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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

देवीत्‍व का जागरण : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 18 Apr 2024

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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णा यते नमः मां शारदा देवी की जीवनी हम लोग देख रहे थे कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज मां की सड़सी पूजा की पूर्व भूमिका बा सबसे पहले तो उन्होंने कहा कि एक के पहले तो जो प्रतिपादित करना था ठाकुर और मां की पवित्रता और दिव्यता क्योंकि पवित्रता और दिव्यता का ही आधार है आध्यात्मिक जीवन का यह फाउंडेशन है तो किस तरह से और फिर ठाकुर जो मां को उपदेश देते हैं वह भी कितने सुंदर सुंदर उपदेश है चांदा मामा सभी के मामा है जिस तरह से चांद पहले और खास करके य आज हमको इतना सिग्निफिकेंट शायद ना लगे किंतु उस समय के कांटेक्ट में उस दिनों के चश्मे पहन के जद देखेंगे तो यह बड़ा ही सिग्निफिकेंट होगा क्योंकि हमको पता है कि हमने जब फ्रीडम मूवमेंट का स्टडी करेंगे तो मंदिरों में प्रवेश अधिकार देने के लिए बहुत सारे आंदोलन चलाए गए थे कोई भी एक मंदिर है उसमें सभी को प्रवेश का अधिकार नहीं था तो फिर जो जिन लोगों को नहीं था वे लोग आंदोलन करते थे और उनको मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार मिलता था यहां तक कि और माने और बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है जब इंदिरा गांधी जगन्नाथ पुरी मंदिर में गई थी तो ऐसा हो गया था कि शायद उनको वहां पर प्रवेश नहीं मिलेगा क्यों क्योंकि वह विधवा थी तो मने यह कौन क्या है उसको देख कर के देवता के मंदिर में प्रवेश देना किसकी क्या जाति है क्या नाती है उसके अनुसार मंदिर में प्रवेश देना यह तो ऐसा हो गया ना कि मंदिर के देवता हमारे पर्सनल देवता है उनके ऊपर में और किसी का अधिकार नहीं है तो हालांकि वैदिक संस्कृति में तो ऐसा सब नहीं था किंतु बाद बाद में हमको पता है स्वामी जी ने भी कहा है स्वामी जी ने हालांकि दो तरह से बात कही है स्वामी जी ने एक तरह से तो यह भी कहा है कि विदेशी आक्रमण हमारे पर प्रारंभ हुए तब से लेकर भारत में बहुत सारी कु प्रथाएं प्रवेश की यह भी स्वामी जी ने कहा है और साथ-साथ में स्वामी जी ने यह भी कहा है कि कुछ कुछ कु प्रता हों का मूल हमारी संस्कृति के साथ में ही पहले से ही जुड़ा हुआ था कोई भी संस्कृति कभी भी परफेक्ट नहीं होती सभी संस्कृतियों को समय के साथ-साथ में इवॉल्व होना पड़ता है समय के साथ-साथ में अपने को डेवलप करना पड़ता है तो वो एक समय था वैदिक यु युग का और आज का यह समय है आज हम जिस तरह से हमारा कांस्टिट्यूशन भारत का सबको समान अधिकारत्ती के देवता भी सभी स्त्री हो ना कि पुरुष हो विधवा हो ना कि कुमारी हो कोई भी जाति का हो ब्राह्मण हो कि अब्राह्मण हो सभी को वह खुले हाथों से खुले हृदय से वेलकम करते हैं याद होगा कि बाल गंगाधर तिलक ने यह सोचा कि यदि हम लोगों का समाज जिस तरह से बट गया है तो समाज में सभी को इकट्ठा करने के लिए एक ऐसे देवता की पूजा चालू की जाए जो कि सबको समान रूप से वेलकम करते हैं तो फिर उन्होंने गणेश पूजा चालू की तो इस तरह से देखिए कि बंगाल में भी अपने बेलूरमठ में ही देखिए जब बेलूरमठ के ऊपर में बेलूरमठ की स्थापना हुई थी बेलोर रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई थी 18971 फर्स्ट में तो उसके बाद में धीरे-धीरे करके मठ की स्थापना हुई मठ में विदेशी देश अपने भारतीय सभी भक्त साधु ब्रह्मचारी इकट्ठा मिलना शुरू हुए साधना शुरू हुई तो आपस के कुछ-कुछ लोगों ने ऐसा प्रचार चालू किया कि अरे यह तो विदेशी लोगों का मठ है पहले तो यह मठ ही नहीं है और नरेंद्र जो है जिसको अपने को विवेकानंद कहलाता है वह साधु ही नहीं है वह एक बाबू है और विदेशी लोगों को लेकर के वो बागान वाड़ी में रहते हैं मठ नहीं बागान वाड़ी है तो उस समय स्वामी जी को दर्शन हुआ मां दुर्गा का और साथ-साथ में ही राजा महाराज को अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद जी को भी मां दुर्गा का दर्शन हुआ और फिर दुर्गा प्रतिमा प्रतिष्ठित करके दुर्गा पूजा प्रारंभ की तो जैसे ही दुर्गा पूजा प्रारंभ की जितने भी आसपास के ब्राह्मण परिवार थे जो कि अपने को बड़ा अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स समझते थे अपने को बड़ा कंजरवेटिव समझते थे वे लोग भी आकर के मंदिर में प्रतिदिन जो पूजा हो रही है बिल्कुल शास्त्रीय विधि से जो पूजा होनी चाहिए वैसे ही दुर्गा पूजा हो रही है देख कर के संतुष्ट हुए और स्वीकार किया कि हां यह मठ जो है वह सही सही भारतीय हिंदू सनातन परंपरा को ही रिप्रेजेंट करता है तो इस तरह से इस तरह के देवता की प्रतिष्ठा करना और सभी भक्तों को खुले हृदय से आमंत्रण दे ना वो दो तरह से फायदेमंद है सबसे पहले तो इस तरह के देवता जो कि बिना किसी नात जात के विचार किए हुए सभी को अपने शरण में आश्रय देते हैं उनकी आराधना करने से आध्यात्मिक चेतना बहुत ही अ झड़प से बहुत ही स्पीड़ी नहीं वो जागृत होगी वह तो एक बात है दूसरा है कि अपनी जो भारतीय संहति है यह जो राष्ट्रवाद है राष्ट्रवाद यह भारत के प्रति अपना प्रेम इस मातृभूमि इस मिट्टी के प्रति अपना लगाव इसको भी जागृत कर देता है क्योंकि जद देखिए कि विदेशी जब आक्रमण स्टार्ट हुए उन लोगों ने बहुत चालाकी से साथ में ये ऑब्जर्व क्या किया कि यह समाज अपने में ही बटा हुआ है तो इन्हीं में से कुछ लोगों को ले लो उन लोगों को अपनी आर्मी में सैनिक बना दो उन्हीं लोगों को अपनी खुफिया एजेंसी में डाल दो और उन्हीं लोगों के द्वारा भारतीयों का उत्पीड़न करो भारतीयों का दमन करो और यह स्ट्रेटेजी जी उनकी डिवाइड एंड रोल एकदम 100% सक्सेसफुल हुई एटलीस्ट कुछ समय तक बाद बाद में तो भारत के देवता जागृत होकर के हमको वो अकल दिलाए कि इस तरह से यदि बाहर वाला डिवाइड एंड रूल करता है तो बाहर वालों की इसमें कोई गलती नहीं है हमारे में ही फूट फाट पड़ी है तो फिर हम लोग वे लोग आकर के उसका बेनिफिट लेंगे ही लेंगे क्या है यदि डेड बॉडी पड़ा हुआ है तो देखेंगे कि थोड़े ही समय में स्कैवेंजर्स जिसको बोलते हैं ना य कीड़ी मको यह जो भी पशु पक्षी आकर के उस डेड बॉडी को नोचना शुरू कर देंगे क्यों क्योंकि डेड बॉडी इस प्रकृति को पसंद नहीं है जैसे ही डेड बॉडी पड़ा हुआ देखेंगे कुछ ही समय में सब स्कैवेंजर्स आकर के उसको खा जाएंगे तो वैसे ही इस भारतीय जो ये ह्यूमन सभ्यता है यह ह्यूमन सिविलाइजेशन है उसको डेड नेशन मृत देश पसंद नहीं है जैसे ही एक देश मृत प्राय होने को जा आ रहा है वैसे ही देखेंगे यह जितने भी स्कैवेंजर्स से बाहर से हत्यारे आएंगे भीतर में से भी ऐसे हत्यारे जन्म लेंगे जो कि इस सभ्यता को नोच के खा जाएंगे तो हमेशा हमको एक जीवंत सभ्यता होना है जीवंत सभ्यता होने के लिए जीवंत देवता चाहिए जो कि सभी को जाति वर्ण निर्वित बिना विचार किए सबको अपने आश्रय में स्थान दे तो अब यह है अभी ये जब ठाकुर ऐसी बात करते हैं देखिए कि यह जो स्वामी जी ने जो एंटीसिपेट किया दुर्गा पूजा के माध्यम से जितने भी विरोधी है सबको इकट्ठा करना या तो फिर बाल गंगाधर तिलक ने यह जो गणेश पूजा करके ये जो महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद का एक आंदोलन जागृत किया इसकी प्रतिध्वनि प्रति मने उसका जो सर्वप्रथम जो उसका आवाज है वो ठाकुर को इस बात में हमको मिलता है कि चांदा मामा सभी के मामा है सभी का चांदा मामा को पुकारने का अधिकार जैसे है वैसे ही ईश्वर भी सभी के ईश्वर है उनको पुकारने का उनकी आराधना करने का अधिकार सभी को है आप चाहे कोई भी हो ईश्वर के सामने सब संतान के समान अधिकार सबका एक ही है संतान के समान सभी एक ही है अभी थोड़ा सा आगे में पाठ करते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं माता ठाकुरानी श्री रामकृष्ण गृहे तहरी पार्श्व शयन करी ते जान मां ठाकुरानी ठाकुर के घर में ही उनके साथ में ही शयन करने के लिए जाती थी किंतु यहां तो साधारण दांपत्य जीवन