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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 20 Mar 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः य मेरी एक किताब दो किताब पब्लिश हुई है राजकोट से यह एक किताब है अपने रामकृष्ण संघ की अ अर्ली हिस्ट्री रामकृष्ण मिशन की आदि कथा और यह दूसरी किताब है यह अपने यहां पर जो गुजराती मैगजीन है उसमें जो मेरे आर्टिकल्स आते हैं उसका कलेक्शन इसका टाइटल है हंसते हंसते आप सक्सेसफुल हो सकते हैं तो एक्चुअली ना गुजराती त किंतु आपनी टर एक्चुअली यह जो अपने जो क्लास होते हैं ना उसी का गुजराती करके इसमें डाला हैने ऑलरेडी आपने सब सुन ही लिया है यह जो मैं हिंदी में जो क्लास करता हूं सुबह को उसी का फिर गुजराती करके इसमें से आर्टिकल बन जाता है तो मेरी मेहनत उसम कम हो जाती है लिखने की सफल था भाई सफल यानी कि सक्सेस अच्छा अच्छा मैं एकदम बिल्कुल शुरू शुरू के जो कुछ क्लास थे उसका उसमें से यह सब आर्टिकल्स लिखे गए हैं और आज अभी हमारा जो ज्ञान योग वाला जो सीरीज चल रहा है उसमें से मेरे एडिटोरियल्स बन जाते हैं इसलिए मुझे एडिटोरियल अलग से लिखने की जरूरत नहीं पड़ती अपने क्लास में से ही हो जाता है अच्छा तो अभी गंभीरानंद जी महाराज की किताब श्री मां शारदा देवी कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर की यह जो छोटी-छोटी इच्छाएं कि मैंने एक छोक देख कर के छोक दे करर के सब्जी खाना है या तो फिर यह रामलाल की मां जो कि अच्छा खाना बनाती थी तो उसकी प्रशंसा और यह मां का खाना कंपैरेटिव इतना अच्छा नहीं था तो बोल दिया कि यह हाड वैद्य है तो ठाकुर ऐसे रसिक शिरोमणि भी थे हंसी मजाक भी करवाते थे और साथ-साथ में यह छोटी-छोटी इच्छाएं देखिए तभी तो उनको हम मनुष्य के रूप में देखेंगे ना हम हम अपना बिहेवियर जिस तरह से देखते हैं उसके साथ में ठाकुर का बिहेवियर कहीं पर कुछ भी नहीं मिलेगा तो हम उनसे प्रेरणा कैसे ले पाएंगे आज जैसे कि उस समय था जबक क्षत्रिय ब्राह्मण वगैरा इस भारत की पवित्र भूमि पर विचरण किया करते थे तो उस समय भगवान राम या भगवान कृष्ण क्षत्रिय के वेश में आए क्षत्रिय के कुल में उन्होंने जन्म लिया जैसे कि क्या है कि उनका क्षत्रियो चित आचरण देखकर के देखकर के बाकी क्षत्रिय लोगों को प्रेरणा मिले कि हां क्षत्रिय के पास में पावर है राजत्व है सैन्य है बल है किंतु यह बल और यह सैन्य और यह शक्ति का उपयोग लोगों के शोषण के लिए नहीं करना है लोगों की भलाई करने के लिए करना है तो ठाकुर भी आज ज्यादातर लोग आप देखेंगे कि क्षत्रिय और या तो फिर उस कक्षा के ब्राह्मण अभी तो कहां रहे हैं अभी आज ज्यादातर लोग तो हम जैसे सामान्य गृहस्थ ही है मिडिल क्लास फैमिली आजकल कहते हैं ना मिडिल क्लास एजुकेटेड फैमिली तो ठाकुर और मां भी इसी तरह के एक फैमिली में आए थे और उनकी यह हमारे जैसी हरकत देख कर के माने ऊपर ऊपर से हमने एक हमारे आसपास में जैसे परिवार में देखेंगे किसी को किसी खास प्रकार का खाना बड़ा पसंद है तो वह उसके लिए बड़ा ही उस तरह का खाना बनाने के लिए बार-बार कहते हैं तो ठाकुर की भी यह सब चेष्टा देख कर के हमको लगता है कि यह सब लीलाए देख कर के पता चलता है कि अरे वह तो हमारे ही जैसे हैं तो यदि हमारे जैसे होकर के उन्होंने इतनी साधना कर दी तो हम इसमें से एक न परट भी क्यों ना कर पाए तो यह हमको आइडेंटिफिकेशन करवाने के लिए यह सब लीला होती है अभी गंभीरानंद जी महाराज आगे लिखते हैं 186 7 में दीर साधना के बाद 186 7 यहां पर बंगोली यर लिखा है 1274 साले दीर्घ साधना परे हृदय और भैरवी ब्राह्मणी सहित श्री रामकृष्ण कमार पुकुरे आशिया श्री मा के तथा आनाई लेन अर्थात की यह 186 7 में दीर्घ साधना के बाद ठाकुर हृदय और भैरवी ब्राह्मणी के साथ में कमार पुकुर आए और मां उस समय जयराम थी तो किसी को भेजा किसी लोग को कि जाओ मां को लेकर आओ और मां को जयराम बाटी से कामर कुकुर बुलाया अभी इस सेंटेंस के पीछे ठाकुर की साधना की पूरी कहानी आ गई हमको पता है कि ठाकुर की साधना के दो फेज थे तीन फेज हम कह सकते हैं कि जब तो पहले तो वह जब कामर पुकुर में थे बचपन में ही मन की एक बालक मन की एक सहज वृत्ति माने एक सुसंस्कार वाला बालक बचपन से ही ईश्वर के प्रति वह निष्ठावान होता है ईश्वर के प्रति क्यूरियोसिटी होती है ऐसा ठाकुर के साथ में था कामर पुकुर में जितने भी साधु सन्यासी आया जाया करते थे कामर पुकुर गांव के बाहर में एक धर्मशाला जैसा था चोटी जिसको बांगला में कहते हैं वहां पर यह गंगासागर या वगैरह तीर्थ जाने वाले साधु सन्यासी साधक गण रुका करते थे और वहां पर जाकर के छोटा सा बालक गदाधर या तो फिर गदाई इस तरह से चंद्राणी देवी उनको स्नेह से पुकारती थी तो यह गदाई भी उनके साथ में जाकर के इन साधु लोगों की थोड़ी बहुत सेवा छोटे-छोटे हाथों से जो मने थोड़ी बहुत सेवा हो सकती है उस तरह से किया करता था और फिर ये लोग भी गदाधर को वो साधुओं के स्वांग में सजा करके घर वापस भेजते थे तो वो सब हमने वो बाल सुलभ क्रीड़ा एं हमने ठाकुर की देखी है किस तरह से धार्मिक नाटक का अभिनय करने में उनको बड़ा ही आनंद आता था किस तरह से लीला प्रसंग में शरत महाराज ने स्वामी शारदानंद जी महाराज ने बड़ा ही विस्तृत विवरण किया है उसी उम्र में गदाधर ने यह देख लिया कि जगत में दो तरह के लोग रहते हैं एक तो वह धर्मशाला में आते हुए साधु सन्यासी जो कि बिल्कुल फक्कड़ है और यह लोग जो है कुछ कुछ लोग संसारी ऐसे घोर संसार में डूबे हुए हैं कि संसार में किसी भी तरह के बेनिफिट प्राप्त करने के लिए किसी भी तरह का मने अपने को कोई फायदा हो यह प्राप्त करने