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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

स्वामी का पैतृक निवास || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 1 May 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायस श्री मां शारदा देवी का चरित्र स्वामी महाराज इसका हम पाठ कर रहे थे इस सप्ताह में मां रह जा रही है और कामा कुकुर के ठाकुर की महासभा के बाद कामा कुकुर में मां की तपस्या के दिन प्रारंभ हो चुके हैं। तो ऑलरेडी हमने देखा कि किस तरह से घर का सब अरेंजमेंट था। कमा उन उन दिनों का कैसा था और किस तरह से मां वहां पर गई थी रास्ते में जब गुलाब मां ने खिचड़ी बना के मां को खिलाई तो मां को ऐसा लगा जैसे कि उनको अमृत बना के खिलाया तो यह सब हमने देख लिया अभी थोड़ा सा उस दिनों की घटना की ओर

श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद: कामारपुकुर में स्वार्थी और हृदयहीन लोगों के बीच माँ सारदा का निवास

आगे बढ़ते हैं कि किस तरह से कौन सी परिस्थिति में मां कामु में रह रही थी तो गंभीरानंद जी लिखते हैं यहां पे कामु समृद्ध जन कोलाल बोल लज्जाशला श्री मामा कुर उस समय समृद्ध जन और कोलाहल पूर्ण समृद्ध जनु और कोलाल पूर्ण अर्थात थी प्रोस्पेरिटी थी बहुत सारे लोग थे वो काफी बुला होता था बोल के ही लज्जा शीला श्री मां के सामने भी प्रद था मां के सामने भयजनक था हालांकि ऑलरेडी हमको पता है कि यदि समृद्धि पपुलेशन और ये हल्लागुल्ला कोला यदि इसका कंपैरिजन कामारु का कोलकाता के साथ में किया जाए तो काम उसके सामने कुछ भी नहीं होगा। किंतु एट द सेम टाइम क्या है कि कोलकाता में मां थी। ठाकुर के शरण जो था ठाकुर की ये जो प्रोटेक्टिव अंब्रेला जो थी उसके अंदर में मां थी। तो फिर क्या है कि ठाकुर है बोल के मां इवन यदि वहां पे रहती भी थी। चलो दक्षिणेश्वर थोड़ा सा म आउटसाइड कोलकाता था कि तू ये जो काशीपुर है श्यामपुर है वो सब तो म तो पार्ट एंड पार्सल ऑफ कोलकाता उस समय का किंतु फिर भी ठाकुर थे ठाकुर की चक्र छाया है ठाकुर का प्रोटेक्शन है बोल के शायद मां को वो इतना भय नहीं करवाता होगा किंतु अभी कुकुर में मां ऑलरेडी अपने को असहाय महसूस कर रही थी बोल के काम कुर का ये जो कोलाहल वगरा है मां के सामने होता होगा ये हम अनुमान करके कह सकते हैं विशेष तो ओ अनुदार अनुभूति शून्य बल्लीवासी एक शहाय दरिद्रे अविचलित खास करके अशिक्षित अनुदार अनुदार अर्थात की मेरो माइंडेड हार्ड हार्टेड उदार का अर्थ है लार्ज हार्टेड और अनुदार का अर्थ है हार्ड हार्टेड या तो फिर ऑर्थोडोक्स या तो फिर कहेंगे कि क्रूर तो अशिक्षित क्रूर दूर और सहानुभूति शून्य गांव वासियों के सामने यह सहाय हीना का सहाय हीना मां के बारे में जी शब्द यूज़ करते हैं। वो भी आश्चर्य की बात की है कि जो पूरे जगत को सफाई पहुंचाती है उनके बारे में सहायना या फिर शब्द और देखिए महाराज तो एकदम परफेक्ट शब्द का चयन करते हैं। देवी और मानवी ये दोनों गुण तो मां के भीतर में है। तो हमेशा मां को सिर्फ देवी भाव से ही देखेंगे। तो मां का जो मानवी भाव है मात भाव है या जो सपंच बालिका भाव है उसका जोुर्य है वो हम आस्वादन नहीं कर पाएंगे और हमारी साधना का एक बहुत बड़ा हिस्सा हम लोग मिस कर देंगे। देखिए मैं साउथ इंडिया में बेसिकली फिलोसोफी का प्रचार चलता है। यहां पे कभी-कभी किसी युवती के साथ में बात करता हूं तो मैं देखता हूं उनको वेदांत में तो बहुत इंटरेस्ट है। किंतु जैसे ही मैं ठाकुर स्वामी जी की कहानियों की ओर जाता हूं। मैं स्पष्ट देख पाता हूं कि उनका इंटरेस्ट एकदम कम हो जाता है। कुछ कुछ सभी नहीं कुछ तो यहां पे लेक्चर वगैरह भी होंगे एकदम हार्ड कोर वैदांतिक सब्जेक्ट पे होंगे। क्लासेस ऐसे सब्जेक्ट पे होंगे किंतु मैंने ये भी एक चीज पाई है। मेरा खुद का लेक्चर जब भी होता है मंदिर में आई प्रफर टू स्पीक ऑन मदर। मां की कहानियां है, मां के जीवन के हिस्से है। उसी पर मैं बोलना पसंद करता हूं और मैं देखता भी हूं कि काफी डिवोटी है वो बहुत ही अच्छे से रिसों भी करते हैं कि हां मां के जीवन की यह सबुर्यमय घटनाएं भी है। उसका आस्वादन भी कर सकते हैं। तो उनको इट एड्स न्यू रिचनेस इन दे स्पिरिचुअल लाइफ। तो यहां पे भी जो जगत की सहाय स्वयं है वो यहां के सहायता दरिद्र ना की तरह एक छोटे से गांव में रहती है। तो क्या कहते हैं महाराज कि पहले तो मां को वहां पे ये जो भुला है बोल के डर डर लगता था और फिर खास करके ये जो गांव का ये जो समाज था वो कैसा था एक तो था अशिक्षित था। दूसरा था अनुदार था उदारता नहीं थी सब कुछ आश एंड वो उसी के छोटे से दायरे में ही अपनी दृष्टि को बंद करके वो देखते थे धार्मिक रूढ़ चुस्तता और दूसरा ये काष्ट नाती जाती उसी के लेंस से ये लोग सब कुछ देखते थे अशिक्षित थे अनुदार थे और सहानुभूति शून्य थे माने कोई एक दरिद्रा असहाय नारी है तो जाकर के उनको हमको पूछना चाहिए