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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 6 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चीर सीमंतिनी चीर सधवा यह चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे। ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है और महासमाधि के जो विविध वर्णन है हमारे पास में अवेलेबल उनको मैंने एक कलेक्शन किया है सब वर्णन का तो उसमें से काली महाराज का जो वर्णन है उसका हम पाठ कर रहे थे। प्रथम से ही पहले से ही फिर से एक बार पाठ कर लेते हैं। काली महाराज क्या

श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: स्वामी अभेदानंद द्वारा

कहते हैं? काली महाराज यानी स्वामी अभदानंद जी महाराज ठाकुर के सन्यासी शिष्य प्रथम से ही पाठ करते हैं। थोड़ा सा कल देखा है किंतु आज पहले से ही देख लेते हैं। जे दिन श्री श्री ठाकुर गलाए रक्तखण होए से दिन आमी नरेंद्रनाथ निरंजन राखाल प्रवृत्ति तहार सम्मुखे बोशिया छिला जिस दिन ठाकुर के गले से रक्त निकला था उस दिन में नरेंद्रनाथ निरंजन राखाल वगैरह उनके सामने बैठे हुए थे ताहाते तहां शरीर अत्यंत दुर्बल होया पड़े इससे ठाकुर का शरीर शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। इहारु दिन पर रविवार पूर्णिमा एकत्र से श्रावण तिनी महासमाधि लाभ करें। इसके कुछ ही दिन के बाद में रविवार एक पूर्णिमा की रात थी। 31 श्रावण को उन्होंने महासमाधि प्राप्त की। जे दिन घटना घटिलो से दिन रात्रि एकार समय आमरा शकले ताहार निकट बसिया छिला जिस दिन यह घटना हुई थी ठाकुर की महासमाधि उस दिन रात को 1:00 बजे के समय हम सब उनके सामने ही बैठे हुए थे साधारण तो जमन समाधि होई तो शे रूपई होलो साधारण रूप से जिस तरह से ठाकुर को समाधि होती वैसे ही हुई ताहार दृष्टि नाशाग्रह रूप पर स्थिर होइया रहलो ठाकुर की दृष्टि नासाग्रे नास नासिका अर्थात नाक और जनरली ठाकुर को समाधि होती थी तो उनकी दृष्टि इस तरह से उनकी जो पलकें हैं झुक जाती थी और नजर जो है वह नाक के जो अग्र भाग है उसके ऊपर में स्थिर हो जाती और ठाकुर का जो फेमस कल्पतरु पोज़ है। उसमें आप देखेंगे कि ठाकुर की दृष्टि इसी तरह से नासाग्रे नासिका के अग्र भाग में स्थिर हुई है। तो यहां पर महाराज लिखते हैं कि जिस तरह से सामान्य साधारण रूप से सामान्य रूप से ठाकुर को समाधि होती वैसी ही समाधि ठाकुर को इस बार भी हुई थी। उनकी दृष्टि जो है नासिका के अग्र भाग में स्थिर होकर के रही। नरेंद्रनाथ उच्च ही स्वरे ओमकार उच्चारण करते आरंभ कर लो। नरेंद्रनाथ ने उच्च स्वर से ओमकार का उच्चारण प्रारंभ किया। देखिए शशि महाराज का वर्णन था। उसमें हमने देखा कि जैसे ही ठाकुर को समाधि हुई ठाकुर नरेंद्र उनके पैरों को मालिश कर रहा था। वह इमीडिएटली ठाकुर के पैरों को बिस्तर पर रख के दौड़ के नीचे चला गया। और यहां पे काली महाराज लिखते हैं कि जैसे ही उनकी दृष्टि नासिका के अग्र भाग में स्थिर हो गई। जैसे ही समाधि हुई नरेंद्रनाथ उच्च स्वर से ओंकार उच्चारण करना प्रारंभ किया। शशि महाराज के वर्णन के अनुसार नरेंद्र नीचे चला गया। किंतु फिर सबको लगा कि यह शायद सामान्य समाधि ही है। तो फिर नरेंद्र ऊपर आया और फिर सब ने ओमकार ओम तत्सत वगैरह जो है वह उसका उच्चारण प्रारंभ किया था। तो इसमें देखिए कि विभिन्न वर्णनों में हमको विभिन्न इंफॉर्मेशन मिलती है। किसी का भी मेमोरी परफेक्ट नहीं होता। दूसरा कि जब हम रिकॉल करते हैं कोई भी घटना को तो हम सभी चीजें कभी भी रिकॉल नहीं कर पाएंगे। वह जो इवेंट्स जिसने कि हमारे मन पे सबसे ज्यादा छाप छोड़ी है, वही इवेंट्स को हम रिकॉल करेंगे। तो यहां पर इस तरह से काली महाराज वर्णन करते हैं। आमराओ शमवेत स्वरे ओमकार ध्वनि कोरते लागीलाम जिस तरह जैसे ही नरेंद्र ने उच्च स्वर से ओमकार ध्वनि का प्रारंभ किया हम लोग ने भी साथ में मिलकर के ओमकार ध्वनि करने लगे शकले मने आशा छिलो जे अल्प क्षण पर ही ता समाधि भंगो होइबे और शीघ्र ही आ त चैतन्य लाभ करबे सबके मन में आशा थी कि कुछ क्षण के बाद में की उनकी समाधि भंग होगी और शीघ्र वह फिर से चैतन्य लाभ करेंगे। फिर से वह पृथ्वी पे सामान्य धरातल पर वापस आ जाएंगे। सुतरान आमरा घंटा पर घंटा अपेक्षा करते लागीलाम। इस वजह से हम लोग घंटे के बाद घंटा अपेक्षा करने लगे राह देखने लगे। समाधि भांगी ते अनेक विलंब होते छ देख्या आमरा मन के आश्वासते लागीला एक समय तनी तीन दिन तीन रात्रि अतिबाहित तो होइया गले बा ज्ञान फिरिया आश नहीं समाधि टूटने में अनेक विलंब हो रहा है देखकर के हमने अपने मन को आश्वास देना प्रारंभ किया कि एक समय था एक दिन था कि ठाकुर जब समाधि में चले गए थे तो वह तीन दिन तीन रात्रि अतिवाहित होकर होने के बाद में भी उनका बाह्य ज्ञान लौट करके नहीं आया था सुतरान ए बार रूप होते पारे इसलिए इस बार भी ऐसा हो सकता है किंतु समस्त रात्रि काटिया गो श्री श्री ठाकुर बाजगान आर फिरिया आशीलोना किंतु समस्त रात कट गई ठाकुर ठाकुर का बाह्य ज्ञान फिर से लौट करके आया नहीं तो शकले हमरा हताश होया किंकर तबो विमूड होया पला तब हम सभी लोग हताश होकर के किंग कर्तव्य विमूढ़ क्या करें क्या ना करें इस तरह से कंफ्यूज होकर के पड़े से रात ही माता ठाकुरानी के संवाद देवा हो उस रात को ही मां को संवाद देना हुआ था मां को समाचार दिया गया था। मां तो वहीं पर थी। वो यह ठाकुर तो फर्स्ट फ्लोर में थे। मां थी ग्राउंड फ्लोर पे। फर्स्ट फ्लोर पर जाने की जो सीढ़ी है उसके नीचे में ही जो छोटा सा कमरा है मां वहां पर रहती थी। देखिए नौबत और ठाकुर का कमरा दक्षिणेश्वर में आपने यदि देखा होगा तो हमको तो पता है गंभीरानंद जी का इनफ विवरण है कि ठाकुर के कमरे में जैसे ही ठाकुर कहते कि हां यह लोग आए हैं तुम लोग खाना खाओ यह बात जैसे ही मां सुनती मां का जो पूरा अटेंशन फोकस कहो ये ठाकुर के श्री चरणों में ही पड़ा रहता था तो जैसे ही नरेंद्र आया या कोई भी डिवोटी आए तो ठाकुर कहेंगे तुम आज यहां पर खाना खाना और इसके बाद में ठाकुर वह झाऊ तला अभी ओपन टॉयलेट था ना वहां पे तो इंडोर टपल प्लंबिंग तो था नहीं तो झाऊ तला में शौच जाने के लिए जैसे ही वह नहबत के सामने से गुजरते और नहबत में मां को कहने के लिए खड़े रहते नबत के सामने कि इनका खाना बनाना है तब वह देखते कि मां ने ऑलरेडी खाने बनाने की प्रोसेस जो है तैयारी प्रारंभ कर दी तो देखिए कि नब और ठाकुर का कमरा वैसे तो काफी डिस्टेंस है। यहां पे काशीपुर में आप देखेंगे कि मां का कमरा तो ग्राउंड फ्लोर पे है और ठाकुर का कमरा फर्स्ट फ्लोर पे है। बस एक सीढ़ी चढ़कर के ऊपर जाना है। तो मां नहबत में ठाकुर के कमरे में क्या हो रहा है वह यदि सुन पाती तो काशीपुर में ठाकुर के कमरे में क्या हो रहा है वह न सुनने का कोई प्रश्न ही नहीं आता। यानी कि ऑलरेडी यह नरेंद्र दौड़ के नीचे आया। जैसे ही ठाकुर को समाधि हो गई और फिर थोड़ी देर के बाद में नरेंद्र ऊपर गया और फिर यह जो ओमकार चेंटिंग वगैरह प्रारंभ किया। यह तो मां को स्पष्ट रूप से सुनाई ही देने वाला है। रात को किसको नींद आने वाली है ठाकुर की इस तरह की अवस्था देखकर के। तो मां को तो ऑलरेडी सब पता चल ही रहा होगा। दूसरी बात है कि ठाकुर और मां का मन दोनों के भीतर में एकत्व था। तो फिर ठाकुर ने जब महासमाधि ग्रहण करने की घड़ी होगी तो उस समय मां को पता ना चले। वही जो हायर डायमेंशनल लेवल पर ठाकुर ने मां को मैसेज दिया ही होगा कि अभी जाने का समय आ गया है तो मां को ना पता चले ऐसा हो ही नहीं सकता। वो जो फेमस घटना है कि शशि महाराज स्वामी रामकृष्णानंद जी उस समय चेन्नई में थे 1902 फोर्थ जुलाई स्वामी जी ने जब महासमाधि ग्रहण की बेलूर मठ में कोलकाता में तो वहां पे चेन्नई में मद्रास में शशि महाराज को स्वप्न आया स्वामी जी स्वप्न में आकर के कहते हैं शशि आमी शरीर के थुतुर मतन फैले दिए शशि मैंने शरीर को थुतु अर्थात कि स्पिट स्पिट की तरह फेंक दिया है। तो देखिए कि इन लोगों का तो सब हायर डायमेंशनल लेवल पर कांटेक्ट था। तो न्यूज़ कब आएगा वह तो एक चीज है। टेलीग्राम आएगा चेन्नई में कि स्वामी जी की महासमाधि हुई है। न्यूज़ पेपर में आएगा। किंतु हायर डायमेंशनल लेवल पर भी इन लोगों का नेटवर्क था और इस नेटवर्क से सब पता चल ही जाता था। तो एनीवे एक फॉर्मेलिटी है कि मां को संवाद देना है कि ठाकुर की जिस तरह से समाधि हुई है अभी लगता नहीं है कि इस समाधि से वह बाहर आएंगे तो इसी रात को श्री श्री मां को यह मैसेज दिया गया श्री मां ऊपर आशिया श्री श्री ठाकुर पारश्व बशिया मां कोथाई गली को बोलिया का ते लागी लेन मां ऊपर आकर के ठाकुर के पास में बैठकर के मां तुम कहां कहां गई? ऐसा बोलकर के रोने लगी। देखिए इस इसके बारे में पहले भी हमने डिस्कस किया है। अ मां

श्री रामकृष्ण के शरीर के भीतर विराजमान माँ काली

शारदा ठाकुर के भीतर में मां काली का दर्शन करती थी। और ऑब्वियसली ठाकुर भी मां शारदा के भीतर में मां काली का दर्शन तो करते ही थे। यानी कि देह है मां शारदा और श्री रामकृष्ण का किंतु भीतर में जैसे कि मां काली मां जगदंबा ही निवास कर रही है। वही ठाकुर ने अभी महासमाधि के कुछ ही दिन पहले कहा कि इसके भीतर में दो है। एक तो जगदंबा है। एक उसका भक्त है। जो कैंसर हुआ है वह भक्त को हुआ है। जगदंबा को कुछ नहीं हुआ। तो ठाकुर तो स्पष्ट रूप से स्वीकार करते थे कि जगदंबा उनके देह में निवास कर रही है। और फिर इसका थोड़ा सा एक्सप्लेनेशन हमने देखा था। एक्सप्लेनेशन यानी कि मेरा इंटरप्रिटेशन। इस तरह से देखा था। ठाकुर ही कथामृत में हमको कहते हैं कि देखिए एक सूरज है। सूरज कहां आकाश में रहता है लाखों लाखों किलोमीटर दूर और और उसका साइज भी कितना बड़ा है। 