Invocation
ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र चैप्टर है प्राण टान अर्थात की प्राणों का आकर्षण अंतर का आकर्षण ठाकुर और मां के बीच में जो अद्वितीय दिव्य प्रेम था उस प्रेम का एक आलेख एक चितार हमको इस चैप्टर में मिलता है जो टॉपिक का हम डिस्कशन कर रहे थे कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर के प्रति मां की जो शरणागति थी ठाकुर के साथ में मां का जो एकी कृत्य था जो संपूर्ण रूप से जैसे कि एक अंतरात्मा दो देह इस तरह से मां और ठाकुर का था जैसे कि एक ही प्राण है दो शरीर है तो ठाकुर की सेवा करने के लिए ही जैसे कि मां जगदंबा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी और गंभीरानंद जी महाराज एक बड़ा ही सुंदर रूप से जो लिखते हैं कि मानवे सेवा र एकटा धारा छ देवता रो पजार विधिया छ मनुष्य की
dakshineshwar kali temple
जद सेवा करनी है तो उसकी भी एक विधि है और यदि देवता की पूजा करनी है तो उसकी भी विधि है जैसे कि शरत महाराज शरत महाराज का देखिए कि उनका जो सेवा भाव था बड़ा ही
Swami Saradananda
प्रबल था अ एक समय था कि जबक ये योगेन मां उनके दो छोटे-छोटे पोते थे तो अभी क्या है कि उनकी लड़की का जब देहांत हो गया तो यह लड़की के पुत्रों को कौन संभालेगा तो जब
Yogen ma
योगेन मां उद्बोधन में रहती थी तो यह दोनों छोटे बच्चों को भी अपने साथ में उद्बोधन में लेकर आई अब यह दोनों लड़के शरद महाराज के कमरे में रात को सोते थे अभी होता ऐसा कि दोनों बच्चे थे और उनको रात को ठंड लगती तो शरद महाराज क्या करते कि वह खुद शरद महाराज खुद मोटे सोटे हैं एकदम उनका जो शरीर था स्थूल काय शरीर था और शरद महाराज को गर्मी ज्यादा लगती किंतु इसके बावजूद कि उनको गर्मी लग रही है और बच्चों को ठंडी लग रही है वह जितने भी खिड़की दरवाजे थे अपने कमरे के सब बंद कर देते वह जब रा को सोते उनको पूरा पसीना हो जाता किंतु यह लोग वह देखते कि बच्चे को किसी भी तरह से मुश्किल ना हो देखिए कि यह हो गया सेवा भाव अ रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी थे शरत महाराज मां के द्वारी थे अर्थात कि मां जब भी कलकत्ता आती के इवन जयराम बाटी में होती तो मां का जितना भी सेवा कार्य है सब कुछ तो शरत महाराज के हस्तक था प्लस उद्बोधन कार्यालय चलाना था प्लस इतने सारे डिवोटा आते थे थे महाराज के पास में ऊपर में से लीला प्रसंग लिखते थे तो इतना सारा कार्यभार शरत महाराज के सर के ऊपर में था और उनको तो नेचुरली हम लोग कुछ नहीं करते दिन में ज्यादा फिर भी हमको तो रात की अच्छे से नींद चाहिए यदि रात को ठीक से नींद नहीं मिली तो हमको पता है कि हमारा दिन कितना खराब जाता है वह रेस्ट नहीं मिलने की वजह से तो किंतु यहां पर देखिए शरत महाराज इतना सब कुछ दिन के दौरान कर भी रहे हैं और फिर भी रात को यह चिंता है उनको कि यह जो दो लड़के हैं उनको जद ठंड ना लग जाए तो दरवाजा बंद करके खिड़की बंद करके सोएंगे अपने को पूरा पसीना हो जाएगा उनको ठीक से नींद नहीं आएगी सुबह को अर्ली मॉर्निंग न 3:30 को उठ कर के जप करने के लिए ध्यान करने के लिए बैठ जाना है वो सब वो करेंगे किंतु सबसे पहली फिक्र है इन बच्चों की शरद महाराज का जब देहांत हुआ था महासमाधि हुई थी उस के बाद में जब उनकी जो डायरी है डायरी खोल कर के देखा गया तो उसमें कितने सारे गरीब है विधवा हैं अनाथ बच्चे हैं उनका पूरा लिस्ट था और शरद महाराज उनके घर जाकर के किसी को पैसों की सहाय करते किसी को सब्जी धान वगैरह देने की जदी है उनको अभाव घर में तो वह देते कोई यदि बीमार हो गया है तो खुद जाकर के उसकी सेवा सुश्रुषा करते तो यह हो गया कि सेवा मनुष्य की किस तरह से की जाए उसका एक सर्वोच्च उदाहरण ऐसा ही एक सुंदर उदाहरण जयराम बाटी में है कि उस समय वहां पर एक विधवा थी और विधवा का एक छोटा बच्चा था जयराम बाटी गांव में रह रहे हैं दोनों अभी ऐसा हुआ कि विधवा के कान में व विधवा
Jayrambati
की उम्र भी बड़ी छोटी थी और बच्चे की उम्र भी बड़ी छोटी थी अभी ऐसा हुआ कि कान में इंफेक्शन हो गया इस लड़की को तो अभी क्या करेंगे कि अभी आज की तरह तो सब जगह पर डिस्पेंसरी हॉस्पिटल वगैरह तो नहीं है ईएनटी स्पेशलिस्ट को उसके पास जाकर के ट्रीटमेंट करवाए वह बेचारी छोटा बच्चा है उसको खिलाने पिलाने के लिए मेहनत मजदूरी तो करनी ही पड़ेगी तो वह मजदूरी किए जा रही है यहां पर कान का इंफेक्शन इतना बढ़ गया कि कान में से कीड़े निकलना शुरू हो गया पस निकलना शुरू हो गया फिर आखिरी एक दिन ऐसा हुआ कि वह बेचारी अभी घर से बाहर भी नहीं निकल पा रही है और उसका छोटा बच्चा खाना नहीं मिलने की वजह से सतत रो रहा है और अभी आसपास के लोग भी पता नहीं ऐसा टेंशन में थे कि इसका इंफेक्शन शायद हमको लग जाए बोलकर के उसके कुटिया में कोई जाता भी नहीं था बच्चे की संभाल रखने वाला भी कोई नहीं तो यहां पर मां को पता चला तो फिर मां ने यह सब सन्यासी संतान थे उनके साथ में जो रहते हैं उनको कहा कि देखो यह लड़की की बेचारी की इतनी दुरावस्था है तुम तुम लोग जद सेवा नहीं करोगे तो कौन करेगा तो फिर यह जो जो सन्यासी थे महाराज वह खुद गए सेवा करने के लिए नाक के ऊपर में वह डिस इफेक्ट डाल कर के एक गमछा जो है नाक के ऊपर में बांध देना पड़ा कमरे व कुटिया में जाकर के इतनी बदबू आती थी किंतु फिर भी कुटिया में गए यह गरीब विधवा की सेवा की बच्चे को खिलाया पिलाया उसको कैसे भी करके शांत किया उसका वह जो कान में जो इंफेक्शन हो गया था तो पानी डाल के ना ऐसा करके उसको साफ किया किंतु प्रॉब्लम यह था कि इंफेक्शन इतना बढ़ गया था कि अभी इस विधवा को बचने की कोई आवश्यकता नहीं कोई संभावना नहीं थी तो अभी जैसे ही उसका मृत्यु हुआ तो उसका जो आखिरी कर्म जो करना पड़ता है श्राद्ध है अग्नि संस्कार है वह सब सन्यासी महाराज ने किया फिर जब वह मां के पास में आखिर में गए तो मां ने कहा कि देखो इस बेचारी का तो कोई नहीं था तुम लोग नहीं होते तो उसका बच्चा भी मर जाता बिना वोह केयर किए हुए और बेचारी को तड़पना भी कितना पड़ता जीवन के आखिरी समय में किंतु तुम लोगों ने जैसे उसी के बच्चे की तरह उसी के लड़के की तरह तुम लोगों ने उसकी सेवा की है तो यह हो गया कि मनुष्य की सेवा किस तरह से की जाए उसका एक जिसको कहते हैं ना कि हाईएस्ट एक स्टैंडर्ड राम कृष्ण संघ में हमने दिखाया है यह जैसे देखिए प्लेग जब कोलकाता में प्लेग प्रारंभ हुआ उस समय कितने ही लोग कलकाता छोड़ कर के जा रहे हैं उस समय यह स्वामी जी ने स्वामी विवेकानंद ने अखंडानंद जी को कहा कि यहां पर रिलीफ कार्य करना होगा तो यह
Swami Akhandananda
अखंडानंद जी है फिर यह निवेदिता है यह सब लोगों ने मिलकर के सेवा कार्य यह जो प्लेग के रोगियों का है
nivedita Plague relief