कि अच्छा आपको यदि कोई सफाई की आवश्यक है आपको यदि कुछ मदद चाहिए तो हम कर सकते हैं ज्यादातर लोगों के भीतर में यज्ञ नहीं था और इस तरह के ग्रामवासी जब ये सहाय हीना दरिद्र से मंडित अविचलित उच्च भाव संबंधे हो अनुसंधित साधुष्य यह जो तीन तरह के लक्षण जिन लोगों में थे अशिक्षित अनुदार और सहानुभूति शून्य पल्लीवासी ग्राम ग्रामवासी उनके सामने ये मां का सहायहीन का जो सहायहीन नारी का दारिद है इससे वे लोग अविचलित थे उससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था और यही मां के उच्च भाव संबंध अनुसंधित सा अनुसंधित अनुसंधित अर्थात ही क्यूरियोसिटी होना क्यों इस तरह के उच्च भाव में रहती है किंतु ये क्यूरियोसिटी नहीं होना उसका अर्थ शब्द नेगेटिव हो जाता है अनुसंधित सानुष्य सा अनुसंधित सा शून्य अनुसंधित सा शून्य अर्थात की अनुसंधित सा नहीं थी उनके प्रति थोड़ा सा भी क्यूरियोसिटी नहीं था कि इस तरह का जीवन ये सहायहीन दरिद्र नारी किस तरह का उच्च आध्यात्मिक जीवन जीती है इसके बारे में किसी को भी क्यूरियोसिटी नहीं थी ए अवस्था तहार जीवन बहुत समस्या दिखा इस अवस्था में मां के जीवन में बहुत सारी समस्याएं दिखाई थी ठाकुर देत्यागे और काशीपुर खातिर बाला हो श्री श्री ठाकुर दर्शन दिया निवारण हो ठाकुर के त्याग के बाद में मां जब काशीपुर में हाथों की चुड़ियां खोलने को ऑलमोस्ट उल कथा भी तैयार हुई थी खुलने ही वाली थी उस समय ठाकुर ने दर्शन देकर के निवारण किया था मना किया था कभी फेमस कहानी कि ठाकुर की महा महासधि के बाद में ही जैसे ही विधवाओं के वस्त्र विधवाओं का यह जो पूरा जो वेश धारण करना है बलराम बाबू ने आ के गुलात्मा को वो सफेद वस्त्र दे के कहा सफेद साड़ी लेकर के कहा कि ये मां के लिए है तो फिर गुलात्मा भी वो एकदम आतंक से शिमरम उठी आतंक से धजित हो गई क्यों क्योंकि मां तो स्वयं लक्ष्मी ठाकुर ने कहा है शारदा सरस्वती उसको सजनाजना अच्छा लगता है तो यदि लक्ष्मी सरस्वती मां को अभी ये सफेद वैधव्य के वस्त्र पहनने को देना तो उन्हें वो मुलाकात मां कहती है कि अरे बाप रे कौन ये लेकर के मां के पास जाएगा तो म फिर भी तो यही मुलाकात मां जब मां के कमरे में प्रवेश किया तो देखा कि मां ने ऑलरेडी उनकी जो लाल गोल्डन वाली जो एक साड़ी थी उसकी बॉर्डर जो है वो काट के पतली कर दी है और साड़ी मां ने ऑलरेडी पहन ली है और फिर किंतु और एक जो घटना जो मां ने बोला मां को बताई कि जैसे ही वो अपने बाकी सब श्रृंगार तो निकाल दिए। एक्चुअली बाकी सब श्रृंगार तो ऑलरेडी मने दक्षिणेश्वर में ही निकाल दिए थे क्योंकि वो किसी मन मोहन की मां जो इसकी कोई रिलेटिव तो उसने इस तरह से बोलना शुरू किया कि ठाकुर तो इतने बड़े त्यागी है और मां ये सब गहने बहने पहन के रहती है तो ये क्या मां को शोभा देता है तो अभी ये वही कोई आ के मां को ये बात बताई कि अरे मां आपके बारे में लोग ऐसा कहते हैं तो मां ने इमीडिएटली काफी कुछ गहने तो निकाल ही दिए थे। उसके बाद में योगी मां ने ही ना ऐसे ही किसी ने आ के मां को कहा कि अरे मां इस तरह से क्यों करती है? आप थोड़े से गहने तो पहनी तो लक्ष्मी स्वयं है। तो उसके बाद में मां ने फिर से थोड़े से गहने तो पहने थे। किंतु वो जो पहनने की तरह ठाकुर ने जो पूरे गहने जो गहनों का जो सेट की मां के लिए बनाया था वो सब गहने गहने फिर से पहनना नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि इसी घटना के कुछ ही समय बाद में ठाकुर को कैंसर हो गया और उनको काशीपुर ले आया गया ट्रीटमेंट के लिए तो ऑफकोर्स अभी ठाकुर को कैंसर है वो काशीपुर में रह रहे हैं सॉरी श्यामपुर में पहले तो श्याम में आए तो उस समय तो कल दक्षिणेश्वर में गई थी तो मां मोहन भगत में रह रही है यहां पे उनका मन पड़ा है श्यामपुर में ठाकुर के चरणों में ठाकुर की सेवा कैसे होती होगी उनकी चिकित्सा कैसे होती होगी यह सब चिंता करते करते तो यही सब चिंता की वजह से मां ने वो संपूर्ण गहने फिर से कभी नहीं पहने तो वही एक पागल की कमेंट की वजह से ज्यादातर गहने तो मां ने निकाल ही दिए थे वही कुछ गहने पहन करके रखे थे उसमें भी अभी तो विधवाओ को एक भी गहने नहीं पहने तो वो जो चूड़ियां भी निकाल रहे थे तब ठाकुर ने आके मां को मना किया था किंतु देखिए वही ये जो लोगों की कमेंट और लोगों का ये जो सहानुभूति शून्यता और लोगों की गुरुता सामाजिक धार्मिक गुरुता धार्मिक धर्म अर्थ यूनिवर्सल रिलीजन नहीं वो जो एक नैरो एक ये होता है ना कास्ट बेस जो होता है थिंकिंग उस तरह का उसकी वजह से मां ने फिर क्या किया यहां पे भी अपनी चूड़ियां निकाल दी कहते हैं महाराज चती श्री मा वष वै देख पचना मुख चीर सीमती अर्थात चीर सधवा श्री मां के वस और भूषण अर्थात जिस तरह के वस्त्र पहने हैं और जिस तरह से मां ने चूड़ियां पहनी है इसमें वैधव्य का चिन्ह नहीं है। विधवा की तरह मां नहीं रहती। विधवा की तरह वस्त्र और आभूषण तीन मां नहीं है। यह देख के पत्नी में गांव में समालोचना अर्थात की नेता ये पीछे पीछे बातें करना क्रम धीरे धीरे करके बढ़ने लगा। ताई तीली हाथ वाला लिया है। इसी वजह से मां ने हाथों की चूड़ियां निकाल करके रख दी। देखिए कितना बड़ा ट्रेजडी है कि लक्ष्मी को स्वयं गह में निकाल देने पड़ते हैं। हालांकि मां फिर से पहन लेगी तो हमको तो सबको पता ही है वो जो फेमस चित्र है मां का वो अपने सभी श में रहता है वो मां इस तरह से जो बैठी है तो हाथ में चूड़ियां पहनी हुई है तो वो तो मां को फिर से पहन लेगी किंतु यहां पे एक बार तो मां को निकाल देनी पड़ी