1 लाख पृथ्वी आप सूरज के भीतर में बिठा सकते हैं। तो 1 लाख पृथ्वी की साइज का सूरज और यहां पे छोटा सा पृथ्वी इस छोटे से पृथ्वी के ऊपर में एक छोटा सा घड़ा इस घड़े में पानी भरिए। इस पानी में आप सूरज का प्रतिबिंब देखिए। तो हमारे भीतर में जो रिफ्लेक्टेड चैतन्य है वह उस सूरज के प्रतिबिंब की तरह ही ब्रह्मन का जो एक प्रत्या चिदाकाश के ऊपर में यह जो रिफ्लेक्शन होता है वही तो हमारे भीतर का चैतन्य है। हमारे भीतर का चैतन्य मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के साथ में कॉम्बिनेशन होकर के अपना कॉन्शियसनेस या तो जीवात्मा क्रिएट करता है। यह देह जब जाता है, देह का मृत्यु होता है, तो यही जीवात्मा या यही जीव या तो फिर यह रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस और मन, बुद्धि, चित्त अहंकार यह दो मिलकर के नया देह धारण करते हैं। तो यही जीवात्मा के भीतर में ही मेरे पूर्व जन्म के संस्कारों का लेखाजोखा रहता है। इसलिए जब मैं नया देह धारण करूंगा तो वह कोरी पार्टी नहीं होगी। वह ब्लैंक स्लेट नहीं होगा। नया जन्म। पिछले जन्म के संस्कारों का लेखाजोखा या बैलेंस शीट नए जन्म में जाएगा। और ऐसा जन्म के बाद जन्म यह जीवात्मा है। देह के बाद देह ग्रहण करता रहेगा। जब कब तक कि अल्टीमेटली उसका यह जो कर्म का लेखाजोखा है वह दोनों साइड बैलेंस हो जाए और यह बैलेंस शीट जो है वह क्लोज हो जाए। आपका अकाउंट क्लोज हो जाए तब तक तो वह कर्म को वर्कआउट जब तक नहीं करते हैं तब तक यह जीवात्मा या अपना कॉन्शियसनेस है वो एक के बाद एक देह धारण करता रहेगा। यह हिंदू धर्म का सबसे फंडामेंटल थ्यरी में एक है कि पुनर्जन्म है, कर्म का सिद्धांत है और मुक्ति या निर्वाण या तो ईश्वर दर्शन या तो ब्रह्म ज्ञान ही जीवन का अंतिम सर्वोच्च उद्देश्य है। तो दिस इज हिंदूइज़्म इन नट शेल। तो ठाकुर की अवस्था देखिए कैसी थी कि नेति नेति करके उन्होंने त्याग किया था साधना की थी तपस्या की थी और उन्होंने ईश्वर दर्शन प्राप्त किया था या तो फिर निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर के ब्रह्म ज्ञान में स्थित हुए थे। ब्रह्म साक्षात्कार हुआ था। ब्रह्म के साथ में एकीकृत हो गए थे। यानी कि यह घड़ा है। घड़े के भीतर में पानी के भीतर में जो रिफ्लेक्शन है, वह घड़ा टूट गया। रिफ्लेक्शन बिखर गया। और जो सूर्य है, उसमें वो मैं ही सूर्य हूं। वह ज्ञान में ठाकुर स्थित हो गए। मैं इस छोटे से घड़े के भीतर में कैद एक छोटा सा प्रतिबिंब मात्र हूं। इस प्रतिबिंब में आप घड़े को हिलाएंगे तो प्रतिबिंब में विकृतियां आएगी, रिपल्स आएंगे, वेव्स और तरंग्स आएगी। यह जो अज्ञान था यह अज्ञान घड़ा टूटने से ही अज्ञान अदृश्य हो गया और मैं वही रेस्प्लेंडेंट सूर्य हूं जिसके भीतर में लाखों लाखों पृथ्वीयां आप आराम से सजा सकते हैं। तो वह ज्ञान ठाकुर को हो गया था। किंतु लोक कल्याण के लिए उन्होंने वापस आना ठीक किया। उन्होंने पृथ्वी पर वापस आए। एक नया घट बनाया। इस घट के भीतर में फिर से पानी भरा और फिर से इस पानी के भीतर में प्रतिबिंब के रूप में उन्होंने अपने को कैद किया। यानी कि देखिए कि किंतु यहां पर डिफरेंस क्या है? पहले का जो घड़ा था वह घड़ा था वह काम कांचन से युक्त जो मन है संस्कारों से युक्त जो मन है वह था ठाकुर के भीतर में काम कांचन का अंश मात्र था नो डाउट किंतु अंश तो था सत्व रजस तमस तीन गुण मिलकर के हमारा ये जो अपना यह मन बुद्धि चित्त अहंकार है अंतःकरण अपना वो सत्व रजस तमस के कॉम्बिनेशन से अपना अंतः अंतःकरण बनता है। किंतु जिस समय ठाकुर के भीतर में आप कहेंगे कि तमस और रजस कैसे हो सकते हैं? तो अगेन लीला प्रसंग में हमने इनफ डिस्कशन किया है कि ठाकुर के भीतर में यदि एक अंश तक नहीं रहता पूर्ण सात्विक होते तो साधना करना उनके लिए सिर्फ एक दिखावा मात्र होता। और व्हाटएवर एल्स ठाकुर इज ठाकुर इज नेवर एन अनट्रुथफुल पर्सन। असत्य जो है ठाकुर के जीवन में एक तनिक भी नहीं है तो फिर सत्य जो है उसका तो फाउंडेशन है ठाकुर का जीवन तो सिर्फ दिखावा करने के लिए साधना करना वो दोनों तरह से नहीं बनता है एक तो ठाकुर का प्रकृति ही नहीं है झूठमठ का दिखावा करने का दूसरा है कि यदि ठाकुर के भीतर में एक अंश तमस और रजस नहीं रहता और फिर साधना करके उनसे मुक्ति प्राप्त नहीं करते तो फिर हम लोग जनसाधारण क्या सोचेंगे? अरे भाई वह तो वैसे ही पूर्ण सात्विक थे। वह सत्व में से सत्व में जाना है। बंगला में जिसको कहते हैं गंगा जले गंगा पूजा गंगा की पूजा कैसे करेंगे? गंगा के जल से ही करेंगे। तो पूर्ण सात्विक है। साधना करके पूर्ण सात्विक हुए। वो क्या फर्क पड़ता है ठाकुर को? हम लोग तो तमस और रजस में डूबे हैं। हम लोग यदि साधना करके पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें तो एक बात हुई। इस हिसाब से भगवान बुद्ध का जो चरित्र है हमारी दृष्टि से ज्यादा एक आकर्षणीय है जो पापी तापी हमारे जैसे हैं कि भगवान बुद्ध भी जब राजकुमार थे तो राजमहल में रहते थे भोग सुख से घिरे हुए थे और फिर भोग सुखों का त्याग करके कष्ट करके उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया था तो एक आम आदमी जो कि आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करना चाहता है उसके लिए तो भगवान बुद्ध का चरित्र इस फार फार फार मोर अट्रैक्टिव आजकल वेस्ट में देखिए पश्चिमी देशों में अमेरिका में यूरोप में बुद्धिज्म के प्रति एक रैशनलिस्टिक अप्रोच है बुद्धिज्म का और खास करके जैन बुद्धिज्म का तो उसके प्रति जो काफी लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है। क्यों? क्योंकि वे लोग देख रहे हैं कि भगवान बुद्ध ने कोई मिरेकल नहीं सजेस्ट किए हैं। भगवान बुद्ध अपने से कोई दावा नहीं करते कि मैं अवतार हूं। अवतार का तो पूरा लाइफ ही डिफरेंट है। मिरेकल से बचपन से ही मिरेकल मिरेकल मिरेकल भगवान बुद्ध का तो ऐसा कुछ नहीं है। ना ही मिरेकल है ना ही अवतार होने का दावा करते हैं। ही इज अ कॉमन मैन। ही वास अ प्रिंस वर्ल्डली सेंस में। किंतु स्पिरिचुअल सेंस में ही इज अ कॉमन मैन लाइक अस। कि पाप किए हैं। मन काम कांचन से भरा हुआ है। विषयों के प्रति आसक्त है। और अभी निर्वाण प्राप्त करना है। तो बताइए क्या करना है? तो भगवान बुद्ध का लाइफ इज अ बेस्ट गाइड फॉर अस। ऐसा रैशनलिस्टिक एप्रोच बुद्धिज्म का वेस्ट में काफी प्रेफर किया जाता है। तो देखिए कि हम यदि ऐसा कहना शुरू कर दें कि ठाकुर तो भगवान के ही ईश्वर के ही अवतार थे। नारायण के ही अवतार थे। नारायण ही स्वयं देह धारण करके आए हैं। तो फिर क्या है कि यह पूरा ठाकुर के ठाकुर का हम आराधना करते, पूजा करते, गुरु के रूप में स्वीकार करते, उनका मंदिर बनाते, सब कुछ करते किंतु उनके कहे अनुसार साधना नहीं करते। तो वो एक है कि लोगों को साधना करने के लिए प्रेरित करना है। दोनों ओर से देखिए ठाकुर के गही भक्त भी थे, सन्यासी भक्त भी थे। सन्यासी भक्तों को साधना के लिए प्रेरित करना है। गही भक्तों को आराधना उपासना पूजा करने के लिए प्रेरित करना है। तो दोनों गुणधर्म ठाकुर के भीतर में रहने चाहिए। अवतारत्व और यह भी रहना चाहिए। इनफ मिरेकुलसनेस उनके भीतर में होनी चाहिए और इनफ तपस्या उनके भीतर में होनी चाहिए। सो दैट बेस्ट कॉम्बिनेशन बेस्ट ऑफ बोथ वर्ल्ड्स ठाकुर के भीतर में था। तो देखिए कि ठाकुर वह प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके फिर से पृथ्वी पर आए हैं। दूसरा एक घड़ा बनाया है। यह घड़ा पूर्ण सात्विक घड़ा है। और इस पूर्ण सात्विक घड़े में फिर से प्रतिबिंब होकर के रह रहे हैं। किंतु जब निर्विकल्प समाधि के बाद में आप वापस आते हैं। देखिए मिरेकल क्या है? घड़े के भीतर में सिर्फ प्रतिबिंब ही नहीं है। ओरिजिनल सूर्य जो है वह भी घड़े के भीतर में रह रहा है। वि इज कैसे आप इसकी व्याख्या करेंगे। सूरज इतना बड़ा है माने जैसे हमने ये कंपैरिजन किया कि एक सूरज के भीतर में आप 10 लाख पृथ्वी ना कि इतनी पृथ्वीियां बिठा सकते हैं। जबकि एक पृथ्वी पे आप करोड़ों करोड़ों घड़े बिठा सकते हैं। यानी कि साइज कंपैरिजन करें तो कहां घड़ा यह चींटी की तरह और यह कहां वो हिमालय की तरह हाथी हिमालय की तरह सूर्य। तो इवन यह चींटी और हिमालय का स्केल है। वह भी छोटा पड़ जाता है। यह घड़ा और सूरज का स्केल को कंपेयर करेंगे तो तो वह सूर्य इस घड़े के भीतर में कैसे रह सकता है? पता है वो एक साइंस फिक्शन कांसेप्ट है। हायर डायमेंशनल स्ट्रक्चर होते हैं। तो ये हायर डायमेंशनल स्ट्रक्चर में क्या होता है? बाहर से आपको छोटा सा दिखता है। भीतर में बहुत बड़ा होता है। इसका एक फेमस उदाहरण है। एक डॉक्टर हु बोल के एक सीरीज है। हु डब्ल्यूho तो ये उसमें क्या है? एक टेलीफोन बूथ है। तो टेलीफोन बूथ अब बाहर से देखेंगे तो उसका साइज कितना होगा? टारडिस इसको कहते हैं। तो टारडिस यानी टेलीफोन बूथ आप देखेंगे बाहर से कितना होगा उसका साइज। एक आदमी खड़ा रहे उतना ही। किंतु यह जो डॉक्टर हु में जो यह टेलीफोन बूथ है बाहर से तो टेलीफोन बूथ जैसा ही दिखता है किंतु भीतर में से स्पेस टाइम डिवाइस है हायर डायमेंशनल डिवाइस जैसे ही आप खोल के भीतर में जाएंगे तो भीतर में इतना विराट दिखेगा तो ये जो दिस इज अ कांसेप्ट रिलेटेड टू हायर डायमेंशन यूजुअली हम स्पेस टाइम ये स्पेस की तीन डायरेक्शन हाइट लेंथ एंड विड्थ और चतुर्थ फोर्थ डायमेंशन है टाइम। ये चार ही डायमेंशन हम लोग देख पाते हैं। चार डायमेंशन का ही हमको अनुभव है। किंतु साइंस कहता है कि मोर देन फोर डायमेंशंस आर पॉसिबल। एक्चुअली स्ट्रिंग थ्योरी वगैरह है। उसमें आप देखेंगे कि मल्टीपल डायमेंशन, 10 डायमेंशन, 11 डायमेंशन यह सब वे लोग इमेजिन करते हैं और मैथमेटिक्स वर्कआउट भी हो जाता है। अभी मैथमेटिक्स तो वर्कआउट हो जाता है। आपको सिंपल एक नंबर लिख देना है। यहां पे चार डायमेंशन, यहां पे छह है, वहां पे आठ है। नंबर लिख करके आप इक्वेशन को तो सॉल्व कर देंगे। किंतु इन प्रैक्टिसी हायर डायमेंशन कैसा दिखेगा? कैसा लगेगा? तो यह साइंस फिक्शन में यह सब इमेजिन करते हैं। तो टारडिस इज वन एग्जांपल कि बाहर से उसका साइज है टेलीफोन बूथ जैसा। किंतु भीतर में जाएंगे विराट स्पेसशिप है। स्पेस टाइम में ट्रैवल करती है। तो यह जो नया जो घड़ा बनता है पहले वाला जो घड़ा था