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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 18 Mar 2024

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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित इसमें जयराम बाटी में हुए प्र संग का सब विवरण जिस चैप्टर में किया है जिसका नाम है वधु इसका हम पाठ कर रहे हैं कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मां को वैराग्य और त्याग की शिक्षा दे रहे हैं और इसमें ही पता चला कि मां वैसे तो सब कुछ चुपचाप सुन रही है किंतु जब मातृत्व के बारे में ठाकुर कुछ भी बोलते हैं तो मां सामने उत्तर देने से चकती नहीं तो यह बात हमने देखी की अभी और भी बाद में एक सुंदर प्रसंग देखा था कि ठाकुर उस समय कामर पुकुर में थे और पास के किसी गांव में एक धार्मिक नाटक हो रहा था तो मां को और उनके परिवार की आर एक स्त्री को वो नाट उनकी एक रिलेटिव वो नाटक देखने जाने की इच्छा थी किंतु ठाकुर ने मना कर दिया तो नेचुरली इससे कि उनको दुख तो होगा ही होगा अभी ठाकुर को पता चल गया कि उनको दुख हुआ है तो ठाकुर ने क्या क्या कहा डरो मत चिंता मत करो दुखी मत हो वो जो नाटक पूरा मैं आपको मैं ही अभिनय करके दिखाऊंगा और फिर उन्होंने हूबहू इस तरह से अभिनय किया कि जैसे शायद हो सकता है जो नाटक मंडली वाले जो लोग होंगे वो भी इतना अच्छा अभिनय नहीं कर पाएंगे तो ये इसमें ठाकुर की ये जो ठाकुर का वैसे वो अपने बहुत बार वो जो जिसको कहते हैं ना सुडो साइंस सूडो साइंस अर्थात कि असली साइंस नहीं होता है किंतु साइंस के नाम पर बहुत सारी चीजें चलती है तो ऐसा एक चीज चलता है कि देयर इज अ अ क्रिएटिव ब्रेन एंड देयर इज एन एनालिटिकल ब्रेन अब क्या ह्यूमन ब्रेन देखेंगे उसको दो डिवीजन आपको दिखाई देंगे बीच में से एक गैप है और एक लेफ्ट हेमिस्फीयर है एक राइट हेमिस्फीयर है तो कोई कोई लोग कहते हैं कि उसमें से एक हेमिस्फीयर है इट इज अबाउट क्रिएटिविटी और दूसरा हेमिस्फीयर है इट इज अबाउट एनालिटिक्स अभी कौन सा लेफ्ट क्रिएटिविटी वाला है कि राइट क्रिएटिविटी वाला है वो मैं भूल गया किंतु इस तरह से अपने ब्रेन के दो डिवीजन करके कहा जाता है मुझे नहीं लगता इसमें कुछ सही सही सत्य होगा कि नहीं पता नहीं किंतु ऐसा बहुत सारी जगह पर कहते हैं तो ठाकुर का किंतु हम एक बात देखते हैं कि उनका जो ये एनालिटिकल ब्रेन था जो क्रिएटिव ब्रेन था वो बहुत ही डेवलप हुआ था एक के बाद कितने सारे प्रसंग हमको इसके बारे में मिलते हैं जब छोटे थे और एक जगह पर गए थे देखा कि एक मूर्तिकार मां दुर्गा की मूर्ति बना रहा है तो यह छोटा सा गदाई उस समय ठाकुर का नाम था गदाधर या तो फिर सब लाड़ में बुलाते थे गदाई तो गदाई ने क्या किया वो वहां से पिछी ली और वह चित्रकार की और आंखों में इतना सुंदर शेप दे दिया मां दुर्गा की आंखों को कि एकदम जैसे कि मूर्ति जीवंत हो गई और फिर बाकी सब चीजें तो पता ही है कि वह जो स्कूल में भेजते थे तो स्कूल में से भाग कर के वह माणिक राजा बोलकर के वहां पर एक धनपति थे जिनका एक सुंदर आम का बगीचा था वहां पर जाकर के नाटक का अभिनय किया करते थे अपने मित्रों के साथ में और गाना तो उनको इतना सुंदर आता था मास्टर महाशय जब कथामृत में लिखते हैं कि जब नरेंद्र को गाते हुए सुना तो वह कहते हैं कि इतना सुमधुर गान उन्होंने ठाकुर के अलावा और किसी को गाते हुए नहीं सुना अभी देख लीजिए कि स्वामी जी ने तो एक्चुअली गान की शिक्षा ली थी बहुत अच्छे-अच्छे कोलकात्ता के उस्तादों के पास है तो नरेद को अर्थात कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद को बहुत अच्छा गान भजन करना आए यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है किंतु ठाकुर वही गांव में बिना किसी उस्ताद के पास में सीखे हुए बिना किसी फॉर्मल संगीत की ट्रेनिंग किए हुए स्वामी जी से भी ज्यादा नरेंद से भी ज्यादा सुमधुर रूप से गा सकते हैं तो सोच के देखिए कि ठाकुर को जो चीज पसंद है उसमें वह कितना गहराई पूर्वक उतर करके उस विद्या को आयत करते हैं उस विद्या में एक्सपर्टाइज्ड था किंतु अगेंस्ट दिस ये एनालिटिकल कैपेसिटी की बात करें तो वही लाहा बाबू की जो पाठशाला में ठाकुर अपने गांव में पढ़ने के लिए जाते थे वहीं पर वो कुछ पढ़ते नहीं थे स्कूल छोड़ कर के भाग जाते थे और बाद में हमने देखा कि कथामृत में एक प्रसंग है तो ठाकुर पूछते हैं कि यह जो चंद्र है व पृथ्वी के आसपास कैसे घूमता है और यह जो भरती ट वगैरह कैसे आते हैं तो ये ऐसा प्रश्न इस तरह का कुछ प्रश्न जब हुआ तो मास्टर महाशय वह जमीन के ऊपर में मिट्टी में यह पृथ्वी है गुरुत्वाकर्षण है यह भरती ओट पानी में जो होती है चंद्र की गति यह सब समझाने लगे तो ठाकुर ने क्या क्या अभी र रहने दो रहने दो मेरा सरने टल टल करता है माने मेरा मेरा सर पूरा घूम जा रहा है यह सब पढ़ते पढ़ते यह सब सीखते सीखते अर्थात कि ये नंबर्स जो है मैथमेटिक्स या तो फिर ये एनालिटिकल थिंकिंग यह सब ठाकुर को वैसे ऊपर से लगता है ऑफकोर्स यह सब चीजें तो ऊपर ऊपर से ही होती है इस तरह का विश्लेषण जैसे कि ब्राह्मण समाज वालों ने कहा था कि परमहंस देव का फैकल्टी ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है आज देखिए कि रामकृष्ण मिशन पूरे वर्ल्ड में फैला हुआ है ठाकुर का क्या था देखिए कि जब यह केशव सेन आया ठाकुर को कहा कि अरे महाशय मेरे यह जो चेले थे या तो मेरे सब ये बंधु थे यह लोग अपने से तो मैंने ब्राह्मण समाज छोड़ के चले गए साथ-साथ में मेरे कितने सारे चेलो को ले गए और फिर मेरे सामने एक दूसरा समाज खड़ा किया है तो ठाकुर ने उत्तर क्या दिया कि तुम समझे सोच समझ करके चेले नहीं बनाते हो इसलिए ऐसा हुआ है ठाकुर ने यह जो फंडामेंटल जो इंग्रेडिएंट्स खड़ा करने का वो क्या है सबसे पहले एकदम कुछ मजबूत एक कुछ माने एकदम परखे हुए कुछ लोगों को ले लिया जाए 10 12 भी भले हो नंबर में भले ही संख्या कम हो किंतु बहुत ही पक्के डिसाइल्स एक बार बना दिए जाए फिर ये डिसाइल जो है बाद में पूरे संघ को विस्तार करेंगे और बाद में यदि संघ में यदि कोई कोई लोग चले जाते हैं या संघ के विरुद्ध में कोई कार्य करते हैं तो संघ को इतनी हानि नहीं होगी किंतु जो सबसे पहले फर्स्ट बैच ऑफ डिसाइल्स है उन्हीं में यदि गड़बड़ हो जाए तो फिर संघ का भविष्य में क्या होगा कोई कुछ बता नहीं सकता तो ठाकुर को इतना तो सेंस था कि अपने डायरेक्ट डिसाइल के रूप में किनको लिया जाए एक सुंदर बात भी है यह बात सुनकर के शर में मैं थोड़ा सा नाराज हो गया था कि ठाकुर ऐसा क्यों करते हैं एक बार यह नरेद वगैरा ने वहां पंचवटी में यह जो ये पिकनिक होता है ना पिकनिक भोजन ऐसा कुछ किया था वहां पर वो खाना बनाया था कुछ अच्छा सा और ठाकुर को बुलाए सब ये त्यागी लड़के वहां पर उपस्थित थे तो सब लोग मिलकर के खाना खा रहे एक पिकनिक जैसा दक्षिणेश्वर काली मंदिर देखा होगा उस समय का तो आपको पता चलेगा आपने जद गए होंगे वहां पर या तो फोटोग्राफ्स देखे होंगे कि एक साइड में पूरा जंगल जैसा था तो ये वन भोज कहते हैं या तो पिकनिक ऐसा करने में बहुत वहां पे आनंद आएगा बहुत ही सुंदर अ प्रकृति रमणीय जगह है प्राकृतिक रूप से बड़ी ही रमणीय जगह है और सा बगल में तो गंगा बह ही रही है तो ये एकदम सुंदर आकाश यह पशु पक्षी यह पेड़ पौधे गंगा बहुत ही सुंदर परिवेश क्रिएट होता है वहां पे ये लोग सब वन भोजन कर रहे थे उस समय किंतु थे सब यही त्यागी लड़के उस समय एक बाउल आकर के उनके साथ में बैठ गया अभी बाउल अर्थात की एक भिक्षा मांगते हुए और साथ-साथ में गान करते हुए जो लोग गली गली घूमते हैं उनको बाउल कहते हैं बंगाल में तो अभी जैसे बाउल आकर के बैठ गया तो ठाकुर ने इमीडिएट कहा अभी नहीं अभी नहीं इनके साथ में मत बैठो फिर क्या कहा कि अच्छा ठीक है बाद में यदि थोड़ा बहुत बचेगा तो तुमको देंगे तो नरेन कहता है स्वामी विवेकानंद भविष्य के उस समय के लड़के नरन कॉलेज में पढ़ते हुए और यह जो लिबरल यह जो माइंड सेट होता है कि ना सभी लोग इक्वल है सभी को इक्वल अपॉर्चुनिटी मिलनी चाहिए सभी को इक्वल बेनिफिट मिलना चाहिए सोसाइटी में इक्वल रिसोर्स डिस्ट्रीब्यूशन होना चाहिए यह सब आज के मॉडर्न आइडियाज से पूरे भरे हुए थे तो स्वामी जी थोड़े से नाराज हो गए कि ठाकुर ऐसा क्यों कहता है इस पावल को कि हमारे साथ में नहीं बैठ सकते कि क्या ये मैंने ये बेटर पर्सन है ये मने खराब आदमी है यह अच्छा आदमी है ऐसा आप कैसे कह सकते हैं जैसे आप संस्कार को मानते हैं कभी-कभी इसके अच्छे संस्कार है इसके बुरे संस्कार है तो ये सब क्या है ये तो पुराने जमाने का सुपरस्टिशन है पुराने जमाने की अंधश्रद्धा है आज के आधुनिक युग में इसका क्या संबंध है तो सबको समान ही गिनना चाहिए कोई ब्राह्मण हो ना कि कोई वैश्य हो ना कि कोई शुद्र हो ना कि कोई अछूत हो यह सब छूत अछूत ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय यह सब अपने मन की कल्पनाएं हैं वो इतिहास का सब यह सुपरस्टिशन है इसको जितना जल्दी दूर कर देंगे इतना ही भारत के लिए अच्छा तो यह सब मॉडर्न आइडियाज वाले स्वामी जी तो थोड़े से नाराज होकर के बोले कि