माँ सारदा का दिव्य दर्शन: श्रीरामकृष्ण के चरणों से बहती गंगा

त द्वितीय समस्या उनकी दूसरी समस्या हुई गंगा ही पास की ये गंगा ही देश में किस तरह से रहेंगे कहां चरकाली मां गंगा प्रति आकर्षण छो उनका चर काल मां गंगा के प्रति आकर्षण था देखिए मां जब जय राम बाटी में रहती थी तो वो दामोदर नदी में स्नान करने को जाती और कहती कि ये दामोदर नदी ही है हमारी गंगा तो वहां पे तो एटलीस्ट दामोदर नदी थी जिनको की मां गंगा कह के वो अपना मन को मना सकती थी मुझे नहीं लगता के आसपास में इस तरह की कोई नदी को मुझे पता नहीं देखना पड़ेगा कनतु में तो दामोदर को मां हमारी गंगा बोल के पुकारती थी आमरा देखिए और हमको ये भी पता है कि ये गंगा के आकर्षण की वजह से ही गंगा के गंगा स्नान के नाम से ही मां पहली बार वो जय राम बाटी से यहां पे दक्षिणेश्वर आई थी वो गांव की पुस्तियां जा रही है कुछ उत्सव था गंगा में स्नान करेगी वो बोल के मां भी इनके साथ में आई मैं भी गंगा में स्नान करने को जाऊंगी तो उनके पिताजी तो समझ गए कि असली रहस्य क्या है इसके पीछे तो वो भी साथ में आए थे तो यहां पे भी हमारा देखिया जी देखिया जी तीन बल्ली वासी शहीद बारंबार गंगाने हमने देखा है कि मां ग्राम्य वासियों के साथ में बाकी जो स्त्रियां थी ग्राम की उनके साथ में बार-बार गंगा स्नान के लिए जाती थी ऑलरेडी पहली बार ठाकुर को मिलने के लिए आई मां तो गंगा स्नान का ही नाम करके आई थी आर दीर्घ्स दक्षिणेश्वर बापा तो कथा ही और ये दीर्घ 13 साल मां दक्षिणेश्वर में रख रही थी उस समय की तो बात ही नहीं है कि गंगा के किनारे ही मां का नर्व था वहां गंगा के गंगा के पवित्र जल में ही स्नान वगैरह होता था तो सब भाव माता ठाकुरानी चंचल उठ यह सब सोच के मां का मन थोड़ा सा चंचल हो उठा की इतनी एक बार गंगा स्नान चाहे कथा भवि यहां तक कि एक बार गंगा स्नान को जाने के लिए भी वहां सूचना शुरू कर दिया दो रीजन एक तो वहां के लोग अनुदार थे निंदा करते थे और अनुसंधित सा्य थे। उन्होंने मां का जो उच्च जीवन है धर्म और आध्यात्मिकता को अनुसरण करके उसके प्रति किसी का भी थोड़ा सा भी क्यूरियोसिटी नहीं था। वो तो एक था फिरता चल रही है कि वो विधवाओं की तरह वो वस्त्र नहीं पहनती आभूषण पहने थे तो फिर मां ने तो ऑलरेडी वो जो चूड़ियां जो है वो निकाल करके रख दी तो ये तो सब है और फिर वहां पे गंगा नहीं है और मां का हमेशा सम्मान मां ने खुद ने कहा है हमारे बराबर गंगाबाई मेरा हमेशा ये गंगा व अर्थ पता है बहुत तो मां ने मेरा हमेशा से मां गंगा के प्रति एक तरह का आकर्षण था तो यहां पर भी जब गंगा नहीं है उस कापुर में तो मां ने सीरियसली सोचना शुरू कर दिया कि एक बार वो गंगा स्नान के लिए जाएगी और कहा जाएगी कलक की तो कहा एक दिन देख समय एक दिन देखा श रास्ता ठाकुर आशी सामने के रास्ते से ठाकुर आ रहे हैं आहार पश्चात श्री तो नरेंद्रों बाबूराम राका प्रभु भक्त वृंद और उनके पीछे आ रहे हैं अनुसरण कर रहे हैं नरेंद्र बाबू राम राल वग भक्त वृंद श्री मां आर देख श्री मां ने और भी देखा ठाकुर पाद जल उंग ठाकुर के पाद पद्म से जल का उत्स अर्थात की जल जैसे कि पानी जो है निकल कर के तरंग आकार से उनके सामने की ओर बड़े ही स्पीड से प्रवाहित हो रहा है। ठाकुर चल रहे हैं और ठाकुर के पाद पद्म से मां गंगा वो आगे निकल के तरंग आकार से तरंगा शेप से वो खेल रही है। तीन भाभी ने मां ने सोचा देखी इनहीं तो श देख रही हूं कि वही तो सब है पाद पद तू गंगा उनके पाद पद्म में से ही तो गंगा है भगवान शिव ने जटा पे धारण किया था ठाकुर के पाद पद्म से वही गंगा वो प्रवाहित होती है ताई श रघुवीरे भरे निकटते मुठा मुठा जमा छिया श्री गंगा पुष्पांजलि लागी है इसी तरह इसीलिए सतवर तुरंत रघुवीर के घर जाकर के उन्हें रघुवीर का घर अर्थात कि जहां पे मंदिर वहां पे उन्होंने सजाने के लिए जवा फूल रखे होंगे तो मुट्ठी मुठी जवा फूल जासवंत के फूल छ के अच्छा छ करके रखा थी वो पेड़ों के ही थे तो पेड़ में से तोड़ करके ला के वही गंगा में मां पुष्पांजलि देने लगी त ठाकुर तहा के बोली मिले तब ठाकुर ने उनको कहा तुम ही हाथ के बाला फेलो ना तुम हाथ की ये जो चूड़ियां है उसको निकालना मत वैष्णव तंत्र जानो तो वैष्णव तंत्र पता है तो श्री मां बोली वैष्णव तंत्र की तो जाने ना मां ने कहा वैष्णव तंत्र क्या