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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 11 Mar 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार षय राम कृष्णाय ते नम आज मां का जीवन फिर से बहुत दिन हो गए बीच-बीच में मैं टॉपिक इसलिए चेंज करता हूं कि हम सबको एक एक विभिन्न तरह के ये जो रामकृष्ण विचारधारा एक महासागर रूपी एक हमारे सामने है तो इसमें बहुत तरह की डिफरेंट डिफरेंट स्ट्रीम्स आ कर के मिलती है तो हम विभिन्न विभिन्न स्ट्रीम से थोड़ा सा थोड़ा सा ग्रहण करें जिससे कि अपना अंडरस्टैंडिंग हो एक ओवरऑल अंडरस्टैंडिंग हो हम सिर्फ कई-कई लोग होते हैं वे लोग सोचते हैं कि नहीं हम लोग तो सिर्फ ठाकुर को ही पढ़ते हैं या तो फिर कोई होता है कि उन्होंने स्वामी जी के बारे में इतना पढ़ा है कि फिर उनको क्वेश्चन हो जाता है कि मां एक्चुअल फिलोसोफर थी कि नहीं ऐसा मैंने सही में सुना है किसी से कि स्वामी जी तो फिलोसोफर थे मां कहां फिलोसोफर थी तो सबका थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से अपना खुद का अंडरस्टैंडिंग डेवलप होता है कि हां ये लोग जो थे वो ना ही फिलोसोफर थे ना ही इन लोगों को हम कोई एक जनरल संत या महापुरुष की कैटेगरी में रख सकते हैं यह तीनों अवतार थे देवी के अवतार या तो ईश्वर के अवतार या तो भगवान शिव के अवतार तो इस तरह से उनका असेसमेंट किया जाना चाहिए नहीं कि सिर्फ एक फिलोसोफी या तो फिर एक संत महापुरुष या एक साधक की दृष्टि से तो यह सब अपना व्यू पॉइंट थोड़ा सा एक्सपें हो इसके लिए हम तीनों का थोड़ा-थोड़ा पाठ करते हैं तो आज फिर से मां के बारे में गंभीरानंद जी की यह किताब है और हम जो चैप्टर का पाठ कर रहे थे उसका नाम है वधु सर्वप्रथम तो मां का जन्म हुआ जयराम बाटी में फिर मां के बचपन के दिनों की कुछ बातें इसके बाद में हमको तो पता है कि ठाकुर के साथ में बहुत ही छोटी उम्र में मां का विवाह हुआ था तो वह विवाह की कुछ बातें और अभी इसके बाद में हमको मिलता है कि मां विवाह होने के अभी एक विवाह हुआ मां का ठाकुर के साथ में और तब से लेकर के मां सर्वप्रथम दक्षिणेश्वर गई यह दिनों के बीच में 73 18735 में मां दक्षिणेश्वर आई और यहां पे 18581 साल के आसपास की जो घटनाएं हैं 60 से 70 तो 10 11 साल की घटनाएं इस चैप्टर में एक साथ में दे दी गई है तो इसी को हम बात कर रहे थे लास्ट प्रसंग जो हमने पढ़ा था उसमें था कि मां मां के विद्या अभ्यास के बारे में मां ने कहा कि मैं तो पढ़ाई लिखना चाहती थी किंतु हृदय केने हृदय ने क्या किया कि मां के हाथ से किताब छीन ली और कहा कि यदि लड़कियां पढ़ाई लिखाई सीखे गी तो वे लोग नाटक नोवल पढ़े गी तो इस तरह से विद्या अर्जन करने की कोई आवश्यकता नहीं जो कि उस समय की पेट्रिया कल एक माइंडसेट था तो किंतु लक्ष्मी जो थी वो बड़ी उसका विल पावर तो स्ट्रांग था दूसरा कि अपने पिताजी के घर में रहती है तो उसका एक अधिकार बनता है वो उस समय की प्रथा के अनुसार यदि बहू अपने ससुर के घर जाती है तो उसका अधिकार इतना नहीं रहता तो इसकी वजह से लक्ष्मी दीदी ने तो जोर करके पढ़ाई शुरू रखी और मां को थोड़ा-थोड़ा सिखाती थी किंतु मां ने कहा कि बाद में मैं जब दक्षिणेश्वर में थी तब वहां पे एक औरत आया करती थी वहां पर गंगा स्नान करने की लिए तो वोह मां को ठीक ठीक उसने वर्ण परिचय सिखाया तो हमको यह पता है कि मां को पढ़ना आता था किंतु लिखना इतना अच्छा नहीं आता था आखिर आखिर में तो अपना नाम भी नहीं लिख पाती थी वह सिर्फ अंगूठा देकर के वह साइन करती थी जहां पर भी साइन करने की जरूरत हो तो यहां तक हमने पढ़ा अभी हम आगे पढ़ते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं महाराज जी लिखते हैं श्री मायर प्रति कथा शसुर परिवार सकलर ऊपर एकटा आंतरिक भक्ति श्रद्धा और भालो भाष परिचय पावा जाए तो मां की प्रत्येक बातों में अपने ससुर का जो परिवार है अर्थात कि ठाकुर का घर ठाकुर के घर में जो भी थे उनके पिताजी उनकी मां उनके भाई बहन सबके प्रति एक गहन श्रद्धा का परिचय हमको मिलता है और यह अभी एक यह भी एक बात है कि बात-बात के चैप्टर आप देखेंगे तो एक्चुअली ठाकुर के ये जो सब कजीन वगैरह थे यह भतीजे वगैरह रामलाल वगैरा उन्होंने मां को किस तरह से ट्रीट किया इसके बावजूद भी मां अपने ससुर के परिवार ठाकुर के प्र परिवार के प्रति इतनी श्रद्धा रखती थी ठाकुर ने एक बार रामलाल को बोला था दक्षिणेश्वर में अ जब