के लिए यह लोग किस हद तक झूठ बोल सकते हैं अपने संस्कारों से किस हद तक हो सकते हैं किस तरह से मलिन उनके मन के ऊपर में छा सकती है जैसे शरत महाराज कुछ कुछ उदाहरण देते थे जदिया तो फिर दूसरों को ठग ऐसा उसका मलिन चरित्र होता तो गदाई उसके पीछे में लग जाता और उसकी ऐसी मने मिमिक्री करता माने उसका ऐसा मने वो आचरण करता उसी के ढब के बोलने का और उसका उसकी मजाक करने का कि लोग हंस हंस करके लोगों का पेट दुख जाता और यह जिसकी वह मजाक करते थे जिसकी मिमिक्री करता था व बेचारा शर्म के मारे कहीं पर मुंह दिखाने को लायक नहीं रहता था और आखिर में जाकर के गदा की शरण में चले गए तब कहीं जाकर के गदाई उनको छोड़ता था तो ऐसा तो गदाई ने बाल गदाई ने सब कुछ देख लिया है तो वो हो गया ठाकुर की साधना का प्रथम पर्व द्वितीय पर्व स्टार्ट होता स्टार्ट होता है 18544 में जबकि अपने बड़े भाई रामकुमार के साथ में बालक गदाधर कलकत्ता आया क्योंकि कामर पुकुर में तो आय के कोई साधन नहीं है और घर तो परिवार तो वही शिव का परिवार है मने सुबह को खाना मिला तो रात का ठीक नहीं रात को मिला तो सुबह का ठीक नहीं तो बड़े भाई के साथ में कोलकाता आए और फिर वहां पर ही एक बड़ा ही अपॉर्चुनिटी आ गया जैसे ईश्वर ने ही उनके लिए यह अपॉर्चुनिटी रखा हो कि वहां पे राणी रासमुल मंदिर बनाया था किंतु रानी रासमुल मंदिर का निर्माण कर सकती है कि नहीं वो पता नहीं इसके बारे में शास्त्रीय मत क्या है यह सब सोचने की जरूरत है तो सब पंडितों की सभा बुलाई गई उसमें रामकुमार भी थे उन्होंने कहा कि यदि कालीवाड़ा वधान किसी सद ब्राह्मण को दे दिया जाए तो फिर कोई दिक्कत नहीं है तो वो रास मणि को यह बात बड़ी अच्छी लगी और रामकुमार को अपने यहां पर मां काली के पुजारी के रूप में नियुक्त कर दिया अभी उस समय गदाधर की मन की परिस्थिति हमको पता है कि किस तरह से निष्ठावान गदाई सोचता है कि अरे मेरे पिताजी तो किसी के मने अभी देखिए व समय था ना उस समय का वो ऊंची जात यह नीची जात यह मने यह सब समय सापेक्ष है आज के जमाने के अनुसार इस तरह के हम नहीं सोचते हैं कभी भी किंतु उस समय के अनुसार उस समय की रीति और नीति के अनुसार खुद ही राम अर्थात की श्री राम कृष्ण बालक गदाधर के पिताजी वो इतने पार्टिकुलर थे कि किससे दीक्षा लेनी किससे भिक्षा लेनी है किससे नहीं लेनी है तो जब यह अभी कई वर्ष थी रानी रास मणी अभी उनके पुजारी हुए हैं उनका अन्न खाना पड़ रहा है तो बेचारा गदाई क्या करता था कि अपने जहां पर उनका घर था पहले कलकाता में आकर के रहते थे वहीं पर रहता था बीच-बीच में अपने बड़े भाई रामकुमार को मिलने के लिए चला जाता था और खाने के लिए क्या करता था तो कोई भी ब्राह्मण है तो उसके घर में जाकर के बैठ जाएगा ठाकुर ने खुद कहा है अपने शब्दों से मने कबेला गय पढ तुम और ताओ कबेला आर ताओ कुछ बोल तुम ना मने ठाकुर कहते हैं किसी भी ब्राह्मण के घर जाकर के मैं बैठ जाता था और जाता भी ऐसे समय था कि खाना तो पहले जब पहले खाना बनता है तब कहीं जाकर के आप बोलेंगे कि हां मैं खाने वाला हूं तो थोड़ा सा ज्यादा आपके लिए बनाएंगे किंतु क्या करते थे खाना होने के बाद में जाते थे सबका अभी खाना तो ब खत्म हो गया तो अभी क्या करेंगे तो कैसे भी करके गदाई के लिए बालक गदाधर के लिए कुछ ना कुछ वहां के ब्राह्मण कुछ ना कुछ खाना बनाते थे कुछ ना कुछ जुगाड़ करते थे और फिर कभी-कभी क्या करते थे कि कालीबाड़ी में से ही वह सिधू अर्थात कि भिक्षा के रूप में थोड़ा आटा वगैरह लेकर के वहां पे वो जो पंचवटी है उसके नी पंचवटी तो खैर उस समय नहीं थी वो तो ठाकुर ने उसको रोपा था सब पेड़ पौधे वगैरह किंतु वो गंगा के किनारे बैठ कर के अपने से अपना खाना बनाते थे किंतु उस समय जो अपने हृदय की प्रेरणा से उन्होंने मां को पुकारना शुरू किया और हृदय की प्रेरणा से उन्होंने मां को कहा जब वह काली मंदिर के पुजारी स्वयं हो गए थे कि मां तुम मुझे दर्शन दो वरना तो ये खड़क है तुम्हारा मैं अपने गले में मारूंगा इससे मैं अपना गला काट दूंगा तो जद ऐसा कहा तब मां ने स्वयं आकर के बालक गदाधर गदाधर अभी बड़ा हो गया है उनको हम श्री राम कृष्ण कह के पुकार सकते हैं श्री राम कृष्ण को दर्शन दिए और तभी से उनका जीवन सतत माने एक के बाद एक दर्शन से परिपूर्ण होने लगा फिर यह कलकता कामर पुकुर में खबर गई चंद्रा मणि देवी को कि अरे आपका लड़का तो पागल हो गया है मां मां कहते कहते रोता रहता है निव स्त्र होकर के घूमता रहता है कुछ कीजिए इसके साथ और जैसे गांव में होता है 10 उपदेश देने वाले लोगों की कमी नहीं होती चंद्रा मणि देवी को बताया गया कि बच्चे को यहां पर लाकर के शादी करवा दीजिए सब ठिकाने पड़ जाएगा तो टज की जब वो कामर पुकुर वापस गए वो हो गया पहले पर्व दूसरे पर्व की साधना की समाप्ति इसके बाद में कमार पुकुर जाकर के मां के साथ में विवाह हुआ और फिर कलकत्ता वापस आए 1860 के आसपास में और फिर वहां से लेकर के उनकी साधना का तृतीय पर्व प्रारंभ हुआ पहले पर्व में तो बचपन में ही बाल सुलभ उनकी जो ऑब्जर्वेशन था इससे पता चल गया कि सार क्या है असार क्या है विवेक क्या है अविवेक क्या है संसार क्या है और ईश्वरीय रास्ता क्या है यह पहले पर्व में पता चल गया द्वितीय पर्व में पता चला द्वितीय पर्व में अपने हृदय के आवेग से उन्होंने मां को पुकार पुकार करके उन्होंने मां का दर्शन प्राप्त किया तृतीय पर्व में क्या होता है उनको तो पूरे विश्व में एक नए अपने वेदांत धर्म को पुनः स्थापित करना है पुनर्जीवित करना है पुनः इसका प्रसारण करना है तो इसके लिए शास्त्रीय सम्मत साधना होनी आवश्यक है तो एक के बाद एक सिद्ध महापुरुष