है मुझे तो कुछ पता नहीं ठाकुर कले ठाकुर ने कहा आज काले ग मणि आश तार का आज शाम को ग मणि अर्थात की गौरी मां आएगी उनके पास में सुनना दिन अपरा श्री गौरी मा आगमन हो उसी दिन शाम को अपरा अर्थात की दोपहर के बाद में शाम को श्रीता गौरी मां का आगमन हुआ देखिए ये सब पढ़ने में एकदम समझ लगता है कि इस तरह से ठाकुर दर्शन दे भविष्यवाणी करे कि आज शाम को गौरी मां आएगी और वो सुखी ने उसी समय आके उपस्थित स्थित भी हो गई। पढ़ने में समय लगता है। देखिए कि जिनका जीवन आध्यात्मिकता से भरत है उन लोगों के लिए यह सब चीज पार्ट एंड पार्सल ऑफ लाइफ। हम लोग मां के जीवन के बारे में यह सब पढ़ते हैं आश्चर्य नहीं होता। एक्चुअली पता है अभिष आश्चर्य क्या होता है? एक समय था वो जो किताब है ना फोटो बायोग्राफी योगी मैं उस समय अपने घर में ये सब पढ़ता रहता था। मुझे अच्छा लगता था थोड़ा सुपरवाइजर पहली पहली जो सब वीडियोस जागृत हुई क्या है धर्म क्या है सब तो ये सब पिता में वहां की लोकल लाइब्रेरी से ला के पढ़ता था वो सोचता था मेरे तो यदि आप धार्मिक है हम लोगों ने देखिए एक जो नॉर्मल एक यंग मैन था मेरे उस समय की मैं तो आज से मैं ऑलमोस्ट 25 साल पहले की बात कर रहा हूं 25 30 साल पहले की बात एक जो नॉर्मल यंग होते हैं। क्या एक्सपोज़र क्या था धर्म के बारे में? तो वही वो जो रामायण महाभारत टीवी सीरियल देखा है फिर मैं जब छोटा था तो वो जो सचित्र कथाएं सब आती थी ये अमर चित्र कथा है ना अभी मैंने बहुत सारी चित्र कथाएं परचेस की है मैं शोर नहीं हूं कि वो अमर चित्र कथाएं की थी कि नहीं गुजराती में थी ज्यादातर किंतु चित्र बहुत ही सुंदर रूप से वो दोरे हुए थे और बड़ा ही सब ये मां काली की कहानियां फिर इसी तरह से भगवान शिव की कहानियां सचित्र कहानियां होती है तो रामायण महाभारत देख टीवी सीरीज ना फिर ये सचित्र कहानियां पड़े तो राक्षसों के साथ में भगवान फाइट करते हैं उसमें एक के बाद एक मिरेकल करते हैं वही तो हमको दिखता है फिर थोड़े से बड़े हुए और बायोग्राफी योगी इस तरह की किताबें पढ़ना शुरू किया तो उसमें भी कि हां ये मिरेकल होते हैं। मिरेकल होने से पता चलता है कि आप रिलीजियस या स्पिरिचुअल है। तो वो पहली पहली बार ये डिस्टिंशन करना शुरू किया था। रिलीजन और स्पिरिचुअलिटी रिलीजन इस मोर ऑफ़ एन एक्सप्रेशन और सोशल सोशल एक्सप्रेशन कि हां सोसाइटी में ये उत्सव किस तरह से मनाए जाएंगे। सोसाइटी में आपका वो जो घर परिवार कैसे चलेगा? शादी ब्याह किस तरह से करना है? वगैरह वगैरह जो सोशल एक्सप्रेशन है। सोशल और पिटिकल एक्सप्रेशन आप कह सकते हैं। स्पिरिचुअलिटी मोर इनर एक्सप्रेशन की हमारा आंतरिक ईश्वर के साथ में कहो ना कि कोई एक हायर पावर के साथ में कहो क्या रिलेशन है? तो ऑलरेडी मैंने रिलीजन और स्पिरिचुअलिटी आध्यात्मिकता और धर्म ये डिस्टिंशन करना शुरू कर दिया था। किंतु अभी मैं धार्मिक लिटरेचर को फिर छोड़ के जब आध्यात्मिक लिटरेचर में भी आते हैं सो कॉल्ड मोर इनर ओरिएंटेड इनर लाइफ ओरिएंटेड तो उसमें भी फिर हमको यह मिरेकल ही दिखते हैं कि आपके पास में यह मिरेकल होंगे वो मिरेकल होंगे। इसके बाद में किनतु में जब ये ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ना शुरू किया खास करके मां को ठाकुर के जीवन में फिर भी देखिए ये विज़ है वगरा वगरा तो लगा ही रहता था मां का जीवन जो कि कितना सागी से भरपूर है स्वामी जी के जीवन में भी देखिए वो पार्लियामेंट ऑफ रिलजन में बिलकुल एक अननोन बेगर हिंदू उसने जाकर के इतना बड़ा इंपैक्ट किया नथिंग लेस देन मेरे गर्ल मां के जीवन में देखिए ना ही वो विद्या का तोड़ है ना ही वो दर्शन की धुन है तो बिल्कुल सादगी से इतना सुंदर जीवन में वो ये करती है बिताती है जो भी आता है आओ बेटा आओ बसो खाओ आओ बैठो खाओ यही मां के जीवन में है तो हमको लगता है कि फिर मां के जीवन में आध्यात्मिकता कहां है किंतु देखिए कि जैसा जितना जितना मैं आपको पढ़ता गया और सही में पता चला ये जो हृदय की उदारता है यही है आध्यात्मिकता का सही लक्षण देखिए फंडामेंटल तो है काम कांचन त्याग और सत्य ठाकुर ने कहा है काम कांचन त्याग को एकदम पक्का कहा है और साथ में ही ठाकुर ने कहा है कल में दो तपस्या है ब्रह्मचर्य और सत्य तो हम तीन फंडामेंटल तपस्या को भेज सकते है ठाकुर ने कहा हमें सब कुछ मां को दे दिया ये लो तुम्हारी भक्ति ये लो तुम्हारी भक्ति वो जो भी है ये ज्ञान ये तुम्हारा अज्ञान सब कुछ ठाकुर ने जैसे की मां को दे दिया किंतु ठाकुर कहते हैं मैं सत्य मां को नहीं दे पाया ऐसा नहीं कह पाया कि ये [गला साफ़ करने की आवाज़] तो तुम्हारा सत्य ये लो तुम्हारा असत्य तो सत्य है कलयुग की तपस्या तो काम कांचन का त्याग और सत्य का अनुष्ठान ये तीन तो एकदम फंडामेंटल एक ही है आध्यात्मिक जीवन के किंतु उसके ऊपर में एक दूसरा एक लेयर आता है वो है हृदय की उदारता। देखिए ये हृदय की उदारता है। यही तो बताती है कि