अरे आप ऐसा क्यों करते हैं इसके साथ में वो भले ना चाहे हमारे साथ में बैठे सबके लिए खाना पर्याप्त है तो ठाकुर ने कहा नहीं यह तुम लोगों के साथ में नहीं बैठेगा बाद में जद उसको खाना खाना है बचेगा तो वो खाएगा तो उस समय स्वामी जी यह सब चीजें नहीं समझ सकते थे किंतु बहुत बाद में उन्होंने अमेरिका जाकर के अपने अमेरिकन डिसाइल्स को कहा कि देखो मेरा मनुष्य की परखने की जो शक्ति है उसमें शायद मैं कभी-कभी भूल कर देता हूं स्वामी जी ने सही सही ऐसे डिसाइल्स बनाए थे जो लोग उनको मैंने सिर्फ मैंने उनको दगा नहीं दिया माने उनके बेवफाई सिर्फ नहीं कि उनके अगेंस्ट में इतनी बुरी भली बातें कही है यह जो लियोन लैंडसबर्ग एक अमेरिकन था जिसको कि संन्यास दीक्षा देख कर के स्वामी जी ने नाम दिया स्वामी कृपानंद अभी ये कृपानंद सो कॉल्ड कृपानंद बाद में तो उसने जो सब नाटक किया तो यह लियोन लैंडसबर्ग ने क्या किया पहले पहले तो स्वामी जी के साथ में रहता था स्वामी जी से बहुत प्रभावित हो गया था न्यूयॉर्क में वो एक जर्नलिस्ट था अभी न्यूयॉर्क के जर्नलिस्ट यानी के सबसे मैंने सैनिक कहो सबसे मैंने किसी भी चीज में विश्वास नहीं करेंगे फेथ और उसके ऊपर में कुछ भी नहीं लेंगे ट्रेडिशनल चलती है जहां तक मैं अपने खुद एक्सपेरिमेंट करके परख करके किसी चीज को स्वीकार नहीं करता तब तक मैं किसी चीज में विश्वास नहीं करूंगा तो यह सब जो ब्लाइंड सुपरस्टिशन है यह सब ये ईस्टर्न कंट्रीज जितने भी है जैसे इंडिया है चाइना है जो कि हजारों सालों की सिविलाइजेशन है यह सब वहां की बैड हैबिट्स है हमको न्यूयॉर्क में ऐसा नहीं चाहिए वो भी न्यूयॉर्क का जर्नलिस्ट पत्रकार माने वन ऑफ द मोस्ट क्या कहेंगे कि अथ एंड साइनिंग पर्सन ऐसा कह सकते हैं ये लियोन लैंडसबर्ग स्वामी जी के विचारों को सुनकर के प्रवचन और क्लास को सुनक के इतना प्रभावित हो गया कि स्वामी जी के साथ में रहने लगा न्यूयॉर्क में और फिर स्वामी जी के पास से दीक्षा भी ली सन्यास दीक्षा भी ली किंतु देखिए कि ये भीतर का डीएनए जो है अभी क्या कहेंगे इसके बारे में तो धीरे-धीरे करके उसको जब बाकी अभी स्वामी जी को उस समय मिला था जब स्वामी जी बिल्कुल पहली पहली बार न्यूयॉर्क गए थे अर्थात कि बहुत ज्यादा डिसाइल्स वगैरह स्वामी जी के पास में उस समय नहीं थे किंतु जैसे-जैसे समय चलता गया बीतता गया ज्यादा से ज्यादा क्लास यह प्रवचन वगैरह स्वामी जी देते गए न्यूयॉर्क में ज्यादा से ज्यादा डेडिकेटेड और मने वेल मीनिंग डिसाइल स्वामी जी के पास आने लगे और उसमें ये जो मिस सारा वेल्डो थी जिन्होंने जिसके थ्रू जिनके थ्रू स्वामी जी ने अपना राजयोग जिनको कि डिक्टेट करवाया था तो ये सरा वाल्डो फिर ये मिसेस ओली बुल ओली बुल तो ठीक है जिनके साथ किंतु ये सारा वाल्डो वगैरह जो न्यूयॉर्क का जो ग्रुप था ओली बुल तो बोस्टन की थी तो ये न्यूयॉर्क का जो ग्रुप था वो स्वामी जी से इतना प्रभावित होकर के इतने डेडिकेटेड डिसाइल बन गए कि अभी ये लियोन लैंडसबर्ग था उसके हृदय में ईर्षा का उद्रेक हुआ वो क्या सोच रहा है कि अरे जब स्वामी जी अकेले थे जब उनका कोई बंधु नहीं था कोई मित्र नहीं था तब मैं ही उनके साथ में रहता था था मैं ही सब उनका काम करता था आज यह सब न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी बना दिया है ये न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में यह गुडविन खास करके यह गुडविन जो है स्वामी जी के चारों ओर सब समय स्वामी जी के साथ-साथ में घूमता रहता है और स्वामी जी के जो प्रवचन है उसको यह लिखता है शॉर्ट हैंड में और बहुत अच्छे से लिखता है मतलब लियोन लैंडसबर्ग ने जो स्वामी जी के प्रवचनों की नोंद की थी इससे कहीं ज्यादा बेटर ये गुडविन ने नोंद की है स्वामी जी के प्रवचन की तो नेचुरली स्वामी जी गुडविन से खुश होंगे गुडविन को वैसे स्टेनोग्राफर के रूप में सैलरी दे कर के रखा गया था किंतु वह सैलरी वगैरह तो क्या है जीवन निर्वाह के लिए कुछ तो करना पड़ता है उसकी गरीब मां थी लंडन में तो गरीब ब्रिटेन में तो गरीब मां के लिए तो कुछ चाहिए किंतु अदर वाइज वो बिल्कुल स्वामी जी ने गुडविन को ब्रह्मचर्य दीक्षा भी दी थी और बिल्कुल स्वामी जी के डेडिकेटेड बोला डिवोटा की तरह शिष्य की तरह गुडविन रहता था तो ये इतने हाईली डेडिकेटेड इतने टैलेंटेड लोग जब स्वामी जी के आसपास आने लगे तो यह लैंडसबर्ग था वह धीरे-धीरे करके उसका मन ईर्षा से भर गया और आखिर में पहले तो वह स्वामी जी के सामने यह सब डिसाइल्स की निंदा करता था कि यह देखिए मिस सारा वाल्डो है यह क्या