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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः हमने शोष पूजा के बारे में सब डिस्कस किया श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसके संबंध में एक सुंदर एक छोटी सी कहानी है अ काशी में अ यह पागली मामी पागली पागली मामी के बारे में तो पता ही है सबको कि वह किस तरह का उसका दिमाग था हालांकि उसका भी कुछ साइकोलॉजिकल रीजंस थे अ उनकी वो जिन लोगों के साथ में उनका बड़ा अच्छा रिलेशन था उनके कुछ रिलेटिव्स उनका एक के बाद एक मृत्यु हो गया था बोलकर के उनका दिमाग थोड़ा सा भ्रष्ट हो गया था तो जो भी है मां को साथ में बड़ा ही अभद्र व्यवहार करती थी मां के साथ में बड़ा ही खराब व्यवहार कर दी थी तो एक दिन पता नहीं किस तरह का पागलपन उनके भीतर में आया पूरी रात भर वो मां को गाली देती है और ठाकुर जी मरूक ठाकुर जी मरूक ठाकुर जी अर्थात की उनकी मां तो उनकी यह होगी किस तरह से रिलेशन होगा व जो भी है वो मां को मां के बारे में गाली देकर के पूरी रात कहती है वह मर जाए वह मर जाए वह मर जाए ऐसा करके पूरी रात उन्होंने निकाली तो अभी मां भी तो पूरी रात भर यह सब सुनती रही व मां भी तो एक बार मां ने कहा था कि यह तो देव शरीर है अपने खुद की ओर इशारा करके कि यह तो देव शरीर है कितना अत्याचार सहेगा ऐसा मां ने अपने मुंह से कहा था तो कभी-कभी मां ऐसा भी कहती थी किंतु इस दिन जिस दिन पागली मामी ने मां को पूरी रात गाली दी कहा कि वो मर जाए मर जाए मर जाए तो सुबह को उठकर के मां ने हंसते हंसते क्या कहा पता है वो जाने ना आमी मृत्युंजय मैं मृत्युंजय हूं ऐसा माने अपने मुंह से अपने बारे में कहा है तो देखिए कि ऐसे छोटे-छोटे कितने ही उदाहरण है मां के जीवन में जिसको पढ़कर के पता चलता है कि मां किस तरह से मानवत्वम मातृत्व और देवी इन दोनों राज्यों के यह जो बॉर्डर लाइन है वहां पर निवास करती थी कभी वह देवी त्व का जो स्वरूप है उनके भीतर में प्रकट होता तो कभी यह मातृत्व उनके भीतर में प्रकट होता तो यह जो एक सुमधुर एक संबंध एक क्या कहेंगे कि एक स्पेक्ट्रम ऑफ एक डिविली मां के भीतर में देखने को मिलता है प्रत्येक छोटी-छोटी घटनाओं में इस तरह से हम देखते हैं तो अभी हम थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मां नबत ठकून आर ठाकुरर घरे ठकून तिनी ठाकुर और ठाकुरर जननी र सेवा की संबोल कोरिया लेन कल हमने देखा कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर आने के बाद में सड़सी पूजा के बाद में कुछ महीनों तक ठाकुर के ही साथ में उन्हीं के कमरे में एक साथ में निवास किया था शयन किया था किंतु बार-बार ठाकुर को रात को जिस तरह से समाधि होती थी जिस तरह से भाव में चले जाते थे इससे क्या पता चलता है कि ठाकुर को कुछ दिनों के बाद पता चला कि मां बेचारी भय के मारी ध्रु जती है पूरा शरीर उनका कंता है भय के मारे डर की वजह से और वह समझ नहीं पाती कि ठाकुर के साथ में क्या हो रहा है क्योंकि बिल्कुल नया-नया ठाकुर के साथ में रहने की उन्होंने शुरुआत की थी तो देखिए अभी अभी यही मां एक और कहती है कि मैं मृत्युंजय हूं और यही मां कभी-कभी देखि ठाकुर की समाधि देख कर के शिव स्वरूप में जो मृत्युंजय स्वरूप में ठाकुर लीन हो जाते थे उसी को देख कर के मां को डर लगता था तो ये है मां का जीवन तो फिर ठाकुर ने देखा कि मां को रात की नींद ठीक नहीं होती तो मां को कहा कि ठीक है तुम अभी जाकर के नबत में रहो तो यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि मां चाहे नबत में रहे ना कि ठाकुर के कमरे में रहे ठाकुर के प्रति और ठाकुर की जननी अर्थात की चंद्रा मणि देवी जो भी वो भी वहां पर नबत में उस समय रहती थी चंद्रा मणि देवी नबत के पहले वो माल पे फर्स्ट फ्लोर पर रहती थी और मां रहती थी ग्राउंड फ्लोर पर तो इस तरह से मां चाहे जहां पर भी रहती हो ठाकुर की सेवा और ठाकुर की जननी की