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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

दैवाधीन : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 17 June 2024

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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका हम पाठ कर रहे हैं मां के जीवन का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पहलू हम कुछ दिनों से डिस्कस कर रहे थे मां जब बीमार थी दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर ने वैसे तो मेहनत करके मां की ट्रीटमेंट वगैरह प्रारंभ तो करवाया था किंतु फिर मां ने सोचा कि यहां पर ज्यादा दिन बार-बार बीमार होकर के रहेंगे तो ठाकुर को बिना मतलब कष्ट होगा ठाकुर मेरी चिंता करते-करते हो सकता है शायद ईश्वर की चिंता करना भूल जाए और ठाकुर ने तो जब पहले जब मां पहली बार आई थी तभी ठाकुर ने पूछा था कि तुम यहां पर क्यों आई हो क्या तुम मुझे ईश्वर के पथ से लेकर के संसार के पथ में खींच जाने के लिए आई हो क्या उस समय मां ने स्पष्ट कहा था नहीं मैं आपको संसार में खींचने के लिए नहीं आई मेरा आगमन हुआ है आप आपको आपके ईश्वरीय पथ में ईश्वरीय साधना में सहाय करने के लिए तो वैसे तो माने ये प्रॉमिस किया है ठाकुर को कि वह ठाकुर को अपनी ईश्वर की प्रति जो एकाग्रता है मन की उसमें सहाय करने के लिए आई है और यहां पर जदी वह बार-बार बीमार होती रहेगी ठाकुर इसी चिंता में रहेंगे कि अरे चलो मां की ट्रीटमेंट करवाए मां का पथ्य उस सब की चिं व्यवस्था करें तो फिर फ वो ईश्वर पर ध्यान कब देंगे तो यह सोच कर के मां चली जाती थी जयराम बाटी अभी जयराम बाटी देखेंगे तो वही बात फिर से आ जाती है मां के पिताजी रामचंद्र के देहांत के बाद में श्यामा सुंदरी देवी मां की मां उन बेचारी को शारीरिक कष्ट करके शारीरिक परिश्रम करके संसार चलाना पड़ता था वहां पर कुछ धनी लोगों के घर से न भुने के लिए ले आती थी अर्थात कि धन में से चावल बनाने के लिए वगैरह जो भी प्रोसेस होगी उस समय की वह सब करने के लिए ले आती थी और इस तरह से परिश्रम करके भी वह अपने बच्चों का पालन नहीं कर पाती थी इसलिए क्या हुआ मां के जो छोटे-छोटे भाई थे उनको सबको परिवार जनों के वहां पर भेज देना पड़ा कि हो सके चलो घर में खाना नहीं नहीं मिलता है घर में यदि ऐसी आर्थिक व्यवस्था नहीं है कि उनकी पढ़ाई लिखाई की जाए तो अपने संबंधी के वहां पर अपने रिलेटिव्स के वहां पर बच्चे लड़के रहेंगे और वहां पर अच्छा खाना मिलेगा पौष्टिक आहार मिलेगा और उनकी पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था होगी ब्राह्मण परिवार है ब्राह्मण का लड़का जद यह सब पूजा पाठ विधि विधान यह सब यदि नहीं सीखेगा तो बड़ा होकर के करेगा क्या इसलिए यह व्यवस्था करने के लिए लड़कों को अपने संबंधी के वहां पर रख दिया और यहां पर मां है मां बेचारी बीमार शरीर लेकर के आई है अभी श्यामा सुंदरी देवी वो जो कर्म करके कार्य करके परिवार का गुजरान चलाए ना कि मां की चिंता करें तो यहां पर भी वही शिव का संसार वही दारिद्र्य और इसी दारिद्र्य में मां को रहना है आखिर में मां ने सिंहवाहिनी देवी के सामने धरना दिया धरने से सिंहवाहिनी ने प्रकट होकर के औषध दिया तो कुछ ट्रीटमेंट हुई और दूसरी बार जब मलेरिया बढ़ गया था तो प्लीहा दागा इस तरह से एक ट्रीटमेंट होता है स्प्लीन के ऊपर में गर्म कोयला रख दिया जाता है जिससे कि उसमें जो वोह सूजन वगैरह जो आई हो वह कम हो जाए और मलेरिया का शाय शायद उपशम हो उस समय मेडिकल ट्रीटमेंट के अभाव में इस तरह की विकट ट्रीटमेंट अवेलेबल थी तो मां ने उसको भी करवाया तो यहां तक हमने देखा अभी गंभीरानंद जी महाराज इस पूरी घटना परंपरा का तात्पर्य विश्लेषण करते हैं हमने खुद ने तो बहुत सारा इसका विश्लेषण किया किंतु अभी देखते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज इसका विश्लेषण किस तरह से करते किस तरह से इस पूरी घटना वली को समझाते हैं तो महाराज जी लिखते हैं कथी तो आचे ज श्री भगवान बाहार शक्ति विशेष जखन जगते अती होन कहा जाता है कि श्री भगवान या तो भगवान की शक्ति का पृथ्वी पर जब आगमन होता है अवतरण होता है तो तरा प्रचलित रीति नीति और आचार व्यवहारे विरुद्ध अकस मातो युद्ध घोषणा ना कोरिया जब भी अवतार या शक्ति प्रकट होते हैं तब वे लोग जो प्रचलित रीति और नियम है जो गांव की प्रथाएं हैं उसके सामने युद्ध घोषणा नहीं करेंगे ऐसा नहीं कहेंगे कि अरे तुम्हारे पूर्वज जो यह सब बता कर के गए हैं गांव में गांव गांव पर यह सब वि कट चिकित्सा चल रही है या जिसको आजकल हम शहरों में रहने वाले लोग अंधश्रद्धा वगैरा कहते हैं यह सब गलत है इसका त्याग करो और आधुनिकता अपनाओ या तो फिर मैं जो कहता हूं उसको सब मान लो वह सब गलत है उसको छोड़ दो ऐसा करके पुराने नीति नियम रीति रिवाज प्रथाओं के सामने युद्ध घोषणा नहीं करेंगे कोई के नव भावे रूपाय तो करेन किंबा तहादेर मृतो देहे प्राण संचार करेन व पुराने नीति नियम रीति रिवाजों को ही नव कलेवर देकर के उनके भीतर में नव प्राण का संचार करके उनको नए युग के अनुसार उनका इस्तेमाल करेंगे उनको एक नया रूप देंगे किंबा ताहा देर मृतो देह प्राण संचा या तो फिर उनके मृत देह में प्राण संचार करेंगे अथवा ई शकोल आपात विरुद्ध प्रति बशर मध शीय महात्म प्रकाश करिया पथ ब्रांतो जनगण के एक उच्चतर आदर्श दिख टानिया लन क्या करेंगे तीन चीजें करेंगे या तो फिर पुरानी रीति रिवाजों को नव एक स्वरूप देंगे या तो फिर यदि मृत हो गए हैं तो उनके भीतर में प्राण का संचार करेंगे जैसे कि जग सिंह वाहिनी देवी जयराम बाटी में सिंहवाहिनी की प्रतिष्ठा जब हुई होगी तो किसी साधक ने या तो फिर मां की साधना की होगी मां का दर्शन प्राप्त किया होगा और मां का आशीर्वाद प्राप्त किया होगा तभी तो किसी भी देवी देवता की प्रतिष्ठा होती है अदर वाइज कोई भी व्यक्ति कोई भी गांव कोई भी लोग किसी पार्टिकुलर देवी देवता को क्यों स्वीकार करेंगे आज यह बंबई में जैसे कि गणेश भगवान की पूजा होती है वह जो स वहां पर बहुत ही फेमस एक गणेश मंदिर है उसका नाम मैं भूल गया या तो फिर यह मीनाक्षी देवी का मंदिर है सि विनायक सिद्धि विनायक यस यस यस सिद्धि विनायक मुंबई में सिद्धि विनायक का मंदिर है या तो फिर कन्याकुमारी में कन्याकुमारी देवी का मंदिर है या तो फिर आप मदुराई जाएंगे मीनाक्षी देवी का मंदिर है या तो फिर कलकाता में जाएंगे कालीघाट में मां काली का मंदिर है यह सब जो कि प्राचीन पुरातन देवी देवता एं हैं उनकी वहां पर इतने सारे लोग इकट्ठा क्यों होते हैं कोई भी उत्सव वगैरह हो जाने से हजारों लाखों श्रद्धालु यात्रालू वहां पर जाकर के देवता के सामने प्रार्थना करते हैं अपने जो अपनी जो अभिलाषा एं हैं अपनी जो वासना एं या इच्छाएं हैं वो उनके सामने निवेदित करते हैं यह अभिलाषा दोनों तरह की हो सकती है वो राजसिक भी हो सकती है सात्विक भी हो सकती है कोई धन मांगेगा कोई प्रतिष्ठा मांगेगा तो कोई मन की शांति मांगेगा कोई परिवार का कल्याण मांगेगा तो कोई अपना आत्म कल्याण मांगेगा किंतु वो ऐसे जागृत देवता के सामने जाकर के सभी लोग लोग इस तरह से मिन्नत मानते हैं धरना देते हैं या फिर प्रार्थना करते हैं तो सिंहवाहिनी देवी की प्रतिष्ठा भी ऐसे ही किसी साधक ने की होगी कि जिसने इस मां की साधना की होगी मां को प्रार्थना की होगी कुछ प्राप्त हुआ होगा किंतु बीच में क्या हुआ कि देवी का महात्म्य धीरे-धीरे विलुप्त होने लगा जैसे-जैसे साधक गण वहां से अदृश्य होते