करती है यह गुडविन ऐसा है वैसा है ऐसा करके पहले तो उनके डिसाइल की निंदा स्वामी जी के पास करता था किंतु यह ईर्षा का पोइजन जहर उसके मन में एक समय इतना फेल गया कि धीरे-धीरे करके स्वामी जी की ही निंदा करना शुरू कर दिया तो अभी स्वामी जी तो एकदम शिव स्वरूप है विराट हृदय है कोई उनकी निंदा करे ना करे फर्क नहीं पड़ता देखते थे कि देखो कि इसके भीतर में मुमुक्षु का एक स्पार्क तो अवश्य है तो भले ही चाहे मेरी निंदा कर दे किंतु जब तक वो ईश्वर प्राप्ति करने के लिए मन की शांति के लिए आत्म दर्शन के लिए साधना करता है तो जब तक वो साधना करता है मुझे उसको सहाय भूत होने दो ऐसा करके स्वामी जी ने क्या किया यह बोस्टन में मिसेस ओली बुल थी उसके साथ में लियोन लैंडसबर्ग का परिचय करवा दिया और बार-बार वो मिस ओली बुल को मिसेस ओली बुल को कहते थे कि थोड़ा इसको पैसों की मदद कीजिए बेचारा अभी जर्नलिज्म वगैरह उसका इतना अच्छे से नहीं चल रहा था उसका उस समय और फिर यह त्याग और वैराग्य की बातें करते करते फिर वो जो जर्नलिज्म में जो गलत गलत चीजें लिखनी होती है ना वो लिखने की इच्छा नहीं होती माने ऐसा होता है धर्म के रास्ते पर चलेंगे आप ऑनेस्ट हो जाएंगे आप अच्छे मने गुड बॉय आप बन जाएंगे तब क्या होगा संसार में आप फेलियर होना शुरू हो जाएंगे यह एक धर्म और आध्यात्मिकता की हमेशा से ये एक पैराडॉक्स रहा ही रहा है तो यह लैंडसबर्ग के साथ में भी ऐसा हो रहा था क्या करें तो मिसेस ओली बूल उसको पैसा भेजती थी और सामने यह लड्स बर्ग क्या करता था स्वामी जी को ही गाली लिखते हुए लेटर वो मिसेस ओली बुल को भेजते थे भेजता था अभी मिसेस ओली बुल तो स्वामी जी की इतनी डेडिकेटेड डिपल थी फिर भी बिकॉज की स्वामी जी ने आदेश दिया है सब सहन करती थी जहां तक हो सके पैसा भी देती थी किंतु आखिर में यह लैंडसबर्ग ने क्या किया न्यूयॉर्क के एक अखबार में एक न्यूज़पेपर में स्वामी जी के बारे में एक बहुत ही खराब एक आर्टिकल लिखा क्या लिखा कि यह न्यूयॉर्क की जो सब लेडीज है महिलाएं हैं उन लोगों का दिमाग इतना मतलब करप्ट कर दिया है इस तरह से पूर्व में से आए हुए सो कॉल्ड गॉड मैन माने सो कॉल्ड ये जो सब योगी है वो मैंने उन लोगों ने न्यूयॉर्क की लेडीज का न्यूयॉर्क की स्त्रियों का ब्रेन वॉश कर दिया है ब्रेन करप्ट कर दिया है और क्या उटपटांग यह सब विधियां उनसे करवाते हैं ये योगासन उने क्या सब तांत्रिक क्रियाएं करवाते हैं माने इतना खराब स्वामी जी के चरित्र के ऊपर में न्यूयॉर्क के उनके डिसाइल्स के बारे में जो आर्टिकल लिखा कि वो जब आर्टिकल स्वामी जी को मिला स्वामी जी पूरे बेचारे दुखित हो गए कि अरे चलो उसको यदि वेदांत छोड़ देना है तो छोड़ दे यदि मुको मुझे गाली देना है तो गाली दे किंतु न्यूजपेपर में यह जो वेदांत मूवमेंट जो चल रही है न्यूज़पेपर में ऐसा लिखने की क्या जरूरत है भाई किंतु जो भी है अभी जिसका जो संस्कार तो स्वामी जी ने एक बार अपने डिसाइल्स को कहा था कि ऐसा बहुत बार हुआ है कि मैं किसी का चरित्र आकलन करने में मैंने गलती कर दी है किंतु श्री रामकृष्ण यदि किसी के चरित्र के बारे में कुछ मंतव्य करते हैं तो आज तक कभी भी मैंने उनको निष्फल होते हुए नहीं देखा यदि उन्होंने किसी के बारे में यह कहा कि यह अच्छा उसका संस्कार है अर्थ फिर वो वो व्यक्ति बाहर से चाहे कितना ही बुरा लगे किंतु आखिर में तो यह पता चल ही गया प्रूव हो ही गया कि उसके संस्कार अच्छे ही है और कोई व्यक्ति बाहर से चाहे कितना ही अच्छा लगे यदि पता चले कि इस ठाकुर ने कह दिया कि इसके संस्कार अच्छे नहीं है तो वह व्यक्ति चाहे बाहर से कितना ही लोगों को इंप्रेस कर दे वो आखिर में तो उसने कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ गड़बड़ कर दी ही कर दी है तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं यदि किसी के बारे में कहता हूं यह अच्छा है या बुरा है उस बात पर इतना ध्यान नहीं देना किंतु श्री राम कृष्ण ने कहा है जिसके बारे में जो वो एकदम सही निकलेगा आखिर में और इस बात के दो उदाहरण है एक तो स्वामी जी स्वयं दूसरा है यह नृत्य देखिए नृत्य गोपाल जब वहां पर दक्षिणेश्वर में आता था तो वह ठाकुर जब वो इस तरह से भाव में आकर के नृत्य कीर्तन करते थे तो वह भी कीर्तन करता था नृत्य करता था और भाव में चला जाता था मने ठाकुर का भाव तो रह गया ठाकुर के पास ये और भी ज्यादा मने चेहरा लाल हो जाता था उसकी छाती लाल हो जाती थी मने इतना मतलब एकदम सांस रुप जाती थी लोग उससे इतने प्रभावित हो गए थे ठाकुर को खुद को कहना पड़ा अरे भाई इतना भाव जरूरत नहीं है इतना अच्छा नहीं है तो अभी क्या हुआ कि एक वहां पर ठाकुर के पास में तो पुरुष डिसाइल भी आते थे लेडी डिसाइल भी आते थे तो ये पुरुष लोग तो उससे इंप्रेस हो ही गए थी लेडी डिसाइल्स में भी बहुत सारे उससे प्रभावित हो गए थे बड़ी ही श्रद्धा करते थे तो एक लेडी आती थी ठाकुर के पास में तो वह उनको अपने घर पर ले जाना शुरू किया कहा आप मेरे घर आइए मैं आपकी सेवा करूंगी बीच में खिलाऊंगी अच्छे से आपको रखूंगी आपसे कुछ उपदेश सुनूंगी तो अभी ये बात ठाकुर को पता चली तो ठाकुर ने नृत्य गोपाल को कहा कि अरे तुम क्या वहां पर जाते हो तो यह नृत्य गोपाल बिल्कुल बच्चे की तरह बोलता है कि हां मैं जाता हूं वह मुझे ले जाती है तो इमीडिएट ठाकुर ने कहा अरे साधु सावधान ये मने ये कभी-कभी ये मातृत्व की बात मने तल्य में कहीं परिणत ना हो जाए तो इस तरह से कभी भी किसी स्त्री के घर मत जाओ हो सकता है यदि बिल्कुल जरूरत पड़ जाए तो एक बार जाओ पूरे जन्म में उसके बाद में दूसरी बार मत जाओ किंतु ऐसा कहने के बावजूद उसने यह बात नहीं सुनी और आखिर में सबको पता है हमने उसकी लाइफ की डिटेल इतना तो नहीं पता किंतु हमको यह पता है कि वो प्रॉपर साधु के रूप में डेवलप नहीं हुआ था रामकृष्ण संघ नहीं जवाइन किया था एक ज्ञानानंद अवधूत अपने को नाम दे दिया था और कहीं पर आश्रम बना कर के रहता था और इसके बारे में कहीं और कुछ जाना नहीं जाता तो यह देखिए कि बाकी सब लोग उससे जितने प्रभावित थे किंतु ठाकुर ने उसके चरित्र का क्या आकलन किया और उसका एग्जैक्ट अपोजिट उदाहरण यह स्वामी जी स्वामी स्वामी जी अर्थात कि नरेण कॉलेज में पढ़ता था पिताजी का देहांत हो गया था क्या करें घर में खाने को भी कुछ नहीं है तो अभी कु संगत जिसको कहते हैं ना कुछ कुछ मित्र स्वामी जी के ऐसे थे जिनका संस्कार नहीं अच्छा था अभी नरेद को तो क्या है उसका खुद का चरित्र तो एकदम अग्नि की जवा प्रकट ज्वाला की तरह वह तो पवित्र था किंतु दूसरे लोग क्या कर करते हैं उससे नर को क्या फर्क पड़ता है तो उस समय यह कुछ-कुछ लोग जाकर के ठाकुर को ऐसा कहने लगे कि अरे नरन तो बुरी संगत में फंस गया है पता नहीं ऐसी जगहों पर जाता है जहां पर कु चरित्र वाले लोग रहते हैं कु चरित्र वाली महिलाएं रहती है ऐसा ऐसा करके ठाकुर के पास में कंप्लेन आने लगी यह भवनाथ जो कि नरेंद्र का इतना अच्छा मित्र था वह भवनाथ जाकर के ठाकुर के पास में एकदम रोना शुरू कर दिया कि अरे महाशय हमको क्या पता था कि नरे के साथ में ऐसा होगा तो ठाकुर तब तक तो सब कुछ चुपचाप सुन लेते थे किंतु इस बार जब भवनाथ ने ऐसा कहा तो ऐसे क्रोधित हो गए चुप तुम नरेंद्र के बारे में मेरे पास में इस तरह की बातें कभी मत करना और फिर ठाकुर खुद एक और फिर नरेद को भी पता चला कि लोग जाकर के ठाकुर के पास में मेरी इस तरह की निंदा कर रहे हैं तो नरेण को भी बड़ा अभिमान हो गया कि ठाकुर जद लोगों की निंदा सुन कर के मेरा इस तरह से चरित्र का आकलन कर दे तो मुझे उस ठाकुर के पास जाने की जरूरत नहीं है छोड़ो उनको यह जमाना ही पूरा मने क्रू क्रूर है यह जगत इतना विकट है इतना भयानक है कि यही मेरे मित्र जो कि मेरे साथ में बात करते अपने को बड़ा ही धन्य समझते थे आज जब मेरे पिताजी की मृत्यु हो गई घर में खाने को नहीं तो एक भी मित्र सामने से मुझे मदद करने के नहीं आ रहा है तो यह जमाने के साथ में यह ठाकुर और उसके बड़े अच्छे-अच्छे भक्त है रहो वहीं पर दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास मुझे वहां जाने की कोई जरूरत नहीं ऐसा नर के मन में भी थोड़ा अहंकार आ गया किंतु ठाकुर को देखिए ठाकुर एक दिन ठीक किया कि नरेंद्र को मिलने के लिए जाएंगे और वही एक गाड़ी में बैठ कर के नरेंद्र के घर आए और नरेंद्र को बड़े ही प्रेम से समझा बुझा करके उनको कहा कि तुम आओ दक्षिणेश्वर तो देखिए कि बाहर से जो कुछ भी दिखता है उसके संस्कार कैसे हैं यह ठाकुर को बड़ा ही अच्छे से समझ में आता था तो यह जो था कि अभी ठाकुर के बारे में कि ऊपर ऊपर से ऐसा लगेगा कि यह जो मैथमेटिक्स है यह साइंस है वगैरह ठाकुर को नहीं समझ में आता है यदि हम यह जो मैंने प्रचलित बात करें कि जो उनका जो मने एनालिटिकल हेमिस्फीयर वो काम नहीं करता था और यह क्रिएटिव हेमिस्फीयर है वो बड़ा ही मने ओवर डेवलप था बहुत ज्यादा दर्शन वगैरह होते थे सभी आर्ट्स साइंस में उनका मास्टरी था किंतु ये एक मने हम लोग क्या है कि आनंद करने के लिए इस तरह से ऊपर ऊपर से एनालिसिस करते हैं डीपर जद एनालिसिस किया जाएगा तो इवन ब्रेन साइंस भी