सेवा ही इसी को उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया था ठाकुरे जननी शेष वय से चलत शक्तिहीन होया बधु ऊपर अनेक विषय निर्भर कोरीते ठाकुर की मां चंद्रा मणि देवी आखिरी समय में चल फिर नहीं सकती थी घूम फिर नहीं सकती थी इसलिए अपने दैनंदिन कार्यों में वह बहुत हद तक मां के ऊपर में ही मां शारदा के ऊपर में ही वह निर्भर करती थी श्री मां इहा जानी तेन मां को यह बात पता थी ताई वृद्धा कोनो प्रयोजन जोखन तहा के डाकी तेन और इसीलिए वृद्धा चंद्रा मणि देवी जब भी किसी भी काम के लिए मां को पुकारती त कोनोई तीनी शबेग ताहर पार्श्व उपस्थित होई तेन तभी ही वह मा दौड़ करके मने एकदम झड़प से दो शो बेगे दौड़ करके मां की ठाकुर की जननी के सामने उपस्थित होती के हो जद सावधान करिया दी तो ज ए भाबे छूटी ले नोबत नीचू दोर जाए माथा टूक जाते पारे तबे तिनी उत्तर दते लोई बा कोई जद सावधान कर देता कि इस तरह से जब भी चंद्रा मणि देवी आपको पुकारती है आप इतना दौड़ करके चली जाती है तो ऐसा होगा नहीं कभी कि यह जो चौखट है दरवाजे की उसके ऊपर में सर लगेगा और सर में वो इंजरी होगी आघात होगा तो मां ने कहा भले ही चाहे सर में लगे इससे क्या हुआ तीनी अमार गुरुजन आर मा चंद्रा मणि देवी मेरी गुरु है और मेरी मां भी है आहा तिनी बूढ़ो होए छन आहा वो वृद्धा हुई है आमी जदी ताड़ा तड़ी ना जाई तार असुविधा होते पारे मैं जदी दौड़ करके न जाऊ तो उनको असुविधा हो सकती है से जनन दौड़े जाए इसीलिए दौड़ कर के जाती हू ठाकुरर जननी तखन नबत उपरे था कीतन मा कीते नीचे ठाकुर की मां चंद्रमणि देवी नबत के फर्स्ट फ्लोर में रहती थी और मां शारदा रहती थी नबत के ग्राउंड फ्लोर पर देखिए यह जो चंद्रमणि देवी की सेवा की बात है इससे दो तीन पॉइंट आते हैं हमारे सामने कि आज के युग में हम लोग देखते हैं कि जब वृद्ध माता-पिता की सेवा करने की बात आती है तो अभी जिस तरह से पूरा एक मन हृदय ढाल कर के सेवा करनी ऐसा सभी लोगों से शायद नहीं होता मैं अपने ही मेरी नजरों से देखा हुआ एक उदाहरण देता हूं मेरे एक रिलेटिव वो उनकी जो इस तरह से नानी थी वो बड़ी ही वृद्ध हो गई थी तो वो चल फिर भी नहीं पाती थी तो यह जो मेरे रिलेटिव थे वो वहां पर वो मेरे से तो उम्र में बहुत बड़े थे तो उनका क्या काम था वो तो नानी को जब भी बाथरूम जाना है टॉयलेट जाना है तो वह तो खड़े भी नहीं हो सकती थी वह अपने बिस्तर में से तो जाकर के उनको एक पात्र दिया जाता था पात्र में वह जो कुछ भी है वह समाप्त करके शौच क्रिया फिर इस पात्र को धोना पड़ता था तो इस तरह से कितने दिन तक कितने सालों तक इन्होंने इनकी सेवा की थी अभी मैं देखता हूं कि देखिए कि इस तरह की अभी मैं खुद मेरे रिलेटिव थे किंतु यदि कोई मुझे ऐसा कहते कि तुम इस तरह से सेवा करो तो शायद मैं नहीं कर पाता और वोह तो वहां की बात यहां पर भी रामकृष्ण मिशन में भी देखिए कि शुरू शुरू में जब हम लोगों ने यह कनखल वगैरह में सेवाश्रम प्रारंभ किए तो हम साधुओं को वहां के जो साधु समाज है वह हमको भंडारे वगैरह में नहीं बुलाते थे क्यों हमारे बारे में क्या कहते थे अरे यह तो साधु है साधु क्यों क्योंकि हम हम लोग रोगियों का मल मूत्र साफ करते हैं इसलिए हमको यह मल मूत्र वगैरह कौन साफ करेगा तो साफ करेगा यह जो नॉर्थ इंडिया का वो जो उस समय का वो जो इस तरह का जो विचार था तो यह साधु लोग भी रोगियों की इस तरह से मल मुत साफ करते हैं अर्थात यह साधु भी साधु है तो देखिए कि मैं पर्सनली जद कहा जाएगा कि इस तरह से भंडारे में जाना है साधु समाज के न किय रोगियों की से सेवा करनी है तो इस तरह से जब हमको ऑप्शन दिया जाता है तो यह पता है कि ऑप्शन थियोरेटिकली एक्सेप्ट करना और प्रैक्टिस में उसको डालना इन दोनों में कितना बड़ा वो बड़ा डिफरेंस है थियोरेटिकली मैं कहूंगा कि ऑफकोर्स मैं तो साधु होना चाहता हूं क्योंकि मैं तो रामकृष्ण विवेकानंद भावधारानी कभी भी चाहूंगा कि यह बड़े बढ़िया