गुरु योगी साधक दक्षिणेश्वर की मुलाकात लेने लगे जैसे कि यह भैरवी ब्राह्मणी थी जैसे कि जटाधारी था जैसे कि तोतापुरी थे वह सबने आकर के ठाकुर को अपनी अपनी सिद्ध पथ में दीक्षा दिलवाई और साधना करवाई और साधना में सिद्धि प्राप्त करवाई तो इसी तरह से ठाकुर ने यह जो वैष्णव भाव साधना है मातृ भाव वगैरह मधुर भाव वो सबकी साधना की उन्होंने तंत्र साधना भी की शक्ति साधना जिसको कहते हैं और साथ में वेदांत साधना भी की अब सभी तरह की शास्त्रीय मत से शास्त्रीय विधि से साधना में सिद्ध होकर के आखिर में 186 7 में हृदय और भैरवी ब्राह्मणी के साथ में ठाकुर कामर पुकुर वापस आए तो अभी ये ठाकुर जब पहली बार कामर पुकुर आए थे और मां के साथ में विवाह हुआ था वो एक ठाकुर और यह एक ठाकुर 186 7 वाले प्राय 9 साल के बाद में वो जो वापस आए हैं यह दूसरे ठाकुर हैं जिन्होंने कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके सतत ईश्वरीय भाव में स्थित हो गए हैं सतत ब्रह्म भाव में जो कि जिनकी स्थिति हो गई है यह ठाकुर माने वो ठाकुर अभी भी पहले वाले ठाकुर को हम अभी भी साधक कह सकते थे किंतु अभी यह जो नए ठाकुर कमार पुकुर आए हैं वह सिद्धों के सिद्ध थे अवतार वरिष्ठ थे अभी तो उनको जगत में पूरे धर्म का प्रवर्तन करना था तो यह हो गए दूसरे ठाकुर और जब 186 7 में वापस आए कमार पुकुर साथ में किंतु भैरवी ब्राह्मणी भी थी तो भैरवी ब्राह्मणी के साथ में जो प्रसंग होते हैं उसका आलेख महाराज जी ने इसके बाद में किया है तो फिर मां को वहां से जयराम से कमार पुकुर बुलाया तिनी पूर्वे अनुष्ठा निक भावे सन्यास ग्रहण कररी लेओ सन्या सेर गुरु तोतापुरी निकट सुन्या लेन अच्छा अभी जब वेदांत साधना की थी ठाकुर ने विधिवत रूप से तोतापुरी से सन्यास ग्रहण किया था और सन्यास ग्रहण करने के बाद में भी तोतापुरी से उन्होंने क्या सुना था स्त्री निकट थाकी ले ओ जहार त्याग बैराग ब विज्ञान सर्वतो भावे अखन थाके से व्यक्ति ब्रह्म में थार्स प्रतिष्ठित होया छ माने भले ही आप चाहे सन्यास लिए हैं किंतु ठाकुर तो पहले ही उनका तो विवाह हो चुका था पहले ही तो शादी शुदा थे तो तोतापुरी ने किंतु ऐसा नहीं कहा कि अभी आप अपनी वधु के साथ में रह नहीं सकते तोतापुरी ने एक्चुअली क्या कहा कि जद स्त्री साथ में रहती है उसके बावजूद त्याग विवेक वैराग्य और विज्ञान पूरा आपका अकब रहता है वैसे का वैसा ही रहता है तब कहीं जाकर के कह सकते हैं कि यह व्यक्ति ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठित है देखिए इसके बारे में योग शास्त्र हमको क्या कहता है योग शास्त्र कहता है कि यह जो पंच क्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश यह पंच क्लेश कैसे हैं पता है बीज की तरह है आप जमीन में डालेंगे फिर उसमें से एक के बाद एक वो पेड़ पेड़ पौधे निकलना शुरू होते ही जाएंगे अभी एक पेड़ उसमें से जन्म लिया अभी पेड़ को आपने काट दिया कुछ दिनों के बाद देखेंगे कि पेड़ की नई डालियां होनी शुरू हो गई है फिर से आपने पेड़ को काटा तो उसके बाद में से फिर से नई डालियां आनी शुरू हो गई अर्थात कि काम और वासना हमारे हृदय में घर करके बैठे हैं हमारे हृदय में जड़ डालकर के बैठे हुए हैं अभी हम कितना ही इस कामना और वासना को काटते रहे जैसे ही सामने थोड़ा सा भी टेंप्टेशन आता है इमीडिएट वह कामना वासना जागृत हो जाती है कि हां मुझे य इस इस चीज का भोग करना है ऐसा करके मन को प्रलोभन देना शुरू कर देता है किंतु इसका सोल्यूशन क्या है योग शास्त्र कहता है कि दगद बीज हो जाना अर्थात कि जिस बीज को आप गर्म पानी में उबाले गे वो बीज जब वह जल जाएगा तब आप उस बीज को मिट्टी में डालेंगे तो उसमें से एक भी पौधा होगा नहीं तो उसे बीज को ही जला देना है जब तक बीज जीवित है तब तक उसमें से नई-नई डालियां बनती ही रहेगी किंतु जब बीज जल गया तो फिर नई डालिया बनने का प्रश्न ही नहीं आता तो यही उपमा योग शास्त्र की ठाकुर आप जब के आप निर्विकल्प समाधि में स्थित हो जाते हैं तब अपनी वासना एं और ये पंच क्लेश जो है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश यह दग्ध बीज हो जाते हैं उसमें से फिर कभी भी नए मने नई शाखा प्रशाखा एं जन्म लेने का प्रश्न ही नहीं आता तो इस तरह से ठाकुर ने साधना की थी उस साधना में निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गए थे उनकी कामनाएं वासना एं दगद बीज हो गई थी अभी चाहे स्त्री के साथ में अपनी वधु के साथ में रहे ना रहे कोई फर्क नहीं पड़ता तो यह तोता पर ने ठाकुर को कहा था कि ज सही सही ब्रह्मज्ञानी का लक्षण क्या है उसकी काम कांचन के प्रति स्पू हा दत बीज हो गई है जड़ मूल तक जल गई है कुछ भी बचा नहीं है तब कहीं जाकर के अपनी स्त्री के साथ रहेगा और कुछ भी विकार मन में नहीं होगा तब कहीं जाकर वह सही सही ब्रह्मज्ञानी है और ठाकुर ने देखिए यहां तो अभी कमार पुकुर में तो क्या है एक छोटा सा कमरा है वहां पर सभी लोग एक साथ में रहते हैं किंतु जब दक्षिणेश्वर की एक घटना है दक्षिणेश्वर में जब मां गई थी तो ठाकुर ने कहा था कि तुम मेरे ही साथ में मेरे ही कमरे में रहना तो शुरू शुरू में ठाकुर के साथ में ही रहती थी मां तो एक दिन रात को क्या हुआ कि ठाकुर के साथ में ही मां सोई हुई है और उस समय तो मां तो एकदम नव यना थी मने उनका तो रूप जो है पूरा मने संपूर्ण रूप से खिला हुआ था उस समय की यह बात है कि ठाकुर ने मां को अपने पास में सोती हुई देखा और क्या सोचा अपने मन में अपने मन को कहा कि मन देखो इसी को कहते हैं स्त्री शरीर और इसी को कहते हैं स्त्री शरीर का भोग करना क्या तुम यह चाहते हो अपने को क्या तुम यह स्त्री