कहता है जद अब अब सही सही में अब डीप में जाएंगे तो इस तरह से डिवीजन करना किय एनालिटिकल हेमिस्फीयर है यह क्रिएटिव है मुझे नहीं लगता कि यह सब कुछ मने डीपर में जाएंगे गहराई में जाएंगे तो यह बात सही निकलेगी कॉन्शसनेस इस तरह का विज्ञान है इतना गहरा विज्ञान है कि हमने उस वो जो एक बार न्यूटन ने कहा था ना मैंने और क्या खोज निकाला न्यूटन इज वन ऑफ द ग्रेटेस्ट साइ इन द हिस्ट्री ऑफ मैनकाइंड यही न्यूटन क्या कहता है कि मैंने और क्या खोज निकाला है एक विराट महासमुद्राम शंख मुझे मिल गया रेती में से तो उसको लेकर के मैं उसकी सौंदर्य के बारे में सोच रहा हूं किंतु सामने यह विराट महा समुंदर बिना एक्सप्लोर किए हुए अभी भी ऐसे का वैसा ही पड़ा है और यह बात कितनी सही है न्यूटन के समय हमारी जो कल्पना थी कि ब्रह्मांड इतना सा है ये कुछ प्लेनेट है और एक सूर्य है किंतु आज हमको पता है कि यह जो गैलेक्सी इट सेल्फ मिलियंस एंड मिलियंस ऑफ स्टार्स अपनी गैलेक्सी में है और इस तरह की मिलियंस एंड बिलियंस ऑफ गैलेक्सी है जिसको कि विजिबल यूनिवर्स कहते हैं वो तो 10 12 बिलियन इयर्स लाइट इयर्स अक्रॉस है और वो भी मने विजिबल यूनिवर्स इट सेल्फ इज अ वन पार्ट इन अ लार्जर मल्टीवर्स तो माने अपनी जो अंडरस्टैंडिंग ऑफ नेचर है वो वो कितनी आज बढ़ गई है तो सही में न्यूटन के समय की जो अंडरस्टैंडिंग थी वह इतनी ही थी व न्यूटन को पता था कि उसकी अंडरस्टैंडिंग कितनी है यह जो एक पैराडॉक्स है ना कि आप जितना जानेंगे ना उतना अज्ञान बढ़ेगा मने जितना आप नॉलेज इकट्ठा करेंगे इतना ज्ञान नहीं बढ़ेगा इतना नॉलेज नहीं बढ़ेगा इतना इग्नोर ही बढ़ेगा क्योंकि जितना ज्यादा आप जानेंगे उतना पता चलेगा कि नहीं जाना है और ऐसा कितना सारा है तो सेम थिंग अबाउट यदि ये विजिबल यूनिवर्स मटेरियल यूनिवर्स के बारे में ऐसा है कि मल्टीवर्स का एक बहुत ही तीन के जैसा भाग यह पृथ्वी है यह मनुष्य है तो यह कॉन्शसनेस इज एन इवन लार्जर कॉस्मस और यह मनुष्य की यह जो ब्रेन और कैपेसिटी लर्निंग मेमोरी नॉलेज उसमें तीन के भर है तो यह तीन के भर को लेकर के हम यह सब एनालिसिस करते हैं और एनालिसिस करना हमको अच्छा भी लगता है सो दैट इज पार्ट ऑफ दैट तो यह ठाकुर को देखिए कि क्या वो महिलाए गई नहीं मां गई नहीं वह धार्मिक नाटक देखने के लिए तो ठाकुर ने अपने से ही इतना सुंदर अभिनय करके दिखाया कि इन लोगों का मन बड़ा ही प्रसन्न हो गया और नहीं जा पाई इसके लिए बाद में उनको कोई दुख नहीं हुआ अभी आगे महाराज जी क्या लिखते हैं महाराज जी लिखते हैं कामर पुकुरे ठाकुरर चलन बोलन संबंध श्री मा बोलिया लेन कामर पुक में ठाकुर कैसे रहते थे क्या बातें करते थे इसके बारे में मां ने कहा है ताके कोखोनो निरा अंद देखी नहीं ठाकुर को कभी भी बिना आनंद के देखा नहीं है निरा अंद में कभी भी ठाकुर को नहीं देखा पांच बछर छले संगे बाकी और बूढो संगे बाकी पाच साल के लड़के के साथ में भी और कोई बूढ़ा व्यक्ति है उसके साथ में भी सकलर संगे मिश सबके साथ में मिक्स होते थे सबके साथ में बात करते थे और बड़े ही आनंद में रहते थे कखन बापू रानंद देखी नहीं कभी भी भाई मैंने ठाकुर को रानंद में नहीं देखा मुंह चढ़ा करके नहीं देखा आहा कामर पुकुरे सकाले उठे बोलते मां कहती है आहा कमार पुकुर में सुबह को उठ कर के ही बोलते आज ईशा खाबो ए रध आज यह साक खाऊंगा इसको बनाओ सुनते पे आमरा अर्थात मां और लक्ष्मी दीदीर मां सबब जगाड़ोद्धारणा अरे ये मेरे साथ में क्या हुआ सकाल थे के उठे की खाबो की खाबो राम राम सुबह को उठ कर के ही मन में यही बात आती है कि क्या खाऊंगा क्या खाऊंगा राम राम आमा के बोल सेन मने ठाकुर ने मां को कहा आरमार किछु खबर साद नहीं तुमरा जा राध बे जा देबे ताई खाबो और मुझे और कुछ खाने की साध नहीं रही इच्छा नहीं रही तुम लोग जो बना करके दोगी वही खाऊंगा वही मैं खा लूंगा शरीर शार्थ अच्छा अभी इसके बारे में ठाकुर ने पता है ना क्या कहा है ठाकुर का कहना है यह देखिए इच्छाएं वासना होना मने दो तरह की होती है बड़ी इच्छाएं माने कि ये काम और कांचन के प्रति अपनी स्प्रो हा और छोटी मोटी इच्छा है कि अच्छा मुझे यह खाना है यह पहनना है तो ठाकुर का क्या कहना था पता है कि बड़ी-बड़ी इच्छाओं का संपूर्ण रूप से त्याग कर दो किंतु यह छोटी-छोटी इच्छाएं है ना उसका भोग करके उसको निपटा दो फिर अपने मन में फिर से यह सब खड़ा ना हो तो यह कामर दक्षिणेश्वर में रहते बड़ा ही सुंदर प्रसंग बड़ा ही फेमस और ठाकुर की साधना के समय ठाकुर के मन में यह जो सब ये मथुर बाबू वगैरह के साथ में रहते