मजे से भंडारे में जाए और बड़ा अच्छा सा पकवान मिष्ठान ना खाए बड़ा प्रणामी लेकर के हज 000 प्रणामी आजकल तो साधु भंडारा में सामान्य बात है तो इतना सा प्रणामी लेकर के आए वो मैं करना चाहता हूं कि इस तरह से वह रोगियों के मल मूत्र साफ करना चाहता हूं थियोरेटिकली पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि रोगियों की सेवा करना ही रामकृष्ण संघ के साधु ब्रह्मचारी भक्तों का प्रथम कर्तव्य है किंतु यदि सही सही में प्रैक्टिकली यदि मेरे सामने यह ऑप्शन आते तो मुझे पता नहीं कि मैं वह थियोरेटिकल ऑप्शन को प्रैक्टिकली सिलेक्ट कर पाता कि नहीं तो यह जो सेवा है यह सेवा कार्य कितना अपने मन को अपने मन के जितने भी कुसंस्कार है इसको पूरा साफ कर देता है इसको पूरा निर्मल कर देता है यह ठाकुर की सेवा करके ही ठाकुर का यह संग गठित हुआ ठाकुर ने यह सेवा करने का मौका दिया अपने भक्तों को जिन भक्तों ने कैंसर हुआ ठाकुर को ठाकुर की भी वही अवस्था ठाकुर ने एक बार कहा कि अभी मैं शोच क्रिया करने के लिए बतर में से खड़ा नहीं हो पाऊंगा तो क्या होगा लाटू महाराज ने फटाक करके कह दिया कि आमी तो अच्छी अपनार सेवक आपके शौच मल मूत्र साफ करने के लिए मैं तो आपका सेवक के रूप में उपस्थित हूं तो देखिए कि ठाकुर ने यह सेवा करने का मौका अपने भक्तों को दिया और जिन भक्तों ने यह मौका ग्रहण किया वे लोग ठाकुर की पदानु सरण करके सन्यास प्रवे सन्यास आश्रम में प्रवेश किया सन्यास ग्रहण किया और और उन्होंने अपना जीवन धन्य बना दिया और जो लोग वैसे तो मुंह से तो बड़ा कुछ कहते रहते हैं गिरीश घोष एक बार कहता है कि जिन लोगों जिनको मैं अवतार के रूप में जान पहचानता हूं जिनको मैंने अवतार के रूप में स्वीकार किया है और गु की गु बोध होए गिरीश घोष मुह से तो ऐसा कहता है उनका जो विष्ठा है क्या विष्ठा के रूप में महसूस होगा ऐसा लगेगा ये भी तो अमृत है अभी ये सब मुंह से बोलने की बात है किंतु गिरीश घोष ने अपने हाथों से तो ठाकुर की ऐसी कोई बहुत खास सेवा नहीं नहीं की थी ऊपर से ठाकुर के सर पर बैठ के क्या कहता था कि मैं आपकी सेवा इस जन्म में नहीं कर पाया आप छोटे बच्चे के रूप में मेरे घर में जन्म ग्रहण कीजिए तो मैं आपकी सेवा कर पाऊंगा तो भा अभी इस जन्म में अब सेवा करने से कौन रोकता है तो क्या है कि देखिए कि जो लोग तीन भागों में मुझे लगता है कि हमारा संघ उस समय बट गया था एक सर्वप्रथम सर्वोच्च जो कैटेगरी है कि जिन्होंने अपने हाथों से भगवान को ठाकुर ठाकुर की सेवा की ये वो सभी बाद में सन्यासी शिष्यों में परिणत हुए वो एक कैटेगरी दूसरे की जिन्होंने शायद अपने हाथों से तो इतनी सेवा नहीं की किंतु बाकी सब तरह से ठाकुर को सपोर्ट किया सन्यासियों को यह त्यागी संतानों को सपोर्ट किया वो सब पक्के गृहस्थ भक्त जैसे कि यह बलराम बसु है गिरीश घोष है मास्टर महाशय है वो सुरेश मित्र है सभी लोग रामचंद्र दत्त है सभी वो ठाकुर के गुरवस्तकम के भक्त है वो ठाकुर के पास आते तो थे किंतु उन्होंने देखा कि अरे ठाकुर भी यह सामान्य मनुष्य की तरह वृद्ध होकर के जरा व्याधि से ग्रस्त होकर के उनको मनुष्य की सेवा करने ग्रहण करनी पड़ रही है वो खुद का कुछ संभाल नहीं पाएंगे तो हमको क्या करेंगे हमको क्या देंगे तो इसमें यह वो कितने लोग हैं कि उसमें इस तरह से चले गए तो भवनाथ जिसमें से ठाकुर ने कहा था कि वो इतनी उसकी इतनी उच्च अवस्था है किंतु फिर भी वो जब एक बार वो बाकी शिष्य लोग जब सेवा कर रहे थे ठाकुर की उसने कुछ नहीं किया था ठाकुर ने खुद कहा था एक बार बोर राजा टी सेज चलो अर्थात की वर राजा की तरह सज करके आया था शादी कर लिया था वर राजा सज करके आया था ठाकुर को और पूछा मुह से सिर्फ कि ठाकुर आप कैसे हैं बस ऐसा बोल कर के चला गया तो ऐसे लोग भी थे कि धीरे-धीरे करके वे लोग इस संघ से बिखड़ बिछड़ गए तो यह जो सेवा करने का जो किसी गुरुजन की सेवा करने का एक मौका मिलता है तो मैं सिर्फ ठाकुर की ही नहीं और किसी की भी तो अपना यह परम सौभाग्य है उसको ग्रहण करना चाहिए और यह भी एक बात है कि यह सौभाग्य सभी लोग ग्रहण नहीं कर पाते मैं अपना खुद का उदाहरण देता हूं कि मुझसे इस तरह से व्यक्तिगत सेवा किसी की नहीं होती मेरा एक क्या है कि किताबें पढ़ने का एक भाव पहले से ही रहा है तो मैं यह सब चीजों को थियोरेटिकली तो बढ़िया सा एक्सेप्ट कर लेता हूं कि हां इस तरह से करना चाहिए यह करना चाहिए वह करना चाहिए किंतु जब प्रैक्टिकल करने की बारी आ जाती है तो मुझे नहीं लगता कि वह मेरे से होगा तो ऐसा भी नहीं है कि सेवा नहीं करेंगे तो फिर कोई रास्ता नहीं है जैसे ठाकुर के दो तरह के शिष्य थे मैंने कहा कि बाकी सब तरह से आप सपोर्ट कर सकते हैं सब कुछ कर सकते हैं भले ही चाहिए इस तरह से फिजिकली सेवा ना करें किंतु यह जो सेवा जो कर सकते हैं वो बताता है कि वोह लोग सर्वोच्च कक्षा के साधक हैं तो यह बात है कि अपने संघ में भी ठाकुर की सेवा करके धीरे-धीरे करके यह बात बाद में ही डेवलप हुई है और देखिए इस इसके बारे में दूसरा भी एक इंसिडेंट है कि एक बार मां उद्बोधन में थी और शरत महाराज को कहीं पर जाना था अभी हमको तो पता है कि शरत महाराज तो मां के द्वारी थे मां के सेवक थे मां की जो सेवा करने में उनका सबसे बड़ा उनका जो कहा जाएगा नाम तो व शरद महाराज का था अभी एक बार शरद महाराज को कहीं प बाहर में जाना हुआ किसी काम से पूरे रामकृष्ण संघ के तो जनरल सेक्रेटरी थे किसी काम के लिए किसी दूसरे सेंटर में जाना हुआ जाने की बात थी तो मां ने कहा कि पहले मैं यहां से जाती हूं अर्थात कि उद्बोधन छोड़ कर के मैं कल जयराम बाटी जाती हूं बाद में तुम जाना ऐसा माने शरत महाराज को कहा तो यह बात सुनकर के बाकी लोगों ने मां को पूछा कि मां शरत महाराज को छोड़ कर के क्या और कोई आपकी सेवा नहीं कर सकता कि शरद महाराज उद्बोधन छोड़ के जाएंगे तो उससे पहले आपको आप ही को खुद को उद्बोधन छोड़ के जाना पड़े तब मां ने क्या कहा था पता है जो शरद जिस तरह से मेरी सेवा करता है ऐसा सभी लोग नहीं कर पाएंगे केस्टो लाल अर्थात की कृष्णलाल महाराज स्वामी धीरान जी वो वो कि छुटा कोते पार और बाबूराम चेला माने इस तरह से कहा कि बाबूराम महाराज अर्थात की स्वामी प्रेमानंद जी का चेला है इसलिए और बाबूराम महाराज तो पता है ना मठ में जितने भी साधु भक्त जाते थे उनकी कितनी सेवा करते थे तो वो बाबूराम का चेला है बोलकर के वो थोड़ी सेवा कर सकता है किंतु और कोई इस तरह की सेवा नहीं कर सकता फिर मां ने क्या कहा कि राजा अर्थात कि राखल महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी दूसरों को दिलवा करके सेवा कर सकते हैं या दूर खड़े रह कर के वह सुपरविजन ऑब्जर्वेशन कर सकते हैं किंतु अपने से सेवा नहीं कर पाएंगे तो यह जो लोग सेवा कर सकते हैं उनका एक कैटेगरी ही अलग है रामकृष्ण संग है पहले से ही लाटू महाराज है शशि महाराज है शरत महाराज है इन लोगों की पूरी एक कैटेगरी ही अलग है शरद महाराज के बारे में तो उनकी डायरी में जब उनका देहांत हुआ था शरद महाराज की महासमाधि हुई थी तब पता चला कि उनकी डायरी खोल कर के देखा गया कितने ही वो विधवा एं हैं कितने ही वृद्ध लोग हैं कितने ही बीमार लोग हैं जिनको कि शरत महाराज पैसा देते थे क्योंकि उनको तो घर खर्च चलाने के लिए और कोई तो उपाय नहीं था पैसा भी देते थे उसकी नोंद उनकी डायरी में पूरी लख थी कि इनको इसका इतना पैसा दिया है इसको इतना पैसा दिया है फिर इतना ही नहीं खुद वहां पर जाकर के सेवा भी करते थे तो ये बहुत ही सुंदर उदाहरण है शरद महाराज का इस तरह से दो अनाथ लड़के थे कुछ समय शरद महाराज के साथ में शरद महाराज के ही कमरे में उद्बोधन में सोते थे अभी इन दोनों को सर्दी जैसा कुछ था उस समय तो यह पंखा है या तो हवा है वह बर्दाश्त नहीं कर सकते थे तो उनकी वजह से शरत महाराज अपने कमरे में जब सोते थे यह दो लड़के उनके साथ में बच्चे जब