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ओ स्काय धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार षय राम कृष्णायन श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हमने देखा कि किस तरह से रानंद जी महाराज हमको मां के जीवन का जो कठिन पर पीरियड वह जो चल रहा था एक कठिन दौर उसके बारे में हमको बताते हैं और किस तरह से मां ने इस परिस्थिति का मुकाबला किया मां ने इस परिस्थिति में कैसे बिहेव किया वह हमको बताया और साथ-साथ में ही अभी यह भी बताएंगे कि मां क्या कर सकती थी जो कि उसने नहीं किया यदि बार-बार बीमार हो रही है तो अपने पति को अर्थात श्री रामकृष्ण देव को कह कर के बड़े धनी व्यक्तियों से धन लेकर के बहुत बढ़िया चिकित्सा वगैरा अच्छी दवाई अच्छा ट्रीटमेंट अच्छी केयर वह सब वह करवा सकती थी किंतु फिर भी आदर्श के लिए जो करना है तार ढेर बाड़ा कोरे छी मां ने खुद कहा है कि आदर्श के लिए जो करना है उसका मैंने बहुत बढ़ चढ़ करके पालन किया है प्रश्न यह होता है कभी-कभी कि क्या जगत में आदर्श का स्थापन करना आवश्यक है कभी-कभी ठाकुर के पास में ऐसे ही कलकाता के दो तीन लोग गए थे धनी यातनाम वगैरह वगैरह उस समय के तो ठाकुर ने पूछा मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है तो क्या उत्तर मिला आहार मैथुन निद्रा यह जो जड़ वादी लोग जो हैं उनको लगता है कि यह जो जीवन का जो सर्वस्व सुख है सर्वस्व आनंद है वह इंद्रियों के भीतर ही समाया हुआ है तो यहां से लेकर के यह पशु योनि में रहने वाले चाहे रह रहे हैं तो मनुष्य योनि में किंतु आचरण कर रहे हैं पशु योनि का तो वहां से प्रारंभ करके सिविलाइजेशन या तो मनुष्य सभ्यता या तो फिर य ह्यूमन कल्चर आज उस उस ऊंचाई तक पहुंचा है कि जहां पर आदर्श ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है भोग नहीं त्याग यही है हमारी भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र और यही आदर्श को कितना बढ़ा चढ़ करके मां ने पालन किया इसी अनुसंधान में पढ़ते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज आगे में क्या लिखते हैं अपनी पुस्तक श्री मां शारदा देवी ण का नाम है देवा दिना महाराज जी लिखते हैं किंतु तत् पूर्वे श्री मायर अद्भुत चरित्र कथा आर एक बार चिंता कररिया लई यह मां का जो अद्भुत चरित्र कि मां जद भी कष्ट होता है तो देव को आधीन होकर के देव को ईश्वर को ईश्वरी को प्रार्थना करके इसका समाधान खोजने का प्रयास कर करी नहीं कि किसी के ऊपर में भार स्वरूप होक के आमरा भाभिया स्तब्ध होई ज कोलकातार धनी और विधान केर द्वारा परिवेट तो हम लोग यह सोच कर के स्तब्ध हो जाएंगे दंग हो जाएंगे कि कलकत्ता के धनी और गण्य मान्य व्यक्तियों से घिरे हुए साधक समाजे सिद्धि चरम अवस्थाए उन्नी तो बोलिया प्रख्या तो साधक समाज में सिद्धि की चरम अवस्था पर उपनीत हुए हैं ऐसा बोलकर के प्रख्यात है यहां पर महाराज जी ठाकुर के बारे में बता रहे हैं कलकाता के धनी लोगों से घिरे हुए हैं मथुर बाबू जैसे कितने ही लोग उनको अपना उनको उनके सामने शरणागत हो चुके हैं साधक समाज में जो कि बड़े ही प्रख्यात है एवं गुण ग्राही सिद्ध गणे द्वारा अवतार रूपे उपास तो स्वयं श्री राम कृष्ण कतक देवी ज्ञाने आराधिता गुण ग्राही साधक गण जैसे कि भैरवी ब्राह्मणी जैसे कि यह तोतापुरी तोतापुरी का तो ठीक नहीं इतना किंतु भैरवी ब्राह्मणी ने अवश्य ठाकुर को अवतार के रूप में प्रचार किया था तो माने सिद्ध साधक