हम लोग आध्यात्मिक रास्ते में आगे बढ़ना शुरू किया है। वरना तो क्या है? कितनी बार आप देखेंगे कि दिखावा तो बहुत बड़ा हो रहा है। धर्म का आध्यात्मिकता का लाइफ में डिसिप्लिन काफी है। रूटीन एकदम आपको सुबह को शाम म पूरा वो जो आपका वो जो बाहर से दिखाने का सब कुछ किंतु थोड़ा सा हृदय में झांक करके देखेंगे तो सबके प्रति द्वेष सबके प्रति कटुता सबके प्रति निंदा इस तरह का मैंने कितनी बार देखा है टैलेंट है नॉलेज है ज्ञान है डिसिप्लिन है सब कुछ है किंतु हृदय जो है वो विषाक्त हो गया है तो देखिए के सही सखी में और फिर देखिए आप ये यदि क्लेम करेंगे ना मैं तो काम कांचन से मुक्त हो गया हूं सत्य पे प्रतिष्ठित हूं अभी इसको कौन देखने को गया है काम कांचन वो आपका और ठाकुर के बीच का ये रिलेशन है म वो आप जा रहे हो और ठाकुर जाने बाकी सबको तो इसको तो वो आपके फेस वैल्यू पे ही ले ले कुछ भी क्लेम करेंगे कौन उसको वेरीफाई करने को तैयार है तो वो तो आप जा रहे और ठाकुर जाने किन्तु तो हमको दिखता क्या है? तो दिखता है हदय की उदारता। देखिए एक छोटा सा उदाहरण देता हूं। मैं अभी कल की ही बात है। हम लोग खाने को बैठे थे तो आम आया है। अभी ये तो आम का सीजन धीरे धीरे कल के आम यहां पे नहीं आता। रेली ही आता है। बहुत आते थे आम। तो मठ में और उससे भी ज्यादा आते थे। यहां पे यदि आपको महीने में तीन चार बार मिल जाए तो बहुत है। तो में आम आया है और हमारे यहां पे जिस तरह से सिस्टम है सर्विंग करेंगे तो पहले सीनियर मोस्ट साधु को ऑफर करेंगे उसके बाद में जो सीनिरिटी में नेक्स्ट आता है और उसके बाद में जो नेक्स्ट आता है यानी सीनियर मोस्ट साधु को पहले ऑफर करेंगे वो जो भी कुछ भी है मतलब भात हो दाल हो चावल सब्जी जो कुछ भी हो मिठाई हो फल हो इसी सीक्वेंस में ही लोग बैठेंगे किचन में खाने को सीनिटी की सीक्वेंस में और सीनिटी की सीक्वेंस में ही ऑफर होगा। तो अब जैसे आम आए हैं तो सबसे पहले सीनियर साधु को दिखाएंगे वो यदि लेते हैं अपनी पसंद का तो फिर नेक्स्ट जो सीनियर है उनको दिखाएंगे। सो दिस इज अ स्टैंडर्ड मेथड रामकृष्ण मिशन में सब कुछ सिक्योरिटी के बेस पे होता है। सो व्हिच इज गुड। सो अभी खाने को बैठे थे दो लोग। मैं था और एक सीनियर स्वामी था। दो आम लेकर के वो रसोई आया। अभी मैंने जैसे ही प्रवेश किया उसने वो डाइनिंग में मैंने उसके हाथ में देख दो आम है। एक रेड है और एक थोड़ा येलो है। तो अभी ऑब्वियसली आप देख के ही पता चलेगा जो रेड आम है वो ज्यादा मीठा होगा। और ये जो येलो आंख है उससे कम मीठा होगा। म जब तक खाएंगे नहीं पता नहीं चलेगा। किंतु ऊपर ऊपर से ही यदि आपको जज करना है तो तो ऑब्वियसली आपको दिखता है ना कि रेड वाला है वो यदि हमको सिलेलेक्ट करने को कहेंगे दो हमारे सामने लाए तो सेलेक्ट करने को कहेंगे तो हम तो ये रेड वाला ही देंगे और ये लो जाओ दूसरों को दो जो जूनियर है उनको दो व्हिच इज कॉमन थिंकिंग मेरा ऐसा है खुद का कि मुझे खाने के लिए इतना कोई इंटरेस्ट नहीं बहुत लंबे समय से जो नजर के सामने आया मैं ले लेता तो मैं जो भी में जो सीक्वेंस में जो आता है उसमें से जो अच्छा लगा ले लिया मैं खाने के लिए कभी भी मैं कोई अच्छी चीज मुझे खानी है तो मैं कभी किसी को कहूंगा नहीं मेरे लिए ये बनाओ या तो फिर मेरे लिए ये लेके आओ हमेशा मैं जो भी आता है सामने बची लेना है उससे आगे और कुछ नहीं तो ये मेरा बहुत लंबे समय से रहा तो नहीं खाने में इंटरेस्ट है ना ही खिलाने में इंटरेस्ट है ना ही खाना बनाने में इंटरेस्ट है इस तरह से मैं थोड़ा ड्राई हूं किंतु कुछ तो साल होता खिलाने को भी उनको अच्छा लगता है, खाना भी अच्छा लगता है और खाना बनाना भी उनको अच्छा लगता है। तो अभी कल की बात है जो रसोइया जो है वो दो आम ले आया एक रेड वाला एक येलो वाला है और जो सीनियर स्वामी थे उनके पास में जा के खड़ा करा। अभी ऑब्वियस है कि म जैसे मैं यदि होता मुझे पूरी चीज में कोई इंटरेस्ट नहीं कि ये दूसरों के प्रति ऐसा कुछ मैं मेरे भाग में जो आएगा अच्छा जो गेस्ट है वो मैं ले लूंगा वो रेड वाला मैं अवश्य ले लेता यदि मेरे सामने कह के आया होगा किंतु मैंने देखा वो जो सीनियर स्वामी थे उनके पास में जाके वो खड़ा रहा उन्होंने पहले तो कहा कि उसको दो मुझे देने को कहा तो वो मेरे पास में आया तो मैंने कहा मैं अभी नहीं खाऊंगा मेरे लिए रख दो मैं बाद में ले लूंगा। तो वो फिर से उनके पास चला गया। तो उन्होंने क्या किया? येलो वाला नाम किया और रेड वाला मेरे लिए छोड़ दिया। तो जैसे ही उन्होंने ऐसा किया आई वास सो स्ट्रक मतलब मुझे क्लियर समझ में आता है कि वो चाहते हैं कि बेटर वो दिखने वाला। अगेन ऐसा हो जिसको पता हो तो खा के पता चलेगा। किंतु जो दिखने वाला बेटर है वो उन्होंने मेरे लिए छोड़ दिया है और जो येलो वाला था वो उन्होंने ले लिया है। रेड वाला मेरे लिए रख दिया है। आई वास सो स्ट्रक मैंने कहा अच्छा देखिए मैंने मेरा खुद का