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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

आविर्भाव : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 11 Dec 2023

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरू पिणे अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज सुबह को मैं बाबूराम महाराज की एक किताब पढ़ रहा था प्रेमिक पुरुष प्रेमानंद चेतनानंद जी का कंपाइलेशन है उसमें एक बड़ा ही सुंदर एक छोटा सा घटना दिखा अ हम लोग पढ़ते रहते हैं किंतु क्या है कि सब कुछ तो याद नहीं रहता तो भूल जाते हैं तो इसको भी मैंने जब पढ़ा तो मैंने सोचा अरे इतनी सुंदर घटना में कैसे भूल गया बाबूरा बेलूरमठ की स्थापना हुई है स्वामी जी ने नियम किया है कि सुबह दिन के दौरान किसी को सोना नहीं है जो भी सोना वगैरा होगा वह रात को होगा दिन के दौरान कोई नहीं सोएगा तो अभी क्या है कि स्वामी जी के तो सब यंग डिसाइल है सब एकदम वो मने एनर्जी से भरपूर और स्वामी जी का काम करेंगे बोल कर के तो वो किसी ने आकर के बोल दिया स्वामी जी को कि बाबूराम महाराज सो रहे हैं दिन का कोई समय होगा और आकर के कंप्लेन कर दिया तो स्वामी जी ने बोला अभी स्वामी जी को क्या है नियम रखना है तो नियम तो सब के लिए है ना ऐसा थोड़ी ना है कि जो नए आए हुए बच्चों के लिए नियम है और जो सीनियर साधु वो लोग जो चाहे करें स्वामी जी ने कहा उ उसके पैर खींच करके वो चारपाई से उसको उठा कर के उसको निकाल उसको नीचे गिरा दो तो यह सुनकर के वो ये साधु बेचारा नया आया था और स्वामी जी का डिसाइल है वो जाकर के बाबूराम महाराज सोए हैं उनके पैर पकड़े और जोर से खींचने लगा तो नेचरली बाबूराम महाराज तो जग जाएंगे पूछ रहे अरे अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो तो ये तो साधु तो थोड़ी ना सुनने वाला है स्वामी जी का आदेश है सबके लिए ठीक है मैंने वो खींच करके बाबूराम महाराज को सही में चारपाई से गिरा दिया और फिर वहां से कुछ भी बोले बिना दौड़ कर के भाग गया क्योंकि वो भी पता है कि बाबूराम महाराज डाट तो क्या होगा तो दौड़ के भाग गया तो अभी यह घटना तो हो गई बाबूराम महाराज तो कुछ बोले नहीं पता है कि स्वामी जी का नियम है खुद की ही गलती है क्या करेंगे किसी को तो दोष नहीं देना है मीन वाइल स्वामी जी के मन में पता नहीं क्या हुआ वो वॉकिंग कर रहे थे उनका जदी आपने देखा होगा उनका रूम जो है बेलूर मठ में फर्स्ट फ्लोर पे गंगा की ओर जो वरांडा है वहां प थोड़ा सा वो पाईचा कर रहे थे एकाएक बाबूराम महाराज किसी काम की वजह से वहां पर चले गए तो जैसे ही स्वामी जी स्वामी जी के मन में पता नहीं फिर एक कहने के बाद में आदेश देने के बाद में उनके मन में क्या हुआ होगा जैसे ही बाबूराम महाराज को सामने देखा एकदम उनके पैरों में गिर गए दो पैर पकड़ लिए जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया अरे बाबूराम तुमको तो ठाकुर ने इतना प्रेम से रखा है ठाकुर तुमको इतना स्नेह करते थे और तुम्हारी इतनी तपस्या है ठाकुर के ऊपर तुम्हारी इतनी श्रद्धा भक्ति है इसके बावजूद मैंने तुम्हारे प्रति इस तरह का एक जघन्य काम किया तुमको इसने चारपाई से गिरा दिया पैर खींच करके यह मेरी कितनी बड़ी गलती हो गई मुझे क्षमा कर दो ऐसा बोलकर स्वामी जी रोते ही जा रहे हैं रोते ही जा रहे बाबूराम महाराज बेचारे सोच रहे कि अरे नर को कैसे ठंडा करे फिर कितना स्वामी जी को समझाया बुझाया अरे उसमें तो आपकी गलती नहीं है नियम तो सभी को मानना है यह मोनेस्ट्री में जद नहीं होगा तो फिर हम लोगों का क्या होगा हम लोग आज बहुत बार सोचते हैं कि जस्ट सिर्फ हमने गेरवा