गण के द्वारा अवतार के रूप में प्रचारित ऐसे श्री रामकृष्ण के द्वारा स्वयं जिनकी पूजा हुई है ऐसी श्री मां श्री रामकृष्ण कर्तक देवी ज्ञाने आराधिता देवी के रूप में जिनकी आराधना हुई है जिनकी पूजा हुई है एवं सर्वदा सु सम्मानिता हो आओ य अलौकिक चरित्र माधुरी महिष पल्ली कखन गौरव मधे आत्त विश्रुत बा श्रद्धा हीन होईना सर्वदा सु सम्मानित होकर के भी इस अलौकिक चरित्र माधुरी से महिस अर्थात की महिमा वान पल्ली बाला अर्थात की गांव की यह सरल बाला कभी भी गौरव मद से आत्म विस्तृत या तो फिर श्रद्धा हीन नहीं हुई है बरम अशेष विनय सहकार आत्मीय सजन एवं ग्रामवासी सकल के जथ चित सम्मान दिया छन एवं ग्राम देवता दर प्रति पूर्वा पेक्षा अधिक भक्ति प्रदर्शन करिया अशेष विनय सहकार अनेक बहुत ही गहन विनय के साथ में आत्मीय सज्जन एवं ग्रामवासी सबको जो सन्मान मिलना चाहिए वह सन्मान दिया है और ग्राम्य देवता के प्रति पहले से भी ज्यादा भक्ति प्रदर्शित की है ये ग्राम्य इतना एक पैराग्राफ रूपी एक पूरा सेंटेंस है महाराज जी भी जब देखिए कि साहित्य के जो उपासक होते हैं साहित्य में जो लोग रस रखते हैं वे लोग जब लिखना शुरू करते हैं तो उनकी कलम से कविता यदि गद्य में भी लिखते हो तो लिखता है कि जैसे पद में लिख रहे हैं माने कविता के रूप में उनकी यह जो सेंटेंस स्ट्रक्चर है उनकी वाणी कविता की तरह ही प्रगट होती है और इस सेंटेंस को थोड़ा सा हम डिटेल में देखेंगे देखिए कि सबसे पहले तो इस सेंटेंस के दो पार्ट है सबसे पहले तो मां का ठाकुर का परिचय दिया दूसरा किया कि यह जो ठाकुर का परिचय जो कि इसके परिचय के द्वारा ठाकुर को को एस्टेब्लिश किया कि ठाकुर कितने महत्व है और यह फर्स्ट पार्ट हो गया सेंटेंस का सेकंड पार्ट हुआ कि यही ठाकुर के द्वारा जो कि इतनी गरिमा के स्वामी है इस ठाकुर के द्वारा इस मां की पूजा हुई है यानी कि सोच लीजिए कि फिर मां का भी महत्व कितना है यानी कि मां का महत्व स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम तो ठाकुर का महत्व स्थापित किया तो यह दो पार्ट हो गए इस सेंटेंस के सर्वप्रथम ठाकुर की महत्ता ठाकुर का महात्म स्थापित करके यह दिखाया कि यही ठाकुर द्वारा पूजित यही श्री श्री मां यानी कि मां की महिमा मां का महत्व मां की गरिमा कितनी है अशेष चरम शिखर पर स्थायी है वो कितनी ज्यादा यह मां की महिमा है तो यह दो सेंटेंस हो गए इस सेंटेंस के दो पार्ट हो गए और थर्ड और आखिरी पार्ट में बताया कि यदि जिसको इतनी महिमा मिलती है जिसको इतना सम्मान मिलता है तो स्वाभाविक है कि उसके भीतर में अहंकार का कुछ ना कुछ प्राकट्य अवश्य होगा होना ही चाहिए यही तो मनुष्य स्वभाव है किंतु देखिए कि हमने हमेशा देखा है कि मां का जो जीवन वो मनुष्यवकाशा है वह सब मां के जीवन में है जितनी बीमारी है आधि व्याधि सब कुछ मां के शरीर में है किंतु मनुष्य चित क्या नहीं है वह है हमारे चरित्र की दुर्बलता हम यदि सम्मान मिलेगा तो हम घमंडी हो जाएंगे और यदि जीवन में कष्ट आएगा तो पूरा डिप्रेशन में चले जाएंगे यह मनुष्य चित दुर्बलता मां में नहीं है वहां पर देवत्व का असली प्रकाश मां के भीतर में होता है देवत्व का अर्थ यहां पर किस तरह से किया है यदि आपको सम्मान मिलता है तो आप घमंडी नहीं हो जाएंगे और यदि जीवन में असामान्य एक चैलेंज खड़ी होती है एक ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति खड़ी होती है तो आप हताशा और निराशा में नहीं डूब जाएंगे क्रोध