Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 22 Mar 2024

Class

ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम मां शारदा देवी की जीवनी में से हम लोग पाठ कर रहे थे अभी हमने देखा कि क्रोनोलॉजिकल अपनी कहानी कहां तक आई है ठाकुर ने साधना समाप्त कर दी है दक्षिणेश्वर में और अभी कामर पुकुर आए हैं अपनी जन्मभूमि में भैरवी ब्राह्मणी और हृदय को साथ में लेकर के तो यहां से कहानी अभी देखिए कि अभी तक तो ठाकुर ने अकेले साधना की अभी अवतार वरिष्ठ होने के लिए किंतु जब जगत में नए नया धर्म तो नहीं वही अपना सनातन धर्म ही सनातन धर्म के बीज पूरे विश्व में उसको स्प्रेड करने के लिए पूरे विश्व में इसका प्रचार करने के लिए जो शक्ति की सहाय चाहिए अभी उस शक्ति के साथ में श्री राम कृष्ण देव का फिर से एक बार मिलन हो रहा है 186 7 की घटना है अपनी ध्यान समाधि साधना वो सब समाप्त करके विभिन्न विभिन्न पथों की साधनाए शक्ति साधना वेदांत साधना सब समाप्त करके ठाकुर आए हैं अपने कामर पुकुर जन्मस्थान में आने के बाद में मां को बुलाया है वहां से यह घटना चालू होती है और हम हमने देखा अभी तक कि भैरवी ब्राह्मणी भी ठाकुर के साथ में आई थी कामर पुकुर और मां को देख कर के अभी मां का तो एकदम सरला बालिका जैसा स्वभाव था और भैरवी ब्राह्मणी को वह अपनी सास की तरह बड़ी ही श्रद्धा भक्ति की करती थी तो भैरवी ब्राह्मणी का शुरू शुरू में तो मां के ऊपर में एक मातृ भाव जैसा था उसकी दो-तीन घटनाएं भी देखी कि भैरवी ब्राह्मणी किस तरह से बहुत ज्यादा मिर्च देकर के तरकारी बनाया करती थी और जब मां को देती थी तो मां अब और देती थी खाने के लिए तो मां खाती थी आंखों में से आंसू निकल आते थे किंतु फिर भी जब भैरवी ब्राह्मणी पूछेगी कि तरकारी कैसी हुई है तो मां कहेगी बहुत अच्छी हुई है डर के मारे कि व मैं यह कह दूं कि बहुत ज्यादा मिर्च डाला है तो वह नाराज ना हो जाए तो मां अपनी सुविधा असुविधा को नजरअंदाज करके भैरवी ब्राह्मणी को श्रद्धा भक्ति की दृष्टि से देखती थी किंतु जैसे कि एक समय आता ही है समाज में फैमिली में परिवार में रहते हैं मनुष्य सहज स्वभाव जो होता है कि मां भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के ऊपर में वास ल भाव था ठाकुर को अपने संतान की तरह देखती थी किंतु अब जब और ठाकुर का भी था कि भैरवी ब्राह्मणी के साथ में बात करते थे उनको समय देते थे उनको बड़ी ही श्रद्धा की नजर से देखते थे किंतु जब मां का आगमन हुआ तो नेचरली है कि ठाकुर की अभी एक ठाकुर का समय मां को शिक्षा देने में जाने लगा मां को धर्म की शिक्षा साधना कैसे करनी है और इसी चपट में हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मां को सभी चीजों में तैयार कर रहे है बात सिर्फ यह नहीं है कि साधन राज्य में मां को तैयार कर रहे हैं साधना किस तरह से करनी है वह सिखा रहे किंतु संसार का किस तरह से कर्म क्या कर्म किस तरह से करना है सब कुछ सिखा रहा है किसके साथ में किस तरह से व्यवहार करना है कहां पर जाते हैं तो किस तरह से रहना है यह जो आगे में हमने पढ़ा ना जखन जेमोन खन ते मोन जेखाने ज शेखाने तेम जार संगे जेमोन तार संगे तेम मने बंगोली में अपने ऑर्डर में यह बड़ा ही फेमस मुक्ति है जब भी कोई नया ब्रह्मचारी कोई यंग लड़का जॉइन करने के लिए आता है इवन कोई डिवटी के वॉलंटिली एक बात है इसको हमेशा ख्याल में रखो जोखन जेमोन खन तमन जब हम जिस तरह से रहते हैं जिस तरह की परिस्थिति में है उस समय उस उस तरह की परिस्थिति के साथ में एडजस्ट करके चलना चाहिए जेखाने जेमोन शेखाने ते मोन जिस जगह पर रहते हैं उस जगह की जो कोई भी रिक्वायरमेंट से नियम कानून है विधि विधान है उसको पालन करके रहना चाहिए जार संगे जेमोन तार संगे तमोन अर्थात कि जो सामने व्यक्ति है उसको उसके साथ में उस तरह का बिहेवियर करना चाहिए अभी यहां पर हमारे से छोटी उम्र के जो लक भक्त है वगैरह आएंगे तो उनके साथ में स्नेह और आदर पूर्वक वर्तन करना चाहिए हमारे सीनियर साधु है उनको श्रद्धा की दृष्टि से देखना चाहिए पूछना चाहिए कि महाराज आपको कोई मैं सेवा की जरूरत है कि नहीं मैं आपको किस तरह से हेल्प कर सकता हूं तो सामने जो भी है उनके साथ में उस तरह से वर्तन करना चाहिए अभी ऐसा कभी-कभी ऐसा होता है कि अच्छा जब यह बात हुई किंतु साथ में उस का काउंटर भी है एक बार बाबूराम महाराज की मां जो कि आठुर में रहती थी उन्होंने ठाकुर को कहा व वैष्णव थी तो तो वैष्णव लोगों का एक दीन हीन भाव रहता है तो कि अपने को अपना अहंकार को बिल्कुल शून्य कर देना जैसे कि ठाकुर ने अपने बाल जब बढ़ गए थे जटा हो गई थी अपने बालों से र रसिक मेहतर था जो कि वहां पर टॉयलेट क्लीन किया करता था उसका टॉयलेट ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन किया था यह मेरा ब्राह्मण होने का अहंकार बिल्कुल शून्य हो जाए इसलिए तो एक वैष्णव भावधारानी बाबूराम महाराज की मां वो आकर के ठाकुर को कहती है कि देखिए अभी भी मैं सबके हाथ का खाना नहीं खा सकती अर्थात कि ब्राह्मण शरीर होने से या ऊंची जात का शरीर होने से बड़ी काष्ट का शरीर होने से कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारी ऊंची जात है और इनलोग लोग की नीची जात है तो मैं इन लोगों का हाथ का खाना कैसे खाऊंगी ऐसा एक रहता है तो किंतु जब साधना करते तो सबके हाथ का खाना खाना चाहिए तभी तो आप निरह कारी त्व में स्थापित होंगे तो वो जाकर के ठाकुर को कहती है कि मैं अभी भी मेरा अहंकार इतना नहीं गया अभी ये अहंकार नहीं गया यह तो मेरी कमेंटरी है साथ में उन्होंने इतना कहा ठाकुर को कि मैं सबके हाथ का खाना अभी तक नहीं खा सकती कहने का यह आशय है कि पूछना चाहती है कि अभी भी अहंकार पूरा गया नहीं तो मैं क्या करूं तो ठाकुर ने कहा देखो कि जिसके हाथ का जिसके तिस के हाथ का खाना खाने से ही धर्म हो जाएगा ये कोई ठीक नहीं है इस ये कोई ठीक बात नहीं है धर्म तो तब होगा जब ईश्वर के ऊपर में अपनी शरणागति आएगी तो देखिए कि ठाकुर किस तरह से कभी हम लोग ये साधना की माया जाल में फस जाते हैं बहुत सारी इंस्ट्रक्शंस बहुत मैंने चारों ओर से हमारे सर पर आ जाती है कि अच्छा जो साधक है वो तो यह भी करता है साधक वो भी करता है है तो यह सब तो अपने से होता नहीं है तो