न है परंतु यह तो कोई साधारण दांपत्य जीवन नहीं है पूर्ण जवन श्री श्री ठाकुर और नवज बना श्री श्री माता ठाकुरानी अधुना ज आत्म परीक्ष किंबा जन समाज शिक्षा प्रदो लीला बला से प्रवृत होया छ ताहर निकट अ अग्नि परीक्षाओं यह कोई साधारण या सामान्य दांपत्य जीवन नहीं है दोनों एक साथ में शयन तो करते हैं किंतु इस मिला के पीछे एक गहन अर्थ छुपा हुआ है पूर्ण यवन श्री श्री रामकृष्ण और नव यौवना श्री श्री माता ठाकुरानी जो परीक्षा जिस आत्म परीक्षा या तो फिर जन समाज को शिक्षा देने के लिए जो लीला विलास में प्रवृत्त हुए हैं वह उनके लिए अग्नि यह लीला जो विलास के लिए प्रवृत्त हुए हैं वो अग्नि परीक्षा से बिल्कुल ही कम नहीं है हमको पता है कि यहां पर तो ऐसा लिखा है कि जिसके सामने अग्नि परीक्षा भी तुच्छ साबित होगी देखिए जब मां सीता उनको लंका से लेकर के भगवान राम वापस आए अयोध्या में तो यह जो विचित्र मन के कुछ कुछ लोग रहते हैं उन लोगों ने आपस में बातें करनी शुरू की कि मां सीता तो वहां पर रहकर आई है पता नहीं इनके चरित्र के बारे में अभी हम क्या कहेंगे ऐसी कुछ-कुछ बातें सुनकर के भगवान राम ने मां सीता का त्याग किया और फिर जब आखिर में सही सही जो एक एक त्याग करने से पहले मां सीता अग्नि परीक्षा भी देने के लिए तैयार हो गई थी और जब अग्नि में प्रवेश किया अग्नि भी मां सीता को जला नहीं पाया अर्थात कि मां सीता का जो मां सीता की जो पवित्रता है वह इतनी शुभ्र थी वो इतनी पावरफुल थी कि अग्नि भी मां सीता को जला नहीं पाई तो वो अग्नि परीक्षा अभी अ यह आ मैं कभी-कभी इस तरह की बातें सुनता हूं तो मुझे यह भी एक प्रश्न होता है कि इस तरह की अग्नि परीक्षा स्थि सिर्फ स्त्रियों को ही क्यों देनी पड़ती है पुरुषों को क्यों नहीं अभी जद मां सीता वहां पर रही थी लंका में तो भगवान राम भी तो इस तरह से वन वन में एक एक देश से दूसरे देश भ्रमण किए है तो उनकी पवित्रता के बारे में क्यों किसी ने संदेह नहीं किया तो ऐसे ऑफकोर्स भगवान राम तो पुरुषोत्तम है संदेह करना ही नहीं चाहिए किंतु जो मूर्ख लोग है वो इस तरह की बातें यदि करते हैं तो फिर भगवान राम पे भी क्यों उंगली नहीं ची दी यह भी देखिए कि एक मनुष्य मन की एक विचित्र है एक समाज की एक जटिलता है कि जब भी परीक्षा देनी पड़ती है पवित्रता की तो स्त्रियों को ही देनी पड़ती है तो जो भी है यहां पर भी देखिए कि भगवान श्री रामकृष्ण वो भी तो युवान थे मां शारदा देवी भी नव यौवना थी अभी जब दोनों एक साथ में शयन कर रहे हैं तो ये उनकी यह जो परीक्षा किसी भी अग्नि परीक्षा से कम नहीं थी और यह अग्नि परीक्षा देने उन्होंने क्यों स्वीकृत किया क्योंकि समाज में उनको एक आदर्श स्थापित करना है यदि समाज में इस तरह का एक आदर्श स्थापित ना किया जाए कि हां आप संसार में भी रह करर के ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं तो यह जो अपने जो भारतीय परंपरा की ये जो दो पंख है ना पक्षी के दो पंख होते हैं तो दोनों पंख से ही पक्षी उड़ता है तो वैसे ही ईश्वर प्राप्ति यह दोनों व्यवस्था में रहकर के हो सकती है सन्यास आश्रम में भी और गृहस्थाश्रम में भी यह प्रतिपादित करना होगा हालांकि देखिए ओरिजिनल भारतीय पद्धति तो यह थी कि पहले 25 वर्ष होगा कि ब्रह्मचर्य आश्रम उसके बाद में 25 साल होगा कि गृहस्थाश्रम फिर 25 साल आप गृह कर्म से धीरे-धीरे निवृत्त होकर के वानप्रस्थाश्रम में जाए और फिर आखिर में सन्यास आश्रम ग्रहण करें तो आज पता नहीं कि इस तरह की व्यवस्था फिर से सक्सेसफुल हो सकती है कि नहीं उस समय भी सभी लोग तो इस तरह से नहीं करते थे और ऐसे लोग भी थे जिनके के भीतर में त्याग की अग्नि इतनी प्रचंड रूप से प्रज्वलित थी कि वह लोग संसार में प्रवेश करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे तो फिर एक ऐसी भी व्यवस्था हुई यह जो क्षत्रिय लोगों ने खास करके इसको प्रारंभ किया है कभी-कभी अपना ट्रेडिशनल पढ़ेंगे बड़ा ही गौर करके बड़ा ही ध्यान से तो यह एक कंफ्लेक्स और ब्राह्मण के प्रति ब्राह्मण लोगों ने शुरू