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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 16 Jul 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे। ऑलरेडी हमने कल एक कहानी देखी कि ठाकुर मां को कहते हैं कंप्लेन के स्वर्ग में स्वर में अनुयोग के स्वर में कि क्या मुझे ही सब कुछ करना होगा तुम कुछ नहीं करोगी तो फिर मां ने क्या उत्तर दिया कि मैं तो स्त्री हूं मैं क्या कर सकती हूं तो फिर ठाकुर ने कहा नहीं नहीं तुमको बहुत कुछ करना होगा यह जो प्रसंग हमने देखा इसी के जैसा जैसा एग्जजेक्टली इसी के जैसा एक दूसरा प्रसंग है और वह भी इसी काशीपुर के दिन का गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं सीढ़ी हो

कहानी: श्रीरामकृष्ण ने माँ सारदा से विश्व के आध्यात्मिक कल्याण की जिम्मेदारी लेने का अनुरोध किया

ते पिया गया पाए व्यथा हो बार पोरे श्री मां से बार एकांतिक आग्रह है तीन दिन विश्राम लोया ठाकुर जोनो खाब लोइया ऊपरे आशिया देखन ठाकुर चोख बुझिया सुइया आ हमको पता है कि वहां पे काशीपुर में एक बार मां ठाकुर के लिए दूध की कटोरी भर के जा रही थी। अब काशीपुर का यदि आपने दर्शन किया होगा वहां जाने का सौभाग्य मिला होगा तो आपको पता होगा कि ठाकुर का कमरा था फर्स्ट फ्लोर पे और वहां पर जाने की जो सीढ़ी थी वो सीढ़ी के मध्य और मां का जो कमरा था जहां पर मां खाना पकाती थी वो था ग्राउंड फ्लोर पे। वो बीच में जो सीढ़ी थी उसके जो स्टेप्स थे वह थोड़े स्टिप थे अर्थात कि स्टेप्स की जो हाइट थी वह थोड़ी ज्यादा थी तो वैसे ही किसी को तकलीफ होगी ऊपर चढ़ने में और मां तो फिर क्या है कि दूध की कटोरी भर के जा रही थी और वह भी हमने उस समय का मां का रूटीन देखा था कि किस तरह से सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठकर के वह शौच वगैरह समाप्त करके दिन भर ठाकुर की सेवा करने में लगी लगी रहती थी और रात को देरी से सोती थी। तो हो सकता है इससे थकावट भी मां को महसूस हो रही होगी। जो भी है मां सीढ़ी से गिर गई। एकाएक मां को चक्कर आया। मां सीढ़ी से गिर गई और जो पैर में उनको थोड़ी सी इंजरी हुई। तो और फिर ठाकुर अभी ठाकुर क्या थे कि अभी इस तरह की कोई घटना होती है तो क्या है कि सबके मन में एक तरह का दुख होता है ना क्योंकि वहां पर जो रहने वाले थे यह नरेंद्र योगेन महाराज ये राजा महाराज वगैरह तो हो सकता है कि उनके मन में व्यथा ना हो या तो फिर उनके मन में जो दुख हुआ होगा उसको थोड़ा सा हल्का करने के लिए ठाकुर ने मजाक करके ये नरेंद्र वगैरह को कहा था योगेन महाराज को कि तुम अपने सर के ऊपर में झुड़ी रख के झुड़ी यानी एक बड़ा बास्केट रख के उसमें मां को बिठा के ऊपर ले आ पाओगे क्या? क्योंकि पैरों में तो वो जो हड्डी है वो थोड़ी सी खिसक गई है तो वह तो पैर चढ़ नहीं पाएगी उस तरह के पैर से वो तो फिर जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तो सब लोग हंस के एकदम एकदम जमीन पर रेंगने लगे यानी कि आलोटने लगे। तो क्या है कि यह ठाकुर का इस तरह का एक था भाव कि इवन उनके आखिरी समय में भी उनकी वजह से मां और ठाकुर की वजह से किसी के मन में दुख ना हो या तो फिर संताप ना हो इस बात का ख्याल रखते थे। तो वही घटना कि मां सीढ़ी से गिर गई थी। पैरों की जो हड्डी थी थोड़ी खिसक गई थी। इसके बावजूद मां का जो ठाकुर की सेवा का आग्रह था उसकी वजह से सिर्फ तीन दिन विश्राम करके फिर से मां चतुर्थ दिन अपना ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करके सीढ़ी से चढ़कर के ठाकुर के कमरे में आई ठाकुर को खाना खिलाने के लिए और हमको यह बात भी पता है कि क्यों मां को ठाकुर को खाना खिलाना पड़ता था इस अर्थ में कि जब ठाकुर खाना खाएंगे तो वहां पर वह मां वहां पर सामने बैठेगी क्योंकि प्रॉब्लम क्या था ठाकुर का कि उनका मन सब समय किसी ना किसी उच्च भाव में वह विलीन हो जाता था तो मां क्या करती थी इधरउधर की 10 बातें करके ठाकुर के मन को यहां पर जागतिक जगत में थोड़े समय रख करके वो रखती थी जिससे कि ठाकुर का आहार समाप्त हो जाए वरना ठाकुर का खुद का ऐसा था कि क्या खा रहे हैं क्या नहीं खा रहे हैं देह के प्रति तो थोड़ा सा भी यह नहीं था अटेंशन जैसा तो देह की रक्षा हो ना हो क्या फर्क पड़ता है तो इसलिए मां को सामने बैठकर के ठाकुर को खिलाना पड़ता था और दूसरी भी बात यह हमको पता है दक्षिणेश्वर में खास करके कि यहां पर ठाकुर का कमरा है यहां पर मां का कमरा है दोनों कमरों में नहबत मां का है वहां पर ज्यादा तो कोई डिस्टेंस नहीं है मुश्किल से 1520 फुट का होगा किंतु फिर भी जैसे कि इन दोनों में एक इस तरह की दूरी थी क्योंकि सब समय पुरुष भक्त कोई ना कोई ठाकुर को घेर करके रहेंगे। ठाकुर के उपदेश तो चलते ही रहेंगे। उस समय मां का ठाकुर के पास में आना, ठाकुर की दिव्य वाणी का श्रवण करना, ठाकुर की सेवा करना, ठाकुर का दिव्य संग प्राप्त करना मुश्किल हो जाता था। इसलिए फिर खाने का एक समय ऐसा था कि जब मां आहार प्रस्तुत कर देती थी ठाकुर के लिए तो फिर सब पुरुष भक्तों को कह दिया जाता था कि अभी श्री श्री मां आ रही है ठाकुर के कमरे में वो खाने का थाली लेकर के तो जैसे ही इस तरह से इंस्ट्रक्शन मिली सब भक्त भी समझ जाते और फिर वह वहां से खड़े होकर के कमरे के बाहर आ जाते और कभी-कभी ऐसा होता था कि उनको समझ में नहीं आता था तो समझाना पड़ता ता था कि भाई कमरे से बाहर जाओ। ठाकुर दोपहर को विश्राम करने वाले थे। एक समय क्या है? देह है। देह को तो बीच में आहार, निद्रा यह सब तो चाहिए ही चाहिए। तो ठाकुर विश्राम कर रहे हैं। खाट के ऊपर में थोड़ा सा लेट के फिर भी सब भक्त उनके सामने ही बैठे हैं। फिर किसी ठाकुर के त्यागी संतान ने आकर के उनको थोड़ा सा समझा के कहा कि अभी ठाकुर विश्राम कर रहे हैं। आप कमरे से बाहर में जाइए। दोपहर का ना कि ऐसा कोई समय होगा। ऐसा समझा करके कहा गया तब भक्त लोग कमरे से बाहर गए। तो इस तरह से था कि मां जब सब भक्त चले जाएंगे या तो कमरे से बाहर चले जाएंगे तब वह खाने का आहार का थाला लेकर के मां आएगी। ठाकुर के सामने बैठेगी। विविध तरह की बातें करेगी। और जब तक ठाकुर खा नहीं लेते हैं तब तक पूरा