जैसे है वो ना ही मुझे खाने में इंटरेस्ट ना ही खिलाने में इंटरेस्ट ना ही खाना बनाने में इंटरेस्ट। जो सामने आता है मैं ले लेता हूं। तो मैं कभी भी ऐसा नहीं सोचूंगा कि अच्छा यह मेरा जूनियर है उसके लिए मैं बेटर वाला छोड़ दूं और और यह जो दूसरा वाला है वो मैं ले लूं। मैं कभी ऐसा नहीं सोचूंगा क्योंकि ये पूरे मामले में ही मैं नहीं जाता। किंतु इनका मैंने देखा कि किस तरह से बेटर दिखने वाला नाम मेरे लिए छोड़ दिया और दूसरा वाला जो है येलो वाला उन्होंने ले लिया। सो म देखिए हमारा उस दिन बात हो रहा था कि ये ओपोरर्चुनिटी है लक्ष्मी दीदी ने ओपोरर्चुनिटी मिस करती है मां की सेवा करने का मां के सानिध्य प्राप्त करने का ये ओपोरर्चुनिटी पकड़ी कैसे जाती है पता है आप ऐसे लोगों को खोजिए कि जिनका हृदय उदार है और ये हृदय की उदारता है ना ऐसी छोटी छोटी चीजों में पता चलती है जैसे ही वो महाराज ने वो येलो वाला अपने हाथ में लिया और कहा कि महाराज ने कहा है उनके लिए रख दो बाद में लेंगे तो ये रेड वाला उनके लिए रख दो इंस्टेंटली स्ट्रक मी की देखिए कि हृदय की उदारता उनकी कितनी गंभीर है ये जो साधु जीवन है या तो फिर ये आध्यात्मिकता है वो कोई बहुत बड़ी-बड़ी बातें बना करके बहुत बड़ी-बड़ी फिलोसफी लगा के विध्वता से पांडित्य से कठोरता करने से तपस्या करने से यह सब चीजों में नहीं दिखती असली तो ऑफकोर्स और सत्य प्रतिष्ठा किंतु यह चीज ये तीन चीजें है जो ज्यादातर समय हमको दिखती नहीं हमको दिखता क्या है वो है ये सेल्फलेसनेस ये जो उदारता है हृदय की ये स्वार्थहीनता जो है वो दिखती है और जैसे ही किसी के भीतर में आप देखें उनका आप संग कीजिए ये ओपोरर्चुनिटी पकड़ने का ये तरीका है अदर वाइज आप यदि पावर पोजीशन विध्वता टैलेंट यह सब देख के यदि संग करने को जाएंगे हो सकता है कि इससे ज्यादा कुछ बेनिफिट ना हो। किंतु ये जो हृदय की उदारता है किसी के भीतर में आपने देखी इमीडिएटली आप उनके प्रति एक रिस्पेक्ट रखिए। हो सकता है तो उनका संग कीजिए। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो सब घटनाएं है कि ठाकुर का दर्शन हुआ। ठाकुर के पैरों में से ये मां गंगा निकल रही थी। मां ने साथ साथ में ही ये जासवंत के फूल है। वो पेड़ के ऊपर में से तोले वो चुने और फिर ला के ये गंगा में उन्होंने अंजलि देना शुरू कर दिया। यह सब चीजें मां के जीवन में है कि इससे भी एक डीपर है मां का ये जो मातृत्व है हमको बिकॉज़ हमने ठाकुर को पढ़ा है यह सब चीज हमको एक नॉर्मल लगती है किंतु मां के जीवन में यह सब हाईलाइट है ऐसा सब भी मां के जीवन में भी हुआ है तो शाम को ही श्री अपरा में श्रीक्ता गौरी मार आ उसी दिन शाम को श्रीक्ता गौरी मां का आनंदन हुआ। वैष्णव शास्त्र अवलंब श्री मां के उजा में वैष्णव शास्त्र अवलंबन से उन्होंने श्री मां को समझा दिया कि जाहार वैशंभव उनका वैव्य असंभव है। मां कभी विधवा हो ही नहीं सकती। कारण तहार चिन्मय स्वामी क्योंकि उनका चम्मय स्वामी है उनके जो स्वामी है उनके जो पतिदेव है उनका ना ही ना ही जन्म है ना ही मृत्यु है ना ही जरा है ना ही व्याधि है यदि जन्म मृत्यु जरा व्याधि दिखता है तो वह सब लीला मात्र है अधिक और उससे भी ज्यादा तीन लोक वह लक्ष्मी है तीन भूषण त्याग को जोत लहीन हुए वह यदि आभूषण त्याग करेगी तो जगत लक्ष्मीहीन हो जाएगा। सही है। ये कितना हमको भारतीय समाज एक तरह से दरिद्र में दरिद्रता में चला गया है। उसका ये भी एक कारण है कि ये जो सामाजिक अनुदारता ये जो सही में लार्ज हार्टेडनेस जो होनी चाहिए। एक असहाय दरिद्र ना है वो वहां पर रह रही है। उनके प्रति सहानुभूति उनके प्रति एक सिंपथी का भाव एक हेल्पफुलनेस जो उनके प्रति रखना वो नहीं करके ये जो नीति नियम जो है आपके नाथ और जात के उसी के भीतर में आप उनको देखेंगे कहा मां का ये जो एक महत्व चरित्र कहा मां की आध्यात्मिकता तो वो नहीं देख के एक छोटा सा पकड़ करके रखा है कि विधवाओं के नियम के अनुसार उन्होंने आभूषण त्याग नहीं किए विधवाओं के नियम के अनुसार संपूर्ण सफेद वस्त्र उन्होंने धारण नहीं किए। बस उसी चीज को लेकर के समाज पड़ा है और इसके छोटी सी के परे जो उनका ये जो आध्यात्मिक उन्नति है जो स्पिरिचुअल डेप्थ है थोड़ा सा भी आप उनका उनकी सेवा करेंगे थोड़ा सा भी उनका सित लाभ करेंगे तो आपका जीवन है कहां वो उच्च स्पिरिचुअल एक शिखर पे जाकर के अवस्थित होगा वो नहीं बस वो जो छोटी एक दृष्टि हमारी बन गई है स्वामी जी ने कहा है ना रिलीजन है वो इनू द किचन। ये धर्म जो है वो किचन में जाकर के घुस गया है। इसका क्या अर्थ है? ये इस हाथ से वो खाना खाए ना कि उस हाथ से पानी पिए ना कि इस हाथ से पानी पिए। तिलक करेंगे तो इस शेप का तिलक करेंगे ना कि उस शेर का तिलक करेंगे। तो यही सब चीजों को लेकर के हम पड़े रहते और अदर देन धर्म का ये जो सही सही सिंबल है काम कांचन त्याग सत्य में प्रतिष्ठा हृदय की उदारता यह सब कुछ हम भूल गए कोई भी आदमी कितना ही निष् क्यों ना हो कितना ही चाहे काम कांचन में लिप्त क्यों ना हो कितना ही चाहे झूठ क्यों ना बोलता हो किंतु ये जो सामाजिक नीति नियम का पालन करता है तो समाज में श्रेष्ठ हो के धार्मिक लीडर बोल के वो कराया जाएगा और जो लोग नीति नियम का पालन नहीं करते ये जो नाथ और जाति ये जो एकदम नैरो डेफिनेशन के भीतर में नहीं रहेंगे तो फिर उनके हृदय की कितनी ही उदारता हो कितना ही सत्य में प्रतिष्ठित हो कितना ही गंभीर उनके आध्यात्मिक अनुभूतियां हो उनका कोई भेद नहीं ये बोल के ये जो हमारी दृष्टि ये जो विशाल दृष्टि संकुचित हो के एकदम छोटे से दायरे में बंद हो गई। धर्मा जब किचन के भीतर में चला गया तब कहीं जाकर के यह सब होना शुरू हुआ। हालांकि किचन में धर्म के

रसोई में आनंद से भोजन बनाते स्वामी विवेकानन्द

ऊपर से मुझे याद आया कि मैंने मैं जब राजकोट में था मैंने एडिटोरियल लिखा था। सीरीज ऑफ एडिटोरियल लिखे थे। रसोई घर में स्वामी विवेकानंद स्वामी जी को खाना बनाना बहुत अच्छा लग रहा था। तो वो तो किचन में जाकर के खाना बनाते थे। तो ये कहानियां मेनली मैंने वहां से सिलेक्ट की थी कैलिफोर्निया से तो कैलिफोर्निया में स्वामी जी सैन फ्रांसिस्को है याना जो हैना वहां पे वो भक्तों के घर में रहते थे और फिर स फ्रांसिस्को में तो एक उनके लिए भाड़े से फ्लट लिया गया था टर्क स्ट्रीट पे किसना है वहां पे वो आड़ाना वहां पे वो के घर रहते थे तो फिर क्या होता था इवन टर्क स्ट्रीट फ्लट में भी वो भाड़े लिए गए घर में वो जैसे ही उनका क्लास समाप्त होगा लेक्चर समाप्त होगा स्वामी जी एकदम छोटे बच्चे की तरह आनंद से उत्फुल हो के दौड़ के किचन में जाएंगे और कहेंगे नाउ वी विल कुक अभी हम खाना बनाएंगे और ऐसा दौड़ के वो खाना बनाना चालू कर देते थे अभी प्रॉब्लम क्या होता था बड़े महंगे कपड़े पहने थे तो लेक्चर लेक्चर देने के लिए वो जो स्वामी जी का फोटो हमने देखा है जिस तरह से वो उनका एक लंबा कोट है फिर उसमें वो जो एक ये पट्टा बांधा है। फिर पगड़ी पहनी है। तो बाकी सब महंगे कपड़े पहन कर के स्वामी जी खाना बनाना शुरू करेंगे। अभी नेचुरली है कि आप खाना बनाएंगे तो छींटे वगरा तो उड़ेंगे तो और इतना महंगे कपड़े खराब भी होंगे। तो फिर ये जोसेफ एंड मेक उनकी मां की तरह वो ऐसा भीतर में जाएगी और डांटेगी स्वामी जी को। अरे स्वामी फर्स्ट चेंज योर क्लथ लेकिन महंगे कपड़े पहन के खाना बना रहा है। ये क्या कर रहा है? तो फिर स्वामी छोटे बच्चे की तरह फिर वो थोड़ा सा मुंह बना के कपड़े चेंज करेंगे। फिर से आएंगे और फिर से खाना बनाना शुरू करेंगे। तो एक दिन की कहानी है वो एडिक एल स्वामी जी डिसाइपल वो स्वामी जी के साथ में खाना बनाने को उसने कहा की हेल्प क्या करना स्वामी जी को स्वामी जी अलऊ करते थे उनको किचन में साथ में खड़े रहने के लिए छोटी मोटी चीजें करेंगे तो वो कहती है की स्वामी जी की क्लास जो अटेंड की है उससे भी कभी ज्यादा वो जो आध्यात्मिक प्राप्ति है स्वामी जी के साथ में रसोई घर में मुझे और स्वामी जी खाना बनाते बनाते कभी गीता के श्लोक चालू कर देंगे कभी अभी कहां वो फिलोसफी की बातें करना शुरू करेंगे व्हिच इज़ मच मोर पावरफुल देन फॉर्मल क्लास अभी ये किचन में क्या वार्तालाप हुआ अनफॉर्चूनेटली उस समय गुडविंग वहां पे खड़ा रह के लिख नहीं रहा था बट एनीवे तो वैसे भी उस समय गुडवि के दिन में तो एडि वो आचार है आचार्य स्वामी जी ने कहा उसके बारे में इसको पात्र में डालो बाकी जो भी उसके कुछ छींटे जो है उसके ड्रेस पे गिरते है के तो अभी क्या है वो जो वैष्ण में जो कासेप्ट है ना शिवाल अर्थात क्या है एक सुंदरी स्त्री वो यदि कोई तकलीफ में आती है तो ये जो यंग लोग है उनको हेल्प करने के लिए बड़े उत्सुक होते हैं और समझ ही सकते हैं एक तरह का एक माहौल खड़ा होगा इस तरह की सिचुएशन में वो स्त्री जाके अरे इतनी बड़ी तकलीफ में आ गई वो यंग मैन करने के लिए रिलेशनशिप बनाने का एक बहाना है। तो अभी एडी तो शी ह्यूमन मिस्टर ह्यूमन तो वो सब भाव उसके भीतर में है कि अभी भी तो अभी ड्रेस के ऊपर में आचार गिरा है तो उसने एकदम कंप्लेंट करना शुरू कर दिया। स्वामी जी देख मेरे ड्रेस पैच मेरा और पूरी अपेक्षा रहती है कि स्वामी जी सब काम छोड़ के उसको हेल्प करेंगे वो ड्रेस फिल करने में वगैरह वगैरह जैसे कि उसने देखा है वेस्ट में जितने भी है ऐसा करते हुए तो वो खुद कहती है पता नहीं एडिन खुद कहती है मैं वहां पे बैठी बैठी कंप्लेन कर रही हूं और अपेक्षा कर रही हूं कि स्वामी जी सब काम छोड़ के इमीडिएटली आ मेरा ड्रेस करेंगे ये अपेक्षा करके बैठी हूं स्वामी जी मेरी कंप्लेंट के सामने करणपात भी नहीं करते। मेरी कंप्लेंट के बारे में एक सुनते तक नहीं। जो अपनी वो गुनगुन करके संस्कृत के श्लोक को गुनगुनाते हैं और वो जो खाना पका रहे हैं वो करते ही जा रहे हैं। करते ही जा रहे हैं। वो कहती है कि मैंने कितनी देर तक