पहन लिया सिर्फ की हम लोग कोई एक व्रत ले करके सन्यास व्रत वगैरह लेकर के यहां पर बैठे हैं बोलक के ही हम लोगों का काम हो जाएगा वो बात सही है यदि मैं इतना सिर्फ सोचू कि मेरे मन में सिर्फ निष्ठा रहनी चाहिए और ठाकुर के प्रति मेरी श्रद्धा भक्ति वह अटल रहनी चाहिए और मुझे जो काम देना है वह काम में सीरियसली करना है हमेशा देखिए कि साथ-साथ में समाज भी एक ऐसी चीज है समाज में सब लोग हमको देखते हैं और वह देख कर के अपना जजमेंट बनाते हैं और यदि वे लोग ऐसा भीतर में चाहे हमारा कुछ भी हो वो लोग बाहर का देखते हैं ना भीतर का कौन देखने को गया है वो तो बाहर से देख कर के ऐसा वो देख कर के वो डिसाइड करते हैं कि इन लोगों के प्रति क्या है और समाज के भीतर में रहना है बोलकर के उनका एक हमारे प्रति क्या अभिप्राय है हमारे प्रति क्या ओपिनियन है उसको भी हमको ठीक से ग्रहण उसको हमारे सब कैलकु माइंड में रखना है एक चीज दूसरा कि देखिए कि ये आश्रम का डिसिप्लिन है यदि कोई एक व्यक्ति आश्रम का डिसिप्लिन फॉलो ना करे भले ही उसका हृदय कितना ही साफ हो किंतु यह जो बाह्य डिसिप्लिन जो है उसका इस तरह का एक प्रभाव है कि जब सभी लोग डिसिप्लिन फॉलो करते हैं तो आश्रम में एक बड़ा ही सुख शांति चैन का वातावरण रहता है और यदि कोई कोई लोग डिसिप्लिन का भंग करना शुरू कर दे अगेन हृदय कितना ही उनका स्वच्छ निर्मल क्यों ना हो बाहर का डिसिप्लिन होना शुरू होता है तो उसका एक रिपल इफेक्ट सब जगह पर फैलता है तो यहां पर स्वामी जी रो रहे हैं बाबूराम महाराज उनको शांत रख रहे हैं माने देखिए कि ये रामकृष्ण संघ का कितना सुंदर एक फाउंडेशन है ऑन वन हैंड नियम कानून डिसिप्लिन सब कुछ है हमको समाज के भीतर में रहना है सोसाइटी में काम करना है आश्रम चलाते हैं तो ये नए आए हुए साधु ब्रह्मचारी गण जैसे ही वो एक नया आया हुआ साधु जैसे ही बाबूराम महाराज को सोते हुए देखा तो उसने यह नहीं सोचा कि ठाकुर के मानस पुत्र है ठाकुर के ईश्वर कोटि स्वयं ठाकुर के त्यागी संतान है ईश्वर कोटी है स्वामी जी के प्रिय गुरु भ्राता है ऐसा नहीं उसने जाकर के सीधा स्वामी जी को कंप्लेन कर दिया तो अभी वह भी तो देखता है कि मेरे लिए जो नियम है वोह उनके लिए भी है स्वामी जी ने एस्टेब्लिश किया नियम सबके लिए है बोलकर के सभी लोग नियम को पालन करते हैं यहां पे वैसे स्वामी जी ने कहा है कि रामकृष्ण संघ में डिक्टेटरशिप है किंतु सही में देखा जाए तो कोई मुझे आज ऐसा कंपेन नहीं कर सकता डिक्टेटरशिप में जैसा ऑर्डर होता है कंपेन होता है कि तुमको यह करना ही पड़ेगा नहीं करोगे तो फिर तुम्हारे साथ में जो हम करेंगे तुम सोचते रह जाओगे मने बहुत कुछ वो लोग जिसको कहे कॉर्पोरल एक्शन ले सकते हैं पुलिस एक्शन ले सकते हैं रामकृष्ण संघ में तो ऐसा नहीं है जनरल सेक्रेटरी महाराज हमारे आश्रम के अध्यक्ष महाराज वोह मुझे बोलेंगे कि तुमको ऐसा करना है यदि मैं उनकी बात सुन कर के मेरी इच्छा से वो नहीं करूंगा तो मुझे रोकने वाला कौन है तो ऑन वन हैंड ठीक है कि डिक्टेटरशिप है किंतु डिक्टेटरशिप तो हम ही एक्सेप्ट करते हैं हम यदि इसको एक्सेप्ट नहीं करें तो डिक्टेटरशिप नहीं चलेगा बाहर की तरह नहीं है कि मैं नहीं करूंगा तो फिर वो और कोई एक्शन लेंगे पनिशमेंट करेंगे ऐसा तो यहां पर नहीं है पनिशमेंट में भी क्या है ज्यादा से ज्यादा बोलेंगे कि चलो कुछ दिन के लिए तुम कहीं तपस्या करके वो तो मेरी इच्छा से मैं जाऊंगा नहीं इच्छा होगा तो नहीं भी जाऊंगा मैं संग छोड़ के चला जाऊंगा आप क्या कर लेंगे मुझे तो कोई रोकने वाला नहीं है तो ये भीतर से हम लोग इस ऑर्डर यह डिसिप्लिन यह डिक्टेटरशिप को एक्सेप्ट करते हैं