ऐसा आखिरी आखिरी समय आ रहा था तो ठाकुर ने दक्षिणेश्वर था कि एगजैक्टली कहां था अभी वो मुझे याद नहीं आई थिंक शायद हो सकता है काशीपुर भी होगा ठाकुर ने कहा कि मां जो है वो कामर कुकुर जाकर के रहेगी और तुम उनकी संभाल रखना तो अभी रामलाल के मन में पता नहीं क्या था कि उन्होंने ऐसा कह दिया कि अच्छा उनकी जहां पर इच्छा हो वो रहे अभी ठाकुर तो एकदम मन को समझ लेने वाले व्यक्ति थे उनको तो ऐसा नहीं था कि शब्दों को देकर के तो जैसे ही रामलाल ने ऐसा कहा ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए और कहा अरे तुम तो पुरुष किस चीज के हुए हो कि तुम अपनी आंट ये जो उनकी यह खड़ी बांगला ते जो रिलेशन होता है अने तो उनकी तुम संभाल नहीं रख पाते तुम किस तरह के पुरुष हो ऐसा करके ठाकुर ने उनको इमीडिएट डांट दिया था तो उसी समय से रामलाल के मन में था कि ठाकुर जो है तो असली तो ठाकुर ही है अभी यह तो उनकी धर्म पत्नी है तो उनका क्या कोई इंपोर्टेंस है तो सही सही में जब ठाकुर का देहांत महासमाधि हुई उसके बाद में मां जब यह वृंदावन वगैरह यात्रा करने के लिए गई थी तो रामलाल ने क्या किया कि वह जो खजांची वगैरह थे वहां के कालीवाड़ा कि यह जो ठाकुर का पेंशन मां को देते हो ₹ वो बंद कर दो क्यों क्योंकि मां के तो बहुत सारे डिवोटा है यह डिवोटा लोग मां को बहुत कुछ देते हैं तो मां को इतने रुपए की जरूरत नहीं अभी हमको आश्चर्य होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया क्या वो पाच वो लेना चाहते थे यह सोच करके कि मैं उनका असली वारसदार हूं तो ₹ का जो पेंशन जो उनको देते हैं वो मुझे दे दो ऐसा था कि सही सही में मतलब एक लालच थी लोभ था कि सिर्फ एक बदमाशी थी उनके नेचर में पता नहीं अभी आज मैंने ऐसा कहीं पर पढ़ा नहीं है कि रामलाल ने वो पाच रुप अपने नाम पर कर दिए ऐसा तो मैंने कहीं पढ़ा नहीं है तो जो भी है व्हाट एवर द फैक्ट उस समय जो रहा होगा मां को जब वृंदावन में पता चला तो माने कहा कि अरे इस तरह का सोना का सोनार मानु सेही चले गलो एक डका छाई नहीं हम की करव अर्थात कि सोने के जो मनुष्य थे भगवान श्री राम कृष्ण गोल्डन मैन वो तो चले गए अभी ये मने ये राख रूपी ये पांच रुपया लेकर के मैं क्या करूंगी मां ने ऐसा कहके बात को जाने दिया इसके बाद में मां जब कामर कुकुर थी तो यह लोग जब आते थे कामर कुकुर में तो उन्होंने क्या किया कि ठाकुर के घर के वो जो उनका तो जो एंसेल हाउस था उसके टुकड़े कर दिए मने उसके हिस्से कर दिए और मां के हिस्से में सिर्फ वही पार्ट आया जहां पर ठाकुर का बचपन बीता था बाकी का सब उन्होंने अपने नाम पर कर लिया तो और जब भी वो कामर पुकुर आते थे तो क्या करते थे मां को बिल्कुल अवज्ञा करते थे ये रामलाल दादादा ये लक्ष्मी दीदी ये दोनों ऐसा करते थे और फिर बाद में क्या हुआ पता है मां तो सब यह सब तो चुपचाप सहन कर लेगी मां तो किसको जाकर क्या बोलने वाली है तो अभी यह सब तो हुआ इसके बाद में जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए पूरे भारत में पूरे विश्व में ठाकुर का नाम होने लगा रामकृष्ण संघ की स्थापना हुई मां जब उद्बोधन आती थी तो कितने हजारों हजारों भक्त मां को मिलने के लिए आते थे आशीर्वाद लेने के लिए उद्बोधन में जयराम बाटी में तब कहीं जाकर के अभी ये लोग क्या बोलना शुरू कर दिए पता है रामलाल दादा और लक्ष्मी दीदी कि अरे वो तो अभी हमारी संभाली नहीं लेती हमारी खबर ही नहीं लेती वो देखती भी नहीं कि हम लोग किस तरह से जी रहे हैं तो अरे वाह कालीवाड़ा वो तो पुजारी थे और ठाकुर का वो जो कामर पुकुर का घर था उसका ज्यादातर हिस्सा तो अपने वो ले लिया मां को साइड करके साइडलाइन करके और अभी कहते हैं ना कि मां तो हमारी खबर ही नहीं रखती यह बात मां ने खुद कही है किसी डिवोटा को देखो किरे मैं जब कमार कुकुर थी तो मेरे साथ इस तरह से व्यवहार किया किंतु आज क्या कहते हैं पता है कि आज कहते हैं कि मैं उनकी खबर नहीं लेती और देखिए कि ये लोग ऐसा क्यों कहते थे पता नहीं एक बार लक्ष्मी दीदी आई थी वो मां के मां को मिलने के लिए मां उस समय कलकाता थी तो अभी पता नहीं कुछ कारण किसी कारण की वजह से मां को जिस कमरे में लक्ष्मी दीदी बैठी थी वहां से और कहीं पर जाना हुआ शायद पूजा करने के लिए जो भी है तो जैसे ही मां गई तो कुछ ही देर में लक्ष्मी दीदी चली गई ये मां को ऐसा बोला भी नहीं कि मैं जा रही हूं ऐसा करके तो मां जब वापस आई पूछा कि लक्ष्मी कहां है