यह प्रारंभ कर दिया अभी प्लेग के रोगी की सेवा करना कितना डेंजरस है जो क्वालिफाइड डॉक्टर होते हैं लोग भी 10 बार सोचते हैं कि प्लेग के रोगी के पास में जाए कि ना जाए क्योंकि यह तो बड़ा ही संक्रमित रोग है बड़ा ही इनफेक्शियस है और एक बार आपको लग गया फिर उस समय तो बचने की कोई संभावना नहीं थी इसके बावजूद यह लोग गली गली में झोपड़ी झोपड़ी में जाते थे घर-घर जाते थे रोगियों की सेवा करते थे और इस तरह से और अखंडानंद जी के सेवा भाव के तो उदाहरण बहुत सारे हैं वहां पर बरहमपुर है कि फिर यह सारगामा जहां पर भी
Akhandanandaji with Orphans
उन्होंने यह दुष्का या तो अकाल रिलीफ किया अनाथ बच्चों को रखा अपने पास में अनाथा आश्रम चलाया सब जगह पर देखिए कि अखंडानंद जी के बारे में इस तरह के विवरण है कि जैसे कि पूरा दिन भर 48 अवर्स लिखा है एक जगह पर कि महाराज को जब आवश्यकता आन पड़ी यह रिलीफ वर्क इतना जोरशोर से चल रहा था 48 आवर्स बिना खाए बिना सोए महाराज जी काम करते रहे महाराज जी ने अपने हाथों से लिखा है अपनी स्मृति कथा में कि घंटों के बाद घंटों में माटी काटता था अर्थात कि वो जो गड्ढा जो बनाना होता है किसी भी कार्य से हो तो माटी काटनी पड़ती है वो पावडे से उस वगैरह से तो गड्ढे गड्ढा मने घंटों के भर घंटों मैंने वो जो शॉर्ट पेंट अर्थात कि वो जो शॉर्ट्स आता है ना उसको पहन कर के मैंने गड्ढा बनाया है गड्ढा खोदा है तो घंटों के घंटों काम करते रहना सोना नहीं खाना नहीं यह जो मनुष्य सेवा का जो हाईएस्ट स्टैंडर्ड है अपने संग में है साथ-साथ में ही देखिए कि देवता की कैसे सेवा की जाए तो फिर यह शशि महाराज उसका उदाहरण है शशि महाराज की सेवा की कितनी सारी कहानियां है ये जो फेमस घटना कि एक बार शशि महाराज तो पता है हमको कि वह भिक्षा करके वराह नगर मठ की यह सब बातें कि वराह नगर मठ में यह गुरु भाइयों को खाने को नहीं मिलता था किंतु फिर भी यह शशि महाराज क्या करेंगे कहां से भी भिक्षा
Swami Ramakrishnananda (Shashi mj)
करके किसी भक्त को कह के गुरु महाराज का अर्थात श्री श्री ठाकुर के भोग की नैवेद्य की व्यवस्था करते थे और अभी क्या करेंगे कि नैवेद्य जब अर्पण हो गया तो खाना तो गुरु भाइयों को ही है किंतु स्वामी जी नरेण को थोड़ा सा उस समय यह लगने लगा कि हम तो सन्यासी है आज यहां पे है कल पता नहीं कहां पे तो इस तरह से यदि हम ठाकुर की सेवा का प्रचलन एक बार करेंगे तो फिर इसको तो परमानेंटली करना पड़ेगा इसको आप कभी स्टॉप नहीं कर सकते देवता की सेवा का तो यही एक नियम है प्रारंभ यदि किया तो इसका अंत नहीं है हमेशा के लिए सेवा करनी पड़ेगी यह ऐसी ही बात है जब मां की महासमाधि हुई थी और बेलूरमठ में मां की चीता जलाई जा रही थी उस समय कुछ-कुछ
Ma Sarada Samadhi Mandir
भक्तों ने क्या किया चीता में से राख है न कि फिरी ये जो अवशेष है वगैरह कुछ सिलेक्ट करना उन्होंने शुरू कर दिया कलेक्ट करेंगे और अपने घर में रखेंगे तो साथ-साथ में ही शरत महाराज ने बड़े ही गंभीर शब्दों में एकदम उच्च स्वर से कहा कि देखो जो लोग मां की अस्थि है ना कि मां की राख जो है चीता की अपने पास में रखते हैं उसको प्रतिदिन सेवा करनी होगी प्रतिदिन पूजा करनी होगी एक दिन भी पूजा नहीं करोगे तो महापाप लगेगा ऐसा स्वर में शरत महाराज ने कहा कि जितने बहुत सारे लोगों ने जिन्होंने राख या अस्थि लिए थे सब वापस रख दिए चीता में क्योंकि यदि देखिए कि एक तो एक शौक होता है ना कि हां मेरे पास में मां की अस्थि है मेरे घर में मां की राख है चीता की वह सब बोलना तो अच्छा लगता है किंतु जब सेवा नहीं करके जब पाप आन पड़ेगा सर के ऊपर में तो वह कौन भुगते का इससे तो बेटर है कि वह नहीं ही रखे तो यहां पे भी यह स्वामी जी और शशि महाराज इन दोनों के बीच में कभी-कभी वाद विवाद हो जाता था कि ठाकुर की अस्थि तो रखे हैं ठाकुर की अस्थियों की
Swami Vivekananda
प्रतिदिन पूजा भी होती है किंतु फिर पूजा करने के लिए जो विधि नियम उपकरण वगैरह जो लगना पड़ता है जो लगेगा उसका जुगाड़ ये फकीर सन्यासी कहां से करेंगे तो फिर एक बार दोनों में वाद विवाद हो गया स्वामी जी ठाकुर के कमरे की ओर जा रहे हैं अभी और कहते हैं कि तुम्हारे ठाकुर को मैं फेंक दूंगा ऐसा करके अभी क्या है देखिए कि ये तो सब लोक शिक्षा के लिए है ना ऐसा तो है नहीं कि ठाकुर का जो पट है ठाकुर का जो ये है आत्माराम का कोटा स्वामी जी जिसको कहते थे जिसमें ठाकुर की अस्थियां संरक्षित है वो जो घट के भीतर में उसको स्वामी जी कहते थे आत्माराम का घट अभी भी बेलूरमठ में जाएंगे आप खैर आपको तो देखने को नहीं मिलेगा हमको भी नहीं मिलता है क्योंकि क्या है पता है बेलूरमठ का जो मुख्य मंदिर
Belur Math Main Temple
जो है मेन टेंपल ठाकुर का उसमें जब ठाकुर का यह जो मूर्ति है संगे मरमर का मार्बल का उसके नीचे में ग्राउंड फ्लोर पे
Thakur in Belur Math
ग्राउंड फ्लोर नहीं कहेंगे उसको कहेंगे कि वोह जो यह है बेसमेंट बेसमेंट में एक कमरा बनाया गया है जो ऊपर में जो कमरे की साइज है नाट मंदिर की उसी साइज का एक वहां पर है और फिर उसके भीतर में एक छोटा सा एक यह बना कर के प्लेटफार्म बना कर के उसमें यह गाड़ दिया गया है फिर उसी से यह जो पूरा जो स्तंभ है वो स्तंभ ऊपर की ओर जाता है ठाकुर की वेदी की ओर उस वेदी के ऊपर में ठाकुर को स्थापित किया गया है तो हम लोगों के लिए मैं जब बेलूर मठ में था तो एक नई प्रथा प्रारंभ की की गई थी कि ठ ठाकुर के सामने बैठ कर के संध्या के समय तो जब ध्यान करना मुश्किल है सुबह को तो हम लोग मंदिर में ही मेडिटेशन करते हैं मंगल आरती के बाद में क्योंकि भक्तों को तो उस समय आने की मनाई होती है ज्यादातर भक्त तो 7:00 बजे के बाद में जो गेट खुलता है 6:30 के समय में उसी टाइम डिवोटा आएंगे उससे पहले नहीं तो क्या है कि मंदिर में बैठ कर के मेडिटेशन करना जब ध्यान करना वो हमारे लिए बड़ा आसान होता है किंतु शाम को तो डिवोर्स बैठे होते हैं है तो शाम को फिर मंदिर में कैसे मेडिटेशन करेंगे तो फिर ये जो बेसमेंट जो है वो बेसमेंट हम साधुओं के लिए खोल दिया गया था तो वहां पर देखिए ऊपर में ठाकुर की मूर्ति है श्री मूर्ति जिसके सामने बैठ कर के हम लोग जप करेंगे और बीच-बीच में ठाकुर का निरीक्षण करेंगे और बेसमेंट में है कि ठाकुर का आत्माराम का वह गट जिसके भीतर में ओरिजनली जो कि वह अस्थि चुरा कर के जिसके भीतर में रखी थी शशि महाराज और निरंजन महाराज ने वो अस्थियां वहां पर गाड़ी गई है तो उसके सामने बैठ कर के आपको जब ध्यान करना है शाम के समय तो यहां पे किंतु क्या है कि एक तो एक लोक शिक्षा की बात है कि ठाकुर की अस्थि रखी है तो सेवा का जो स्टैंडर्ड इतना हाई होना चाहिए हमेशा के लिए रामकृष्ण संघ के डीएनए में जैसे कि यह बात लिखी जानी चाहिए कि ठाकुर की सेवा में कभी भी कोई भी गड़बड़ ना हो कोई भी कमती ना हो बाकी जितना भी