क्यों क्योंकि बिल्कुल प्रथम से हम लोग देखते आ रहे हैं कि स्वामी जी ने संघ में सभी के लिए एक ही तरह के नियम रखे हैं यदि वह आज का आया हुआ ब्रह्मचारी हो ना कि वह सर्वोच्च आसन पे स्थित सर्वोच्च सीनियर साधु हो नियम सबके लिए एक है तो वह देख कर के वो भीतर से इसके प्रति एक रिस्पेक्ट जाता है तो मैंने आज सुबह सुबह पढ़ा मुझे बड़ा अच्छा लगा मैंने कहा मैं उसको शेयर करता हूं तो आज फिर से मां की कहानी मां की जीवनी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित एक जो पैराग्राफ है इसके बारे में हम लोग डिस्कस कर रहे थे चैप्टर का नाम है आविर्भाव सर्वप्रथम हमने अवतरण का देखा अर्थात की प्रीफेस उसके बाद में था शक्तिपीठ प्रथम चैप्टर फिर ये दूसरा चैप्टर है आविर्भाव मां का इस पृथ्वी पर आगमन हुआ इसकी पश्चात भूमिका क्या है तो शक्तिपीठ चैप्टर में जयराम बाटी ग्राम के बारे में महाराज जी ने हमको सुंदर वर्णन दिया यहां पे मां के माताजी पिताजी उनके पूर्वज पुरखों के बारे में महाराज जी लिख रहे हैं यहां पे एक छोटा सा पैराग्राफ उन्होंने जिस तरह से लिखा है कि मुख्य देर अर्थात कि मां के पिताजी का जयराम बाटी ग्राम में आगमन या तो उनके पुरखों का जयराम बाटी ग्राम में आगमन उसके साथ में वेस्ट बंगाल में या तो फिर खैर वेस्ट बंगाल तो आज का डिवीजन है उस समय के बंगोल में एक जो धर्म विप्लव प्रकट हुआ था उसके साथ में इनका आगमन जयराम बाटी ग्राम में वो संश्लिष्ट है दोनों एक साथ एक दूसरे के साथ में एक तरह से जुड़े हुए हैं और व विप्लव क्या था कि बौद्ध धर्म जो कि हजारों सालों से भारत में अपनी शाखा प्रशाखा एं फ ला रहा था भगवान बुद्ध के प्रेरणादाई संदेश को हम हिंदुओं में प्रचार कर रहा था उसका धीरे-धीरे अपसरण होने लगा था अभी मैंने भी थोड़ा सा एक इसके ऊपर में रिसर्च करके देखा है स्वामी जी ने भी बुद्ध धर्म के ऊपर में काफी कुछ कहा है प्रश्न होता है कि बौद्ध धर्म भारत में से कैसे गया तो हम लोगों को बहुत बार कहा जाता है कि शंकराचार्य ने जिस तरह से हिंदू धर्म का एक रिवाइवल स्टार्ट किया हिंदू धर्म की पुनः जागृति रेनेसा विदेश में शब्द है रेनेसा हमारा र किंडलिंग कह सकते हैं या तो री अवेक निंग कह सकते हैं यदि भारत में हिंदू धर्म के पुनः जागरण को यदि इसके बारे में कहा जाए तो तो भारत में अवेक निंग स्टार्ट हुआ इसके साथ में बुद्धिज्म का डिक्लाइन जुड़ा हुआ है तो यह तो एक बात है फिर मैं थोड़ा सा और मैंने रिसर्च किया तो जनरल बाकी सब जो हिस्टोरियन है उनका मानना है कि इस्लाम के आक्रमण की वजह से भी बुद्धिज्म का काफी कुछ क्षति उसकी ह्रास हुई है क्योंकि उन लोगों ने बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री थी बुद्धिस्ट साधु थे उनको टारगेट किया था और उनके ऊपर में अत्याचार किए थे मठ मोनेस्ट्री जितनी उनकी थी उनको या तो लूटा या तो जलाया या तो फिर उसको किसी भी तरह से बंद करवाया तो यह भी उसके साथ में एक रीजन जड़ित है नेचुरली हमारे मन में प्रश्न होगा कि इस्लाम के आक्रमण से यदि बुद्धिज्म का हरासर में हुआ तो उतना ही उसका नुकसान हिंदू धर्म को क्यों नहीं हुआ क्योंकि यदि मुस्लिम लोगों ने बौद्ध लोगों को टारगेट किया है तो हिंदुओं को भी टारगेट किया है यदि उनके मठ को उन्होंने जलाया है तो अपने मंदिरों को भी तोड़ा है यह तो जग विदित है किसी की निंदा करने की बात नहीं वो तो सब हिस्टोरिकल घटनाए वह सब चली गई आज के परिप्रेक्ष्य में मैं नहीं बोल रहा मैं सिर्फ हिस्टोरिकल परिप्रेक्ष्य में ही पूछ रहा हूं कि इस हिस्टोरिकल परि प्रेक्ष में इस्लाम के आगमन से बौद्ध धर्म का भारत में ह्रास हुआ तो हिंदू धर्म