त्रिगुणमय अह त्रि तीन गुणों से बना हुआ घड़ा जब जब तक साधना करता है साधक जब तक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता तब तक जो घड़ा होता है मन बुद्धि चित्त अहंकार वह बनता है तीन गुणों से सत्व रजस तमस से वह घड़ा बनता है तो बोलकर के वह घड़ा फोर डायमेंशन के भीतर में ही है किंतु निर्विक विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में जो नया घड़ा बनता है इट इज अ हायर डायमेंशनल वो घड़ा उसको कहेंगे एक हायर डायमेंशनल वेसल कि जिसके भीतर में आप एक बाहर से तो दिखेगा घड़े का ही शेप और साइज है किंतु उसके भीतर में वह इतना बड़ा है कि ओरिजिनल सूरज को लाकर के आप उसके भीतर में रख सकते हैं। सो ठाकुर के भीतर में भी निर्विकल्प समाधि के बाद में पृथ्वी पर वापस आकर के जो देह धारण किया था वो देह सामान्य देह नहीं था। पूर्ण सात्विक देह था। इसके भीतर में सामान्य मनुष्य की तरह सिर्फ रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस ही नहीं। ओरिजिनल सोर्स कॉन्शियसनेस भी सोर्स कोड आजकल कहते हैं जिसको। मतलब वह सोर्स कॉन्शियसनेस भी उनके भीतर में वर्तमान थी। और इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि इसके भीतर में दो है। एक तो ओरिजिनल चैतन्य एक तो रिफ्लेक्टेड चैतन्य है ही है जो कि सब में होता है। किंतु सोर्स ऑफ ऑल चैतन्य चैतन्यमई जो है वह स्वयं ठाकुर के भीतर में विराजमान है। और इसीलिए और मां तो वही थी। चैतन्यमई स्वयं थी मां तो ठाकुर भी मां के भीतर में जगदंबा का दर्शन करते हैं। शोडशी पूजा के समय हमने देखा और बाद में भी और फिर मां भी ठाकुर के भीतर में वही जगन माता का दर्शन करती है। मां को पता है कि इसके भीतर ठाकुर के भीतर में देह तो 14 पोया बांग्लादेश जे बोले ये 14 पोया ये मेजरमेंट यूनिट है। यानी मनुष्य की हाइट कितनी होगी? 5 1/2 फुट 6 फुट एकदम मोस्ट तो ये 5 1/2 6 फुट की हाइट के भीतर में इतना जो कुछ खेल चल रहा है कि मनुष्य मनुष्य का भी कॉन्शियसनेस है। ईश्वर भी भीतर में रह रहे हैं। तो ये दोनों इस तरह की जो करामत है ये जो मिरेकल है वो ठाकुर के भीतर में चल रहा है। ये सब खेल मां को पता था और इसीलिए मां को थाई गलीगो मां यहां पे काली महाराज ने इस तरह से लिखा है शशि महाराज ने लिखा है कि मां काली तुम मेरे किस दोष की वजह से मुझे छोड़ के चली गई तो ये ठाकुर के भीतर में मां काली का दर्शन मां करती थी

श्री रामकृष्ण और लज्जापटावृता माँ शारदा का दिव्य संबंध

और ऐसा बोलकर के मां रोने लगी श दृश्य हृदय विदारक यह दृश्य हृदय विदारक था काली महाराज आगे लिखते हैं किंतु अपरूप बोध हो ते लागी लो यह हृदय दृश्य वैसे तो हृदय विदारक था किंतु अपरूप लगने लगा हमरा एक पारश्व दाड़या आश्चर्य जो पतिप से मधुर संबंध प्रत्यक्ष कोते लागीलाम हम लोग एक साइड में खड़े रह के आश्चर्यचकित होकर के पति और पत्नी का वह मधुर संबंध प्रत्यक्ष करने लगे एवं भालाम ए रूप दृश्य ओ भाव आमरा पूर्वे कखनो देखी नाई और सोचने लगे इस तरह का दृश्य और भाव हमने पहले कभी देखा नहीं था ऑब्वियस है कि मां कभी भी ठाकुर के साथ में जाहिर में कोई वार्तालाप करती ही नहीं थी गंभीरानंद जी का ही दक्षिणेश्वर के दिनों का वर्णन देखेंगे तो मां जब भी ठाकुर के लिए खाना ले आती तो फिर जितने भक्त पुरुष भक्त यदि बैठे हैं तो सबको कहा जाता कि मां आ रही है ठाकुर को खिलाने के लिए तो आप अभी यहां से जाइए तो पुरुष भक्त है सब वहां से चले जाते वो जो एक फेमस घटना भी है कि एक दिन मां ने वहीं दक्षिणेश्वर काली मंदिर में ही मां काली की मूर्ति के पहनाने के लिए फूलों की माला वगैरह आभूषण बनाए थे। फूलों के बनाए थे। तो वो सोने के गहने निकाल के ये जो फूलों के बने आभूषण है मां शारदा द्वारा बनाए हुए वो मां काली को पहनाए गए। सफेद फूल है। काले कलर के पत्थर की मां काली की मूर्ति है। तो ठाकुर जब दर्शन करने के लिए गए तो इतना सुंदर लगने लगा। ठाकुर ने कहा अरे जाकर के मां को बुलाओ। वह भी तो आकर मां काली का दर्शन करें। देखो इतने सुंदर फूलों के गहने बनाए हैं। मां काली को पहना करके कितना सुंदर लग रहा है। तो फिर मां को संदेश भेजा गया और कोई एक स्त्री के साथ में मां तो घुमटा टान करके आ रही है। किंतु जैसे ही मां ने देखा मां शारदा ने देखा कि ठाकुर के साथ में यह बलराम बाबू वगैरह पुरुष भक्त भी खड़े हैं। तो फिर मां ने क्या किया? वो सामने से यदि दक्षिणेश्वर काली मंदिर दर्शन किए होंगे तो पता होगा जो वो जो नाट मंदिर है नाट मंदिर से नाट मंदिर के सामने से काली मंदिर में प्रवेशने का एक सीढ़ी है और फिर उस सीढ़ी से नहीं जाकर के क्योंकि ठाकुर के साथ में बलराम बाबू वगैरह पुरुष भक्त थे तो साइड में से जो सीढ़ी है उसमें से मां शारदा वो काली मंदिर में जाने का प्रयास कर रही थी। उस समय ठाकुर ने चिल्ला के कहा अरे उस सीढ़ी से मत जाना। वो अभी कुछ दिनों पहले एक मछुआन है। उस सीढ़ी से उठ रही थी। एकाएक पैर फिसल गया और गिर कर के पड़ी। तो ठाकुर ने