तो बोला कि वो तो चली गई तो मां तो एकदम बड़ी दुख ित हो गई कि अरे लक्ष्मी आई और मैंने उसको कुछ दिया नहीं साड़ी वगैरह ठाकुर का प्रसाद मैंने तो कुछ दिया नहीं तो इमीडिएट मां ने यह साड़ी प्रसाद वगैरह जो भी है वो किसी डिवटी के थ्रू जहां पर लक्ष्मी दीदी रहती थी वहां पर भिजवाया कहा कि जाओ जाकर के उनको ये दे आओ तो मां खुद इनको जिसको जो प्राप्य है मां का हमेशा कहना था जिसको जो प्राप्य है उसको वो देना चाहिए जयराम बाटी में एक बार ऐसा हुआ कि वहां पर एक लेडी डिवटी थी तो वहां पे एक बिल्ली आ आई तो अभी क्या है जनरली एक बिल्ली को देख कर के एक प्रेम जैसा होता है ना कि तो कोई उसको सर पर हाथ लगाता है कोई ऐसा कोई उसको कुछ खाने को देता है मेरे से ये सब नहीं होता किंतु ऐसे बहुत सारे लोग होते हैं कि इस तरह से वो सर पर हाथ घुमाएंगे उसको गोद में लेंगे उसको कुछ खाना देंगे तो अभी यह महिला एक लेडी डिवटी जो वहां प जयराम बाटी में थी उसको भी एक सामने जब बिल्ली आई तो उसने क्या किया अपने पैरों से उसके सर पे ये ऐसा करके पैर उसके सर पर रख कर के जैसे हाथ ऐसा करते हैं ना ऐसा अपने पैरों से कर रही है तो जैसे ही मां ने देखा इमीडिएट मां ने कहा अरे ये सर तो जो है व तो गुरु स्थान है वहां पर अपना पेर मत रखो यानी कि मनुष्य के सर पर तो छोड़ ही दीजिए मां कहती है कि बिल्ली के सर पर भी अपना पैर नहीं रखना है देखिए कि आजकल ये एनिमल राइट्स वाले जो भी हल्ला मचाते हैं तो मां उस समय से हमारा जो ट्रेडिशनल हिंदुइज्म का एनिमल राइट कि सबके भीतर में वोह आत्मन है सबको एक तरह से ट्रीट करना चाहिए हां शक्ति का तफावत है माने ये देखिए कि फिलोसोफी जितनी हाईएस्ट थी इतने प्रैक्टिकल भी थे ऐसा नहीं कि फिर बिल्ली को अपने घर में बिठा करके रखो मां की वो दूसरी एक कहानी है ना कि मां एक बहुत ही सुंदर विवरण है और इस विवरण में मुझे पार्टिकुलरली इसलिए याद रह गया है कि इसमें जो की पॉइंट है वो गुजराती ट्रांसलेशन में छोड़ दिया है मैंने पहले भी एक बार कहा था कि मां रात का समय है एक सन्यासी महाराज जी ने एक विवरण दिया है बहुत ही सुंदर कि संध्या का समय है जयराम बाटी में मां एक कटोरी में दूध लेकर के अपने संतानों की अपेक्षा कर रही है क्योंकि ये सन्यासियों को क्या था यह त्यागी लड़कों को कि काम के लिए कहीं द क्वाल पाड़ा है या तो और कहीं प जाना होता था तो आते-आते देरी हो जाती थी तो मां एक कटोरी में दूध लेकर के उन की अपेक्षा कर रही है फिर वहां पे दिया भी टम टमा रहा है और संध्या का समय गांव का तो कितना खुशनुमा होता है माने वो वायरस और यह बैक्टीरिया और ये माने ये मॉस्किटो और ये पानी यह सब वहां का इतना डेंजरस था कि अब कुछ दिन रहेंगे तो बीमार हो जाएंगे किंतु इसके अलावा ये जो एक नेचुरल सौंदर्य जो होता है खास करके बंगोल के गांवों का बहुत ही सुंदर होता है तो मां इस तरह से वातावरण में बैठी है आंख बंद करके हो तो मन में ठाकुर का नाम ले रही है या तो फिर अपने बच्चों की चिंता कर रही है कटोरी साथ में है किंतु अभी य यह जो ट्रांसलेशन यहां तक गुजराती में किया है इसके बाद में एक लाइन गुजराती में छोड़ दी है क्या है कि मां के हाथ में साथ-साथ में पास में ही एक डंडा भी रखा हुआ है जो बिल्ली जदी आ जाएगी और दूध में मुंह डालेगी तो मां इस डंडे से बिल्ली को मने मार तो नहीं किंतु डर दिखाएगी जमीन पर पटके गी जोर से तो क्या होगा बड़ी आवाज होगी तो बिल्ली डर के मारे भाग जाएगी तो देखिए कि अभी ये जिसने गुजराती में ट्रांसलेट किया होगा वो इसने ये सब बाकी मां की बातें सुनी होगी कि हां मां तो कहती है कि बिल्ली के प सर पर पैर नहीं रखना क्योंकि वो गुरु स्थान है वो जो गंगाराम बोलकर के मां का एक तोता था तो जैसे ही गंगाराम को भूख लगती थी जोर से वो चिल्लाता था मां मां मां उसको पता चल गया था मां बोलने से ही खाना मिलेगा तो जैसे ही मां यह बात सुनती थी गंगाराम की मां मां करके चिल्ला रहा है तो बोलती है कि अच्छा बेटा गंगाराम आ रही हूं आ रही हूं ऐसा कह के कुछ भी जो खाने का होता है वो गंगाराम को देगी वो जो वहां की गाय वगैरह थी मां इनको इतना स्नेह करती थी तो जिसने ट्रांसलेशन कर रहा होगा उसने सोचा होगा अरे मां वैसे तो पशु पक्षियों को इतना स्नेह करती है फिर मैं यहां प ऐसा लिखूंगा कि हां मां के हाथ में डंडा है जिससे कि वह अपने संतानों के लिए जो दूध की कटोरी रखी है उसमें बिल्ली मुंह लगाए इसके लिए डंडा है