अपना कार्य है यह रिलीफ वर्क है स्कूल है डिस्पेंसरी है जो कुछ भी है उसमें उतार चढ़ाव आता रहेगा बढ़ता कम होता रहेगा किंतु ठाकुर सेवा एक बार जिस विधि से प्रारंभ की जिस सेंटर में भी हो सब सेंटर में सब तरह से सेवा नहीं होती किसी सेंटर में अन्न भोग दिया जाता है किसी सेंटर में नहीं दिया जाता किसी सेंटर में प्रतिदिन पंचोपचार से पूजा होती है कोई कोई सेंटर में नहीं होती है क्योंकि वहां पर सेंटर ही छोटा होता है जैसे कि मैं लिमडी में था तो लिमडी में प्रतिदिन पंचोपचार से पूजा नहीं होती थी दशो पचार पूजा जो नित्य पूजा जिसको कहते हैं वह प्रतिदिन नहीं होती थी तो क्योंकि मैं अकेला था मुझे अकेला अकाउंट देखना है किचन देखना है और रिलीफ वर्क देखना है सब कुछ मुझे ही अकेले को देखना है मेरे साथ में जो बड़े महाराज थे बापा महाराज वह तो 80 इयर्स के थे तो वह तो कुछ करने वाले नहीं है तो वहां पर वैसे ही एक दो साधु ही रहते थे तो पहले से ही वह प्रथा नहीं थी प्रतिदिन नित्य पूजा करने की किंतु जिस परि जिस आइडियाज लेकर के आपने पूजा का प्रारंभ किया जिस विधि के साथ में प्रारंभ किया उस विधि को फिर कभी नहीं छोड़ना है मान लीजिए अभी एक दिन स्टार्ट किया कि यहां पर अन्न भोग देना है तो एक बार जो प्रारंभ किया अन्न भोग उसको कभी भी आपको छोड़ना नहीं है सतत हमेशा के लिए अन्न भोग देते ही रहना पड़ेगा तो यह जो सब आइडियल है देव सेवा के वह हमारे डीएनए में जैसे कि पूरा गहराई में चला जाए इसके लिए यह सब बाह्य लीला चल रही है स्वामी जी नाराज हो हो कर के ठाकुर के व गर्भ मंदिर की ओर जाते हैं कहते हैं तुम्हारे ठाकुर को मैं फेंक दूंगा यहां पर शशि महाराज भी तो कुश्ती बाज थे वोह भी तो पहलवान थे स्वामी जी को पटक करके जोर से जमीन पर उनके बाल पकड़ करके बालों से पकड़ करके खींच करके बाहर ले आए गर्भ मंदिर से दूर लेकर गए तो यहां पर लाटू महाराज बैठे थे लाटू महाराज
Swami Adbhutananda
कह रहे हैं ठाकुर ने अच्छा किया कि पैसा रख के नहीं गए अस्थि को लेकर के तुम लोग मारामारी करते हो पैसा रख के जाते तो क्या करते तुम लोग तो अब यह बाह्य लीला के माध्यम से किंतु यह दिखाना है कि रामकृष्ण संघ में ठाकुर सेवा का आदर्श कितना उच्चतर है उच्चतम है तो यहां पर गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि देखिए मनुष्य की सेवा की एक धारा है और साथ में देवता की पूजा कैसे की जाए उसकी भी एक विधि है किंतु देवता जब स्वयं मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर आते हैं तो उनकी सेवा कैसे की जाए वो आपको देखने के कौन करेगा किस तरह से करेगा उसके लिए तो फिर मां भगवती को ही स्वयं देह धारण करके जमीन पर आना पड़ेगा और देखिए जब ठाकुर ठाकुर की पूजा हम जब घट में या पट में करते हैं अस्थि में करते हैं तो एक तरह से है और जब जीवंत ठाकुर की पूजा करनी है तो आपको बहुत कुछ सोच समझ करके करना पड़ता है संपूर्ण रूप से निस्वार्थ हो कर के ठाकुर कहेंगे मैं दूध नहीं पिऊंगा मैं भात नहीं खाऊंगा इतना ज्यादा नहीं खाऊंगा तब पटा करके के फुसला करके यहां तक कि झूठ बोल कर के आपको ठाकुर को खिलाना पड़ेगा अभी देखिए कि कोई भी सन्यासी यदि हम जैसे जो सामान्य सन्यासी है उनको यदि इस तरह से कहा जाए कि आप झूठ बोलिए ठाकुर की पूजा के सेवा करने के लिए तो हम तो 10 बार सोचेंगे कि अरे भाई ठाकुर सेवा में यदि झूठ बोलना पड़े उसमें ऐसा कुछ गड़बड़ करना पड़े तो तो हम तो नरक में जाएंगे क्या नरक वास सहन करने के लिए तैयार है उस समय ये जो मुक्ति कामना जो है मुक्ति कामना को भी साइड पर रख देनी पड़ती है जब म ईश्वर मनुष्य देह में जन्म ग्रहण करते हैं उस समय यदि इस मनुष्य रूपी ईश्वर की सेवा करनी है तो यह मुक्ति कामना मेरा आध्यात्मिक कल्याण होगा मैं साधना कर रहा हूं मैं सेवा कर रहा हूं यह अहंकार को भी आपको संपूर्ण रूप से तेज देना पड़ेगा संपूर्ण रूप से आपको विसर्जित कर देना पड़ेगा तब कहीं जाकर के देव मनुष्य रूपी मनुष्य देह में देवता की सेवा होगी और इसके सुंदर उदाहरण भी देखें मां झूठ बोल कर के ठाकुर को खाना खिलाती है कभी-कभी दूध पिलाती है ज्यादा भात खिलाती है यह सब देखा और देखिए यह तो एक स्टैंडर्ड हो गया एक मेनिफेस्टेशन हो गया कि संपूर्ण निस्वार्थ होकर के सेवा अर्थात कि मुक्ति कामना को भी त्याग करके सेवा किस तरह से की जाए इसका एक जद यह उदाहरण है तो दूसरा ही उदाहरण गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं कि जब दूसरी स्त्री भक्त जब ठाकुर के पास आना शुरू हो गई तो उनके मन की ऐसी इच्छा हुई कि वे लोग ठाकुर को आहार करवाए वे लोग ठाकुर के साथ में समय व्यतीत करें वे लोग ठाकुर के सानिध्य में ज्यादा से ज्यादा रहे यहां पर पहले से ही मां शारदा ठाकुर की सेवा कर रही थी तो अभी जब तक मां है तब तक उनको तो यह मौका नहीं मिलने वाला है तो सभी लोगों ने सभी तो नहीं कुछ कुछ लोगों ने इस तरह की कुछ कटो वाक्य है निंदा है इस तरह से मां के बारे में करना शुरू कर दिया यहां पे गोलाप मा थी वो थोड़ी स्वार्थी तो नहीं कहेंगे किंतु गंभीरानंद जी महाराज जैसे कहते हैं कि वह अपने ही भाव में चलना जानती थी दूसरों के मन का भाव नहीं समझ पाती थी ठाकुर ने जब कहा एक दिन तुम खाना लेकर आओ तो उसके बाद में फिर मां समझ गई कि उनके मन की इच्छा है कि वह प्रतिदिन जाए मां अपने हाथों से आहार का जो खाने का थाला था गुलाप मां को दे देती थी गुलाप मां जाकर के ठाकुर के सामने बैठ कर के ठाकुर खाते थे और उनके साथ में वार्तालाप करती थी वैसे ही यह मनो मोहन की मां है उसके मुंह से ऐसा निकल गया कि ठाकुर तो ऐसे त्यागी शवर है त्याग के राजा है और मां किस तरह इतने सब गहने पहन कर के रहती है क्या क्या अच्छा दिखेगा तो अभी गुलाप मां भी उनके मन में भी पता नहीं यह ईर्षा वगैरह किस तरह से चल रही होगी सीधा मां को जाकर के कह दिया कि मनो मोहन की मां ऐसा कहती है कि आप इतने सारे गहने क्यों पहनती है तो यह बात सुनकर के मां को दुख हो गया और मां ने जितने भी यह नथ है यह सब वो जितना भी वह गहने पहनती थी वह सब निकाल दिए बस ठाकुर ने जो मां के लिए स्पेशली जो दो चूड़ियां बनाई थी वो मां ने पहन करके रखी दूसरे दिन जब योगेन मां आई देखा कि अरे मां ने तो सब गहने निकाल दिए हैं मां तो स्वयं लक्ष्मी है बाकी लोगों को यह समझ में नहीं आता बाकी लोगों को इतना ही दिखता है कि हां मैं ठाकुर की सेवा करूंगी मैं ठाकुर के सानिध्य लाभ प्राप्त करूंगी इतना ही दिखता है मां जो स्वयं लक्ष्मी मां के गहने उतार दिए तो यह तो पूरा जगत संसार अंधेरे में डूब जाएगा यदि लक्ष्मी के पास में से अपने गहने छीन लेंगे तो तो फिर योगेन मा ने कैसे भी करके मां को समझा करके मां को फिर से तैयार किया राजी करवाया कि आप फिर से गहने पहनी है किंतु हुआ ऐसा कि माने सब गहने फिर कभी नहीं पहने क्योंकि कुछ-कुछ गहने तो पहने किंतु कुछ ही दिनों के बाद में ठाकुर का कैंसर का रोग प्रारंभ हो गया और फिर उसके बाद में तो ठाकुर की सेवा ठाकुर की चिं में ही गहने पहनने के बारे में मां का कभी मन ही नहीं गया तो यह देखिए कि यहां पर मां का जितना भी आप आचरण देखेंगे कितना संपूर्ण रूप से जैसे कि अपने को विलीन कर दिया है यह जो सती का जो आदर्श है पति का जब देहांत होता है तो पति की चिता के ऊपर में वह अपने को फेंक देती है जीवन त्याग कर देती है तो यह जो संपूर्ण रूप से सती का जो आदर्श कि जो ईश्वर है ईश्वर की सेवा सेवा में संपूर्ण रूप से अपने को विलीन कर दिया संपूर्ण रूप से जैसे कि अपना जो अहम है उसको अग्नि दाह दे दिया उसको चिता के अग्नि के ऊपर में पूरा उसको प्रज्वलित कर दिया जला करके राख कर दिया मुझे ठाकुर की सेवा करनी है व मौका भी यह जो आखिरी एक जो हम सबका होता है हम लोग सब यहां पर क्यों आते हैं आते हैं तो मुक्ति कामना लेकर के ही आते हैं आध्यात्मिक उन्नति हो यह कामना तो एक रहती ही है ठाकुर ने स्वयं कहा था कि मेरी यह वासना थी इच्छा थी कि मैं भक्तों का राजा हूं स्वामी जी कहते थे कि द वे बुद्धा जज अ मैसेज फॉर द इट आई हैव ए मैसेज फॉर द वेस्ट जिस तरह से भगवान बुद्ध के पास में इष्ट को देने के लिए पूर्व को देने के लिए जो एक मैसेज था संदेश था मेरे पास में पश्चिम को देने के लिए एक संदेश है तो किंतु देखिए कि इन लोगों का यह जो इच्छा था कार्य करने का कर्म करने का वह जीवन के आख आखिरी समय वह समाप्त हुआ जब स्वामी जी कैलिफोर्निया से लौट रहे थे आखिरी जर्नी उनकी विदेश की अभी भारत जा रहे हैं उस समय उन्होंने जो पत्र लिखा था उसमें वह कहते हैं कि मैं फिर से वोह नरेण हो गया हूं यह जो पूरे जगत में घूमना वेदांत का प्रचार करना भारत की उन्नति करना यह विधवा है अनाथ गरीब लोगों के लिए कार्य करना एक संघ की स्थापना करना यह जो सब मेरी जितनी भी एंबीशंस थी जितनी भी मेरी कल्पनाएं थी जितने भी मेरे प्रकल्प थे वह सब जैसे कि विलीन हो जा रहे हैं मैं फिर से वही नरेण बन गया हूं जो कि पंचवटी के तले में बैठ कर के मंत्र मुग्ध होकर के श्री राम कृष्ण देव की अमृतवाणी का श्रवण किया करता था तो यह जीवन के आखिर में स्वामी जी इस परिस्थिति पर पहुंचे ठाकुर का खुद का देखिए ठाकुर की एक जो वासना थी भक्ति भक्तो निय थाका भक्ति और भक्त को लेकर के रहना वह जब ठाकुर का हाथ में फ्रैक्चर हुआ था उस समय जब आखिरी आखिरी यह जो समय प्रारंभ हो गया था ठाकुर के जीवन का तब कहते हैं कि देखता हूं कि इसके भीतर में सिर्फ दो ही लोग है एक मां है दूसरा है मां का संतान यह जितनी भी इच्छाएं थी उनकी कि भक्ति और भक्त को लेकर के रहने की यह जो सब बीच-बीच में निर्विकल्प समाधि में चले जाते हैं उस समय जब ठाकुर मां को विनती करते थे कि नहीं मुझे इस लौकिक जगत में ही रखिए मैं तुम्हारा नाम गुण गान कीर्तन करूंगा भक्तों के सा में मैं आनंद करूंगा वो जो आखिरी वासना थी ठाकुर की वह भी तो जैसे कि चली जा रही है किंतु यहां पर मां को देखिए प्रारंभ से ही मां के मन में कुछ भी नहीं था एक इतनी भी वासना या इतनी भी एंबिशन नहीं थी संपूर्ण रूप से निर्वासन यदि कहा जाए अपने संघ में तो वह ठाकुर और स्वामी जी भी नहीं होंगे वो होगी मां बस एक आखिरी ऑब्लिगेशन ठाकुर ने मां के ऊपर में रखा था कि जब देहांत हुआ हुआ ठाकुर का उस समय मां ने भी सोचा मैं यहां पर क्यों रहूं मैं भी जीवन त्याग करती हूं उस समय ठाकुर ने कहा कि नहीं यह योग माया है राधू इसका आसरा लेकर के रहो तुमको जगत
Ma and Radhu
में बहुत सारा कार्य करना है तो जब ठाकुर ने ये आदेश दिया उस समय यह राधू की माया लेकर के मार रही थी इससे पहले और इसके बाद में भी इसके दौरान भी मां के खुद के मन के भीतर में बिल्कुल यह नहीं था इच्छा या डिजायर कि हां मुझे यह करना है या मुझे वो करना है मुझे ठाकुर की सेवा करनी है जो करती थी इतना जी जान लगा कर के करती थी कि जैसे कि उनका अलग अस्तित्व ही नहीं था तो यह है भक्ति की पराकाष्ठा यह है आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च आदर्श तो इस आदर्श के बारे में गंभीरानंद जी महाराज हमको बता रहे हैं इसके बारे में आगे पढ़ते हैं राम महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मायर ई संसार संबंध शून्य सेवा ता पर जो किंतु शकल बुझीते पारि तो ना मां का ये संसार संबंध शून्य अर्थात कि किसी भी तरह की सांसारिक वासना नहीं है इस तरह की यह जो सेवा है इसका तात्पर्य सभी लोग समझ नहीं पाते थे शुद्ध की ताई सिर्फ इतना ही अशुद्ध मने ए विषय हिसार उदय हो तो जो जो अशुद्ध मन के लोग है उनके मन में मां कीय जो संपूर्ण रूप से अपने को बिला करके यह सेवा कर करने का जो भाव था इसके प्रति ईर्षा का भी उदय होता था राम एमन की एक टू आध टू आलोचना हो ज हुई तो ना तहा ओ नहीं ऐसा भी और ऐसा ही नहीं है कि सिर्फ लोग मन में ही मन में ईर्षा करके शांत हो जाते थे कोई कोई लोग बीच-बीच में मां के बारे में कटू निंदा या आलोचना भी किया करते थे सुत अज्ञ लोकर विपरीत इंगी तो बा समालोचना ज श्री मायर कण चर होई तो ना इहा बोला चले ना राम की वजह से जो यह अज्ञ लोग थे अज्ञानी लोग थे इनकी यह जो समालोचना या निंदा है वह मां को बीच-बीच में ना सुनाई दी हो किसी जैसे गुलाप मां है ऐसे लोगों ने आकर के मां को ना बताया हो ऐसा भी नहीं है अर्थात कि मां को यह सब पता रहता था एक बार एक महिला स्पष्ट श्री मां के बोलिया फेली लेन एक बार एक डिवोटा ने एक स्त्री भक्त ने मां स्पष्ट कह दिया तुम ठाकुरे काछ जाओ के नो तुम ठाकुर के पास में जाती क्यों हो देखिए ये नारायण और लक्ष्मी ये शिव और पार्वती राम और सीता ये कृष्णा और राधा इनका यह जो ये ये है युगल मूर्ति इनमें यह फूट पड़वा के ट्राई कर रही है कहते हैं कि तुम क्यों ठाकुर के पास में जाती हो सरला श्री मा अपर कथा सरल भावे ग्रहण करी तेन सरल जो मां थी सरल स्वभाव वा वो लोगों की बात को वैसे सहज रूप से ही ग्रहण कर लेती थी अधिक अंत तिनी सर्वदा शतर को था कीते जते तहर व्यवहारे अपरे पीड़ी तो ना होए और सिर्फ इतना ही नहीं कि लोगों की बात को वह बहुत ज्यादा उससे लोगों के ऊपर में क्रोधित होना शुरू हो जाएगी दूसरों के ऊपर में तो क्रोध नहीं ही करेगी जो उनकी निंदा करती है करते हैं उनको वो श्राप या तो ऐसा कुछ नहीं ही देगी किंतु साथ-साथ में ही हमेशा इस इस बात को लेकर के सतर्क रहती कि वह खुद ऐसा कुछ ना कर बैठे कि जिससे कि लोगों को बात करने का मौका मिले देखिए मां को ऐसा कह दिया ठाकुर के पास क्यों जाती हो हमको तो पता है कि कितने महीने में एक बार कहीं जाकर के मां को ठाकुर का दर्शन होता था जब यह खाने का थाला लेकर जाती थी तो हो सकता है प्रतिदिन दर्शन होता किंतु उसमें भी तो बहुत सारी स्त्री भक्त आ करके कहती कि हम लोग थाला लेकर के जाएंगे तो इसके अलावा तो ठाकुर के पास जाने का मां के पास में क्या एक था शुरू में गंभीरानंद जी ने हमको कहा कि ठाकुर जब स्नान करने के लिए जाते थे तो ठाकुर को जो तेल मालिश मां कर दिया करती थी उनके लिए आहार पकाया करती थी वो सब है किंतु इस तरह का मौका भी मां को कितनी बार मिलता था तो यह जो अल्प समय का उनका जो मिलन उसमें भी किसी किसी को देखा नहीं जाता ईर्षा के मारे बोल बैठता कि क्यों ठाकुर के पास जाती हो तो मां ये सब बातों से नाराज तो नहीं ही होती उन लोगों के ऊपर में ऊपर से इतना प्रयास करती कि दूसरों को बोलने का कोई मौका ना मिले रा परेर हितो साधने व्रती होया तहा के अजोथा अनेक स्तले असज यंत्रणा सहन करते होले ओ तिनी से कष्ट स्वेच्छा वर्ण करी तेन दूसरों का हित साधन करते करते उनको बहुत बार असह्य यंत्रणा सहन करने पर भी वह स्वेच्छा से यह कष्ट स्वीकार करती दूसरों का हित साधन अर्थात कि यह गोलाप मां को खाने का थाला दे दिया कहा कि तुम जाओ इसको लेकर के अभी उनको ठाकुर की ठाकुर से वो विरह वेदना जो है अपने हृदय में ही वह छुपा करके वह कुछ भी बोल नहीं रही है तो यह दूसरों का हित साधन करते-करते अपने को जो कष्ट हो रहा है व अशेष कष्ट भी वह बिना किसी वाक्य व्यय के बिना किसी वो कंप्लेन के वह सब सहन करती जाती वर्तमान खेत्रे ओई रूप अभिमत सुनिया ता हार बुझीते विलंब होलो ज श्री श्री ठाकुर सेवा सुयोग ना पाइया ई महिला मनो कष्ट उपस्थित होया से अब जब इस महिला ने ठाकुर के बारे में मां के मां को ऐसा कहा कि तुम क्यों ठाकुर के पास में जाती हो तो उसके ऊपर नाराज नहीं होकर के मां ने समझ लिया कि इस महिला को ठाकुर की सेवा का मौका नहीं मिल रहा है इसलिए ईर्षा के वशीभूत होकर के वह मां को यह सब कह रही है अत तिनी किछु दिन ई काजे बरतो रही लेन इसकी वजह से मां ने कुछ दिन ठाकुर की सेवा नहीं की श बड़ो ई दुखेर समय वोह बड़ा ही दुख का समय है दिना ठाकुर जखन झाऊ तलाई जायते तखन होई तो श्री मां तहर दर्शन पाई तेन दिन के आखिर में जब ठाकुर शौच करने के लिए झावतला की ओर जाते तब हो सकता है कि मां नबत में बैठे बैठे दूर से उनका दर्शन कर पाती कोनो दिन बा शेष सौभाग्य ओ घट तो ना और कभी-कभी हो सकता है कि वह सौभाग्य भी नहीं मिलता मां के पास में तो ऐसा नहीं है कि काम धाम कुछ है नहीं और वहां पर न बट के वह दरवाजे के पास में बैठ कर के खड़ी रह कर के अपेक्षा करें कि ठाकुर कब
Nahabat
यहां से पसार होंगे मां को तो सब कुछ करना है देखिए जिन लोगों का ये जो सो कॉल्ड माने तथाकथित सेवा भाव होता है वे लोग जो कठिन कार्य करने से किंतु कभी भी वो मा मां का जो कठिन कार्य क्या है आहार बनाना ठाकुर के लिए खाना बनाना इतने छोटे से जो यदि आपने नबत देखा होगा कितना अल्प परिसर
Nahabat Inside
छोटी जगह है वहां पर रह कर के सब्जी काटना फिर मछली बनाना है मछली को जो भी कार्य करना है ठाकुर का सब मां करती थी तो वो सब कार्य में सहाय करने की बात छोड़ दीजिए ठाकुर का सानिध्य प्राप्त करना है तो वो जो खाने का जो खाना बन गया है वो बना बनाया खाना लेकर के ठाकुर के पास जाना है उसके लिए सब तैयार है है किंतु ये जो कठिन कार्य है पर्दे के पीछे रह कर के जो कार्य करना है जिसमें किसी भी तरह का वो ना ही आपको यह मिलेगा मतलब कंप्लीमेंट मिलेगा कोई आभार प्रदर्शित करेगा चुपचाप आपको यह जो पर्दे के पीछे रहकर कार्य करना है वो करने को तो कोई तैयार नहीं होगा वो तो मां को ही करना है तो मां के पास में वह समय भी नहीं है कि वह कहीं जाकर के वह दरवाजे के पास में खड़ी हो ठाकुर का अपेक्षा करें वह समय भी तो मां के पास नहीं था तो ऐसा कितनी बार हुआ है कि वह दर्शन भी मां के भाग्य में मिलता नहीं था देखिए कि यह जो हम लोग भी जब ठाकुर के पास जब आए हैं ठाकुर की जब सेवा या किसी भी तरह से कर्म कर रहे हैं हमको कुछ-कुछ अपना भी क्या कहेंगे कि इंट्रोस्पेक्शन करना है हम जो कर्म कर रहे हैं क्या वह दिखावे का कर्म है क्या सब लोगों के सामने हम अपना एक पर्सनालिटी प्रोजेक्ट कर रहे हैं क्या इस आशा के साथ में कि हमको लोगों का कंप्लीमेंट प्राप्त होगा लोगों की प्रशंसा प्राप्त होगी कि हां आप इतना अच्छा कार्य कर रहे हैं किंतु जब पर्दे के पीछे कार्य करने की बात आएगी तो वह करना फिर वो कौन करेगा जहां पर कोई कॉम्प्लीयंट होता है तो ऐसा तो हमारे साथ में नहीं है तो यह जो है हमेशा जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि लोगों की नजर के सामने जब कर्म करने की बात आ जाए तो वह जो कोई कायर भी है वह बड़ा ही वीरता पूर्वक कर्म कर देगा क्यों क्योंकि उसको यह लोग लोकमान्य की जो उसकी ये जो डिजायर है वो बड़ा स्ट्रांग होता है तो कायर भी बड़ा वीरता का कार्य कर देगा यदि लोगों के सामने करना है किंतु लोगों की नजर से ओझल हो कर के लोगों की नजर के अंतराल से लोगों के सामने नहीं रख कर के जब एक चुपचाप छोटा-छोटा जो कार्य होना है दिन का जीवन का या सेवा का वह करने के लिए कितने लोग तैयार है कर्म योग का वही आदर्श है यह बात स्वामी जी ने हमको कही है तो वह जो स्वामी जी का कर्मयोग का आदर्श इस तरह से निरव रूप से साधना करते जाइए कि जिसमें ना ही कोई कंप्लीमेंट मिलने वाला है ना ही कोई प्रशंसा मिलने वाली है ना ही किसी का थैंक्स आपको मिलने वाला है ना ही आपको कोई लोक मान्यता मिलने वाली है इस तरह का निरव साधन कर के कार्य करते जाना यही तो आपका वो कर्मयोग का असली आदर्श है वही तो अभी देखिए कि ऐसा तो नहीं है कि ठाकुर ये ठाकुर सब ऊपर ऊपर से ही देखते हैं अभी गुलाप मां खाना लेकर आई तो ठाकुर क्या यह सोचेंगे कि गुलाप मां मेरे से मां से अच्छी भक्त है मां कमरे में बैठी है नबत में बैठी है गलाप मां खाना लेकर के आई है ठाकुर को तो नहीं पता है ऐसा नहीं है ठाकुर तो लोगों के हृदय में देखते हैं कि लोगों के हृदय में क्या भाव है गुलाप मां और मां शारदा इन दोनों में क्या डिफरेंस है ठाकुर को तो बड़ा ही बखूबी पता है एकदम स्पष्ट रूप से पता है वो जैसे वो ठाकुर खुद उपमा देते हैं ना एक बच्चा बाप के एक जो पिता है एक फादर है उसके दो बच्चे हैं एक बच्चा बड़ा है अपने पिताजी को पिताजी करके बलाता है और एक छोटा बच्चा है वो बा या पा ऐसा करके पुकारता है छोटे बच्चे को बोलना नहीं आता इसलिए वह ऐसा करता है तो क्या पिताजी यह सोचेंगे कि जो बच्चा बड़ा है उसको बोलना आता है तो इसलिए उसके मन में मेरे प्रति ज्यादा निष्ठा है और छोटा बच्चा मेरा नाम नहीं पुकार सकता इसलिए उसके मन में मेरे प्रति कम निष्ठा है ऐसा थोड़ी ना वो पिताजी ऐसा सोचेंगे उनको पता है कि दोनों के मन में हो सकता है समान निष्ठा हो वही है कि बड़े बच्चे को बोलना आता है तो पूरा नाम देके बुलाता है छोटे बच्चे को बोलना नहीं आता तो बा या पा ऐसा करके बुलाता है तो यहां पे भी हम लोग जिस किसी क्षेत्र में हम सेवा करते हो यदि अपना हृदय शुद्ध है तो ठाकुर उस सेवा को लक्ष्य करेंगे उस सेवा का जो परिणाम है जो शुद्ध जो फल है उसका आध्यात्मिक व हमको अवश्य प्राप्त होगा किंतु जिस दिन हम एक दिखावे के लिए सेवा करना शुरू करेंगे लोक मान्यता के लिए सेवा करना शुरू करेंगे उस दिन देखिए कि उस सेवा का जो आध्यात्मिक फल है लोक मान्यता शायद मिल जाएगी किंतु सेवा का जो आध्यात्मिक फल है उसका वह जो लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न कहते हैं ना कि धीरे-धीरे करके उसका जो रिजल्ट है कम से कम होना शुरू हो जाएगा तो यहां पर भी किस तरह से सेवा करनी है अपना क्या आदर्श होना चाहिए सेवा का मैं सेवा कर रहा हूं ये अहंकार को भी त्याग कर देना होगा 10 लोग देखे कि मैं सेवा कर रहा हूं 10 लोग मेरी प्रशंसा करें या तो फिर ऐसा होता है कि चलो गुलाप मां के केस में वो बात नहीं थी कि 10 लोग देख कर के उनकी प्रशंसा करते उनको ऐसा था कि ठाकुर के सानिध्य का आनंद प्राप्त करना था तो वो जो ठाकुर के इवन देवता के सानिध्य का जो आनंद रूपी जो वासना है उसको भी त्याग करना है सेवा अर्थात की प्योर सेवा सामने क्या मिलता है इस बात को आपको संपूर्ण रूप से भूल जाना है यह हो गया सर्वोच्च सेवा का आदर्श जो कि हमको मां शारदा के जीवन में देखने को मिलता है तो आज यहीं तक रखते हैं अभी इसके बाद में एक नया टॉपिक स्टार्ट होता है जो कि हम कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु एक ही शब्द में उसका उत्तर दे सकते
ठाकुर के संन्यासी शिष्य इतनी मेहनत से कैसे काम कर पाए
हैं ब्रह्मचर्य राम राम राम राम यदि आप ब्रह्मचर्य का अजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो उससे जो उधमी शक्ति होती है उससे आप असंभव भी संभव कर सकते हैं सो ट इज द बिगेस्ट मोस्ट इंपोर्टेंट फैक्टर उसके बाद में जोद फैक्टर है तो देखिए कि हमने पहले भी कहा था कि कर्म दो तरह से होते हैं एक शारीरिक कर्म है एक मानसिक कर्मा है तो यह जो आप फिजिकल कर्मा करेंगे ना तो उसको तो आपको एक्सरसाइज ही मिलेगा क् मानसिक कर्मा जो है ना हमको एग्जॉस्ट कर देता है तो यह मानसिक कर्म को कम करके यदि मन को आप मन के भीतर में जो सतत एक जो चलता रहता है उसको यदि आप थोड़ा सा शांत कर दे देन इ ट एनर्जी विल ट्रांसम्यूट इट सेल्फ इनटू फिजिकल एनर्जी माने सब तरह की एनर्जी में कि फिजिकल एनर्जी है या तो मेंटल एनर्जी है क्रिएटिविटी है यह कंपेज है यह जितने भी पॉजिटिव जो है सब कुछ उसमें वह ट्रांस यह होगी ट्रांसफॉर्म होगी वह एनर्जी क्योंकि अपना मन ही देखेंगे कि काम अब आप बैठे भी है ना सोफा पे बैठे हैं एसी चल रहा है वेरी कंफर्टेबल फिर भी आप यू विल फील एग्जास्टेड क्यों क्योंकि माइंड सतत कार्य करता है सतत सोचता रहता है तो जब तक मन का यह सोचना आप समा नहीं करेंगे तब तक आपको यह एग्जॉस्ट दूर नहीं होगा अब बैठिए
हम टीवी या सोशल मीडिया देखकर विश्राम लेना चाहते हैं। लेकिन मन तब भी काम करता रहेगा और परिणामस्वरूप हम थक जाएंगे।
शांति से और आपका मन स्थिर हो जाए तो वो हो गया कि आप आपने सही एक आप लेवल प आ गए हैं अभी और देखिए यह सब है ना आजकल के ही यह सब है पहले के जमाने में आप देखेंगे ना तो ऐसा जो व्यस्तता था मानसिक व्यस्तता लोगों के मन में इतनी नहीं थी मैं मैं अपने देखा हुआ उदाहरण बताता हूं हमारे गांव में हम लोग जाते थे वेकेशन में वहां पर हम हमारी दवाई की दुकान थी तो हमने एक एक वर्कर को रखा था एक बूढ़े एक भाई थे तो वहां पर वह गल्ले प बिठा रहते बैठे रहते थे तो अभी उनका काम है कि वो कोई कस्टमर आएगा तो पैसा लेकर दवाई देना है अभी वोह कस्टमर इतने ज्यादा आते नहीं थे उस समय इतना कुछ होता नहीं था तो मैं जब भी वहां अभी शहर से गए हैं ना हम लोगों का तो टाइम टेबल एक होता है एक सुबह को उठकर यह करना है वो करना है एक एक बिजी लाइफ होता है एक शेड्यूल को ये सब फॉलो करना होता है और इन भाई को मैं देखता था वो गल्ले पर बैठे हैं वो वहां पर कुर्सी पर बैठे हैं तो बैठे हैं सामने क्या था कि एक बहुत बड़ा मैदान था दुकान के सामने क्योंकि वहां पर रेलवे स्टेशन था तो रेलवे स्टेशन तो वैसे दूर था किंतु रेलवे स्टेशन और दुकान के बीच में कुछ नहीं था खुला मैदान था पेड़ पौधे थे बड़ा ही रमणीय दृश्य था तो वहां पर आप बैठेंगे कुर्सी पर सब दिखता था तो ऐसे बैठे-बैठे देखते रहते थे तो कभी-कभी ऐसा लगता था ये जड़ हो गए हैं क्या हम लोग देखिए आजकल यह बात सोच नहीं सकेंगे कि आप बैठे हैं और व आकाश में देख रहे हैं व तो देख रहे हैं और कोई टेंशन नहीं है और कोई चिंता नहीं और कोई विचार नहीं किंतु यह जो व्यस्तता है ना इट्स अ मॉडर्न फिनोमिना इवन आज से 20 30 40 साल पहले भी देखेंगे ना लोग इतने व्यस्त नहीं होते थे वो बैठे हैं तो बैठे हैं आराम से बैठे हैं कोई टेंशन नहीं है हम लोग आज बिना काम के 10 मिनट बैठेंगे ना तो हम एकदम हार्ट बीट्स बढ़ जाएंगे पल्पिटेशन स्टार्ट हो जाएगा वी कैन नॉट सिट डूइंग नथिंग ये पहले के जमाने में ना ऐसा भी नहीं है कि लोग बहुत ज्यादा धार्मिक थे किंतु दो तीन चीजें उनके फेवर में थी जो कि आज हमारे अगेंस्ट में चली जाती है एक तो एक क्वाइट विश्वास था कि हां एक हायर पावर है क्योंकि जगत के बारे में इतना नॉलेज नहीं था अभी यह इतना बड़ा कॉस्मो है यह सब फोर्सेस ऑफ नेचर सो हु कंट्रोल्स दिस फोर्सेस ऑफ नेचर आज हमारे पास में इतना पावर है कि जो देखिए कि मेटराइड इंपैक्ट हुआ तो डायनासोर को एक्सटें कर दिया आज वह नासा इस तरह से रॉकेट बना रहा है कि यदि पता चला डिटेक्ट हुआ कि मेटराइड आ रहा है पृथ्वी की ओर तो आप रॉकेट छोड़ कर के उसको डिफ्लेक्ड कर देंगे उसको पाथ उसका चेंज करवा देंगे सो ट मच पावर अभ क्लाइमेट कंट्रोल है क्लाइमेट प्रेडिक्शन है रिसेंटली वह हमको मिल रहा है ना उतना ही हमको यह वि ईश्वर के ऊपर में से डिसबिलीफ ना स्केप्टिसिजम आता रहा है जो कि भीतर में भीतर में पनप रहा है बाहर में वो एक्सप्रेस नहीं होता सो दैट इज वन थिंग सेकंड कीय जो मानसिक व्यस्तता एक सब समय एक रेस्टस का भाव कि व्ट टू व्ट टू डू नेक्स्ट इसके बाद में क्या है यह मोबाइल में सतत नोटिफिकेशन आते रहते हैं यह एलाराम एक के बाद एक लगा के रखे हैं तो ये सो दोस फ्यू थिंग्स वे इन फेवर ऑफ दिस ओल्डर जनरेशन तो उनके लिए आध्यात्मिकता थोड़ी सी सहज थी कंपेयर टू अस राम ये जो स्वामी जी की स्वामी जी की
मैंने एक बार एक साधु को बहुत शांति से चलते हुए देखा। जल्दी करने से हम आखिर क्या हासिल कर बैठते है।
एग्जैक्ट यही कहानी है कि एक बार लेक्चर के लिए जा रहे थे तो किसी ने कहा कि स्वामी जी हरी अप द टाइम इज पासिंग मने वो टाइम हो गया है लेक्चर का थोड़ा जल्दी चलिए तो स्वामी जी वो एक कहानी को रेफर करते हैं अनटिल एंड अनलेस आई रीच देर नथिंग इंटरेस्टिंग गोइंग टू हैपन अर्थात कि एक आदमी को फांसी पर चढ़ा रहे थे तो वो जो सब लोग दौड़ दौड़ करके फांसी के वो जहां पर चढ़ा रहे हैं वहां देखने को जा रहा है और यह आदमी जिसको फांसी पर चढ़ा रहे है वो आराम से चल रहा है वो बोलता है मैं जब तक नहीं जाऊंगा इंटरेस्टिंग कुछ होने वाला नहीं है स्वामी जी इसी बात को रेफर करके कहते हैं जब तक मैं लेक्चर हॉल में नहीं जाऊंगा इंटरेस्टिंग कुछ होने वाला नहीं शांति से चलो दौड़ो [हंसी] मत एटलीस्ट आई वट मिस एनीथिंग ये जो तालिबान है ना इंटरेस्टिंग तालिबान जो है वो लोगों का ऐसा कहना था कि अमेरिकंस हैव द वच बट वी हैव द टाइम अमेरिकन लोगों के पास में दुनिया भर की मशीनरी है दुनिया भर के वेपंस है स्टिल द फाइटर प्लेन है इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल है एयरक्राफ्ट कैरियर है किंतु समय हमारे पास में है वे लोग यहां पे पेशेंस रख कर के हमारा लाइफ ट्रांसफॉर्म करने नहीं वाले हैं 1015 साल हुए वे लोग भागेंगे यहां से राम राम एटली राम राम तो टुडे वी हैव द वच बट वी डू नॉट हैव द टाइम इन अवर ओल्डर जनरेशन दे डिडेंट हैव द वच बट दे हैड द
जैसा कि स्वामीजी एक अन्य संदर्भ में कहते हैं, माँ का प्रभाव सुबह की ओस की तरह होता है जो फूल पर धीरे-धीरे गिरती है और उसे पोषण देती है।
टाइम कि यह जो बात है स्वामी जी ने कही थी इंडियन कल्चर के बारे में इंडियन कल्चर के बारे में स्वामी जी ने क्या कहा कंपेयरिंग टू अदर कंट्रास्टिंग इट विथ अदर कल्चरस के जो बाकी के जो कल्चर है अपने को स्प्रेड करते हैं विद द पावर ऑफ गन एंड पावर ऑफ आर्मीज बट इंडियन कल्चर है इट इज लाइक ए मॉर्निंग ड्यू द फॉलिंग साइलेंटली अपॉन द रोज एंड नरिंगरे सुबह का जो ओस है गुलाब पे गिरता है और उसको नरिच करता है तो भारत का जो इन्फ्लुएंस है इस तरह से साइलेंट इन्फ्लुएंस है सो व्हिच इज नरिंगरे इट्स एक्जिस्टेंस यू कैन नॉट डिफर इट इ आउटरा इट इन्फ्लुएंस सो दैट इज द पैरेलल स्वामीजी ड्रॉस और के साथ में कंपेयर करना इज अ वेरी नाइस कंपैरिजन अ और तो जैसे दिस इज अगेन वेरी इंटरेस्टिंग कि मान
दूसरों के दृष्टिकोण को समझना और सेवा करने के लिए अपना विशेषाधिकार त्यागना, माँ को अद्वैत के परम आचार्य बनाता है
मदर इज द अल्टीमेट अथॉरिटी कि जिन्होंने जिनके जब ये कंप्लेन वही मायावती से जब कंप्लेंट गई कि स्वामी जी ने वो ठाकुर की मूर्ति है ठाकुर का फोटोग्राफ हटा दिया है सो मदर इज द अल्टीमेट अथॉरिटी शी सेड दैट नहीं आपके जो ठाकुर है वो अद्वैत है और तुम लोग भी अद्वैत हो ऑन व्हिच बेसिस मदर इज सेइंग दिस हमको लगेगा कि माने अद्वैत साधना तो की नहीं है किस तरह से वो बोल रही है किंतु मदर इज अ पर्स निफिट ऑफ द अद्वैत राइट और किस तरह से अी डिटेक्ट करेंगे देखिए बहुत बार हम लोगों को ऐसा होता है ना तोतापुरी जी को देख कर के खास करके कि नहीं वो तो इतना स्ट्रांग विल पावर है इतने फिजिकली और मेंटली स्ट्रांग है ठाकुर पे नाराज हो जाते थे ठाकुर को डांट करके उनके पास में साधना करवाते थे ठाकुर जब कहेंगे कि नहीं मैं जब आंख बंद करता हूं तो मां की मूर्ति दिखती है तो वो कांच का टुकड़ा उनके कपाल प मार तो दिस इज अ सॉर्ट ऑफ अद्वैत शंकराचार्य है हमको ये प्रकट होता है कि दिस इज व्ट अद्वैत साधक लुक्स लाइक बट वी कैन नेवर थिंक दैट मदर इ अ शी इज अ पर्स निफिट ऑफ अद्वैत राइट जितने भी लोग मां को देखेंगे कहेंगे भक्ति की ही परा कष्टा दिखाई है किंतु ठाकुर जब कहते हैं ना शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान एक सो हाउ इज इट पॉसिबल तो शुद्ध भक्ति दैट मींस कि आप जिनकी सेवा करते वो सेवा भी त्याग कर देना यदि आपको ऐसा लगे कि दूसरों को इससे कष्ट हो रहा है सो दिस एक्सपेंशन ऑफ द सब्जेक्ट अल्टीमेटली अवेद क्या है कि व एवरीवन इज पार्ट ऑफ अवर माय ओन सेल्फ तो गोलाप मा भी वही है ठाकुर भी वही है देखिए ऐसा इंटरेस्टिंग हुआ भी है मने लिटरली ऐसा हुआ है जब मां वृंदावन की कहीं पर थी ठाकुर की महासमाधि के बाद में तो फिर एक दिन ऐसा आया कि मां अभी हमने ऐसा डिस्कस किया है कि मां को वैसे भाव समाधि ज्यादा नहीं होती थी किंतु जो कुछ कुछ समय जो होता था एवरी टाइम इज वेरी इंटरेस्टिंग एवरी टाइम इज यूनिक तो उस समय मां को एकाएक भाव हुआ उस समय गुलाब मां वहां पे थी तो देखा कि मां के ऊपर में जैसे कि ठाकुर का आविर्भव हुआ है ठाकुर जिस तरह से बात करते हैं मां उस तरह से बात करती है ठाकुर को ठाकुर जब पान खाते हैं तो अपने दांत से पहले कुछ काट करके फिर पान खाएंगे मां भी इसी तरह से पान खा रही है तो गुलाब मां को संदेह हुआ कि निश्चय ठाकुर का अवि भाव मां के ऊपर में हुआ है तो फिर उन्होंने कुछ प्रश्न किए उनको पता है ठाकुर का सानिध्य प्राप्त किया है तो ठाकुर किस तरह से इसका उत्तर देंगे तो वो पूछ रही है कुछ प्रश्न किए मां को और देखा कि मां उसी तरह से उत्तर दे रही है जैसे कि ठाकुर देते थे से मेरी इंटरेस्टिंग कि ठाकुर का आविर्भाव होना व्हाट इज द मीनिंग ऑफ दैट मां और ठाकुर संपूर्ण रूप से एकाकार हो गए हैं सो दिस एकाकार होना अपने को विलीन कर देना अपना अहंकार विलीन कर देना दैट इज द अल्टीमेटली अद्वैत साधना सो शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान एक ही है दिस मदर इज परफेक्ट एग्जांपल ऑफ दिस टीचिंग ऑफ टाकुर और ये जो ठकर और स्वामी जी ने कहा है उन्होंने अपने मुन से स्वीकार किया है इट इज नॉट लाइक की हम लोग इनफर कर रहे हैं पढ़ कर के जैसे हम लोग इंटरप्रेट करते हैं कि हां ऐसा ऐसा होना नहीं लिटरली दे हैव एक्सेप्टेड दिस जबकि माने ऐसा कभी भी इर मतलब अपने मुंह से ऐसा कभी नहीं कहा कि हां कि मैं ऐसा कुछ चाहती हूं ना कि मैं ऐसा कुछ कर करूंगी मां ने अपने मुंह से कभी ये कहा नहीं तो ट मीस इटस रियल ये इंटरप्रिटेशन नहीं है दिस इज रियल ये बड़ा ही अगेन वेरी वेरी गुड
जैसा कि ठाकुर कहते हैं कि हमें मन में , वन में, और कोने में ध्यान करना चाहिए। वैसे ही हमें प्रशंसा की उम्मीद किए बिना नीरव कर्म करना चाहिए।
पैरेलल ज मने वने और कोण ठाकुर जैसे कहते हैं कि साधना कैसे करनी है मन में करनी है वन में करनी है कॉर्नर में करनी है ठाकुर कहते हैं कि वो मच्छर दानी डाल कर के वो भक्त बैठा हुआ है तो लोग सोचते हैं सो गया किंतु सोया नहीं है मच्छरदानी में बैठ कर के जप कर रहा है ये अगेन वेरी इंटरेस्टिंग स्टोरीज दे कि लाटू महाराष् है तो एक दिन रा नगर की बात है तो सब गुरु भाई रात को सोते थे तो साथ मेंही सोते थे वो बड़ा होल था तो उसमें तो रात को शशि महाराज ना कि शरद महाराज देख उनकी नींद खुल गई किसी कारण से देखा तो खटखट करके आवाज हो रहा है अब ये आवाज कब होगी जब कोई जपमाला घुमा रहा है तो जपमाला का जो आवाज होता है घुमाने का और रात को तो एकदम सन्नाटा है आजकल की तरह वो डीजे वगैरह तो है नहीं तो एकदम सन्नाटे है वो माला का आवाज सुनाई दे रहा है तो उन्होंने सोचा इस रात को कौन जप कर रहा है खड़ा हो कर के देखा तो थोड़ा इधर-उधर देखा तो एकदम आवाज बंद हो गया बोला सोचा कि मन का भ्रम हुआ होगा शायद फिर सो गए फिर से थोड़ देखा कि खटखट करके आवाज हो रहा है फिर खड़े हो गए तो फिर आवाज बंद हो गया तब उनको लगा कि हां अभी कोई छुप-छुप करके जप कर रहा है दिन भर तो जप करता है रात को भी नहीं छोड़ता है फिर खड़े होकर के एकदम बैठ गए और पता चल जाता है कौन सोया है कौन ढोंग कर रहा है सोने का पकड़ लिया लाटू महाराज को लाडू महाराज जब सब सो जाते हैं तो माला लेकर जप करते हैं तो ये शशि महाराज एट में भूल गया किसने उनको पकड़ा था बोला कि तुम लाटू छुप छुप करके रात को जप करते हो सोचते हो हमारे से आगे बढ़ जाओगे ऐसा नहीं होगा हम भी तुम्हारे साथ बैठ के जप करेंगे ये जो छुप कर के जब करना है तो ये अगेन वेरी इंटरेस्टिंग पैरेलल कि कर्म भी करना है तो लोगों को पता नहीं चलना चाहिए कि मैं इतनी सेवा कर रहा हूं क्योंकि जिस समय आप सेवा का दिखावा करेंगे उसी टाइम फिर वही लोकमान्य की इच्छा आ जाएगी जिस पर्पस के लिए सेवा कर रहे हो पर्पस ही वो चला जाएगा उसका अर्थात साधना का अंतिम उद्देश्य है अहंकार का नाश अब साधना करने से अहंकार बढ़ता है तो वह साधना किसका लाटू महाराज की एक ऐसी दूसरी भी कहानी है लाटू महाराज ने एक बार ठीक किया नरेण इतना है नर की ठाकुर इतनी प्रशंसा करते हैं नर को मैं हरा दूंगा साधन बज ज में जब ध्यान करना शुरू किया जोरों से चलाया उस समय स्वामी जी वरा नगर में ही थे वरा नगर मठ की बात है एकदम जोर से जब ध्यान कर रहे कर रहे कर रहे अभी ये जो विवरण लाटू महाराज ने स्वयं दिया है लाटू महाराज कहते हैं कि मैंने ऐसा जब ध्यान का वो जो पूरा झड़ की तरह मैंने जब ध्यान करना शुरू किया खत्म करके मैं जब स्वामी जी की ओर देख रहा हूं तो स्वामी जी और कितने आगे निकल गए हैं हमने कोई संभावना ही नहीं है कि मैं कितना जब ध्यान कर ल और उनको पकड़ पाऊ आखिर में मेरा हार मान ले और और देखिए स्वामी जी के जीवन में ना वो जो ठाकुर के समय जो सदन भजन किया था उसका विवरण है बाद बाद में ऐसा कोई विवरण नहीं है कि स्वामी जी बैठ कर के तपस कर रहे हैं कि जप कर रहे हैं कि ध्यान कर रहे हैं स्वामी जी जन किया है सब कुछ छुपके छुपके किया है उनकी बायोग्राफी में भी इतना सारा विवरण नहीं मिलेगा किंतु ऐसे जब गुरु भाइयों की बात सुनते हैं तब हमको पता चलता है कि उन्होंने क्या साधन भजन किया होगा ना वो भी तो सही और उस समय तो रिकॉर्ड करने वाला कोई नहीं था बाद बाद में जब वो प्रसिद्ध हुए तब भी तो ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि स्वामी जी ने बैठ कर के आज सुबह से जब ध्यान कर लिया ऐसे उल्टा प्रमाण मिलता है तो ग्रहण हो रहा है तो वो शरद चंद्र को स्वामी जी कहते हैं सुना है कि ग्रहण के समय जो करते हैं वो उसका बहुत गुना फल बाद में मिलता है तो मैं थोड़ा सो जाता हूं मेरे जीवन में सोना लिखा नहीं है तो मैं जाऊ बाद में हो सकता है मुझे ज्यादा रेस्ट मिल प्रसिद्ध होकर के 10 लोग जब स्वामी जी के बारे में लिख रहे थे उस समय भी ऐसा कोई विवरण नहीं है उस समय जब यह गुरु भाइयों की बात सुनेंगे तब पता चलेगा स्वामी जी छुपके छुपके कितना करते थे ऑफ कोर्स यह तंत्र साधना के बारे में वगैरह के बारे में ठाकुर किसी को बताते नहीं थे किंतु के साथ में डिस्कस सब किया है ऐसा नहीं कि नरेण को इनकरेज किया है एटलीस्ट डिस्कस सब कुछ किया है व जो अष्टावक्र संहिता किसी को पढ़ने को नहीं देंगे नरेद्र को पढ़ने को देते थे तो सब तरह की साधना औरली साधना नहीं तो साधना का डिस्कशन ठाकुर ने अवश्य किया है उनके साथ क्योंकि नर को तो अल्टीमेटली जगतगुरु होना था जितने भी प्रसन देखेंगे ना स्वामी जी के जब भी स्वामी जी अभी जैसे अल्मोड़ा में गुफा में जा गए तो फिर ये शरद महाराज थे वहां पर शरद महाराज भिक्षा करके लाते थे उनके लिए किंतु उनके साथ में गुफा में नहीं रहे अखंडानंद जी के साथ में हिमालय के रास्ते से जा रहे हैं तो अखंडानंद जी को कहते तुम अलग रास्ते से जाओ मैं अलग रास्ते से जाता हूं तो थोड़ी देर के बाद में अखंडानंद जी को ऐसा लगा कि स्वामी जी किसी के बात करके हंसी वजक कर र है तो उन्होंने सोचा कि इस वैरान रास्ते पर कौन आया है तो स्वामी जी की ओर गए देखा कि स्वामी जी अकेले अकेले बातें कर रहे हैं अकेले अकेले हंस रहे हैं तो समझ गए कि भाव में है स्वामी जी तो फिर वो अलग हो गए वहां से सो स्वामी जी वाज वेरी केयरफुल कि यस पैरेलल एक दूसरा उदाहरण है नॉट एटली लाइक दिस बट पैरेलल ठाकुर कहते हैं कि आप जब तीर्थ यात्रा करने के लिए जाते हैं तो सोच करने के लिए तो रास्ते में ही खुले में ही करना होगा तो उसमें तो व कोई आज की तरह रेस्ट रूम वगैरह तो थे नहीं तो ठाकुर कहते साधु का लक्षण क्या है पता है जो लोग वैसे ही सबके सामने शोज करेंगे रास्ते के किनारे साधु जो होगा नाना जंगल में जाकर के शोच करेगा जिसको कोई देख ना पाए तो इंटरेस्टिंग पैरेलल किंतु देखिए कि आपका जो ये होगा ना मतलब स्पिरिचुअल लाइफ में जद डीप में जाना है ना तो मेरा जो खुद का एक आपको एक्सपीरियंस है कहता हूं मतलब राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य इज द बेस्ट वे टू डाइव डीपर इन टू स्पिरिचुअल लाइफ क्योंकि आज हमारा है अनन गत प्राण ये आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना स्वामी जी लाटू महाराज की तरह रात रात जग करके जप करना यह सब अभी हमारे से कहां संभव है आपसे तो नहीं है मेरे से भी नहीं है और मैं भी बहुत कम साधुओं को देखता हूं जो कि साधन भजन की इस ऊंचाइयों तक पहुंचे है हम लोगों के लिए भक्ति योग अर्थात की ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति कर्म योग यानी कि ठाकुर का जो अल्प मात्रा में कार्य हो सके और स्वाध्याय कि राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य में जितना डीप में जा सके यह जो उसकी चर्चा करने से चंदन का वो जो होता है ना काष्ट होता है चंदन का पेस्ट बनाने के लिए घिसना पड़ता है जितना घिस उतना ही खुशबू आती जा तो वैसे ही राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य जितना चिंतन मनन स्मरण करेंगे उसका जो पावर है ट विल गो टू अस माने वो ठाकुर खुद कहते हैं ना कोई एक व्यक्ति जो बना वो जो ये बना अग्नि प्रज्वलित करता है तो 10 लोग आकर के उसके ऊपर में वो सेकते हैं अग्नि को ठंडी के दिनों में उसकी गर्मी प्राप्त करते हैं तो उन्होंने हमारे लिए यह सब प्रसंग रख कर के गए हैं उसका चिंतन मनन करके हमारे मन को सुकून मिलता है