जैसे ही ऐसा कहा तो ये बलराम बाबू वगैरह समझ गए कि मां खुद आई है मंदिर में जाना चाहती है। किंतु हम लोग खड़े हैं। बोल के यह फ्रंट डोर से नहीं जा रही आगे के दरवाजे से। तो इमीडिएटली वे लोग वहां से चले गए और फिर मां मां ने देखा कि वह पुरुष भक्त चले गए हैं। तो फिर ठाकुर के पास में जाकर के वह जो फ्रंट गेट है वहां से मां ने मंदिर में जाकर मां काली का दर्शन किया। तो यह लज्जा पटावता मां थी। कभी भी पुरुष भक्तों के सामने आना नहीं, चेहरा दिखाना नहीं। उनके साथ में डायरेक्ट वार्तालाप करना नहीं। बाद में भी हम देखेंगे कि जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब भी मां कोलकाता आती थी और पुरुष भक्त मां को दर्शन करने को आते तो जिस कमरे में मां बैठी है कमरे के भीतर में नहीं जाएंगे। वहां पर वह जो दरवाजे की चौखट है वहां पे वो प्रणत होकर के दर्शन करेंगे और फिर गोलाप मां मां के पास में खड़ी रहेगी। वह कहेगी कि मां अमुक- अमुक भक्त है। वह आपको दर्शन कर आपको प्रणाम कर रहे हैं। और मां को यदि कुछ कहना है तो बड़े ही मृदु स्वर से बोलेगी। गोलाप मां वो सुन के वो पुरुष भक्त को कहेगी कि मां आपको यह बात कह रहे हैं। देखिए तीन-चार फुट का ही डिस्टेंस है। किंतु फिर भी मां का चेहरा भी देखना संभव नहीं था। ना ही मां के गले का वो जो सुमधुर स्वर है वह भी सुनना संभव नहीं। पुरुष भक्तों के लिए वो गोलाप मां बिल्कुल वो पहो पहलवान की तरह वो द्वारवान की तरह वो वहां पर खड़ी हुई है। मां का दर्शन करना है। मां का प्रेम प्राप्त करना है। मां का स्नेह प्राप्त करना है। तो आपको जयराम भाटी जाना होगा। तो यहां पे काली महाराज कहते हैं कि इस तरह का अपरूप दृश्य कि मां सबके सामने कुछ बोले मां ठाकुर के साथ में कुछ संबंध प्रकट करें। ऐसा अभी तक हमने कभी नहीं देखा था। यह एक अपरूप दृश्य है। आमरा एक हम लोग एक साइड में खड़े रहकर के आश्चर्यजनक आश्चर्यचकित होकर के पति और पत्नी का यह मधुर संबंध प्रत्यक्ष करने लगे। एवं और सोचने लगे कि इस तरह का दृश्य और भाव हमने पहले कभी देखा नहीं था। प्रकृत प श्री श्री ठाकुर श्री मां के श्री श्री भवतारणी जीवंत मूर्ति बोलिया ज्ञान करते एवं श्री मांओं श्री श्री ठाकुर के मां काली बोलिया संबोधन करते सच कहे तो श्री श्री ठाकुर श्री मां को श्री श्री भवतारिणी की जीवंत मूर्ति बोलकर के ही सोचते और श्री मां भी श्री श्री ठाकुर को मां काली बोलकर के संबोधन करती अभी इस तरह का उदाहरण कि ठाकुर को मां मां काली बोलकर के पुकार रही है। ऐसा तो ज्यादा नहीं है। यही एक दो ही घटनाएं हैं। तो एनीवे रिपोर्ट नहीं हुआ होगा या तो काली महाराज को पता होगा जो घटनाएं हमको नहीं पता है। एक दिन की बात है हृदय मां को कहता है। तो मां शारदा को कि मां तुम ठाकुर को बाबा बोल के बताओ तो मैं जानू। सच जानू कि तुम्हारा और ठाकुर का संबंध जो है वो म एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी संबंध है। तो मां कहती है ठाकुर से बाबा किया वो तो मेरे सर्वस्व है। जीवन सर्वस्व है। सिर्फ बाबा नहीं है। तो ये मां और हृदय का एक वार्तालाप हृदय के जो है ना जो भी स्मृति कथाएं हृदय ने बाद बाद में यह वराह नगर मठ में जाकर के कुछ-कुछ बातें कही है। तो शरद महाराज वह बातें हमको बताते हैं। किंतु साथ में ही कहते हैं देखो हृदय जो भी कहता है ना थोड़ा सा उसको टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट इंग्लिश में जैसे कहते हैं कि उसको थोड़ा सा डाउट करके ही चलना है। एक घटना हृदय बताता है कि ठाकुर जब मधुर भाव की साधना कर रहे थे तो साड़ी वगैरह पहन करके बिल्कुल एक स्त्री की तरह ही दिख रहे थे और जब वो वहां पे भगवान की कोई मूर्ति होगी उसके सामने चामर व्यंजन कर रहे हैं। तो मथुर बाबू उस समय मुझे लेकर के अंतर महल में गए जहां पर यह स्त्रियां रहती है ना अंदर महल में उस समय जैसा था पर्दा प्रथा तो स्त्रियां जिस जगह पर रहेंगी पुरुषों का जाना निषिद्ध था खास करके बाहर के पुरुषों का तो वहां पे मथुर बाबू मुझे ले गए हृदय कहता है और कहता है कि देखो तो हृदय यह जो सब स्त्रियां खड़ी है बताओ तो उसमें तुम्हारे मामा कौन से हैं तो हृदय कहता है कि मुझे सही में मुश्किल हो गया यह पहचानना कि जिनके साथ में मैंने घर किया जिनकी इतनी सेवा की और ठाकुर को मैं पहचान नहीं पाया। इतना ठाकुर ने अपने को यह मधुर भाव साधना में डाल दिया था। तो शरद महाराज यह लिखते तो हैं किंतु साथ में यह भी कहते हैं कि हृदय को लेकर के मथुर बाबू अपने घर के अंदर महल में जाए और बाकी सब स्त्रियां जिनको हृदय देखे बाकी सब स्त्रियों को क्योंकि घुमटा तो खुला होना चाहिए। अदरवाइज तो पता ही नहीं चलेगा। तो उस समय तो पर्दा प्रथा घुमटा प्रथा बड़ी स्ट्रांग थी। तो स्त्रियों ने घुमटा भी नहीं पहना है, चेहरा खुला है और सब मथुर बाबू के घर की स्त्रियां उनके बीच में ठाकुर यह मथुर बाबू हृदय को दिखाए यह थोड़ा मानने में नहीं आता है। तो जो भी है हृदय का उस समय बड़ा जोर