साथ में तो उसने सोचा होगा कि ऐसा लिखने से वह जो पूरा मां के बारे में एक जो विवरण एक थीम बन रही है उस वो भंग हो जाएगी किंतु देखिए कि अपनी फिलोसोफी जितनी हाईएस्ट है उतनी ही प्रैक्टिकल है दोनों का संगम यहां पे है जैसे ठक स्वामी जी ने एक बार कहा था कि कभी भी टारगेट इतना ऊंचा मत रखो कि जिसको तुम अचीव ना कर पाओ और जब अचीव नहीं कर पाओगे तो तुम फ्रस्ट्रेट हो जाओगे हालांकि गुजराती में ऐसा भी है कि टारगेट हमेशा ऊंचा रहना चाहिए तो मिस हो गए तो ठीक है किंतु यहां पर क्या है पता है टारगेट को ऊंचा रखना या प्रैक्टिकल रखना कि एक आइडियल मेंटेन होना चाहिए इतना भी हम प्रैक्टिकल कर दे इतना ही उसको मैंने डे टू डे लाइफ के उसके लेवल प ले आए कि टारगेट का या आइडियल ही ना रहे या तो फिर आइडियल इतना ऊंचा ना हो जाए कि जो कि बिल्कुल असंभव हो हमारे लिए उसको प्रैक्टिस करना यानी आइडियल भी मेंटेन करना है और प्रैक्टिलिटी भी मेंटेन करनी है यह है वेदांत प्रैक्टिकल वेदांत जो कि स्वामी जी कहते हैं तो यहां पे स्वामी जी यहां पर गंभीरानंद जी महाराज जो कहते हैं कि अभी यह सब तो बात की बात है और यह सब होने के बाद में भी लक्ष्मी दीदी रामलाल दादा और यह भी देखिए कि रामलाल दादा के बारे में वैसे तो हम यह सब कह रहे हैं किंतु राजा महाराज की स्मृति कथाएं पढ़ेंगे तो उनका रामलाल दादा के प्रति बड़ा ही श्र भक्ति थी उनकी और जब भी रामलाल दादा बेलूरमठ आते थे तो राजा महाराज बड़े ही खुश हो जाते थे और कहते थे कि अच्छा चलो ठाकुर के समय के वो भजन गाओ वो भजन गाओ तो रामलाल दादा सही सही वो सब भजन गाते थे और वो भजन सुनते सुनते राजा महाराज को ऐसा एक होता था प्रतीत होता था कि हां मैं फिर से दक्षिणेश्वर चला गया हूं ठाकुर के सामने बैठा हूं और वही सब पुराने दिनों की यादें तो समाधि में भी चले जा भाव में चले जाते थे तो वो भी रामलाल दादा का एक स्वरूप है और यह भी एक स्वरूप है हमको सब कुछ कभी-कभी ऐसा होता है कि हम लोग सोचते हैं ना कि कोई भी पर्सन है ना 100% आइडियलिस्टिक होना चाहिए यदि किसी कोई बुरा व्यक्ति है जैसे वो मजूमदार वगैरह जो कि अपनी स्टोरी में विलन है स्वामी जी के अगेंस्ट में उन्होंने बहुत सारा यह सब किया था तो वह जद बुरा है यदि अपनी स्टोरी में तो उसके सब दुर्गुण ही उसके लिखने चाहिए जो अच्छे हैं जैसे कि रामलाल दादा वगैरह यदि बाद में राजा महाराज की स्टोरी पढ़ के पता चलेगा लेकि बहुत उनके साथ में मित्रता थी या तो फिर कहेंगे कि कथामृत में ठाकुर बार-बार रामलाल को बुलाते हैं रामलाल के साथ बात करते हैं यहां तक कि कथामृत में नरेण या तो राजा महाराज इन सबका जो विवरण आता है उससे पहले तो रामलाल दादा आ जाते हैं वो जब मास्टर महाशय को जब ठाकुर पूछते हैं कि अरे तुम्हारी शादी हो गई कि नहीं तो मास्टर महाशय ने कहा कि शादी तो हो गई है तो ठाकुर बड़े ही चौक गए बड़े ही दुखित हो कर के रामलाल को बुलाने लगे अरे रामलाल देखो इसकी शादी हो गई है फिर बो बच्चे हो गए तो हां बच्चे हो गए अरे तो बच्चे भी तो उसी समय से हम देखते हैं कि हां रामलाल दादा का सुंदर विवरण है तो किंतु जब हम प्रॉपर इसको स्टडी करते हैं तो 100% बुरा या 100% गलत ऐसा बहुत ही रेर देखने को मिलता है देखिए कि ठाकुर थे जिनके बारे में गलत कुछ भी नहीं हो सकता हालांकि ये जो कुछ कुछ विपरीत विचारधारा वाले लोग होते हैं वे लोग कहते हैं कि ठाकुर ने मां को बड़ा कष्ट दिया और फिर मने होता है ना कि अपना पति धर्म नहीं निभाया वगैरह वगैरह बोलने वाले होते हैं और यदि ऊपर ऊपर से पड़े तो लगता भी है मां दक्षिणेश्वर आई है और रात को आई और ठाकुर ने मां को क्या कह दिया कि अरे तुम किस समय वहां से यात्रा की हो तो मां ने कहा कि बुधवार बार बेला ने कि ऐसा कुछ बोल दिया जो कि अशुभ मुहूर्त तो ठाकुर ने कहा अरे उस मुहूर्त में तुमने यात्रा की इसीलिए मैं गिर गया और मेरा हाट टूटा फैक्चर हो गया जाओ तुम जाओ और यात्रा बदल करके आ जाओ तो मैंने जब पहली बार पढ़ा था तो मैं तो बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया था अरे भाई ये कोलकात्ता टू जयराम बाटी कामर पुकुर यात्रा क्या सहज है कि आप वैसे ही जा कर के आ जाएंगे यहां से वो मंदिर में जाना मंदिर से ऑफिस में आना हम लोगों को जो आश्रम में रह के हैबिट हो गई है कि हमारा वर्क प्लेस यहां पे है तो घर वहां पे है तो खाने का यहां पे है और मंदिर यहां पे है दो मिनट वॉकिंग करके आ गए तो ऐसा थोड़ी ना है यहां पे दो दिन तीन दिन लगते हैं रात फिर मां तो पहली बार आई थी एक बार का विवरण दो बार का विवरण हमको पता है एक बार इतनी बीमार हो गई थी वहां पर रास्ते में पड़ी हुई है पिताजी साथ में है किंतु पिताजी भी बेचारे क्या करेंगे मां बिल्कुल ऑलमोस्ट बेहोश हो कर के पड़ी है देखा कि एक बिल्कुल काले कलर के रंग के एक एक स्त्री एक औरत उनके सामने आई और किंतु शरीर का वर्ण तो काला है किंतु चेहरा एकदम एकदम तेज और ओजस से चमक रहा है तो मां ने कहा कि अरे तुमको कौन हो तो उन्होंने कहा कि देखो कि मैं तो तुम ये हो जाओ ठीक हो जाना वो जो है मैंने उनको तुम्हारे लिए ही वहां पर रोक करके रखा है म कोड वर्ड पूरे है तो मां ने कहा तो मां समझ गई वो अर्थात कि ठाकुर और उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए ही उनको वहां पर रोक करके रखा है अर्थात मां वहां पर जाएगी ठाकुर और मां की लीला होगी इस इसमें से हम लोग हमारे जैसे उनके भक्त संतान हम लोग उससे सीखेंगे तो इसीलिए ठाकुर को वहां पर रोक के रखा है वरना ठाकुर है वो तो सन्यासी वो तो किसी चीज से वो बंधे हुए नहीं है वो एक बार वो ऐसा हुआ कि हृदय ने वो वहां के जो मथुर बाबू का लड़का था त्रैलोक्य नाथ तो उसकी लड़की की कुमारी पूजा कर दी तो उन्होंने वो तो बड़े डर गए कि अरे यह तो इसकी पूजा की है तो ब्राह्मण है ये तो ब्राह्मण नीचे जात के हैं वो जो लड़की तो उसकी इस तरह से कुमारी पूजा की तो लड़की के साथ में पता नहीं क्या हो जाएगा डर गए और हृदय को भगा दिया तो उसी मामले में किसी ने आकर के ठाकुर को बोला कि आप वो बाबू ने आपको भी जाने को बोला है तो ठाकुर बड़े हंसते-हंसते वो गमछा था वो अपने कंधे पर डाले और निकल गए वो एकदम गेट की ओर जा रहे हैं गेट से निकल रहे वो त्रैलोक्य बाबू ने देखा कि ठाकुर भी जा रहे हैं तो दौड़े-दौड़े आए और उनके चरणों में गिर गए अरे आपको तो मैंने जाने को नहीं कहा किसने बोल दिया आपको तो ऐसा बोला कि आप रह जाइए रह जाइए तो ठाकुर हसते हंसते फिर से अपने कमरे में आ गए तो ठाकुर को तो यहां पे वहां पर ऐसा कोई फर्क नहीं पड़ता था मां यहां पर आएगी दक्षिणेश्वर लीला होगी भविष्य में हजारों सालों तक संतानों को एक आदर्श सिखाना है एक आदर्श दिखाना है उसके लिए वो ठाकुर को वहां पर अटका करके रखा है तो ऐसा तो नहीं है कि वो आप जयराम दक्षिणेश्वर में बोले कि जाओ यात्रा बदल के चली आओ तो वो सीधी गई और एक वापस आ गई मैंने यात्रा तो इतनी कठिन है और कभी-कभी ऐसा हमको लगता है कि क्यों ठाकुर इस तरह से व्यवहार करते हैं एक बार मां जब दक्षिणेश्वर आई थी तो हृदय पता नहीं वो गुमान और गुरूर और घमंड से इतना भर गया था कि मां को बोला कि क्यों आई हो यहां पर चली जाओ वापस ऐसा पता नहीं और मां के साथ में श्यामा सुंदरी देवी भी थी मां की मां तो अभी श्यामा सुंदरी देवी और हृदय दोनों सि होड़ के तो अभी यह होता है ना अपने गांव वालों के प्रति एक तुच्छ ता चल्य भाव होता है तो मां को तो ऐसा कुछ बोल ही दिया और साथ-साथ में श्यामा सुंदरी देवी को भी बिल्कुल अपमान जैसा कर दिया मां ने कहा कि मां ने खुद ने कहा है कि मेरी मां और हृदय सि होड़ के थे तो हृदय हमार मां के एकट मान मानो को लेना अर्थात कि थोड़ा सा भी उनको सम्मान नहीं दिया असमानिची देवी ने कहा कि यहां मैं किसके भरोसे अपनी लड़की को रख के जाओगी चलो तुम मेरे साथ जयराम बाटी वापस ऐसा बोल कर के श्यामा सुंदरी देवी अपनी लड़की मां शारदा को लेकर के जयराम बाटी वापस चली गई थी अभी ठाकुर इस समय हृदय से इतने डरे हुए थे या तो पता नहीं अभी ठाकुर को तो ऐसा तो नहीं कह सकते ना कि हृदय से डरे हुए किंतु पता नहीं वो ठाकुर कुछ बोल नहीं पाए तो अभी यह सब सुनक के हमको लगता है कि अरे ठाकुर मां के साथ में इस तरह से वर्तन क्यों करते हैं किंतु अभी देखिए कि यह सब चीजों में भी तो सीखना है ना कि मैंने ये क्या सीखेंगे पता नहीं मुझे तो समझ में नहीं आ रहा ये सब चीजों में क्या सीखना है मां और ठाकुर का जो अनंत संबंध था एक ईश्वर ईश्वर मने शिव और पार्वती का वो तो समझ में आता है किंतु ठाकुर इस तरह से अपनी नजरों के सामने मां का अपमान होते हुए देखेंगे वो पता नहीं हालांकि ठाकुर ने बाद में हृदय को कहा भी था कि मेरे तुम मेरा जितना भी अपमान करना चाहते हो कर लो मां का अपमान करोगे तो तीन भुवन में त्रिभुवन में तीनों लोक में तुम्हारा स्थान नहीं मिलेगा तुमको रक्षा करने वाला कोई नहीं