कंप्लेंट की। तब कहीं जाकर के स्ट्रगल हुआ। स्वामी जी कॉमन ये जो आम एक यंग पर्सन है एक सुंदरी स्त्री वो यदि मुसीबत में आती है तो कैसे दौड़े दौड़े जाते हैं हेल्प करने के लिए स्वामी जी उस कैटेगरी में नहीं थे इस कंप्लीटली डिफरेंट केटेगरी तब कहीं जाकर के उसने कंप्लेंट करना बंद किया और फिर अपने हाथों से उसने अपना ड्रेस किया ये जो शिवाल का जो कांसेप्ट है की ये यंग मेन सुंदरी स्त्री को युवती को स्त्री को हेल्प करना चाहिए तो उसको एक बहुत ही म नोबल एक एटीट्यूड माना जाता है यंग में तो किसी ने स्वामी जी को कहा कि आप हिंदू हो इस तरह का शिवाने का कासेप्ट ही नहीं है स्वामी जी ने कहा देखो इस सब के पीछे सिंपल काम करो ये सब बड़ी बड़ी नो बातें मत बनाया करो आप इमेजिन कीजिए वृद्धा स्त्री है वो यदि इस तरह से कंप्लेंट करेगी तो कोई यंग जाएगा उनको करने के लिए युवती है सुंदरी है तभी जाएगा अदरवाइज नहीं जाएगा तो वो सामने होगा जो ये सब बोल रहा था जो हो गया तो देखिए काम कांचन त्याग ये रहने की उदारता ऐसी छोटी छोटी चीजें प्रकटित होती है। स्वामी जी के जीवन में त्याग है ही उसमें कोई प्रश्न नहीं। किंतु एक [गला साफ़ करने की आवाज़] छोटी सी ऐसी एक कहानी आप सुनिए और एकदम क्लियर हो जाएगा की ये कितने डेप्थ तक चला गया। ऐसा नहीं है कि उन्होंने बहुत ही रिस्ट्रे करके अपने को रखा है कि थोड़ा सा भी अपनी सेल्फ कंट्रोल लूज हो जाएगा। खड़ा करके भीतर का ये सब कचरा जो है बाहर आ जाएगा जो कि ज्यादातर हम लोगों के साथ में होता है। बड़ा इस कंट्रोल में रहना पड़ता है। बहुत ही अपने को रिस्ट्रिक्ट करके रहना पड़ता है। थोड़ा सा भी अपने माइंड को छोड़ दिया पता नहीं भीतर में से क्या आ जाएगा। ज्यादातर लोगों को इंक्लूडिंग मसेल्फ लोगों को इस तरह के में रहना पड़ता है। स्वामी जी देखिए किचन में एक सुंदरी युवती स्त्री के साथ में काम कर रहे हैं। अमेरिका में है वो अमेरिका में आपने कौन क्या किया कुछ किसी को पता नहीं और यही स्त्री म और कोई थर्ड पर्सन स्वामी जी की प्रशंसा करने के लिए कहानी नहीं कहता। यही स्त्री कहती है ये बात स्वामी जी के बारे में कि मैं यहां पे कंप्लेंट के कंप्लेंट दिए जा रही हूं। कह रहे स्वामी जी देखिए मेरा इतना सुंदर ड्रेस है वो बिगड़ गया हेल्प कीजिए स्वामी जी सुनते तक नहीं है स्वामी जी उसके सामने नजर ऐसा घुमा के देखते तक नहीं क्या डेप्थ है त्याग कहां तक ये त्याग उनके डीएनए तक चला गया है वो जो चैतन्य महाप्रभु के बारे में ठाकुर कहते हैं ना कि उनकी जीवा के ऊपर में किसने चीनी रख दी जस्ट इमेजिन जीभ के ऊपर में चीनी रखेंगे तो चीनी तो गीली होगी ही होगी किंतु वो चीनी तनी भर गीली नहीं हवा में उड़ गई सूखी भी सूखी की रही हवा में उड़ गई तो ये त्याग जो है अपनी रूटियों तक चला जाना चाहिए अपने डीएनए तक चला जाना चाहिए तब कहीं वो त्याग होता है बाकी तो हमारा क्या है देखिए ज्यादातर लोग क्यों ना जात वगरा एक छोटा सा एक लेकर के बुद्धि लेकर के रहते हैं क्योंकि क्या है पता है सबको पता है कि अपनी आध्यात्मिकता की दूर कहां तक थोड़ा सा भी आप ये करेंगे स्कप करेंगे खड़ा करके भीतर का पूरा कचरा बाहर आ जाएगा वो स्किन डीप है स्किन डीप अर्थ की वो थोड़ा सा ही ऊपर में का आवरण है थोड़ा सा भीतर में आप झगेंगे तो पूरा राक्षसी पन भरा हुआ है और इसीलिए इस तरह के राक्षसी पन को छुपाने के लिए ही हम लोग अपने को इस तरह की छोटी ये जो दृष्टि बिंदु है उस बांध देते हैं कि किसी को पता ना चले दिखाना है कि मैं कितना ध्यान हूं और किसी को पता ना चले चले कि भीतर में कितनी राक्षसीता भरी हुई है। खोल करके हम अपने को यह सब नीति नियम कायदे कानूनी नाद जात की ये नैरो माइंडेडनेस की एक मायाजाल बनाते हैं और फिर उसमें अपने को डाल देते हैं और फिर इस तरह की मायाजाल में रहते रहते मां जैसा किसी का आगमन हुआ जगत जननी स्वयं कहां उनकी उन्हें गंभीर आध्यात्मिकता क्योंकि हमारी ये जो छोटे से दृष्टि बिंदु पर कहीं पे भी हम नहीं कर पाएंगे बहने पहनती है सफेद वस्त्र नहीं पहन है तो फिर क्या है उनके जीवन में क्या है आध्यात्मिकता क्या है धर्म हमारी दृष्टि फिर इतनी छोटी हो जाती है ये जो म अपोरर्चुनिटी जैसे उस दिन हमारी बात हो रही एक उदार दृष्टि रख के धर्म में अपनी एक अंतर्दृष्टि होनी चाहिए कि धर्म क्या है वो अंतर्दृष्टि ले के हम जब लोगों को देखेंगे ना उनको इमीडिएटली पता चल जाएगा कि कौन कहां पे खड़ा है तो आपको ये नहीं देखना कि किसका कितना पावर है किसका कितना बड़ा पोजीशन है किसका कितना बड़ा पॉपुलरिटी है वो सब चीजें आएगी तो वो कुछ नहीं है ये थोड़ी सी अंत दृष्टि लेकर के आप देखिए कि कौन कहां पे है इमीडिएटली आपको पता चलेगा कि किसका संग करने से हमारी आध्यात्मिक उन्नति होने वाली है अच्छा इस टॉपिक में और भी अभी है जो अभी हम जीवन के नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्स श्री राम कृष्णा ओम