गए पुराने साधक गणों की मृत्यु होती गई नए साधक नहीं आ रहे तो देवी की प्रतिष्ठा भी देवी की महिमा भी लुप्त होती गई फिर कहीं जाकर के मां का आविर्भाव हुआ उसी जयराम बाटी ग्राम में और फिर मां ने जब देवी के सामने धरना दिया तो देवी ने जाग्रता होकर के मां को औषध दिया तो देखिए अच्छा ये जो हम लोग बहुत बार कहते हैं ना कि भगवान के सामने अब अच्छा स्वामी जी के साथ में इस बात का थोड़ा सा कंट्रास्ट हम लोगों को आपको पता है कि मुझे इस तरह से यह कंट्रास्ट स्टडी करना एक अच्छा लगता है थोड़ा सा तो देखिए कि स्वामी जी के सामने स्वामी जी के साथ में मां का यह कंट्रास्ट किस तरह से है स्वामी जी के घर में भी जब पिताजी का देहांत हुआ था तो उस समय उस खाने के लिए कुछ नहीं छोटे-छोटे भाई है उनकी रक्षा कैसे करेंगे तो स्वामी जी आए ठाकुर के पास में कहा कि महाशय आपरे परिवार के लिए कुछ कर दीजिए तभी तो मैं यह सब साधना साधन भजन जो कि आप बता रहे हैं उसमें मैं पूरा एकाग्र होकर के यह सब करूंगा तो तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया कि जाओ मंदिर में मां काली स्वयं जाग्रता विराजमान है उनके पास में जो मांगना है मांग लो तो स्वामी जी गए क्या मांगने के लिए गए रोटी दो कपड़ा दो मकान दो क्योंकि तीनों चीजों का अभाव था मकान भी उनसे छीन दिया गया था कपड़े पहनने के लिए नहीं थे बहुत ही मुश्किल से वही पुराने कपड़ों को चला रहे थे फट गए हैं तो उसी को सिलाई कर कर के चलाएंगे खाने का परिस्थिति ऐसा था कि नरेण स्वामी विवेकानंद का युवावस्था का नाम तो नरेंद घर में आकर के क्या कहता था कि अपने मां और भाइयों को कि आप लोग खा लीजिए मैं अपने बंधु के यहां पर खाके आया हूं तो ऐसा करके खुद बुखा रहता था और खाना अपने भाइयों को खिला देता था तो रोटी कपड़ा मकान तीनों का अभाव था किंतु जब मां के मंदिर में गए मां के सामने हाथ जोड़े तो मुंह से क्या आ गया रोटी कपड़ा मकान नहीं वही सनातन पुकार साधकों की जो कि युग युगांतर से गुंज उठ रहती है मंदिरों के भीतर में ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो और ऐसा करके जब उन्होंने मांग करके ठाकुर के पास में आए वही भाव में मग्न है मां के ठाकुर ने पूछा नरेंद्र तुमने मांगा क्या अपने परिवार के लिए तो नरेंद्र एकदम भाव भंग होकर के एकदम आश्चर्य चकित होकर के बोला अरे महाशय मैं तो उसकी बजाय और ही कुछ मांग के आया तो ठाकुर ने कहा जाओ जाओ फिर से जाओ फिर से माग के आओ फिर से गया फिर से वापस आया फिर ठाकुर ने फिर से भेजा हर बार एक ही पुकार साधक गण की ज्ञान भक्ति वैराग्य आखिर में फिर नरेंद्र ने ठाकुर को कहा कि आप ही ने कुछ गड़बड़ कर दिया है आपी ने मुझे कुछ हिप्नोटाइज कर दिया है कैसे भी करके इसीलिए मैं सब गलत गलत चीजें माग के आता हूं अभी आप ही मेरे परिवार का कुछ कीजिए तो ठाकुर ने कहा अरे तुम्हारे संस्कार ही ऐसे हैं तुम्हारा जन्म ही इसके लिए हुआ है तुम यह सब संसार की चीजें कैसे मांगोगे किंतु फिर आखिर में कहा अच्छा जा तो देर परिवार मोटा भात ता पड़े अभाव था कवेना अर्थात कि सामान्य भात और कपड़े इसका अभाव नहीं रहेगा तो यह देखिए कि नरेंद्र जितनी भी बार माहाकाली के मंदिर में मांगने को गया है रोटी कपड़ा मकान मांग के आया है ज्ञान भक्ति वैराग्य तो मां ने फिर यह क्यों मांगा जगत धात्री के सामने सिंहवाहिनी के सामने कि हां बीमारी ठीक हो जाए उसके लिए औषध दो तो यह क्या कंट्रा क्शन नहीं है क्या तो देखिए कि इस का सोल्यूशन मुझे ऐसा लगता है कि मां शारदा देवी ने सिंहवाहिनी के सामने शायद ऐसा कहा नहीं है कि आप मेरी बीमारी ठीक कर दीजिए सिर्फ जाकर के हत्या ही दी है सिर्फ जाकर के धरना ही दिया है क्योंकि सिंहवाहिनी के मंदिर में आने से पहले देखिए कि तालाब के किनारे पड़ी हुई थी डाइजेंस हो गई है बार-बार लूज मोशन होता है और उस समय तो इंडोर प्लंबिंग या घर के भीतर में टॉयलेट नहीं थे वो बाहर में ही जाना पड़ता था एकांत जगह पे तो मां को बार-बार इतनी बार जाना पड़ रहा है कि उन्होंने सोचा घर में जाकर के वापस आने की वजह यहीं पे एकांत में तालाब के किनारे पड़ी रहती हूं अभी तालाब के किनारे पड़ी थी वहां पे पानी में अपना प्रतिबिंब देखा और प्रतिबिंब में देखा कि अस्थि चर्म सार शरीर हो गया है अर्थात कि ये चमड़ी और हड्डियों के अलावा इस शरीर में और कुछ बचा नहीं है तो मां ने सोचा यह जो कुरूप शरीर है यह पंचमहाभूत का यह पदार्थ का बना हुआ यह जो शरीर है मल मूत्र विष्ठा से भरा हुआ ऐसे शरीर को धारण करके लाभ क्या है प्रयोजन क्या है छी ऐसे शरीर का मैं त्याग ही कर देती हूं ऐसा मां ने सोचा ऐसा सोच रही थी उसी समय जो मां का भाई था उसने आकर के कहा कि मां यह सिंहवाहिनी का मंदिर है वहां पर तुम इस तरह से धरना दे सकती हो तो माने मुझे ऐसा लगता है कि सिंहवाहिनी के मंदिर में जब वह पड़ी होगी धरना देकर के उन्होंने अपने स्वास्थ्य की कामना नहीं की होगी उन्होंने यही मांगा होगा कि जीवन का जो महत् उद्देश्य है जो कि ईश्वर लाभ वो ईश्वर लाभ में अपने पति देव को सहाय होने के लिए जो वह आई है उसमें कहीं पर कुछ विक्षेप ना हो जाए क्योंकि मां का देह धारण शक्ति का आगमन आप वो जो इस किताब का जो इंट्रोडक्टरी जो चैप्टर है उसमें गंभीरानंद जी महाराज ने बड़ा ही स्पष्ट रूप से लिखा है कि शक्ति का आगमन वैसे तो हमारे अंतर द्वंद यानी कि हमारे हृदय में यह जो यह अच्छी शक्तियां और बुरी शक्तियां हमारे सत्कर्म और दुष्कर्म हमारे भीतर में सत्व और यह रजस तमस इन दोनों के बीच में जो युद्ध होता है उसमें यह सत्य की रक्षा करने के लिए सत्य को बल प्रदान करने के लिए देवी का आगमन होता है तो मां को पता है कि उनका आगमन सिर्फ यह शरीर की रक्षा करने की के लिए या तो फिर शारीरिक सौंदर्य को मेंटेन करने के लिए नहीं हुआ मां का आगमन तो हुआ है अपने पति की सेवा करने के लिए और मां के पास में यह जो हजारों हजारों भक्त उस समय आने वाले थे जबकि मां जीवित थी इस देह में और जब मां का देहांत होगा महासमाधि होगी तब भी मां के पास में आने वाले संतानों की संख्या उत्तरोत्तर दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाने वाली है तो वोह जो महत उद्देश्य है वह किस तरह से वह महत् उद्देश्य वह सक्सेसफुल हो यही माने मांगा होगा नहीं कि अपना खुद का स्वास्थ्य किंतु जगत का कल्याण क्योंकि जगत के कल्याण के लिए ही देवी का आगमन होता है और इसीलिए फिर सिंहवाहिनी ने जागृत होकर के मां को औषध दिया देखिए यह जो गंभीरानंद जी महाराज ने कहा कि जब अवतार या शक्ति का देवी का आगमन होता है तो पुरानी प्रथाओं को तोड़ नहीं देते ऐसा नहीं कहते कि अरे तुम लोगों के पास में यह बिकॉज कि उस समय इग्नोर है गरीबी है यह जितनी भी हमारी शास्त्र विद्या है जिसको कि हम आयुर्वेद कहते थे वगैरह यह लुप्त हो चुका है इसलिए तुम लोगों के पास में कोई सहाय नहीं है तो आप लोग मंदिर में जाकर के इस तरह से धरना देते थे किंतु आधुनिक युग में मेडिकल साइंस इतना एडवांस हो गया है कि आपको यह सब नाटक करने की जरूरत नहीं है डिस्पेंसरी में हॉस्पिटल में जाओ प्रॉपर मॉडर्न ट्रीटमेंट दो लो ऐसा करके जद हम हमारे जैसे लोग कहेंगे गांववासियों को किंतु मां ने ऐसा नहीं कहा मां ने ऐसा नहीं कहा कि ये पुरानी प्रथाएं सब गलत है उसका त्याग करो उसको तज दो किंतु मां ने वही पुरानी प्रथा में प्राण संचार किया है वही पुरानी प्रथा को पुनः जागृत किया है किंतु किसी अंधश्रद्धा को फिर से वह नहीं ले आई ऐसा जदी मानना कि मुझे अपना शारीरिक स्वास्थ्य शारीरिक सुख उपभोग ही चाहिए और इसीलिए मैं देवी के सामने धरना दे रहा हूं इसके लिए नहीं पुरानी प्रथा को प्राण संचार करके नव जीवन देने का क्या अर्थ है वही कि देवी के पास में देवता के पास में आप जब भी कुछ भी मांगते हैं तो कोई महत उद्देश्य सिद्ध करने के लिए मांगिए जैसे कि स्वामी जी ने मांगा ज्ञान भक्ति वैराग्य तो वैसे ही मां ने मांगा होगा जगत का कल्याण अपने पति की सेवा क्यों क्योंकि ठाकुर का खुद का आगमन हुआ है जगत में धर्म चक्र प्रवर्तन करने के लिए वही वेद और योग और वेदांत की जो पुरातन वाणी है गीता फिर यह भागवत जैसे हमारे धर्मशास्त्र है जो कि हमारी मिट्टी की यह हमारी मिट्टी में जिसने कि अमृत सिंचन किया है हमारी सभ्यता की जो धरोहर है उसको पुनः जागृत करने के लिए पुनः उसको प्रचारित करने के लिए और सिर्फ भारत में नहीं अभी इस बार पूरे विश्व में इसलिए तो स्वामी जी को स्वामी जी वहां पर वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में गए थे शिकागो में तो पूरे विश्व में भारतीय यह आध्यात्मिक चेतना का प्रचार करने के लिए ठाकुर का अवतरण हुआ है तो ठाकुर की सेवा करने से एक तरह से वही महत् उद्देश्य ही सिद्ध होता है तो वही महत्व उद्देश्य की सिद्धि कामना ही माने सिंहवाहिनी के सामने की होगी नहीं कि यह कहा होगा कि यह शरीर ठीक हो जाए इसके लिए औषध दे दो तो देखिए कि पुरानी प्रथा को ही पुनर्जीवित किया है किंतु एक नया स्वरूप दे दिया है एक नई हमको शिक्षा दी है ईश्वर के सामने अपने खुद के स्वार्थ के लिए कुछ मत मांगो या तो मांगो तो जगत का कल्याण और या तो मांगो तो फिर आध्यात्मिक साधना में सिद्धि लाभ यही दो चीज ईश्वर के सामने मांगनी चाहिए और फिर इन दोनों की सिद्धि के लिए ईश्वर को हमको जो देना है वह ईश्वर दे देंगे उसके बाद में हमको फिर बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं ईश्वर यदि यह सोचेंगे कि हां इसका शरीर धारण र करने से उसका शरीर टिके रहने से बहुत सारे लोगों का कल्याण होगा जगत में यह धार्मिक भावना और विकसित होगी तो इसके शरीर को ठीक-ठाक रखो जिससे कि बाकी का काम भी सत्व अच्छे सुचारु रूप से चले तो ईश्वर ही यह सब सोचेंगे कि हमको अपना कार्य करने के लिए क्या-क्या चाहिए धन की आवश्यकता है तो धन आ जाएगा आज राम कृष्ण में देखिए कि हमारा यह जो सेवा कार्य है हमारी डिस्पेंसरी है रूरल डेवलपमेंट है स्कूल है कॉलेज है इसको चलाने के लिए प्रचूर धन चाहिए तो वह धन भी ठाकुर दे दे रहे हैं ऐसा नहीं कहते कि मैं तो इस तरह से फकीर की तरह रहा मां के पास में बेचारी को औषध के लिए भी कुछ व्यवस्था नहीं थी रोटी कपड़ा मकान की ये जो हमको तकलीफ थी तो तुम लोग भी ऐसे रहो उन्होंने तो ऐसा नहीं कहा उन्होंने कहा जगत का कल्याण के लिए रामकृष्ण मिशन को जो चाहिए वह सब प्राप्त हो तो हमेशा देवी देवताओं के सामने कोई अच्छी महत चीज मांगिए और फिर उस महत उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए जो कुछ भी देना होगा वह देवता हमको स्वयं दे देंगे इसीलिए नव भावे रूपाय तो करें इसको या तो फिर नव रूप में रूपाय करेंगे रूपांतरण करेंगे या तो फिर इस मृत देह में पुरानी मृत प्रथाओं के भीतर में प्राण संचार करेंगे या तो फिर व सब आपात विरुद्ध प्रतिवेदन परिस्थिति में रह कर के भी अपना महात्म प्रकाश करके पथ भ्रांत जनगण के अर्थात कि जो अपना लक्ष्य भूल गए हैं ऐसे जन समाज को एक उच्च आदर्श की ओर खींच लेंगे एक उच्च आदर्श की ओर ले जाएंगे पुरानी प्रथाओं को यदि स्वार्थ प्राप्ति के लिए स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता था उन सबका त्याग करके ऐसी भयानक विकट परिस्थिति में जन्म ग्रहण करके पुरानी प्रथाओं को अपनाएंगे और पुरानी प्रथाओं के भीतर में अपनी खुद की आध्यात्मिक शक्ति है व डालेंगे वो प्रकट करेंगे और जन समाज को कहेंगे कि भाई देखो यह जीवन का इस समाज का यह हिंदू जन यह जो अपना जन समाज है जिसकी यह गठन हमारे वेद के ऋषि मुनि करके गए हैं वैदिक युग के उसका तात्पर्य यह है सही तात्पर्य उनको याद करवाएंगे और फिर इस तरह से पूरे जन समाज को यह मटेरियल ज्म का यह जो राक्षस हमको जो खा जा रहा है ये इंद्रिय सुख रूपी यह जो पथ भ्रांत हो गए इंद्रिय सुख को प्राप्त करने के लिए उनको एक ईश्वरीय महात्म रूपी नया पथ या तो वही सनातन पथ के ऊपर में फिर से आकर्षित करके लेके आए के जाने श्री मायर रूप आचरण पश्चात कौन निगुण उद्देश्य लुकाई तो छलो किसको पता मां का यह जो आचरण है सिंहवाहिनी के सामने धरना देना या वह जो कोयले का डाम लेना व मलेरिया को ठीक करने के लिए इसके पीछे क्या कोई गहन उद्देश्य छुपा हुआ था कौन कह सकता है हालांकि महाराज ने खुद ने उस गहन उद्देश्य के बारे में चर्चा की है किंतु अल्टीमेटली देखिए कि मनुष्य की बुद्धि की एक सीमा है हम लोग चाहे अपना रामकृष्ण साहित्य कितना ही पढ़ ले वेद वेदांत कितना ही समझने का सुनने का प्रयास करें अपनी बुद्धि की हमेशा एक सीमा रहती है और इस सीमित बुद्धि से ही उनके कार्यकलाप को हमको इसके बारे में सोचना है तो नेचरली माने क्या किया क्यों किया इसके पीछे का क्या तात्पर्य है वह हमारी सोच एक लिमिटेड दायरे के भीतर में ही होगी और यह हमको स्वीकार करके चलना है इस महाराज जी एक एक और तो उसका एक समाधान भी देते हैं साथ-साथ में यह कह भी देते हैं कि हमको ठीक ठीक बता नहीं पाएंगे कि यह सब चीजें क्यों हो रही है क्या इसके पीछे का गहन प्रयोजन है गहन उद्देश्य है तबे तीनी निजे बोलिया लेन तबे माने खुद ने कहा था आदर्श हिसाबे जा करते होए तार ढेर बाड़ा करे छी आद के हिसाब से जो कुछ करना होगा जो करना होता है वह बहुत बढ़ चढ़ करके किया है देखिए कि मनुष्य के जीवन में आदर्श छोड़ कर के है क्या और आदर्श ही हमारे जीवन में से चला गया तो मनुष्य का जीवन कैसा हो जाएगा अभी कुछ दिनों पहले मैं एक आर्टिकल पढ़ रहा था एक लड़के के बारे में यह लड़का छोटी उम्र में शायद कैसे भी करके जंगल में में खो गया था या तो फिर उसके माता-पिता की यात्रा करते-करते मृत्यु हो गई होगी या तो फिर अनाथ होगा जो भी होगा कैसे भी होगा वह जंगल में भूला पड़ गया और फिर यह पूरा जंगल में ही मैं बड़ा हुआ वह भालु हों के साथ में यह शेर के साथ में जंगली पशु पक्षियों के साथ में अभी जब कुछ समय बड़ा होने के बाद में जब किसी लोगों को पता चला कोई लोग जंगल में से यात्रा कर रहे होंगे इस लड़के को देखा तो उन्होंने कहा कि अरे यह तो है तो मनुष्य का लड़का यह मनुष्य का शरीर किंतु फिर भी जंगल में ये पशुओं के साथ में पशुओं की तरह ही रह रहा है यह कैसे आश्चर्य की बात है बोलक के इन लोगों ने इस लड़के को फिर शहर में लेकर आए और फिर सब लोगों ने इसके साथ में बात करने का प्रयास किया किंतु प्रॉब्लम यही है कि छोटी उम्र में जबकि बोलना उसने बोलना वगैरह नहीं सीखा होगा उसी उम्र में यदि वह जंगल में भूला पड़ गया होगा और जंगल में पशुओं के साथ में बड़ा हुआ होगा तो उसको तो फिर मनुष्य की वाणी यह हमारी भाषा कैसे आएगी तो कुछ बोल नहीं करके वह यह पशुओं की तरह वह बात कर रहा है मने पशु लोग किस तरह से वो दहाड़ करके या तो चिल्ला करके या तो फिर यह सब वो करके वह जो बातें करते हैं अपनी जो उनकी एक स्पेशल लैंग्वेज होती है उसमें वह कम्युनिकेशन करते हैं तो यह लड़का भी वो इस तरह से पशुओं की आवाज करने लगा तो अभी क्या है कि यह घटना उस समय बड़ी प्रसिद्ध हो गई थी और यह जंगल बुक बोलकर के एक एक बड़ी ही एक फेमस कहानी है उसमें ऐसा ही एक लड़का जंगल में खो जाता है या फिर पशुओं के साथ में बड़ा होता है इस तरह की कहानी वो लिखी गई तो वो जो कहानी लिखी गई थी ये इसी लड़के की वो कहानी के ऊपर में इसी लड़के का जो न्यूज़ बड़ा फेमस हो गया था तो लिखी गई थी अभी इस लड़के का फोटोग्राफ उस आर्टिकल में था अभी उसका चेहरा आप देखेंगे तो बिल्कुल एक जंगली व्यक्ति की तरह एक पशु की तरह उसका चेहरा था हालांकि चेहरा है मनुष्य का किंतु चेहरे के ऊपर में जो एक्सप्रेशन है जो भाव है वह पशु के भाव है तो देखिए कि शरीर मनुष्य का है किंतु भाव जो है वह है पशु के क्योंकि वह कभी सिविलाइजेशन में रहा ही नहीं नहीं कभी यह जो आध्यात्मिक या तो फिर यह जो सामाजिक इन्फ्लुएंस है उसके ऊपर में आया ही नहीं तो उसका चेहरा देख कर के मुझे एकदम समझ में आया कि देखिए हम अपने बच्चों को बचपन से ही यह सब अच्छी बातें अच्छे संस्कार गुड मैनर्स यह जो सब सिखाते हैं ईश्वर को प्रार्थना करने के बारे में ईश्वर के गुणगान जो सिखाते हैं यह विद्या अर्जन करने के लिए स्कूल वगैरह में भेजते हैं पाठशाला में इसका प्रभाव हमारे ऊपर में कितना गहन होता है भले ही चाहे हम बिकॉज के सभी लड़के आजकल इस तरह से पढ़ाई लिखाई करते हैं अच्छे संस्कार अर्जन करने का प्रयास करते हैं तो हमको लगता नहीं है इस बात का वैशिष्ट्य क्या है या तो फिर इस बात का महात्म्य क्या है किंतु इस तरह से सडन एकदम विरोधाभासी कोई चित्र हमारी नजर के सामने आ जाए तब हमको लगता है कि अरे जिसको हम संस्कार कहते हैं है जिसको हम कल्चर कहते हैं जिसको हम आध्यात्मिकता कहते हैं जिसको विद्या कहते हैं जिसको गुड मैनर्स कहते हैं इसका हमारे जीवन में कितना बड़ा प्रभाव है वरना तो वो लड़का भी मनुष्य का देह धारण किए हुए हैं हम भी मनुष्य का देह धारण किए हुए हैं किंतु उसके भीतर में भाव है पशु का और हमारे भीतर में तो मां ने कहा है कि देखिए यह हमारा मनुष्य जीवन है किसी एक आदर्श के ऊपर में गठित हुआ है सभी को अपना-अपना धर्म दिया गया है पति धर्म भी है पत्नी धर्म भी है विद्यार्थी धर्म भी है राज धर्म भी है एक आदर्श राजा को किस तरह से राज्य चलाना चाहिए एक आदर्श पति को किस तरह से अपने परिवार की संभाल रखनी चाहिए एक आदर्श आश पत्नी या आदर्श मां को किस तरह से अपना परिवार चलाना चाहिए बच्चों को संस्कार देना चाहिए तो वैसे ही यह जितने भी आदर्श है इस आदर्श का समग्र वही तो मनुष्य जीवन है एक पत्नी के भीतर में से आदर्श ले लीजिए क्या देह के सुख के लिए ही क्या विवाह हुआ है बच्चे के भीतर में से आदर्श ले लीजिए वह यदि विद्यार्थी धर्म का पालन नहीं करे तो दुनिया भर में वह घूमता फिरे किसी का साथ झगड़ा करेगा किसी के साथ मारामारी करेगा तो कहीं पर कुछ वही कुछ ना कुछ ट्रबल में जाकर के वह अटके आदर्श पिता में से आदर्श ले लीजिए पिता जद घर में आकर के अपने पत्नी को अपने बच्चों को धमका जाएंगे पिटाई करेंगे यह जो सब हम सुनते हैं ना इसकी एक सुंदर कहानी है मां उद्बोधन में रहती है और इतनी शांति से रहती है कि क्योंकि इतना सारा कार्य हो रहा है किंतु मां की महिमा वहां पर विराजमान है मां सदे है विराजमान है तो सब कुछ शांति से हो रहा है इतने सारे भक्त आते हैं बड़ी ही शांति से मां के दर्शन करते हैं प्रसाद प्राप्त करते हैं वहां मां रहती थी फर्स्ट फ्लोर पर और शरद महाराज रहते थे ग्राउंड फ्लोर पे मां के धवारी मां के वोह रक्षक मां के सेवक तो थ मां को जाकर के प्रणाम करेंगे आने वाले भक्त थोड़ा सा प्रसाद लेंगे थोड़ा सा शरद महाराज के पास में बैठेंगे थोड़ा सा गप लगाएंगे थोड़ा सा उपदेश सुनेंगे और चले जाएंगे इतने सारे साधु ब्रह्मचारी इतना बड़ा पब्लिकेशन हाउस चलता है शरद महाराज तो जनरल सेक्रेटरी ऑफ रामकृष्ण मिशन हालांकि जनरल सेक्रेटरी शब्द नहीं था किंतु वो कार्य तो जनरल सेक्रेटरी का ही करते थे तो इतना बड़ा सब कुछ कार्य होने के बावजूद पूरा शांति से आनंद से उद्बोधन चलता था तो एक दिन एकाएक क्या हुआ कि उद्बोधन के सामने झोपड़ पट्टी वगैरह है आपने शायद देखा ही होगा उस समय भी थी तो उस समय में वहां पे एक परिवार रहता था अभी पति जो है वह कहीं बाहर से यह तो मजदूरी का कार्य करके थके हुए घर आते हैं आ कर के देखा कि उसनी पत्नी ने खाना नहीं बनाया या तो फिर खाना बनाने में किसी वजह से देर हो गई तो इसने क्रोधित होकर के अपनी पत्नी की जो मारपीट चालू की है वह बेचारी चक्कर खाके गिर गई और चिल्लाने लगी अपने बचाव के लिए और यहां पे फर्स्ट फ्लोर पे जो उद्बोधन में मां बैठी थी शांति से जो भी कार्य कर रही होगी उसके कानों में यह पत्नी के स्व बचाव की चित्कार गई वैसे ही मां खड़ी होकर के बाहर निकली वहां पर वह जो वरांडा था वो रांडे में खड़े होकर के मां ने चिल्ला कर के कहा कि अरे तुम क्या अपनी पत्नी को मार ही दोगे क्या तुम्हारे में थोड़ा सा भी यह यह नहीं है पेशेंस नहीं है क्या अपनी पत्नी की इस तरह से पिटाई करते हो ऐसा करके मां ने ऐसा रुद्र स्वरूप धारण करके चिल्लाया कि वो जो आदमी अपनी पत्नी की पिटाई कर रहा था उसके जैसे सांप के सर पर धूल डालने से व सांप कैसा एकदम चुप हो जाता है आपको वैसे तो क्रोधित होकर के दस नहीं को आता है वो किंतु जैसे ही धूल डालेंगे उसका क्रोध उसका वो जो पावर्स एकदम ठंडा हो जाएगा तो मां ने ऐसा रुद्र रूप धारण करके चिल्लाया कि वह आदमी जिसका क्रोध वगैरह घमंड वगैरह सब एक क्षण में चला गया और एकदम बेचारा भई के मारे वह एकदम डर गया और यहां उद्बोधन में एकदम भल्ला मच गया कि अरे मां की आवाज कभी सुनाई नहीं देती थी यहां मां ने एकाएक चित्कार करना क्यों शुरू कर दिया तो वे लोग भी दौड़े-दौड़े आए मां क्या हुआ मां क्या हुआ तो सबने तो देख कर के ही समझ गए कि वह आदमी अपनी पत्नी की पिटाई कर र रहा था और माने उसके बचाव के लिए ऐसा रुद्र स्वरूप धारण करना पड़ा है किंतु देखिए मनुष्य जीवन में से जीवन के जितने भी एस्पेक्ट है उसमें से जद यह आदर्श चला जाएगा तो कैसा होगा यह पति आदर्श पति होने की वजह पशु की तरह अपनी पत्नी के साथ में व्यवहार कर रहा है मां ने जब उसको डाटा जम करके तब वह घबरा गया और फिर अपनी पत्नी की माफी मांगने लगा तो यह आदर्श ही हमको पशुओं से ऊपर में ले जाते हैं वरना पशु और मनुष्य में फर्क क्या है मनुष्य का शरीर और यह बंदर का शरीर कहो या तो यह भालू का शरीर कहो ना कि यह कुत्ते बिल्ली का शरीर कहो फर्क क्या है एक्चुअली जद देखेंगे तो बहुत सारे बायोलॉजिस्ट तो ऐसा कहते हैं कि पशु का शरीर जो है वह हमारे से ज्यादा तेज है हमारे से ज्यादा हेल्दी है हमारे से ज्यादा वो क्या कहेंगे कि वो सर्वाइवल ऑफ द टेस्ट कहते हैं ना तो यह सर्वाइवल गेम में वो सर्वाइवल करने के लिए उनका देह हमारे से बेटर है तो फिर उनमें और हम में फर्क क्या रह गया फर्क रह गया संस्कार का फर्क रह गया आदर्श का और इसलिए माने कहा है कि आदर्श की रक्षा करने के लिए आदर्श को जितना भी पालन करना होता है उससे बहुत कहीं जाकर के बढ़ा चढ़ा करके आदर्श का पालन किया है पत्नी का आदर्श मां का आदर्श धर्म गुरु की पत्नी का आदर्श क्योंकि वह तो ठाकुर तो एक सामान्य पति नहीं थे वह तो जगत के अवतार थे अवतार के रूप में जगत में अवती हुए थे तो अध्या शक्ति का आदर्श इस आदर्श को कहीं बढ़ा चढ़ा करके मां ने उसका पालन किया है तब मां ने जद 100% किया तो हम लोग कहीं जाकर के 1 पर 2 पर कर पाएंगे माने यदि 1 पर 2 पर किया तो तो हम लोग क्या करने वाले थे इसलिए हमको प्रेरणा देने के लिए और आदर्श की स्थापना करने के लिए तो आज यही तक कल फिर सनत है ओ शांति शांति शांति हरि तसत श्री राम कृष्ण पर मस्तु