या तो फिर गलानी या तो फिर किसी को कष्ट देना किसी का अहित करना वो वो सब भाव प्रकट नहीं होंगे यह जो मनुष्यवकाशा आने से निराशा या क्रोध में चले जाना तो यह मानसिक व्याधि नहीं शारीरिक व्याधियों है मलेरिया भी हो जाएगा डेंटरी भी हो जाएगा काला ज्वर भी हो जाएगा भी काला जवर का जो भी वो वे लोग उस समय में मीनिंग करते होंगे तो वह सब कुछ मा को होगा किंतु साथ-साथ में ही उनका मन जैसे कि एक अन्य राज्य में विचरण करता है मां का मन जैसे की शरीर से डिसोसिएट होकर के शरीर से संपर्क कट करके एक मन रहता है स्वर्ग में और शरीर रहता है पृथ्वी पर मन रहता है मंदिर में और शरीर रहता है संसार में देखिए कितना सुंदर संगम है मां के जीवन में यदि हमको संसार में रहना है जद परिवार जनों से घिर कर के रहना है तो यह है आदर्श शरीर भले चाहे रहे संसार में मन रहेगा सब समय वैकुंठ लोक में सब समय भगवान शिव के श्रीपाद पद्म में यह है मनुष्य जीवन का सही सही आदर्श तो देखिए इतना लंबा सेंटेंस इतना मतलब मैं तो बंगाली हूं नहीं मैं तो बंगाली सीखा हूं किंतु मैं भी कह सकता हूं कि बंगाली भाषा का जो आप जद अध्ययन करते हैं जो लोग विश्वविद्यालय में यूनिवर्सिटी और कॉलेज में अच्छा-अच्छा बंगाली साहित्य जो लोग पढ़ते हैं जैसे कि हम लोग गुजराती साहित्य का अभ्यास किया है स्कूल में तो क्या होता था कि जो कि बड़े-बड़े विद्वान गुजराती साहित्यकार हुए उनके वह जो सिलेक्टेड रचना संग्रह हमको पाठ्य पुस्तक में देते थे और उसी पाठ्य पुस्तक का अध्ययन करके हमको समझ में आता था कि जो स्टैंडर्ड गुजराती साहित्यिक गुजराती सो ललित ढंग से लिखा हुआ गुजराती किसको कहते हैं तो वह जो किया गया है सिलेक्टेड गुजराती लिटरेचर का तो जो लोग गुजराती के अच्छे-अच्छे वह जो पाठक होंगे वह जो अच्छे जानकार होंगे वे लोग यह सब सिलेक्शन करते हैं तो वैसे ही मुझे लगता है मुझे पता नहीं कि ऐसा है कि नहीं किंतु ऐसा होना चाहिए कि गंभीरानंद जी ने यह जो मां की पुस्तक लिखी उसमें यह जो कुछ कुछ सेंटेंस है जो कि कितने अर्थ से गभीर है ऐसे सेंटेंस का हम यदि प्रॉपर एनालिसिस करने को जाए तो हम इसके ऊपर में पीएचडी थीसिस लिख सकते हैं इतना गभीर इतना सुल नित इतना साहित्यिक यह सब सेंटेंस दोनों तरह से इसका महात्म्य है एक तो साहित्य की दृष्टि से है और दूसरा है इसका फिलोसॉफिकल दर्शन शास्त्र की दृष्टि से क्योंकि आपको यदि कोई भी धार्मिक साहित्य की रचना करनी है तो धार्मिक साहित्य सर्वश्रेष्ठ कब कहा जाएगा जब उसमें साहित्य के भी गुण है और उसमें दर्शन शास्त्र अध्यात्म शास्त्र के भी गुण है दोनों जद इकट्ठा होते हैं तो उसको चरम साहित्य का अवदान के रूप में उसको गिना जाएगा आध्यात्मिक क्षेत्र में तो यहां पर भी इस सेंटेंस के बारे में ऐसा ही है देखिए कि कितना सुंदर ढब से यह सेंटेंस लिखा गया है है और साथ में यह भी देखिए कि इसका कितना गंभीर अर्थ होता है जैसे कि गंभीरानंद जी महाराज ने इतना बड़ा पुस्तक लिखा तो सही किंतु इतने बड़े पुस्तक में कुछ-कुछ सेंटेंस ऐसे हैं इससे पहले भी हमने इसके बारे में डिस्कस किया था जब भी इस तरह के सेंटेंस आ जाते थे हमारे सामने कि उसमें जैसे कि पूरी किताब का सार गर्भ ऐसे सेंटेंस के भीतर में आ गया हो जैसे कि तो यह सेंटेंस भी ऐसा ही है इसको हम फिर से एक बार देखते हैं और अच्छे से इसका अनु द्या करते हैं आमरा भाभिया स्तब्ध होई हम लोग यह सोच कर के आश्चर्य चकित हो जाएंगे स्तब्ध हो जाएंगे जे कोलकातार