उनके साथ में सोते थे खिड़की दरवाजा सब कुछ एकदम टाइट बंद करके सोएंगे अभी वह शरद महाराज का शरीर तो इतना मोटा सरखा था और जब खिड़की दरवाजा बंद हो जाएगा और गर्मी के दिनों में पूरे पसीने से वो भीग जाते थे इतना कष्ट होता था उनको किंतु उनकी उम्र भी उस समय काफी हो चुकी थी किंतु फिर भी यह दो बच्चों को कष्ट ना हो इसलिए वह पूरा कष्ट अपने सर पर ले लेते थे तो इस तरह से देखिए कि हमारे संघ में यह जो सेवा का भाव यह सेवा का आदर्श कितना उज्जवल रूप से वो प्रगट मान है वह उज्वल रूप से सबके सामने इसको रखा गया है तो मां का भी ऐसा है व ये चंद्रा मणि देवी नौबत के पहले मंजिल पर रहती थी फर्स्ट फ्लोर पर और कुछ भी जरूरत होने से आवश्यकता होने से मां द को पुकारती थी वो मां भी दौड़ कर के जाती थी और जद वह चौखट व दरवाजे तो छोटे थे व सर झुका कर के भीतर में नहीं जाएंगे तो सर पर लग जाने का भय था मां ने खुद कहा था कि इस इस तरह से इतनी बार मेरे सर पर लगा है कि एक कुछ समय के बाद में ऑटोमेटिक हैबिट हो गई कि दरवाजे के भीतर में प्रवेश करती हूं तो ऑटोमेटिक सर झुका करके ही करती हूं ऐसा वो मशीन लर्निंग कहते हैं ना वो हार्ड वायर इस तरह से प्रोग्रामिंग हो गया था तो यह मां कहती है कि जद मैं दौड़ कर के नहीं जाऊंगी तो वृद्धा मां को कितना कष्ट होगा तो यह सेवा का आदर्श हमारे संग में माने भी चरितार्थ करके दिखाया है ठाकुरर सेवाओ तीनी एई रूप सर्वांत करण करी तेन ठाकुर की सेवा भी इसी तरह से पूरा मन प्राण देकर के मां करती थी ई सेवा अवलंब ने तीनी ताहर जी टक साहो चर जो पाई तेन त हाई तहर पखे थेट छलो यह सेवा करते-करते ठाकुर का जितना संग प्राप्त हुआ यही मां के लिए बहुत था वो पता है ना जब ठाकुर के कमरे में कीर्तन वगैरा होता था नृत्य गीत होता था अभी मां खुद तो वहां पर जा नहीं सकती है इसलिए वहां पर नबत में वोह जो एक पर्दा लगाया था चटाई जैसा उसके भीतर में एक छोटा सा छिद्र था उस छिद्र में से मां यह नृत्य कीर्तन वगैरह देखती थी और ठाकुर भी वो ठाकुर जब नृत्य कीर्तन कुछ भी होता है तब वह कहते कि यह जो नबत की ओर का जो उनके कमरे का जो दरवाजा है वो खोल दो यदि मां यह सब नहीं देखेगी नहीं सुनेगी तो सीखे गी कैसे और बाद बीच-बीच में ठाकुर व हंसी मजाक करते-करते रामलाल को कहते भी थे देखो कि तुम्हारी चाची का यह जो पर्दा है चटाई का उसके भीतर का छिद्र दिन प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है क्योंकि छिद्र थोड़ा सा बड़ा होगा तो ठाकुर के कमरे में जो नृत्य कीर्तन हो रहा है वह देखने में सुविधा होगी तो इस तरह से तो मां के पास में बस इतना ही समय था कि वह जब ठाकुर के लिए खाना पका करके ठाकुर को खिलाने को जाएगी ठाकुर के साथ में बैठेगी ठाकुर की दो तीन बातें सुनेगी शई शो सेबोक लीला आबार दैहिक प्रयोजन साधने आबद्ध नाथा किया नेक खेत्रे आध्यात्मिक भूमि ते विकसित होतो यही सेव्य सेवक लीला दैहिक प्रयोजन साधन उसमें आबद्ध न रह कर के अन्य अनेक क्षेत्र में उच्च आध्यात्मिक भूमि में विकसित होता अर्थात कि यह सेव्य सेवक का जो भाव है जो संबंध है वह किंतु सिर्फ शारीरिक नहीं कि मां ठाकुर के लिए चलो कमरे की सफाई करती होगी शायद फिर वहां पर ठाकुर के लिए पानी भर के रखती होगी ठाकुर के लिए खाना बना कर के लाती होगी यह तो सिर्फ एक दैहिक सेवा ही नहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में भी इसका विकास हुआ था आध्यात्मिक क्षेत्र में किस तरह से ठाकुर ने मां को सब तरह से सभी साधनाएं संसार में किस तरह से रहना है व्यवहार किस तरह से करना है किसके साथ सब कुछ ठाकुर ने मां को सिखाया था बाह्य भूमि ते विचरण काले ठाकुर ए समय प्रकृति भावे प्राधान्य बस तो आपना के जगदंब सखी बा परि चालि का मने करतन एवं श्री मां के रूप जगदंब अपर सखी बोलिया जानते बाह्य भूमि में रहने के समय ठाकुर उस समय की बात है कि ठाकुर अनेक स बार अपने को प्रकृति का भाव अपने ऊपर आरोप करते और अपने को जगदंबा की सखी या तो फिर उनकी दासी के रूप में वह सोचते और मां को भी इस तरह से एकदम बाकी और एक सखी के रूप में अपने मन में सोचते श्री माओ नंदे और सोजत ने काचली और अलंका आदि द्वारा ठाकुर के नारी बेसे सजाया दिया निजे के तहर सखी भविया उल्लास होई तेन मां जब ठाकुर मां के इस तरह से सोचते कि वह भी जगदंबा की दासी है या सखी है मां भी इस बात से आनंदित होकर के ठाकुर को अलंकार से और स्त्रियों के वस्त्र पहना कर के स्त्री रूप में सजाती और उनको उनकी सखी समझ कर के बड़ी ही उल्लास होती अभी यह विवरण पढ़ कर के थोड़ा सा हमको चिंता करने की एक प्रयोजन प्रकट होता है ठाकुर का जो लीला प्रसंग श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज ने जो पूरा लिपिबद्ध किया है उसमें ठाकुर की सभी साधनाएं का विवरण है और और सिर्फ साधना हों का विवरण ही नहीं साधना के पीछे क्या फिलोसोफी है इसका भी बड़ा सुंदर सा विवरण उसमें प्रस्तुत है तो यह जो ठाकुर का सखी भाव में या तो प्रकृति भाव में या तो नारी रूप में अपने को इमेजिन करना या तो इस तरह से साधना करना कि मैं जगदंबा की दासी हूं या तो मैं जगदंबा की सखी हूं और इस भाव का अपने ऊपर में आरोप करके मां जगदंबा की सेवा करना इसके बारे में काफी कुछ वर्णन उसमें है ठाकुर जब वह मथुर बाबू के साथ में उनके जान बाजार स्थित भवन में जाते थे तो जैसे जनरली क्या होता है ऐसे बड़े-बड़े जमींदार होते हैं जनरली उस समय की प्रथा ही ऐसी थी कि अंदर महल रहता है एक भीतर का घर का हिस्सा रहता है वहां सिर्फ स्त्रियां ही जा पाएगी उनके अलावा कोई आगंतुक मेहमान कोई पुरुष वहां पर नहीं जा पाएगा तो ठाकुर के लिए वो स्त्रियों के मन में इतना एक सहज भाव था और मथुर बाबू का कि मथुर बाबू का भी ठाकुर के ऊपर में इतनी श्रद्धा थी कि ठाकुर बड़े ही निसंकोच रूप से अंदर महल में जाते थे वहां पर स्त्रियों के साथ में रहते थे और यही स्त्रियां उनको स्त्री वेश में सजाती थी और यही स्त्री वेश में सज कर के ठाकुर इन स्त्रियों के साथ में मां जगदंबा की पूजा आरती देखने के लिए जाते थे यहां तक कि हृदय ने एक बार कहा था और हृदय ने जो कहा है वह शरत महाराज ने लिपिबद्ध किया है हृदय कहता है कि मथुर बाबू ने सब स्त्रियों को दिखा कर के कहा कि देखो तो इसमें तुम्हारे मामा कौन से हैं मां है तो हृदय के तो मामा होते थे हृदय उनका तो भांजा था तो हृदय इतने साल ठाकुर की सेवा किया किंतु स्त्री वेष में ठाकुर सच करके जो बाकी सभी स्त्रियों के साथ में खड़े थे वो समझ नहीं पाया कि ठाकुर इनमें से कौन है इतना ठाकुर अपने को उस पात्र में देते थे तो यह एक मधुर भाव की साधना है या तो फिर यह सखी भाव की या तो कहेंगे प्रकृति भाव की साधना है यह प्रकृति भाव का आरोप अपने पर आरोप करने का सबसे बड़ा एक प्रयोजन यह है कि जिससे कि काम भाव अपने मन में से संपूर्ण रूप से दूर हो जाए तो यह एक साधना है तो यहां पर भी अभी वो जो मथुर बाबू के घर पे जो ठाकुर की यह जो सब साधनाएं चल रही थी तो ठाकुर बाद में तो देखिए कि एक बार निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गए बाद में हमको यह प्रश्न हो सकता है कि फिर इस तरह से फिर से सखी भाव की साधना या तो फिर से यह सब साधनाएं करने का क्या प्रयोजन है किंतु मेरे जो मेरा जो एनालिसिस है कि ऐसा नहीं है कि निर्विकल्प समाधि के बाद में सभी साधना हों की परि समाप्ति हो गई या तो सभी साधना हों का अंत आ गया मुझे लगता है कि इसके बाद में सभी साधनाएं एक साथ में में सहज रूप से रह सकती है अर्थात कि यह जो निवेदिता ने कंप्लीट वर्ष में जो पूर्व भूमिका में लिखा है ना कि विवेकानंदा हैज रिमूव्ड दिस बैरियर बिटवीन सेक्रेड एंड सेक्युलर अर्थात कि अध्यात्मा और व्यवहार इन दोनों के बीच की जो भेद रेखा है वह स्वामी विवेकानंद ने मिटा दी है तो वैसा ही निर्विकल्प समाधि के बाद में पहले तो मैं साधना करता हूं एक इस