ठाकुर इस तरह से ज्ञान की तलवार लेकर के यह माया जाल को काट देते हैं ठाकुर क्या कहते हैं कि हां ये जोखन जेमन खन तमन यह सब तो ठीक ही है किंतु देखिए कि सबसे इंपॉर्टेंट चीज है कि ईश्वर के ऊपर में शरणागति वरना बहुत सारे लोग कोई कोई लोग ऐसे भी होते हैं कि अपना है ना सोशल इंजीनियरिंग मने एक वो करके ठीक करके रखते हैं कि हां बोलने में इतने पटू होते हैं कि सबके साथ में इतना सुंदर व्यवहार करेंगे आपको लगेगा कि अरे वाह इसके जैसा और कोई साधु ही नहीं है किंतु हृदय होता है शायद हो सकता है कि शुष्क हो या तो फिर ऐसा भी हो सकता है मुख में राम बगल में छोरी वो कहते हैं ना अपने कि मुंह से तो अच्छी-अच्छी बातें कर रहा है किंतु हृदय में फिर विष भरा हो ऐसा भी हो सकता है माने यह सब जो उपदेश है वो सब एक सोशल लेवल पर उपदेश है इसको बियोंड वन पॉइंट इस इस तरह की उपमा को स्ट्रेच नहीं करना चाहिए एक पॉइंट से आगे इस मां को नहीं ले जाना चाहिए क् जो भी है यह भैरवी ब्राह्मणी जब कामर पुकुर आई तो मां भैरवी ब्राह्मणी के साथ में बिल्कुल अपनी सास की तरह व्यवहार करती थी बड़ी ही अपने जो भी असुविधा है उसको छुपा करके रखती थी किंतु फिर भी यह जो ह्यूमन नेचर है वो ह्यूमन नेचर की वजह से भैरवी के ब्राह्मण में ईर्षा प्रकट हुई कि ठाकुर मुझे अभी जितना समय देते थे उसमें से उतना समय अभी नहीं नहीं देते अभी उनका समय उनकी सहधर्मिणी मां शारदा के साथ में बीत रहा है तो यह नेचरली भैरवी ब्राह्मणी सहन नहीं कर पाई और फिर धीरे-धीरे करके एक के बाद एक घटनाएं हुई देखिए गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं अच्छा किंतु उसको पढ़े इससे पहले कल की एक घटना के बारे में हमारा थोड़ा सा डिस्कशन बाकी रह गया है कल महाराज जी ने क्या लिखा था कल एक घटना हम ने देखी कि जिस तरह से एक दिन भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को गौरांग के वेश में सजाया और गौरांग की तरह ही कपड़े पहनाए गौरांग महाप्रभु तो पता है बांगला के एक अवतार थे व बड़े ही वन ऑफ द ग्रेटेस्ट अवतार इन इंडिया उनके प्रति जितने भी अपनी श्रद्धा भक्ति हो वो कम है ठाकुर खुद उनको बड़ा ही रिस्पेक्ट देते थे ठाकुर उनको ब मानते थे तो गौरांग महाप्रभु की तरह भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को सजाया तो माला वगैरा पहनाई और फिर मां शारदा को कहा कि आकर के ठाकुर को ठाकुर का दर्शन करके जाओ तो मां आई और देखा कि ठाकुर उस समय भाव में मग्न हो गए थे तो यह देख कर के मां को थोड़ा भय भी लगा और थोड़ा सा एक लज्जा भी हुई कि भैरवी ब्राह्मणी वहां पर खड़ी है वो तो सास की तरह है तो फिर बहुत ज्यादा कुछ बातें ना करके ठाकुर को प्रणाम करके चली गई इस घटना के बारे में फिर जो गंभीरानंद जी महाराज है वह क्या लिखते हैं देखिए घटना बड़ी छोटी है बड़ी सहज है किंतु गंभीरानंद जी महाराज इसकी जो व्याख्या करते हैं इसके बारे में थोड़ा सा हमको सोचना होगा महाराज जी क्या लिखते हैं संभव तो ई अनिर्वायता मिश्रित छलो संभवत इस भय के साथ में मां तो फट करके प्रणाम करके चली गई दौड़ कर के चली गई महाराज जी ने लिखा है द्रुत पदे चलिया गलन माने दौड़ कर के चली गई बिल्कुल वहां पर रुकी नहीं तो पहले तो हमको अनुमान हो सकता है कि माने यह भाव समाधि वगैरह देखा नहीं फिर भैरवी भी वहां पर खड़ी थी तो डर की मरी चली गई होगी किंतु महाराज क्या कहते हैं भय के साथ में लज्जा भी मिश्रित थी कारण आमा दिग के मने राखी ते होई बे हमको यह बात याद रखनी होगी जि श्री मा तखन लज्जा पटा ब्रता नव बधु श्री मां उस समय भी लज्जा रूपी पट में आवृत नव वधु है लज्जा पटा वृता कितना सुंदर शब्द है मां के बारे में लज्जा के पट में आवृत नव वधु है स्वश स्निया ब्राह्मणी सम्मुख है पति सिधान ये स्वश स्निया सास की स्थान पर जिनका जगह है यह भैरवी उसके सामने पति के साथ में तहर अज्ञात सारे ओ कोनो चपलता चलेना अज्ञात सार में भी माने गलती से भी भूल से भी पति के साथ में कोई भी चपल चंचल बिहेवियर चंचलता प्रकाशित नहीं होनी चाहिए आर स्वभाव तो धीरा श्री मायर चरित्रे उहर नितांत अभाव छलो और स्वभाव से ही धीर मां के चरित्र में इस तरह की चंचलता का संपूर्ण रूप से अभाव था अभी देखिए यहां पर चंचलता का महाराज जी क्या अर्थ करते हैं हमको पता है कि ठाकुर ने मधुर भाव की साधना की है ठाकुर खुद अपने को गोपी या तो राधा मान कर के गोपी जब वह साधना करते थे दक्षिणेश्वर में थे मथुर बाबू जब जीवित थे और ठाकुर की जितनी भी आवश्यक है उसको पूर्ण करने के लिए वह हमेशा तत्पर रहते थे उस समय की यह घटना है जब मधुर भाव की साधना करने का प्रारंभ किया ठाकुर ने तो अपने को गोपी या तो राधा मान कर के वह साधना करते थे स्त्रियों की तरह ही कपड़े पहनते थे और जब मथुर बाबू उनको अपने जान बाजार कलकत्ता में एक जान बाजार बोलकर के जगह है जहां पर मथुर बाबू का बंगला हुआ करता था रास मणि का तो वहां पर जब अपने बंगले पर अपने मकान पर ले जाते थे अपने घर तो घर में जैसे अन्य सब स्त्रियां है उन सब स्त्रियों के साथ में ठाकुर भी स्त्रियों के कपड़े पहन कर के ही रहते थे उस समय यह पहचानना मुश्किल हो जाता था कि वह पुरुष है कि नहीं देखिए ये ठाकुर का यह प्रकृति भाव आजकल का नहीं है बचपन में भी वोह हमने एक छोटी सी घटना हमको पता है कि किसी के कामर पुकुर में ही ये ऐसा वो पर्दा प्रथा होती है ना तो पर्दा प्रथा का कोई बहुत ज्यादा मतलब मने कोई कोई घर के जो पुरुष होते हैं वो जनरली क्या करते हैं पर्दा प्रथा को कितना माने स्त्री स्त्रियां घर के बाहर कितनी जाए पूरा समय घर में ही रहे इसका एक बैलेंस करके चलते थे जब भी आवश्यकता होने से स्त्रियों को घर के बाहर जाने देते थे और आवश्यकता नहीं रहने से घर के बाहर नहीं जाने देते थे या तो फिर वो जो लाज निकालते हैं ना चेहरा वो अपनी साड़ी से आवृत कर देते हैं वस्त्र से उस तरह से करने को बोलते थे तो जिस घर के पुरुष सबसे उम्र में सबसे बड़े वो उनकी जिस तरह की ऑर्थोडॉक्सी होगी उस तरह से अपने घर की स्त्रियों को रखते थे उस समय की जो परिस्थिति थी उसके अनुसार यह बात है तो जब वह ठाकुर किसी के घर में गए थे तो वहां के पुरुष जो उम्र में बड़े थे वो बड़ा ही अहंकार करके कहने लगे कि मेरे घर की स्त्रियों को तो किसी ने देखा