शुरू में एक इस तरह से उन्होंने रंभ किया था कि ये जितनी भी विधि है जितने भी यह जो अग्नि है जितने भी होम है जितने भी देवता है उनके ऊपर में हमारा व्यक्तिगत अधिकार है और उनके माध्यम से यदि आप विधि वगैरह ना करवाए ये जो राइट्स एंड रिचुअल्स यदि ना करवाए तो आप उस ईश्वर की प्राप्ति शायद ना कर पाए तो इस तरह से उनका एक जो मोनोपोली हो गया था ईश्वर तत्व के बारे में ईश्वर साधना के बारे में ये क्षत्रिय लोगों ने उस मोनोपोली को तोड़ा ये जो उपनिषद है और य इवन यह जो बुद्धिज्म है यह जैनिज्म है जो कि जिसमें त्याग प्रचंड रूप से भरा पड़ा है यह देखेंगे कि क्षत्रीय कुल की ही यह एक गिफ्ट है टू द मैनकाइंड टू द ह्यूमन काइंड यह भगवान बुद्ध भी क्षत्रिय थे यह भगवान जैन महावीर भी क्षत्रिय थे फिर यह भगवान राम और भगवान कृष्ण जिन्होंने इसी उपनिषद तत्व को जनसाधारण में प्रचार किया वे लोग भी क्षत्रिय थे तो इसीलिए यह जो क्षत्रिय परंपरा जो है किंतु क्षत्रिय परंपरा को इस तरह से समाज में फैलाना सभी आश्रम में फैलाना सिर्फ यह नहीं कि गृहस्थ आश्रम में जो कि ब्राह्मण लोग थोड़ा सा ज्यादा फेवर करते थे उन लोगों की जो परिस्थिति जो उन लोगों की प्रणाली थी चार आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम गृहस्थ आश्रम वानप्रस्थ आश्रम संन्यास आश्रम और यह क्षत्रिय लोगों ने जिसका प्रवर्तन किया कि ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा सन्यास आश्रम में प्रवेश अभी देखिए कि भगवान राम कृष्ण अपनी जो राम कृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशनल देखने को मिलती है कि भगवान राम कृष्ण ने उसी ऋषि परंपरा का ब्राह्मण परंपरा का प्रतिनिधित्व किया है जिसमें कि गृहस्थाश्रम करते तो है किंतु धर्म के आधार पर त्याग के आधार पर ईश्वर प्राप्ति ईश्वर साधना के आधार पर अर्थात कि सही सही गृहस्थाश्रम क्या कहेंगे किसको कहेंगे वो भगवान रामकृष्ण और मां शारदा देवी ने दिखा दिया और यह जो क्षत्रिय परंपरा है ठीक ठीक क्षत्रिय परंपरा कौन सी है तो पूर्ण यवन में ही संसार त्याग करके गृहस्थ आश्रम को ठोकर मार करके पूरे ईश्वर में अपने मन को लगा देना और सिर्फ ईश्वर में ही नहीं यह जो अद्वैत वेदांत की जो परिकल्पना है कि हां मेरे भीतर में ही आत्मन विराजमान है मेरे भीतर में ही ईश्वर है अहम ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्मण हूं बस यह जो अज्ञान का एक आवरण हमारे मन के ऊपर में लगा हुआ है वो मुझे पहचानने नहीं देता मेरा सही स्वरूप क्या है मैंने इस शरीर के साथ में अपने को आइडेंटिफिकेशन हो जाना होगा यह जो पूर्ण त्याग का पथ है सन्यास का पथ यह भी स्वामी जी ने दिखाया अर्थ की ये जो पक्षी की दो पाक है सत गृहस्थ आश्रम सही सही गृहस्थ आश्रम धर्म के आधार पर कैसा होना चाहिए वो भी हमको देखने को मिलता है मां और ठाकुर के जीवन में और हमारी क्षत्रिय परंपरा के अनुसार त्याग का रास्ता कौन सा है वह भी देखने को मिलता है यह स्वामी विवेकानंद और गुरु भाइयों के जीवन में अच्छा जदी कहेंगे कि भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों गृहस्थ भी थे तो यह भी देखना है कि ये लोग उस लेवल पर रहते ते थे कि यह जो डिफरेंस हमको जो दिखते हैं ना कि यहां यह गृहस्थ है या यह त्यागी है ना कि ये हित फॉलो करता है ना कि व अद्वैत फॉलो करता है यह जो डिफरेंस हमारे लेवल प जो रहते हैं उनके लेवल पे यह डिफरेंस सब मिक्स हो जाते हैं वो सब डिफरेंस अदृश्य हो जाता है क्योंकि आखिर में ब्रह्मण तो एक ही है यह जो सोशल मेनिफेस्टेशन है उसका सांसारिक उसका जो बही प्रकाश है वह तो क्षण भंगुर है बाहर से दिखाने के लिए है भीतर में जैसे जैसे जा तो यह सन्यास संसार या द्वैत या अद्वैत यह ब्राह्मण या क्षत्रिय यह गृहस्थाश्रम ना कि यह वानप्रस्थाश्रम यह जितने भी भेद है वह सब विगण होकर के एक ही ब्रह्मण में मिलित हो जाएंगे तो जैसे ही ब्रह्म साक्षात्कार हुआ वैसे ही यह सब स्वरूप बाह्य स्वरूप नहीं दिखते हैं तो भगवान राम और कृष्णा गृहस्थ थे सन्यासी थे वह नहीं सोच कर के ऐसा सोचना है कि वे लोग ऑलरेडी ब्राह्मण में प्रतिष्ठित थे तो यहां पे भी ठाकुर और मां यवन के प्रारंभ में ही जिस अग्नि परीक्षा देने के लिए उधत हुए हैं जिस अग्नि परीक्षा देने की उन्होंने एक प्रारंभ किया है वह एक लीला विलास के रूप में हम लोगों को शिक्षा देने के लिए कि सत गृहस्थ आश्रम कैसे बिताया जाए इसके बारे में एक इंटरेस्टिंग स्टोरी है अखंडानंद जी जब प्रेसिडेंट हुए उस नहीं प्रेसिडेंट तो नहीं वाइस प्रेसिडेंट थे जब उनको दीक्षा देने के बारे में बताया गया तो उन्होंने एक नियम किया कि यदि पति पत्नी दीक्षा लेना चाहते हैं तो उनको ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ेगा अदर वाइज व दीक्षा नहीं देंगे तो अभी इस तरह का कठोर कौन प्रॉमिस दे सकता है कि हां हम लोग पति-पत्नी साथ में ही रहेंगे फिर भी हम ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे झूठ मूठ की बात कर सकते हैं कि हां हम पालन करने का प्रयास करेंगे किंतु नहीं हुआ तो नहीं हुआ ऐसा फिर झूठ बोल कर के द लेना भी तो ठीक नहीं है तो कुछ कुछ भक्तों ने जाकर के महापुरुष महाराज को कंप्लेन किया कि देखिए हम लोग गंगाधर महाराज के पास में जाते हैं दीक्षा लेने के लिए किंतु वो हमसे इस तरह का वचन लेते हैं कि तुम लोगों को संसार में ब्रह्मचर्य का पालन करना है तभी मैं दीक्षा दूंगा तो हम लोग तो महाराज संसारी है हम लोग संसार में रहकर किस तरह से इस तरह का वचन दे पाएंगे और इस तरह से तो हमको दीक्षा भी नहीं मिलेगी तो ये महापुरुष महाराज ने ये बात सुन कर के गंगाधर महाराज जब बेलूरमठ आए थे उनको बताया कि भाई देखो हम लोग जिस तरह से जो त्याग तपस्या और यह जो आदर्श लेकर के रहते हैं गृहस्था आश्रम में यह तो संभव नहीं है तुम इस तरह की इंपॉसिबल कंडीशन मत खड़ी करो कि जिससे कि यह लोग झूठ बोलने पर मजबूर हो जाए या तो फिर दीक्षा ही ना ले तुम अपना हृदय थोड़ा सा उदार करो और सबको दीक्षा देने की शुरुआत करो तो आदर्श है अपने सामने कितना फॉलो करना हम लोग भी संन्यास आश्रम में है संन्यास आश्रम के जो आदर्श है उसका का यदि 10 पर भी मेरे से होगा तो जद मैं अपने को लकी समझूंगा आई विल कंसीडर माइसेल्फ फॉर्चूनेटली स्वामी विवेकानंद के सामने मैं कौन सी चीज हूं मने मैं किस खेत की मली हूं यदि वो कहावत का यदि वो किया जाए उपयोग तो वो स्वामी विवेकानंद के सामने यदि 1 पर भी मैं आदर्श का पालन कर पाऊं सन्यास का तो भी तो मेरे लिए बहुत है स्वामी जी वो लंडन में राजयोग का क्लास ले रहे थे समाधि किस तरह से होती है वह बता रहे हैं और वहीं पर वह समाधि मग्न भी हो गए हम लोग तो कितने सालों सालों जन्म जन्मांतर तक तपस्या करेंगे तब कहीं जाकर के हो सकता है प्रार्थना करेंगे कि शायद समाधि मिल जाए तो आदर्श भारतीय परंपरा में बहुत उच्च सभी लोग हमारे सामने रख ग अवतार भी ऋषि मुनि भी प्रोफेट्स और सेंट सभी लोग हमको यह देखना है कि कहां तक हम फॉलो कर सकते हैं और कभी-कभी ऐसा होता है ना कि में आदर्श एक नजर के सामने रख कर के फॉलो नहीं होता है तो एक तरह का एक मायूसी या तो गिल्ट फीलिंग आ जाता है कि अरे मेरे सामने यह आदर्श है मैं नहीं फॉलो कर पा रहा हूं अर्थात कि मेरा जीवन ही मतलब मैं तो गड्ढे में ही गिरंगा मेरा आध्यात्मिक जीवन पूरा मिट्टी में मिल गया इस तरह से एक होता है कभी-कभी भाव आता है मेरे साथ में भी ऐसा काफी ब कई बार हुआ है जब भी बेलूर मठ में ऐसा था हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में थे ना तो इस तरह से एक प्रथा है कि एवरी सैटरडे नाइट अभी संडे को क्लास नहीं होता बाकी दिन तो क्लास होता है आपको एक सेकंड का भी टाइम नहीं मिलेगा संडे को क्लास नहीं होता अभी क्लास नहीं होता यह भी कहना एक उन्हें हास्यास्पद ही है क्योंकि संडे को फिर अपनी रूम का क्लीनिंग करना पड़ता है उसमें इतनी एनर्जी चली जाती है कि उससे बेटर है कि क्लास में बैठ के पंखे के नीचे में व आचार्य महाराज की बात सुने किंतु फिर भी ऐसा वो कि संडे को क्लास नहीं है तो सैटरडे पूरी रात जप यज्ञ करो तो पूरी रात बैठना है पूरी रात बैठ कर के जप यज्ञ करना है यज्ञ का अर्थ है कि जप करने में विराम ना होना चाहिए अभी इंडिविजुअल लेवल प तो शायद ये संभव नहीं है किंतु सभी लोग मिलकर के जप करते हैं तो जप यज्ञ उसमें विराम नहीं होगा तो आइडियल स्पीकिंग सभी को पूरी रात बैठना है किंतु प्रैक्टिकली तो ऐसा होता नहीं है तो फिर दो-तीन ब्रह्मचार्य को ड्यूटी दी जाती है कि व सब सभी को बोल दिया जाता है ये तुम्हारा समय ये तुम्हारा समय जैसे कि मुझे बोल दिया कि रात को 11 से 1 बजे तक ब बैठना है फिर और किसी को बोल दिया कि रात को 1 बजे से लेकर के 400 बजे तक 3:00 बजे तक बैठना है ऐसा ग्रुप बना कर के बोल देते हैं और दो-तीन ब्रह्मचारी होते हैं कि जिस ग्रुप की बारी है अभी जिस ग्रुप का अभी वो टाइम है उनको बुला कर के कहेंगे नींद से जगा करके अरे उठो उठो तुम लोगों का टाइम हो गया वहां पे चैटिंग हल में जाकर के जप में बैठने का तो हम नींद में होंगे फिर एकदम उठेंगे अरे भाई जाकर के बैठना पड़ेगा क्या करेंगे जाकर के मुंह धोएंगे कैसे भी करके वो वो हॉल में जाकर के बैठेंगे और सब समय घड़ी पर नजर रहेगी कि रात को 2 बजे जिसका ड्यूटी आता है ज जप करने का एक से दो और तीन दो दो घंटे का होता है वो जो स्लॉट होता है तो एक से तीन का जिसको स्लॉट आया वो तो बेचारा मर ही जाएगा अभी क्योंकि नींद आधी खत्म हुई है आधी खत्म होने का नहीं है तो देखिए अभी ये तो कोई बात नहीं हुई घर छोड़ कर के आए हैं सन्यासी हो कर के आए हैं दक्षिणेश्वर में जब ये लड़के लोग ठाकुर के पास में जाते थे और रात को सोते थे तो ठाकुर उनको धक्का मार के उठा देते थे कि अरे तुम लोग यहां पर सोने के लिए आए हो ना कि ईश्वर प्राप्ति के लिए आए हो उठो उठो जप करो जप करो ध्यान करो ऐसा करके सबको कहां-कहां प भेज देते किसी को चांदनी के घाट प भेज देते थे किसी को पंचवटी पे किसी को अपने ही घर के रामदेव में बैठ कर के जप करने को बोलते थे तो ठाकुर ऐसा करते थे गुरु भाई ऐसा करते भी थे तो हमको पता है किंतु हमको खुद को ऐसा करना वो किस तरह से संभव है वो जो टीसी गया सो गया उसके बाद में मैं कभी भी रात भर जग करके जप नहीं किया है मुझे पता है मेरे से नहीं होगा तो अभी यह एक गिल्ट फीलिंग होना कि भाई साधु होने को आए हो और साधु परंपरा का एक बहुत ही महत्व का एक राइट है एक रिचुअल है उसका मैं पालन नहीं कर रहा हूं तो कैसे साधु होऊंगा तो ये गिल्ट फीलिंग आ सकती है किंतु मैंने अपने साथ में इस तरह से समाधान कर लिया है कि चलो मैं रात भर जग करके जप नहीं करता हूं तो कभी-कभी रात भर जग करके किताब अवश्य पढ़ लेता हूं क्योंकि मेरा रीडिंग का बड़ा ही बेड हैबिट है व अच्छी किताब आ गई तो फिर नींद फिन सब चली जाती है और ऐसा कई बार हुआ है कि मैं पूरी रात भर जग कर के किताब पढ़ी है तो मैं इस तरह से अपने मन को समाधान कर देता हूं हालांकि दिस इज नॉट आइडियल किंतु देखिए कि आइडियल कभी भी 100% हम अचीव नहीं करने वाले हैं नहीं कर पाएंगे ऐसा समझ के ही आध्यात्मिक जगत में कदम रखना है एक चीज और दूसरा कि ऐसा भी ना हो कि अच्छा आइडियल तो होने वाला ही नहीं है फॉलो तो छोड़ो ना आइडियल को बाहर से भे धारण करके रहो बाहर से गेरुआ धारण करके रहो भीतर में जो गड़बड़ होना है सो हो यदि ऐसा हो गया या तो फिर गेरुआ पहना है कि नहीं पहना है या तो फिर जद संसार आश्रम में है गृहस्थ आश्रम में है और एक बार मान ही लिया कि इस आश्रम में तो ईश्वर प्राप्ति की संभावना नहीं ही है चलो भोग विलास में डूब जाते हैं तो फिर क्या होगा पता है करप्शन और युद्ध साधु जद अपने भेक का अपने वेष का सम्मान नहीं करता तो भीतर में से आएगा करप्शन और यदि गृहस्थ अपने धर्म का पालन नहीं करेगा तो धीरे-धीरे करके यह समाज युद्ध गरीबी ये इकोनॉमिक डिप्रेशन और रेवोल्यूशन की ओर जाएगा यह जितने भी युद्ध चल रहे हैं सबके पीछे देखिए यह जो राज करते हैं राज करता लोग राजा लोग कहने को तो ये प्रेसिडेंट वगैरह है किंतु राजा की तरह ही रहते हैं वे लोग इतने भयानक करप्ट है अपने जीवन में कि सभी का शोषण करके करके धन संपत्ति हड़प ले रहे हैं और फिर समाज में निश्चय एक तरह का इससे असंतोष प्रकट होगा तो फिर ये लोग क्या करेंगे इस ये असंतोष अपने सामने ना अग्नि की तरह व हमको जला दे उनको बाहर में कहीं पर डायरेक्ट करेंगे कि देखो अपने दुश्मन देश हमारे पर आक्रमण करना चाहता है हमारा बुरा भला हमारे बारे में बुरा भला कहते हैं तो तुम लोग गरीब हो तुम लोगों का जो शोषण करते हैं इसकी तुम्हारी जो गलानी है तुम्हारा जो एक गुस्सा है उसको अपने दुश्मनों के प्रति डालो हम लोगों के प्रति मत उसको बहाओ कि हम लोग राजा है राज करेंगे शोषण भी करेंगे यह हमारा अधिकार है तो लोगों को मूर्ख बना कर के यह लोग पूरे समाज को युद्ध में डाल देते हैं या तो फिर यह करप्शन में डाल देते हैं तो दोनों तरीके से यह भयानक खतरा है यदि गृहस्थ और सन्यासी दोनों यदि ऐसा सोचेंगे कि 100% आदर्श का पालन करेंगे तो एक तरह की मायसी गिल्ट फीलिंग डिप्रेशन आ और दोनों जद ऐसा सोच लेंगे कि आदर्श तो होने ही नहीं वाला है चलो जो चाहे वह करो जैसे इंद्रिया जिस डायरेक्शन में ले जाए तो ले जाने दो तो सन्यास आश्रम करप्ट होगा और गृहस्थ आश्रम युद्ध में डूब जाएगा देह बोध रहितो ठाकुरर प्राय समस्त रात्री तोन समाधि ते अति बाही तो हो तो देह बोध रहित ठाकुर की प्राय समस्त रात्रि समाधि में वहन होती समाधि में ही अति वाहित होती ता दृष समाधि एक विराम ने तिनी पार्श्व साहिता श्री मायर रूप जवन संपन्न श्री अंगे प्रति दृष्टि निक्षेप पूर्वक विचारे प्रवृत्त होलेन बापरे मने ये प्रोज है ना कि पोएट्री इतने सुंदर शब्द यूज किए हैं ठाकुर रात में तो समाधि में ही रहते थे सोना तो उनका थोड़ा मुश्किल से ही होता था अभी एक बार इस तरह से समाधि में थोड़ी देर के लिए वह बाह्य जगत में वापस आए तो वापस आने के साथ में ही उन्होंने क्या देखा कि उनके पास में ही मां मां का जो रूप यवन संपन्न श्री अंग उसके ऊपर में ठाकुर की नजर पड़ी और उन्होंने नजर उनकी पड़ने से ही उन्होंने अपने मन में विचार किया क्या विचार किया मोन एर नाम स्त्री शरीर मन अर्थात कि ठाकुर अपने को संबोधित करके कह रहे हैं देखो कि इसी का नाम है स्त्री शरीर लो के एके परम उपाधे भोग्य वस्तु बोले जाने लोग इसको बड़ी ही भोग्य वस्तु के रूप में पहचानते हैं एवं भोग कर बार जन्नो सर्वण लाला तो होए और इसी का भोग करने के लिए सर्व क्ण आतुर रहते हैं किंतु एक ग्रहण करले देही आबद्ध ते होए किंतु जद इस पूर्ण यवन स्त्री शरीर को भोग करोगे तो तुम इस देह रूपी पिंजर में ही बंधे रहोगे जीवन भर सच्चिदानंद घन ईश्वर के लाभ करा जाए ना सच्चिदानंद घन ईश्वर को आप नहीं कर पाएंगे भाब घोरे चूरी करो ना इसलिए भाव के घर में चूरी मत करना मन में एक बात सोचते हो मुंह पे और आचार में दूसरी बात दिखाते हो ऐसा कभी मत करो पेटे एक खाना मुखे एक खाना रेखो ना अपने पेट में एक बात रखना मुंह पर दूसरी बात करना ऐसा मत करो सत्य बोलो तुम एक ग्रहण करते चाओ अथवा ईश्वर के चाओ तुम इस शरीर को ग्रहण करना चाहते हो या तो फिर ईश्वर को चाहते हो जद एकही चाओ तो ही तोमार शम के रहे छ नाओ यदि इस शरीर को ही ग्रहण करना चाहते हो तो मां नजर के सामने ही है उसको तुम देख सकते हो ही रूप विचार पूर्वक ई अंग स्पर्शने जननो अष्ट प्रसार करी बा मात्र मोन सहसा कुंठित उच्च समाधि पते धाबी तो होया विलीन होया गलो जैसे ही ठाकुर ने यह विचार किया और जैसे ही उनका हाथ मां के शरीर की ओर बढ़ा वैसे ही उनका मन एकाएक कुंठित हो गया और उच्च समाधि पथ में धावित होकर के समाधि में विलीन हो गया ईश्वर में विलीन हो गया श रात्रे आर साधारण भूमि ते नामिया आश लो ना उस रात को ठाकुर का मन फिर से साधारण भू पर वापस नहीं आया परर दिन बहु खण ईश्वर नाम श्रवण पराया तहा के व्यवहारिक जगते ना माईया आना संभव होलो दूसरे दिन बहुत दिन बहुत समय तक उनको ईश्वर का नाम सुनाया गया तब कहीं जाकर के उनको व्यवहारिक जगत में उनको उनके मन को फिर से लाया गया यह देखिए कि कितनी भयानक अग्नि परीक्षा है यदि हम लोग आश्रम में रहकर के देखिए सन्यासी लोग गेरवा क्यों पहनते हैं मस्तक मुंडन क्यों करते हैं आश्रम में या किसी मठ में क्यों रहते हैं और यदि भ्रमण भी करेंगे तो यह किसी के घर में नहीं रह कर के किसी धर्मशाला या तो फिर वन में रहने का क्यों पसंद करते हैं क्योंकि यदि हम लोग त्याग की बारे में बातें तो करेंगे किंतु नजर के सामने कोई टेंप्टेशन आ गया तो उस टेंटेशन के सामने मन को रोक पाएंगे कि भी नहीं वह संदेह हमेशा हमको रहता है तो इस संदेह का निवारण करने के लिए वह टेंप्टेशन ही ना आए इसलिए यह पूरी सन्यास आश्रम की परंपरा है ऋषि मुनि भी अपने आश्रम में रहते थे किंतु देखिए कि अब जब आप गृहस्थाश्रम में रह ही रहे हैं और नजर के सामने इस तरह का टेंटेशन आ ही जाता है और जब उस समय मन में एक बात और मुंह पर एक बात मुंह से तो कहते कि अरे भाई मैं भले घर कर रहा हूं भले मैं गृहस्थाश्रम में हूं किंतु हम पति-पत्नी हमेशा भाई बहन की तरह रहते हैं ईश्वर की बातें करते हैं ऐसा मुह से तो कहना हो गया किंतु फिर भीतर भीतर में काम भाव रह गया तो फिर वह किस तरह से अपनी रक्षा कर पाएंगे यदि इस तरह का टेंप्टेशन आ गया तो तो ठाकुर देखिए कि सामने से जाकर के इस टेंप्टेशन को बुलावा दे रहे हैं अपने मन की परीक्षा करने के लिए और जैसे ही मन की परीक्षा की वैसे ही उनका मन कुंठित हो गया जैसे कि यह कछुआ अपने इस तरह की उदाहरण है कि कछुआ अपना सर और अपने हाथ पैर जैसे ही भीतर में खींच लेता है अपने शेल के भीतर में वैसे ही जब मनुष्य जो त्यागी मनुष्य होता है उसके सामने टेंप्टेशन आने से उसकी इंद्रियां भी उसके मन भी जिस तरह से कछुआ हाथ पैर को भीतर में खींच लेते हैं वैसे से ही कुंठित हो जाएगी तो देखिए कि उसी कुंठित शब्द का प्रयोग यहां पर महाराज जी ने किया है कि ठाकुर का मन इमीडिएट कुंठित हो गया इमीडिएट वो आप अपने भीतर में वो चला गया ईश्वर में मग्न हो गया और ऐसी गभीर समाधि में चला गया कि उस रात को तो वह समाधि में से बाहर आए ही नहीं दूसरे दिन बहुत देरी तक उनको बहुत समय तक ईश्वर का नाम सुनाया तब कहीं जाकर के समाधि बंद हुई तो देखिए इसके बारे में फिर बाद में गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि अरे हम किस तरह के दैव मानव का यह लीला हम उसके बारे में विचार करने के लिए चिंतन करने के लिए आगे बढ़े हैं जिसके बारे में हम जितना सोचेंगे उतना ही हमारा मन अभिभूत हो जाएगा उतना ही मन हमारा आश्चर्य चकित हो जाएगा कि कहां एक सामान्य मनुष्यों की मनुष्य की सत्य निष्ठा कहां एक साधारण साधक की यह त्याग और सन्यास के प्रति साधना के प्रति त्याग और साधना के प्रति निष्ठा और कहां यह भगवान श्री राम कृष्ण की निष्ठा उनको हम अवतार वैसे ही नहीं कहते वैसे तो बहुत सारे लोग अपने को अवतार करके पुकारते हैं कोईकोई लोग है वह कहते हैं कि मैं राम कृष्ण का अवतार हूं और मेरी पत्नी जो है वह मां शारदा देवी के अवतार है एक तरह का एक आश्रम उसका फाउंडर बड़े फेमस है वोह इस तरह का दावा करते रहते हैं तो देखिए कि एक्चुअली यदि राम कृष्ण और मां शारदा होने के के लिए किस तरह की अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है उसके बारे में कभी सोचा भी है लेकि वो सिर्फ मुंह से ही चलाते हैं कि मैं राम कृष्ण का अवतार मेरी पत्नी मां शारदा का उतार है मुंह से बोलने से तो बोल देंगे और 10 लोग ऐसे भी खड़े हो जाएंगे जिनको कि इस तरह का कोई सदिया चाहिए वो आपका भजन कीर्तन भी शुरू कर देंगे आपके गुणगान भी शुरू कर देंगे किंतु आपके मन में जाक करके देखिए यदि इस तरह का कोई दावा करते हैं या तो फिर इतना ही जद दावा करें कि हां मैं श्री रामकृष्ण देव का संतान हूं इस परंपरा में दीक्षित भक्त हूं इस साधन पथ पर चलने वाला साधक हूं यदि इतना भी हमको सोचते हैं तो भी हमको यह याद रखना होगा कि किनके चरण हम अनुसरण कर रहे हैं किनके फुट स्टेप में चल रहे हैं जद उनसे एक लाख भी पवित्रता यदि हमारे भीतर में आ गई तो भी हम धन्य हो जाए तो आज तो श श श शांति हरि बो तस श्री राम कृष्ण परमस