था। मथुर बाबू कहो ना कि जो कोई भी कहो यही शरद महाराज यह भी लिखते हैं कि ठाकुर के साथ में रहकर के हृदय का जो एक कॉमन सेंस है और एक आत्मविश्वास है इतना जबरदस्त हो गया था कि ठाकुर तो जाते थे ना सबको मिलने के लिए यह केशव सेन वगैरह तो निर्भय होकर के हृदय उनके साथ बात करता था एज इफ वो इनका इक्वल है तो ठाकुर का रिप्रेजेंटेटिव है डरना क्या है जग नारायण स्वयं उनको रिप्रेजेंट कर रहा है तो उसके मन में वह था बड़ा स्ट्रेंथ था मन की शक्ति बहुत थी तो दोनों ओर से है हृदय को हो सकता है कि मथुर बाबू ले भी गए हो और यह भी हो सकता है कि बादबाद में यह हृदय ने यह कहानियां बना दी हो अपनाेंस स्थापित करने के लिए। सो शरद महाराज कहते हैं कि यह सब थोड़ा सा सोच समझ करके लेना है हृदय की बातों का।

श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: स्वामी अभेदानंद द्वारा

अपूर्व और मधुर से संबंधो श्री श्री ठाकुर रो श्री मार अपूर्व और मधुर यह संबंध श्री श्री ठाकुर और श्री मां का देखिए ये ठाकुर के त्यागी संतान है ना उन्होंने ठाकुर और मां को जिस तरह से देखा है जिस तरह से समझा है दैट इज यूनिक और यह रेमिनेशंस में ही देखिए हमने साइड बाय साइड ये जो रेमिनेशंस लिए हैं उसी में से हमको पता चल जाता है कि किसका क्या फोकस था किसका क्या अंडर अंडरस्टैंडिंग था किसको क्या घटना याद है। इट नॉट ओनली शोज़ अस। यह सिर्फ इतना नहीं बताता कि वे लोग ठाकुर को किस तरह से देखते थे। मां को किस तरह से देखते थे। साथ में यह भी पता चलता है कि उनकी खुद की पर्सनालिटी किस टाइप की थी। क्योंकि मेरी पर्सनालिटी के अनुसार ही तो मेरे ऊपर में यह इंप्रेशन पड़ेगी। तो अब जैसे यह नोटबुक है। नोटबुक में आप लिखेंगे तो बहुत अच्छे से लिख पाएंगे। किंतु यह पत्थर की दीवाल है। उसमें आप पेंटिंग करने को जाएंगे तो बड़ा मुश्किल होगा। नोटबुक में अच्छे से ड्राइंग हो पाएगा। और पत्थर की दीवार पे बड़ा मुश्किल है ड्राइंग करना। जबकि यह जो पेंटर होते हैं वो लोग स्पेशल जो कैनवास यूज करते हैं उस पे आप पेंटिंग करने को जाएंगे तो और भी सुंदर होगा। यानी कि जो कैनवास है उसके उसका क्वालिटी क्या है? उसके अनुसार पेंटर चाहे कितना भी अच्छा हो किंतु कैनवास की क्वालिटी जो है वह भी मैटर करती है। तो ठाकुर का जो लीला था वह तो सबके सामने एक ही तरह का था किंतु प्रत्येक गुरु भाई का अपना अपना जो संस्कार था उसके अनुसार उन्होंने ठाकुर और मां को ग्रहण किया है। श्री श्री ठाकुर महासमाधि होए 31 श्रावण 1200 1293 साल ठाकुर की महासमाधि होती है बंगाली ईयर है 31 श्रावण 1293 और अंग्रेजी ईयर है 16th अगस्त 1886 ख्रिस्ताब् रात को 1:6 पे नेपाल के नेपाल कैप्टन विश्वनाथ उपाध्याय श्री ठाकुर महासमाधिर संवाद पहिया या ताड़ाताड़ी आशिया उपस्थित होइलो एवं श्री ठाकुर मेरुदंड गव्य ग्रुत मालिश करते कोरिले चैतन्य चैतन्योदय होइबे बोललो नेपाल के जो राज प्रतिनिधि थे कैप्टन विश्वनाथ उपाध्याय उन्होंने ठाकुर की महासमाधि का संवाद प्राप्त करके वहां पे आए ताड़ातड़ी आए दौड़ करके चले आए और ठाकुर के मेरुदंड जो है उसके ऊपर में यह गाय का घी मालिश करने से हो सकता है कि ठाकुर को चैतन्य होगा ऐसा उन्होंने कहा तखनोई शशि श्री ठाकुर मेरुदंड गब्य घृत आन्या शाग्रहे मालिश करते लागीो साथ में ही शशि अर्थात स्वामी रामकृष्णानंद जी ने ठाकुर के सेवक मेन सेवक उस समय के ठाकुर के मेरुदंड में गव्यघ्रत ले आकर के साग्र है आग्रह पूर्वक मालिश करना शुरू कर दिया किंतु ता ते बाह्य ज्ञान प्रकाश कोनो चिन देखा गैो ना किंतु उससे भी बाह्य ज्ञान प्रकाश का कोई चिन्ह देखा नहीं गया शकोले ए खबर पया एक आशिया समोवेत होते लागीो सभी लोग यह खबर प्राप्त करके एक के बाद एक आकर के समवेत होने लगे महाविपद संवाद क्रमे शबत्रय छोड़या प लो इस महावि विपद का संवाद धीरे-धीरे सब जगह पे फैलने लगा बेला दोष घोटिकार समय डॉक्टर महेंद्र सरकार आशिया नाड़ी देखिया विशेष भा पर्यवेक्षण करिया बोली लेन आर मालिश करिया कोनो फल होइबे नाम आखर में 10 बजे के आसपास डॉक्टर महेंद्र सरकार ने आकर के नाड़ी देख के पल्स देख के विशेष रूप से ऑब्जरर्वेशन करके करके निरीक्षण करके कहा कि और मालिश करने से कोई लाभ नहीं है। कोई फल मिलने वाला नहीं है। और दो घंटा पूर्व श्री श्री ठाकुर प्राण वायु बाहर होया गया छे आधे घंटे से पहले ठाकुर का प्राण वायु निकल चुका है। बाहर निकल चुका है। ए बार चीर समाधि इस समय चीर समाधि महेंद्र सरकार कथा शून्य आमला आमरा शकल आशा ही हारला महेंद्र सरकार की बात सुनकर के हमने सब आशा गवा दी ए द के श्री ठाकुर दिव्य देह संत्कार व्यवस्था होते लागीो और यहां पे ठाकुर के दिव्य देह के सत्कार की व्यवस्था होने लगी से अवस्था फोटो लेबर बार जो डॉ महेंद्र सरकार 10 टाका दिया शोका भी भूत चित्ते चलिया गले ठाकुर की इस अवस्था में फोटो लेने के लिए डॉक्टर महेंद्र सरकार ने ₹1 दिया और शोकाभिभूत शोक से अभिभूत चित्त से वहां से चले गए। यह न्यू इंफॉर्मेशन