थे तो धनी लोगों के साथ में कभी-कभी मथुर बाबू की घर पे जाते थे वहां पे कोलकात्ता में और फिर यह काशी वगैरह में भी उनके साथ में फिरे थे बड़े धनी लोगों के साथ में रहते हैं तो ये धनी लोग क्या करते हैं री वाला पोशाक पहनेंगे यानी कि बड़ा महंगा जिसमें री लगा हुआ है फिर वो जिसमें सोने का नल है ऐसा गुड़गुड़ाहट और तकिए को ठे सान दे कर के तक में अपने कमर को लगा कर के तो ठाकुर को एक बार मन में हुआ कि इस तरह से शेठ की तरह बन कर के देखा जाए क्या होता है तो इमीडिएट मथुर बाबू को आदेश हुआ कि अच्छा जरी वाला पोशाक ले आओ ये ये सोने का ये नल वाला ये हुक्का ले आओ ये सब तो इमीडिएट मथुर बाबू तो ठाकुर के अनुग थे इमीडिएट सब चीजों की व्यवस्था हो गई ठाकुर ने ये बढ़िया सा कपड़े पहने बढ़िया सा हुक्का लिया बढ़िया से बिस्तर पर बैठे और तकिए को मैंने कमर लगा कर के वो बढ़िया सा हुक्का पी र है व एक बार जैसे हुक्का पिया ठीक ठाकुर के मन में ये जो वासना उठी थी उसका संपूर्ण रूप से लोप हो गया कपड़े निकाले हुक्का फेंक दिया तकिया भी फेंक दिया कपड़े उतार कर के कपड़े के ऊपर में पेर मारे उछल करके उसके ऊपर में कि ये वो अपने मन को बताते हैं देखो मन इसी को कहते हैं कि अच्छे कपड़े पहनना इसी को कहते हैं हुक्के में माने वो हुक्का पीना और इसी को कहते हैं गद्दी पर बैठ के तकि प बैठ के बैठना तो माने ये सब छोटी-छोटी वासना है ठाकुर कहते हैं उसका भोग करके निकाल दो तो वैसा ही ठाकुर को यहां पे कि सुबह को उठ कर के ही मन में होता है कि अच्छा आज मैं यह सब्जी खाऊंगा आज यह साक खाऊंगा और फिर जब ये किंतु कुछ दिनों के बाद में देखा कि यह वासना संपूर्ण रूप से मिट गई है और ठाकुर ने कहा देखिए इमीडिएट कि अरे यह सब क्या चल रहा है मेरे मन में छोड़ो ये सब चीजों को मां जो ब बना कर के देखी वही खाऊंगा और आगे मां क्या कहती है शरीर शर्ते देश जते माने कोलकात्ता में जद बीमार हो जाते तो ठाकुर अपने शरीर को अच्छा करने के लिए स्वास्थ्य के लिए अपने देश में अर्थात की कामर पुकुर आते दक्षिणेश्वर थाक दे खूब पेटे अशु के भुगते कि ना दक्षिणेश्वर में रहते रहते पेट का बहुत ही उनको असु होता था क्यों गंगा का पानी पास में ही है बड़ा ही ह्यूमिड वहां का एटमॉस्फियर है तो इसीलिए गंगा के किनारे रहते-रहते ह्यूमिडिटी से यह मने इनडाइजेशन की तकलीफ तो सभी को होने वाली है तो इसीलिए कलकाता में रहते-रहते दक्षिणेश्वर में उनको इनडाइजेशन हमेशा होता रहता था इसलिए स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए कमर पुकुर आते थे बोलते म ठाकुर क्या कहते हैं मां कहती है कि ठाकुर क्या कहते हैं राम राम पेट टा केवल मले भरती केवल मोले बेरछ है अर्थात पेट में यह जो मल है वही भरा हुआ है पेट में से मल ही निकल रहा है ए सबे तार पर शरीरे घेन्ना धरे गलो आर शरीरे जत्न करते ना यह बारबार पेट में इनडाइजेशन बार-बार यह उनको जो भी हो जाता होगा डाइज वगैरह तो इसकी वजह से ठाकुर को शरीर के ऊपर में एक तरह की घृणा आ गई और शरीर की संभाल लेना बंद कर दिया किंतु हमको पता है कि शरीर की संभाल नहीं लेकर के फिर आखिर में क्या हुआ तो कैंसर हो गया था किंतु खैर वो कैंसर कैसे हुआ क्यों हुआ इसकी बहुत सारी डेफिनेशन है इसके बहुत सारे राज है उसमें जाएंगे उसके लिए और एक अलग से क्लास करना होगा कि क्यों ठाकुर को कैंसर हुआ तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति सावधान शांति हरि ओम ओम श्री राम

Question Answer

कृष् पूर्ण के साथ में एक्चुअली क्या हुआ था कि पूर्ण की मां मां के पास में आती थी बार-बार आती थी मां को बड़ा परेशान करती थी कहती थी कि मां मेरा बच्चा बड़ा बीमार है आप ठीक कर दीजिए तो मां ने बड़ी नाराजगी पूर्वक कहा कि देखो ठाकुर ने तो कहा था कि पूर्ण की शादी मत करवाना शादी करवाने से उसका शरीर नहीं रहेगा तो फिर भी तुम ने जबरदस्ती उसकी शादी करवा दी देखो अभी जो उस उसके मैंने कर्म में जो लिखा था अभी वह बीमार हुआ है नहीं रहेगा और आखिर में सही में वही हुआ कि पूर्ण का देह त्याग हो गया था तो यह ऐसा मां की बातों में ऐसा पड़ा है तो पूर्ण तो माने ईश्वर कोटि फिर भी अभी उसके साथ में ऐसा हो तो क्या करेंगे ठाकुर ने यह भी कहा था वो राक्षस कुल की महिला के साथ में किसी का वो किसका विवाह मैं भूल गया एक्जेक्टली पूर्ण का ही ना कि किसका राक्षस कुल की स्त्री के साथ में उसका विवाह हुआ है तो अभी इसका देह ज्यादा नहीं टिकेगा मोस्ट प्रोबेबली पूर्ण के साथ में ही तो अभी यह जब पहली बार पढ़ा था तो यह सब वही हम लोग जो आजकल के मॉडर्न कांसेप्ट लेकर के आते हैं ना कि अरे राक्षस कुल का किसी स्त्री को ऐसा बोल देना ठाकुर को मैंने थोड़ा सा भी दया और मने यह नहीं है कंपेज किंतु देखिए कि ठाकुर जिस तरह से लोगों को देखते थे हम लोग उसको नहीं देख पाते और आखिर में वही सही ही होता है जो ठाकुर कहते हैं तो अभी क्या करें देखिए यह जो कम्युनिज्म जो है मैंने कार्ल मार्क्स के द्वारा शुरू हुआ और आज उसके बहुत सारे वेरिएशंस है अब इवन मोस्ट लिबरल वेस्टर्न कंट्रीज में जिस तरह के वेरिएशन चलते हैं वोह आज का कम्युनिस्ट प्रभावित जो वेरिएशन जितने भी है उसमें क्या कहते हैं कि सभी को इक्वल राइट होना चाहिए जबकि स्वामी जी का क्या कहना है पता है स्वामी जी कहते हैं सभी को इक्वल अपॉर्चुनिटी होना चाहिए यदि ब्राह्मण के लड़के को एक टीचर देते हैं तो शुद्ध के लड़के को द टीचर दो किंतु यह नहीं कि जिस चोप के लिए शुद्र का लड़का फिट नहीं है तो फिर भी जबरदस्ती उसको रिजर्वेशन करके ये चॉप दो ऐसा स्वामी जी ने नहीं कहा है तो यह डिफरेंट कांसेप्ट है इक्वल राइट्स वर्सेस इक्वल अपॉर्चुनिटी यह हमको मने स्वामी जी का बड़ा पहले से ही एक क्लियर है आईडिया जो कि हम नहीं समझ पाए हैं नहीं किंतु दिस इज नॉट एनटायर कर करेक्ट जैसे कि ये स्टडी के साथ में जो हुआ था स्टडी पहले तो स्वामी जी को एक पहले तो छोड़ दिया उसने फिर निवेदिता के साथ में जो कॉरेस्पोंडेंस हुआ वो थोड़ा सा मैंने पढ़ा है निवेदिता कहती है स्टडी को कि आपने स्वामी जी को ठीक-ठीक समझा नहीं है तो स्टडी कहता है देखिए कि डू मने मने आप आई हैव फुल रिस्पेक्ट फॉर यू किंतु तुमने जिस तरह से स्वामी जी को अपना गुरु बनाया है मैं किसी को अपना गुरु नहीं बना सकता और स्वामी जी भी ह्यूमन है वो कोई ईश्वर नहीं है क्योंकि मैंने उनके साथ में रहकर उनके सब बैड हैबिट्स वगैरह देखी है वगैरह वगैरह करके उसका कॉरेस्पोंडेंस है अभी स्वामी जी जब लंदन जाते हैं दूसरी बार तब वो स्वामी जी को मिलता भी नहीं है तो ठीक है मने मिलता है किंतु उनके मुंह पर कुछ बोलता नहीं है किंतु बाद बाद में वह लेटर लिख कर के स्वामी जी को कहता है कि अरे आप तो महंगे महंगे आपके सब शौक है आपको अच्छा खाना चाहिए अच्छे चिरू चाहिए स्मोक करने के लिए तो मैं आपको इसी वजह से मैं आपको कोई धार्मिक पुरुष महापुरुष नहीं मानता तो स्वामी जी ने एक एक दो बार तो छोड़ दिया किंतु उसके बाद में जो एक लेटर लिखा है स्टडी को ऐसा डांटा है उसमें उसको कि देखो कि जो भी चिरू वगैरह पीता हूं जो खाना खाता हूं मैंने अपने पैसों से किया है तुमने मुझे जो ब्लैक होल में रखा था जिस तरह का घर वो घर का पूरा विवरण मैंने पढ़ा है स्वामी जी को एक छोटे से कमरे में रख दिया था अच्छे-अच्छे कमरे वो स्टर्डी और मिस मुलर ने ले लिए थे और खाना भी मुझे ठीक से नहीं खिलाते थे मेरा भाई मेरे साथ में रहता था बीमार था फिर भी ये मिस मलर उस परे नाराज हो गई कि अरे तुम तो साधु हो तो तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ क्यों रहेगा बोलकर के मेरे भाई को भगा दिया उस समय भी मैं कुछ नहीं बोला और फिर आखिर में पूरा काम करते-करते मेरी तबीयत खराब करके मैं वहां पर वेदांत का प्रचार करता रहा जिसका कि बेनिफिट आपको मिलता रहा और आखिर में आप मुझे ऐसा कहते हैं ऐसा करके स्वामी जीने उसको सीरियसली डांटा है तो वो स्वामी जी कभी-कभी बोल लेते थे वो जो इंडिया में आए तब वो थियोसोफिकल सोसाइटी के बारे में वो जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा के प्रवचन में एक बार कहते हैं कि जब मैं वहां पर था व किसी से किसी ने बोला कि हां इसका मृत्यु हो गया है तो यह थियोसोफिकल सोसाइटी वाले लेटर में लिखते हैं द डेविल हैज डाइड माने तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो बात माने क्या है कि एक पॉइंट आता है कि स्वामी जी को प्रतिकार करना पड़ता है इसलिए नहीं कि वो अपने को इंडिविजुअली अफेक्ट करता है क् पूरे कार्य को संघ को अफेक्ट करता है तो संघ को जब अफेक्ट करेगा तब स्वामी जी को बोलना पड़ेगा कि कहीं ऐसा ना हो जाए भविष्य में लोग कहे कि रामकृष्ण मिशन य थियोसोफिकल सोसाइटी की मदद से बना है ऐसा कोई ना कह जाए इसलिए मुझे ऐसा बोलना पड़ता है सो स्वामी जी का मने लक्ष्मण रेखा थी वह लक्ष्मण रेखा क्रॉस करने से तो डंडा पड़ेगा संघ के लिए इंडिविजुअली नहीं इंडिविजुअली नहीं यस यस मैंने सेकंड टाइम अमेरिका से आए थे तो राजा महाराजा सब उनके संगी थे तो किसी को कुछ बोल देते तो कुछ भी करवा सकते थे नहीं किया वोह उनका बड़पन है