नहीं है हमारी घर की स्त्रियों का चेहरा कैसा है किसी को पता नहीं है इतनी स्ट्रिक्ट पर्दा प्रथा हमारे यहां पर ऑब्जर्व की जाती है तो फिर ठाकुर गदाधर तो बालक ही था उस समय कामर पुकुर में छोटा सा था और तो फिर वो छोटे से बालक में किंतु इतनी बुद्धि है उसने इमीडिएट इनको कह दिया देखिए स्त्रियों का चरित्र अच्छा रखना है तो उनको धार्मिक शिक्षा देनी चाहिए नहीं कि इतनी स्ट्रिक्ट पर्दा में उनको रखना चाहिए उनको पिंजरे में बद्ध एक पंखी की तरह उनको रखना चाहिए ऐसा नहीं उनको धर्म की शिक्षा दो ऐसा बालक गदाधर ने बोल दिया तो फिर भी वो लोग कहने लगे कि हमारे ये अहंकार एक ऐसी चीज होती है ना कि मेरे घर में कोई स्त्रियों का कोई चेहरा नहीं देख सकता तो फिर क्या है कि गदाधर को लगा कि इनका अहंकार भंग करना चाहिए एक बार तो वो क्या किया अपने घर में गया फिर दूसरे दिन स्त्रियों के कपड़े पहन कर के वो आया वहां पे और जाकर के और इतनी म उनका स्त्रियों का मैंने बात सिर्फ यह नहीं है कि कपड़े पहनना वो वर्व है वर्तन है चाल चलन है आवाज है सब कुछ इतना मने गदाधर ऑब्जर्व करता था ना सब कुछ नाटक भी करता था तो नाटक में तो उस समय ऐसा था कि स्त्रियों को लेकर नाटक कोलकात्ता में होते थे थिएटर में किंतु गांव में तो स्त्रियों का अभिनय पुरुष लोग ही करते थे तो ठाकुर ने कहा है कि जो लोग नाटक में यह धार्मिक नाटकों में स्त्री का पात्र अभिनय करते थे उनका चाल चलन रहना वगैरह सब स्त्रियों जैसा हो जाता था यह ठाकुर का सब पूरा ऑब्जर्वेशन है ठाकुर भी यहां पे इस तरह के पात्र का अभिनय शायद करते होंगे तो किंतु उनका ऑब्जर्वेशन ऐसा पक्का था कि जब वो वहां पर उसके घर में गए स्त्रियों के कपड़े पहन के और कहा कि अभी तो रात बहुत हो गई है मुझे और कहीं प मैं तो इस तरह से प्रवास कर रही हूं और कहीं पर जाने की जगह नहीं है मेरे लिए क्या आप मुझे थोड़ा सा आसरा देंगे तो उस घर के जो पुरुष थे वो जो बड़ा ही करके बोला करते थे कि हां मेरे घर की स्त्रियों का चेहरा किसी ने नहीं देखा तो उन्होंने कहा अच्छा अच्छा ठीक है जाओ जाओ तुम जाओ भीतर में जाओ सब औरतें वहां पे है उनके साथ में जाकर के रहो तो फिर वो गदाधर बिल्कुल स्त्रियों के कपड़े में ही भीतर में चला गया भीतर में जाकर के सबके साथ बात किया कौन कैसा है क्या है सब देख लिया फिर दूसरे दिन जाकर के उनको बताता है देखिए मैं कैसे आपके घर में चला गया आपके भीतर में अंदर महल उसको कहते थे वहां पर चल जाकर के मैंने सब कुछ ऑब्जर्व कर लि तो ये देख कर के फिर वो जो पुरुष थे उनका घमंड चकना चोर हो गया और बाकी लोगों को भी बड़ा हंसी आने लगा तो देखिए ठाकुर जो है स्त्रियों का अभिनय किया करते थे स्त्री सुलभ प्रकृति भाव जिसको कहते हैं वह उनमें था तो यह प्रकृति भाव की साधना अपने को राधा मान कर के भगवान कृष्ण की आराधना यह चैतन्य महाप्रभु का मधुर भाव का एक अभिन्न अंग है चैतन्य महा प्रभु ने ही इस तरह से मधुर भाव की साधना का प्रचलन किया है मधुर भाव की साधना पहले भी थी किंतु आधुनिक समय में उसके प्रचलन करता है गौरांग महाप्रभु तो अभी ठाकुर भी इसी तरह से गोपियों के कपड़े पहन के गोपियों की तरह ही ईश्वर को चामर डालते थे यह सब करते थे और यहां तक कि देखिए कि ये साइकोसोमेटिक माइंड और बॉडी का जो लिंक है कभी-कभी हम सोचते हैं कि पहले बॉडी इवोल्व होता है फिर बॉडी को कंट्रोल करने के लिए ब्रेन और कॉन्शियस निस इवॉल्व होती है किंतु एक्चुअली जिस तरह से ज्ञान योग में स्वामी जी कहते हैं कॉन्शसनेस इवॉल्व होती है और एडवांस जितनी भी कॉन्शसनेस होती जाती है उसको सपोर्ट करने के लिए बॉडी फिजिकल बॉडी साथ-साथ इवोल्व होता है तो मेनिफेस्टेशन हो कॉन्शियस इव कॉन्शसनेस इवोल्व नहीं होती कॉन्शसनेस का मेनिफेस्टेशन होता है तो मेनिफेस्टेशन जितना बढ़ता जाएगा कॉन्शसनेस का बॉडी भी साथ-साथ में इवोल्व होता जाएगा तो यहां पर भी ठाकुर जब राधा भाव की मधुर भाव की साधना कर रहे थे तो स्त्रियों को महीने में जिस तरह से मासिक आता है तो ठाकुर को भी उस तरह से होने लगा ठाकुर को भी वस्त्र का व्यवहार करना पड़ता था जब ब्लीडिंग होता था उसको क्लीन करने के लिए यहां तक उने लीला प्रसंग में संपूर्ण विवरण है शारदानंद जी महाराज ने साधना साधक भाव के जो उनका चैप्टर है पूरा वर्णन शरद महाराज ने किया है पढ़ कर के हमको आश्चर्य होगा हनुमान की महावीर के भाव की साधना करते थे दास भाव की अपने को महावीर हनुमान मान कर के भगवान राम की स्तुति करते थे तो हनुमान को जिस तरह से पूंछ होती है वैसे ही उनकी करोड़ रज जो है स्पाइनल कोर्ड उसका जो आखिरी ये जो है वहां पर वो बढ़ने लगा था कोकस उसको बोलते हैं इंग्लिश में जैसे पूंछ जैसे बढ़ती है एक ईच जैसा बढ़ गया था पूछ की तरह जैसे कि अभी पूंछ आने ही वाली हो मने इस तरह से जैसे कॉन्शसनेस में चेंजेज होता है शरीर भी उसके साथ चेंज होता है तो यह अद्भुत ठाकुर की साधना हमको देखने को मिलती है तो यहां पर भी अभी मधुर भाव का अर्थ क्या है ठाकुर अपने को राधा मान कर के भगवान कृष्ण को पति मानते थे अभी प्रश्न होगा कि ठाकुर और मां का संबंध क्या है हम क्या ऐसा मानेंगे कि ठाकुर और मां के बीच में मधुर भाव था क्योंकि वो तो ठाकुर थे पुरुष और माथी प्रकृति भगवान शिव और माथी पार्वती गौरी और यह थे अवतार वरिष्ठ और माथी जगदंबा स्वयं तो इन दोनों का जब मिलन होगा तो क्या हम यह मान ले कि ठाकुर और मां के बीच में या तो मां का ठाकुर के प्रति मधुर भाव था क्या हम ऐसा मान ले मेरा पर्सनल जो मैंने यह सब चिंतन इतना उच्च कक्षा मने एकदम हायर लेवल का है और अपनी बुद्धि भी कम पड़ जाती है यह सब मैंने बातें करते करते चिंतन करते करते किंतु यह जो छोटी बुद्धि ठाकुर ने हमको दी है एक लिमिटेड उससे मैं जो अनुमान करता हूं मुझे ऐसा नहीं लगता कि मां और ठाकुर के बीच में मधुर भाव का संबंध था मां जब पहली बार ठाकुर के साथ में विवाह हुआ था मां की उम्र मुश्किल से पांच-छह साल थी तो उस समय तो वो बच्ची की और ठाकुर की 23 साल की उम्र थी तो फिर एक बच्ची का अपने पिता के प्रति जो भाव होता है वो बालिका का भाव मां का ठाकुर के प्रति होगा और वैसे भी ठाकुर और मां के बीच में एज गैप इतना बड़ा था कि मां ठाकुर को अपने पिता के रूप में ही एक तरह से शायद देखती होंगी