कि जो ठाकुर का वह फोटो है वह जो बाकी जो जितने भी ठाकुर के डिसाइपल आसपास में खड़े हैं और एक कोट के ऊपर में ठाकुर को सुलाया गया है उसका फोटो का पैसा जो है महेंद्र सरकार ने दिया था ₹1 तो शोकोले यामरा नीजे दे रे के बारे ओशोहाय ज्ञान को ते लागीला उस समय हम सब अपने को असहाय मानने लगे असहाय समझने लगे भाभी अभिलाम आमादे सोहाय संबल और शकल आशा भरोसा अबोशान होइलो सोचा कि हमारा सहाय संबल और सब तरह की आशा और भरोसे का अवसान हुआ है एकन की करबो वो कहां के आश्रय कोबा दिनो जापन करबो अब क्या करेंगे और किसको आश्रय करके दिन बताएंगे देखिए यह जो शोक है ठाकुर की इतनी सेवा की और ठाकुर इस तरह से सबको छोड़कर चले गए तो निश्चय जो शोक होगा उनके हृदय में किस तरह से उस शोक का वर्णन करेंगे देखिए इंटरेस्टिंगली कोई भी इस तरह का प्रयास नहीं करता कि ठाकुर के जाने से इतना शोक हुआ उस सभी तो लिटरेरी महापुरुष है ना एवरीवन इज लिटरेरी जॉइंट शशि महाराज शरद महाराज स्वामी जी मास्टर महाशय साहित्य की दृष्टि से इनके पास में सुपर पावर और उन्होंने बहुत अच्छी-अच्छी रचनाएं की है। स्वामी जी के स्तोत्र स्तव मास्टर महाशय का कथामृत यह काली महाराज का स्वयं उनका जो कंप्लीट वर्क्स है देखेंगे कि उनकी विद्या मेधा शक्ति कितनी है। शशि महाराज शरद महाराज शरद महाराज ने लीला प्रसंग लिख दिया। शशि महाराज का कंप्लीट वक्स चेन्नई से ना कि कहां से पब्लिश हुआ है। 150 एनिवर्सरी थी शशि महाराज की महासमाधि की ना बर्थ एनिवर्सरी 150 तो इतना बड़ा एक वॉल्यूम पब्लिश हुआ है शशि महाराज का स्वामी रामकृष्ण नंदे जीवन स्मृति कथा और पत्र संभार ऐसा ही कुछ है। इतना मोटा है तो वो है मेरे पास में तो अखंडानंद जी का ही इसी तरह से इतना मोटा एक वॉल्यूम तो मेरे पास में है अभी सुहितानंद जी आए थे उनके साथ बात हो रही थी तो वो कहते दो वॉल्यूम पब्लिश हुए हैं तो मुझे दूसरे वॉल्यूम के बारे में तो नहीं पता किंतु एक वॉल्यूम इतना मोटा जो है अखंडानंद जी का कंप्लीट वो है मेरे पास में सो महापुरुष महाराज का वो जो महापुरुष मूर्ति संग्रह इतना मोटा सा है। सो ये लोग लिटररी दृष्टि से कोई पीछे नहीं है। कोई भी भाव को व्यक्त करना है साहित्य में ये लोग आसानी से कर सकते हैं। माने मधुर भाव हो ना कि दिव्य भाव हो, तपस्या का भाव हो, ना कि आनंद का भाव हो। ये लोग बड़े माहिर है भाव प्रकट करने में। किंतु ठाकुर के जाने के जो शोक हुआ है, जो दुख हुआ है, वह भाव किसी ने साहित्य में प्रकट नहीं किया। मास्टर महाशय ने अप्रैल में ही लिखना छोड़ दिया। अगस्त माने चार महीना अप्रैल से मई, जून, जुलाई, अगस्त अगस्त में ठाकुर की महासमाधि हुई और फिर अगस्त के बाद में सितेंंबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फेब। फरवरी 21 फरवरी को मास्टर महाशय वराह नगर मठ जाते हैं। तो वह कथामृत का फिर से प्रारंभ फरवरी 1887 से होता है। सीधे 10 महीना मास्टर महाशय ने गैप लगा दी है। ठाकुर के रहते-रहते महासमाधि के 4 महीने पहले और छ महीने बाद। तो देखिए यह साहस कोई नहीं करता कि ठाकुर के जाने का शोक, दुख, ग्रीफ, संताप कैसे वे लोग व्यक्त करेंगे। यह काली महाराज ये दो-तीन सेंटेंस लिखते हैं। वह भी तो बहुत बड़ी बात है। मुझे याद नहीं आ रहा है कि और किसी ने इस तरह से इतने दो-तीन सेंटेंस लिखने का भी साहस किया हो। तो पहला भाद्र सोमवार छिलो प्रथम भाद्र सोमवार था। आमा देर जीवन एक स्मरणीय दिन मेरे जीवन का एक स्मरणीय दिन था। श्री श्री ठाकुर के देखले तहार प्राण वायु निर्गत होया छे बुझ बार उपाय छिलोना ठाकुर तो मृत्यु शैया पे शायित थे किंतु उनको देखकर के उनका प्राण वायु चला गया है उड़ गया है यह समझने का कोई उपाय नहीं था शहास बदन छिलो साहस्य वन था दिव्य ज्योति जेनो तहार समस्त शरीर होते निर्गत होते छिलो दिव्य ज्योति जैसे कि उनके समस्त शरीर से निकल रही थी से महासमाधि फोटो लेब बार जन बंगाल फोटोग्राफर कंपनी के खबर दिया आना हो वही महासमाधि का फोटो लेने के लिए बंगाल फोटोग्राफर कंपनी को खबर देकर के बुलाया गया ओ एकटी खाटे ऊपर श्री श्री ठाकुर शरीर स्थापन को करा हो और एक खाट के ऊपर में श्री ठाकुर का शरीर स्थापित किया गया पुष्प तबक श्री खाटे चार दिक शाइ देवा हो पुष्प और यह मालाएं वगैरह उस खाट के चारों ओर सजा दी गई। श्री श्री ठाकुर गोलाई पुष्प माल लो एवं मुखे चंदन फूल दिया शाजानो होइलो ठाकुर के गले में पुष्पमाला और चेहरे पे चंदन और फूल देकर के सजाना हुआ रामबाबू निजे खाटेर सम्मुखे दाणाया नरेंद्रनाथ के तहार पारश्व दाणते बोलीले रामबाबू अपने स्वयं खाट के सामने खड़े रहे और नरेंद्रनाथ को उनके बगल में खड़े रहने को कहे आमरा पश्चाते शकले निर्बाया शी ऊपर दाईलाम हम लोग सब पीछे में निर्वाक होकर के सीढ़ी के ऊपर में खड़े रहे बंगाल फोटोग्राफर कंपनी दुई खानी ग्रुप फोटो तुल्य लेल लेन बंगाल फोटोग्राफर कंपनी दो ग्रुप फोटो लिया उन्होंने इसके बाद में भी है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम