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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

नीरव साधना || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 24 Feb 2025

प्रार्थना

ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित मां का जीवन चरित्र यह इस सप्ताह हम पाठ करेंगे और उसके ऊपर में थोड़ी सी आलोचना करेंगे हम जिस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं उसका नाम है नीरव साधना अभी जो एक प्रसंग हमारे सामने आता है अभी तक जो हुआ उसका एक आउटलाइन हमको

प्रसंग: 6 पर्व में विभाजित माँ का जीवन

पता है कि मां का जीवन हमने कितने कुछ पर्व में बांट दिया है हमारी अंडरस्टैंडिंग के लिए उसमें मां का बालिका पर्व कि जिस समय मां कामा जयराम बाटी में थी और वो बालिका थी और उस समय की कुछ घटनाएं भी हमको पता है जैसे कि वहां पर जब अकाल पड़ा था तब उनके पिताजी ने जो खिचड़ी वगैरह पकाते थे तो अपने छोटे-छोटे हाथों से हवा डाल कर के उसको ठंडी करके लोगों को खिलाने में सहाय करती थी तो वह एक बालिका परवा हो गया उसके बाद में जब ठाकुर के साथ में उनका विवाह हुआ तो वहां से लेकर के ऑलमोस्ट अराउंड 18592 तब तक मां जयराम बाटी और कामर पुकुर में ही थी जब ठाकुर दक्षिणेश्वर से वहां पर जाते अपने गांव तो मां भी कामर पुकुर उनके साथ में उनका उनको देखने के लिए जाती उनकी सेवा करने के लिए जाती उस समय का एक सुंदर प्रसंग है कि एक बार जब ठाकुर जयराम बाटी गए थे तो मां तो छोटी बच्ची थी तो लज्जा के मारे शर्म से कहीं पर छुपी हुई थी किंतु फिर भी यह हृदय ने उनको खोज निका कि वह कहां पर हैं और उनको उनके श्री चरणों में पुष्प देकर के उनकी पूजा की थी तो वह एक सुंदर प्रसंग उस समय का किंतु फिर भी हमको पता है कि ठाकुर के जो लक्षण थे सब दक्षिणेश्वर में वह कभी दिगंबर हो जाते कभी वह भाव में आकर के नृत्य करते कभी मां जगदंबा का नाम लेते लेते वह रोना धोना शुरू कर देते कि क्यों मां तुम दर्शन नहीं दे रही हो वगैरह तो ठाकुर की इस सब गतिविधि का समाचार वहां पर जाता था जयराम बाटी कामर पुकुर और मां भी बड़ी दुखित होती थी सोचती थी कि मैं भी यदि जाऊं दक्षिणेश्वर अपने नजरों से देखूं वह कैसे हैं अपने हाथों से सेवा करूं तो मां 18720 पूजा तो तब से लेकर के ठाकुर और मां इन दोनों के जीवन का एक नया पर्व आरंभ हुआ ठाकुर के जीवन में यह आनंद पर्व कि मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के उन्होंने कलकत्ता में अपना जो नया मैसेज है या तो फिर वही सनातन मैसेज उसको आज की भाषा में उन्होंने फैलाना शुरू किया और क्या है कि उनकी खुद की तो कोई एजेंसी नहीं थी उन्होंने तो कोई प्लान करके कुछ करते नहीं थे मां जगदंबा ने उनके माध्यम से कार्य करवाना शुरू किया और यहां पर मां के भी वह आनंद के दिन मां कहती है उस दिनों का दक्षिणेश्वर के दिनों का वर्णन करती है कहती है कि ऐसा लगता था जैसे कि हृदय में आनंद का पूर्ण घट बिठाया हो दिन रात आनंद में जाते थे ठाकुर की सेवा करते-करते कहां समय चला जाता था पता नहीं चलता था और हालांकि देखिए कि बाह्य दृष्टि से देखें तो उनको कितना कष्ट था छोटे सी नबत में रहना है फिर वह फिर उस उसी नहब में ठाकुर के लिए खाना बनाने का वह सब सामान है फिर वहां पर वोह उस छत के ऊपर में से एक यह झुल रही है हांडी हांडी के भीतर में पानी रखा है पानी के भीतर में मछलियां तैर रही है तो रात को सोने के समय उनका कलकल शब्द सुनाई देता है तो यह बाह्य दृष्टि से बड़े ही कठोर जीवन मा बिताती थी यहां तक कि शौच जाने के लिए वो वहां पर सबसे अरली मॉर्निंग उठ कर के बाकी सब काली मंदिर में ना उठे हो उस समय बड़ी ही अरली मॉर्निंग उठकर के झावतला बोलकर के वही गंगा के किनारे जगह है वहां पर शौच के लिए जाना होता था और फिर दिन भर मां व बाहर भी नहीं निकल पाती थी क्यों क्योंकि वह ठाकुर ने ही कहा था कि मैंने सोचा था कि वह गांव की औरत है वह अभी यहां पर कहां इधर-उधर सोच के लिए जाएगी लोगों की नजर में आएगी मुझे शर्मिंदा होना पड़ेगा यदि लोग मां के बारे में कुछ बोलना शुरू करें तो किंतु वोह ठाकुर हृदय को कहते हैं कि देखो मैंने खुद ने आज आज तक उसको कभी बाहर कहीं जाते नहीं देखा है तो फिर मां ने जब यह सुना तो मां बेचारी बड़ी टेंशन में आ गई मां अपनी वोह मां काली को प्रार्थना करके कहती है कि ठाकुर को तो जो देखना चाहते हैं आप सब दिखाई देती है मां काली तो आप मेरी इज्जत की रक्षा कीजिए मेरी लाज की रक्षा कीजिए और मां काली ने भी मां शारदा देवी को इस तरह से लज्जा और उसके आवरण में ने रखा था कि मां बाहर निकलने भी मतलब इस तरह से इतना अर्ली मॉर्निंग सब समाप्त कर देती थी कि किसी की नजर में भी आना नहीं होता था किंतु वह वही मां फिर कहती है कि दिन के दौरान यदि सोच जाने को हुआ तो फिर वह तो जाने ही पाएगी तो मां कहती है कि वेग धारण करते-करते पेट का रोग लग गया तो इस तरह की कठिन परिस्थिति में रहने के बावजूद मां ने जो जिस तरह से साधना की थी सतत उन के मन में ईश्वर का अविरत नाम स्मरण चलता रहता था उसकी वजह से बाकी सब भूल जाती थी और वही आनंद ही उनको याद रहता था आखिर में और फिर यह आनंद के दिन भी समाप्त हुए ठाकुर को कैंसर हुआ 1885 की गर्मी में उस ग्रीष्म ऋतु में और फिर उनको ट्रीटमेंट के लिए और वह जो समाप्त हुआ जो जिस घटना के साथ में हम आनंद पर्व को समाप्त करते हैं वह है पाणी हाटी की घटना तो पाणी हाटी की घटना का भी हमने विस्तृत रूप से आलोचना किया है आलोचना की है अभी फिर ठाकुर को पहले तो श्याम पुकुर और बाद में काशीपुर ट्रीटमेंट के लिए लाया गया कैंसर की और पहले तो कुछ समय मां वहीं पर दक्षिणेश्वर में थी और वो बेचारी अकेली रहती थी तो किस तरह से ठाकुर की सेवा करने का भी सौभाग्य नहीं मिलता था तो कितने कष्ट के दिन गए होंगे हम समझ सकते हैं किंतु वहां पे कोलकाता में शीघ्र ही कुछ ही दिनों में यह भक्तों को समझ में आ गया कि यदि ठाकुर की ठीक-ठीक सेवा करनी है उनके लिए यह पथ्य या डाट प्रस्तुत करना है तो मां को तो बुलाना ही पड़ेगा तो मां को पहले श्याम पुकुर में बुलाया गया वही अल्प परिसर जगह बड़ी ही छोटी जगह उसमें मां को रहना है ठाकुर के लिए खाना बनाना है वहां पे भी मां का वही रूटीन था रात को सिर्फ 4 घंटा सोने को मिलता था क्योंकि वहां पे जो अ कमरे तो बड़े कम थे और फिर मां की छत पे चली जाती थी बाथरूम भी एक ही था तो 3:00 बजे उठकर के बाथरूम जाकर के वह मां अपना कार्य प्रारंभ कर देती थी तो कहीं 11 बजे वह अपने कमरे में सोने को जाती थी तो सर के ऊपर में पत्थर बांध कर के सर में अपने सीने में आशा और भरोसा लेकर के मां इस तरह से तपस्या कर रही थी उसके बाद में ठाकुर को काशीपुर लाया गया और फिर वहां से हमको पता है कि 18864 कमार पुकुर चली गई यह कामर पुकुर का समय कहा जाएगा कि मां का यह जो तपस्या मय जीवन था इतनी कठिनाइयां इतनी सब समस्याओं को समाधान समस्या में रहते रहते भी जो मां का जो पूरा जीवन बीता था तो इतने तपस्या मय कठोर जीवन में भी सबसे ज्यादा तपस्या मय जीवन मां का वही कमार पुकुर के दिन थे वो कलकत्ता के भक्त वो जो ठाकुर के त्यागी संतान थे वो तो सब पूरे जगत में बिखर गए थे कोई कहां प्रव्रज्या के लिए चला जा रहा है स्वामी जी अमेरिका चले गए थे यहां पर शशि महाराज अकेले कभी अकेले तो कभी एक दो गुरु भाई रहते थे उनके साथ में वराह नगर और फिर ये आलम बाजार मठ में और वे लोग तो बेचारे खुद के पास में खाने को पैसा नहीं है मां की चिंता तो कैसे करेंगे और फिर यह ठाकुर के भक्त भी जैसे कि सब अपने-अपने जगत में जैसे कि खो गए थे फिर धीरे-धीरे कर के वोह कामर पुकुर से समाचार आने लगा कि मां का तो बड़ा ही कठिन जीवन जा रहा है खाने पीने की भी समस्या हो रही है तब कहीं जाकर के भक्तों ने बीच-बीच में मां को कलकत्ता लाना शुरू किया और फिर यह श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा देवी की मां एक बार जाकर के कामर पुकुर में देखा कि वह बेचारी को तो इतनी दुरावस्था है तो फिर वह मां शारदा देवी को अपने साथ में जयराम बाटी ले आई और फिर मां जयराम बाटी आई फिर यह स्वामी जी अमेरिका से आए और फिर संघ की स्थापना की जैसे पूरे भारत में श्री रामकृष्ण देव के नाम का झंडा जैसे कि विजय पता का फैलने लगी तब कहीं जाकर के फिर अपने संघ की स्थापना हुई और यह शरत महाराज है वगैरा ने मां का सेवा का भार ग्रहण किया ऐसा नहीं है कि मां की सेवा यह लोग पहले नहीं करते थे योगेंद्र महाराज करते थे त्रिगुणा तीता नंद जी करते थे किंतु फिर उस समय पैसों का अभाव इतना था कि बहुत ज्यादा कुछ कर नहीं सकते थे और मां वैसे भी लोगों की नजरों से दूर ही रहती थी बड़े ही कम भक्त थे जो जिनको कि मां के बारे में पता था और जो लोग की मां के पास में आते थे किंतु फिर जब यह संघ की स्थापना हुई रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई तब से फिर मां ने बीच-बीच में कामर कोलकात्ता नियमित रूप से आना शुरू किया और फिर कोलकाता में वैसे ही तो ठाकुर का नाम का विजय अभी चारों ओर विजय पता का लहरा रही है स्वामी जी के बारे में प्रतिदिन न्यूज़पेपर में कुछ ना कुछ आ रहा है तो नेचुरली भक्तों की संख्या भी बढ़ेगी उनको भी एक क्यूरियोसिटी होगी कि यह मां शारदा देवी कौन है जाके उनका दर्शन करें तो फिर अभी धीरे-धीरे करके भक्तों का आगमन बढ़ने लगा मां के पास में जयराम बाटी में भी और कलकत्ता में भी दोनों जगह पे मां दीक्षा भी देती थी भक्तों के साथ में बात भी करती थी और फिर मां के खुद के सेवक सेवक भक्त भी आकर के जुटे यह क्वाल पाड़ा वगैरह से यंग लड़के मां के पास में रहते थे जयराम बाटी में मां की सेवा करते थे उनकी आज्ञा का पालन करते थे तो वो था मां का जैसे कि अ गुरु भाव का प्रकाश तो वो गुरु भाव का प्रकाश आखिरी फिर वह 1920 में मां ने महासमाधि ग्रहण की तो अभी देखिए कि मां की दृष्टि से मां के जीवन के कितने पर्व होते हैं एक तो है कि बालिका पर्व जब विवाह के पहले के दिन जयराम बाटी के दूसरा है जयराम बाटी कामर पुकुर पर्व जबकि विवाह तो हो गया है किंतु वह अभी गांव में ही रह रही है तीसरा है दक्षिणेश्वर पर्व जबकि वह वहां पर आई है दक्षिणेश्वर में ठाकुर के आनंद की हाट बिठी हुई है और मां ठाकुर की सेवा कर रही है चौथा है कि तपस्या पर्व कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब चौथा होगा संघ जननी पर्व जो ठाकुर के कैंसर की ट्रीटमेंट जो चल रही थी उस समय माने सर्वप्रथम यह त्यागी संतानों की यह लीडरशिप जैसे कि उन्होंने ग्रहण की हमने पढ़ा ऑलरेडी कि किस तरह से नरेद वगैरह मां के पास में जाते थे मां के पास में और ठाकुर को कैंसर हो गया था सब समय बोल नहीं पाते थे दुर्बल हो गए थे तो जो सब डिसीजन मेकिंग करना है तो किसी तो वडील को तो पूछना चाहिए तो यह लोग तो त्यागी संतान तो सब भैरव जैसे थे सब एक के बाद एक वो थोड़ी ना यह गृहस्थ भक्तों को पूछने को जाएंगे मास्टर महाशय या रामचंद्र को उन्होंने जब किसी की जद आज्ञा का पालन ही करना है किसी को यदि अपने सर पर लीडर बनाकर बिठाना ही है तो मां शारदा देवी ही है तो फिर मां शारदा देवी के पास में समस्याओं का समाधान कोई भी निर्णय लेना है डिसीजन मेकिंग लेना है तो उसके बारे में सलाह मशवरा करने के लिए मां के पास में आते थे तो सर्वप्रथम माने संघ का जननी का पद धारण किया तो वो जैसे कि वो पर्व चौथा पांचवा हो गया वही तपस्या पर्व और जिस दिन मां वो कमार पुकुर में रहती थी स्वामी जी के ठाकुर की महासमाधि से लेकर के स्वामी जी के भारत में आने तक के व दिन वो तपस्या पर्व और फिर जैसे ही स्वामी जी भारत में आए जैसे कि ठाकुर के नाम की विजय पताका पूरे विश्व में फैलाई उन्होंने तब से लेकर के वह भक्त जनन के रूप में स्थापित हुई सभी भक्त मां के पास में आने लगे और उसी दिनों और भी एक घटना हुई थी वही राधु की कि वह ठाकुर ने आकर के राधु की ओर दिखा कर के कह दिया कि यह योग माया है उसको आश्रय लेकर के उसका आश्रय लेकर के तुम शरीर धारण करो तो वही राधू और फिर यह स्वामी जी का आगमन यह दोनों घटनाओं से फिर मां ने धीरे-धीरे करके यह गुरु पद अपने संग में वो संभाला तो देखिए कि छह पर्वों में हम मां के जीवन को इस तरह से बांट सकते हैं अभी जिस नीरव साधना उसके बारे में जो चर्चा कर रहे हैं यह हालांकि क्रोनोलॉजिकल देखेंगे तो हम कलकत्ता वाले पर्व में ठाकुर को कैंसर हुआ है वहां तक तो आ गए हैं किंतु फिर भी जैसे कि यहां पर गंभीरानंद जी महाराज इस चैप्टर में जैसे कि एक विहंगा अवलोकन करते हैं विहंगा अवलोकन यानी कि एक पीछे की ओर एक दृष्टि करते हैं दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर फिर से एक दृष्टि करके फिर से कुछ ना कुछ महत्त्वपूर्ण प्रसंग यहां पर हमारे सामने उत्था पित करते हैं हमारे सामने प्रेजेंट करते हैं तो देखिए कि यह जो एक

प्रसंग: ठाकुर के भाव और समाधी के बारे में माँ की प्रतिक्रिया

सर्वप्रथम प्रसंग आज हम पढ़ेंगे उस प्रसंग में गंभीरानंद जी क्या कहते हैं कि एक दिन की बात है कि ठाकुर ने मां को कहा कि उनका कमरा साफ कर दो तब तक वह मां काली के मंदिर में जा करके आते हैं तो यहां पर मां ठाकुर के कमरे में थी सब सफाई वगैरह कर रही थी उसी समय जैसे कि एकाएक ठाकुर ने कमरे में प्रवेश किया आंखें लाल थी और पैर इस तरह से टलम कर रहे थे जैसे कि उन्होंने शराब पी ली हो यानी कि ठाकुर भाव में मत्त थे भाव के नशे में धुत थे और इसी अवस्था में आकर के ठाकुर मां को पता नहीं है ठाकुर आ गए हैं वो तो वो पीछे से आकर के मा ठाकुर ने मां को थोड़ा सा धक्का देकर के कहा कि क्या मुझे क्या मैंने शराब पी रखी है कि क्या तो माने मां ने एकदम पहले तो चौक गई होगी कि क्या हुआ किंतु फिर इमीडिएट अपने को संभाल करके मां ने कहा कि अरे नहीं आप शराब क्यों पिएंगे आप तो मां काली का भावा अमृत खाया है आपने भाव अमृत यह भावा अमृत पायन किया है इस इसीलिए आप भावर रूपी नशे में मत है तो ठाकुर इस बात से आश्वस्त हो गए और बड़े ही खुश भी हो गए देखिए कि ठाकुर के साथ में ऐसा था जब वह भाव में चले जाते थे तो लोगों के ऊपर में एक तरह से डिपेंडेंट हो जाते थे वो कैशव सेन के वहां पे एक नाटक का अभिनय हो रहा था तो नव वृंदावन बोलकर के एक नाटक का तो ठाकुर को बुलाया था तो ठाकुर और राखल यानी कि भविष्य के राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद वह वहां पर गए और वहां पर बैठे हुए थे ऑडियंस में अभी क्या था कि ठाकुर के बगल में ही राखल बैठा हुआ था तो कुछ कार्य के लिए किसी चीज किसी वो फॉर सम रीजन राजा महाराज को खड़े होकर के कहीं पर जाना हुआ तो अभी वह ठाकुर की बगल वाली सीट खाली थी उस समय एक दूसरा आदमी वहां पर आकर के बैठने लगा तो इमीडिएट ठाकुर ने उसको कहा कि देखो तुम यहां पर मत बैठो यहां पर मेरा साथी है व बैठता है और क्यों तुम मेरे साथी की जगह पर क्यों नहीं बैठ पाओगे क्योंकि मेरा ऐसी अवस्था हो जाती है भाव में कि मेरे साथ वाले जो मुझे कहते हैं वह मुझे करना पड़ता है तो इसीलिए ठाकुर ने उसको अपनी बगल में नहीं बैठने दिया था ऐसी ही एक दूसरी भी घटना है कि वह घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के ठाकुर एक बार कलकत्ता जा रहे थे साथ में रामलाल दादा थे रामलाल दादा यानी कि ठाकुर के बड़े भाई रामेश्वर के पुत्र तो ये रामेश्वर के पुत्र रामलाल दादा व दोनों जा रहे थे ठाकुर वह रामलाल दादा कहीं कलकाता में एकाएक ठाकुर ने कहा कि मुझे कचोरी खाने की इच्छा हुई है तो वो ठाकुर को यह सब इच्छाएं होती रहती थी तो वहां पे फागू की एक दुकान है जहां पे यह कचोरी बड़ी सुस्वादु बड़ी टेस्टी कचोरी मिलती है तो यह रामलाल दादा कचोरी लेने को गए और फिर वो वो फिर यह जो फागू जो था जिसकी यह दुकान थी वह भी बड़ा भक्त था उस को पता है कि ठाकुर के लिए कचौरी ले जा रहे हैं तो फिर वह साथ में यह जो हुक्का में जो डालने के लिए तंबाकू होता है तंबाकू को जलाने के लिए वह जो कलके यानी कि कोयला वगैरह जो देते हैं वो बड़ा बढ़िया सा सजा करके पान बान वगैरह सजा करके वो देता था तो यह सब लेते ले लेकर के आकर के यह सब जब तक रामलाल दादा वापस आए देखा कि ठाकुर वो घोड़ा गाड़ी में नहीं बैठे हैं तो रामलाल दादा तो बड़े टेंशन में आ गए वो सब चीजें रखी साइड पे और वो दरवा को पूछा घोड़ा गाड़ी वाले को कि कहां गए यह बाबू जो यहां पर बैठे थे तो वह घोड़ा गाड़ी वाला उत्तर देता है हिंदी में कि अरे बाबू तो चले गए वहां पे तो रामलाल दादा दौड़े पीछे में देखा कि ठाकुर एकदम एकदम शीघ्र गति से एकदम स्पीडली कहीं पर जा रहे हैं तो रामलाल दादा दौड़ कर के गए ठाकुर को पूछा कि अरे आप कहां जा रहे हैं क्या कर रहे हैं तो ठाकुर जैसे कि उनकी बात को सुन ही नहीं पा रहे हैं किंतु फिर जब कुछ क्षण के बाद में जैसे कि उनको होश आया और फिर वह जैसे कि थोड़े प्रकृति स्थ हुए पता नहीं भाव के आवेग में क्या हो गया था कहां पर जा रहे थे और फिर जब रामलाल दादा उनको घोड़ा गाड़ी तक वापस लेकर आए तब उन्होंने कहा कि देखो तुम कहीं मुझे अकेला छोड़ कर के जाओगे तुम सबसे पहले मुझे पूछ कहना कि आप यहां पर ही बैठिए जब तक मैं वापस नहीं आता हूं और जब तक मैं इस तुम्हारी बात का हा में उत्तर ना दूं तब तक तुम मुझे छोड़ कर के मत जाना यहां पर देखिए कि ठाकुर किस तरह से अपने को ही फंसा दे रहे हैं जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि जो मां काली का भक्त होता है ईश्वर का जो संतान होता है गलती से भी गलती नहीं कर पाएगा तो तो यहां पर यदि ठाकुर ने अपने मुंह से कह दिया है कि जब तक तुम वापस नहीं आओगे तब तक मैं कहीं नहीं जाऊंगा तो ठाकुर यदि कितने ही भावा वेश में क्यों ना आ जाए यह सत्य रक्षा करने के लिए अपने वचन का पालन करने के लिए उनको तो वहीं पर बैठे रहना पड़ेगा तो वह जो यह सत्य रक्षा जो ठाकुर कहते हैं कि मां काली को सब कुछ अर्पित कर दिया यह लो तुम्हारी भक्ति ये लो तुम्हारी अभ क्ति ये लो तुम्हारा ज्ञान ये लो तुम्हारा अज्ञान यह सब करके पुष्पांजलि के रूप में माहाकाली के चरणों में जब अर्पण कर दिया तब ठाकुर कहते हैं कि मैं एक चीज मां को नहीं दे पाया मैं यह कभी ना कह पाया कि यह लो तुम्हारा सत्य यह लो तुम्हारा असत्य ठाकुर कहते हैं कली काल में सत्य ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है तो ठाकुर ने जब अपने को सत्य से बांध दिया तब कहीं जाकर के जो रामलाल दादा वहां से चले भी जाएंगे तब वो ठाकुर कितने ही भाव में क्यों ना आ जाए वो गलती से भी वो अपना सत्य वचन तोड़ नहीं पाएंगे सुपरकॉन्शियस लेवल में भी यह सत्य का बंधन जैसे कि उनको उसी एक ही जगह पे बिठा कर के रखेगा तो यहां पर भी देखिए कि वह ठाकुर बालक भाव में एक तो उच्च ऐश्वरीय भाव में है और मां को पूछते हैं कि क्या मैंने मद खाया है क्या मैंने शराब पी है क्या मैं नशे में मत्त हूं तब मां जब उनको कहती है कि नहीं नहीं आपने तो मां काली का भावा मृत खाया है भावर रूपी अमृत का पान किया है और ईश्वरीय नशे में ईश्वरीय भाव में मत्त है तब कहीं जाकर के ठाकुर जैसे एक मां अपने बच्चे को सांत्वना देती है और बच्चा कैसे खुश हो जाता है बच्चा रोते-रोते आता है कहीं से बाहर से और मां को कंप्लेन करता है कि उसके मित्र के साथ में यह झगड़ा हुआ उसके टीचर के साथ में यह हो गया यहां पे खेल के मैदान में यह हो गया और मां बच्चे को शांतना देती है तो बच्चा कैसे एकदम सरल बालक शांत हो जाता है आनंदित हो जाता है यहां पर भी देखिए कि मां और ठाकुर का जो रिलेशनशिप है वो कितना कॉम्प्लेक्शन भाव कभी ठाकुर का गुरु भाव कभी मां का जैसे कि वह उनकी अ बालिका भाव बालिका भाव नहीं किंतु एक तरह से शिष्या की तरह कि ठाकुर जो उनको सिखाएंगे वही सब वह सीख रही थी क्योंकि मां के साथ में जो था कि बड़ी छोटी उम्र में शादी हो गई फिर ना ही स्कूल में गई है ना ही कोई फॉर्मल एजुकेशन उन्होंने प्राप्त किया है तो इस संसार में रहने के लिए जो कुछ भी करना है किस तरह से लोगों के साथ में व्यवहार करना है किस तरह से आध्यात्मिक साधनाएं करनी है किस तरह से यह जो लोक व्यवहार करना है भक्त लोग जब आते हैं तो उनको आनंद और स्नेह के साथ में अपना लेना है यह जितने भी यह जो आध्यात्मिक और पार मार्थी अ पार मार्थी और यह सांसारिक जितनी भी बातें हैं सब बातें ठाकुर ने मां को सिखाई थी तो इसीलिए जैसे कि इन दोनों का भाव का जो वैविध्य है भाव का जो इन दोनों का माधुर्य है वह कितना अद्भुत है तो पहले तो इस प्रसंग को पढ़ लेते हैं एक दिन ठाकुर लीला छले माता ठाकुरानी सम्मुख उच्च भावा बस्था अभिव्यक्त कोरिया तद विषय तहर धारणा शक्ति परीक्ष कोरिया लेन एक दिन ठाकुर ने लीला के छल में मां मां शारदा देवी के के सामने उच्च भावा वस्था अभिव्यक्त करके उसके बारे में मां की क्या धारणा है मां की धारणा शक्ति क्या है इसकी परीक्षा की थी अर्थात ये सेंटेंस बड़ा लंबा से करती है और देखिए इस बात का कंट्रास्ट हम पहले दिन जब ठाक ठाकुर और मां एक ही कमरे में साथ में सोते थे जब मां पहली बार दक्षिणेश्वर आई और उसके बाद में ठाकुर ने मां को कहा कि तुम भी मेरे साथ में यहीं पर सोना तो एक ही कमरे में सोते तो थे किंतु हमको पता है कि ठाकुर बार-बार भावा अवस्था में चले जाते थे समाधि में चले जाते थे जगन माता के साथ में मां काली के साथ साथ में वार्तालाप करते रहते थे तो मां उस समय सो नहीं पाती थी बड़ी ही भ भयभीत हो जाती थी मां ने यह सब भाव वगैरह तो कभी देखा नहीं था तो फिर यह भयभीत रहते रहते ही वह जग कर के ही पूरी रात निकालती थी ऐसा कुछ समय तक जब तक हुआ कुछ समय तक जब हुआ तब ठाकुर को समझ में आया कि मां रात को सो नहीं पा रही है इसलिए फिर मां को कहा कि तुम एक काम करो नहब में यानी कि ठाकुर के कमरे के सामने ही जहां पर वह एक शहनाई वगैरह बजाने के लिए नबत खाना है वहां पर ठाकुर की मां चंद्रा मणि देवी रहती थी तो ठाकुर ने कहा कि जाओ तुम भी जाकर के उनके साथ में रहो तब कहीं जाकर के मां वहां से चंद्रा मणि देवी के साथ में नौबत में रहने के लिए चली गई थी अी इससे भी पहले की जद बात कहे कामर पुकुर की बात है कि ठाकुर कलकाता से भैरवी ब्राह्मणी और हृदय के साथ में गांव आए थे कामर पुकुर मां शारदा देवी को जयराम बाटी से बुलाया गया उस समय मां की उम्र तो बड़ी ही छोटी थी तो एक बार ऐसा हुआ कि भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को बड़ा ही सुंदर रूप से यह माला वगैरह पहना करके सजाया चंदन वगैरह करके जैसे कि पूरे एक बाल गोपाल को सजाती है फिर भैरवी ने मां शारदा देवी को कहा कि आकर के ठाकुर का दर्शन करके जाइए तो जब मां आई ठाकुर का दर्शन करने के लिए उस समय ठाकुर भावा अवस्था में थे तो मां को तो यह भाव वगैरह समझ में नहीं आता था तो थोड़ी डर गई और फटाक करके प्रणाम करके व वहां से भाग खड़ी हुई तो वो ऐसा है कि मां को पहले पहले भाव वगैरह समझ में नहीं आता था और डर जाती थी अभी इस बात का कंट्रास्ट इस घटना के साथ में कीजिए ठाकुर अभी मां की फिर से परीक्षा करना चाहते हैं कि यदि वह भावा वस्था में होते हैं तो मां अब उनसे डरती है कि नहीं डरती वो भावा के बारे में क्या सोचती है तो यह परीक्षा करने के लिए लीला के छल में यह लीला रूपी एक नाटक करके ठाकुर ने मां की यह भावा वस्था के बारे में धारणा शक्ति की परीक्षा करना चाहा शहीदन दिनर बेलाई श्री मां के पान साजी ते एवं बिछाना झाड़िया और घर खानी परिपाटी करिया राख ते बोलिया ठाकुर श्री श्री जगदंबा दर्शन काली मंदिरे गेले उस दिन दोपहर को ठाकुर ने मां को क कि पान सजा दो और बिछाना झाड़ करके घर को ठीक ठाक करके रखो ऐसा करके ऐसा कहके ठाकुर श्री श्री जगदंबा दर्शन के लिए काली मंदिर में गए श्री मां खि हस्ते गृह का जो प्राय शेष करिया छन एमन समय ठाकुर माता लेर न्याय टोली ते टोली ते एके बारे श्री मायर निकट उपस्थित होई लेन मां अपने क्षिप्र हस्ते अर्थात की बड़े ही कुशलता पूर्वक यह सब गृह कार्य ऑलमोस्ट उन्होंने समाप्त कर दिया है उस समय ठाकुर जैसे कि एक नशे खोर की तरह टल टल नशा खोर आदमी जद शराबी जब शराब पीता है तो वह कैसा टलने लगता है सीधा चल भी नहीं पाता तो उसी तरह एक व शराबी की तरह टलत टल ठाकुर मां के एकदम नजदीक आकर के खड़े हो गए ताहर चखू रक्त बण एखाने पा फेली ते शेखाने पड़ी ते छे कथा अस्पष्ट होया गया छ ठाकुर की आंखें लाल हो गई है रक्त वर्ण हो गई है यहां पर पैर पड़ते यहां पर पैर डालना चाहते हैं किंतु पैर पड़ते हैं और कहीं पे कथा अर्थात की बात करना उनका बड़ा ही अ उनकी बात बड़ी अस्पष्ट हो गई है जब वो नशा खोर जब नशा करता है तो आपने देखा होगा कहीं वो टीवी में ना मूवीज में वो कैसा स्पष्ट बात करता है छोटे बच्चे की तरह ठीक-ठीक वो अपने शब्दों का उच्चारण भी नहीं कर पाता है तो यहां पर भी ठाकुर ठीक-ठीक उच्चारण भी नहीं कर पा रहे हैं उनकी बात अस्पष्ट हो गई है कर्म व्यवस्था श्री मां बुझीते हो पारे नाई जे ठाकुर ए तो निकट आशिया छन मां काम में इतना व्यस्त थी तो इसीलिए कर्म व्यस्त श्री मां उनको समझ में नहीं आया कि ठाकुर इतने नजदीक आकर के खड़े हुए हैं अकस्मात ठाकुर तहा श्री ंगो ठेलिया बोली लेन ओगो आमी की मौद खे छी एकाएक ठाकुर ने मां का श्री अंग ठेल करके यानी कि थोड़ा सा धक्का लगा करके उन्होंने मां को पूछा जैसे वह छोटा बच्चा मां का अटेंशन पाना चाहता है तो कैसे वह मां की साड़ी खींचता है ना कि मां को ऐसा धक्का मारता है तो इस तरह से बिल्कुल बच्चे की तरह शराबी की तरह मा ठाकुर ने मां को मां के श्री अंग को थोड़ा सा धक्का देक के पूछा ओगो आमी की मौद खे छी अरे मैंने क्या शराब पिया है श्री मां पश्चात चाहिया स्तंभ तो होई ले ओ तख नहीं उत्तर दिले नाना मद खाब केनो मां मां ने पीछे मुड़ कर के देखा तो ठाकुर बिल्कुल शराबी की तरह खड़े थे तो एक क्षण के लिए तो वह स्तंभित हो गई आश्चर्य चकित हो गई किंतु दूसरी ही क्षण उन्होंने उत्तर दिया कि नहीं नहीं शराब क्यों पी रखी है भाई आपने ठाकुर जिज्ञासा कोरी लेन तबे केनो टोल छी तबे केनो कथा कोई ते पछी ना आमी माता तो जब मां ने कहा कि नहीं आपने तो शराब नहीं पी है तो ठाकुर पूछते हैं सामने कि तो फिर मेरा पैर टल क्यों रहा है मैं ठीक से बात क्यों नहीं कर पा रहा हूं क्या मैं शराबी हूं क्या मैं माता हूं श्री मां शश बस्ते उत्तर दिले माने बिल्कुल इमीडिएट उन्होंने उत्तर दिया शीघ्र उत्तर दिया नाना तुही मद खाबे केनो ही मां काली बाबा वृत खे छो नहीं नहीं तुम शराब क्यों पियोगे तुमने तो मां काली का भावा मृत खाया है भावर रूपी अमृत खाया है इसलिए तुमको तुम्हारे ऊपर में यह भाव का आवेश हुआ है इसलिए आपके पैर टल रहे हैं और इसीलिए आंख लाल हो गई है और इसीलिए बात जो है आपकी शब शब्दों का उच्चारण अस्पष्ट हो गया है ठाकुर उहा आश बोश तो होया बोली लेन ठीक बोले छो बोलिया ई आनंदो प्रकाश कोरीते लागी लेन ठाकुर इस बात से बड़े ही आश्वस्त हो गए और कहा ठीक कहे हो और फिर ऐसा करके आनंद प्रकाश करने लगे जैसे कि बिल्कुल एक बच्चा अपनी मां के साथ में आदर करता है अदार यह बंगाली शब्द है वो जैसे कि वह एक तरह का नाटक करता है जद वो मां का अटेंशन चाहिए तो कुछ ना कुछ जाकर के मां के साथ में आर्गुमेंट करेगा झगड़ा करेगा मां के पास में जाकर के कंप्लेन करेगा उसका हेतु यह है कि मां बाकी सब काम छोड़ कर के बच्चे के ऊपर में भाव भार दे बच्चे के बच्चे के ऊपर में अपना अटेंशन दे तो ये यहां पे भी और दूसरा की ठाकुर वो परीक्षा करना चाहते थे कि अभी इस बार जब मां भावा वस्था देखती है तो उनको भय होता है कि नहीं होता है तो किंतु देखिए कि इतने दिनों ठाकुर के साथ में रह कर के अभी मां भी समझ गई है कि ठाकुर इसी तरह से हैं कभी यह गुरु भाव में आकर के यह बड़े-बड़े विद्वान जो होते हैं कलकत्ता के यह केशव सेन विद्यासागर बंकिम यह वगैरह वगैरह यह इन लोगों को जैसे कि नरेण नरेण जैसा नरेण यह लोग जद आश्चर्य चकित हो जाए इस तरह की बातें करते हैं ठाकुर और कभी-कभी भावा वस्था में आकर के शराब भी हो जाते हैं और कभी-कभी बच्चे की तरह वह लीला करते हैं तो अभी अभी तक तो मां को भी समझ में आ गया है तो ठाकुर की परीक्षा में हम कह सकते हैं कि मां पास हो गई है अच्छा अभी इसके बाद

प्रसंग: दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता: ईश्वरीय प्रसंग के बारे में निरंतर चिंतन

का जो एक घटना है ठाकुर जब मां और लक्ष्मी दीदी दोनों तो वहां पर रहते थे नबत में तो ठाकुर जब यह ईश्वरीय कथा उनके साथ में करते तो फिर उनको क्या कहते पता है कि यह जो भगवान को कृष्ण की लीला है या तो फिर जो भी बातें मैं आप लोगों को करता हूं आप लोग यदि सुनती है तो फिर आप लोग जब खाना वगैरह पकाते हैं कोई भी गृह कार्य करते हैं तो सब यह सब बातों की चर्चा करते रहिए यानी कि क्या है कि सत चर्चा से सत्संग से सत विचार से अपने जीवन को भर दीजिए 24 घंटे यही सत विचार अपने जीवन में अपने मन में चलते रह ने चाहिए और ठाकुर उपमा देते हैं कि गाय जिस तरह से खाना खाने के बाद में वो जब खाई खा गाय जब खाती है तो वह पहले तो खा लेती है फिर एक जगह पर बैठ कर के उसको वागड़ी है गुजराती शब्द है बंगाली शब्द है जाबर काटा अर्थात कि गाय एक बार तो खा लेगी उसके सामने जो खड़ वगैरह रखा है उसके बाद में शांति से एक जगह पर बैठ कर के उसको चिबा रहेगी लंबे समय तक तो यहां पर भी एक एक बार जब ईश्वरीय प्रसंग होता है तो उसको सुन लेना है किंतु फिर सुन कर के उसको भूल नहीं जाना है बाकी जितने भी कार्य हम सब करते हैं तो यही ईश्वरीय प्रसंग की बात याद करके या तो इसके बारे में सोचना है या तो फिर अपने संगियोवेसे सारी मेहनत करते हैं दिन में 10-15 मिनट रेगुलर बैठते हैं किंतु फिर भी हमारा मन एकाग्र क्यों नहीं हो रहा है तो एकाग्र नहीं होता है क्योंकि यह आध्यात्मिकता आध्यात्मिकता को ना हम जैसे कि एक पिंजरे में पूर देते हैं मेरे घर में एक छोटा सा मंदिर है तो मैं वहां पर जाकर के जो 10-15 मिनट सुबह को बैठा या तो फिर यह शाम को मैं अपने आश्रम में आकर के आरती वगैरह अटेंड किया या तो यह जो क्लास वगैरह हमने सुना फिर यह जो आधा एक घंटा जो हुआ सो हुआ अपनी आध्यात्मिक साधना फिर दिन के फिर जो 12-15 घंटा जितने भी है हमारे एक्टिव अवर्स उसमें फिर दुनिया भर की सांसारिक चीजों से अपना मन भरा रहता है तो यह जो आध्यात्मिकता के और अपने आम दिन प्रतिदिन के दिनों जो दो जीवन है उसमें एक वाटर टाइट कंपार्टमेंट आप खड़ा कर देंगे एक दीवाल आप खड़ी कर देंगे तो ऐसा ही होगा किंतु ये आध्यात्मिक ता को दिन प्रतिदिन के कार्यों में आप प्रवेश करने दीजिए सीप आउट यह इंग्लिश शब्द है लेट द स्पिरिचुअलिटी सीप इन अवर डे टू डे लाइफ मैं जो भी करता हूं ड्राइविंग करता हूं अभी देखिए कि कुछ-कुछ कार्य ऐसे हैं कि आपको 100% उसमें अटेंशन देना पड़ेगा अ बिजनेस डीलिंग कर रहे हैं या मीटिंग में बैठे हैं वगैरह वगैरह किंतु अब आप देखेंगे कि अपने जद यह जो मान लीजिए कि आप आन घंटा हम सोने के लिए फिर यह दैनिक कार्य के लिए जद देते हैं तो फिर भी हमारे पास में एटलीस्ट 12 से 14 घंटा प्रतिदिन का वर्किंग डे रहता है उसमें हमारा बहुत सारा कार्य तो हम ऑटोमेटिक करते जाते हैं अर्थात कि हमारा शरीर जो है वह मसल मेमरी के आधार पर कार्य करता है हमारा मन कहां पर भटक रहा होता है तो उस समय यह मन को भटकते नहीं देना और उसको हमेशा इस तरह की सत विचार में उसको बांध करके रखना भले ही मैं चाहे ड्राइविंग कर रहा हूं ना कि यह फिर मैं ऐसा कोई खाना बना रहा हूं ना कि ऐसा कोई भी रूटीन कार्य कर रहा हूं तो देखिए कि एटलीस्ट यदि हम अपने जीवन को तीन भाग में बांट दे वर्किंग आवर्स को एक तो हो गया एक्टिव साधना यानी कि मैं श्राइन में बैठ कर के या कहां पर भी बैठ कर के क्लास सुन रहा हूं या पाठ कर रहा हूं या जब ध्यान कर रहा हूं आरती में बैठा हूं वो एक्टिव साधना हो गई फिर हो गया कि एक्टिव वर्किंग अवर्स एक्टिव वर्किंग यानी कि आपका माइंड इस तरह से उसमें व्यस्त है कि आप उस चीज को छोड़ कर के और कुछ सोच ही नहीं पाते तो वो एक हो गया उसके बाद में किंतु बीच में एक ग्रे एरिया है वहां पे एक ऐसा समय है कि आपका शरीर तो कार्य कर रहा है किंतु आपका मन 10 जगह पर भटक रहा है तो यह एक नेक्स्ट एरिया है कि जिसको कि आप क्लेम कर सकते हैं जिसको कि आप स्पिरिचुलाइज्ड ठाकुर उच्च धर्म तत्व संबंध श्री मां के उपदेश दतन कभी-कभी ठाकुर उच्च धर्म के संबंध में तत्व के संबंध में मां को उपदेश देते श्री मां और लखी दीदी निकट एक दिन श्री कृष्णेर लीला वर्णना आंते ठाकुर लक्ष्मी देवी के बोलिया छिले एक दिन ठाकुर ने लक्ष्मी देदी के सामने लक्ष्मी देवी के सामने यह भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करने के बाद में कहा था लक्ष्मी दीदी यानी कि वही ठाकुर के भाई की पुत्री वोह और रामलाल दादा यह दोनों भाई बहन थे रामलाल दादा पुजारी थे वहां पे मंदिर में और लक्ष्मी दीदी मां के पास में नबत में रहती थी बाय दिस टाइम मां चंद्रा मणि देवी ठाकुर की माताजी चंद्रा मणि देवी की समाधि हो चुकी थी महासमाधि हो चुकी थी तो यह मां और लक्ष्मी दीदी साथ में रहते थे तब ठाकुर लक्ष्मी दीदी को कहते हैं आमार काछ जा सबब सुनली तोरा जने बला बली को भी मेरे पास में जो कुछ भी सुना है तो तुम दोनों लोग आपस में इसके बारे में बातें करना गरु गुलो दिनर बेलाई जा सब खाए रात्रे सेही गुलो जाबर काटे ये गाय वगैरा दिन में जो खाती है व रात में बैठ कर के उसको चिबा है तुई आर तोर खड़ी दुई जने बला बोली करबी ता हले कृष्णर ई सब लीला कोथा आर भुले जाबी ना बेश मने थाक बे तुम और तुम्हारी चाची चाची अर्थात कि हमारी मां शारदा यह तुम दोनों आपस में यह भगवान कृष्ण की लीला उच्च धर्म तत्व इसके बारे में वार्तालाप करना जिससे कि क्या होगा कृष्ण की यह लीला कथा है तुम भूल नहीं जाओगी तुम्हारे मन में सब ठीक-ठीक यह मेमोरी बन कर के रह जाएगा आर एक दिन ठाकुर निज हाते षट चक्र आकिया श्री मां के दिया छिले और एक दिन की

प्रसंग: ठाकुर माँ को सिखाने के लिए शट-चक्र दोरते है

बात बात है कि ठाकुर ने अपने हाथों से यह षट चक्र का चित्र दौर करके मां शारदा देवी को दिया था यह बड़ा ही इंटरेस्टिंग है कि ठाकुर ने अपने हाथों से षट चक्र का चित्र दोरा था हमको जदी वही कामर पुकुर के दिनों की बात याद हो तो यह बालक गदाई गदाधर एक जगह पर जा रहा था देखा कि मां दुर्गा की प्रतिमा किसी ने बनाई है किंतु प्रतिमा जैसे कि निस्तेज लगती है जैसे कि निर्जीव लगती है तब यही यह आर्टिस्ट था गदाधर तो पहले से ही तो गदाई ने क्या किया वो पीछे उठाई वहां से व ब्रश ड्राइंग ब्रश उसको उठा कर के दुर्गा मां दुर्गा की आंखों को इस तरह से चित्रित किया इस तरह से दोरा कि जैसे कि प्रतिमा जीवंत हो गई हो सजीव हो गई हो तो यह ठाकुर यह सब चीजों में बड़े माहिर थे आज यदि हमारे पास में ठाकुर का दौरा हुआ एक चित्र है वही वो जो ठाकुर के गले का वो घाव हुआ है वो जो एक चित्र वो ठाकुर ने दोरा है और जिसमें लिखा है कि घोरे बायरे हाक देवे नरेन सिखे देवे घरे बायरे हाक देवे ऐसा ही कुछ अभी एकट वर्डिक देवे ना कि डाक देवे जो भी है तो नरन शिक्षा देगा इस तरह से ठाकुर ने वोह चित्र दोरा है जहां तक मुझे याद है ठाकुर के दोरे हुए चित्र या तो लिखे हुए शब्द यही एकमात्र हमारे पास में प्रिजर्व हुए हैं हां दूसरा भी है हां मैं भूल क्यों जा रहा हूं वहां सिहोड़े तो सिहोड़े हृदय का जन्मस्थान तो वहां पर ठाकुर ने अपने हाथों से लिखी हुई वो सब है वो जो पाला पाला अर्थात की नाटक तो ये जैसे कि जो वो सब नाटक का अभिनय करते थे वहां पर माणिक राजा के आम्र कानन में आम के बागान में वो उसमें से कुछ-कुछ नाटकों ठाकुर ने अपने हाथों से लिख कर के रखा है तो वह सब वहां पर है अभी मुझे डाउट है कि वह ओरिजिनल हमने देखे होंगे क्योंकि रामकृष्ण मिशन की जो पॉलिसी है यह जितने भी इंपॉर्टेंट डॉक्यूमेंट यह सब अभी म्यूजियम में प्रिजर्व करने के लिए रख लिए हैं तो वह जो हमको दिखाए थे उस समय तो मैं मैंने पूछा नहीं था आज भी मुझे पता नहीं मुझे लगता है कि हमने रोक्स देखी होगी ओरिजिनल वहां पर रखा होगा कभी किंतु ओरिजिनल हेड क्वार्टर में म्यूजियम में लेकर के शायद वहां पर जेरोक्स रखी होगी आई डू नॉट नो देखना पड़ेगा और ठाकुर के यह हैंडराइटिंग को यदि आपको देखना है तो वह रामकृष्ण मिशन इंस्टिट्यूट ऑफ कल्चर से एक पु एक किताब प्रकाशित हुई है जिसका नाम है श्री राम कृष्णेर पुंथी अर्थात कि श्री रामकृष्ण द्वारा लिखित पुंथी वह जो रामकृष्ण पुंथी है जिसके की ऑथर यह अक्षय कुमार है वह अलग है और यह अलग है राम कृष्णेर पुंथी ठाकुर की पुंथी ठाकुर द्वारा लिख लिखित पुंथी उसमें यह है कि पहले तो ठाकुर के जो हैंडराइटिंग है उसका रोक्स दिया हुआ है उसका फैक्सी माइल है फिर वही ठाकुर के शब्दों को रीप्रोड्यूस किया गया है फिर वही ठाकुर के शब्दों का आधुनिक भाषा में लिखे गए क्योंकि ठाकुर की वह जो कमार पुकुर की भाषा थी वह शायद आज हमको समझने में तकलीफ हो मैंने इसको पढ़ा है और बड़ा ही इंटरेस्टिंग है कि ठाकुर की भाषा और आज की कोलकात्ता की भाषा बंगाली ये कितना फर्क लगता है है दोनों में ठाकुर की भाषा बड़ी ही स्वीट लगती है वही जो कामर पुकुर की वो जो गामठी उनकी जो बोली होगी डायलेक्ट होगी वो ग्रामीण डायलेक्ट रूरल डायलेक्ट वो बड़ी ही स्वीट लगती है व और दूसरी एक बात है कि हमको पता है कि ठाकुर जब कामर पुकुर जाते थे तो वहां की डायलेक्ट में बात करते थे और कोलकात्ता आ जाते थे तो कोलकात्ता की डायलेक्ट के बारे में डायलेक्ट में बात करते थे किंतु वो फिर धीरे-धीरे कभी-कभी मिक्स हो जाता था तो वो मिक्स अप हुई हुई वो रूरल एंड न डायलेक्ट ठाकुर की कैसी लगती होगी वो एक बड़े यदि हमको पढ़ने को मिले ओरिजिनल क्योंकि हमको यह पता है कि कथामृत में एटलीस्ट मास्टर महाशय ने कुछ-कुछ एडिटिंग किया है मुझे ऐसा नहीं लगता कि ठाकुर की डायलेक्ट एज इट इज उन्होंने प्रिजर्व की हो क्योंकि वह रामकृष्ण और पुंथी किताब आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि एगजैक्टली उसी तरह से यदि लिखने को जाएंगे तो सब कुछ शायद आज हमको समझ में ना आए फिर ठाकुर बीच-बीच में अप शब्द भी बोलते थे गाली फाली भी दे देते थे तो वह भी थोड़ा सा एक एडिटिंग करना पड़ेगा पहले तो मास्टर महाशय ने सब ओरिजिनल ही रखा था किंतु फिर स्वामी जी ने उनको कहा कि देखिए कि ठाकुर यह जो गाली गलोज करते थे अपशब्दों का व्यवहार करते थे तो उस समय किंतु ठाकुर बड़े ही केयरफुल थे कि वही कुछ पुरुष भक्त और अंतरंग भक्त ही उनके सामने बैठे हो उसी समय ठाकुर इस तरह की भाषा का व्यवहार करते थे इस तरह की भाषा बोलते थे किंतु जब लेडी प्रेजेंट हो स्त्री भक्त हो या तो बाहर का कोई हो तो ठाकुर थोड़े से सावधान हो जाते थे वह इस तरह की भाषा नहीं बोलते थे तो अभी ठाकुर ने हमको एक प्राइवेटली जो बात कही है जिस लैंग्वेज में कही है उसको आप यदि पब्लिश करेंगे तो यही रामकृष्ण कथामृत पूरे विश्व में फैलने वाला है आबा स्त्री पुरुष सभी लोग जो है सभी उसको पढ़ने वाले हैं सभी के घर में यह जाने वाला है तो यह अपशब्द गलोज उसमें अच्छा नहीं लगेगा तो आप इसको यहां से हटा दीजिए तो फिर मास्टर महाशय ने काफी कुछ सेंसर किया था देखिए कि यह जो हमारी बात हो रही थी लीला प्रसंग में कि जब भक्ति की अपरिपक्व अवस्था होती है भक्त जब हम नए-नए भक्त होते हैं हमको संपूर्णता देखनी पसंद होती है अपने इष्ट में मेरे इष्ट है एकदम परफेक्ट है एकदम सभ्य कल्चर है बड़े ही हाईली स्पिरिचुअल है अभी इस तरह के अवतार को मैं गाली गलोज देते हुए सुनूंगा तो मैं तो एकदम आश्चर्य चकित हो जाऊंगा अरे यह मैं जिसको अवतार के रूप में बोल रहा हूं ग्रहण कर रहा हूं मैं कभी किसी को गाली नहीं देता मैं कभी अपशब्द नहीं बोलता अपने पूरे जीवन में और जिसकी मैं पूजा कर रहा हूं वो इस तरह की भाषा में बात करते हैं अरे यह क्या है बोलकर के मैं थोड़ा सा उनसे दूर हो जाऊंगा किंतु जैसे-जैसे भक्ति की मेरी भक्ति गहन तर होगी निष्ठा श्रद्धा बढ़ती जाएगी फिर यही सब चीजें और ज्यादा हमको आनंद दे तो यहां पर भी जब पहली पहली बार कथामृत पब्लिश हुआ था उस समय यह सब सेंसर हो गया था तो ठीक है किंतु मुझे ऐसा लगता है कि हम जैसे अंतरंग भक्त है जो कि नियमित रूप से ठाकुर के पास में आते हैं ठाकुर को अपने इष्ट के रूप में गुरु के रूप में स्वीकार किया है हमारे लिए वोह अनसेंसर वर्जन होना चाहिए जिसको कि हम एंजॉय कर पाए हमको पर्सनली मेरी बात बताऊं ठाकुर हजार भी गाली दे तो उनके ऊपर में श्रद्धा भक्ति मेरी कभी भी कम नहीं होने वाली तो यह यहां पर भी कि यहां पर जैसे है कि ठाकुर ने अपने हाथों से यह शट चक्र दौर करके मां को दिया था यह षट चक्र यानी कि वह जो अपनी स्पाइनल कोर्ड में यह जो चक्र है तंत्र के अनुसार मणिपुर है अनाहत है वगैरा वगैरा मूलाधार वगैरा तो आज्ञा तो यह चक्र मां को दौर करके दिए थे अभी उसको प्रिजर्व नहीं किया गया है प्रिजर्व होते तो हमारे लिए बड़ा ही एक ट्रेजर एक एसेट हो जाता अभी के जो प्रसंग है अभी उसको हम कल देखते हैं आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु यह बात आपकी बिल्कुल ठीक है कि आज

प्रश्न: ग्रे एरिया में आध्यात्मिकता प्रवेश करवाने का आपका विचार थेओरी में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसे प्रेक्टिकल बनाना कठिन है। हमारा काम इतना अधिक डिमांड वाला हैं कि हमें जो भी खाली समय मिलता है, वह नौकरी के तनाव में ही चला जाता है।

का जो वर्किंग लाइफ है ना वोह इतना फास्ट पै से इतना डिमांडिंग है मेरे कुछ रिलेटिव्स अमेरिका में रहते हैं तो वह तो कहते हैं कि देखिए तो क म्यूट होता है दो घंटे का आना जाना फिर वहां पर आपको हमारी तरह नहीं कि आपका वो 925 ना कि ऐसा जॉब वहां तो आपको दिन भर बैठे रहना पड़ेगा वहां पर फिर उ सैटरडे संडे जो कुछ मिलता है छुट्टी जैसा इतना फास्ट पेस लाइफ है वहां का और यहां पर भी अभी महानगरों में सब जगह प ही हो गया है क्या वो 925 भूल ही जाना है अभी आपको व और यहां पे ऊपर से दूसरा एक डेंजर है कि वीकेंड भी नहीं है यानी सैटरडे संडे भी नहीं यानी वे लोग जो पांच दिन जितना कार्य करते हैं हमको छ दिन करना है व दिस इ आई एग्री विथ यू किंतु देखिए इससे थोड़ा सा ऊपर जाके देखिए आज की जितनी भी जॉब होती है ना खास कर के ये जो वाइट कलर जॉब होती है एडमिनिस्ट्रेशन में टेक इंडस्ट्री में वगैरह वहां पे ना क्रिएटिविटी एक बहुत बड़ा पार्ट इसको प्ले करती है आपको सेल्स सेक्शन है प्रोडक्ट डिजाइन करना है मार्केटिंग कैंपेन करना है कुछ भी करना है कि आपके भीतर में जबरदस्त क्रिएटिविटी चाहिए तो फिर यह क क्रिएटिविटी का सोर्स क्या है तो दैट इज अ स्पिरिचुअलिटी ये जैसे स्वामी जी कहते हैं कि आप यदि किसी अभी जैसे देखिए स्वामी जी की बात अभी फिलहाल छोड़ दे और ये इन लोगों की बात ले न्यूटन है या आइंस्टाइन है यह जो इतने ग्राउंड ब्रेकिंग थॉट प्रवोकिंग आइडियाज जो उनके माइंड में आए वो कहां से आ मने दे केम फ्रॉम सम वेयर आउटसाइड जो अपनी ये जो जनरल एक जो बा फोर कॉर्नर्स जो होती है हमारे ब्रेन की इसके बाहर में से कहीं से इतना एक आश्चर्यजनक कंप्लीट न्यू आईडिया उनके माइंड में आया कि इट अपेंडेड द सेंचुरी ऑफ थिंकिंग कि हां यूनिवर्स का स्ट्रक्चर इसी तरह का है उसको तोड़ कर के एक नया ही स्ट्रक्चर उन्होंने खड़ा किया जिसके ऊपर में आज हमारी मॉडर्न साइंस की पूरी अंडरस्टैंडिंग इसके ऊपर में बनी है तो ये जो कंप्लीट न्यू ग्राउंड ब्रेकिंग आइडियाज आना कंपलीटली न्यू इनोवेशन क्या डिस्कवरी करना ट कम्स फ्रॉम ए दिस कम्स फ्रॉम अ सुपर कॉन्शियस लेवल नहीं कि कॉन्शियस लेवल में तो यदि हम अपने माइंड को ट्रेन करें मने मुश्किल है किंतु ट्रेन करके यदि देखें कि इवन यदि मैं ऑफिस में बैठा हूं बड़ा ही डिमांडिंग वर्क मेरे सामने है बॉस ने कह दिया है कि सेल्स कैंपेन करना है कैसे भी करके सेल्स को बढ़ाना है तो यदि आप उसके बारे में सोचते ही जाएंगे ना तो लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न यह आ जाए जाएगा आप जितना सोचेंगे ना उतना टायर्ड होंगे उतना ही आपका माइंड जो है ना क्रिएटिविटी क्रिएटिव आइडियाज में अक्षम होता जाएगा वो वीक होता जाएगा किंतु थोड़ा सा ब्रेक ले लीजिए थोड़ा सा एक मने स्पिरिचुअल होने का ट्राई कीजिए योर माइंड विल बी रिफ्रेश्ड योर माइंड विल बी फोकस स्ट्रेंथ एंड यू विल बी इन टच विद दिस सुपरकॉन्शियस लेवल फिर वहां से कंपलीटली नए क्रिएटिव आइडियाज इस तरह से आएंगे कि यू विल बी सक्सेसफुल नॉट ओनली ऑन योर स्पिरिट लाइफ बट आल्सो इन योर वर्किंग लाइफ तो थिरी एटलीस्ट इतना कहती है प्रैक्टिस जैसे मेरे खुद के मैं अभी मेरा एग्जांपल आपके लिए रिलेवेंट नहीं है किंतु फिर भी मैं दे रहा हूं अभी जैसे कि देखिए कि मेरे साथ में अभी मैं लिखता हूं राइट मुझे किताब लिखनी है वो एक स्टोरी बुक में लिखता हूं जिसका कि मेरी यह जो लाइफ है अपने संघ की लाइफ उसके साथ में ऐसा कोई रिलेशन नहीं है यहां पे मैं यह तो सीपी क्लीनिक देखता हूं वहां पर मैं पब्लिकेशन देखता था यहां प या तो फिर ये और कुछ ना कुछ एड एडमिनिस्ट्रेटिव वर्क है किंतु यदि बच्चों के लिए किताब लिखनी है तो मुझे कंप्लीट क्रिएटिव आइडियाज चाहिए तो फिर मैं क्या करूंगा कि बीच-बीच में ब्रेक लेकर के अपने वो जो ऑफिस की छत के ऊपर में जाकर के टहल था वहां पे राजकोट में यहां पे भी मैं कहीं प बाहर में जाक 510 मिनट टहल के आता हूं तो यह जो थोड़ा सा आप वॉकिंग करेंगे ना उसमें अपने माइंड को थोड़ा सा एक स्पिरिचुलाइज्ड में इकट्ठा हो जाएंगे कि जब मैं जब लिखने को बैठूंगा फटाफट करके मेरा वह लिखना स्टार्ट हो जाएगा सो इवन थियोरेटिकली आप यह कर सकते हैं बशर्ते कि आपको थोड़ा सा मेहनत करना पड़ेगा इसके

प्रश्न: हमें अपनी नौकरी खोने का इतना डर रहता हैं कि हम कोई उच्च विचार करने की हिम्मत ही नहीं कर पाते हैं।

लिए यहां पे ना हम जो इंडस्ट्रीज है ना उसको दो हिस्से में बांट सकते हैं एक तो है लिगसी इंडस्ट्रीज कि जहां पर आपका मोर और लेस क्लाइंट बेस सेफ है आपका प्रोडक्शन वही फिक्स है आपको उसी को रिपीट करते जाना है फिर दूसरा है कटिंग एज इंडस्ट्री वहां पे आपको कंटीन्यूअस यू विल हैव टू बी एट द फोरफ्रंट ऑफ इनोवेशन अदर वाइज यू विल लॉस आउट तो अभी क्या है कि जो लिगसी इंडस्ट्रीज होती है ना वहां पे डज नॉट मैटर कि आप परफॉर्मेंस करते हैं कि नहीं करते हैं यदि चमचागिरी करेंगे तो आपका काम चल जाएगा क्योंकि काम तो वही रिपीटेड वर्क ही है आपको नया तो कुछ इंट्रोड्यूस नहीं करवाना है जबकि य कटिंग एज इंडस्ट्री में आपको चमचागिरी काम नहीं करने वाली है यू विल हैव टू गिव सॉलिड क्रिएटिव आइडियाज अदर वाइज आप बिजनेस से बाहर हो जाएंगे तो उस तरह की इंडस्ट्री में काम करना बड़ा अच्छा लगता है बड़ा मजा आता है क्योंकि आई कैन गिव माय फुल टू माय जॉब रदर देन की चमचागिरी करता घूमू बॉस लोगों की और यह पॉलिटिक्स करता घूमू व्हिच इज नथिंग बट वेस्टेज ऑफ टाइम और उसकी बजाय मैं यदि अपने माइंड को किसी क्रिएटिव आइडियाज में लगाऊ दैट वुड बी मच बेटर मुझे एक जॉब सेटिस्फेक्शन मिलेगा ये जो बहुत सारे लोग कैलिफोर्निया वगैरह माइग्रेट क्यों कर जाते हैं क्योंकि वहां पे ये कटिंग एज इंडस्ट्रीज है इंडिया में ज्यादातर इंडस्ट्रीज देखिए कि वह सब लिगसी इंडस्ट्रीज है आपको वोह रिपिटेटिव वर्क करते जाना है मेरे पिताजी के पिताजी जो करते थे वो उसकी जगह पे उसका पोस्टिंग हुआ उसकी जगह पे मेरा पोस्टिंग हुआ और वही करते जाना है देयर इज नो चेंज यह तो फिर पता है ना कितने सालों तक ये पूरा एक डेड एक बना करके रख दिया था पूरे देश को इंडस्ट्री का तो फिर अभ यह लिबरलाइजेशन के बाद में यह सब होना शुरू हुआ है नेचरली आप मैं आपके साथ में बिल्कुल एग्री करता हूं इस तरह की इंडस्ट्री में जॉब करना कि जहां पे हमारे परफॉर्मेंस कितना ही अच्छा हो एफिशिएंसी कितनी ही हो क्रिएटिविटी क्रिएटिविटी कितनी ही हो चमचागिरी किए बिना आपको नहीं कुछ होने वाला तो वहां पे पूरा स्पिरिट ही डेड हो जाता है आई एग्री विद यू एंटायस यहां पे एक दूसरी बात याद करनी है स्वामी जी ने जो तमस देखा ना भारत में इसी तरह का इसलिए उन्होंने कहा कि आत्म श्रद्धा सबसे पहले चाहिए बाकी सब बातें बाद में इसलिए उन्होंने यह राजयोग की ज्ञान योग भारत में नहीं सिखाया कहा कि पहले तो शेर की तरह दहाड़ पहले तो खड़े हो अपने पैरों पे पहले तो फुटबॉल खेलो बाद में गीता की बात करना तो एगजैक्टली इसीलिए गीता की बात करते करते डर फेट जाएगा तो फिर क्या गीता तुम पढ़ोगे व पहले तो फुटबॉल खेल कर के मसल बनाने पड़ेंगे

प्रश्न: एक बार मैंने अपनी रिश्तेदार के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था। आज वह मर चुकी है। लेकिन मुझे उसके साथ बुरा व्यवहार करने का बहुत दुख है। मैं उसे बताना चाहता हूँ कि मुझे खेद है। क्या वह मेरी प्रार्थना सुनेगी?

देखिए जहां तक जो डिपार्टेड अपने रिलेटिव्स है उनके लिए प्रार्थना करना तो अपना वेदांत तो जिस तरह से कहता है कि यह एक बार जीवात्मा का गठन होता है मेरे भीतर में एक जीवात्मा है आत्मा और जीवात्मा में डिफरेंस क्या है कि आत्मन इज सर्वव्यापी जीवात्मा सिर्फ मेरा अकेले का है यानी कि सूरज का प्रकाश एक कुंभ में गिरता है घड़े में घड़े में पानी रख है तो सूरज का एक प्रतिबिंब उस घट में दिखेगा अब यह घट टूट गया तो प्रतिबिंब भी अदृश्य हो जाएगा किंतु जब तक घट रहेगा तब तक प्रतिबिंब रहेगा तो मेरे भीतर में इस तरह से जीवात्मा है जिसके भीतर में मेरे सभी संस्कार है इस जन्म के यह शरीर टूटने के बाद में दूसरा शरीर ग्रहण करेगा जीवात्मा और वहां से एक शरीर से दूसरे शरीर तक जाता जाएगा यह जो स्वर्ग लोक नर्क लोक पितृलोक वगैरह है लोक यानी कि रियल्स वर्ल्ड तो वह सब भी है अपने वेद में शास्त्र में किंतु वह क्या है टेंपररी अवस्थाएं हैं सब सबसे परमानेंट अपना थिरी यही है कि एक शरीर से दूसरे शरीर की ओर हमको जाना है अपने संस्कार को काट देना है इनफ ये जो गुड डीड्स का स्टोरेज इकट्ठा करना है जिससे कि हमको अल्टीमेटली मुक्ति मिल जाए तो यदि हम अपने जो डिपार्टेड लव्ड वन से जो हमारे रिलेटिव्स है उनके लिए प्रार्थना करें वह सुनेंगे कि नहीं वो वेदांत की जो हमारी थिरी है उसमें इतना फिट नहीं बैठता है यदि आप अपनी संहिता पोर्शन में जाए वेद के तो पता चलेगा पितृलोक में वे लोग हैं और फिर उन हमारी प्रार्थना व सुनते हैं इसलिए हम पितृ कर्म वगैरह श्राद्ध कर्म वगैरह करते हैं तो वो तो एक बात हो गई किंतु हम थोड़ा सा और ऊपर

प्रश्न: मुझे अपने पिछले कर्मों पर पछतावा है और मुझे उनके लिए दुख है। इस पछतावे से कैसे छुटकारा पाया जाए?

उठ कर के देखें किसी एक पार्टिकुलर व्यक्ति के बारे में नहीं करके हम इन जनरल हम हमारे कर्मों का लेखा जोखा यदि देखें कि मैंने भूतकाल में सही कितना किया गलत कितना किया और यदि मैंने इतना सही कुछ नहीं किया है बाकी जब कुछ किया है तो आकर के मुझे वह अभी परेशान करता है तो देखिए कि इसके बारे में तो थिरी बड़ी स्पष्ट है ठाकुर जैसे कहते हैं हम जितना सूरज के पास में जाएंगे वैसा ही पृथ्वी से दूर जाते जाएंगे अभी जो हुआ है सो हुआ है गिरीश घोष का क्या कहना था यदि मुझे पता चलता कि ठाकुर जैसा कोई मेरे पाप फेंकने वाला इतना बड़ा गड्डा मिलता मुझे तो मैं और भी कितने पाप कर लेता तो क्या है कि भूतकाल में हमने आप आप लोगों ने जो कुछ भी किया हो गिरीश से ज्यादा तो पाप नहीं किए होंगे तो बात यह है कि एक बार यदि ठाकुर की शरण में आ गए ठाकुर को शरणागत हो गए साधना करने की शुरुआत कर दी एटलीस्ट नियमित रूप से हम यदि थोड़ा बहुत जप थोड़ा बहुत स्वाध्याय थोड़ा बहुत सत्संग कर लेते हैं ये अपना जो साधना रूपी गाड़ी एक बार चालू हो गया ना तो हमने स्टेशन छोड़ दिया दिल्ली जाना है वहां पे स्टेशन प खड़े हैं मैं विशाखापट्टनम स्टेशन प खड़ा हूं मुझे बेलूरमठ जाना है मान लीजिए तो जब तक मैं स्टेशन प खड़ा हूं तब तक ये टेंशन है कि गाड़ी टाइम पे आएगी कि नहीं आएगी क्या होगा क्या नहीं होगा वगैरह वगैरह एक बार गाड़ी आई मैं बैठ गया फिर अभी गाड़ी वाले के भरोसे में आराम से बैठा हूं गाड़ी मुझे वोह कोलकाता लेकर जाएगी ही जाएगी तो वैसे ही यह रामकृष्ण रूपी गाड़ी में आप एक बार बैठ गए हैं फिर वो बहुत सब चिंता मत कीजिए कि अब मैं कहां जाकर रुकूंगा पिछले वाला स्टेशन का क्या होगा क्योंकि क्या है कि देखिए 100% शुद्ध इस जगत में कोई नहीं होता है यदि देह धारण करना है तो सत्वर रजस तमस का मिश्रण से ही देह धारण होगा जैसे कि मां ने कहा कि ब्रह्मा ने सबसे पहले चार कुमारों की रचना की किंतु ये चारों कुमार इतने शुद्ध पवित्र थे कि साधना करके ब्रह्मलीन हो गए तो फिर अभी संसार भी तो चलाना है तो फिर 12 प्रजापति हों की रचना की उनके भीतर में थोड़ा बहुत काम क्रोध वगैरह रख दिया तो उन्होंने फिर ये संसार की रचना की तो ये प्रजापति के संतान हम लोग हैं तो काम क्रोध मद लोभ मोह सत्व रजस तमस मिश्रण होकर के ही हम लोग आए हैं अभी जो कुछ हुआ सो हुआ भविष्य में नहीं करना है किंतु यदि जैसे कि कहते हैं ना कि ढले हुए दूध पे शौक करने से कोई लाभ नहीं है दूध गिरा तो गिरा अभी क्या है नया दूध लेकर के फिर उसकी मिठाई बना के खानी है तो वैसे ही साधना की शुरुआत कर दी हमने उसके बाद में फिर पुरानी जो रिग्रेट से अभी ऐसा नहीं है कि रिग्रेट मेरी लाइफ में नहीं है मेरी लाइफ में भी है ऐसी कुछ रिग्रेट जो कि यदि मुझे फिर से मौका मिल जाए मेरी लाइफ जीने का तो मैं वह सब कुछ नहीं करूंगा किंतु खैर अभी उस समय नादान थे बच्चे थे जो कर दिया सो कर दिया अभी जब ठाकुर के पास में आ गए हैं तो ठाकुर पर भरोसा रख के नियमितता बनाए रखें वो एक बड़ा की फैक्टर है रेगुलेरिटी आध्यात्मिक जीवन में बहुत लोग कहते हैं कि हमको अभी ध्रुव की तरह एक पैर पर खड़े रहकर 1000 साल तपस्या करनी होगी नहीं हो होगा ठाकुर ने कहा है कलयुग में अनगतला है वह एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या की बात भूल जाइए वो जैसे जैन मुनि उपवास करते हैं पूरा 1015 दिन का वोह पर्यूषण वगैरह का तो वोह उपवास भी इतना हमसे नहीं होने वाला है वो जैसे स्वामी जी ने खुद ने देखा था एक साधु को देखा दोनों हाथ ऊपर रख कर के तपस्या कर रहा है तो दोनों हाथ जैसे कि एटो फाइड हो गए थे बिल्कुल उसमें से ये जो मसल वगैरह पूरा खत्म हो गया था हड्डी जैसे बन गए थे तो वो तपस्या भी हमसे नहीं होने वाली है हमारी तपस्या है रेगुलेरिटी नियमित रूप से जप ध्यान स्वाध्याय सत्संग इतना यदि हम करते रहेंगे तो देखेंगे कि विदन फ 10 इयर्स ये चेंजेज दिखना हमको अपने लाइफ में शुरू हो जाएगा ये रिग्रेट जो है ना रिग्रेट कैन बी अ गुड पावर आपको कहेंगे कि गुड ड्राइव इन योर लाइफ इंपे आपको कर इंपेलर है कि हां य मेरे पास में जैसे मान लीजिए सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा होता तो फिर मैं साधना करता भी क्यों एक भी तो हम में नहीं है ना प्रॉब्लम यहां पे आता है स्वामी जी के खुद के जीवन में देखिए कि इतने मतलब शुद्ध पवित्र थे फिर भी पिताजी का मृत्यु वो एक ऐसी घटना थी कि जिसने कि स्वामी जी के जीवन में टर्निंग पॉइंट लाया तो हमको ना अभी ऐसे कुछ तरह के पीछे से धक्का मारने वाला कुछ चाहिए तो जद रिग्रेट भी है हमारी लाइफ में दैट रिग्रेट विल फोर्स अस अहेड अभी मेरे पास में 10 मिनट है मेरे पास में दो ऑप्शन है मैं बैठ कर के कोई फालतू का वीडियो देखूं ना कि मैं 10 मिनट कहीं वो मो बापू का कोई अच्छा सुंदर प्रसंग है व्हिच एवर जो हम फॉलो करते हैं स्पिरिचुअली उसको मैं सुनू ट दैट बोथ ऑप्शन कम्स बिफोर अस उसे जो कहते हैं ना कि श्रेयस प्रेयस मनुष्य तत श्रेय और प्रेय दोनों हमारे सामने आते हैं श्रेय यह है जो कि हमारे लिए श्रेष्ठ है प्रेय यह है जो कि हमारे इंद्रियों को भाता है तो मैं इंद्रियों के विषय को छोड़ कर के मेरे लिए जो श्रेष्ठ है जन्म जन्मांतर के लिए श्रेय वो मैं कब सिलेक्ट करूंगा जबकि मेरे पास में कोई एक यह हो एक इंस्पिरेशन हो या तो इंपे फोर्स हो जो कि मुझे धक्का मार के मुझे फोर्स करती है कि नहीं मेरी लाइफ में ये रिग्रेट है या तो मैंने ऐसा कुछ किया है लेट दैट बी अवर ड्राइविंग फोर्स टू गाइड अस कंटीन्यूअसली इनटू द डायरेक्शन ऑफ श्रेय इनटू द डायरेक्शन ऑफ पॉजिटिविटी देखिए मैं एक एक बात बताऊं

प्रश्न: एक बार मुझे यह भरोसा हो जाए कि मेरा मृत रिश्तेदार खुश है, तो मैं चैन की सांस लूंगा

मेरा एक अनुभव मेरे पास में ना एक लड़का आता था मैं उस समय रांची में था था कॉलेज का लड़का था तो अभी क्या है कि उस समय यह मोबाइल नए-नए आए थे आजकल तो मोबाइल का ऐसा कोई वैल्यू नहीं है जब तक वह बड़ा महंगा हो किंतु उस समय मोबाइल नए-नए आए थे तो अभी क्या उसके मित्र ने उसके ऊपर में इस तरह का आक्षेप लगाया कि इस लड़के ने उसका मोबाइल चुरा लिया है अभी यह बात उसकी कॉलेज में फैल गई और जैसे होता है कि उस स्टूडेंट्स में कि वह सब लोग उसको उसका एक आइसोलेट कर दिए उसको उसका परहेज करने लगे उसकी निंदा करने लगे तो यह लड़का बड़ा ही दुखी हो गया तो एक बार आश्रम में आया था मेरे साथ में मुलाकात हो गया तो फिर उस बा उस दिन के बाद से वह नियमित आता था आकर के मुझे बीच-बीच में पूछता है अच्छा मेरी कॉलेज में तो ऐसी मेरी परिस्थिति है कोई मेरे से बात नहीं करता कोई मेरे पर विश्वास नहीं करता सब लोग कहते हैं मैं मोबाइल चोर हूं तो मैं क्या करूं मैंने उसको कहा कि देखो कि मेरे से तो यह पॉसिबल नहीं है कि मैं तुम्हारी कॉलेज में आकर के तुम्हारी जो समस्या है वह सॉल्व कर दूं ना ही मुझे ऐसा लगता है कि ठाकुर ऐसा कुछ करेंगे तुम्हारे साथ में बेटर है कि यह जो तुम्हारे साथ जीवन में हुआ है ना टेक इट एज टर्निंग पॉइंट कि तुम यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ होता तो वही बाकी 1 लाख लड़कों की तरह पूरे विषय में डूब कर के पूरा विषय में ही अपना जीवन मटेरियल जम में बिताते हैं तो एटलीस्ट यह घटना तुमको ठाकुर के पास लेके आई टेक द बेनिफिट ऑफ इट एंड स्टार्ट रीडिंग कथामृत टेक दीक्षा साधुओं का सत्संग करो नियमित रूप से तुम संध्या आरती में आओ तो समय होता है लड़कों के पास में ऐसा नहीं कि नहीं होता है तो तुम आओ यहां पे नियमित रूप से ये घटना का सहारा लेकर के तुम अपने जीवन को परिवर्तित कर दो यह घटना तुमको ठाकुर के पास लेकर आई है इस तरह से तुम सोचो यह मत सोचो कि ठाकुर तुमको वहां पर सब ठीक कर देंगे इस तरह से सोचो कि ठाकुर ने अपने पास में लाने के लिए तुम्हारे जीवन में यह घटना को रखा है जैसे स्वामी जी का हमने देखा पिताजी का मृत्यु तो हमारे सबके जीवन में ऐसी कुछ-कुछ घटनाएं आती है ना कि जैसे हमको झंझोट के रख देती है वो यदि नहीं आती तो हम वही मटेरियल ज्म में वही विषय वासनाओं में वही जगत में वही संसार में फंसे रहते किंतु यह एक ऐसा डिजास्टर हुआ कि व्हिच ब्रॉट अस नियरर टू ठाकुर तो फिर ठाकुर को आप आप यह कीजिए कि ठाकुर को थैंक मने आप उनको उनको कहिए कि ठाकुर आपने अच्छा किया कि यह मेरे साथ में हुआ तो मैं आपके पास में आ पाया वरना तो इस जगत में देखिए करोड़ों करोड़ों लोग विषय में डूबे हुए हैं जिनको कि सिर्फ ईश्वर या भगवान को लिप सर्विस देते हैं सिंसियर नहीं है तो इस घटना ने हमको सिंसियर बनाया है इस घटना ने हमको इंट्रोस्पेक्शन करने के लिए मजबूर किया है दिस टू इंट्रोस्पेक्ट इज द फर्स्ट स्टेप टुवर्ड स्पिरिचुअल साधना तो यह इंट्रोस्पेक्ट मैंने किया देखा मैंने अपने पूरे जीवन को देखा कि अरे यह क्या हो रहा है भगवान बुद्ध के साथ में वही घटना कि वह भोग विलास में डूबे हुए थे अपने महल में फिर वह बाहर निकले तो देखा कि एक वृद्ध पुरुष एक डेड बॉडी और एक बीमार व्यक्ति यह देखा तो उनके मन में ऐसा झटका लगा कि ही वाज इंपेल्ड कपेल टू ड थिंकिंग समथिंग आउट ऑफ द बॉक्स सो दैट टूक हिम टुवर्ड्स द पाथ ऑफ निर्वाण तो तो यह जो हमारे जीवन में होता है ठाकुर को कहिए कि ठाकुर आपने बहुत अच्छा किया कि ये डिजास्टर मेरे लाइफ में लाकर रखा तो जिससे कि मैं विषय के भोग के प्रति नहीं जाकर के आपकी ओर आने के लिए मुझे आना पड़ा है आई एम फोर्सड टू डू दिस कंपलसरी मुझे आना पड़ा है तो दिस इज वन वे टू लुक एट द थिंग्स