और बाद में जब मां दक्षिणेश्वर गई और ठाकुर के लिए खाना पकाना वगैरह शुरू किया और ठकर की केयर करना शुरू किया तब सहज रूप से मां का ठाकुर के ऊपर में मातृ भाव जैसा प्रकट हुआ होगा ठाकुर ने खुद कहा है जब एक पत्नी होती है पत्नी का पति के प्रति मधुर भाव तो होता ही है साथ में मातृ भाव भी होता है पति का वो पत्नी एक अपने बच्चे की जिस तरह से केयर करती है पत्नी भी पति की अपने बच्चे की तरह ही इतना ही म केयर करके उसकी मने सेवा करती है तो यह मुझे ऐसा लगता है कि शुरू शुरू के समय में शुरू के दिनों में मां का ठाकुर के प्रति बालिका का भाव होगा और फिर बाद में मां का ठाकुर के प्रति मातृ भाव होगा मुझे ऐसा नहीं लगता कि ठाकुर और मां के बीच में मधुर भाव का संबंध होगा क्योंकि यह जगत जननी ईश्वर स्वयं है यह दोनों संसार में लीला करने के लिए आए हैं शुद्ध भाव का प्रदर्शन करने के लिए आए और मधुर भाव की जो साधना होती है वह साधक और ईश्वर इन दोनों के बीच में ही होनी चाहिए यदि एक स्त्री और पुरुष मधुर भाव के बारे में सोचना शुरू करें तो वहां से पतन एक स्टेप ही दूर है तो इसीलिए यह मेरा एनालिसिस है और यहां पर इसीलिए महाराज जी बड़े ही मने संयमित रूप से इस तरह से कहते हैं कि मां जब उस समय ठाकुर को प्रणा काम करने के लिए आई तो वधु के रूप में कोई चंचलता प्रकाशित ना हो जाए मधुर भाव रूपी चंचलता ठाकुर के सामने प्रकाशित ना हो जाए इसके बारे में मां बड़ी ही सावध थी क्योंकि आखिर में तो मनुष्य का शरीर धारण किया है मानव देह में अभी तो मां जगदंबा है तो मानव देह के जो गुणधर्म है व तो रहेंगे ही रहेंगे तो उस गुण को मानवीय जितने भी भाव है उस परे तो बड़ा ही कंट्रोल करके रहना है तो फिर ठाकुर जिस तरह से भाव में है उस तरह से और भैरवी भी वहां पर उपस्थित है तो किसी भी तरह से कोई भी प्रकार की चंचलता मधुर भाव का एक अंश भी बिल्कुल प्रकाशित ना हो इसके लिए मां बड़ी ही प्रयत्न वान थी और इसीलिए साथ में भी महाराज ने क्या कहा है वैसे भी मां का स्वभाव बड़ा ही धीर था धीर स्थिर था जिससे कि दूसर को कहीं पर भी पता नहीं चलेगा कि मां के मन में क्या चल रहा है ठाकुर ने कहा था ना कि एक छोटा सा तालाब है उसके भीतर में जद हाथी प्रवेश करें तो पानी में इस तरह से वो वेव्स आएंगे भरती ओट ऐसी आएगी कि पूरा तोल पाड़ हो जाएगा ठाकुर का ये बंगोली शब्द है तालाब में तोल पाड़ हो जाएगा अर्थात कि पानी ऐसा उछले कि चारों ओर जाएगा किंतु एक विराट दीर्घ समुंदर है उसमें यदि हाथी प्रवेश करता तो क्या है कि उसकी सतह पर थोड़ा सा शायद पता चलेगा कि हाथी ने प्रवेश किया और फिर किंतु बिल्कुल पता नहीं चलेगा तो वैसे ही जिसका भाव सहन करने की भाव को रक्षित करने की भाव को कंटेन करने की जिसमें क्षमता होती है वे लोग कितना ही भाव का तोल पाड़ उनके मन में हो जाए बाहर में कुछ भी नहीं पता चलेगा और जिसका मन छोटा होता है भाव को धारण करने की क् क्षमता कम होती है अल्प होती है उनको थोड़ा सा ही भाव होने से चीखना चिल्लाना शुरू कर देंगे जैसे कि हृदय के साथ में हुआ था वो हृदय बार-बार ठाकुर को बोलता था आपको इतना भाव समाधि दर्शन होते हैं मुझे कुछ करवा दीजिए तो एक बार सही सही उनको कोई भाव कुछ हो गया तो हृदय चिल्लाने लगा अरे रामकृष्णा चलो हम गांव गांव शहर शहर चलते हैं लोगों को यह मंत्र वितरण करते हैं लोगों को चैतन्य देते हैं तो ठाकुर क्या कहते हैं रसशाला रोश बैठ साला बैठ और ऐसा करके उसके छाती पर हाथ घिसने लगे तब कहीं जाकर के हृदय का भाव संवरण हुआ तो मैंने ठाकुर कहते हैं कि तुम मैं मुझे इतना इस तरह के हजार भाव दिन रात होते रहते हैं फिर भी मैं इतना चिल्लाता नहीं हो तुम ऐसा थोड़ा सा भाव हो गया क्या चिल्लाना शुरू कर दिया है राजा महाराज की बात है राजा महाराज भी इसी तरह से ठाकुर के पीछे में लगे थे कि आप मुझे कुछ दर्शन दिलवा दीजिए यह दिलवा दीजिए फिर एक बार क्या हुआ कि नाट्य मंदिर में वो राजा बैठे थे सामने से ठाकुर आ रहे हैं अचानक ऐसा लगा कि सामने से और एक महाशक्ति ठाकुर के साथ-साथ में आ रही है वो देख कर के राजा महाराज अर्थात की राखल उस समय का बाद में स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट तो राजा महाराज ऐसे डर गए कि दौड़ कर के ठाकुर के कमरे में चले गए और फिर जाकर ठाकुर गए तो मने ठाकुर को तो समझ में गए थे कि क्या हुआ है तो पूछा कि क्या रे क्यों दौड़ के चला गया तो कहा कि महाशय मुझे ऐसा डर लगा पता नहीं कि इसलिए मैं दौड़ के चलाया तो ठाकुर ने कहा कि बड़ा भाव भाव करता था देखो भाव होने से ही भाग जाता ह स्वामी जी का देखिए कि ठाकुर ने स्पर्श कर दिया तो चिल्लाने लगे अरे आप क्या कर रहे हैं मेरे मां है मेरे बाबा है आप क्या कर रहे हैं मेरे साथ तो थोड़ा सा ही भाव होने से अभी ऑफकोर्स स्वामी हृदय की बात अलग है राजा महाराज की और स्वामी जी की बात अलग है वो तो साधना के शुरू में थोड़ा भाव की वजह से डर लगा था वरना तो राजा महाराज तो बाद बाद में ने देखे कि कुसुम सरोवर के किनारे जब तपस्या करना जब ध्यान करना शुरू किया था सही सही में साधना करने की शुरुआत की तब तो इस तरह के कितने ही भाव राजा महाराज के हृदय में आते थे जाते थे किसी को पता नहीं चलता था वह जो एक फेमस फोटोग्राफ है ना कि राजा महाराज एक बड़ी आराम कुर्सी के ऊपर में बैठे हुए हैं इस तरह से हाथ इस तरह से तत्व मुद्रा में है और आंख बंद है और मुंह में हुक्के का नल है और मैंने लग रहा ऐसे कि हुक्का पी र है किंतु इस तरह से भाव के राज्य में विचरण कर रहे पता नहीं मैं आई एम फोर्चुनेगीएंट्स जिसके हृदय में होता है उसकी कैपेसिटी क्या है उसके अनुसार भाव संवरण कर सकते हैं या तो भाव दिखा सकते हैं तो मां थी धीर स्थिर वो मां का इतना मां के भीतर में भाव और समाधि वगैरह चलता ही रहता था किसी को पता नहीं चलता था क्योंकि भाव को छुपाने की मां की क्षमता बड़ी ही अद्भुत थी इवन ठाकुर से भी ज्यादा थी ठाकुर तो फिर भी नृत्य कीर्तन करते करते समाधि में मग्न हो जाते और फिर इस तरह से बोलते कि हां मैं अमी भाजे जाओ अमी तामा खाओ मने मैं शोच करने के लिए जाऊंगा मैं तमा खाऊंगा मैं कुछ नाश्ता करूंगा ऐसी कोई इच्छा प्रकट करते थे जिससे कि उनका मन फिर से जागतिक जगत में वापस आ जाए तो ठाकुर को तो फिर भी सबके सामने भाव समाधि होता मां को तो कुछ भी नहीं होता था बड़ी ही रेर कुछ कुछ घटनाएं है मां के जीवन में जैसे कि लगेगा कि हां मां को भाव हुआ है या तो समाधि हुई है तो यहां पे भी देखिए ये तीन-चार सेंटेंस में किंतु गंभीरानंद जी हमको बताते हैं मां और ठाकुर का संबंध क्या है बिल्कुल चंचलता नहीं बिल्कुल यह मधुर भाव का प्राग्यवारे स्थिर होकर के मां और ठाकुर रहते थे किंतु दोनों के बीच में ये जो हृदय का संबंध था कितना स्ट्रांग था पता है ना एक बार मां यह दक्षिणेश्वर की घटना है मां दक्षिणेश्वर में थी नौबत में थी ठाकुर अपने कमरे में थे मां ध्यान कर रही थी उस समय वो वृंद वृंदा बोलकर के एक दासी वहां पर थी काम करती थी उसने कोई एक बर्तन पटक दिया अभी आप ध्यान करते हैं तो आपका मन बड़ा ही सूक्ष्म हो जाता है आपका मन बड़ा ही शांत हो जाता है उस समय एक एकाएक एक बड़ा आवाज होने से मन को बड़ा ही आघात पहुंचता है तो जैसे ही उसने बर्तन पटका मां एकदम मां ध्यान कर रही थी चिल्ला उठी एकदम एक मने सूक्ष्म मन हो गया है तो तो जैसे मां चिल्लाई यहां पर ठाकुर दौड़ के आए वहां से कि क्या हुआ क्या हुआ देखने के लिए तो देखिए कि मां को कुछ भी होता है ठाकुर इमीडिएट जो कुछ करते हैं सब छोड़ कर के दौड़ कर के मां के पास में आते थे तो मां और ठाकुर का हृदय का संबंध तो था किंतु जगत में लोगों के सामने दिखाने के लिए नहीं वह हृदय में छुपाने के लिए ही था और हमारे लिए है कि हम जब साधन भजन करते हैं आंख बंद करके चिंतन करते हैं तो हमको इस सब संबंध के बारे में मन में ही मन में चिंतन करना चाहिए और उस चिंतन से हमको वोह जो स्पिरिचुअल बूस्ट मिलेगा वो आप थोड़ा सा प्रैक्टिस करेंगे तो पता चलेगा कि हम कभी मने इमेजिन करके कि हां अभी संध्या का समय है जब करने के समय इस तरह से थोड़ा सा इमेजिन करना है संध्या का समय है मैं भी ये मास्टर महा है कि यह नरेन है इनकी तरह नौका में बैठ कर के दक्षिणेश्वर में आता हूं और दक्षिणेश्वर में चांदनी का घाट है वहां पर उतर करके पहले तो जाकर के माहाकाली को दर्शन करते हैं फिर भगवान वो राधाकांत का मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर वहां दर्शन करते हैं भगवान शिव बार शिवलिंग है वहां पर दर्शन करते हैं फिर ठाकुर के कमरे में जाते हैं ठाकुर को प्रणाम करते हैं नबत में मां है मां को जाकर के प्रणाम किया मां का आशीर्वाद दिया फिर या तो चांदनी में या तो पंचवटी में या तो ठाकुर के कमरे में बैठ कर के जप कर रहे हैं और ठाकुर अपनी वह अमृतम कथा हमको सुनाते रहते हैं तो इस तरह से थोड़ा सा यदि आप इमेजिन करेंगे जब ध्यान इतना सहज सरल हो जाएगा माने सही में एक मैं हमेशा कहता हूं कि राम कृष्ण संघ में जो लोग आते हैं उनको ध्यान करना बड़ा ही सहज है उन लोगों के लिए एक हाथ में कथामृत रखना है एक हाथ में जपमाला रखनी है कथामृत पढ़ते जाना है जपमाला पर जप करते जाना है जब जप अटके तो कथामृत और कथामृत अटके तो जब इन दोनों से बाहर में मन को नहीं जाने देना है बड़ा ही सहज सरल उपाय है हमारे लिए तो यह ठाकुर और मां का यह प्रसन्न अभी भैरवी ब्राह्मणी और कामर पुकुर में वापस जाते हैं महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मायर भैरवी प्रति श्रद्धा अभाव नाथा किले ओ श्री मा का भैरवी के प्रति श्रद्धा का अभाव न रहने से भी तहर सही ठाकुरे सहज मिलन के भैरवी कतो कोटा इर्षद चोखे देखीते लागले मा का ठाकुर के साथ में मिलन जो हुआ है इस घटना को भैरवी थोड़ी सी ईर्षा की दृष्टि से देखने लगी बहु परि बारे बहु श्वसुर अबा तो संबंधों पारिवारिक जीवन के बीच मय करिया तुले बहुत सारे परिवार होते हैं अब यह उस समय की बात है आज से 100 1 स साल पहले की बात है कि बहुत सारे परिवारों में सास और बहू का इस तरह का अवांछित माने जो चाहिए नहीं इस तरह का संबंध परिवार को विष मय करके रख देता है वर्तमान खेत्रे श्री मा अति ब निरी हो प्रकृति छिन वर्तमान क्षेत्र अभी हमारे उदाहरण में मां बड़ी ही निरीह अर्थात कि बड़ी ही शांत प्रकृति की थी यह यह भैरवी उनको वह तीखा तरकारी भी देते हैं मिर्च वाला तो भी बेचारी खा लेती है आंखों से आंसू निकल रहे हैं फिर भी मुंह से कहती है कि बड़ी अच्छी तरकारी हुई है अपनी सुविधा असुविधा के प्रति बिल्कुल ही अभन थी इस तरह की मां होने से भैरवी को वैसे तो कोई मौका नहीं मिलता था भैरवी तहर बिरुद्धे अभि जोगर कोनो अशर खुजा पायले ना भैरवी मां के विरोध में कोई भी कंप्लेन करने का अवसर खोज के पा नहीं रही थी जे ईर्षा अन्न भावे आत्म प्रकाश करते लागी लो किंतु फिर भी यह ईर्षा थी अन्य रूप से आत्म प्रकाश करने लगी मां का स्वभाव ऐसा है कि भैरवी ब्राह्मणी नाराज भी होगी जदी उनको डांटे गी भी सही को कोई भी काम करने को बोलेगी बेचारी मां सब कुछ चुपचाप कर लेती थी तो अभी कंप्लेन करने का मौका कहां पर मिलेगा किंतु फिर भी यदि इस तरह से सीधे रूप से कंप्लेन नहीं तो और तरह से भैरवी की ईर्षा प्रकाशित होने लगी क्या किस तरह से प्रकाशित हुई तीनी श्री रामकृष्ण भविष्यत संबंध संदे प्रकाश पूर्वक ताहा के सावधान करिया दते लागले श्री राम कृष्ण के भविष्य के बारे में संदेह प्रकाशित करके भैरवी उनको सावधान करने लगी सहधर्मिणी सहीत अबाध मिश्रण फले तिनी साधक जीवने पतन बरण करते छन मात्र सहधर्मिणी के साथ में स्वच्छंद मिश्रण के परिणाम से वह अपने साधक जीव जी वन में पतन की ओर आगे बढ़ रहे हैं पहले तो वह मां के प्रति कोई कंप्लेन नहीं खोज पा रही है जा जाके ठाकुर को नहीं कह रही कि देखो कि शारदा ऐसा कर रही है कि वैसा कर रही है ऐसा कंप्लेन करने का मौका नहीं मिला तो दूसरे तरह से ठाकुर को भड़का रही है कैसे कि आप जब वोह मां शारदा के साथ में रहेंगे तो आपके साधक जीवन में पतन की संभावना है क्यों क्योंकि यह तो जग विदित है कि साधकों को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए यह तो सबके सबको यह बात पता है तो आप अपनी स्त्री के साथ में रहेंगे तो कहीं ना कहीं आज नहीं ना कल पतन तो होना ही होना है अभी देखिए यह ब्राह्मणी जैसे हमारी कल बात हुई थी जिनको अवतार वरिष्ठ के रूप में घोषित करती है वही ब्राह्मणी पहले तो यह है कि मां को ना पहचान पाई जगदंबा के रूप में किंतु फिर ठाकुर को भी ऐसा क्यों कहती है भाई जैसे सामान्य साधक है स्त्री के साथ में रहेंगे तो पतन हो जाएगा जिन्होंने निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली है जिनके क्लेश काम कांचन दग्ध बीज हो चुके हैं जड़ मूल के साथ में जल के समाप्त हो चुके हैं वो ठाकुर किस तरह से फिर से कामना और वासना में आबद्ध होंगे लिप्त होंगे तो यह मन के ऊपर में ईर्षा का आवेश होने से माने भैरवी ये तो सिर्फ ये नहीं कि मां को नहीं पहचान पा रही है ठाकुर को जो पहचाना था तो ठाकुर का स्वरूप भी विस्मृत हो गई साथ-साथ में ठाकुर को सामान्य साधक के रूप में वार्निंग देने लगी चेतावनी देने लगी कि अपनी सहधर्मिणी के साथ में मत रहना वरना पतन होगा सिद्ध गुरु तोतापुरी सिद्ध गुरु तोतापुरी प्रज्वलित वनी सदृश जहां के ए विषय नि शंक चित्ते संपूर्ण स्वाधीनता प्रदान करया लेन स्नेहाधाम तहा के शयो चले ढाक रखा करते अग्रसर होलेन बड़ी ही लिटरेरी बड़ी ही मने साहित्य के रूप में बड़ा ही रसाल यह सेंटेंस है मैंने इसको अंडरलाइन करके रखा है सिद्ध गुरु तोतापुरी प्रज्वलित वहनी सदृश प्रज्वलित अग्नि सिखा के समान प्रज्वलित वहनी अर्थात की अग्नि सिखा सदृश अर्थात की समान प्रज्वलित वहनी सदृश जहां के अर्थात के श्री राम कृष्ण के ए विषय निशंक चित्ते संपूर्ण स्वाधीनता प्रदान करिया लेन इस मामले में इस बारे में कि हां मां के साथ में रहो इससे धर्म जीवन को हानि नहीं पहुंचेगी सिर्फ इतना ही नहीं मां के साथ में कोई भी काम विकार के बिना रहोगे तो तुम ब्रह्म विज्ञान में स्थित हो गए हो यह साबित होगा यह प्रूव होगा यह जिस जिस तोतापुरी सिद्ध गुरु तोतापुरी सबसे पहले देखिए एक के बाद एक महाराज जी किस तरह के शब्द प्रयोग करते हैं तोतापुरी के बारे में कहा है सिद्ध गुरु ऐसे वैसे गुरु नहीं है जिन्होंने खुद साधना करके ब्रह्म विज्ञान का सब कुछ जो भी एक्सप्लोरेशन करना है कर लिया है ब्रह्म विज्ञान का अथ स इति माने प्रारंभ से अंत जिन्होंने समझ लिया है वैसे सिद्ध गुरु तोतापुरी वहनी सिखा वहनी शिखा सदृश प्रज्वलित वहनी शिखा सदृश माने जो प्रज्वलित अग्नि की जैसे रामकृष्ण है पहले से ही निशंक चित्ते संपूर्ण स्वाधीनता प्रदान करिया चले निशंक चित्ते माने मन में कोई डाउट रख के नहीं कि हां शायद नहीं होगा शायद होगा निशंक चित्ते संपूर्ण रूप से निश्चिंत होकर के संपूर्ण स्वाधीनता प्रदान करया छले संपूर्ण स्वाधीनता प्रदान की है उसी श्री राम कृष्ण को स्नेहाधाम देखिए ऊपर में लिखा है सिद्ध गुरु तोतापुरी अभी यहां पर क्या लिखा है स्नेह अंध ब्राह्मणी स्नेह से अंध हो चुकी ब्राह्मणी तहा के स्वीय अंचल ढकिया रोखा कोरीते अग्रसर होलेन तहा के अर्थात श्री राम कृष्ण को स्वीय अंचल अंचल अर्थात की आंचल तहा के स्वीय अंचल ढकिया श्री राम कृष्ण को अपने आंचल से ढक करके उनकी रक्षा करने के लिए तत्पर हुई सिद्ध गुरु तोता ने श्री राम कृष्ण को कह दिया है मने प्रज्वलित अग्नि शिखा सदृश्य श्री राम कृष्ण को कह दिया है कि यदि धर्म पत्नी के साथ में रहोगे तो काम विकार बिना रहोगे तो तुम्हारे ब्रह्म विज्ञान को कोई हानि नहीं होगी ऊपर से ब्रह्म विज्ञान में स्थित हो गए ऐसे श्री राम कृष्ण को स्नेह में अंध भैरवी ब्राह्मणी अपने अंचल से ढक करके अपने अंचल से रक्षा करने के लिए ढक करके रक्षा करने के लिए तत्पर हुई है एक सेंटेंस ये पूरा मने शारदानंद जी का ये लीला प्रसंग पढ़ेंगे ना प्रत्येक सेंटेंस इस तरह का है मने लंबा लंबा और इतना मतलब अलंकृत मने साहित्य की दृष्टि से देखेंगे पढ़ने का बड़ा ही आनंद आता है किंतु फिर थोड़ा सा पेशेंस होना चाहिए कि प्रत्येक क्योंकि क्या है कि प्रत्येक शब्द में एक ना एक गुढा अथ छुपा हुआ है ब्राह्मणी स्नेह से अंध है किंतु तोतापुरी सिद्ध गुरु है इसका अर्थ क्या हुआ पता है कि देखिए कि लीला प्रसंग में नंद जी महाराज ने एक बड़ी ही इंपॉर्टेंट बात कही है जो भी गुरु ठाकुर के पास में आते हैं उन्होंने ठाकुर को तो साधना करवाई उन्होंने तो ठाकुर को सिद्धि प्राप्त करवाई किंतु साथ-साथ में ही उनकी खुद की सिद्धि प्राप्त करने में जो एक या दो स्टेप बाकी थे वह ठाकुर के साथ में रहकर के उनकी वह संपूर्ण सिद्धि उन्होंने भी प्राप्त की उन्होंने भी ठाकुर के साथ में रहकर के संपूर्ण सिद्धि में स्थित होना है वो आखिरी जो लास्ट स्टेप था वो ठाकुर की मदद से उन्होंने लिया तोतापुरी के साथ में क्या था कि अद्वैतवाद थे और अद्वैतवाद होने की वजह से शक्ति को वो थोड़ा सा तुच्छ दृष्टि से देखते थे शक्ति का आदर नहीं करते थे किंतु हमको तो पता है जगत में रहना है शक्ति के संसार में तो शक्ति के इलाके में ही रहना है शक्ति के आश्रित होकर के ही रहना है मैं मैं ब्रह्मज्ञानी हूं ब्रह्म विज्ञानी हूं किंतु शरीर तो पंच महाभूत का बना हुआ है शरीर तो इस शक्ति के क्षेत्र में है शरीर खराब होगा तो आप कहां जाएंगे तो सही में आखिर में तोतापुरी के साथ वही हुआ पेट की पीड़ा से परेशान होकर के गंगा में समाधि शरीर त्याग करने के लिए गए किंतु गंगा में जितना ही आगे बढ़ते जाते हैं दक्षिणेश्वर के सामने शायद आपने गंगा देखी होगी डेढ़ 2 किलोमीटर चौड़ी है और प्रचंड उसका प्रवाह है गंगा सागर के साथ में मिलने के लिए जा रही है पूरे भारत का मने अ भारत का जल गंगोत्री से आया हुआ सब पूरा जल उस गंगा में है किंतु उसका अर्थ है कि उस गंगा में प्राण गवाना प्रवाह के साथ में बह जाना बड़ा ही आसान है जैसे ही आप थोड़ा सा ध्यान उनका गया आपका गए आप शरीर गया उसी गंगा में यह तोतापुरी जा रहे हैं अपना शरीर विसर्जन करने के लिए किंतु जितना आगे जाते हैं इतना ही शायद देखेंगे कि कमर से ऊपर में पानी ही नहीं जा रहा आधे तक चले गए किंतु कमर के ऊपर पर पानी नहीं जा रहा तब कहीं जाकर के उनको पता चला कि ये ईश्वर की मां काली की शक्ति की कोई लीला है और वो समझ कर के वो वापस आए और उनको तब उन्होंने शक्ति को स्वीकृत किया स्वामी जी ने भी शक्ति को स्वीकृत स्वामी जी ने भी मां को स्वीकृत किया था ठाकुर दूसरे दिन बड़े ही खुश खुश थे मैंने वो एक दूसरा प्रसंग है तो वो भैरवी ब्राह्मणी का भी ठाकुर के ऊपर में यह जो स्नेह का जो संबंध था वो अंध की तरह हो गया था और भैरवी ब्राह्मणी को आखिर में ठाकुर से विदाय लेकर के ठाकुर के साथ में ममत्व का यह संबंध तोड़ कर के काशी में जाकर के रहना था और संपूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी थी तो यह घटना जब चल रही है उस समय तोतापुरी सिद्ध हो चुके थे ठाकुर के साथ में रह कर के किंतु ब्राह्मणी को अभी भी सिद्धि संपूर्ण सिद्धि प्राप्त करना बाकी थी इसलिए महाराज जी लिखते हैं कि सिद्ध गुरु तोतापुरी किंतु स्नेह से अंध ब्राह्मण एक हीने एक एक शब्द में जिस तरह से अपनी ये पूरी स्टोरी है पूरी स्टोरी के कितने सारे एलिमेंट्स एक एक शब्द में एक एक सेंटेंस में आ जाते हैं इसका और भी थोड़ा सा विच मने विश्लेषण हम और थोड़ा सा कल करेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु

Question Answer

मने ये एक्चुअली देखिए मधुर भाव है ना सर्व भाव का समागम है तो हम कह सकते हैं कि मधुर भाव है किंतु एक्चुअली प्रॉब्लम क्या है ना मधुर भाव का शब्द प्रयोग करने से ही हम लोगों को लगता है कि वह नायक और नायिका का भाव प्रेम भाव एक्चुअली शुद्ध मधुर भाव है उसमें सब भावों का समागम इसलिए मधुर भाव की भी बड़ी ही विषद डेफिनेशन होने उसके ऊपर में बहुत चर्चा होनी चाहिए शारदानंद जी महाराज ने पहले तो एक लंबी सी भूमिका बांधी है मधुर भाव की कि वह क्या है बाद में फिर ठाकुर ने क्या साधना की है वह करने को जाते हैं तो मैं इस तरह से मैं जब सोचता हूं तो मैं यह सोचता हूं कि मां और ठाकुर के बीच में सभी तरह के भाव है बस मैं मधुर भाव शब्द उसको नहीं देता ठाकुर मां को काली के रूप में देखते हैं मां ठाकुर को काली के रूप में देखती है वो जो बुद्धिस्ट कोन है ना कि एक हाथ से ताली बजने से उसका क्या आवाज आता है तो यह ठाकुर और मां का ये क्वान है अपने लिए पजल है य पजल सॉल्व करेंगे तो सिद्धि मिल जाएगी वो जो ठाकुर का वो फेमस उदाहरण है ना कि साप सबको डरा रहा था तो एक ब्रह्मचारी ने साप को दीक्षा दी तो साप बेचारा एकदम शांत हो गया तो गांव वालों ने साप की पिटाई कर दी अभी नेक्स्ट टाइम जब ब्रह्मचारी आया तो बड़ा ही क्षत विक्षत अवस्था में साप को देगा तो जब साप यह कहता है व ब्रह्मचारी पूछता है कि अरे तुम्हारे साथ क्या हुआ तो बोला कि इनलोग मैं तो अभी शांत हो गया हूं मैं किसी को दस्ता नहीं हूं तो गांव वालों ने मेरी पिटाई की तो ब्रह्मचारी ने क्या कहा अरे मैं तुमको दने के बारे में मना किया है तुम फोस तो दिखा सकते हो डर तो दिखा सकते हो आत्मरक्षा के लिए फिर ठाकुर क्या कहते हैं बाद में क्या कहते हैं कि सन्यासी के लिए वो भी नहीं है कि मने डर भी ना दिखाना वो सन्यासी के लिए है किंतु संसारी जो है वो जद आत्म रक्षा करने के लिए जो दूसरों को डर ना दिखाए तो तो फिर आत्म रक्षा संसार कैसे चलाएगा वो गांधी जी के वो फेमस बात है ना कि वो जब इंडिया पाकिस्तान का पार्टीशन हुआ तो वहां से बहुत सारे लोग यहां पर आए और फिर उसमें से कुछ-कुछ लोग गांधी जी को मिलने के लिए गए कि बोला कि महात्मा जी आप तो अहिंसा का प्रचार कर रहे हैं इसके लिए जब यह लोग जो हमारी पत्नी और बच्चों को लेने मारने के लिए आए तो हमने कुछ किया नहीं अहिंसा का पालन किया गांधी जी बड़े ही नाराज हो गए महामूर्ख य तो मैं अहिंसा का पालन तो एक प्रिंसिपल के रूप में है ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने अपने परिवार जनों की रक्षा करने के लिए हिंसा की बात नहीं चलती है वहां तो तुमको खड़क ले के सामने खड़े हो जाना है रक्षा करने के लिए फिर अपनी भी जान यदि जाए तो जाए वह भी धर्म के रूप में उचित है तो क्या है कि जब अपनी या तो परिवार जनों की रक्षा करने की बात आती है तो वह तलवार उठानी हीय उठानी है वरना तो हम संसार में रह ही नहीं पाएंगे यह जो बुद्धिज्म का जो सबसे बड़ा प्रॉब्लम कि जो क्षत्रिय है उसको भी आप भिक्खू बना दो उसको भी अहिंसा का उपदेश दे दो जब फिर जब आक्रमण होता है तो अहिंसा वाले सब इकट्ठा होकर के बैठे हैं कौन दुश्मनों के सामने लड़ने को जाएगा ऐसा होता है तो इसलिए हिंसा और अहिंसा को बैलेंस करके चलना है बहुत ज्यादा अहिंसा साधुओं के लिए है साधकों संसारी लोगों के लिए तो कहीं ना कहीं तो साथ में तलवार होनी ही चाहिए आत्मरक्षा करने के लिए यह तो एक बात हो गई दूसरा एक क्या होता है पता है आज का जो जगत है ना डिस एंपावरमेंट का जगत है खास करके हम लोग जब पहले थोड़ा सा प्रिमिटिव सोसाइटी था अपने हाथ में बहुत कुछ था इंडिपेंडेंस था आज का सोसाइटी इस हद तक इंस्टीट्यूशनलाइज हो गया है कि आपको लगता है कि आई एम कंपलीटली डिस एंपावर्ड मैं क्या कर पाऊंगा ये जो चार्ली चैपलिन के शुरू शुरू के जो मूवीज थे वो इतने पॉपुलर क्यों हुए थे ऐसे इसलिए सिर्फ नहीं कि मैंने चार्ली चैपलिन से बड़ा ही कॉमेडी करता है वो भी एक है और ये इंडस्ट्रियल एज में आप बड़ी-बड़ी फैक्ट्रीज में काम करते हैं हजार हजार वर्कर्स एक साथ में काम करते हैं अभी मेरी सुविधा असुविधा के प्रति वह फोर मैन आएगा और आपकी पिटाई करके जाएगा मैंने इस तरह का पावर उस समय उसके पास था वो आपको काम करना ही करना है थोड़ा सा भी इधर-उधर नहीं चलेगा इंस्टिट्यूशन में ऐसे फंस गए हैं मने तो यह जो मने मशीन मनुष्य को कंट्रोल करता है ऐसा एक भाव ये चार्ली चैपलिन के मूवीज में ये जो फ्रेंस कफ का है उसकी नोवेल्स में यह भाव आता है 1984 बो करके एक नोवल है तो क्या है कि यह सोवियत यूनियन ईस्टर्न यूरोप जो कम्युनिज्म का प्रभाव यह वेस्टर्न यूरोप में ये इंडस्ट्रियल इजेशन का प्रभाव ऐसे जो बढ़ता जाता है तो हमको ऐसा लगता है कि हम इंस्टिट्यूशन में ऐसे फंस गए हैं कि अभी हमारा सुनने वाला कोई नहीं है हमारा कुछ मने हम अपनी जो प्रॉब्लम्स है इसको कहीं कह भी नहीं सकते इंस्टीट्यूशन से निकल के कहां जाएंगे आपको जॉब करनी है एक जगह पर जॉब करेंगे तो वहां पर भी वो वही पागल बॉस है दूसरी जगह प जाएंगे वहां पर भी पागल बस है आपके पास में क्या वो ऑप्शन है कि शहर को ही छोड़ दो चलो मैं गांव में जाता हूं एक छोटी सी जमीन लेकर के खेती करके वहां पे इंडिपेंडेंटली रहूंगा क्या ये ऑप्शन है क्या अपने पास इंडिपेंडेंट रहने का वो ऑप्शन बहुत कम लोगों के पास होता है कि छोड़ो इंस्टीट्यूशंस को मैं इंडिपेंडेंस रहे वो नहीं होगा तो इंस्टिट्यूशन में रह कर के ये जो डिस एंपावरमेंट की फीलिंग आती है दिस इज अ वेरी सीरियस मैटर और इसका सोल्यूशन फिर आखिर में अब बोस के साथ में फाइट कैसे करने को जाओगे गांधी जी का जो उदाहरण है बाकी सब उदाहरण उस समय के लिए ठीक था प्री इंडस्ट्रियल एज के लिए कि हां कोई आपके पर अटैक करता है आप अपने को डिफेंड करो ठाकुर तो कह देंगे कि वो ना ही साप ना ही वह ब्रह्मचारी ना ही गांव वाले किसी इंस्टिट्यूशन का पार्ट थे वी आर पार्ट ऑफ इंस्टीट्यूशंस और इंस्टिट्यूशन की पॉलिस माने इंपर्सनल शोषण होता है बहुत बार तो ये जो शोषण होता है ना इंपर्सनल शोषण होता है ऐसा नहीं कि किसी का आपके प्रति द्वेष है पॉलिसी ही इस तरह की है कि हम चक्की में पीसे जा रहे हैं क्या करेंगे तो इसके बारे में अभी दो है कि एक तो है कि क्या हम इने थोड़ा लॉन्ग टर्म सोचे इंडिविजुअल की दृष्टि से नहीं सिविलाइजेशन की दृष्टि से जद सोचे तो क्या इंस्टीट्यूशंस आर बेड क्या इंस्टीट्यूशंस को समाप्त करके फिर से वही व प्री इंडस्ट्रियल रूरल सोसाइटी में चले जाना चाहिए जबकि थोड़ा बहुत इंडिपेंडेंस सबके साथ में था क्या यह सोल्यूशन है ना कि बेटर सोल्यूशन मुझे नहीं लगता कि दैट इज अ सॉल्यूशन क्योंकि ये सिविलाइजेशन जिस डायरेक्शन में जा रही है इंस्टीट्यूशंस तो आपको चाहिए ही चाहिए वरना जो भारत में जो जिस तरह से हजार साल तक हम इस तर लूटेरे के शिकार बनते रहे हम यदि इंस्टीट्यूशंस को छोड़ देंगे तो फिर से इस तरह से आक्रमण चालू हो जाएंगे तो वो तो उपाय ही नहीं है एक इंस्टीट्यूशनलाइज आर्मी चाहिए इंस्टीट्यूशनलाइज जुडिशरी चाहिए ये इंस्टीट्यूशनलाइज बैंकिंग इंडस्ट्रियल सेक्टर्स चाहिए और हमको उसमें इवन रामकृष्ण मिशन इज अ इंस्टिट्यूशन अभी मोनिस्ट जम इट सेल्फ अ इंडिपेंडेंस रह कर के मुझे नहीं लगता कि मैं इतना डेवलप हो पाता जितना मैं यहां पे डेवलप हो पाता हूं दोनों तरीके से यदि आप प्रॉपर इंस्टिट्यूशन चलता है तो सोसाइटी में कंट्रीब्यूशन भी होता है इंडिविजुअल का डेवलपमेंट भी करता है तो दो तरह से इसको सोचना है इफ आई एम ए पार्ट ऑफ इंस्टिट्यूशन तो मुझे ज्यादा स्पिरिचुअल होना होगा थोड़ा बहुत अपमान थोड़ा बहुत यह सब सहन करने की कैपेसिटी अपने में होनी ही चाहिए और दूसरी ओर अपनी मेधा शक्ति को इतना डेवलप करना है कि एक समय ऐसा आए कि हम इंस्टिट्यूशन को मॉडिफाई करके उसका स्वभाव जो है वह परिवर्तन करने की क्षमता डेवलप कर सके दिस आर द टू सॉल्यूशंस अदर वाइज और कोई सोल्यूशन नहीं है ठाकुर के जितनी भी कहानियां है आप देखेंगे कि प्री इंडस्ट्रियल एज की है प्री इंस्टिट्यूशन एज की मैंने इवन रामकृष्ण मिशन में भी अब ठाकुर आज जो कहते हैं उसका अक्षरशः पालन नहीं होता माने ठाकुर कहते हैं कि सन्यासी यदि स्त्री की मूर्ति भी है वो भी यदि सामने आए तो उसके ऊपर नजर नहीं डालनी है किंतु अपने बड़े महाराज है मैनेजर महाराज है तो ऑफिस में बैठे हैं सभी सभी लोग आएंगे सभी तरह के डिवटी आएंगे सबके साथ समान रिस्पेक्ट देक बात करना है उस समय ये सब नहीं चलेगा तो इवन रामकृष्ण मिशन एज ए मोनेस्ट्री इंस्टिट्यूशन ठाकुर के शब्दों का अक्षरशः पालन नहीं कर सकता सो वी हैव टू थिंक कि इस जमाने में किस तरह से रहना है तो मेरी दृष्टि से दिस आर द टू सोल्यूशन थोड़ा सा अपमान सहन करने के लिए स्पिरिचुअलिटी स्पिरिचुअल पावर बढ़ाए और साथ में मेधा शक्ति बढ़ाए कि वो जो एक शेर है ना कि खुद ही को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है मैंने अपने को ही इतना बुलंद करना है कि लोग आक के पूछे कि हां इस इंस्टिट्यूशन को क्या फ्यूचर होना चाहिए कैसे गवर्न करना चाहिए डर ऑर्डर में नहीं है और किसी के मुझे पता नहीं देखना पड़ेगा इस तरह से मैंने सोचा नहीं ऑर्डर में तो नहीं है होगा तो कोई जाहिर नहीं करेगा प्रश्न ही नहीं आता यह सब तो इंटेंसली पर्सनल होता है बाहर में मुझे इस तरह का याद नहीं आता ना अभी देखिए मैंने आज की मॉडर्न दृष्टि से यदि देखि तो अभी मैंने कल ही न्यूज पढ़ा किय जो एक पैरालाइज एक व्यक्ति है उसके ब्रेन में वह जो ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस चिप बैठा दिया है न्यूरा लिंक इसको कहते हैं वह टेस्ला वालों ने तो वह उससे वह अभी पैरालाइज है किंतु वह कंप्यूटर को व मैनेज कर पा रहा है ऑपरेट कर पा रहा है यह भी तो एक कॉशसनेस मेनिफेस्ट होक के बॉडी का इवोल्यूशन होता है वो तो एक है अभी आर्टिफिशियल इवोल्यूशन भी होना शुरू हो गया है किंतु देखिए इसमें भी है कि अभी जैसे जो कटिंग एज जो लोग फिजिक्स और डायनामिक्स कॉन्शसनेस में रिसर्च करते हैं उन्होंने ऑलरेडी एक्सेप्ट कर लिया है कि कॉन्शसनेस का एक रोल है माने स्पेस टाइम मैटर एनर्जी यह जो चार बेसिक इंग्रेडिएंट्स है सोने कॉस्मो के उसमें कॉन्शसनेस इ आल्सो अ पार्ट तो मैंने क्या है कि यह एक्सेप्टेंस तो हो गया है वही बात है कि डिटेल्स वर्क आउट करनी है फेन मेन ये जो उसका क्या नाम था मैं भूल गया शजर शजर इक्वेशन बड़े ही फेमस है क्वांटम डायनेमिक्स में शजर का एक पूरा पैसेज है कि मुझे उपनिषद पढ़कर के इतनी प्रेरणा मिली है सुंदर पैसेज है मेरे पास है कि नहीं मैं कल लाकर के उसको पा पढ़ूंगा अभी इसके बाद में तो नेक्स्ट वीक ज्ञान योग चलने वाला है वापस उसम ये उसको पढ़ के चालू करूंगा कि शजर उपनिषद के बारे में क्या बोलता है माने ये जो कटिंग ये जो फ्रिड्स ऑफ केप ने वो लिखा है कि वो टा ओ फिजिक्स मने जो कटिंग एज है उन्होंने ऑलरेडी य कॉन्शसनेस का रोल एक्सेप्ट करना शुरू कर दिया है वही बात है कि डिटेल्स वर्क आउट करनी है य मैंने आपको वो किताब सजेस्ट की थी ना कि वह अपने कल्चर इंस्टिट्यूट ऑफ कल्चर में कॉन्शसनेस के ऊपर सेमिनार होते थे तो अपने अपने साध अपने ऑर्डर के मने टॉप लेवल के साधु फिर बाहर के वह अपने वेदांती साधु फिर वोह फिजिसिस्ट ये सब सब मिलाकर के वो पढ़िए उसको माने यह सब है ये लोग वर्क वर्कशॉप करते हैं तो आईडिया सब आट होते हैं वो कोई यह पॉइंट रखेगा तो सामने यह पॉइंट रखा जाएगा फिर यह वर्किंग पेपर्स पब्लिश होते हैं तो होना चाहिए रामकृष्ण मिशन शुड टेक मने इसमें अग्रेसिव होना चाहिए किंतु अब यह सब क्या अपने अपने ऑर्डर में स्पोरा होता है कभी होता है कभी बंद हो जाता है फिर से कभी स्टार्ट हो फिर इंस्टीट्यूशनलाइज ये इंस्टीट्यूशनलाइज करने से ही यह प्री इंस्टीट्यूशनल मोनेट म और यह पोस्ट इंस्टीट्यूशनल मोनेट बहुत डिफरेंस है दोनों में