धनी और विधान दिगर द्वारा परिवेट तो अभी देखिए इस के जैसे तीन पार्ट है तो सबसे पहले पार्ट में ठाकुर की महिमा का गान किया गया है उसके दूसरे पार्ट में कहा गया है कि यही ठाकुर ने इस मां की पूजा की है यानी कि मां की महिमा स्थापित की गई है और तीसरे पार्ट में देखिए कि इस मां की जद इतनी महिमा है तो मां के भीतर में घमंड कभी भी नहीं आया एक सरल गांव की बाला के रूप में ही मान ने हमेशा वर्तन किया है अपने बड़ों को सम्मान दिया है अपनी पुरानी प्रथाओं को सम्मान दिया है ग्राम के देवताओं को सम्मान दिया है वरना तो बहुत बार होता है ना आप पढ़ाई लिखाई का गांव में लड़के का जन्म हुआ और पढ़ाई लिखाई करके शहर में चला गया वहां से ना कि विदेश में चला गया अमेरिका वहां कहीं पे करोड़पति हो गया फिर गांव में एक दिन मुलाकात के लिए आता है और गांव में सब जो कुछ भी देखता है उसके के ऊपर में कटाक्ष करता है या तो फिर इसकी निंदा करता है अपनी मां को कहेगा यह घुमता टान के तुम क्यों घूमती हो मैं तो अमेरिका जाके आया वहां प स्त्रियां तो कभी घुमता नहीं टान वह अपने पति को नाम देक पुकारती है और तुम अपने पति को यानी अपने खुद के पिताजी को वो ऐसा करके सुनो जी वगैरह बिना नाम दिए इतना श्रद्धा करके बात करती हो यह सब कौन सी पुरानी पुरानी प्रदा है इसको छोड़ दो और गांव में जदी वो पेड़ के नीचे में पीपल के पेड़ के नीचे में या तो वटवृक्ष के नीचे में एक पत्थर जदी रखा होगा वह खुद जदी छोटा होगा तो उस पत्थर के सामने परीक्षा के समय कितनी ही प्रार्थना की होगी अभी अमेरिका रिटर्न है विदेश से पैसा कमा करके आया है सब कुछ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वगैरह यह सब देख कर के आया है और पत्थर के सामने जाकर कहता है कि यह क्या सब अंधश्रद्धा है इसका त्याग करो स्वामी विवेकानंद स्वयं कलेज में पढ़ते थे और विदेशी पंडितों से प्रभावित हो गए थे उस समय एक दिन ऐसा हुआ कि ठाकुर के पास जाकर के गीता की प्रशंसा कर दी तो ठाकुर को तो नरेंद्र की सब एक एक चाबी पता है तो ठाकुर ने इमीडिएट कहा कि किसी यूरोपियन पंडित ने गीता की प्रशंसा की होगी इसीलिए नरेंद उसकी प्रशंसा कर रहा है देखिए स्वामी जी को इसीलिए सभी लोगों ने बोला था आप भारत में जितना ही चाहे प्रचार कर लीजिए आप की महिमा आपके गुण समझने वाले लोग आपको भारत में नहीं मिलेंगे आपको अमेरिका जाना होगा अमेरिका में जाकर के आपको सक्सेसफुल होना होगा जब यह अमेरिकन और ब्रिटिश और यह यूरोपियन आपकी महिमा का गान करेंगे आपकी ख्याति आपकी सुख याति करेंगे आपके मित्र होंगे आपके मददगार होंगे आपके शिष्य होंगे तब कहीं जाकर के उसकी असर भारत पे भारत यों पे होने वाली है क्यों क्योंकि हमारे पुरखों के प्रति अपनी प्रथाओं के प्रति अपने देवताओं के प्रति एक आज नहीं उस समय की बात कर रहा हूं गुलाम भारत था तो उस समय की बात कर रहा हूं आज तो भारत इतना स्पेस साइंस है ना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अभी मैं कल ही देख रहा था कि टॉप फाइव कंपनियां विश्व में मार्केट कैपिला इजेशन की दृष्टि से उसमें दो कंपनी के सीईओ इंडियन है माइक्रोसॉफ्ट और यह ग के तो आज तो साइंस टेक्नोलॉजी सभी क्षेत्र में भारत जो है वह आगे बढ़ रहा है तो अभी अपनी पुरानी प्रथाओं पर फिर से हमको विश्वास हो जाए यह तो कोई बड़ी बात नहीं है किंतु भारत गुलाम था उस समय सब समय हमको बताया लोग यह जो क्रिश्चियन प्रीचर्स जो आते थे मिशनरी सब समय बताते