शरीर का भोग करना चाहते हो यदि चाहते हो तो कोई झूठ मूठ का मुझे ऐसा मत कहना कि अरे नहीं नहीं मन में भोग की माने आशा है इच्छा है किंतु मैं मुंह पर कह रहा हूं नहीं मैंने तो तोतापुरी से संन्यास ग्रहण किया है नहीं मैं तो मां काली का साधक हूं मैं यह सब करूंगा तो लोग क्या कहेंगे ऐसा झूठ मुठ की बात मुंह पर मत करना जो हृदय में है वही कह दो यदि भोग करना है तो यह रहा स्त्री शरीर भोग कर लो इस बात को निकाल दो मन में से तो जैसे ही उन्होंने ऐसा कहा वैसे ही उनका मन सड़ सड़ करके ठाकुर का खुद का शब्द है वो ऐसा फटफट करके वोह समाधि के राज्य में ऐसा स्थित हो गया कि पूरी रात वो समाधि में स्थित रहे सूर्योदय होने तक वो समाधि में से वापस नहीं आए थे और मैंने इसी बात जद ये स्टार्ट की है तो इसका अंत भी कैसे आता है कि मां शुरू शुरू में ठाकुर के साथ में शयन करती थी ठाकुर के ही कमरे में दक्षिणेश्वर में किंतु रात को बार-बार ठाकुर को समाधि होती है यह देख कर के मां को बीच-बीच में डर लगता था ऐसा लगता था कि अभी समाधि होती है तो यह अपने हृदय की धड़कन तो बंद हो जाती है ना वो शरीर तो जड़ जैसा हो जाता है तो मा कभी एकदम रोना शुरू कर दी थी ये सोच कर के कि ठाकुर मर गए हैं उनका शरीर त्याग हो गया एक एक बार रात को तो ठाकुर को ऐसी समाधि हो गई माने रोते-रोते हृदय वगैरह सबको जगा दिया ये लोग सब आए दौड़ते दौड़ते और ठाकुर को ईश्वर का नाम सुनाने लगे तब कहीं जाक के ठाकुर समाधि में वापस समाधि में से वापस आए किंतु उसके बाद में ठाकुर को पता चला कि अभी मां इस तरह से उनके साथ में रात को रहेगी और रात को तो ठाकुर बार-बार समाधि में जाएंगे कभी मां के साथ में बड़े-बड़े जोर-जोर से बातें करेंगे तो अभी मां को तो बेचारी को तो डर लग ही जाएगा ना तो फिर ठाकुर ने कहा मां को कि अच्छा एक काम करो तुमको रात को नींद नहीं आती इसलिए तुम जाकर के नबत में चंद्रा मणि देवी उस समय ठाकुर की मां नबत में ही रहती थी तो जाकर के मेरी मां के साथ में रहो तो उस उस तरह से माने वो मां और ठाकुर का साथ में रहने का वो अंत आया तो यहां पे देखिए कि महाराज जी कहते हैं कि ठाकुर तोतापुरी ने ठाकुर को कहा कि यदि सही सही ब्रह्म भाव में प्रतिष्ठित हुए हो तो यदि स्त्री के साथ में भी रहोगे तो मन में कोई भी विकार नहीं आएगा स्त्री और पुरुष उभय के जीनी समो भावे आत्मा बोलिया सर्वण दृष्टि और तद अनुरूप व्यवहार करते पारेन तहा रही थार्स ब्रह्म विज्ञान लाभ होया छ जो स्त्री और पुरुष पुरुष दोनों को समरूप से आत्मा ऐसा करके पहचान सकते हैं और इस तरह से वर्तन भी कर सकते हैं वो वही लोग यथार्थ ब्रह्म विज्ञान में प्रतिष्ठित हुए हैं मैं अभी मैं जब तक यह सोचता रहूंगा कि मैं मैं हूं मेरे यह संस्कार है मेरी यह मेमोरीज है मेरी यह वासना है मेरी यह एंबिशन है मेरी ये ड्यूटीज है मेरी यह रिस्पांसिबिलिटी है जब तक ये मैं में चलता रहेगा तब तक ब्रह्म विज्ञान में हम प्रतिष्ठित नहीं होंगे जिस क्षण सही सही माने यह सिर्फ बातों की बात नहीं है व्यवहार में भी ऐसा होना चाहिए अभी मैं मन से तो ऐसा 10 लोगों को बोल रहा हूं कि हां मुझे तो मैं तो साधना करता हूं मैं तो साधक हूं मैं तो ब्रह्म चिंतन करता हूं ठाकुर मा स्वामी जी की किताब पढ़ता हूं ऐसा करके मैं बड़ा गर्व करता हूं किंतु किसी ने मेरे बारे में दो कटू वाक्य क्या बोल दिए दो कटू शब्द क्या बोल दिए एकदम मैं क्रोध से पागल हो जाऊंगा चेहरा क्रोध से लाल हो जाएगा तो यदि ऐसा होता है तो मुंह से बोलने से क्या लाभ है माने जब तक व्यवहार में नहीं आता माने ये व ये जो कहते है ना कि लोहा है लोहे में से जद तलवार बनानी है तो भट्ठी की आग में उसको लना पड़ता है भट्ठी की आग में डाल कर के उसकी सब अशुद्धियां दूर करनी पड़ती है तब कहीं उस लोहे से एक मजबूत तलवार एक स्ट्र स्वर्ड तैयार होगी वरना जब तक लोहे में अशुद्धियां है आप कोई भी शस्त्र बनाएंगे तो शत्रु के साथ में जब भी मुकाबला होगा व शस्त्र टूट जाएगा तो यह साधना के फोर्ज में साधना के आगुण में अग्नि में अपने मन को तपा करके अपने मन को गाल करके सब यह जो अशुद्धिया है उसको दूर करना पड़ेगा तब कहीं जाकर के ब्रह्म विज्ञान में हम लोग स्थित होंगे तो ये मैंने बोलने से सिर्फ नहीं चलेगा व्यवहार में भी आना चाहिए जब लोग मेरे पास में आकर के सुकून प्राप्त करते हैं मेरी वाणी सुन कर के उनको अच्छा लगता है तब तो कहीं आप जाकर के कहेंगे ना कि यह साधक है वरना मेरा चेहरा ही सब समय ऐसा गंभीर या तो क्रोधित रहता है मेरा मने मैं मुझे देख कर के ही ऐसा लगता है अरे भाई इसके साथ में बात नहीं करनी पता नहीं कितना टेंशन ये सर के ऊपर में लेकर घूमता है मेरे साथ में होता है एक्चुअली होता है क्योंकि मैं इंट्रोवर्ट हूं कम बातें करता हूं तो बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि अरे यह उनके मन में पता नहीं क्या चल रहा है उनसे थोड़ा सा दूर ही रहो तो मैंने यह बहुत अनुभव किया है तो क्या करें देखिए ये मैंने ये मैंने थोड़ा सा समझना होगा कि एक तो है कि आपका नेचर ही एक इंट्रोवर्ट है तो वो एक हो गया और दूसरा हो गया कि आपका नेचर क्रोधी स्वभाव का है दुर्वासा मुनि थे ना जैसे कि जहां पर भी जाते थे उनकी ठीक आग स्वागता आप नहीं करेंगे ठीक ठीक उनकी मेहमान नवाजी नहीं करेंगे तो क्रोधित हो जाएंगे श्राप दे देंगे तो ऐसा दो तरह का एक श्राप देने वाला एक व्यक्ति व्यक्तित्व रहता है दूसरा एक रहता है कि इंट्रोवर्ट पर्सनालिटी रहती है कि वो बाय नेचर ही ज्यादा बातें नहीं करते अभी लोगों का तो क्या है ना कि मन के भीतर में क्या चलता है बहुत कम लोग तो पहचान पाते हैं तो और फिर एक एक मलाइन इंटेंशन भी कुछ कुछ लोगों का रहता है कि अरे वो बात नहीं करता उस उसका मतलब कि उसके मन में कुछ ना कुछ गड़बड़ है तो खैर यह मैंने अपने जीवन में बहुत फेस किया है और मैं कभी-कभी सोचता भी हूं कि अच्छा मैं और ज्यादा एक्स्ट्रो वर्ट होता और ज्यादा कम्युनिकेटिव होता तो अच्छा नहीं होता क्या मैं यहां पे ये सब किताबों में इतना सब कुछ पढ़ता हूं कि हां मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा कंपेज दया यह सब अपने जीवन में होने चाहिए और मैं तो कहीं जाकर के बहुत ही रेयरली किसी के साथ जाकर बात करूंगा सामने से कोई बात करने को आए तो ठीक है मैं तो जाकर नहीं करूंगा तो क्या मुझे और ज्यादा ओपन माइंडेड नहीं होना चाहिए किंतु देखिए कि मैंने देखा है कि जो प्रकृति है सो है जिसकी मैं जोर जबरदस्ती करके 1015 दिन लोगों के साथ में सामने से जाकर के बात करूंगा भी तो 1015 दिन के बाद मैं ऐसा थक जाऊंगा कि फिर से मैं ऐसा नहीं करूंगा तो वो एक हो गया कि आपकी प्रकृति एक तरह की है किंतु एक दूसरा हो गया कि मन का भाव एक है कोई कोई लोग होते हैं मुंह पे तो बहुत ही अच्छी-अच्छी बातें करेंगे किंतु पता नहीं उनके मन में क्या होता है जैसे कि वह हिंदी में कहावत है ना कि मुख में राम बगल में ूरी इस तरह से कि मुह पे तो अच्छी बातें करेंगे मन में पता नहीं किस तरह के अंकट बंकट और गड़बड़ सरब है उनके मन में ठाकुर ने एक बार कहा था कि कुछ-कुछ लोगों से बड़ा ही सावधान रहना चाहिए क्या एक तो है कि जो कि बिल्कुल बात नहीं करता दूसरे है कि जो बहुत ज्यादा बातें करता है तीसरा है कि इस तरह का तालाब जिसके ऊपर में वो एक लील कहते हैं ना फंगस जैसा वो छा गया है तो उस तालाब का पानी नहीं पीना है किंतु मतलब पता नहीं भीतर में क्या है बाहर से एक जैसा दिखता है भीतर में एक जैसा दिखता है तो ठाकुर एक्चुअली कहते है यह बात मास्टर महाशय के सामने किंतु ऐसा कहने के बाद में ही इमीडिएट कहते हैं किंतु मास्टर महाशय का इसका फल्गु नदी जैसा है फल्गु नदी के बारे में कहा जाता है कि वो रेती के नीचे में वो उतरती है वो राती के नीचे में वो प्रवाहित ऊपर में से रहती दिखेगी किंतु उसके नीचे फल्गु नदी प्रवाह की तरह पानी का प्रवाह चलता रहता है तो ठाकुर ने ऐसा कहा कि बिल्कुल नहीं बोलते तो मास्टर महाश बड़े ही इंट्रोवर्ट है तो मैं अभी कथामृत पढ़ता हूं तो मैं कभी-कभी सोचता हूं कि मैं मैं मेरा किसके साथ में आइडेंटिफिकेशन होगा नरेंद्र के साथ में तो कभी नहीं होने वाला है मने इतना बकबक करते रहते मैं एक महीने में शायद जितना बोलता होंगा उतना वो एक दिन में बोलते होंगे तो स्वामी जी के साथ में तो आइडेंटिफिकेशन होने वाला नहीं है मुझे लगता है किय मास्टर महाशय के साथ में थोड़ा बहुत आइड टिकेशन होगा वो भी मेरे जैसे ही थे बड़े ही इंट्रोवर्ट थे ज्यादा बातें नहीं करते थे तो ठाकुर ने उनके ही बारे में ऐसा कहा था कि जो बहुत ज्यादा बातें करते हैं जो बिल्कुल बातें नहीं करते ऐसे लोगों से सावधान रहना पता नहीं उनके मन में क्या है किंतु इमीडिएट बोल दिया कि इनका है फल्गु नदी जैसा बाहर ऊपर में से तो रहती दिखती है किंतु नीचे में शीतल जल का प्रवाह बहता रहता है तो आई आल्सो लाइक टू से अबाउट माइसेल्फ मने ऐसा तो हम अपने को तो कहेंगे ना कि भाई मैं वो ऐसा थोड़ी ना है कि मेरे मन में की ग मैं भी ऐसा सोचता हूं कि भले ही चाहे मैं ऊपर से इंट्रोवर्ट हूं भीतर में तो यह सब प्रेम करुणा बहुत भरा हुआ है तो ऐसा कहक हम अपने को सांत्वना पहुंचाते हैं ये ये मुंह से बोलना और सही सही व्यवहार में लाना यहां पर वह तोतापुरी कहते हैं कि मुह से ब्रह्म ब्रह्म कहते रहना अहम ब्रह्मास्मि कहते रहना मुह से सन्यास ले लेना किंतु अपने व्यवहार में आचरण में इसको प्रदर्शित ना करना से नहीं चलेगा यदि प्रदर्शित हुआ तो समझ लीजिए कि वह सही सही ब्रह्म विज्ञान में प्रतिष्ठित हुआ है तहा रही थार्स ब्रह्म विज्ञान लाभ होया छ उसी को सही सही ठीक ठीक यथार्थ ब्रह्म विज्ञान प्राप्त हुआ है स्त्री पुरुष भेद संपन्न अपोर सकोल साधक होले ओ ब्रह्म विज्ञान होई ते बहु दूरे रहिया छ मने जो जो लोग सामान्य साधक है उनके मन में जब तक स्त्री और पुरुष का भेद है तब तक वह ब्रह्म विज्ञान से बड़े ही दूर है जैसे कि मीराबाई वृंदावन में गई थी ठाकुर का उदाहरण है तो वहां पर वह जो गोस्वामी थे मैं नाम भूल गया उनका चैतन्य पंथ के तो उनसे मिलना चाहती थी मीराबाई उनसे मुलाकात दर्शन करना चाहती थी उनके तो उन्होंने यह कह के मना कर दिया कि अरे मीराबाई तो तो स्त्री है तो उनके दर्शन उनके साथ में मुलाकात में कैसे कर सकता हूं तो मीराबाई ने एक मैसेज पहुंचाया कि जब तक क्या आपको इस अवस्था में भी क्या स्त्री और पुरुष का भेद है तो जैसे ही यह मैसेज मिला वह गोस्वामी जी समझ गए कि अरे यह तो मेरी बड़ी शिक्षा हो गई मैं यदि अपने को यह कहता हूं कि हां मैं साधना करके सिद्धि प्राप्त की है तो फिर ये स्त्री और पुरुष का भेद कैसे रहेगा फिर उन्होंने मीरा भाई को इनवाइट किया और दोनों में बहुत ही सुंदर वा लाप हुआ था ये ठाकुर का उदाहरण है तो देखिए ऑफकोर्स यह तो मैंने जिस गोस्वामी जी के बारे में बताया वोह सही सही मने वो ब्रह्म निष्ठ थे तो बोलकर के उन्होंने ये उनके साथ में यह ठीक हुआ कह सकते हैं हम लोग जद कहेंगे कि अरे हम लोग तो यह सब स्त्री और पुरुष के भेद से ऊपर है हम लोग स्त्रियों के साथ में जितना चाहे जैसे भी चाहे बात कर सकते हैं तो हमारे लिए किंतु बहुत बड़ा डेंजर है क्योंकि हम लोग अभी साधक अवस्था में है देखिए मैंने ये प्रसंग पहले भी एक बार शायद कहा था कि कैलिफोर्निया स्वामी जी गए थे तो मिसेस एलिस एंस ब्रो उनके साथ में रहती थी तो अभी एक ही कमरे में र एक ही वो फ्लैट में रह रहे हैं टर्क स्ट्रीट में उन्होंने फ्लैट लेकर के केली सन फ्रांसिस्को में वो वेदांत के ऊपर प्रवचन देते थे तो एक ही फ्लैट में रह रहे हैं बाथरूम है बाथरूम में तो वहां पर टब होता है टब में ये लोग स्नान करते हैं तो वो अभी ये टब जो है बेदिंग टब वो अभी वो एलिस हेंस ब्रो मिसेस हेंस ब्रो उसको क्लीन किया करती थी और स्वामी जी कभी-कभी उनसे नाराज रहते थे कि अरे यह ठीक से क्लीन नहीं किया इस फिर वो बाथरूम में जाकर खड़े रहते थे वो टब क्लीन कर रही है और स्वामी जी खड़े-खड़े बोल रहे है यहां पर ठीक से क्लीन नहीं हुआ वहां पर ठीक से क्लीन नहीं हुआ फिर एक बार तो ऐसा हो गया कि एलिस हेंस ब्रो नाराज हो गई और वो जो जिस चीज से साबन से क्लीन कर रही थी स्वामी जी के हाथ में पकड़ाया और कहा स्वामी जी आपको इससे ज्यादा अच्छा क्लीन चाहिए अपने से ही कर लीजिए तो अभी वैसे तो थोड़ा ये ह्यूमरस घटना है किंतु सोच कर के देखिए कि य सामान्य साधक किसी स्त्री के साथ में एक फ्लेट में रहेगा और मन में थोड़ा सा भी काम विकार ना आए तो किस ऊंचाई पे किस उच्च स्थिति पर व सिद्ध है वो हम इमेजिन करके वो समझ सकते हैं तो यहां पर भी तोतापुरी ने कहा कि स्त्री और पुरुष का भेद जिसके मन में बिल्कुल दूर हो गया है माने दो तरह से एक तो है कि स्त्री और पुरुष का भेद है और बड़े ही सावधान रहते हैं एक मने वो तो तभी भी जेनुइन केस हो गया एक ऐसा भी केस हो सकता है कि स्त्री पुरुष का भेद है वैसे मन में और मन में किंतु मुंह पर ऐसा दिखाता है कि नहीं मैं तो भाई अभी ब्रह्मज्ञानी हो गया हूं मैं जो चाहे वो करूं अपने ऑर्डर में ये एक कहानी बड़ी ही प्रसिद्ध है कि एक किसी एक साधक को मैजिस्ट्रेट के सामने जाकर के खड़ा करवा दिया अभी मैजिस्ट्रेट ने पूछा कि अरे तुम ये सन्यासी के कपड़े पहने हो और तुमको शर्म नहीं आती किसी स्त्री के साथ में इस तरह का अत्याचार करते हुए तुम ऐसा कैसे कर दिया तुमने तो उसने उत्तर दिया कि अरे मैंने थोड़ी ना किया है मेरे शरीर ने ऐसा किया है तो अच्छा तो वो अभी वेदांत सिखा रहा है वो तो मैजिस्ट्रेट था वो भी बड़ा वेदांती था वो क्या कहता है अच्छा ठीक है मैं आपको छोड़ देता हूं आपके शरीर को फांसी दे देता हूं तो ऐसे लोग जो कि मन में सब गड़बड़ सरब रखे हुए हैं मुंह पे दिखाते हैं तो वो तो बिल्कुल गलत है उससे एक स्टेप ऊपर है यदि मन में भेद है तो उसके बारे में सावधान रहे और फिर सर्वोच्च स्टेज पर आप आ जाते हैं मन से ही सब भेद निकल गए हैं तब आप व्यवहार में इस तरह से व्यवहार कर सकते हैं जैसे कि स्त्री और पुरुष में भेद नहीं है किंतु हमेशा देखिए उसके बाद में भी एक परिस्थिति आती है ठाकुर तो विश्व गुरु है विश्व आचार्य है उनको देख कर के बाकी के लोग सीखने वाले हैं तो दक्षिणेश्वर में लीला प्रसंग में वर्णन है कि जब कोई स्त्री भक्त ठाकुर के पास में आकर के लंबा समय बैठती थी तो ठाकुर कहते थे कुछ देर के बाद में कि अच्छा जाओ यह सुंदर यह काली मंदिर है वगैरह जाकर के प्रणाम करके आओ और तभी भी जद ये स्त्री भक्त खड़ी नहीं होगी तो ठाकुर खुद कोई बहाना कर कर के खड़े होकर के रूम में से निकल आते थे यानी कि ये उससे भी मैंने ये देखना है कि मन में भले ही चाहे स्त्री और पुरुष का कोई भेदभाव ना हो किंतु आपका आचरण देख कर के बाकी के लोग सीखने वाले हैं वे लोग जदी बोलेंगे अरे ठाकुर ऐसा करते हैं जैसे वो नृत्य गोपाल का यह बड़ा ही जग जाहिर किस्सा है कि वह ठाकुर ठाकुर के पास आता था तो भाव में आकर के ऐसा नृत्य करता था ऐसा भाव में चला जाता था ठाकुर उसके बारे में थोड़े से कंसर्न हो जाते थे थोड़े से परेशान हो जाते अरे इतना भाव इसको हो रहा है तो ठाकुर के पास जो स्त्री भक्त आती थी उन्होंने देखा कि अरे इसका तो बड़ा सुंदर भाव होता है ठाकुर खुद मैंने उसकी सराहना करते हैं तो लोग उसमें से एक स्त्री भक्त उनको बार-बार अपने घर ले जा रही है तो ठाकुर ने कहा कि अरे साधु सावधान एक एक दो बार जाना बात बहुत ज्यादा जाना नहीं तो क्या है कि ये उससे भी एक ज्यादा स्टेप है आगे का स्टेप है कि संसार में रहते हैं जगत में रहते हैं समाज में रहते हैं दूसरे लोग क्या बोलेंगे क्या सोचेंगे सब सोच समझ करके हमको आचरण करना है तो यह पूरा किंतु अभी यहां पर है कि ठाकुर को मां के साथ में रहना है इसलिए यह महाराज जी पूरी पूर्व भूमिका बना रहे हैं और देखिए इवन मां के साथ में भी ठाकुर किस तरह से एक प्रभेद बना कर के रखते थे वो वहां पे पाणी हाटी का महोत्सव सभी लोग जा रहे हैं पुरुष भक्त भी जा रहे हैं स्त्री भक्त भी जा रही है बिचारी मां के हृदय में वो तो उने एक हो जाएगा ना कि सब लोग जा रहे हैं कितना आनंद होगा कितना नृत्य कीर्तन होगा मैं क्यों ना जाऊं तो फिर वो किसी के थ्रू मैसेज भिजवाया ठाकुर को कि क्या मैं भी आपके साथ में आऊं क्या तो तो ठाकुर ने कहा उत्तर क्या दिया उसकी इच्छा है तो आए तो जैसे ही माने यह सुना कि ठाकुर ऐसा कहते उसकी इच्छा है तो आए इमीडीएटली मां समझ गई यदि ठाकुर चाहते कि मैं जाऊं तो कहते कि हां वो आए मैंने ऐसा भार पूर्वक कहते किंतु मेरे पर जब छोड़ दिया है तब ठाकुर नहीं चाहते कि मैं जाऊं तो मां ने सामने से कह दिया अच्छा ठीक है मेरी इच्छा नहीं है जाने की तो ठाकुर ने जब ये सुना तो कैसे खुश होए और क्या कहा कि अच्छा ही किया देखो वो कितनी बुद्धिमता है हम लोग यदि दोनों साथ में जा तो लोग क्या कहते हैं कि हंसो हंसी ऐसे छ माने ठाकुर थे परमहंस तो हंस और हंसी ये दोनों आए हैं माने मां को भी तो फिर ठाकुर की तरह ही रिस्पेक्ट देना पड़ेगा ना ठाकुर जहां जहां प भी जाएंगे मां को भी तो साथ-साथ में उतनी ही रिस्पेक्ट पूर्वक ले जाना पड़ेगा तो दूसरे लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे तो ठाकुर इस तरह से बड़े ही सावधान थे समाज में रहते हैं तो समाज की यह जो सब नीति नियम बंधन कानून है उसमें रहना है समाज को तोड़ने के लिए नहीं आए जैसा मने नॉट टू ब्रेक द ओल्ड बट टू रिन्यू व्ट इज ऑलरेडी देयर माने समाज के भीतर में जो अमृत की धारा ऑलरेडी बह रही है उसको संपुष्टि बाकी जो चीजें नहीं ठीक लगती उसको तोड़ देना है जो सही है उसको ही आप बढ़ावा देते रहेंगे तो ऑटोमेटिक जो गलत है वह चला जाएगा तो आगे महाराज जी लिखते हैं तत्वदर्शी तोतापरी ई इहा बो लेन जो तत्वदर्शी तोतापुरी थे ठाकुर के वेदांत भाव के गुरु उन्होंने यह भी कहा था जे रामकृष्ण न्याय निर्विकल्प समाधि मान पुरुष जद निर्विकार चित्ते सहधर्मिणी प्रति स्वीय कर्तव्य पालन करेन तबे ताहा ते धर्म हानि होए ना तोतापुरी ने क्या कहा था श्री राम कृष्ण की तरह निर्विकल्प समाधि प्राप्त महापुरुष यदि निर्विकार चित्त से मन में किसी भी तरह का विकार लाए बिना सहधर्मिणी के प्रति अपने कर्तव्य पालन की सचे होते हैं अपने कर्तव्य पालन करते हैं तो उससे धर्म हानि नहीं होती सहधर्मिणी है सहधर्मिणी के प्रति कर्तव्य है कि उनका पालन पोषण करना उनकी जो भी आवश्यक चीजें हैं वो देना और साथ-साथ में ही उनको धर्म की शिक्षा देना क्योंकि धर्म की शिक्षा ही तो वो पति ही तो पत्नी को देगा माने ट्रेडिशनल रूप से जिस तरह से चला रहा था तो यह सहधर्मिणी को धर्म सिखाना धर्म का पालन करना यह यदि निर्विकल्प समाधि प्राप्त महापुरुष ऐसा करते हैं तो इससे धर्म को कोई हानि नहीं होती यही तोतापुरी ने ठाकुर को सन्यास दीक्षा दी है और यही तोतापुरी यह भी कहते हैं कि यदि सहधर्मिणी है और उनके प्रति जो सनातन धर्म का पालन करेंगे तो इससे धर्म की हानि नहीं होगी यहां पर क्या कहना चाहते हैं कि संन्यास जो लिया है तो संन्यास लेने के बाद में सन्यास धर्म को हानि नहीं होंगी अदर वाइज तो जब तक गृहस्थ है सहधर्मिणी के प्रति अपनी वधु के प्रति कर्तव्य पालन करते हैं उस तो गलत कुछ नहीं है वह तो करणीय है आपको करना ही है किंतु संन्यास लिया है तो संन्यास लेने के बाद में यदि आप ऐसा करते हैं तो गलत कुछ नहीं है ऐसा तोतापुरी सतन आमरा सहज बुझीते पारी ज सरल सत्य निष्ठ और धर्म साधना अनुपम साहस युक्त ठाकुर श्री मा के सादर ग्रहण करया लेन इहा ते तहर बिंदु मात्र खती होई नाई इसीलिए हम लोग सहज रूप से ही समझ सकते हैं कि सरल सत्य निष्ठ और धर्म साधना में अनुपम साहस युक्त श्री राम कृष्ण मां को बड़े ही प्रेम पूर्वक ग्रहण किए थे इससे उनकी साधना में बिंदु मात्र क्षति नहीं है देखिए यहां पर ठाकुर के बारे में क्या कहा है ठाकुर सरल है सत्य निष्ठ है और धर्म साधना में अनुपम साहस युक्त है माने कि धर्म साधना करने में भी हम लोग कभी-कभी कंजरवेटिव होते हैं तो मैंने शक्ति मंत्र लिया है तो शक्ति मंत्र की ही साधना करूंगा जैसे कि ठाकुर ने सर्वप्रथम शक्ति मंत्र त्र लिया था माहाकाली के पुजारी थे इसलिए किंतु इसका अर्थ यह नहीं हिंदू धर्म आपको कभी भी यह नहीं कहता कि आप जिस साधना में है उसी साधना को किए जाइए और कुछ नहीं कर सकते हिंदू धर्म में ऐसा नहीं है इसीलिए आध्यात्मिक जीवन में जो कि बड़े ही साहसी है जैसे कि इस तरह के ठाकुर वह सोचेंगे कि हम लोग जैसे एडवेंचरर्स होते हैं ना वो एडवेंचर स्पोर्ट करके आजकल चला है कहीं आप वो हिमालय में चले जाइए एडवेंचर के लिए कहीं पे यह वाटरफॉल है उसमें से यह काक होती है तो केनो केनो केनो में बैठ कर के वाटरफॉल के ऊपर में से जंप लगाइए कहीं पैराशूटिंग कीजिए कहीं पे नॉर्थ पोल में चले जाइए कहीं प जाकर के आइस स्केटिंग कीजिए कहीं पे हॉर्स राइडिंग कीजिए माने एडवेंचर स्पोर्ट जिससे कि आपके एड्रीनलिन को किक मिलती है ऐसे साहस साहसिक लोग होते हैं तो यहां पे ठाकुर धर्म जगत में वो साहसिक थे वो सोचते हैं कि अरे मैंने हिंदू धर्म की ही साधनाए क्यों य इस्लाम की भी तो साधना कर सकता हूं मैंने मैं क्रिश्चियनिटी की भी साधना कर सकता हूं और उन्होंने किया भी था तो धर्म जगत में साह संयुक्त ठाकुर उन्होंने अपनी धर्म पत्नी के प्रति कर्तव्य पालन के लिए अग्रसर हुए सचि हुए तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री

Question Answer

राम हालांकि इतना सरल है मने मां का जीवन कभी कभी पढ़ते तो इतना सहज सरल है ठाकुर के साथ में रहती थी क्या कौन सी बड़ी बात है ना किंतु मैं कहूंगा कि देखिए मैंने हायर लेवल पर तो दोनों एक प्राण दो शरीर थे इसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु जब हम डे टू डे प्रैक्टिलिटी की बात करते हैं ना तब मां का अपना एक इंडिपेंडेंस था और इस इंडिपेंडेंस का एक्सरसाइज भी मां करती थी और इसीलिए मैं मैं इस तरह से सोचूंगा कि मां की इच्छा होगी जाने की किंतु ठाकुर की इच्छा नहीं है तो फिर आखिर में वो नहीं गई थी माने उनको दुख हुआ होगा मुझे ऐसा लगता है जैसे यहां पे ही हमने देखा ना कि ठाकुर ने मना कर दिया कि वो धार्मिक नाटक चल रहा है तो देखने की क्या जरूरत है तो ठाकुर किंतु समझ गए उनको दुख हुआ है तो वही नाटक का अभिनय करके मां के सामने दिखाया अभी मां को जद दुख अभी इतना आइडेंटिफिकेशन हो गया होता तो मां को दुख नहीं होता दुख नहीं होता तो ठाकुर को अभिनय करके नहीं दिखाना पड़ता माने देखिए व्यवहार में तो इंडिपेंडेंस रहेगा ही अदर वाइज तो क्या होगा स्टोरी नहीं बनेगी मने सब कुछ परफेक्ट है तो फिर स्टो जटिला कुटिला नहीं रहने से व मने मजा नहीं आता तो जटिला कुटिला पात्र ही नहीं है मने प्रसंग भी होते हैं केदार बाबू थे नाने क्वाल पाड़ा के अध्यक्ष वोह मां को एक बार मिलने को गए मां को पूछते हैं बड़ा फेमस प्रसंग है यह पूछते हैं कि मां ठाकुर तो सर्वधर्म संभव सिखाने को आए हैं तो मां ने क्या कहा कि नहीं देखो बेटा ठाकुर आए थे साधना करने के लिए उनके मन में सतत यह था कि एक साधना के बाद में दूसरी साधना करके में किस तरह से उस साधना के अनुसार यह सिद्धि प्राप्त होती है वो जानने की उनमें ये क्यूरियोसिटी थी क्यूरियोसिटी शब्द माने नहीं यूज किया ये मैं पैराफ्रेज कर रहा हूं किंतु यह विभिन्न साधना करके विभिन्न पथ से ईश्वर प्राप्त करने के लिए वो ठाकुर के जीवन का सर्वोच्च मनेय था पहले तो त्याग मने माने पहले ही कह दिया त्याग किंतु साथ में यह भी कहा कि विभिन्न पथ से ईश्वर प्राप्ति करना यह ठाकुर का जीवन का एक बड़ा ही एक लक्षण था उद्देश्य था ऐसा नहीं एक लक्ष कैरेक्टरिस्टिक थी तो माने भी इस तरह से ये रिकॉग्नाइज किया है वो वो एक प्रसंग था ना कि जब ठाकुर कैंसर हो गया था काशीपुर चले गए थे मां अके दक्षिणेश्वर में थी शुरू शुरू में बाद में तो वहां पर गई थी शुरू शुरू में अकेली थी तो भीतर से जो एक ग्रीफ जो होती है ना संताप शोक अरे ठाकुर के साथ में क्या होगा उस समय पता है ना कि एक दिन रात को सपना आया सपने में जैसे कि बहुत सारी डिया एक साथ में टूटती हो धम करके ऐसा शब्द हुआ और साथ-साथ में ही एक वाणी सुनाई दी अशरीरी वाणी कि इस संसार में कौन किसका पति है कौन किसकी पत्नी है कौन किसका है तो जैसे ही यह वाणी सुनाई दी इमीडिएट मां के मन में ऐ एक वैराग्य का एक प्रगट हुआ कि यह जो ठाकुर के साथ में क्या होगा यह चिंता बिल्कुल कुछ समय के लिए चली गई और फिर उसकी तीव्रता कम हो गई अभी पता चल गया है कि ठाकुर का भी लीला संवरण हो रहा है तो यह देखिए कि मने मने एक्चुअल देरर इंसिडेंट कि हमको पता चलता है कि उनके मन में कितने पैरेलल ट्रैक्स है कभी-कभी नहीं पता चलता किंतु ऐसी घटना से पता चल जाता है यह भी है और साथ में यह भी है मैंने अवतार के का तात्पर्य कि जो जो युग होता है ना जो समय होता है उसका एक जेट गेस्ट होता है जर्मन वर्ड है स्पिरिट स्पिरिट ऑफ द टाइम्स अभी आज ये इंडस्ट्रियल इंडस्ट्रियल इजेशन का ये युग है सायंस टेक्नोलॉजी ने अपनी यह जो मेंटल बाउंड्रीज जो है इतनी बढ़ा दी है य पूरे कॉस्मस में एक छोटे से तीन के भर हम है तो यह जो आज के युग की जो विचारधारा है आज के युग की जो फिलोसोफी है उसके अनुसार हम लोगों की एक चिंतन धारा बहती है हम लोगों के मन में कुछ-कुछ प्रश्न होते हैं कि हां यह राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन कैसे होता है ये पॉवर्टी क्यों है समाज में ये जो मैं सतत ये इंडस्ट्रियल इजेशन का ये जो स्ट्रेस है भले ही चाहे हम उसको ना पहचान पाए आज के मॉडर्न एज का ये स्ट्रेस ये बड़े-बड़े इंस्टिट्यूशन में पहले तो क्या इंस्टिट्यूशन थे ही नहीं जो आप गुरुकुल में जाते थे घर में रहते थे खेती काम करते थे वगैरह आज हमारा पूरा पूरा जीवन ना इंस्टीट्यूशनलाइज हो गया है आप स्कूल में जाएंगे एक इंस्टिट्यूशन है जॉब करेंगे या बिजनेस करेंगे तो ये गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन के साथ में सब समय आपको रहना है तो इंस्टीट्यूशनलाइज स्ट्रेस अपने सर पे है तो इसका क्या सोल्यूशन तो यह जो अपनी चिंतन प्रवाह है उसका सोल्यूशन वे लोग देते हैं अब मैं अपने खुद के मन की बात करूं कि मैंने ये मैं हिस्ट्री पढ़ कर के मैं सोचता रहता था कि इसका क्या सोल्यूशन है पॉवर्टी का क्या सोल्यूशन है व्हाई सिविलाइजेशंस राइज एंड फॉल अब जब मैं ने ये लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पढ़ा स्वामी जी का इमीडिएट मैं जो प्रश्न करता था ऐसा लगा कि स्वामी जी मेरे लिए ही ये किताब लिखे हैं वो फट फट फट करके उत्तर मिलने लगे और इमीडिएट मैंने सोचा कि अरे यदि जीवन में कुछ करना है तो इन्हीं को फॉलो करना पड़ेगा तो ये अपनी विचारधारा की जो कहीं जाकर के हम अटक जाते हैं बंद दरवाजे मिलते हैं दरवाजे का ताला टूट खुल जाता है तब हम इमीडिएट उनके फॉलोअर्स हो जाते हैं अभी मैं रामायण महाभारत कितना ही पढ़ूं कितनी ही उच्च शिक्षा हो किंतु मैं जिस पार्टिकुलर रास्ते से सोच रहा था ये जो माने इंस्टीट्यूशनलाइज अपना लाइफ है उसमें कैसे रहना क्या करना शायद हो सकता है कि माने सोल्यूशन होगा गीता तो सब समय के लिए लिखी गई है उपनिषद सब समय के लिखे गए किंतु मीनिंग बाहर करना मेरी बुद्धि के बस की बात नहीं है किंतु यह ये जो कथामृत है लेक्चर कोलंबो टू अल्मोड़ा पढ़ कर के इमीडिएट मेरे बुद्धि के बस में है ये कि मैं समझ लू कि हां मेरे साथ में जो है इशू इसका यह सोल्यूशन हो सकता है तो वो भी एक है कि समय का जो स्पिरिट है उसके साथ में उन्होंने ढल करके उसकी समस्या का उन्होंने समाधान दिया है तो पढ़ कर के थोड़ा सा भी आपका एक क्वेश्चनिंग माइंड रहेगा मुमुक्षा आप इमीडिएट यहां पर आ जाएंगे और यह मुमुक्षु लोगों को इकट्ठा करना ही इनका मेन काम है बाकी तो जो एक साधारण भक्त जन है भक्त समुदाय है वो फिर धीरे-धीरे आता रहेगा तो मुमुक्षु को इकट्ठा करना उनको साधना पथ पर आगे ले जाना ट इज अ मने मेन थिंग इनके लिए मेरा मेरे पास में मने स्टेडी ऑडियंस है मैं किताब मैं मैगजीन में लिखता हूं मेरे ऑलरेडी बड़े मने बड़ा ही वाइड वाचक वर्ग है इसलिए मैं बड़ा मजे से बैठा हूं उनके पास में तो राम कृष्ण ज्योत नहीं था कि लिखेंगे और सब लोग पढ़ना शुरू कर देंगे