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Meditation ·

Guided Meditation || श्रीरामकृष्ण ध्यान || 20 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः अभी मैं शाम को समुंदर के किनारे वॉकिंग के लिए गया था। इतना ठंडा पवन आ रहा था। मैंने सोचा क्या होगा? इतना ठंडा पवन क्यों? और अभी देखिए बिजली गरज रही है जोर-जोर से। सो देखते हैं अभी क्या होता है। आई होप कि अपना क्लास पूरा हो जाए। उसके बाद में जितना बरसना हो वह बरसे।

ध्यान के दौरान नेत्र हमेशा अर्धनिमीलित होने चाहिए

पिछली बार एक जो प्रश्न हुआ था कि आंख के बारे में आंख खुली रखनी है कि बंद रखनी है? तो उसके रिलेटेड एक थोड़ा सा डिस्कशन कर लेंगे। सबसे पहले तो ठाकुर क्या कहते हैं? मैं थोड़ा सा पाठ कर लेता हूं। कथामृत में से एक कंपाइलेशन मैंने किया है। तो मणिलाल बोलकर के एक भक्त है। ठाकुर को प्रश्न कर रहे हैं। प्रश्न क्या है? अच्छा ध्यान की नियम कोथाई ध्यान करते होवे। अच्छा ध्यान का नियम क्या है? कहां पर ध्यान करना होता है? श्री रामकृष्णम हृदय डंका पेटा जाएगा हृदय है डंका पेटा अर्थात कि फेमस जगह है हृदय ध्यान करते होते हृदय ध्यान होते पारे अथवा शहस्त्रारे एगुली आईनेर ध्यान [गला साफ़ करने की आवाज़] हृदय में ध्यान कर सकते हैं या तो फिर सहस्त्रार में ध्यान कर सकते हैं। यह नियम अनुसार ध्यान की पद्धति है। शास्त्र आ शास्त्र में है तबे तुम्हार जेखाने अभिरुचि ध्यान करते पारो [गला साफ़ करने की आवाज़] तुम्हारी जहां पे भी इच्छा है ध्यान कर सकते हो सब स्थान ही तो ब्रह्ममय कोथाई तीन ना सब जगह ही तो ब्रह्ममय है ईश्वर कहां पे नहीं है जोखन बोल काछे तीन पाए नारायण स्वर्गों मूर्ति पाताल ढेके फैल लेन तखन की कोनो स्थान बाकी छिलो जब बलि के सामने नारायण ने तीन पे तीन ही अपने कदमों से स्वर्ग मर्त्य और पाताल को आवृत कर दिया था तब क्या कोई स्थान बाकी था गंगा तीरो जेमन पवित्रो आ जेने खराब माटी छे से तेमनी पवित्रो गंगा तीर भी उतना ही पवित्र है और जहां वहां पे खराब मिट्टी है यानी कि शौच करने की जगह वगैरह वह भी उतनी ही पवित्र है। आारा छे ए सम शमश तो तारे विराट मूर्ति और भी है यह जगत समस्त उन्हीं की विराट मूर्ति है। निराकार ध्यान ओ साकार ध्यान निराकार ध्यान ओ साकार ध्यान निराकार ध्यान बो कठिन निराकार ध्यान बड़ा ही मुश्किल है से ध्याने जा किछु देखछो सुनछो लीन होए जावे उस ध्यान में हम जो कुछ देख रहे हैं सुन रहे हैं लीन हो जाता है केवल स्वस्वूप चिंता बस रह जाती है स्वस्वूप की चिंता या तो फिर स्वस स्वरूप का चिंतन से स्वरूप चिंता करे शिव नाचे वही स्वरूप का चिंतन करके शिव नृत्य करते हैं आमी की आमी की ए बोले नाचे मैं कौन हूं मैं क्या हूं यह बोल के नृत्य करते हैं एके बोले शिव जोग इसको कहते हैं शिव योग ध्यानेर समय कपाले दृष्टि रखते हो ध्यान के समय में कपाल पर दृष्टि रखनी होती है। नेति नेति कोरे जगत छेड़े स्वस स्वरूप चिंता नेति नेति करके जगत त्याग करके स्वस स्वरूप की चिंता आर एक छे विष्णु योग और एक है विष्णु योग नासाग्रे दृष्टि नास नाक अर्थ नास अर्थात कि नाक नासाग्रे यानी कि यहां पे टिप ऑफ द नोज वहां पे दृष्टि अर्धेक जगते और उनरे थोड़ा सा जगत में थोड़ा सा भीतर में शाकार ध्यान ए रूप हो साकार ध्यान इसी तरह से होता है शिव कोखन कोखन साकार चिंता करे नाचेन राम राम बोले नाचे शिव कभी-कभी साकार चिंता करके नृत्य करते हैं। राम राम बोल के नृत्य करते हैं। देखिए बेसिकली यहां पे ठाकुर क्या कहना चाहते हैं? ध्यान की दो पद्धतियां हैं। एक है शिव योग दूसरा है विष्णु योग। जो हम आंख बंद करके जो ध्यान करते हैं वो उससे क्या होता है? अपनी प्राण शक्ति जो है, अपनी एकाग्रता है, वह बेसिकली यहां पर भ्रू मध्य केंद्रित हो जाती है। इसको कहते हैं निराकार ध्यान या तो फिर कहते हैं शिव योग। और किंतु यह क्या है ना थोड़ा सा मुश्किल है। इतना इजी नहीं है शिव योग करना। जो प्रारंभ में ध्यान करते हैं उन लोगों के लिए सहज पद्धति है विष्णु योग। अर्थात कि [गला साफ़ करने की आवाज़] हृदय में ध्यान करना और आंखें जो है उसको अपने यहां पे टिप ऑफ द नोज नासाग्रे उसको केंद्रित करना। किंतु एक बात है याद रखिए कि नाक के सामने केंद्रित करना एग्जजेक्टली आप ऐसा करने को जाएंगे तो होगा क्या कि आंखों के ऊपर में थोड़ा सा स्ट्रेन हो जाएगा। सो इससे बेटर क्या है कि आप थोड़ा सा नजरों को झुका दीजिए। बस इसी से काम हो जाएगा। आप एग्जजेक्टली टिप ऑफ द नोज ऐसा केंद्रित करने को जाएंगे ना तो आंखों पर स्ट्रेन पड़ने लगेगा। तो वो एक बात है। दूसरा है कि आंखों को नेत्र को किस तरह से अर्ध निमिलित जो संस्कृत शब्द है अर्ध निमिलित नेत्र अर्थात कि नेत्र जो होते हैं थोड़े से बंद होते हैं। उसको कैसे करना है देखिए। एक उपाय है कि आप अपनी नजरों को झुका दें। ठीक है? यह एक उपाय है। दूसरा एक उपाय है आंखों को बंद कर दें और फिर थोड़ा सा उसको खोलें। जस्ट 1 मि.मी. जितना यह बेटर रहेगा। अ इससे होगा क्या कि ऑलमोस्ट 90% अपनी नजरें बंद है। बस 10% जितनी खुली है। तो देखिए दो उपाय है। एक तो है नजरों को झुकाना। उससे ऑलमोस्ट आपकी पूरी-पूरी नजर खुली ही रहती है। दूसरा उपाय है आंखों को पहले तो बंद कर देना और फिर हल्का सा खोलना। इससे क्या होगा कि यह जो मन को अंतर्मुख होना है वह भी हो जाएगा और फिर यह जो स्ट्रेन पड़ता है आंखों के ऊपर में वह भी नहीं पड़ेगा। तो ऐसा आप प्रैक्टिस कीजिएगा। आंख बंद मत कीजिएगा। क्योंकि ठाकुर कहते हैं कि वह जो मेथड है वह शिव योग है। और शिव योग क्या है? निराकार ध्यान क्या है? थोड़ा सा मुश्किल है। वह हम जब प्रैक्टिस करतेकरते आगे बढ़ेंगे तब यह सब करना है। साधना के प्रारंभिक स्टेज में यह सब नहीं करना। तो आंखें हल्की सी खुली होगी किंतु किस तरह से? पहले तो हमने आंखों को बंद कर दिया है। फिर हल्का सा फिर से खोल दिया है। जैसे कि आप दरवाजा हल्का सा खोलते हैं ना वो खोल करके देखते हैं कि बाहर कौन खड़ा है। बड़े महानगरों में क्या है कि यह चोरी लूटफाट बहुत होता है। तो लोग एक कड़ी लगा देते हैं दरवाजे के ऊपर में। फिर थोड़ा सा खोल के देखते हैं। तो सेफ्टी और सिक्योरिटी रहता है। तो यहां पे भी पहले आंखों को पूरा बंद कर दिया। फिर हल्का सा खोला। ऐसा करने के बाद में एकाग्र किया अपने मन को हृदय के ऊपर

ध्यान की विधि

में। तो यह हो गई हमारी मेथड। सबसे पहले गीता चटिंग करेंगे। गीता का 12th चैप्टर 10 श्लोक करके करेंगे। ऑलमोस्ट आई थिंक 12th चैप्टर में 20 श्लोक है। तो 50-50% करके करेंगे। पहले 10 श्लोक इसके बाद में आंखें बंद करके हल्का सा ओपन करना और फिर मन को अपने हृदय पर एकाग्र करना देखना कि श्री रामकृष्ण देव स्वयं अपने हृदय में विराजित है। वह एक इमेजिनेशन करना इस तरह से एक चित्र खड़ा करना ठाकुर का। तो ऐसा एक बार कर दिया फिर उसी परिस्थिति में ध्यान करना है। जब यह समाप्त होगा मैं हरि ओम ऐसा कहूंगा तो फिर आप धीरे-धीरे करके ध्यान में से बाहर आइएगा। इसके बाद में फिर से 10 गीता के श्लोक फिर से वही सेम मेथड गीता का श्लोक समाप्त होने से फिर से हृदय में ध्यान करना है और फिर मैं आखिर में लाली दी को कहूंगा कि स्तोत्र पाठ करें। तो जब तक स्तोत्र समाप्त नहीं होता है आप ध्यान में ही मग्न रहिए। जैसे स्तोत्र समाप्त होता है धीरे-धीरे करके ध्यान में से बाहर आ सकते हैं। अभी हम

गीता पाठ

गीता पाठ [संगीत] करते हैं। तो वही सेम मेथड कि मैं दो बार चेंज करूंगा। एक बार आप सुनिएगा, दूसरी बार मुझे फॉलो कीजिएगा और यदि आपको ऑलरेडी आता है, ऑलरेडी आपको अभ्यास है तो आप दो बार भी चेंट कर सकते हैं। इससे अच्छा ही होगा बुरा नहीं। [संगीत] तो अथः द्वादशोध्याय अर्जुन उवाच एवं सतत युक्ताय भक्तम परपासते भक्तम [संगीत] परपासते [गाना गाने की आवाज़] ये चाप्यक्षम अव्यक्तम ये चाप्यक्षरमव्यक्तम [संगीत] तेशाम के योग [गाना गाने की आवाज़] वित्तमा तेशाम के योग वित्तमा श्री भगवान उवाच मैयावेश मनोमा मैयावेश मनो येमा नित्य युक्त उपासते श्रद्धया परयोपता ते युक्त तमामता येतक्षरम निर्देशम येत क्षरमन निर्देशम अव्यक्तम परपासते अव्यक्तम परपासते [संगीत] सर्वत्र गम चिंत्यम च सर्वत्र गम चिंत्यम [संगीत] च कूटस्थम अचलम ध्रुवम कूटस्थम अचलम ध्रुवम सनयम्द्रिय ग्राम म सनयम्द्रिय ग्रामम सर्वत्र समबुद्धय [संगीत] सर्वत्र समबुद्धय ते प्राप्तवती मामेव [गाना गाने की आवाज़] ते प्राप्तवती मामेव सर्वभूत ते रता सर्वभहते रता क्लेशो दिकत तरस्तेशा क्लेशो दिक तरस्तेशा अव्यक्त चेतसाम अव्यक्त चेतसाम अव्यक्त गतिर दुखम अव्यक्त गतिर दुखम देहव वाप्यते देह व्याप्यते येतो सर्वाण कर्माण येत सर्वाण कर्माणी म सन्यस्य मत परा म [संगीत] सन्यस्य मत परा अनन्य न वयोगन अनन्य न व योगन माध्यांत उपासते माध्यायंत उपासते तेशामहम समुधता तेशामहम समुद्धता मृत्यु संसार सागरात भवामी न चरा पार्थ भवामी न चरा पार्थ मैयावेशित चेतसा [संगीत] मैयावेशित चेतसा मव [गाना गाने की आवाज़] मन आस्त मव मन आधस्त [संगीत] म बुद्धिम निवेशय निवशिष सिमव निवस अतः उर्ध्वंम न संशयः अत उर्ध्वंम न संशयः अथ चितम समाधान धातु अथ चितम [संगीत] समाधानातुम न शको स्थिरम न शको [गाना गाने की आवाज़] स्थिरम अभ्यास योग ततो अभ्यास [संगीत] योगन ततो मामेच्छा तुम धनंजय अभ्यासेप्य [संगीत] समर्थोसी अभ्यासेप्य समर्थोसी [संगीत] मत कर्म परमो भव मत्कर्म परमो भव मदमप कर्माण मदथमप कर्माणि कुरवन [गाना गाने की आवाज़] सिद्धि मवाप्ससी कुरवन सिद्धि मवाप्ससीसी [संगीत] वेरी गुड। नाउ

ध्यान अभ्यास

जिस तरह से हमारी बात हुई आंखों [संगीत] को बंद करके एक बार हल्का सा खोल दीजिए। अपने हृदय में ध्यान कीजिए। हृदय हमारा हो गया है मंदिर। मंदिर में हमने श्री रामकृष्ण देव को विराजित किया है। स्थापित किया है। [संगीत] श्री राम कृष्ण मां शारदा समस्त गुरु भाइयों की उपस्थिति हृदय मंदिर में है। [संगीत] उनकी उपस्थिति से हृदय में से [संगीत] ओजस उत्पन्न होता है। ओजस [संगीत] है आध्यात्मिक शक्ति। आध्यात्मिक प्रवाह। [संगीत] यह ओजस रूपी प्रकाश अपने पूरे देह मन में बह करके प्रसारित होकर के [संगीत] मन के जितने भी नेगेटिविटी है उसको खाए जा रहे हैं। ्म ओम [संगीत] ओम हरि ओम धीरे-धीरे करके [संगीत] ध्यान में से बाहर आइए।

शिव योग और विष्णु योग: श्री रामकृष्ण

यहां पर जैसे ठाकुर ने कहा शिव योग और विष्णु योग इसका अर्थ क्या है? जब हम भगवान के ऊपर में मन को एकाग्र करते हैं तो वह हो गया विष्णु योग और अपने स्वस्वूप का चिंतन करते हैं तो वह हो गया शिव योग। हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम कभी-कभी क्या होता है? हम लोग ध्यान करने की शुरुआत तो करते हैं किंतु यह जो प्रॉपर मेथड है कि कहां पर कंसंट्रेशन करना है। आंखों को परिस्थिति क्या होनी चाहिए और किस तरह से यह मेथड को डेवलप करना है इसको हम सिस्टमेटिक नहीं सीखते। इसलिए यूजुअली क्या होता है? आंख बंद कर दिया और सीधा अपने मन को यहीं पे आंखों के सामने ही केंद्रित करना शुरू किया। वि इज एक्सट्रीमली डेंजरस। यदि आंख बंद करते हैं तो होगा क्या? यह जितना भी रजस है अपने मन में वह रिलीज होगा और इतना उथल-पाथल मचाएगा मन के भीतर में कि अच्छा है कि लोगों की ध्यान करने की कैपेसिटी ज्यादा नहीं। 5 मिनट, 10 मिनट, 20 मिनट एट द मोस्ट आधा घंटा। आधा घंटा ध्यान करेंगे कोई गलत ध्यान भी किया तो कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं यहां पे एक इंस्टट्यूट में गया था कॉलेज में तो वहां पे एक लेडी थी हेड ऑफ डिपार्टमेंट एचओडी इलेक्ट्रिकल एंड कम्युनिकेशन। तो वह मुझे बता रही है कि किसी ने उनको ध्यान करना सिखाया और यहां पर आंख भ्रू मध्य पर ध्यान करना है आंख बंद करके तो मैं काफी लंबे समय से यह ध्यान कर रही हूं। तो मैंने कहा देखिए आपकी मेथड गलत है। यदि आप ऐसा करेंगे ना तो बड़ा नुकसान होने की संभावना है। तो उन्होंने कहा कि मैं तो लंबे टाइम से कर रही हूं। ऐसा नुकसान तो कुछ हुआ नहीं। मैंने कहा वह सिर्फ इसीलिए कि ज्यादा से ज्यादा 15 से 20 मिनट आप बैठती होंगी। उससे ज्यादा नहीं। ऐसा करने से कोई नुकसान नहीं है। देखिए गलती करने से प्रॉब्लम कब स्टार्ट होगा? जब हम 1 घंटे से ज्यादा ध्यान करेंगे। अच्छा करने से फायदा कब स्टार्ट होगा? जब हम 1 घंटे से ज्यादा ध्यान करेंगे। यह जो हम 5 मिनट 6 मिनट बैठे वह कुछ नहीं है। ध्यान करना है तो मिनिमम 1 घंटा करना है। एक घंटा तो सिर्फ मन को सेटल होते है। उसके बाद में तो असली मेडिटेशन स्टार्ट होता है। तो अभी तो यह ऑनलाइन क्लास है। अपना समय लिमिटेड है। बोल के हम लोग मुश्किल से 5 मिनट, 6 मिनट, 8 10 मिनट करेंगे। किंतु एक बार यहां से मेथड आप सीखें तो फिर जब आप अपने समय के अनुसार जब आपके पास में सुविधा हो उस समय आप जब ध्यान करें तो 1 घंटे से ज्यादा ध्यान करेंगे तभी उसका फायदा और नुकसान समझ में आएगा। गलत तरह से करते हैं तो नुकसान भी 1 घंटे के बाद में ही पता चलना शुरू होगा। यदि सही तरीके से करते हैं तो फायदा भी 1 घंटे के बाद में ही मिलना शुरू होगा। तो यह एक बैकग्राउंड हो गया। फिर से मैं कहता हूं आंख कभी भी पूरी बंद मत कीजिए। आंख बंद करने के बाद में क्या होता है? आपका मन जो है रजस से भर जाता है। दुनिया भर का वो सब इधरउधर फेंकेगा। और इतना जोरों से बिजली की आवाज हुई सुनाई दी बहुत जोर-जोर से बिजली चल रही है। सो होगा क्या कि इवन यदि मैं इमेजिनेशन भी करता हूं ना आंख बंद करके मान लीजिए 100% मेरी आंख बंद है। मैं यदि कुछ देखता भी हूं ना कुछ इमेजिनेशन भी करता हूं ना वह राजसिक ही होगी। मान लीजिए मैं ठाकुर के कमरे में बैठा हूं। ऐसा मैं इमेजिनेशन करता हूं 100% आंख बंद करने के बाद में तो वह भी क्या है ना राजसिक इमेजिनेशन है वह सात्विक इमेजिनेशन नहीं है वो ध्यान नहीं है ध्यान तभी होगा जब मैंने जिस तरह से मैंने मेथड बताई आप आंखों को झुकाए उसकी वजह आप आंखों को पूरा बंद कर लीजिए फिर हल्का सा खोलिए तो ऐसा करने से क्या होगा कि आपका मन जो है ना रजस से भर नहीं जाएगा और आप प्रॉपर ध्यान भी कर पाएंगे और आप इसको हृदय में कंसंट्रेट कर पाएंगे। मान लीजिए यह हो गया विष्णु योग जैसे ठाकुर ने कहा मान लीजिए शिव योग करना। मान लीजिए शिव योग करना है तो क्या है कि हम यदि अपने स्वस्वरूप का भी चिंतन करते हैं तब भी आंखों को हल्का सा खुला रखना है। इससे होगा क्या कि हमारा जो स्वरूप है उसको हम देख पाए समझ पाए। देखिए अभी मैं जो ध्यान कर रहा था मैं शिव ध्यान कर रहा था। इस अर्थ में कि हृदय में नहीं यहां पर भ्रू मध्य में ही या तो फिर सर के भीतर में ही अपना खुद का स्वरूप चिंतन करते-करते मैं वही कर रहा था। किंतु इवन देन मैंने अपनी आंखों को थोड़ा सा खुला रखा था। जैसे मैंने कहा एक बार आंख बंद कर दिया फिर हल्का सा खोल दिया। तो शिव योग करें ना कि विष्णु योग करें। आंखों को हल्का खुला रखना ही है। जैसे ही आंख बंद करेंगे ना होगा क्या? हम फेंटसी वर्ल्ड में चले जाएंगे। इसके बाद में इवन यदि हम दक्षिणेश्वर की भी कल्पना करते हैं। इसके बाद में इवन बेलूर मठ की भी कल्पना करते हैं तो मन शायद एकाग्र होगा किंतु वह ओजस रिलीज नहीं होगा। हमेशा याद रखिए ध्यान सक्सेसफुल है। उसका साइन क्या है? ओजस। ओजस क्या है? एक तरह का आनंद, एक तरह का उत्साह, आध्यात्मिक आनंद, आध्यात्मिक उत्साह जो कि ध्यान करने से रिलीज होता है। एक आप कोई भी पेड़ की लकड़ी को आप काट करके छोटी सी लकड़ी उसको आप घिसते रहिए, घिसते रहिए। क्या होगा? ज्यादा से ज्यादा यदि लकड़ी जलना शुरू होगी तो धुआं निकलेगा। उतना ही बदबू आएगी और कुछ नहीं होगा। किंतु चंदन की लकड़ी को आप घिसिए उसमें से खुशबू आना शुरू हो जाएगी। तो ध्यान भी ऐसा है। नकली ध्यान जो है वह एक सामान्य पेड़ की लकड़ी को घिसने के बराबर है। उसमें से ज्यादा से ज्यादा क्या होगा कि धुआं ही निकलेगा घिसने के बाद में। अर्थात कि आउटकम क्या है? तो वह है रजस। और चंदन की लकड़ी है। चंदन की लकड़ी को आप घिसिए। देखिए आउटकम क्या है? तो वो है खुशबू। वो है आनंद आध्यात्मिक आनंद। तो यह है हमेशा ख्याल में रखिए कि सही मेथड क्या है? गलत मेथड क्या है? फिर और गीता चेंटिंग का महात्म क्या था? वो भी हमने देखा। हम जब नजरों को झुकाते हैं, अर्ध निमिलित लोचन से ध्यान करने का प्रयास करते हैं। मन दौड़ता है 1000 डायरेक्शन में। उस समय मन को बार-बार पकड़ कर के एक जगह पर बिठा के रखना। उसके लिए आपको चाहिए संकल्प शक्ति। विल पावर आत्मश्रद्धा। तो यह विल पावर या तो संकल्प शक्ति या तो आत्मश्रद्धा कहां से आएगा? तो यह गीता चटिंग करके जैसे ही आपकी वाणी है, आपकी यह स्वर है, यह पवित्र मंत्रों का उच्चारण करेंगे, यह एक पवित्रता आपके चारों ओर फैलनी शुरू होगी। ध्यान करने के समय इस पवित्रता को इंटरनलाइज कीजिए। इस पवित्रता को अपने भीतर में प्रवेश करवाइए। यही पवित्रता एक तलवार की तरह एक शस्त्र बनके आपके हाथ में रहेगी। उस शस्त्र से, उस विल पावर से आप मन को एकाग्र कर सकते हैं। तो यहेंस है गीता चटिंग का और ध्यान करना है। हृदय में भी कर सकते हैं। सर के भीतर में भी कर सकते हैं। ख्याल रखिए कि दोनों ध्यान का स्वरूप क्या है? हृदय में ईश्वर की कल्पना करनी है। सर के भीतर में सहस्त्रार में स्वस्वूप की कल्पना करनी है। स्वस्वूप की कल्पना या तो शिव ध्यान शिव योग मुश्किल है। प्रारंभ में मत कीजिए। प्रारंभ विष्णु योग से ही कीजिए। तो यह फिर से गीता चटिंग

गीता पाठ

श्लोक नंबर 11 अथै तदप्य शक्तोसी अथै तदप्य [गाना गाने की आवाज़] शक्तोसी करतुम मध्यमाश्रितः करतुम मध्यग माशितः सर्व कर्म फलत्यागम ततः कुर यतात्म वान ततः कुर यतात्मवान श्रेय ही ज्ञानमभ्यासात श्रेय ज्ञानमभ्यासात ज्ञान ध्यानम विशेष्यते ध्याना कर्म फल त्याग ध्याना कर्म फल त्याग त्यागा रनंतरम त्यागा [संगीत] रंतम अध्वष्टा सर्वभता नाम अध्वष्टा सर्वभता नाम मैत्र करुण एवच निर्ममो निरहंकार सम [संगीत] दुख सुख क्षमी सम दुख सुख क्षमी संतुष्ट सततम योगी यतात्मा दृढ़ निश्चयः यतात्मा दृढ़ निश्चय मर्पित [संगीत] मनो बुद्धि मर्पित मनो बुद्धि यो भक्त समे प्रिय यस्मानो द्विजते लोको यस्मानो [संगीत] द्विजते लोजते चयः लोजते चयः हर्ष भयो द्वेग हर्षमर्ष भयो द्वेग मुक्तो यह सच में प्रिय मुक्तो में यह मुक्तो यह सच में प्रिय अनपेक्ष सुचि दक्ष अनपेक्ष सुचिर दक्ष उदासीनो गतव्यथः उदासीनो गतव्यथः सर्वारंभ परिित सर्वारंभ परित्यागी यो भक्त समय प्रिय प्रिय यो भक्त समे प्रिय यो न हश्यति नष्टि यो नशति न द्वष्ट [संगीत] न शोचति न काक्षति शुभा शुभ परित्यागी भक्ति मान्य समय प्रिय समह शत्रो च मित्रेच समह शत्रो चमित्रे च तथा मानापमानयो तथा मानापमानयो हो शीतोष्ण सुख दुख ु शीतोष्ण सुख दुखेशु समह संग [गाना गाने की आवाज़] विवर्जितः समह संग विवर्जितः तुल्य निंदा स्तुतिर मौनी [संगीत] संतुष्टो ये न के न चित संतुष्टो ये न के नचित अनिकेत स्थिरति अनिकेत स्थिरती भक्तिमान में प्रियो नर भक्तिमान में प्रियो नरह येत धर्म्याम [संगीत] येतो धर्म्यामदम यथोम [संगीत] परपासते यथोक्तम पर्यपासते श्रद्धा मत परमा श्रद्धा [संगीत] मत परमा भक्ते तव में प्रिया भक्ते तव में प्रिया ओम तत्सद इति ओम तत्सत इति श्रीमद् भगवत गीता [गाना गाने की आवाज़][संगीत] सुमद् भगवत गीता सु उपनिषद सु उपनिषद सु ब्रह्म विद्यायाम ब्रह्म [संगीत] विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्णार संवादे श्री कृष्णार संवाद भक्ति योगो नाम द्वादशोध्याय वेरी गुड अगेन फिर से ध्यान

ध्यान अभ्यास

आंखें पूरी बंद करके हल्की सी खोल [संगीत] बोल दीजिए हृदय में फिर से दक्षिणेश्वर चले जाइए। वही ठाकुर का चीर परिचित कमरा मास्टर महाशय जो कथामृत में वर्णन करते हैं वो लिखते हैं वही चिर परिचित कमरा जैसे कि जन्म जन्मांतर से हम [संगीत] ठाकुर के उसी कमरे में विराजमान है। युग युग से हम वहां पर विराजित है। ठाकुर है सामने। अपनी खाट [संगीत] के ऊपर में मां भी खाट के ऊपर बैठी है। [संगीत] सभी गुरु भाई फर्श पे हैं। बैठे हुए हम भी फर्श पर बैठे हैं गुरु भाइयों के साथ में। छोटा सा दिया टम टम करके जल रहा है। सुधिंग एबर लाइट मन को शीतलता प्रदान करने वाली [संगीत] दिए की ज्योति ठाकुर के श्री वदन को मुखारविंद को प्रकाशित कर रही है। आरती के बाद का समय है। पूरा विश्व जैसे कि गंभीर प्रशांति में डूब गया है। [संगीत] गंगा का कल कल निनाद हवा में पेड़ों की आवाज, पत्तों की आवाज। इसके अलावा जगत निस्तब्ध है। [संगीत] शांत। हृदय में से ओजस प्रगटित हो रहा है। [संगीत] दिए की [संगीत] ज्योति की तरह यह ओजस मेरे पूरे देह में तरंगाई होकर के [संगीत] मेरे संस्कारों को शुद्ध निर्मल कर रहा है। मेरा मन शांत [संगीत] जगत में सभी के प्रति मेरा सद्भाव सबके [संगीत] कल्याण की कामना किसी के प्रति द्वेष नहीं, [संगीत] किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं, मन जैसे कि अष्टपाश से मुक्त हो गया है। [संगीत] मुक्ति प्राप्त हो चुकी है। ईश्वर [संगीत] के दर्शन प्राप्त हो चुके हैं। [संगीत] ब्रह्म ज्ञान की प्रशांत शांति मेरे हृदय को भरपूर कर दे रही है। चेहरे पर हल्की हंसी होनी चाहिए क्योंकि हृदय में किसी भी तरह के कुसंस्कार अभी नहीं रहे ध्यान करके के शिशु की तरह पवित्र मन मेरा हो चुका है। [संगीत] लाली दी को रिक्वेस्ट करता हूं स्तत्र पाठ करने के लिए। आप सभी ध्यान करते रहिए और साथ में ही स्तत्र पाठ का श्रवण कीजिए।

स्तोत्र पाठ

ब्रह्मा की ते ओम ब्रह्म वाचन ओम वम स्वाहा स्वधा बम बस स्वरा भाव त मात्रा अिकाच तमे सा तम देवी जनते सर्वम तते जगत त्यते देवी तसते चस सर्व विष्ण तथा रूप जगत महा महा विद्या महा माया महा महा मो भवती महा देवी महासु प्रम सर्वस्य विधाने काल महत मोह सदा त श्री त बुद्ध बोधा लक्षणा लज्जा पुष्टि तथा दुष्ट शनी कोरा गगिनी चक्र तथा शनी चाल भूषण के परिश्यति सुंदरी पराम परमा तमेव परमेश्वरी य कचित वस्तु सदस सदवा तस सर्वस्य [गाना गाने की आवाज़] या शमी के सुसेया जगत सष्टा जगत सो बसता कस्ताम विष्णु शरीर ग्रहम कार्यवास्तु शक्ति मार्कम प्र च स्वास क्रियतास हत महामस प्रियतास में तो महाम ब्रह्मा करती देवी स्तुति समाप्त ओम शांति शांति शांति हरि ओम ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: ध्यान करते आंख पूरी बंध हो जाय तो क्या करे?

ठीक है। आंख आप बंद करें फिर थोड़ा सा खोलें। ठीक? यह टेक्निक है। अभी मान लीजिए पूरी बंद हो जाती है तो आपको अलर्ट रहना है कि थोड़ा सा फिर से खोल देना है। पूरा बंद रहे ऐसा कभी मत कीजिए।

प्रश्न: कितना समय और कैसे ध्यान करे?

एक घंटा मिनिमम आपको बैठना है। तो आप कैसे बैठेंगे वो आपके ऊपर है। सोफा पर बैठ सकते हैं। लाटू महाराज तो लेटे ध्यान करते थे तो वह भी एक है। एक घंटा मिनिमम बैठने की किस तरह से बैठे वह आपको देखना है। उसके लिए कोई और कोई नियम नहीं है। [संगीत]

प्रश्न: नेत्र यदि आधे खुले रखने है तो क्या सामने ठाकुर का फोटो रख सकते है?

कर सकते हैं। किंतु यदि आप आंख बंद कर जैसे आप अपनी नजरों को झुकाएंगे ना तो आपको बहुत कुछ दिखेगा। किंतु नजरों को एक बार बंद कर दिया और फिर हल्का सा खुला रखा ना आपको ज्यादा कुछ नहीं दिखेगा। थोड़ा सा ही दिखेगा तो उस समय नजर के सामने ठाकुर का फोटो रखें तो उसमें गलत कुछ नहीं है। रख भी सकते हैं नहीं भी रख सकते क्योंकि आपका कंसंट्रेशन जो है वैसे ही आपके हृदय पर रहेगा। देखिए यहां पर एक लड़का आता है। ध्यान करने के समय मैंने कहा कि नजरों को झुका के रखिए। तो मुझे कहता है कि महाराज मैं आंखों को झुकाता हूं। इस तरह से मुझे थोड़ी घबराहट होने लगती है। तो मैं क्या करूं? मैंने कहा टेंशन मत लो। देखो कि ऐसा कोई दो-तीन उपाय है। प्राकृतिक जगह पे जाकर बैठना है। छत के ऊपर में पेड़ है, वृक्ष है, पौधा है, फूल है। उस पे नजर को केंद्रित करो। नजर उसके ऊपर है, मन है हृदय पे। धीरे-धीरे देखोगे कि आंखें क्या देखती है, उसका कोई मैटर नहीं करता। आंखों को बंद करने की तुमको कोई जरूरत नहीं यदि तुमको घबराहट होती है तो राइट तो आंखें क्या है खुली रखें अर्धनि रखें पूरी बंद करके हल्की सी खोले यह शुरू शुरू में आपको यह रहेगा कि मैं क्या देख रहा हूं आंखों की पोजीशन कैसी है किंतु जैसे-जैसे मन एकाग्र होता जाएगा ना आप देखेंगे कि बाह्य विश्व फिर अदृश्य हो जाएगा इवन दो ठाकुर की वह कहानी है कि एक आदमी मछली मछली पकड़ रहा है। उसका पूरा मन उसमें लग गया। फिर एक आदमी पीछे से जा रहा है। वह उसको पूछता है कि अरा वह एड्रेस कहां पे है? तो यह जो मछली पकड़ रहा है वो इतना तन्मय है मछली पकड़ने में कि वो सुन ही नहीं पा रहा है ना? मछली जैसे पकड़ गई फिर वो वो आदमी को एड्रेस बताने को दौड़ता है। तो प्रारंभ की 5 मिनट 10 मिनट ही यह सब हमको लगता है कि मैं मेरे नेत्र कैसे हैं? मैं क्या देख रहा हूं वगैरह किंतु ऐसे एक बार ध्यान जम गया ना तो फिर कुछ मैटर नहीं करेगा कि आपके नेत्रों की पोजीशन या तो आप क्या देख रहे हैं। ओम