मिलेगा वो तो बाद में बोल था किंतु जब एक्चुअली ऐसा हुआ तो ठाकुर कुछ बोल नहीं पाए अभी इसके पीछे हम लोग बहुत कुछ लॉजिक लगा सकते हैं कि मां को भी एक तरह से वैराग्य सीखने की जरूरत थी जब ठाकुर का इस तरह से कैंसर होकर के वहां पर थे काशीपुर में उस समय मां की मन की परिस्थिति इस तरह से हो गई थी कि भीतर से इतना दुख इतना कष्ट और जो कि प्रिय पात्र जो अपने होते हैं उनको उनका कष्ट देख कर के हमको और ज्यादा कष्ट होता है तो यह जो देख कर के मां की परिस्थिति ऐसी थी उस दिन उस समय मां रात को सोई हुई थी एकाएक उन्होंने क्या एक दर्शन देखा एक दर्शन हुआ कि एक मिट्टी की हांडी जो होती है ना मिट्टी का यह जो यह होता है पानी भरने का पात्र बड़ा सा वो जोर से टूट गया ऐसी एक आवाज आई इस इस तरह की आवाज की मिट्टी का एक बड़ा पात्र जोर से टूटा हुआ है और साथ-साथ में ही कोई बोला कि इस संसार में कौन किसका है तो जैसे ही मां ने यह सुना इमीडिएट जैसे कि वो एक हिप्नोटिज्म में से हम लोग बाहर आ जाते हैं तो ऐसा मां को हुआ एक प्रचंड वैराग्य मां के हृदय में प्रकट हुआ कि हां इस संसार में सही में कौन किसका है हम सब तो दो तरह से देखें एक तो है कि यदि आप ईश्वर की सही सही में ईश्वर की उपासना करते हैं सही सही में आप यह विश्वास करते हैं कि यह जगत के नियंत्र ईश्वर है तो फिर ईश्वर ही तो इस जगत में है किसी के साथ में यह जो जागतिक संबंध है अपने पारिवारिक संबंध यह तो दो दिन के हैं आएंगे जाएंगे ईश्वर ही हमेशा के लिए है आत्मन ही हमेशा के लिए है तो आप आत्मा दर्शन या तो ईश्वर दर्शन के लिए जो भी प्रयास कर रहे हैं वही हमेशा रहने वाले हैं आपकी साधना ही यहां पे सही है साधना साधक और साध्य यदि देखा जाए तो इस इस विश्व में यही तो तीन है इन तीन को छोड़ करर के इस जगत में है क्या फिर ये तो आएगा जाएगा तो इस तरह से देखिए कि मां को भी बीच-बीच में प्रचंड वैराग्य का उनके हृदय में आवेश हो यह भी जरूरत थी और साथ-साथ में यह भी जरूरत थी कि मैंने ठाकुर के जाने के बाद में जगत बिल्कुल ही सुना लग रहा है तो जगत में रहकर क्या करेंगे तो मां के इस वैराग्य प्रवण मन को बांध के रखने के लिए वो राधु की जरूरत थी मां वहां पर बैठी थी एक एकाएक उन्होंने देखा कि वह पागली मामी तो क्या एक अपने हाथ में कोई एक खिलौना लेकर के ऐसा कुछ लेकर के जा रही है पीछे में यह राधू छोटी सी उनके पीछे पीछे रोती हुई जा रही है देखा जैसे माने एकदम हृदय में मातृत्व का यह हुआ आवेश हुआ और वह राधु को अपने हाथ में ले लिया तब ठाकुर ने आकर के कहा कि देखो यही है योग माया इसका इसकी सहाय लेकर के इसका आश्रय लेकर के जगत में रहना है तो यह पूरा मने देखिए कि ठाकुर के जीवन में जो ड्रामा है स्वामी जी के जीवन में जो ड्रामा है हमको लगेगा कि मां तो संसार में ही रही है मां का जीवन तो वैसे तो बड़ा ही सेफ था वो कहीं अमेरिका जाकर के पागल लोगों के साथ में सर तो नहीं पटकने थे ना कि ठाकुर की तरह ऐसी प्रचंड साधना तो नहीं कर देनी थी कि जिससे कि वो मैंने वो जो साधना में विकन डालने वाले लोग होते हैं ना वो एक बार ठाकुर के सामने आकर के एक था में बड़े से थाल में संदे देश रुपया और एक दो सुंदर स्त्रियां लेकर के वह आकर के खड़े हो गए बोला कि यह सब ले लो तुम पूरे जगत के स्वामी हो जाओगे तो ठाकुर चिल्लाना शुरू कर दिए मां मां करके तो मां ने आकर के इनको काट करके भगा दिया तो ठाकुर की तरह प्रचंड साधना नहीं करनी स्वामी जी की तरह जगत जय नहीं करना मां के जीवन में क्या है ऐसा जद ऊपर ऊपर से लगेगा किंतु जैसे हम पाठ करेंगे जैसे अभ्यास करेंगे लगेगा कि ड्रामा जिसको कहते हैं ये मां के जीवन में कम नहीं था इन लोगों से वही है कि ड्रामे का स्वरूप अलग था वो एक बाह्य जागतिक जीवन में वोह ड्रामा चल रहा था इन लोगों का और मां का था कि पारिवारिक फलक के ऊपर में ये जो पारिवारिक स्टेज के ऊपर में मां का ड्रामा था तो यह परिवार और साथ में रहना किस तरह से हमको सहन शक्ति साधना तपस्या से रहना है वह सब मां के जीवन से पता चलता था तो यहां पे देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि मां की प्रत्येक बात में बातों में अपने ससुर के जो परिवार जन है उनके प्रति एक आंतरिक श्रद्धा और भक्ति दिखती थी वो किस चीज के बाद में कि यही हृदय राम यही रामलाल दादा यही लक्ष्मी दीदी इन लोगों ने मां की अवज्ञा की अपमान किया इसके बावजूद भी मां की उस परिवार के ऊपर में इतनी