का क्यों नहीं हुआ तो उसका उत्तर भी हमारे पास में बड़ा ही क्लियर है जैसे हम यही अवतरण का में पढ़ रहे थे कि जितनी ही बार धर्म पर आक्रमण होता है मनुष्य के हृदय में संशय उत्पन्न होता है उतनी ही बार देवी पृथ्वी पर अवतरण करती है धर्म की रक्षा करने के लिए और मनुष्य के हृदय के भीतर में यह संदेह संशय निराशा यह हताशा यह जो सब नेगेटिव इमोशन है उसका अपसरण करने के लिए उसके ऊपर में विजय प्राप्त करने के लिए यह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट है और उस समय भगवान श्री कृष्ण चैतन्य का आगमन हुआ था तो उसने एक उन्हो उनके आगमन से वैष्णव धर्म की य मूवमेंट वैष्णव मूवमेंट उसकी वजह से हिंदू धर्म को एक सपोर्ट मिला और हिंदू धर्म में सिर्फ वेस्ट बंगाल में ही नहीं पूरे भारत में एक एक के बाद एक संत महापुरुष प्रकट होते गए और उनकी तपस्या उनकी साधना और उनके उपदेशों की वजह से हम हिंदुओं ने अपने हृदय के भीतर में धैर्य धर करके अपने धर्म को बचा के रखा सेम चीज हम बुद्धिज्म के बारे में नहीं कह सकते हैं बौद्ध धर्म में हम देखेंगे कि चाइना या जापान या थाईलैंड यह सब देशों में अच्छे-अच्छे बौद्ध भिक्खू या तो बौद्ध मंग उनका आविर्भाव प्रादुर्भाव हुआ था यदि हम जापान के बारे में सोचे तो खास करके यह जैन बुद्धिज्म के एक के बाद एक पेट्रिया उनका जो आगमन हुआ और उन्होंने इतना सुंदर रूप से बौद्ध धर्म को जनसाधारण के भीतर में उसका प्रसार किया भारत में ऐसा नहीं हुआ ऐसा क्यों ये एक थोड़ा देखने की बात है कि बौद्ध धर्म की जन्मभूमि भारत उसी में ही समय के अनुसार बौद्ध संत महात्मा और साधक उनका उद्भव क्यों नहीं हुआ तो मेरा जो पर्सनल थिरी ऐसा है कि संत और महात्मा अर्थात कौन वो तो एक मुमुक्षु ही है आज एक कोई भी एक किसान है या तो फिर एक सैनिक है या तो फिर एक राजा है या तो फिर उसके कोई अधिकारी है जैसे सायं थे वो राजा के वो तो मंत्री थे फिर उन्होंने वेद के ऊपर में भाषा लिखा वेद का उद्धार किया मतलब आधुनिक जगत के लिए तो इस तरह से वोह ऐसे मुमुक्षु लोगों का प्रादुर्भाव होता है फिर मुमुक्षु सोचना शुरू करते हैं कि मुझे किस डायरेक्शन में मुझे प्रकाश दिख रहा है और जिस डायरेक्शन में प्रकाश दिखेगा उस डायरेक्शन में वह चले जाएंगे तो ऐसा था कि मिडिवल एज जिसको कहते हैं उस समय भारत में जितने भी यह मुमुक्षु का जन्म हुआ उनको सबसे ज्यादा प्रकाश हिंदू धर्म की ओर से ही दिख रहा था इसीलिए उनका हिंदू धर्म की ओर आकर्षण बढ़ा और हिंदू धर्म का रिवाइवल हुआ यदि उनको बौद्ध धर्म में आकर्षण दिखता बौद्ध धर्म में प्रकाश दिखता तो उस डायरेक्शन में में चले जाते इस्लाम धर्म में दिखता तो उस डायरेक्शन में चले जाते क्रिश्चियनिटी तो भारत में था ही वो सेंट थॉमस हिमसेल्फ आई थिंक भारत में आए थे और उन्होंने भारत में क्रिश्चियनिटी का वो स्थापना की थी सम वो तो जीसस के अपोस्ट थे डायरेक्ट डिसाइल थे तो क्रिश्चियनिटी भारत में था ही बाद में फिर इन लोगों के यूरोपियन आक्रमण के साथ में उनका बढ़ावा हुआ किंतु उनका स्थापना तो हो चुका था मिशनरीज भारत में आते जाते रहते थे तो वो तो कोई बड़ी बात नहीं कि इन लोगों के पास में ऑप्शन नहीं था ऑप्शन थे जितने भी मुमुक्षु साधक जन्म लिए किंतु जब वो ऑप्शन वो सही सही साधना करने का शुरुआत करते हैं तब उनको सबसे ज्यादा आकर्षण सबसे ज्यादा प्रकाश उनको हिंदू धर्म में ही दिखता था बोलकर के उन्होंने उस मार्ग के ऊपर में चलना शुरू किया और उस मार्ग के साधु और संत के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की तो एक मेरा जो पर्सनल थिरी है तो यहां पर फिर महाराज जी लिखते हैं कि बौद्ध धर्म