थे कि तुम्हारे पुरखे भी गलत है तुम्हारी प्रथाएं भी गलत है वह सब करप्ट है सब अंधश्रद्धा है उसका त्याग करके क्रिश्चन कटी को अपना लो यह हमारी यूरोपियन सभ्यता को अपना लो तब कहीं जाकर आपका कल्याण होगा तो उस समय की बात है कि इस तरह का डाउट होना स्वाभाविक था तो देखिए तीन पार्ट इस सेंटेंस के सर्वप्रथम पार्ट में ठाकुर की महिमा का गान किया गया दूसरे पार्ट में यही मही महिमा मंडित अवतार वरिष्ठ ठाकुर के द्वारा मां की पूजा की गई है वो कहा गया और तीसरा कि यही मां के द्वारा जिनकी इतनी महिमा है उन्होंने गांव में गांववासियों को अपने माताजी पिताजी को अपने गांव के देवताओं को यथोचित सम्मान दिया है और इतना ही नहीं जितना जितना समय बढ़ता गया जितना जितना समय बीतता गया उतना ही मां का सम्मान इन लोगों के प्रति बढ़ता ही गया बढ़ता ही गया तो ये सेंटेंस बड़ा ही सुंदर साहित्य की दृष्टि से और दर्शन शास्त्र की दृष्टि से फिर से एक बार पढ़ते हैं आमरा भव्य स्तब्ध होई जे कोलकातार धनी और विद्यान दिग द्वारा परिवेट तो हम लोग यह सोच करके स्तब्ध हो जाते हैं कि कलकत्ता के धनी और विद्वान लोगों के द्वारा जिनको जिनके जो घिरे हुए हैं अर्थात जो यानी कि श्री राम कृष्ण जो घिरे हुए हैं साधक समाजे सिद्धि चरम अवस्थाए उपनि तो बोलिया उन्नी तो बोलिया प्रख्या तो साधक समाज में जो सिद्धि की चरम शिखर पर विराजमान है बोलकर के जो प्रख्यात है एवं गुण ग्राही सिद्ध गणे द्वारा अवतार रूपे उपास तो स्वयं श्री रामकृष्ण और गुण ग्राही सिद्ध गण के द्वारा अवतार के रूप में उपासक स्वयं श्री राम कृष्ण त्रिक इस श्री राम कृष्ण के द्वारा देवी ज्ञाने आराधिता एवं सर्वदा सु सम्मानिता होईया हो यही श्री राम कृष्ण के द्वारा देवी के रूप में आराधिता और हमेशा सुसमा नित होकर के भी इस अलौकिक चरित्र माधुर्य महि स पल्ली बाला इस अलौकिक चरित्र की स्वामिनी इस चरित्र माधुर्य से महि स पल्ली बाला पल्ली अर्थात की गांव गांव की यह सरल बाला कखन गौरव मदे आत्त विश्रुत बा श्रद्धा हीन होए ना कभी भी गौरव मद से अहंकार से और घमंड से आत्म विस्मृत या तो फिर श्रद्धा हीन नहीं हुई है आत्म विस्तृत विस्मृत अर्थात कि मेरा सही स्वरूप मेरे भीतर में में विराजमान मेरे हृदय में प्रकाशित देवत्व है नहीं कि यह पंच महाभूत का बना हुआ शरीर की सीमाए यह मेरा सही स्वरूप का ज्ञान यह एक चीज दूसरा श्रद्धा हीन मां कभी भी श्रद्धा हीन नहीं हुई है स्वामी जी ने कहा है ना कि नच केता की तरह श्रद्धा चाहिए भारत में स्वामी जी ने क्या कहा मेरा सर्व से मेरा सर्वप्रिय उपनिषद है कठ उपनिषद क्यों क्योंकि वह नचिकेता में वह श्रद्धा है कि वह जाकर के यम को प्रश्न कर सकता है आज मृत्यु की बात सुनकर के हम सब लोग भय के मारे हमारी वाणी बंद हो जाएगी हम लोगों की वाच शक्ति वो रुद्ध हो जाएगी पता नहीं पसीना होने लगेगा अरे भाई मृत्यु सामने है पता नहीं क्या होगा किंतु इस बालक में नचिकेता में यह श्रद्धा है कि वह जाकर के यम को प्रश्न कर सकता है कि मृ मृत्यु के बाद का जीवन मृत्यु के बाद क्या है देवता लोगों को भी जो समझ में नहीं आता वह आप मुझे समझा दीजिए तो यह आत्म श्रद्धा स्वामी जी कहते हैं कि इसकी भारत में आवश्यकता है तो यहां पर देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज ने यह जो उपनिषद के जो दो सर्वश्रेष्ठ गुण एक तो मेरे आत्म स्वरूप का ज्ञान और दूसरा आत्म श्रद्धा तो गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि मां कभी भी आत्म विस्मृत नहीं हुई और कभी भी आत्म श्रद्धा से हीन नहीं हुई परम अशेष विनय सहकार आत्मीय सजन एवं ग्रामवासी सकल के जथ चत समान दिया छन अशेष विनय सहका आत्म विस्तृत तो नहीं ही हुई श्रद्धा हीन तो नहीं ही हुई परंतु प्रचूर विनय के साथ में अशेष विनय देखिए कितना सुंदर शब्द है विनय तो है किंतु अशेष विनय ऐसा विनय जिसका शेष नहीं है ऐसा विनय कि जिसका अंत नहीं है वह कहानी जो कि मेरी बड़ी फेवरेट है मैंने पहले भी दो-तीन बार कही है ब्राह्मण भोज है मां के घर में और सब ब्राह्मण लोग खा रहे हैं और वहां पर एक सन्यासी महाराज उनको परोस रहे हैं पर्यवेक्षण कर रहे हैं उस समय ब्राह्मण लोगों ने देखा कि यह सन्यासी भले अभी चाहे सन्यास गेरुआ धारण किया हो किंतु इसका जन्म तो ब्राह्मण कुल में नहीं हुआ है तो सब लोग नाराज हो गए भोजन करने वाले ब्राह्मण कि अरे एक अब्राह्मण होकर घर में जन्म लेने वाला वो भले चाहे सन्यासी भी हो वो ब्राह्मण लोगों को खाना कैसे परोस सकता है तो सब खड़े हो गए और बोल दिया कि हम खाना अधूरा छोड़ केर चले जाएंगे अभी ब्राह्मण भोज रखा है ब्राह्मण लोग खाना अधूरा छोड़कर चले जाएंगे तो उस घर गृह स्वामी को जिसका घर है जिसके घर में यह ब्राह्मण भोज है उसको कितना पाप लगेगा तो अभी देखिए कि यह तो कोई सामान्य गृह स्वामी नहीं है यह तो इनका गृह पूरा विश्व ब्रह्मांड है पूरे विश्व ब्रह्मांड की स्वामिनी जगत धात्री जगदंबा स्वयं श्री श्री मां इस गृह की स्वामिनी है और इस ग्रह में जद यह लोग अधूरा भोजन रख के जाएंगे तो इस ब्राह्मण लोगों को तीनों लोक में कोई स्थान देने वाला नहीं है जब हृदय ने मां का असम मान किया था तब ठाकुर ने क्या कहा था मेरा असम मान करोगे तो फिर भी तुम्हारी रक्षा है मां का असम मान किया तो तीनों लोक में ब्रह्मा विष्णु महेश भी तुमको नहीं बचा पाएंगे तो ऐसी मां के घर में जाकर के मां का अपमान किया है मां श्राप दे सकती थी कुछ भी कर सकती थी उस समय किंतु उसकी वजह माने गल वस्त्र होकर के अर्थात की पूरा गुमटा वगैरह टान कर के दो हाथ जोड़ते जोड़ते बड़े विनय पूर्वक इन ब्राह्मण लोगों को बार-बार विनती की कि आप कृपा करके ब्राह्मण भोज छोड़ कर के मत खड़े हो जाइए आप मेरे पर कृपा करके ब्रा भोजन समाप्त कीजिए ऐसा मैंने जब पहली बार यह प्रसंग पढ़ा था तो मुझे अविश्वास हो गया था कि सही में यह सब किताबों में जो लिखा है सही लिखा है कि फिर हमको हमको कभी-कभी ऐसा होता है ना जो चेले होते हैं ना अपनी गुरु की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए बढ़ा चढ़ा करके सब कुछ लिखते हैं कि मेरे गुरु ने यह चमत्कार किया नहीं कि मेरे गुरु ने यह चमत्कार किया जैसे कि लोग गुरु से प्रभावित हो जाए अपने राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य में उल्टा है अपने यहां पर इन लोगों का विनय इन लोगों की यह जो ह्यूमिडिटी है हलने है ये हलने विना ये सब प्रकाशित होता है अरे भाई गिरीश घोष कहता है कि ठाकुर ने प्रणाम अस्त्र के द्वारा जगत जय किया है गिरीश जाकर के हाथ जोड़ कर के प्रणाम करता है तो ठाकुर झुक कर के प्रणाम करता है तो गिरीश जाकर के और झुकता है तो ठाकुर और भी झुकते हैं तो आखिर में गिरीश ने साष्टांग होकर के प्रणाम किया देखिए कि ये जो विनम्रता ये विनय उल्टा हो गया ना और दूसरे लोग कहेंगे कि अरे मेरे गुरु के पास ये शक्ति है मेरे गुरु के पास वो शक्ति है हम लोग कहेंगे कि मेरे गुरु के पास शक्ति है किंतु इस शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया वही उनकी सबसे बड़ी सिद्धि है और शक्ति का प्रदर्शन करने वाले तो लाखों लाखों आपको धार्मिक पुरुष वगैरह मिल जाएंगे शक्ति होकर के भी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना अपमान सहन कर लेना अपमान को खा लेना यह कितनी बड़ी सिद्धि है यह दिखा करके दिखाओ अपने गुरु के भीतर में तब तो हम लोग कहीं मानेंगे तो यह प्रसंग जब मैंने पढ़ा था स्वामी जी को मैंने इतना पढ़ा ठाकुर का कथामृत वगैरह सब पढ़ लिया ठाकुर के दर्शन के बारे में पढ़ लिया स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के वक्त होता दे दी यह राजयोग ज्ञान योग जिसका कि हम पाठ करते हैं यह सब पढ़ लिया किंतु यदि मन सही सही प्रभावित होता है तो मां के यह सब प्रसंग से इतना विनय इतनी विनम्रता इतना यह जो गुरु और देवता गण इनके प्रति यह श्रद्धा यह किसम देखने को मिलगा वक्ता देने वाले हजार होंगे दर्शन पर्शन होने वाले व अवतार पुरुषों से अपना रामायण महाभारत पुराण भरे पड़े हैं किंतु मां की य दीनता मां के भीतर में श्रद्धा और साथ में यह विनम्रता का यह संयम यह संयोग यह प्रयागराज की तरह यह संगम यह कहा प कितना देखने को मिलता है तो इसीलिए एक कोई एक मां का एक सन्यासी शिष्य मां को पूछता है कि मां यह राधु के प्रति आपका इतना आकर्षण है तो यह तो आश्चर्य की बात है आप तो भगवती स्वयं एक लड़की के प्रति आपका इतना आकर्षण आपकी बच्ची के प्रति इतना आकर्षण तो मां ने नाराज होकर के क्या कहा था मेरे जैसा इस त्रिभुवन में दूसरा किसी को खोज करके दिखाओ तब पता चलेगा जिसका मन सूक्ष्म हो जाता है वो सूक्ष्म मन से जिस चीज को पकड़ता है उसके प्रति ऐसा ही लगता है बाहर बाहर से कि इसके ऊपर में माया हो गई है या आकर्षण हो गया है किंतु देखिए एक बार तो मां ने कह दिया कि मेरे जैसा इस त्रिभुवन में और दूसरा कोई है तो उसको खोज के बता दो चैलेंज माने किया है वो चैलेंज इसलिए नहीं किया कि मां सबको दीक्षा देती थी और दीक्षार्थी बड़े खुश खुश होकर चले जाते थे मां जिसको आशीर्वाद हो देती थी तो उसका जीवन परिवर्तित हो जाता था मां आज भी लाखों लाखों भक्तों को सूक्ष्म रूप से मार्गदर्शन देती है हाथ पकड़ कर के रास्ता दिखाती है यह सब गुण से कोई मां की महिमा नहीं है हां वह सब गुण है किंतु यह विद्या के साथ में विनम्रता देवत्व के साथ में मानत्व का जो सु संयोग है वही है मां की सही सही महिमा का गान तो अशेष विनय सहका आत्मीय सज्जन एवं ग्रामवासी सकल के जथ चित सम्मान दिया छन अशेष विनय से आत्मीय स्वजन और ग्रामवासियों को यथा शक्ति यथा जितना उचित है सम्मान देना उतना दिया है एक बार जयराम बाटी में एक महिला भक्त ने एक बिल्ली को एक बिल्ली के सर के ऊपर में पेर रख कर के जैसे आदर करते हैं ना बिल्ली को कुत्ते को तो इस बिल्ली के सर के ऊपर में पैर रख कर के ऐसा वो उसको यह कर रही थी तो माने इमीडिएट कहा अरे बिल्ली को प्रणाम करो किसी के सर पर पैर नहीं रखना है क्यों क्योंकि सर तो गुरु स्थान है अच्छा अभी यह इस बात को यदि किसी व्यक्ति के बारे में आप कहेंगे कि किसी व्यक्ति के सर पर पैर नहीं रखना है अरे ठाकुर शर्मा जाते थे ठाकुर भाव में चले जाते थे किसी के सीने पर पैर रख देते थे ऐसा सब जब करते थे किसी के किसी की गोद में पैर रख देते थे और जब ठाकुर जब भाव में बाहर आते थे तो थोड़े से शर्मा जाते थे अरे भाई मैं क्या करूं भाव में चला गया था