वह वहां पर रहेगी। ठाकुर ने एक बार अन्न ग्रहण कर लिया तो फिर वह झूठा ताला लेकर के नहबत में वापस आएगी। तो यह था दिन भर में एक समय जो मिलता था मां को ठाकुर का दिव्य संग प्राप्त करने का सौभाग्य। तो कभी-कभी यह भी वंचित हो जाता था। यह सब कहानियां भी हमने देखी कि एक बार गुलाब मां को ठाकुर ने कहा कि तुम खाने का थाला लेकर के आओ तो अभी हो सकता है कि शायद उस समय मां बिजी होगी ना कि जो भी होगा गुलाब मां की ठाकुर को सेवा करने का एक सौभाग्य मिले हो सकता है इसलिए भी शायद ठाकुर ने कहा हो जैसे कल हमने देखा था कि यह चंद्र वो जो उद्बोधन का जो वर्कर था तो मां ने चंद्र को एक बार मां चंद्र चंद्र के पास में से कितना सारा काम करवा रही है छोटा-मोटा। तो चंद्र भी बड़े भक्ति भाव से मां का कार्य कर रहा है। जब यह सब कार्य समाप्त हो गया। इसके बाद में मां चंद्र को पूछती है कि अच्छा बेटा तुम समझ पा रहे हो कि मैं तुम्हारे पास में से अपनी सेवा क्यों करवा रही हूं? तो चंद्र तो बेचारा क्या उत्तर देगा? वह तो सेवा करने के लिए तो वहां पर आया था। उसमें क्या थोड़ी ना कोई रीजन या लॉजिक होता है। तो मां ने कहा कि मैं जब नहीं रहूंगी तो यह तुम मेरी सेवा कर रहे हो। इस सेवा से तुमको यह याद रहेगा। मेरी स्मृति तुम्हारे मन में सेवा के माध्यम से जागृत रहेगी। तो यह बात सुनकर के तो चंद्र बड़ा खुश हो गया। और फिर जब वह नीचे आया वो सीढ़ी उतर करके देखा कि सामने ही शरद महाराज खड़े हैं और शरद महाराज शायद शरद महाराज ने सुन लिया होगा या तो फिर उनकी कोई वो तृतीय नेत्र वो थर्ड आई होगी वहां से उस उन्होंने देखा होगा जो भी है संजय की तरह तो जो भी है अभी उन्होंने सामने जैसे वो चंद्र सीढ़ी से उतर कर के नीचे आ रहा है शरद महाराज वहां पर खड़े हैं और हंसते-हंसते उसके सामने देख रहे हैं तो चंद्र ने पूछा क्या हुआ तो कहते हैं कि जो यह जो ऋषि मुनि गण है हजारों हजारों साल तपस्या करके जिस जगत जननी का आशीर्वाद नहीं पाते हैं वही जगत जननी का आशीर्वाद तुमने ये छोटी-मोटी सेवा करके पाप प्राप्त कर लिया। वाह तुम तो धन्य हो गए। जाओ तुम्हारी मुक्ति हो गई। तो देखिए कि यह लोग जो सेवा करवाते हैं मास्टर महाशय का भी ऐसा था कि मास्टर महाशय को सेवा करना नहीं आता है। तो ठाकुर उनको कहते थे थोड़ा सा पैर दबा दो। थोड़ा सा यह कर दो, वह कर दो। तो मास्टर महाशय लिखते भी हैं। कथामृत के लेखक कथामृत में लिखते हैं कि वह मणि को तो सेवा करना आता नहीं है। मास्टर को सेवा करना आता नहीं है। इसलिए व्यस्त होकर के जैसा-जैसा ठाकुर गाइड कर रहे हैं उनको वैसा-वैसा वो कर रहे हैं। तो क्या है कि यह अवतार पुरुषों की सेवा करना यह उनके हृदय तक पहुंचने का एक सर्वश्रेष्ठ रास्ता है। देखिए कि यह जो अंतरंग त्यागी संतान थे उन्होंने ठाकुर की सेवा करके ही वह अपना जीवन धन्य कर लिया था। इसलिए जब वह कल्पतरु दिन को आत्म प्रकाश से अभयदान फर्स्ट जनवरी 1886 उस दिन को जब ठाकुर सबको स्पर्श करके तुमको चैतन्य हो यह आशीर्वाद दे रहे थे तो वह आशीर्वाद लेने के लिए एक भी त्यागी संतान वहां पर नहीं आया था क्योंकि उनको यह पता था कि ठाकुर की सेवा ठाकुर के आशीर्वाद से कहीं ज्यादा पावरफुल है। उसकी पवित्रता का यदि मेजरमेंट करें तो ठाकुर की सेवा करना ठाकुर के ही आशीर्वाद से वो पवित्रता का जो मीटर होगा उसमें ज्यादा नंबर उसके आ जाएंगे। तो क्या है कि यही शायद गोलाप मां को यह सिखाने के लिए कि सेवा कैसे की जाए? तो ठाकुर ने एक बार कहा उनको कि तुम जाओ उद्बोधन से नहबत में से खाने का थाला लेकर आओ। तो फिर यह एक बार तो गोलाप मां गई लेकर के फिर उनको बड़ा आनंद आने लगा कि ठाकुर के साथ क्योंकि क्या यही एक समय है बाकी तो सब समय ठाकुर कितने भक्तों के साथ में वार्तालाप करते होंगे कितना भाव समाधि में रहते होंगे किंतु जब आप उनको सामने बिठा करके उनको आहार करवाते हैं उस समय जो एक आपका एक वन टू वन जो एक रिलेशन बनता है और कोई वहां पर उपस्थित नहीं है ठाकुर का मन भी उध ध्वगति में दौड़ने की वजह वो कैलाश और मानसरोवर की ओर जाने की वजह वहीं पर दक्षिणेश्वर में ही बैठा है। आहार कर रहा है। तो उस समय ठाकुर का जो एक दिव्य संग मिलेगा वह कितना पवित्र होगा। तो यह सोचकर के फिर गोला मां प्रतिदिन मां के पास में से वही आहार का थाला लेकर के वो ठाकुर के कमरे में चली जाती। यहां पर मां का कष्ट देखिए किंतु कि जो एक समय जो मां को मिलता था दिन भर में ठाकुर का दिव्य संग प्राप्त करने का उनके साथ में वार्तालाप करने का उनकी दिव्य वाणी का श्रवण करने का वो एक समय भी जैसे कि मां के हाथ से छीन लिया गया। किंतु फिर भी मां कंप्लेन नहीं करती है। देखिए जब हमने यह सब डिस्कस कर रहे थे गंभीरानंद जी के वह जीवनी में तब भी हमने एक बात देखा था कि यह जो सैक्रिफाइस जो होता है ना यह सेवा करने का भी एक प्रलोभन होता है। बहुत बार ऐसा होता है कि हमको लगता है कि मैं ही सेवा करूं और यह क्योंकि हमने यह सब कहानियां सुनी है तो कि सेवा करना ही सर्वश्रेष्ठ साधना है। आप हजार बैठकर के नाम जप कीजिए। वही लाटू महाराज की कहानी कि वह ठाकुर ने देखा कि लाटू वहां पे गंगा के किनारे बैठकर के ध्यान कर रहा है। यहां पर मां नहबत में वो आटा माख ये कर रही है। बना रही है रोटी बनाने के लिए। तो ठाकुर ने जाकर के लाटू को कहा अरे लाटू तुम यहां पर बैठकर के ध्यान कर रही हो। कर रहे हो वहां पे मां को मैदा ठासो क्यों लोक पाना माने अर्थात कि मां जो मैदा जो होता है उसका आटा बनाना होता है पूरी या बनाने के लिए लुची बनाने के लिए उसके लिए कोई आदमी नहीं मिल रहा है जाओ जाकर के मां को हेल्प करो तब कहीं जाकर के लाटू महाराज मां को हेल्प करना प्रारंभ किए। ठाकुर स्वयं लाटू महाराज को मां के पास में लेकर के आए और कहा कि यह लड़का है बड़ा ही वह भक्तिमान है। वह तुम्हारी सहाय करेगा। जैसे ही ऐसा कहा ठाकुर ने तब से लेकर के लाटू महाराज मां की सेवा कर रहे थे। तो यह सब कहानियां तो हमने काफी सुनी है। कल्पतरुद्दीन की बात तो जग जाहिर है कि ठाकुर की सेवा करनी है। नहीं कि ठाकुर के आशीर्वाद के पीछे दौड़ना है। तो यह जैसे कि ठाकुर के आशीर्वाद तपस्या करने से बड़ा है ठाकुर के मतलब एक अवतार पुरुष के आशीर्वाद प्राप्त करना। अवतार पुरुष के आशीर्वाद प्राप्त करने से भी श्रेष्ठतर है अवतार पुरुष की सेवा करना। और इससे भी ज्यादा श्रेष्ठतर क्या है कि अवतार के प्रति अपनी भक्ति तो प्रचंड है किंतु जब सेवा करने में कोई दूसरा सेवा करना चाहता है तो सेवा का त्याग करना वह उससे भी कठिन है। उससे भी ज्यादा पावरफुल आध्यात्मिक एक्सपीरियंस और प्रैक्ट प्रैक्टिस है। यहां पे मां ठाकुर की जो एक बार सेवा करने का मौका प्राप्त हुआ था वह भी जैसे कि मां ने अपने हाथों से गवा दिया। ऐसा मां कह सकती थी दूसरे दिन गोपाल गोलाप मां को कि तुम क्यों हर बार ले जाती हो ठाकुर के लिए खाना। ठाकुर ने तो तुमको एक ही बार ले जाने को कहा। ऐसा तो नहीं कहा कि तुम दिन प्रतिदिन ले जाओ। ऐसा मां ऐसा कह सकती थी। किंतु मां ने ऐसा कभी कहा नहीं। तो देखिए कि यह जो मां का ठाकुर के साथ में जो रिलेशन है ठाकुर के साथ में जो दिव्य भाव जो तरंग है दोनों के बीच में इससे हम लोगों को कितना सब कुछ सीखने को मिलता है। तो यहां पर भी देखिए यह जो प्रसंग इसी तरह से प्रारंभ होता है। वहां पर मां सीढ़ी से गिर गई थी। मां की हड्डी खिस गई थी। उस दिन के तीन ही दिन विश्राम लेकर के मां वो खाने का आहार का थाला प्रस्तुत करके वही सीढ़ी उठकर के ठाकुर के पास में जाकर के बैठती है। ठाकुर आहार करेंगे और वह मां बातें करके करके वार्तालाप करके करके ठाकुर के मन को वहीं पर इहलोक में संसार में बांध करके रखेगी। जिससे कि थोड़ा बहुत आहार ठाकुर के देह में प्रवेश करें। बल और शक्ति प्राप्त हो तो फिर उनके द्वारा जो जगत कल्याण का कार्य हो रहा है वह और थोड़े दिन ज्यादा हो। तो इसके किंतु देखा तो क्या देखा कि ठाकुर आंख बंद करके सोए हुए हैं। मां डाकी लेन मां ने पुकार के कहा एक खाबेजे उठो अभी खाओगे अभी खाना हो गया है। उठो देखिए मां भी कितने प्रेम से यह जो मां और ठाकुर का वार्तालाप है बड़ा ही रेयरली इसको नोट किया गया है और एक-एक शब्द एक-एक वाक्य जैसे कि अमृत और मधुर्यमय से मधुरता से भरे हुए हैं। अभी खाओगे उठो ऐसा करके मां पुकार रही है ठाकुर जेो कौन दूर देश हो थे आशिया भाबेर घोरे मायर दिखे ताकया बोली लेन ठाकुर जैसे कि कौन दूर देश में चले गए थे अब ठाकुर कौन से दूर देश में चले गए हमको अंदाज करने की जरूरत नहीं है हमको पता ही है कि वही तुरीय अवस्था में ठाकुर का मन रम रहा होगा तो कैसे भी करके मां की पुकार सुनकर करके बड़े कष्ट से तुरीय अवस्था में से अपने मन को खींच करके इस जागृत अवस्था में लेकर के आए और फिर भाव के घोर में आकर के अभी भी भाव से मतवाले हैं तो भाव में जैसे कि भाव का यह जो जैसे नींद में से हम जगते हैं ना कभी-कभी बड़ी गहरी नींद में से जगते हैं तो थोड़ी देर के लिए तो नींद का जो नशा जो होता है ना अपने पे छाया रहता है। मैं कहां पर हूं, क्या कर रहा हूं वो जैसे कि समझ में ही नहीं आता। तो ठाकुर भी तुरीय अवस्था में इस तरह से डूब गए थे कि तुरीय अवस्था का जो नशा है वह जागृत अवस्था में अभी भी उतर नहीं रहा है। इसलिए भाव के घोर में मां के सामने देखकर के कहा ठाकुर ने देख कोलकाता लोक गोलो जेनो अंधकार पोकार मत किलबिल कोर छे देखो अंधकार के लोग जैसे कोलकाता के लोग जैसे कि अंधेरे में यह जो कीड़े मकोड़े जो होते हैं वह कैसे इधर-उधर जाने का प्रयास करते हैं। किलबिल अर्थात कि अंधेरे में किस तरह से दौड़ते रहते हैं आप ऐसा तो इस तरह से कोलकाता में लोग अंधेरे में दौड़ रहे कीड़े मकोड़े की तरह है तुम ही तादेर देखो तुम उनको देखो तुम उनको देखना मां अनुजोगे स्वरे बोली ले मां ने फिर से वही अनुयोग करके कहा कंप्लेन करके कहा आमी में मैं मानुष मैं तो स्त्री पुरुष मैं तो स्त्री हूं ताकि की को होवे तो वह कैसे होगा ठाकुर निज अंगोखाइया आपन भाभी बोलिया जते लागी जब मां ने ऐसा कहा कि कोलकाता के लोग जैसे कि अंधेरे में किलबिल करते कीड़े की तरह है तुम उनको देखो तो मां ने फिर से वही बात कही कि मैं तो स्त्री हूं मैं क्या कर सकती हूं किंतु ठाकुर ने मां का उत्तर जैसे ही सुना ही नहीं अपने ही अभी वह जो भाव के नशे में अभी भी तो मत है तो तो उसी नशे में क्या कह रहे हैं ए आर की कोर छे इसने और क्या किया है ये अर्थात कि इसने अर्थात कि ठाकुर ने स्वयं ने इसने और क्या किया है तोमा के एर अनेक बेश करते होवे तुमको इससे अनेक ज्यादा कुछ करना होगा इससे बहुत ज्यादा कुछ करना होगा मां से प्रसंगो बंधु कोबार जनो कथाए एकू जोर दिया ही बोली ने अभी मां को थोड़ा सा डर लग गया कि यह ठाकुर बार-बार जो कह रहे हैं कि मैंने क्या किया है? इसने क्या किया है? तुमको तो इससे अनेक बहुत कुछ ज्यादा करना है। तो मां को लगा कि शायद अभी ठाकुर लीला संवरण की ओर आगे बढ़ रहे हैं। लीला संवरण के लिए प्रस्तुत हो रहे हैं। इस डर की वजह से मां ने सी एकदम थोड़ा सा यह प्रसंग बंद करने के लिए थोड़ा सा जोर से कहा कथाएं एकू जोर दिया ही बोली ले बात में थोड़ा सा जोर देकर के ही कहा से जोखन होबे तो कौन होबे तुम ही एकन खावो तो वो जब होगा तब होगा तुम अभी खाना खा लो तो अब देखिए वो छोटा बच्चा जब होता है वो इधरउधर दौड़ता रहता है खाने के समय में मां उसको पुकारती है फिर भी खाने को नहीं आता है। तब मां कैसे जोर से उसको कहेगी अच्छा बैठकर के खाना खा लो पहले बाद में जितना खेलना है उतना खेलना। अपने भाइयों के साथ में जितना झगड़ना है झगड़ना। पहले अभी आकर के सबसे पहले खाना खा लो। तो मां जैसे बच्चे को जोर करके वह बुला के खाने के लिए बिठाती है। वैसे ही एग्जजेक्टली मां इस प्रसंग को बंद करने के लिए बात में थोड़ा सा जोर डाल के कहा। वह जब होगा तब होगा। तुम अभी खाना खा लो। तो और देखिए मां ठाकुर को अपनी अर्थात कि आप नहीं कहती है। तुम कहती है। वह भी देखिए कि कितना एक सुंदर एक उन दोनों का रिश्ता है। तुम अभी खाना खा लो। तो अब मां ने जैसे ही इस तरह से कहा तो अभी मां वो अपने घर में भी चिल्ला करके बोलेगी तो बच्चा कैसे थोड़ा सा ठंडा होकर के आकर बैठ के खाना खाता है। तो यहां पे भी ठाकुर उठिया बोशी दे। ठाकुर ने उठ के बैठ गए और फिर मां मां ने जो आहार ले आए थे मां जो आहार ले आई थी वह आहार करने लगी। देखिए

माँ की महिमा का वर्णन

यहां पर जो एक बहुत इंपॉर्टेंट बात ठाकुर कहते हैं कि मैंने और क्या किया है? तुमको तो इससे अधिक और कितना सब कुछ करना है? तो यह प्रश्न होगा कि ठाकुर ने तो स्वामी विवेकानंद को तैयार किया। यह तो कोई कम बात नहीं थी। मां के शिष्य इतने सारे थे। इतने पवित्र शुद्ध हृदय थे। किंतु स्वामी विवेकानंद की केलीबर का तो एक भी शिष्य मां का नहीं था। यह वीजानंद जी ना कि कोई भी आप ले लीजिए। स्वामी जी तो स्वामी जी ही थे। तो यदि शिष्य को तैयार करने की कंपटीशन हो ठाकुर और मां की तो ठाकुर के जो प्रधान शिष्य स्वामी विवेकानंद ही तो इसमें सर्वश्रेष्ठ आएंगे। जहां तक आध्यात्मिक उपदेश देने की बात है वह भी आप देखिए कि ठाकुर का कथामृत है किस तरह की आध्यात्मिक रत्नों से भरा पड़ा है और मां के पत्रों के बारे में मैंने पहले भी एक बार कहा था ना मैं शायद उस समय ट्रेनिंग सेंटर में था ट्रेनिंग सेंटर में था उस समय शायद यह पत्र नए पब्लिश हुए थे नए हुए थे पब्लिश कि नहीं मुझे देखना पड़ेगा किंतु म इंस्टट्यूट ऑफ कल्चर की ओर से मायर चिट्ठी बोल करके मां के पत्र बोलकर के किताब शायद उस समय पब्लिश हुई थी ना कि उस समय मेरे ध्यान में आई थी। जो भी है मैं बड़ी होशे से म बड़े खुशी-खुशी वो किताब को परचेस करके ले आया। सोचता था कि यह जैसे मैं स्वामी जी के लेटर पढ़ता हूं। ये तुरियनंद जी के लेटर पढ़ता हूं। वैसे पता नहीं मां के पत्रों में किस तरह का आध्यात्मिक खजाना छुपा होगा। किंतु जैसे ही पत्र रैंडमली पढ़ना शुरू किया। मैं तो एक के बाद एक डिसअपॉइंटमेंट ही प्राप्त होती गई। यहां पे लिखा है बाबा जीवन केमो नाो आमी भलो आची तुम ही भलो आो बेटा तुम कैसे हो मैं अच्छी हूं मैं आशा रखती हूं तुम अच्छी हूं तुमको मैं आशीर्वाद देती हूं आशा रखती हूं तुम अच्छे रहोगे बस यही तीन चार लाइन इधर-उधर रिपीट होती रहती है और फिर काम की बात कुछ होगी तो होगी जो एक मां का पत्र कुछ कभी-कभी हम लोग उसको सीरियसली लेते हैं थोड़ा बहुत कि वो मायावती से एक स्वामी जी ने लिखा मां को एक साधु ने कि मां मां ठाकुर स्वामी जी ने यहां पे मायावती में ठाकुर की पूजा बंद करवा दी है। तो फिर इसके बारे में यह तो ठीक नहीं है। तब मां ने इसके उत्तर में कहा था कि ठाकुर अद्वैत थे और तुम भी ठाकुर की तरह ही अद्वैती ही हो। तो ठाकुर तो माने यह एक पत्र है कि जहां पे आपको लगता है कि एक थोड़ा बहुत फिलॉसोफिकल मीमांसा मां ने की है। किंतु ज्यादातर पत्र आप देखेंगे तो उसमें वही है। मां कहती है बेटा तुम ठीक रहना। बेटा मैं तुमको आशीर्वाद देती हूं। ऐसी ही कुछ बातें लिखी है गोल घुमा करके। तो मैंने फिर वह किताब रखी दी थी उस समय। मैंने सोचा कि बिना मतलब का पैसा चला गया। टीसी में पैसा होता नहीं है साधुओं के पास में। ब्रह्मचारियों के पास में ऐसा ज्यादा कुछ मेरे पास में जो थोड़ा बहुत बचा के रखा था। तो मैंने सोचा था कि कुछ अच्छी-अच्छी किताबें लूंगा। तो यह मैंने क्या ले लिया? पैसा बचा के रखा था उसमें। इससे तो बेटर मैं और कोई अच्छी किताब ले सकता था। तो जो भी है अभी फिर मुझे लगा कि मुझे पहले एक बार लाइब्रेरी में जाकर के देख लेना था कि वह कैसा है वो फिर बाद में किताब परचेस करना बाद में मैं इस तरह से करता था कि कोई भी किताब परचेस करनी है तो फिर पहले एक बार लाइब्रेरी में जाकर के पढ़ लेना है अच्छी लगे तभी करनी है तो तो खैर उस समय तो मुझे ऐसा लगा नहीं किंतु जैसे-जैसे मैं फिर मां का जीवन और ज्यादा गहराई से स्टडी करता गया देखा देखिए ऐसा नहीं है कि मां के जीवन में जो मधुरता है मां के जीवन में जो भाव का यह जो म एक क्षीर सागर है वो मुझे समझ में नहीं आ रहा था वो इजीली समझ में आ गया था जब मैं मायर कथा पढ़ रहा था मां की मां की बातें हिंदी में शायद है मां की बातें बेंगली में है मायर कथा तो यह किताब जब मैं पहली बार पढ़ना शुरू किया तभी से मुझे लग रहा था कि मां के जीवन में जो हमारे प्रति प्रेम है जो भाव का सागर है। उससे ज्यादा गहराई आध्यात्मिक गहराई मुझे नहीं लगता कि कथामृत छोड़कर के और कोई किताब में होगी। तो वह तो मुझे पहले ही समझ में आ गया था। किंतु यह जो मां के पत्र जो थे खास करके कि जो मैं ऐसा आशा रखता था कि क्योंकि क्या है कि वह जो प्रसंग है अपने जो कोई भी आप देखिए एकेडेमिक स्टडी करेंगे तो आपको पता रहेगा कि जो अभी स्वामी जी खुद जो पत्र लिखते हैं उसकी ऑथेंटिसिटी स्वामी जी ने जो प्रवचन दिए हैं उसको तो गुडविन या तो फिर ऐसे लोगों ने वह रिकॉर्ड किया है। तो स्वामी जी के द्वारा डायरेक्ट लिखे हुए शब्दों की वैल्यू उससे ज्यादा है। क्यों? क्योंकि वहां पर कोई सेकंड पर्सन बीच में नहीं आता है स्वामी जी के शब्दों को इंटरप्रेट करने के लिए। प्रवचन में खास करके और इस तरह से होता भी है कि स्वामी जी जब अमेरिका से लौटे तो शशि महाराज स्वामी जी को कह रहे हैं कि देखो भाई मैं तुम्हारा एक प्रवचन पढ़ रहा था। वहां पर तुम ऐसा लिखते हो कि इवोल्यूशन तो हुआ है होता है किंतु डिवोल्यूशन नहीं होता इस अर्थ में कि जब एक प्रजाति है वह जैसे कि पशु में से मनुष्यत्व की ओर जाती है किंतु तुम लिखते हो कि प्र माने जब वह अच्छे कर्म या ऐसा कुछ करती है तब किंतु यह मनुष्य होकर के बाद में फिर उसका डिवोल्यूशन होना फिर से वह पशुत्व योनि प्राप्त करना वह असंभव है वह नहीं होता है ऐसा जो तुमने लिखा है वह गलत है। ऐसा शशि महाराज स्वामी जी को कह रहा है। हमको तो पता है हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जब हम सत्कर्म करते रहेंगे तो पशु योनि से मनुष्य योनि में जाएंगे। मनुष्य और दुष्कर्म करेंगे तो मनुष्य योनि से पशु योनि में आएंगे। हमारे शास्त्र तो क्लियर है। तो फिर तुमने ऐसा क्यों कहा? तब स्वामी जी कहते हैं कि देखो भाई मैंने तो कहा था इवोल्यूशन भी होता है और डिवोल्यूशन भी होता है। किंतु यह गुडविन जो है वह समझ नहीं पाया इस बात को। या तो फिर उसको स्वीकार नहीं कर पाया क्योंकि यह बाइबल के अनुसार नहीं है बोल के तो उसने मैं जो डिवोल्यूशन हो सकता है इस बात को घुमा करके उसने लिख दिया डिवोल्यूशन नहीं होता है तो क्या है कि देखिए स्वामी जी को इस तरह का एक्सप्लेनेशन देना पड़ा था किंतु स्वामी जी स्वयं जो पत्र लिखते हैं उस पत्र में तो किसी भी तरह का गड़बड़ होने का प्रश्न ही नहीं आता है। जो स्वामी जी ने लिखा है एज इट इज हम लोग पढ़ रहे हैं। तो मैं भी ऐसा सोचता था कि मां की बातें में तो क्या बातों में तो क्या है कि सब तरह की बातें चलती है। अभी जैसे कल ही हमने पूर्ण की बात देखी पूर्ण ने पूर्णा कभी यह चंद्र चंद्रमोहन तो चंद्रमोहन मां को लेकर के कभी-कभी जयराम बाटी जाया करता था। तो एक बार मां को लेकर के जय राम बाटी जाता है। वहां पर पेड़ के नीचे में विश्राम कर रहे हैं। तो चंद्र ने मां को रिक्वेस्ट की कि मां आप अपना सही स्वरूप प्रकाशित कीजिए। तो फिर मां ने भी उसकी रिक्वेस्ट सुन ली। तीन-चार बार उसको कहना पड़ा। मां तो वैसे तो स्वीकार करेगी नहीं। किंतु बार-बार कहने पर आखिर में मां ने उसकी रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। बाकी सबको कहा कि मैं चंद्र के साथ में बात करना चाहती हूं। तुम लोग थोड़ा सा यहां से दूर चले जाओ। तो बाकी लोग जब चले गए तब मां ने अपना सही जगत धात्री स्वरूप चंद्र के सामने प्रकाशित किया। अभी देखिए कि यह बात तो मां ने खुद ने तो कभी कही नहीं है। चंद्र ने ही कही है। अभी वह कितना ऐसा तो हम लोग नहीं कहेंगे कि वो झूठ बोल रहा है। ऐसा कुछ किंतु क्या है ना इस तरह की स्मृति कथाएं ज्यादातर अपने बुढ़ापे में लिखी जाती है। जब यह सब घटनाएं होती है उस समय कोई लिखता नहीं है। मास्टर महाशय का भी स्वयं देखिए कि जब ठाकुर के साथ में वार्तालाप होते थे शॉर्ट हैंड नोट उन्होंने रख के रखी थी। किंतु उसके ऊपर में विस्तार तो उन्होंने अपनी वृद्धावस्था में किया था। तो उस समय वह मेमोरी कितनी शार्प रहती है, नहीं रहती है वह सब भी तो एक प्रश्न है। तो फिर क्या है कि हम लोग खास करके रामकृष्ण संघ में इस तरह के जो घटनाओं को एनकरेज नहीं करते। तो बोल के अभी चंद्र यह जो कहता है उसके ऊपर में एक तरह का तो प्रश्नार्थ चिन्ह लगेगा। किंतु यहां पर यदि मां डायरेक्ट पत्र लिखती है तो उस पत्र में क्या होगा क्या नहीं वह तो मां ने खुद कहा है वही होगा इसके अलावा तो कुछ होने वाला नहीं बोलकर के मेरी बड़ी आशा थी उस पत्रों के ऊपर में खैर उस समय तो मैंने मां की वो किताब मां की मां की पत्र मां मायर चिट्ठी उसको मैंने साइड पर रख दिया किंतु फिर मैं राजकोट में जब मेरा पोस्टिंग हुआ था इस घटना के पांच छ साल के बाद में तब कहीं जाकर के फिर से उसको को खोलकर के पढ़ना शुरू किया और यह मां के पत्र उस समय पढ़कर के इतना मन में एक आनंद आता है। बस वही तीनचार बातें लिखी है। मां आशीर्वाद ही दे रही है। पूछ ही रही है सिर्फ कि बेटा तुम कैसे हो? किंतु इतना भी पढ़ने में मन को कितना जैसे कि सुकून मिलता है। किंतु यहां पर देखिए हमारा प्रश्न क्या था? प्रश्न यह है कि ठाकुर जब यह कहते हैं कि तुमको मेरे से भी बहुत कुछ ज्यादा करना है तो हमको यह बात सही में आश्चर्य लगती है कि ठाकुर ने जिस तरह से स्वामी विवेकानंद, स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी शारदानंद इन तरह के जिस शिष्यों को तैयार किया मां के शिष्य कम नहीं थे किंतु इस कैटेगरी में तो नहीं आएंगे। जब जहां तक उपदेश देने का प्रश्न है वह भी ठाकुर ने जिस तरह से आध्यात्मिक अपनी उपलब्धियों को वर्णित किया है। उस तरह का भी शायद मां के जीवन में नहीं मिलेगा। तो फिर मां ठाकुर से ज्यादा क्या करने वाली है? तो मां को ज्यादा क्या करना था? ठाकुर उच्च अधिकारियों को लेकर के उनको साधना के उच्चतर सोपान की ओर लेकर जाते थे। ऑलरेडी जिसके संस्कार शुद्ध पवित्र थे ऐसे लोगों को आध्यात्मिकता की ओर ले जाते थे। किंतु मां के पास में जो लोग आते थे उनके संस्कार कोई इतने शुद्ध पवित्र नहीं थे। किंतु फिर भी बिना किसी कंडीशन के मां ने अपना जो स्नेह है उनमें बांटा है। वही

कहानी: माँ गरीब महिला को मंत्र दीक्षा देते हैं

चंद्र जिसकी बात हम कर रहे थे उसकी पत्नी उसका नाम था चपला सुंदरी। तो अभी क्या था कि उसको एक बार स्वप्न में आया कि मां उनको दीक्षा दे रही है। तो फिर उन्होंने सुबह को उठकर के ये चंद्र को बताया कि मैंने स्वप्न में ऐसा देखा तो फिर चंद्र जाकर के मां को कहता है कि मां मेरी पत्नी को इस तरह से दर्शन स्वप्न हुआ कि आप उनको दीक्षा दे रही है। तो मां ने कहा अच्छा ठीक है। तो एक एक काम करो तुम उसको एक दिन ले आओ और कहना कि यह नई साड़ी पहन करके लाल किनारी वाली लाल किनारी वाली नई साड़ी पहन करके वो आए मैं उसको दीक्षा दूंगी। अभी प्रॉब्लम यह है कि यह बेचारी के पास में चपला सुंदरी के पास में नई साड़ी है ही नहीं लाल किनारी वाली। तो फिर मां ने खुद ने अपने वहां से उद्बोधन से साड़ी भेजी। वो साड़ी पहन के वो वहां पे आई मां के पास में दीक्षा लेने के लिए। देखिए माने आपके पास में कुछ भी नहीं है और फिर आप मां के पास में आ रहे हैं आध्यात्मिक उपदेश प्राप्त करने के लिए और फिर भी मां आपको देती है। यही चपला सुंदरी एक बार फटी हुई साड़ी पहन करके वहां पे फटी हुई साड़ी फट गई थी। तो फिर उसको सिल दिया था। तो यह सिलाई की हुई साड़ी पहन के उद्बोधन में मां का दर्शन करने के लिए जाती है। तो मां ने कहा देखो बेटी इस तरह से कभी भी फटी हुई साड़ी नहीं पहननी चाहिए। यह जो अच्छा लक्षण नहीं है तो फिर यह बेचारी क्या कहेगी चपला सुंदरी वो तो पैसा तो है नहीं कि नई साड़ी फटाक करके ले ले। तो मां समझ गई। उसके बाद में ऐसा हुआ कि जब तक यह मां जीवित थी, तब तक उद्बोधन में से यह चपला सुंदरी के लिए साड़ी जाती थी और मां की महासमाधि के बाद में शरद महाराज साड़ी भेजते थे। यहां तक कि देखिए कैसे-कैसे

कहानी: माँ एक गरीब युवक को दीक्षा देती है और उसकी आध्यात्मिक उन्नति की ज़िम्मेदारी लेती है

प्रसंग है। एक लड़का आया मां के पास में दीक्षा प्राप्त करने के लिए। तो फिर मां ने कहा अच्छा दीक्षा तो उसको दे दी। फिर मां ने कहा कि अच्छा तुम मुझे देने के लिए कुछ गुरु दक्षिणा के रूप में लाए हो। अभी ऐसा नहीं है कि मां को कुछ चाहिए किंतु यह जो गुरु परंपरा है अपने मंत्र लिया है तो आपको गुरु को दक्षिणा तो देनी ही होगी। तो यह लड़के ने कहा मां मेरे पास में तो कुछ भी नहीं है। तो फिर मां ने अपने हाथों से वहां पर जो एक फल पड़ा हुआ था वह लड़के के हाथ में देकर कहा कि अभी यह फल तुम मुझे गुरु दक्षिणा में दो। देखिए गुरु ही आपको दक्षिणा दे रहे हैं गुरु दक्षिणा देने के लिए। गुरु ही आपको वह दे रहे हैं फल गुरु को अर्पण करने के लिए। और फिर मां कहती है कि देखो यह फल मुझे देकर के कहो कि मां मैंने इस जन्म के पूर्व जन्म के जितने भी पाप है आपके श्री चरण में मैंने दे दिए। तब कहीं इस लड़के में अकल आई। वह सोच रहा है कि मैं मां को कुछ दे नहीं पा रहा हूं। वह तो ऊपर से मां मुझे देती है। दक्षिणा देने के लिए ऊपर में से मैं अपने पाप भी मां को दे दूंगा क्या? तब वह बेचारा कहता है कि मां मैं अपने पाप तो आपको नहीं दे पाऊंगा। इस जीवन में कुछ है नहीं मेरे पास में तो यह तो मेरे मन की कमजोरी है। मेरी कमजोरी है। ऊपर में से मैं पाप भी दे दूं। इतना हीन तो मैं नहीं हूं। तब मां ने हंस करके कहा अच्छा ठीक है। आज से तुमको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं। तुम्हारा इस जन्म का अगले जन्म का जिम्मा मेरे पास में सुबह शाम एक बार जप कर लेना बस इसी से हो जाएगा। तो देखिए कि जिसके पास में कुछ नहीं है ऐसे लोगों का भार मां ग्रहण करती

कहानी: माँ एक शुभ-लक्षण लड़के को दीक्षा देती है

है। जय राम बाटी में एक लड़का आया तो मां ने लड़के को देखकर के ही लगा कि इसके संस्कार अच्छे हैं। तो ठीक है। मां ने मन में ही मन में कुछ ठीक कर लिया। दूसरे दिन मां पूजा करके पूजा समाप्त करके वहीं पूजा के आसन पे ही बैठकर के हरि प्रेम महाराज थे वहां पे। उनको कहा कि वो लड़का जो आया था ना कल उसको बुला के ले आओ। तो हरि प्रेम महाराज भी समझ गए कि मां पूजा के आसन पर बैठी है और लड़के को बुला रही है। इसका अर्थ है कि लड़के को दीक्षा देगी। तो महाराज ने सहज रूप से यह अनुमान कर लिया कि लड़के ने ही मां को रिक्वेस्ट किया होगा कि मां मुझे दीक्षा दो बोलकर के ही मां सहमत हुई होगी। तो यह लड़का भी प्रस्तुत होकर के बैठा होगा बाहर में ही। तो वह बुलाने के लिए जैसे गए तो लड़का गायब है तो उन्होंने वापस आकर कहा मां यहां पर तो कोई दीक्षा प्रार्थी नहीं बैठा है। जनरली जैसे होता है सिस्टम कि मां तैयार जब पूजा के बाद में उनको बुलाएगी और यह लोग भी प्रस्तुत होकर के नए वस्त्र पहन करके स्नान वगैरह करके वो वो प्रणामी जो देनी है गुरु दक्षिणा लेकर के तैयार होकर बैठेंगे। ऐसा तो कोई मुझे नहीं दिख रहा है। तो मां ने कहा नहीं नहीं वो लड़का आया था कल रात को होगा इधर-उधर बुला के लाओ उसको। अभी ये लड़के को तो कुछ पता ही नहीं है कि मां उसको दीक्षा देने के लिए प्रस्तुत होकर बैठी है। वो इधर-उधर घूम रहा है गांव में वो भानु पीसी जो कि मां जब छोटी थी तो जिनको जिनका जिस भानु पीसी की घर जाकर के वो लेटी रहती थी। क्यों? क्योंकि सभी लोग कहते थे कि यह श्यामा सुंदरी की लड़की का विवाह एक खेपा एक पागल आदमी के पागल जमाई के साथ में हुआ है। तो यह सब वो सुनना ना पड़े बोलकर के मां भानुपीसी के घर चली जाती थी। वही भानु पीसी वृद्धा हुई है। तो यह लड़का भी उनके घर चला गया। अभी यह भानु पीसी ये मक्खन ना दही कुछ बना रही होगी। तो लड़के को देखकर के कहा बेटा खाओगे? तो अभी देखिए सरल हृदय है गांव वाले। जो कोई भी आया बोल दिया खाओगे कि नहीं खाओगे? तो फिर लड़के ने कहा खाऊंगा। क्यों नहीं खाऊंगा? तो वह खा रहा है। उस समय यह हरि प्रेम महाराज को पता चल गया कि अभी मां सामने से कृपा कर रही है। और लड़के को बेचारे को कुछ पता नहीं है कि उसका सद्भाग्य कितना है। तो वो गांव में खोज रहे थे उसको। अभी यह भानु पीसी खोजते-खोजते भानु पीसी के घर गए। देखा कि वो लड़का बैठकर के खा रहा है मक्खन। तो उसको कहा कि अरे तुम यहां पे बैठे हो। मां तुम्हारी राह देख रही है। जाओ जाओ दौड़ के जाओ मां के पास में। तो ये लड़का भी बेचारा एकदम घबरा गया कि मां मेरी राह देख रही है। पता नहीं क्या होगा। वह दौड़ के गया मां के पास में। वह देखा मां पूजा के आसन पर बैठी हुई है। तो लड़के ने कहा कि मां क्या चाहिए? क्या हुआ? तो मां ने कहा बैठो मैं तुमको दीक्षा दे रही हूं। दीक्षा लोगे क्या तुम? तो लड़का बोलता है मुझे कुछ पता नहीं है। मैं दीक्षा क्या है? यह क्या है? वो मैं तो फिर खाना खा के आया हूं। अभी तो भानु बीसी के वहां खा रहा था। तो मैंने कहा वो सब कुछ चिंता मत करो। मैं दीक्षा देती हूं। तुम ले लो। देखिए कि ठाकुर के पास जाकर के आपको कितनी विनती करनी होगी। कितना उनके पास में जाना होगा। हां ठाकुर संस्कार देखते थे। अब ये पूर्ण वगैरह है। नहीं आ रहे हैं तो पूर्ण के वो वहां पे उसको देखने के लिए मास्टर महाशय के स्कूल में चले जाते थे। नरेंद्र नहीं आता था तो नरेंद्र को देखने के लिए नरेंद्र के साथ में वार्तालाप करने के लिए उसके घर चले जाते थे। यह सब ठाकुर करते थे। किंतु वह सब उच्च अधिकारी के लिए। अभी यह लड़का जो है उसके बारे में इससे ज्यादा और कुछ नहीं पता है। एटलीस्ट मुझे नहीं पता है। तो देखिए कि ऐसे कितने ही लोगों के ऊपर में मां ने जैसे कि सामने से कृपा की है। सामने से चलकर के इनको आशीर्वाद दिया है और कि देखिए कि और एक प्रसंग है।

कहानी: जयरामबाटी के कुछ ब्राह्मण माँ से नाराज हो जाते है

शायद इसके साथ में रिलेटेड ना हो। किंतु मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर और मां में जो कंट्रास्ट है तो किस हद तक मां वो समाज के भीतर में यह जो आध्यात्मिकता है प्रवेश करवाना चाहती थी। एक बार ऐसा हुआ कि वहां पर ब्राह्मण भोजन चल रहा है जयराम बाटी में तो अभी ब्राह्मण भोजन चल रहा है। सबको भोजन करवाना है। किंतु जैसे गांव की प्रथा होती है सबसे पहले ब्राह्मण लोगों को भोजन मिलेगा। ब्राह्मण पुरुषों को उसके बाद में ब्राह्मण स्त्रियां वहां पर बैठकर खाएगी और उसके बाद में और जितनी जाति है नाती है वे लोग वहां पर बैठकर आहार करेंगे तो इस तरह से पहले ब्राह्मण पुरुषों को बिठाया गया और फिर जैसे ही वहां से वह दो ब्रह्मचारी है वो हाथ में वो खाने का यह सब जो बर्तन खिलाने का वो जो होता है राइस वगैरह जिसमें भरा हुआ है वह लेकर के परोसने के लिए आए। तो जैसे ही दो ब्रह्मचारी को देखा वैसे ही सभी ब्राह्मण लोग चिल्लाना शुरू कर दिए। अरे यह कौन है यह लोग? कौन हम ब्राह्मणों को खाना खिला रहे हैं? परोस रहे हैं। कौन जाति है इनकी? कौन सी नाथ के हैं? ऐसा करके सब ने चिल्लाना शुरू कर दिया। अभी यह लड़के मोस्ट प्रोबेबबली होंगे वह कोवालपाड़ा के। अभी कोलपाड़ा के जो लड़के मां के पास में आते थे और मां की आशी मां के आशीर्वाद प्राप्त करके वह वहां पर रहते थे और फिर किसी ने ब्रह्मचर्य भी धारण किया था। किसी को फिर सन्यास भी प्राप्त हुआ था। मां के मां ने ही गेरवा वस्त्र दिया था। या तो फिर मां कहती थी कि यहां से गेरवा लो और फिर वहां पर जाकर के बेलूर मठ में शरद महाराज को कह के बेलूर मठ में वीरजा होम करवा के आना। तो इस तरह से वो मां का सिस्टम था। तो उसी तरह से यह दो ब्रह्मचारी थे। खाना परोस रहे हैं। प्रारंभ ही जैसे किया कि हल्ला हल्ला मच गया। हल्लागुल्ला मच गया। यह सभी लोग चिल्ला रहे हैं कि यह कौन जाति के हैं जो कि ब्राह्मणों को परोसेंगे। पता नहीं है कि सिर्फ एक ब्राह्मण ही दूसरे ब्राह्मण को परोस सकता है। ऐसा करके सभी लोग खड़े हो गए। तो मां भी एकदम अभी देखिए और कोई होता यदि मां के लेवल पर जिनकी कि इतनी माने स्पिरिचुअल पावर है कोलकाता से इतने सारे भक्त जिनके पास में जय राम बाटी में आते हैं तो और कोई होता तो वो सीधा-सीधी कह देता कि अच्छा तुमको नहीं खाना है निकलो यहां से कोई जरूरत नहीं है किंतु क्या है देखिए कि यह आध्यात्मिक जो एक रीति जो है इसको बना करके रखना है अपने समाज समाज में ऐसा नहीं है कि जब आप आध्यात्मिक होते हैं तो आपके पास में एक लाइसेंस आ जाता है दूसरों की यह जो सम्मान है दूसरों की यह जो सेंसिटिविटीज है उसको ठुकराने का। यह सभी के सम्मान को सभी की सेंसिटिविटीज को बना करके आपको आध्यात्मिक होना है। तो मां जैसे कि उनको बार-बार विनती कर रही है कि आप लोग आहार कर लीजिए। बिना आहार के आप मत उठिए। वरना तो यजमान को दोष लगेगा। अभी ये जो पूरे विश्व के यजमान है उनको क्या दोष लगने वाला है? वहां से जो ब्राह्मण लोग बिना खाएंगे जाएंगे तो साले सब नरक में जाएंगे। किंतु फिर भी वही जो जगत जननी इन ब्राह्मणों का भी अपकार नहीं करना चाहती है। मां को पता है यदि ये बिना खाए यहां से चले गए तो उनकी यह जो बाद की अवस्था है बड़ी बुरी होगी। किंतु ऐसा नहीं कह के मां बार-बार विनती कर रही है। आप लोग खाना खाइए और फिर जो भी है आप कहिए। हम क्षमा चाहती हूं मैं आपसे। मैं किसी ब्राह्मण को ले आऊंगी परोसने के लिए। ऐसा बार-बार विनती करती है। फिर भी यह लोग ब्राह्मण लोग वहां से उठकर के चले गए। अभी देखिए। जगत धात्री का जगत जननी का इस तरह से अपमान करना और कोई देवी होती तो सीधा श्राप ही दे देती कि जाओ यहां से मरो नरक में जाकर के किंतु मां नहीं मां फिर क्या किया गांव के यह जो प्रतिष्ठित जो कुछ-कछ लोग होते थे उनके घर जाकर के मां विनती कर रही है कि देखिए ब्राह्मण लोग मेरे घर आए थे बिना खाना खाए चले गए हैं तो इससे तो सबका अकल्याण होगा अभी यह अकल्याण होने वाला है ब्राह्मण लोगों का ही किंतु फिर भी मां ऐसा कहती है कि मेरा होगा दूसरों का होगा तो बेटर है कि आप ब्राह्मण लोगों को समझा करके वहां पर खाना खाने के लिए वापस भेजिए तो उस समय क्या था कि वहां के वो जो आस जो एक बड़ा जमींदार था वो जमींदार था फिर मां का मंत्र शिष्य ऐसे तो कितने पावरफुल लोग मां के मंत्र शिष्य थे मां यदि उनको आदेश करेगी तो ब्राह्मी लोगों को कहां ये लोग ठिकाने ला देंगे किंतु ऐसा नहीं वो जमींदार था उसका रिप्रेजेंटेटिव गांव में रहता था और वह भी बड़ा म जमींदार का रिप्रेजेंटेटिव है। बड़ा ही पावरफुल आदमी है। मां उसके घर जाकर के विनती कर रही है कि आप ब्राह्मण लोगों को समझाइए आहार फिर से कर ले। तो फिर वो रिप्रेजेंटेटिव तो एकदम वो म तो घबरा गया कि मां स्वयं आकर के इस तरह से विनती कर रही है। उसको तो पता है कि उनके ये जो जमींदार है वह तो कैसे वो मां के भक्त हैं। तो फिर उसने क्या किया? सीधा जो जितने भी ब्राह्मण थे सबको बुलाया अपने घर और फिर सबको कहा कि तुम लोगों को शर्म नहीं आती है मां के साथ में इस तरह से करते हो मां का अपमान करते हो इस घटना का क्या होगा बाद में पता है तुम लोगों को माने सिर्फ इन लोगों का जो आर्थिक जो माने इस जगत में जो नुकसान होगा ये जमींदार यदि नाराज हो जाएगा उससे भी बड़ा है कि दूसरे लोक में दूसरे जगत में क्या होगा जब आप जगत धात्री का जगत जननी का अपमान करते हैं किंतु फिर भी यह ब्राह्मी लोगों का घमंड देखिए वो किसी भी बात से ना ये हो नहीं हो रहे हैं स्वीकार नहीं कर रहे हैं वो ठंडे नहीं हो रहे हैं तो फिर मां ने कहा अभी कि अच्छा ऐसा क्या है माने कोई प्रायश्चित करें ना कि क्या करें कि जिसकी वजह से यह ब्राह्मण लोग फिर से आकर के खाना खाएं तो यह ब्राह्मण लोगों ने कहा कि आप हमको जुर्माना देना होगा यह जुर्माना आप देंगे तभी हम जाकर के बैठकर के खाना खाएंगे तो कितना देना होगा जुर्माना तो उन्होंने ठीक किया ₹25 देना होगा। माने उस समय की बहुत बड़ी रकम है। तो ठीक है। मां ने ₹25 जुर्माना दिया तब कहीं जाकर के यह लोग आकर के बैठकर के खाना खाए। देखिए कि मां यदि उन लोगों को जाने देती तो इन लोगों का कितना बड़ा अकल्याण होता। कितना बड़ा अपकार होता। उनकी सात पीढ़ियां डूब जाती। किंतु उन लोगों के साथ में ऐसा ना हो बोलकर के मां कितनी ही करुणा से माने कितना ही विनम्रता से उनके सामने विनती कर रही है कि आप लोग आइए और खाना खा लीजिए। जिन लोगों ने यह स्मृति कथा लिखी है वे लोग कहते हैं कि हम लोग तो आश्चर्य में ये हो गए कि मां इतना उन लोगों को रिक्वेस्ट कर ही क्यों रही है? किंतु देखिए कि यह सब तो देवी सब मां के भीतर में क्या भाव है। यदि मां इन लोगों को जाने देती, यदि इन लोगों को छोड़ देती, बिना खाए यह लोग चले जाते तो फिर इन लोगों का क्या होता, क्या होगा, यह शायद मां से नहीं देखा जाएगा। बोल करके मां ने अपने से रिक्वेस्ट करके करके जुर्माना देकर के उन लोगों को बिठा के खाना खिलाया। किंतु देखिए फिर यह तो मां के साथ में भैरव भी तो आते हैं ना। तो वो ललित च वो एक थे ललित बाबू मां के भैरव जैसे वो संतान वो पास में ही रहते थे तो उनको पता चला कि ये ब्राह्मण लोगों ने मां के पास में से इस तरह से दंड वसूली किया है तो वह तो बड़े नाराज हो गए फिर एक दिन आए गांव में मां के पास में मां का दर्शन करने के लिए फिर क्या था कि एक वो ग्रामोफोन लेकर के आए थे तो ग्रामोफोन उस समय एक तो यूनिक एक चीज था कि एक मशीन में से आवाज निकलती है तो ठीक ठीक है वो गांव के बीच में जाकर के ग्रामोफोन चालू कर दिया। तो ये जितने भी ब्राह्मण थे जिन लोगों ने मां के पास में से ये दंड वसूला था वो सब आकर के मां के वो वो ग्रामोफोन सुनने के लिए आकर के खड़े रह गए। उत्सुकता से परवश होकर के क्या है यह? कौन सा यह जादू चमत्कार वाला मशीन है। तो यह ललित बाबू ने देखा कि सभी लोग आ गए हैं। फिर उन्होंने ग्रामोफोन बंद करके पॉकेट में से एक रिवॉल्व निकाला और हवा में फायरिंग करते कहा कि जिन लोगों ने मां के पास में से पैसा वसूल किया है वो वापस दे दो वरना अभी सबको मैं शूट कर देता हूं। तो ये लोग ऐसे डर गए बेचारे कि जो दंड लिया था वसूल किया था मां के पास में से जुर्माना वो सब वापस दे दिया। तो देखिए कि

कहानी: माँ के भैरव भक्त ललित बाबू की कहानी

ऐसा ही एक दूसरी घटना है। ललित बाबू की ही यह तो मां के भैरव जैसे थे सेवक तो पागली मामी पागली मामी गई है अपने पिताजी के वहां पे। तो वो है पागली उसके पिताजी भी पागल जैसे ही पता नहीं कैसे थे तो पिताजी ने क्या किया कि पागली के जितने भी गहने हैं अपने पास में रख लिए तो यह पागली तो बेचारी वैसे ही पागल है और पिताजी ने गहने छीन लिए उससे तो और भी पागल हो गई तो आकर रोती-रोती मां के पास में कहती है कि मेरे पिताजी ने मेरे गहने ले लिए हैं मैं क्या करूं मेरे गहने लौटा दो ऐसा करके रो रही है तो मां भी बेचारी क्या करेगी तो उस समय यह ललित बाबू थे तो ललित बाबू उन्हें तो जैसे उनको पता चला कि मां को कष्ट मिल रहा है इस तरह से सीधे तैयार हो गए वो पुलिस वाले का वो कपड़े पहन करके सीधा उस गांव में चले गए वो जो ये पागली मामी का जो पिताजी जहां पर रहते थे उसको धमकाने के लिए तो जैसे वो गए हैं उस समय मां को यह डर लग गया। देखिए यह जो पागली मामी का पिता उसकी वजह से मां को जो कष्ट मिल रहा है उसका अकल्याण ना हो। ललित बाबू जाकर के उसका अपमान ना करें। इसके लिए मां ने क्या किया? उस समय मास्टर महाशय भी वो जयराम बाटी में उपस्थित थे। मां का दर्शन करने के लिए आए थे। और मास्टर महाशय माने ही इज अ कूल पर्सन। उनका हृदय भी एकदम मैच्योर ही इज अ मैच्योर एंड बड़े ही उन्हें एक उनका जो बुद्धि शक्ति है एकदम वो स्टैंडर्ड टाइप का था। तो मां ने उनको बुला करके कहा देखो वह ललित बाबू गए हैं। ललित गया है इसके पास में से वह गहने वापस लेने के लिए। वह ब्राह्मण का अपमान करेगा। तो तुम एक काम करो आप एक काम कीजिए। मास्टर महाशय को मां कहती है। आप जाइए पीछे पीछे में और देखिए कि वो ब्राह्मण का अपमान ना हो। तो मास्टर महाशय इमीडिएटली एग्री हो गए और वो भी गए पीछे-पीछे में। अभी यहां पर जिस सेवक महाराज ने यह कहानी लिखी है, वह कहते हैं कि मां को उस दिन रात को यह बात के डर से कि उस ब्राह्मण का कहीं अपमान ना हो जाए। पूरी रात नींद नहीं आई थी। तो अभी देखिए कि जिसने मां को इतना कष्ट दिया उसके प्रति मां की इतनी ममता कैसे हो सकती है? किंतु बात ऐसी है कि देखिए कि दो बात एक तो ब्राह्मण लोगों का अपमान नहीं होना चाहिए। शास्त्र में जो लिखा है उसकी रक्षा करनी है। दूसरा कि ब्राह्मण अजानता माने इग्नोरेंस के माध्यम से भी कहीं मां का कहीं अपमान ना कर ले। मां को कहीं कष्ट ना पहुंचा दे। जिससे कि उसको नरक भुगतना होगा। तो उसको नरक ना भुगतना पड़े। बोल के मां खुद इतना कष्ट उठा रही है उस ब्राह्मण के लिए तो क्या है देखिए हम सब की जो परिस्थिति है इस संसार में हम लोग ना ही यह कोई आध्यात्मिक उच्च कोई यह लेकर के आए हैं अधिकारित्व लेकर के आए हैं ना ही ठाकुर मां स्वामी जी की सेवा करने का उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का कोई शक्ति है हमारे में यह जो सेवा अपराध होता है वह बार-बार हम करते ही रहेंगे और इस तरह के सेवा अपराध अपनी यह जो फिजिकल मेंटल यह सब वीकनेस है उसकी वजह से कहीं हमको नरक ना भुगतना पड़े बोलकर के मां सामने से आकर के कष्ट स्वीकार करके हमको यह सब मुसीबतों से निकालती है। यहां पर जो ठाकुर कहते हैं कि इसने और क्या किया है? तुमको इससे और अनेक ज्यादा कुछ करना है। इस अर्थ में नहीं कि मां को स्वामी विवेकानंद से कोई बड़ा एक आध्यात्मिक महापुरुष को तैयार करना था। इस अर्थ में कि ठाकुर ने आध्यात्मिक उच्च अधिकारियों को ही शिक्षा दी थी। शिष्य बनाया था। जबकि मां के पास में मध्यम और ज्यादा से ज्यादा मंद अधिकारी और जो अधिकारी भी नहीं है। यह जो जय राम भाटी के ब्राह्मण मां का अपमान करने के लिए उद्यत हो गए थे, तैयार हो गए थे। ऐसे लोगों के ऊपर में मां को अपनी करुणा और कृपा बरसानी थी। इसलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं कि मैंने और क्या किया है? तुमको इससे और अधिक बहुत कुछ करना होगा। दोस्तों आज यहीं तक कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

ठाकुर हैं IIT और माँ हैं "सर्व शिक्षा अभियान" !

ये अच्छा आपने पैरेलल कि ठाकुर आईआईटी और मां सर्व शिक्षा अभियान एकदम परफेक्ट उपमा देकर के मुझे बाकी जगह का तो पता नहीं किंतु गुजरात में मैं था तो वहां पर देखा कि गवर्नमेंट का पॉलिसी है कि बच्चों को फेल नहीं करना है। तो ऐसा वो मां का पॉलिसी है। किसी को पीछे रख के नहीं जाना है। सबको पास कर देना है।

प्रश्न: एक बार दीक्षा प्राप्त हो जाने पर हमें अपनी मुक्ति के बारे में आश्वस्त होना चाहिए, लेकिन हम ऐसा महसूस नहीं करते। क्यों?

मां ने वो गारंटी देकर कहा है ना कि ठाकुर के नाम की दीक्षा मिली है। आपको मंत्र मिला है तो ठाकुर को स्वयं आखिरी समय आकर के आपको वह रामकृष्ण लोक में लेने को लेने को आना पड़ेगा। तो यहां तक गारंटी हमको मिली हुई है। किंतु क्या है कि क्योंकि यह इंद्रियों से इंद्रियों से जो परवश जो है ना मन हमेशा यही सोचता है कि यह इस जगत में हमको क्या मिल रहा है। वो पर जगत का वो वैल्यू्यूएशन हमको इतना नहीं आता समझ में। वैराग्य इसी को कहते हैं कि इस जगत के आकर्षण से इस जगत के एस्पिरेशन से अन्य जगत को हम वी एस्पायर टू दी अदर वर्ल्ड व्हिच इज कॉल्ड रियल वैराग्य। तो क्या है कि यह साधना प्रारंभ हो गई है। मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे राजा महाराज ने कहा ना कि समाधि इज़ अ बिगिनिंग ऑफ़ स्पिरिचुअल लाइफ। हम लोग सोचते हैं समाधि इज़ द कलमिनेशन ऑफ़ स्पिरिचुअल लाइफ। ये कहते हैं कि बिगिनिंग ऑफ़ स्पिरिचुअल लाइफ। तो यह मंत्र दीक्षा भी प्राप्त करना ऐसा है कि अभी आपने जैसे ही मंत्र दीक्षा प्राप्त कर ली तो यानी कि आपको रियलाइजेशन हो गया है। किंतु यह रियलाइजेशन हुआ है। यह रियलाइजेशन आपको अभी समय लगेगा। [हंसी] मूवीज में आप देखते हैं ना दो तरह के श्रीमंत दिखते हैं। एक तो गर्भ श्रीमंत है। पिताजी के पैसे इन्हहेरिट किए हैं। बचपन से ही पता है मैं धनी हूं। उसका एक घमंड जैसा रहेगा। दूसरा है कि मेहनत करके वह पैसा कमाया है। वो बड़े होने तक माने बूढ़ा होने तक वह सामान्य कपड़े पहनेगा। सामान्य खाना खाएगा, बस में फिरेगा। ऐसी कितनी घटनाएं हैं। वो नारायण मूर्ति, सुधा मूर्ति वगैरह पैसे है तो पैसे दिखा नहीं रहे हैं। या तो फिर सब समय उनको यह रियलाइजेशन रहता है कि पैसा है ना यह एफएमरल है। आज है तो कल नहीं है। तो क्या है? लाइफ स्टाइल को इस तरह से ना बना दो कि हम पैसा नहीं थे तो हम जिस तरह से शांति से रहते थे तो पैसा चला जाए तो कोई बहुत बड़ा कष्ट ना हो जाए। जबकि यह जो गर्भ श्रीमंत होता है वह क्या है कि वो एक उसी जगत में जन्मा है। उसके लिए वही एक सबसे बड़ी रियलिटी है। सो ही बिहेव्स इन अ डिफरेंट मैनर। हम लोग क्या है कि वो कष्ट करके मेहनत करके आखिर में वो मां का आशीर्वाद मिला है। तो अभी हमको यह किंतु यह स्ट्राइक नहीं हो रहा है कि मिल गया है सब कुछ। वो स्ट्राइक होने में अभी स्ट्राइक दूसरी स्ट्राइक होनी है। माने सिद्धि प्राप्त हो गई है। यह समझने के लिए अभी फिर से दूसरी साधना करनी पड़ेगी। पहली साधना करनी होती है सिद्धि प्राप्त करने के लिए। फिर दूसरी साधना करनी पड़ेगी। वो सिद्धि प्राप्त हो गई वो समझने के लिए। और ठाकुर कहते हैं ना कि वो कुछ कुछ यह होते हैं पेड़ होते हैं। जहां पर पहले फल आते हैं बाद में फूल आते हैं।

प्रश्न: यद्यपि मैं जानता हूँ कि आध्यात्मिक साधना महत्वपूर्ण है, किन्तु सांसारिक सुखों की मेरी इच्छा इतनी प्रबल है कि मैं साधना को अधिक महत्व नहीं देता।

नॉट नेसेसरी। देखिए संसार की रीति ही ऐसी है। इसलिए तो अपने वेद में वह चार आश्रम की व्यवस्था है ना कि अब स्टडी कीजिए। फिर यह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कीजिए। फिर वानप्रस्थ आश्रम फिर सन्यास आश्रम। तो यह तो मनुष्य का नेचर ही है। अपने शास्त्र भी इस बात को स्वीकार करते हैं। हम लोग शास्त्र कभी हमको इंपॉसिबल कार्य करने को नहीं कहेगा। ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा सन्यास आश्रम जाना वो कुछ 1% हाफ% लोगों के लिए ही पॉसिबल है। तो वो एक अलग रास्ता हो गया। आप एक बार गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर लिए तो बी ऑनेस्ट बी बी फोर्थ राइट अबाउट इट। व्हाई माने एक एक माने दो नौका में पैर रखना वो भी तो एक मुश्किल है ना। ठाकुर ने क्या कहा? अब आपने संसार किया है तो बीवी बच्चों के लिए व्यवस्था करना आपका जिम्मा है। वो नहीं करके आप इधर-उधर मारे घूमेंगे तो कैसे चलेगा? हां फिर अभी जैसे ठाकुर का खुद का था। अपनी खुद की पत्नी की संभाल नहीं लेते थे। जब तक मां काम जय राम बाटी में थी मां ने स्वामी ठाकुर ने ऐसा तो कहीं देखा नहीं कि मां क्या कर रही है। थोड़ा समाचार मंगवाए क्योंकि फिर वह तो ईश्वर में संपूर्ण रूप से अब्सॉर्ब हो गए थे। दैट इज अनदर मैटर। किंतु जब तक यह कॉन्शियसनेस है कि मैं हूं माने आई कॉन्शियसनेस जब तक रहती है तब तक तो यह धर्म रहेगा। यह धर्म और मोक्ष दो रास्ते हैं। माने अर्थ और काम जब तक है अहंकार जब तक है तब को तब तक धर्म को फॉलो करना है। और धर्म यानी कि यह पुत्र धर्म पति धर्म यह सब धर्म। सो दैट वी विल हैव टू फॉलो। बट किंतु फिर जैसे शास्त्र कहते हैं कि एक समय आएगा वानप्रस्थ आश्रम बच्चे जैसे बड़े हो जाते हैं अपना जिम्मा लेना शुरू कर देते हैं फिर आप अपना जीवन का वो ट्रांजिशन प्रारंभ कीजिए धीरे-धीरे करके ईश्वर में और ज्यादा मन लगाइए फिर उस अवस्था में आकर नहीं लगाते हैं तो ठाकुर कहेंगे धिक वो जो केशव सेन के वहां पर गए एक बूढ़ा आदमी बैठकर के पत्ते खेल रहा था तो ठाकुर कहते हैं ना कि इस उम्र में कि वह ईश्वर का नाम चिंतन करना चाहिए नहीं कर वो पत्ते खेल रहा है। अभी ठाकुर यह यंग लोगों को ऐसा नहीं कहता कि वो यंग आदमी है। संसार की चिंता कर रहा है। तो क्यों संसार की चिंता कर रहा है? माने रिवर्स मास्टर महाशय वहां पर रह रहे हैं। दक्षिणेश्वर में रिट्रीट के लिए आए हैं। इस मास्टर महाशय को ठाकुर घर वापस भेजते हैं। तुम घर जाओ घर में इस तरह से रहो जैसे कि पतिप तुम्हारे तुम्हारे पत्नी और संतान जैसे कि तुम्हारे कोई नहीं है। उनके भरण पोषण की तुमको जिम्मा लेना है। किंतु उनसे कोई भीतर से संबंध नहीं रखना है। सो ठाकुर दोनों अवस्था में वो जो बूढ़ा आदमी है कहते हैं कि इस अवस्था में पत्ते खेल रहा है। और यहां पर यंग आदमी उनके पास में आया है तो घर वापस भेज रहा है। कथामृत के प्रारंभ में ही प्रथम द्वितीय दर्शन में ही ऐसा है कि वह यहां पर आकर रह रहा था एक आदमी ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं मैंने उसको घर वापस भेज दिया यह कह के कि तुम्हारे बीवी बच्चों की संभाल कौन रखेगा? तुम्हारे पड़ोसी रखेंगे क्या? सो क्या है कि जिस अवस्था में है उस अवस्था का धर्म निभा लेना है। वह भी तो शास्त्र सम्मत ही है। सही बात है। यह जो संस्कार का जो मोमेंटम जो होता है वह इतना इजीली जाता नहीं है। इसलिए तो ठाकुर कहते हैं ना कि मने वने और कोणे ये बीच-बीच में रिट्रीट करना चाहिए। संसार में है तो संसार छोड़ नहीं पाएंगे। रिट्रीट में चले जाना है। कोई नित्य कुछ ना कुछ साधना करनी है। यथाशक्ति

प्रश्न: जयरामबाटी के ब्राह्मणों की कहानी के बारे में - मैं ललित बाबू से सहमत हूं। माँ को धूर्त ब्राह्मणों के प्रति इतनी दयालु नहीं होना चाहिए था।

नहीं यही डिफरेंस है ना। देखिए कि जो करुणा जो होती है ना वो किसी लॉजिक के अनुसार नहीं चलती। ये लॉजिक कब तक रहता है? जब तक हम संसार के साथ में जुड़े हुए हैं। जैसे उर्ध्वगति करना शुरू किया। होता क्या है पता है? कई बार हम अपने को मेजर करना चाहते हैं कि मैं कहां तक पहुंचा हूं आध्यात्मिक जीवन में। तो दीज़ आर द मेजरमेंट्स कि हमने यह लॉजिक के परे जाकर सोचना शुरू किया है कि नहीं कि अभी तक हम इसी लॉजिक के में बंधे हुए हैं। दीज़ आर सम ऑफ द मेजरमेंट्स। दुश्मन के प्रति या तो जिसने हमारा अपमान किया है ऐसे लोगों के प्रति या तो जो कि दुष्ट है ऐसे लोगों के प्रति दया करुणा होना। दिस इज द साइंस कि हम लोगों ने फिर यह बंधन छोड़कर के ऊपर उठना शुरू किया है। और यह जेन्युइन होना चाहिए। फिर यह म वो प्लान करके कि मैं इस पर दया कर रहा हूं। लोग देखें और फिर मेरी प्रशंसा करें। वह भी नहीं होना चाहिए। इट हैज़ टू बी स्पॉनटेनियस। ललित बाबू मां को कहते हैं आज मैं तुम्हारा अबाध्य लड़का हूं। तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा। जाकर के अभी देखिए उन्होंने उनकी पिटाई नहीं की। शूट नहीं किया। वही बहुत बड़ी बात है। माने भक्त लोग ललित बाबू को कजर कहते थे। उस समय वो जर्मनी का वो था ना डिक्टेटर कैजर कैजर जिसने कि ये फर्स्ट वर्ल्ड वॉर स्टार्ट किया था तो इनका नेचर भी ऐसा था वो मां के शिष्य और बिल्कुल भैरव जैसे तो लोग उनको कैजर करके बुलाते थे माने उसने फर्स्ट वर्ल्ड वॉर चालू कर दिया इसने ये जय राम भाटी में वॉर चालू कर देगा किसको पता कलेक्ट करना वो बहुत सारी कहानियां है उनकी बिखरी पड़ी है बहुत सारी है यह कलेक्ट करके एक बार देखेंगे सही में वो मने वो गिरीश घोष के ही वो समकक्ष है ये अच्छा टॉपिक है। करूंगा कनेक्शन करेंगे एक बार।