का अपसारी धर्म का पुनः आ प्रदु पुनः जागरण हो रहा था उस समय मुख्य वंश का मुखर्जी यह वंश उनके पूर्वज है मां के उनका जयराम बाटी में आगमन हुआ था और साथ में महाराज क्या लिखते हैं बौद्ध प्राधान्य विमुक्त हिंदू समाज तखन होय अनमनी स्वभाव बौद्ध दिग के समाजे ओपा कोरीते छ ना होय उदार भावा पन्न बौद्ध दिग के महादर देवता सोहो निजो अंगे ग्रहण करते उस समय जो उदार मन के बौद्ध थे उनके और उनकी प्रैक्टिसेस उनके देवता गण थे उनको हिंदू धर्म में लोग यह लोग समाहित कर दे रहे थे या तो फिर जो बौद्ध ऑर्थोडॉक्स थे कठोर उनका आचरण था उनको वे लोग धीरे-धीरे करके समाज में से निष्कृति दे रहे थे समाज के बाहर नहीं कहा जा सकता समाज में से निष्कृति देने का अर्थ क्या है ऐसा नहीं है कि उनको आउटकास्ट कर रहे हैं आजकल यह जो हिंदू धर्म के बारे में बोला जाता है कि क्यों किसी को आउट का आउटकास्ट किया क्यों किसी को अछूत बोल कर के उसके साथ में बात ये नहीं है कि हम किसी को आउटकास्ट कर रहे हैं हम इतना है कि यह हमारा समाज है उसमें यह हमारा गांव है इस गांव के भीतर में हम अपनी विचारधारा अपने धर्म के अनुसार चलेंगे आपके लिए आपका गांव है आपके गांव में आप अपनी विचार धारा के अनुसार चले वो आपके जो सर्वश्रेष्ठ है ऐसा कीजिए हम तो कहीं दूसरों के गांव पे दूसरों के शहर पर दूसरों के देश पर जाकर के हिंदुओं ने कभी भी आक्रमण नहीं किया कभी भी यह नहीं कहा कि हमारी विचारधारा हमारे देवता हमारे धर्म हमारी साधन पद्धति हम आपके सर के ऊपर में लाद दे रहे हैं आपको उसको स्वीकार करना ही होगा हिंदुओं ने तो ऐसा कभी नहीं कहा हिंदुओं ने सिर्फ इतना कहा है कि हमको शांति से जीने दे यह हमारा गांव है यह हमारा शहर है हम अपनी साधन पद्धति अपने देवता पूर्वजों के आदेश के अनुसार अपने ऋषि मुनि गण के उपदेश के अनुसार यहां पर रहेंगे अपना जीवन निर्वाह करेंगे आपको वी यू आर वेलकम टू हैव योर ओन विलेजेस योर ओन कम्युनिटीज आप अपना गांव स्थापित कीजिए अपने शहर स्थापित कीजिए और यदि आप हिंदुओं के गांव में हिंदुओं के शहर में रहेंगे तो आपको कोई भी आप के ऊपर में अत्याचार नहीं होने वाला है कोई प्रश्न ही नहीं है कि हिंदुओं ने इतने हजारों सालों में किसी के ऊपर में अत्याचार किए हो वाद विवाद हुआ है आर्गुमेंट हुई है फिलोसॉफिकल पॉइंट को लेकर के बहुत सारे झगड़े भी हुए हैं किंतु अत्याचार कभी नहीं हुआ यह हिंदुओं ने कभी नहीं किया है तो ये एक पूरा जो कांसेप्ट है ना कि किसी को आउटकास्ट कर दिया इसलिए इन लोगों की यह परिस्थिति है वो बिल्कुल गलत है इसमें बहुत सारे कॉम्प्लेक्शन इकोनॉमिकल पॉलिटिकल इश्यूज शामिल जिसका चर्चा करने का यहां पर स्थान नहीं है वह अन्य जगह कर सकते हैं तो बात यही है सिर्फ और अच्छा ये जो बात है यह जो पार्टिकुलर यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है कि जो अनमनी स्वभाव ऐसे बौद्ध जिनका एक रूढ़ि चुस्त स्वभाव था उनको हमने धीरे-धीरे करके दूर किया और अंते अर्थ थोड़ा सा उनके थोड़ा सा दूर किया और जो हमारे उदार स्वभाव वाले बौद्ध थे उनको अपने समाज में समाहित कर लिया यह जो सेंटेंस है और सेंटेंस के साथ में पूरा पैराग्राफ उसका ट्रांसलेशन हिंदी में नहीं है मैं आज सुबह को देख रहा था गुजराती में देखना पड़ेगा कि है कि नहीं जहां तक मुझे ख्याल है गुजराती का ट्रांसलेशन हिंदी में से ही हुआ है तो हिंदी में नहीं है तो गुजराती में भी नहीं होगा तो यह सब आजकल थोड़े सेंसिटिव सब्जेक्ट हो जाते हैं तो शायद इसीलिए उन्होंने उसका हिंदी ट्रांसलेशन नहीं किया होगा तो हमको किंतु बीइंग ए हिंदू हमको एक बड़ा ही ध्यान में रखना है बहुत सारे लोग हमारे पर ऐसा आरोप डालते हैं कि आपका ब्राह्मण लोगों का अत्याचार ब्राह्मण लोगों का यह रूटी चुस्त इसकी वजह से यह समाज में पोव यह गरीबा आई सब फैला हुआ है तो इजली हमको एक्सेप्ट नहीं करना है उसके लिए बहुत सारे कॉम्प्लिकेटेड रीजंस थे और उस रीजन में जा सकते हैं किंतु कोई हमारा दोष है हमारी गलती है ऐसा बिल्कुल नहीं है कुछ कुछ ब्राह्मण इंडिविजुअली हो सकते कि तो हिंदू समाज को इसके लिए दोषी ठहराना हिंदू समाज को इसके लिए रिस्पांसिबल ठहराना वह बिल्कुल गलत है आगे में महाराज जी लिखते हैं ही रूपे बौद्ध देव देवी देवीरा देव देवीरा क्रम हिंदू देव देवीर सुमास ने बोशिया हिंदू पुरोहित पूजा पाते थाकी लेन तो उदार हृदय के जो बौद्ध थे वह और उनके देवी देवता हमने अपने समाज में उसको ग्रहण कर लिया अपने समाज में उसको एक रिस्पेक्टेड स्थान दिया और उन्हीं देवी देवताओं की पूजा हम हिंदू लोग करने लगे हिंदू देवो देवीर सुमासो ने बोशिया हिंदू देव देवियों के सम आसन पर बिठा कर के उनकी पूजा हिंदू पुरोहित गण करते थे कितना सुंदर लिखा है ऐसा नहीं है कि आपके देवता है तो हम आपके देवताओं को हमारे देवताओं से निम्न स्थान देंगे देखिए महाराज जी का एकएक शब्द उसमें एकएक हिस्टोरिकल फैक्ट लिखा हुआ है और यदि देखिए महाराज को ये स्टोरिकल फैक्ट या तो फिर उनके माइंड में यह पार्टिकुलर बात नहीं होगी तो व सम आसन शब्द वो यूज नहीं करते क्योंकि प्रत्येक शब्द यूज होता है उसके पीछे कुछ आइडिया होता है खास करके गंभीरानंद जी का प्रत्येक शब्द माप तोल कर के वो डालते हैं यहां पे तो हिंदू देव देवी के सम आसन पे बिठा करके हिंदू पुरोहित उनकी पूजा करने लगे बौद्ध धर्म से लिया है तो आप हमारे से निम्न है आप हमारे से निचली कोटि के निचली कक्षा के ऐसा नहीं हमारे ही सम आसन्न है संभव तो ए सूत्र मुख जरा धर्म ठाकुरे पूजा आरंभ करेन संभव तो शायद हो सकता है कि इसी वजह से यह मुख्य वंश धर्म ठाकुर की पूजा प्रारंभ की है हमको पता है कि बौद्ध धर्म में कहा जाता है कि बौद्ध संघ और धर्म यह तीन बुद्ध धर्म और संघ यह तीन उनके क्या कहेंगे कि प्रिंसिपल्स है उनके बुद्धिज्म के उनके बारे में चर्चा विचारणा और आधार स्तंभ जिसको कहा जाता है बुद्ध धर्म और संघ तो इसलिए बुद्धम शरणम गच्छामि धम्मम शरणम गच्छामि संघम शरणम गच्छामी ये जो उनका उनकी स्तुति है वो इसीलिए बनी हुई है तो यह जो धर्म ठाकुर है कुर्म के रूप में कछुए के रूप में धर्म ठाकुर उसकी पूजा मुख्य लोगों ने जो प्रारंभ की उसके पीछे यही रीजन हो सकता है कि उनके देवी देवताओं को हमारे ही देवी देवताओं के सम आसन पर स्थापित करके हमारे पुरोहित गणों ने उनकी पूजा आरंभ की ग्रामे आगमन पोर तरा ग्रामवासी अपर हिंदू देरो जजन जाने प्र व्यापत होन एवं तथा ब्राह्मण धर्मर विजय पताका उडन कोरेन गाव में आने के बाद में जयराम बाटी में प्रवेश करने के निवास स्थान ग्रहण करने के बाद में ग्राम के जितने अन्य हिंदू थे हिंदू परिवार थे उनके घर में यजन और याज यह दोनों का उन्होंने प्रारंभ किया और इस तरह से हिंदू धर्म की विजय पता का उस ग्राव में लहराई यजन और याज याज यानी भिक्षा ग्रहण करना और यजन यानी पूजा पाठ विधि यज्ञ याग वगैरा सब करना जैसे कथामृत प्रसंग में शारदानंद जी महाराज लिखते हैं कि ब्राह्मण के तीन धर्म क्या है यजन यजन अध्यापन अर्थात कि वो पूजा विधि होम वगैरह करेगा वो गृहस्थ लोगों को आशीर्वाद देगा उनके पास से भिक्षा ग्रहण करेगा और अध्यापन अर्थात कि उनको वेद की शिक्षा देगा यह तीन ब्राह्मण के धर्म है तो वैसे ही इन्होंने अभी यहां पे अध्यापन का उल्लेख गंभीरानंद जी महाराज ने नहीं किया किंतु यजन और याज का उल्लेख किया