तरह का एक भाव रहता है और मैं साधना नहीं करता अभी यह जागतिक व्यवहार कर रहा हूं और अभी साधना कर रहा हूं ऐसा दो डिफरेंशिएबल प समाधि के बाद में पूरा जीवन ही साधनाम हो जाता है जो कुछ भी करेंगे सब साधना है साधना तो और या तो फिर कहेंगे कि ईश्वर की उपासना है ईश्वर मय हो गए हैं और जो कोई भी कार्य करते हैं वह ईश्वर की उपासना हो जाता है तो यह जो कि पहले साधक भाव में जिस समय ठाकुर साध करते थे उस समय ठाकुर जो स्त्री वेष धारण करके जो मां जगदंबा की पूजा करते थे उनको चामर डालते थे उनकी आराधना करते थे उसमें और निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर के सड़सी पूजा करके मां के आगमन के बाद में अपने को स्त्री वेश में सजाते हैं उसमें यह एक डिफरेंस रहेगा पहले ठाकुर साधना करते थे अभी ठाकुर के लिए प्रकृति भाव सहज हो गया है जैसे कि यह वीर भाव है है जैसे यह सख्य भाव है जैसे कि यह शांत भाव है मातृ भाव है बालक भाव है सख्य भाव है वैसे ही ये प्रकृति भाव भी जितने भाव राज्य के राजा है श्री रामकृष्ण तो ठाकुर के भीतर में सभी भाव अभी एक साथ में सहज होकर के विराजित हो रहे हैं वह सब एक साथ में रह रहे हैं तो अभी यह मां के साथ में रहकर के मां उनको वस्त्र पहनाए गी स्त्रियों के स्त्रियों के अलंकार उनको सजाएगी अलंकारों से ठाकुर को सजाएगी और मां खुद अपने को इस तरह से सोचेगी कि मैं भी मैं और ठाकुर दोनों ही जगदंबा की दासिया है तो यह एक पूरा एक सहज है इसमें कोई जोर जबरदस्ती करके इस तरह से साधना करके वह भाव ही नहीं है क्योंकि ठाकुर तो उस भाव को ट्रांसडर्म भाव सभी ठाकुर के भाव राज्य में सहज हो गए इसीलिए मां भी बड़ी ही उल्लास होती थी ठाकुर को इस तरह से नारी वेश में सजा करके और अपने को ठाकुर की सखी सोच करके इसीलिए देखिए कि यह भाव का आरोप करके या तो इस भाव में रह कर के ठाकुर के मन में मां के प्रति की किसी भी तरह का काम भाव नहीं प्रकट होता था गंभीरानंद जी आगे लिखते हैं एई सेवा विषय तहर कोनो दावी दावा छीलो ना यह जो मां ठाकुर की सेवा करती थी इस संबंध में मां का ऐसा कुछ नहीं था कि मैं ही सेवा करूंगी मेरा ही सेवा करने का अधिकार है मेरा दावा है यह मेरा अधिकार है इस तरह से मां का नहीं था ठाकुर जोखन जोतो टकू जे भावे चाहि तेन तीनी ता हाई संपादन कोरिया तृप्त थाकी तेन ठाकुर जब जितना चाहते थे जिस तरह से चाहते थे उस तरह की सेवा करके ही मां संतुष्ट होती थी ऐसा कभी-कभी मैंने देखा है कि कोई-कोई लोग इस तरह से अब जैसे कि दो उदाहरण है ठाकुर के जीवन में अभी हम लोग यदि ऐसा कहेंगे कि हां सेवा करना बहुत ही अच्छी बात है और सेवक का अपना एक उच्च कैटेगरी है रामकृष्ण संघ की भावधारानी सेवा करने का अधिकार सिर्फ मेरा है और कोई सेवा करने को आएगा तो उसके प्रति मेरे मन में हिंसा या तो फिर ईर्षा या तो फिर एक क्रुद्ध भाव प्रकट होगा तो ऐसा एक उदाहरण है यह हृदय ठाकुर जब बाकी भक्त आना शुरू किए थे तब ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि हृदय यहां पर रहता तो तुम लोग जिस तरह से मेरी सेवा करते हो किसी को वह सेवा करने नहीं देता क्योंकि वह हृदय का एक अधिकार जैसा था एक ईर्षा थी बाकी एक भीतर में एक एक नेगेटिव वृत्ति खड़ी हो गई थी कि हां मैं ही ठाकुर की सेवा करने का अ एलिजिबल या तो फिर अधिकारत्ती बात स्वीकार की है कि जब ठाकुर दूसरे लड़कों के साथ में बात करते थे तो मेरे मन में उस समय बड़ी ही ईर्षा प्रकट होती थी कि ठाकुर तो सिर्फ मेरे अकेले हैं बाकी सब लोगों के साथ में क्यों बात करते हैं बाकी सब लोगों को अपने पास में क्यों आने देते हैं फिर वही यही ठाकुर ने राजा महाराज को कहा कि कुछ समय के लिए राजा महाराज को दूर कर दिया राजा महाराज वही वृंदावन वगैरह गए जो भी कर्म जो कटने थे वो कट गए फिर जब वापस आए तब उनका मन एकदम शांत हो गया था तो यह कभी-कभी सेवा करने का अधिकार जब मिलता है तो उससे एक नेगेटिव भाव भी खड़ा होता है यह भी खतरा है हमको इसके बारे में जागृत रहना है और मैंने यह सब चीजें अपनी नजरों से देखी भी है कि कोई-कोई लोग बहुत अच्छे से सेवा तो करते हैं बहुत अच्छे से कोई भी कार्य समापन तो करते हैं किंतु साथ-साथ में उनके मन में एक अ दूसरों के प्रति एक तुच्छ ता चल्य का भाव आ जाता है कि यह जो कार्य है यह जो सेवा है वह मैं ही ठीक-ठाक कर पाता हूं या ही मैं ही ठीक-ठाक कर पाऊंगा बाकी सब लोग इसको इतना अच्छे से नहीं कर पाएंगे और किसी को सेवा का अधिकार मिलेगा तो यह लोग बड़े ही नाराज हो जाएंगे तो यह बात कि सेवा करना बहुत ही अच्छा है किंतु साथ-साथ में ही सेवा करते-करते दूसरों के प्रति तुच्छ ता चल्य या तो फिर दूसरों के प्रति क्रोध का भाव प्रकट ना हो इसके बारे में बड़ा ही सावधान रहने की जरूरत है मां का ऐसा था कि मां ठाकुर की सेवा तो करती थी किंतु यदि कोई इस सेवा में व्याघात पहुंचाता यदि कोई इस सेवा में आकर के कोई बाधा सृष्टि करता तो मां उसको फड़ा करके उसके ऊपर में नाराज नहीं हो जाती जैसे कि देखिए कि मां की कहानी पढ़ कर के मां की बात पढ़ कर के हमको पता चलता है कि ठाकुर के पास में मां बहुत ज्यादा समय नहीं रह पाती थी क्यों क्योंकि वही पाणी हाटी वाली बात की मां और ठाकुर यदि साथ-साथ में रहेंगे तो लोग उनके लिए उनके बारे में कटु शब्द कहना शुरू कर देंगे उनके बारे में अपमानजनक बातें करना शुरू कर देंगे इसलिए दोनों बिल्कुल सेपरेट ही रहते थे किंतु क्या क्या होता था मां खाना पका कर के ठाकुर को खाना देने के लिए आती थी उस समय बाकी सबको कहा जाता था कि अभी आप कमरे में से चले जाइए मां शारदा आ रही है तो मां आएगी बाकी पुरुष भक्त सब लोग चले जाएंगे और मां ठाकुर के साथ में बैठ कर के बातें करेगी उनको खाना खिलाएगी यही पूरे दिन भर में यही एक मौका था मां को ठाकुर के साथ में रहने का बातें करने का और उनकी सेवा करने का तो एक बार इस तरह से मां थाली लेकर के ठाकुर को खिलाने के लिए जा रही थी तो उसी समय ये गोला गुला मा गुलाप मां का तो पता है ना वो कुछ भी गुलाप मां ने मां की सेवा भी बहुत की किंतु साथ-साथ में ही उनका स्वभाव तो थोड़ा सा एक सेल्फिश तरह का था कि वो जैसे ही मां को देखा कि मां थाला लेकर के ठाकुर को खिलाने को जा रही है तो गुलाप माने फटाक करके मां के हाथ में से थाला खींच लिया बोला कि मां मैं ठाकुर को खिलाऊंगी अर्थात कि मैं ठाकुर के साथ में इस तरह से अकेले बैठ कर के बात करने का मुझे मौका चाहिए और वो मौका मुझे पाने के लिए मैंने मां के हाथ में से ये मौका खींच लिया और ये जो स्वार्थ इससे मां को जो आघात होता है वो गुलाप मां को उस समय समझ में नहीं आ रहा था तो इस तरह से गुलाप मां ने जाकर के वोह ठाकुर को खाना खिलाया तो अभी ऐसा तो कितने ही दिन चला तो मां सब कुछ चुपचाप सहन कर लेती थी ऐसा नहीं कहा कि गुलाब हम यही तो मेरे लिए एक मात्र तुम लोग तो दिन भर ठाकुर के साथ में बैठे रहते हो ठाकुर ने महिला भक्तों को वो अपने कमरे में आकर के बैठ कर के बात करने से मना नहीं किया तुम लोग सब दिन भर ठाकुर के साथ में रहते हो उनकी बातें सुनते हो उनका सत्संग करते हो तो इतना मौका तुमको यदि मिलता है तो यह एक जो 1015 मिनट मुझे मिलती है ठाकुर को साथ में बैठने की वो भी तुम क्या मेरे से छीन ले र हो तो माने किंतु गुलाप मां को ऐसा नहीं कहा वोह चुपचाप हंसते-हंसते थाली गुलाप मा को दे दी तो देखें कि यह सेवा का स्टैंडर्ड कितना हाई है अपने ऑर्डर में दोनों तरीके से एक तो सेवा करने की वृत्ति होनी चाहिए एक चीज और दूसरा कि जद सेवा का अधिकार दूसरों को मिलता है या तो फिर हमसे छीन लिया जाता है तो उस समय मन में क्रोध प्रकट नहीं होना चाहिए यदि क्रोध प्रकट होता है तो हम लोग ठीक-ठीक सेवा नहीं कर रहे हम लोग दूसरों की सेवा करके अपना अहंकार ही बढ़ा रहे हैं तो यह थी हमारी मां शारदा तो आज यही तक कल फिर से निलते हैं ओम शांति शांति शांति ह r