मैं क्या कर रहा हूं उसके प्रति मेरी ंश नहीं है तो ठाकुर इस तरह से क्षमा मांग लेते थे तो देखिए कि इस तरह से तो जो अपना एक शास्त्र नीति सम्मत आचरण है उसको तो करना ही चाहिए व्यक्ति के सर पर पैर नहीं रखना चाहिए अनटिल एंड अनलेस आपका मन उस उच्च अवस्था में चला गया किंतु यहां पर तो बिल्ली है मां कहती है कि इवन बिल्ली को भी इस तरह से मां के घर में ही किसी एक महिला भक्त ने झाड़ू लगा कर के झाड़ू को छोड़ जोर से फेंका एक कोने में इमीडिएट मां ने कहा कि अरे यह जो झाड़ू है उसका भी एक सन्मान है उसी को भी उसका सन्मान मिलना चाहिए जिसको जो सन्मान प्राप्त है उसको वह सन्मान मिलना चाहिए तो झाड़ू को जो सम्मान मिलना चाहिए बिल्ली को जो सम्मान मिलना चाहिए उसकी चिंता मां करती है तो मनुष्य और देवताओं की तो बात ही क्या है तो इसीलिए मां कह कि सबको यथा चित यथा उचित सन्मान दिया छन सन्मान दिया है एवं ग्राम्य देवता दर प्रति पूर्वा पेकाओ अधिक भक्ति प्रदर्शन करिया छन ग्राम्य देवताओं की ओर पहले से भी कहीं ज्यादा भक्ति का प्रदर्शन किया तो आज यही तक कल फिर से मिलते ओम शांति शांति शांति हरि ओ तसत शम देखिए कि अलौकिक चमत्कार करना भगवान के लिए अवतार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है और इसका हम जितना फलावा कर जितना हम प्रचार करेंगे ना उतना ही अपनी महिमा और गरिमा कम होती जाएगी ऐसे तो कितने ही आपको मिल जाएंगे जो दावा करेंगे अरे मैं आपकी बीमारी ठीक कर दूंगा यह कर दूंगा दर्शन दे दूंगा चमत्कार कर दूंगा है ना चरित्र की जो महत्ता है वही तो असली आभूषण है अवतार का और किसी भी सिद्ध पुरुष का इसलिए यह बात आपकी सही है कि अपनी किताबों में जब कहीं पर भी जब कभी भी इस तरह के अलौकिक घटनाओं के बारे में लिखा गया है तो अपने संघ के जो बड़े लोग हैं वे लोग इस बात को ज्यादा बढ़ावा नहीं देते यह बात बिल्कुल सही है महिमा का वर्णन सिर्फ इसीलिए किया गया है पूर्व भूमिका के रूप में कि आखिर में मां जो सबको सन्मान देती है तो सन्मा अच्छा अभी मैं भी सन्मान दे दूंगा किंतु मेरी क्या औकात है मैं कौन हूं मैं सम्मान देता हूं तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है अभी राजा आक के सन्मान देगा या देश का प्राइम मिनिस्टर जाकर के किसी के बारे में बोलेगा कि अच्छा यह अच्छा आदमी है तो पूरे न्यूज़पेपर में छप जाएगा मैं किसी का सम्मान करूंगा कोई मेरे एक दो मित्र होंगे उनको छोड़कर और कोई इसको सुनने वाला नहीं तो देश का प्राइम मिनिस्टर किसी का सन्मान करेगा तो फट करके सब न्यूज़पेपर में आ जाएगा तो सन्मान कर सन्मान देने वाला कौन है उसके ऊपर में भी तो बहुत कुछ निर्भर करता है तो मां एक गांव वासियों को यह देवताओं को सन्मान देती थी तो इसके पीछे में बैकग्राउंड क्या है तो पहले तो मां की महिमा का वर्णन करें बाद में तो मां जिसको सम्मान देती है वह ठीक होगा नहीं देखिए यह सब उद्देश्य नहीं होते हैं सही सही उद्देश्य है शरणागति की महिमा का प्रचार देवी हां क्योंकि क्या है देवी तोव का जागरण तो अभी चलिए मान लीजिए कि गांव में कुछ कुछ लोग हैं उनको कुछ फायदा होगा मान लिया है किंतु देवी शरणागति क्या है यह बात जगत समझेगा अभी कोई अमेरिका में बैठा है कोई ब्रिटेन में बैठा है तो सिंहवाहिनी जागृत हो गई है तो उनको क्या लाभ है कभी नाम भी नहीं सुना किंतु मां शरणागति के द्वारा देवी को जागृत कर सकते हैं वह मैसेज जो दिए हैं पूरे विश्व को काम में लग सकता है