है और देखिए कि ब्राह्मण चरित्रवान ब्राह्मण सभी ब्राह्मण का नहीं कह रहा हूं चरित्रवान ब्राह्मण यदि किसी के घर से भिक्षा ग्रहण करते हैं तो वह जिस घर से भिक्षा ग्रहण की जाती है वहां पर कितना पुण्य का संचार होता है ऐसे रूढ़ चुस्त ब्राह्मण जो थे ठाकुर के पिताजी खुदीराम वह सभी के घर की भिक्षा ग्रहण नहीं करते थे और उनका बड़ा ही नियम था अगेन ऐसा हो जाएगा कि यदि खुदीराम के बारे में ऐसा सोचेंगे कि क्यों किसी की भिक्षा ग्रहण नहीं करते क्या वो नीच कोटि का है या ऐसा कुछ भी आउटकास्ट है या ऐसा इसलिए उसकी भिक्षा ग्रहण नहीं करती कि क्या किंतु क्या है कि देखिए कि यह तो सब देवी सब बातें हैं ठाकुर खुद व एक ब्राह्मण शशि महाराज ठाकुर का आहार वो पकाते थे और कोई नहीं मतलब जो ब्राह्मण शरीर थे उन्हीं का आहार ठाकुर ग्रहण करते थे आज में भी ठाकुर के जो पुजारी होते हैं बहुत हद तक वो ब्राह्मण ही हो ऐसा एक रखा जाता है सब समय नहीं किंतु फिर भी ऐसा एक हो तो अच्छा है तो क्या है कि ये सब देवी एक प्रभाव है जाति धर्म गुण यह सब जन्म जन्मांतर से संस्कार हमारे भीतर में चले आ रहे हैं तो ऐसा कभी यह नहीं सोचना है कि ब्राह्मण ब्राह्मण से भिक्षा ग्रहण करेगा दूसरों से नहीं ग्रहण करेगा तो उनका अवमानना अवगणना कर रहा है यह वही बात है कि यदि आपको साधना करनी है तो साधना करने के समय अपने मन और शरीर को अत्यंत जितना हो सके डिसिप्लिन में रखना है और फिर एक बार जैसे ठाकुर कहते हैं कि पौधा जब छोटा होता है तो उसको वाढ के भीतर में एक बेड़े के भीतर में घिर कर के रखा जाता है पौधा जब बड़ा हो जाता है तो उसके साथ में आप हाथी को भी बांध दो पेड़ बन जाता है तब तो कुछ नहीं होता तो वैसे ही जब साधक साधना की अवस्था में होता है अपने मन को बहुत ही डिसिप्लिन करके चलता है तो बात यह नहीं है कि मैं इससे भिक्षा ग्रहण करूंगा उस नहीं करूंगा क्योंकि उस ये यह जाति का है या वो वो जाति का है मुझे अपनी इंद्रियों पर संयम रखना है तो इंद्रियों पर संयम रखने के लिए मैं इस तरह के कुछ नियम बनाऊंगा कि ऑटोमेटिक इंद्रियों पर संयम हो जाए जैसे रामकृष्ण संघ में सुबह को मंगल आरती में जाना ही जाना है यदि आप जा सके तो बहुत अच्छा है तो बात यह नहीं है कि मंगल आरती में जाने का उसका खुद का कोई यह है उसका प्रभाव यही है सुबह को उठकर के भगवान श्री राम कृष्ण देव के दर्शन करेंगे मंदिर में गर्भ ग्र में बहुत अच्छी बात है किंतु गोइंग बियोंड दैट देखिए कि आप जल्दी उठते हैं तो आपको रात को जल्दी सोना है जल्दी सोना है और बिकॉज कि जल्दी उठना है तो आपकी नींद का समय धीरे-धीरे कम होगा तो नींद का समय कम होगा तो डीप स्लीप होगी डीप स्लीप की वजह से ये आपके मन के हमारे मन के जो कु विचार वो सब वगैरह जो है वो धीरे-धीरे आना बंद कर देंगे क्योंकि सुबह को उठना ही है रात को सोना ही है जल्दी से नींद का समय कम हुआ तो ऑटोमेटिक जितनी नींद है वो गहरी होने ही वाली है तो कु विचारों के आने का समय उनका प्रवेश द्वार जो है धीरे-धीरे करके छोटा होता जाता है तो ये जो डिसिप्लिन है ये काम कांचन की ओर साधक का मन हमेशा दौड़ता है और एक गृहस्थ का मन जब काम कांचन के भीतर में ही रहता है तो साधक को क्या है तो उसको क्या है कि उसका इतना प्रभाव महसूस नहीं होता किंतु साधक जब त्याग करने की शुरुआत करता है तो प्रत्येक छोटी-छोटी बात उसके मन में एक इको की तरह उसके मतलब एक होती है और प्रत्येक छोटा-छोटा प्रलोभन उसके सामने बहुत बड़ा होकर के सेंट एंटोनी की बात है वो डेजर्ट में चले गए इजिप्त में रण में मरुभूमि में वहां पर जाकर के तपस्या करेंगे अब जब भी उनके मन में कोई ऐसा कु भाव