श्रद्धा भक्ति थी क्या कहती थी निजर स्सु संबंध तीनी शगर बे बोलिया लेन अपने ससुर अत की रामचंद्र के बारे में उन्होंने बड़े ही गर्व पूर्वक स गर्व गर्व पूर्वक कहा था अमार ज शसुर छिले बड़ो तेजस्वी निष्ठावान ब्राह्मण मेरे जो ससुर थे बड़े ही तेजस्वी निष्ठावान ब्राह्मण थे तीनी अपरिग्रह लेन अपरिग्रह अर्थात की सबके सामने जाकर के हाथ फैला कर के भिक्षा नहीं मांगते थे कि मुझे यह दे दो वो दे दो परिग्रह अपरिग्रह यह शब्द योग शास्त्र में है जो अविद्या ये जो अपरिग्रह अर्थात कि जिस चीज का हम हम चीजों का संग्रह नहीं करना उसको हम अपरिग्रह कहते थे तो यह संग्रह नहीं करके जितना ही मुक्त पन से रह सके उतना ही ईश्वर की ओर सब अपना ये मन जाएगा ये ठाकुर का है ना कि वो कृष्ण किशोर नग कौन वो एक बार आकर के ठाकुर को बोल रहा है कि अरे ये टैक्स वाले आए थे और मेरे घर में उन्होने टैक्स वगैरह शायद नहीं दिया होगा तो वो लोग क्या करते हैं कि घर में जो कुछ भी चीज है वो कपड़े है या तो बर्तन है उसका लीलाम कर दे रहे हैं उसको मैंने ऑक्शन कर दे रहे हैं जिससे कि जितना भी उसको पैसा देना था वो निकल जाए तो बड़े ही दुखित होकर के ठाकुर को बोल रहा है अभी ठाकुर तो बोलते हैं वो बड़ा मजाक करके बोलते हैं कि तुम तो बोलते हो ना कि बीच-बीच में कि मैं ख हूं अर्थात कि मैं तो आकाश वत हूं तो ठाकुर ने कहा मजाक में कि तुम्हारे वो बर्तन जद घटी बाटी ले जाते तो ले जा जाने दो ना तुम तो ख हो तुम तो आकाश वत हो तुमको क्या फर्क पड़ता है माने ये लोग बोलते हैं ऐसे बहुत सारे लोग कि मैं ख हूं अर्थात कि मैं आकाश वत हूं मैं आत्मन हूं मैं तो ईश्वर दर्शन करने के लिए साधना कर रहा हूं किंतु ये चीजों के ऊपर में मोह इतना होता है कि यदि अपने खाने पीने की या तो फिर सुविधा के लिए कुछ भी नहीं मिला तो बड़ा ही क्रोध आ जाता है कि अरे मेरा यह प्राप्य है मुझे यह नहीं मिला यह कौन सी बात है तो इसलिए मने ये अपरिग्रह होना क्यों क्योंकि हम सिर्फ वेदांत की दृष्टि से कहे कि मैं आत्मन हूं मैं साधक हूं मैं भक्त हूं मैं आकाश वत हूं स सर्फ बोल कर के नहीं चलेगा सही सही में अपरिग्रह होना पड़ेगा तो इसीलिए यहां पे माने कहा तिनी अपरिग्रह लेन के हो कोनो जिनिश बाड़ी ते दते एलेयो ने बार निषेध छलो यदि कोई घर में कोई चीज देने को आए तो लेने की मनाई थी अर्थात कि वह तो ब्राह्मण थे तो वो तो हो सकता है कि किसी के घर पूजा पाठ वगैरह उपनयन सेरिमनी वगैरह करवाते होंगे तो किसी जो पुराने दिनों की जो प्रता थी कि वो गांव में जो ब्राह्मण रहते हैं इस तरह से तो उनको जाकर के कुछ दान दक्षिणा दिया जाए तो यहां पर किंतु इनके घर में मनाई थी कि कोई यदि कुछ दक्षिणा देने के लिए आता है कोई चीज देने के लिए आता है तो बिल्कुल लेना नहीं है निषेध था आमार शासुर काछ किंतु क की लुक ने दिले तीनी रधे बेड़े रघुवीर के भोग दिए शकल के प्रसाद देते किंतु उनकी सासू अर्थात की चंद्रा मणि देवी को छुपके छुपके जद कोई कुछ दे देता यह अन्न है वगैरा यह सब्जी या तो फल वगैरह तो वह चंद्रा मणि देवी क्या करती उसको राध करके वह रघुवीर को भोग देती या देखिए कि यह भी है किसी का अन्न ग्रहण करना या किसी से कोई दा स्वीकार करना अर्थात कि उनके यह जो कर्म जो है उसका एक अंश हमारे में आ जाता है इसीलिए ठाकुर जब कलकत्ता में किसी के घर जाते थे अन्न ग्रहण नहीं करते थे हालांकि यह जो पूरी है या तो मिठाई है ऐसा कुछ वो सामने से माग के खाते थे बहुत बार ऐसा हुआ है किंतु अन्न किसी का ग्रहण नहीं करते थे अन्न ग्रहण करते थे बलराम का क्या कहते थे बलराम का अन्न बड़ा शुद्ध अन्न है तो इसलिए किसी का कुछ ग्रहण करना उनके कर्म का कुछ हिस्सा तो अपने पास में आएगा ही आएगा तो अभी रामचंद्र थे कि इतने निष्ठावान थे इतने मतलब अपने जीवन को इतना डिसिप्लिन में रखते थे किंतु चंद्रा मणि देवी का हृदय इतना उदार था कि यह पता होने के बावजूद भी कि अन्न ग्रहण किसी का कर रही है या किसी की दक्षिणा स्वीकार कर रही है तो उनका कुछ कर्म अपने पर आएगा तो भले आए उनको तो कुछ राहत मिलेगी सामने वाले को जो दाता है उनको तो कुछ सुकून मिलेगा तो यह समझ कर के उदार हृदय वाली चंद्रा मणि देवी जद छुपके छुपके कोई कुछ लेता था तो व ले देता था तो वह ले लेती थी और रात करके रघुवीर को भोग लगाती थी शसुर का जानते पारले खूब राग करते किंतु जद रामचंद्र को पता चल जाता तो वह बड़े ही नाराज हो जाते बड़ा ही क्रोध करते किंतु ज्वलंत भक्ति छलो तार किंतु उनकी अर्थात की रामचंद्र की ज्वलंत भक्ति थी मां शीतला तार संगे संगे फिरते मां शीतला स्वयं इनके साथ-साथ में घूमती थी शेष रात्रे उठे फूल तुलते जावा तार अभ्यास लो आखिरी मने एकदम अर्ली मॉर्निंग को उठ कर के फूल तोड़ने के जाने का उनका अभ्यास था एक दिन लाहा देर बागा ने गए छ एक दिन क्या हुआ अर्ली मॉर्निंग को फूल चुनने के लिए पूजा में भगवान को ऑफर करने के लिए फूल चुने जाते हैं तो वो फूल चुनने के लिए लाहा बाबू अर्थात कि वो कामर कुकुर के जमींदार उनका बागान था वहां पर फूल चुनने के लिए अर्ली मॉर्निंग गए थे एकटी नो बछर मतो में ऐसे ताके बोल से एक न साल की छोटी सी बच्ची आकर के उनको बोल रही है बाबा ईद के शो दद के भालो भालो दद के डाले खूब फूला छ वो बच्ची आकर के उनको कहती है कि बाबा यहां पर आइए बाबा अर्थात की पिताजी यहां पर आइए यहां की डालो पर बहुत सुंदर फूल है अच्छा नुय धर जी तुम ही तोलो अच्छा मैं डाल को थोड़ा सा झुका करके रखती हूं आप लिए आप उसम फूल को चुनिए तीनी बोलले ई समय खाने तुम केमा तो रामचंद्र तो थोड़े से आश्चर्य चकित हो गए इतनी छोटी बच्ची इतनी अर्ली मॉर्निंग को अपना घर छोड़ कर के इस तरह से गार्डन में क्या कर रही है तो उन्होंने कहा कि इस समय में तुम यहां पर कौन हो मां तो उन्होंने क्या कहा आमी गो आमी एई हालदार बाड़ी अर्थात उन्होंने वो फिर वो लड़की ने बात घुमा करके ऐसा कह दिया मैं तो यहीं पर रहती हूं यह हालदार लोगों का जो घर है वहीं पर रहती हूं अमन लेन बल भगवान तार घरे ऐसे जन्मे लेन अच्छा खुदीराम रामचंद्र नहीं खुद राम यस यस थैंक यू खुद राम हां तो अमन लेन बोले भगवान तार घरे ऐसे जन्मे छिले ऐसे थे बोलकर के ही भगवान वहां खुदीराम के घर में जन्मे थे रामचंद्र अर्थात की मां के पिताजी खुदीराम अर्थात की ठाकुर के पिता जीी यस अच्छा तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण

Question Answer

मस्तु यहां पर शिवरात्रि की पूजा हो गई मैं एक प्रहर तक जनरली रहता हूं जब पूरी रात को पूजा होती है काली पूजा या शिवरात्रि की पूजा तो मैं यजली एक प्रहर तक रहता हूं और फिर अपने रूम में चला जाता हूं पूरी रात में जनरली रुकता नहीं तो किंतु एक प्रहर की पूजा में रहा बड़ा ही सुंदर बड़ा ही उन्हें आनंद आया और यहां पर शिव नृत्य वगैरह भी होता है और वो मैंने वीडियो भी व लिंक भी भेजा था तो वहां पर देखे होंगे आपने कि सुंदर वह शिव नृत्य वगैरह हुआ बहुत सारे लोग आए थे पूरा मंदिर यहां पर भर जाता है तो एक तो बड़ी सुंदर पूजा हुई समाप्त अभी सामने ठाकुर तिथि पूजा है तो यह बड़े उत्सव के दिन है आजकल एक्चुअली इसका क्या सोल्यूशन बड़ा ही सिंपल है जिसकी सकाम भक्ति होती है ना वो परफेक्शन देखना चाहता है क्योंकि उसको लगता है कि यदि मैं वो परफेक्ट नहीं होंगे तो मुझे क्या कुछ दे पाएंगे ठाकुर को कैंसर हो गया तो अभी ठाकुर अपना ही बीमारी नहीं ठीक कर पाते मुझे क्या ठीक करेंगे तो वो लोग इंपरफेक्शन देख कर के डर जाते हैं क्योंकि उनको लगता है कि ठाकुर अपने खुद के बारे में यदि इस तरह से हैं तो मुझे तो कुछ नहीं दे पाएंगे किंतु सामने देखिए कि जिनकी निष्काम भक्ति थी ये सन्यासी सब लड़के जो त्यागी लड़के इनके पास आते थे अच्छा ठाकुर को कैंसर हो गया तो अभी हम हमारा धर्म है कि उनकी सेवा करना तो सब लोगों ने मिलकर के सेवा चालू कर दी थी ये कल्पतरु दिन को दो डिवीजन जो हो गए थे ये जितने भी भक्त जिनको की मुक्ति चाहिए अभी सकाम भक्ति यानी ऐसा नहीं है कि ठाकुर के पास से पैसा या तो धन या तो प्रतिष्ठा मांग रहे हैं मुक्ति मांग रहे हैं कि हमको आप ईश्वर के यदि स्वरूप है तो हमको मुक्ति दे दीजिए तो वो मुक्ति की कामना करके आए है जबकि वो वे लोग सब ठाकुर के पास में कल्प दर उद्दीन को खड़े हैं कि व स्पर्श कर दे और कुछ मिल जाए तभी वो जो निष्काम जिनकी भक्ति है मुक्ति भी नहीं चाहिए हम इनको चाहते हैं क्योंकि हम इनको प्रेम करते हैं तो वे लोग वो शरत महाराज वगैरह देखिए कि वहां पर छत के ऊपर में रहकर ठाकुर का बिछाना धूप में सुखाने को रख रहे हैं पता है कि ठाकुर सबको स्पर्श करके अनुभूति दे रहे किंतु फिर भी वहां पर नहीं गए ठाकुर वापस आएंगे फ्रेश बिछाना मिलेगा सोने के लिए वो उनकी नजर ज्यादा है तो ये जो है कि सकाम भक्त परफेक्शन चाहेगा वो डर जाएगा इंपरफेक्शन देख कर के किंतु निष्काम भक्त है वो लोग सब कुछ एस होल इनको ग्रा जैसे है वो हमारे है