प्रकट होता था उनको यह कु भाव है ना जैसे शरीर धारण किए हुए उनकी नजर के सामने घूमते फिरते दिखाई देते थे आश्चर्य होगा हमारे मन में ऐसा कुबा होगा तो मन में ही रहेगा सामने नजर के सामने थोड़ी ना दिखाई देगा किंतु ये सेंट एंटोनी इतनी तपस्या कर रहे थे उस माया से आप जब मुक्त होने का प्रयास करेंगे माया आकर के हजार गुना आकर के आपको गिरेगी ठाकुर को वो जैसे वो एक पंचवटी में दर्शन हुआ था एक गोरा खलासी खलासी यानी सेलर तो सेलर एक ब्रिटिश सेलर अभी क्या है ना कि वो ब्रिटिश सेलर के वो जो ये होता है उसके डिस्टिंक्टिव उसका यूनिफॉर्म रहता है रेड कलर का और वाइट उसमें में बटंस वगैरह रहते हैं तो उस समय इस तरह के ड्रेस यूनिफॉर्म पहने हुए गोरे लोग कोलकाता की शहरों में गलियों में चलते रास्ते पे तो लोगों को देख कर के बड़ा ही एक डर और एक तरह का रिस्पेक्ट का उनके मन में उदय होता था कि ये लोगों के पास में रियल पावर है ये लोग सही सही मर्द है माने पृथ्वी पे जय किए हैं तो ये गन बोट डिप्लोमेसी की वजह से ही तो ब्रिटेन ने पृथ्वी जय की है तो जो गन बोट चलाते हैं स्टीम बोट वगैरह उ उनके पास में कितना पावर होगा तो इनका एक डिस्टिंक्टिव यूनिफॉर्म रहता था तो वो यूनिफॉर्म पहना हुआ एक गोरा खलासी यानी कि मने जो पावर परसोनिफाई पावर पसो निफा एसआई गोरा खलासी एक बड़े थाल में संदेश गहने व सोना मोहोर वगैरह लेकर के प्रलोभन दिखा रहा है साथ में एक दो औरतें खड़ी है वो लोग प्रलोभन दिखा रही है तो अभी ठाकुर तो काम कांचन से वैसे अवतार वरिष्ठ है कोई काम कांचन स्पर्श नहीं करने वाला है किंतु जैसे कि उन्होंने अहंकार का आरोप किया है हमारे कल्याण के लिए हमारे कल्याण के लिए साधना की है हमारे कल्याण के लिए वो काम कांचन के वो उसकी जो बेड़िया है जंजीर है उससे छूटने का प्रयास कर रहे हैं सब सरफेस के ऊपर में है हमारी तरह वो रियल नहीं है सब मिथ्या है तो जो भी है तो ठाकुर ये काम कांचन से मुक्त होने के कतार पर थे या तो मुक्त हो चुके थे किंतु फिर भी ये मन ऐसा पागल है कि बीच-बीच में ऐसा कुछ फेंके तो ऐसा गोरा खलासी वह स्त्री उनको आकर के प्रलोभन दे नजरों से देख रहे हैं तो जैसे भगवान बुद्ध है कि आखिरी आखिरी दिन आखिरी रात निर्वाण मिलने वाला है तो मारा आकर के उनको प्रलोभन दिखा रहा है भय दिखा रहा है सेंट एंटोनी की बात यानी कि साधक जब काम कांचन से दूर जाने का प्रयास करेगा बहुत छोटे-छोटे प्रलोभन उसके सामने आकर के विराट स्वरूप धारण करेंगे इस समय यह जो डिसिप्लिन है हमारे जीवन का वही हमको बचाता है मन के ऊपर में कभी भी भरोसा नहीं करना है वह कब कहीं जाकर के किस गड्ढे में गिर जाए कब कहां फिसल जाए कब कह नहीं सकते ये फिजिकल डिसिप्लिन है तो आप जिंदा है तब आप बचे हुए हैं तो ब्राह्मण लोग किससे भिक्षा ग्रहण करेंगे किससे नहीं ग्रहण करेंगे यह सबका एक डिवाइन एक मीनिंग हो सकता है कि इसके संस्कार अच्छे हैं उसके नहीं है वो सब एक बहुत ही हायर लेवल की बात है किंतु थोड़ा सा लोअर लेवल पे हमारी दृष्टि से साइकोलॉजिकली देखा जाए तो उसका यह भी है कि उनके ऊपर में एक डिसिप्लिन आरोपित होता है कि किससे लेना है किससे भिक्षा नहीं लेनी है तो इससे क्या होता है कि जिवा के ऊपर में ऑटोमेटिक एक संयम आ जाता है तो यह ब्राह्मण लोगों का यजन और याज है यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि हिंदू लोगों के घर में उन्होंने यजन और याज में प्रवृत्त हुए और हिंदू धर्म की विजय पता का लहराई इसके बाद का पैराग्राफ हिंदी में है यह वाला नहीं था अच्छा तो कल फिर से मिलते हैं कल आगे पढ़ेंगे अज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु