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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इस किताब में से हम लोग पाठ और थोड़ा सा चर्चा कर रहे हैं यह चैप्टर प्रकरण उसका नाम है देवीर बोधन अर्थात की देवी का जागरण इस चैप्टर में गंभीरानंद जी महाराज ने हमको विस्तार से बताया कि रामकृष्ण संघ की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना शोड़ी पूजा कि जिसका अवलंबन करके ठाकुर ने यह धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रारंभ किया इस जगत में वेदांत रूपी जो सनातन धर्म था उसको पुनः जागृत करने का जो ठाकुर का जो मिशन है वह जो स्टार्ट हुआ वह इस घटना से स्टार्ट हुआ तो इस घटना का बड़ा ही सुंदर बड़ा ही विस्तृत वर्णन महाराज ने किया और अभी इस प्रकरण का एक आखिरी पैराग्राफ बचा है इसका हम पाठ करेंगे महाराज जी क्या कहते हैं सड़सी पुजार प्राय एक बर परे श्री मां अशु ईया पड़ी लेन शोड़ी पूजा समाप्त होने के बाद में प्राय एक साल मां ठाकुर के साथ में रही थी और उसके बाद में वह बीमार हो गई अस्थ हो गई ठाकुरे द्वितीय रसदार श्री जुक्तो शंभुनाथ मल्लिक डॉक्टर प्रसाद बाबू के डाका इया चिकित्सा कोराई लेन ठाकुर के जो प्रथम रसदार थे वोह थे मथुर बाबू कालीवाड़ा की जो स्थापक थी रानी रामनी उनके जमाता उनके जमाई अभी मथुर बाबू का तो देहांत हो चुका था तो ठाकुर के द्वितीय रसदार थी ये शंभूनाथ मल्लिक तो मां जब बीमार हो गई तब इसी शंभूनाथ मल्लिक ने डॉक्टर प्रसाद बाबू उसको बुला कर के मां की चिकित्सा करवाई थी किंतु कौन फल होई लोना चिकित्सा से कोई भी लाभ कोई भी अ आराम मां को नहीं हुआ अगत दक्षिणेश्वर थाकि ठाकुरे उद्वेग उत्पादन अनुचि मने कोरिया श्री मां श कोलेर परामर्श कमार पुकुर होया जयराम बाटी चलिया गले जब चिकित्सा का कोई परिणाम नहीं हुआ उनकी बीमारी उनकी व्याधि वैसी ही रही तब मां ने सोचा कि ठाकुर को बिना मतलब उद्वेग करके कोई लाभ नहीं अच्छा है कि मैं यहां से जाऊं ऐसा सोच कर के कमार पुकुर के रास्ते से मां जयराम बाटी चली गई अभी यहां पर यह प्रकरण समाप्त होता है अ इस घटना के बारे में जो दो-तीन विचार है कि अभी देखिए कि इन दोनों का जीवन एक दूसरे को समर्पित था ठाकुर मां के भीतर में मां काली देखते थे मां भी ठाकुर के भीतर में वही महाकाली को देखती थी उसी महाकाली का दर्शन करती थी तो क्या ऐसा नहीं होना चाहिए आज जिस तरह से हम लोगों की सोच है कि पति या पत्नी दो में से जो एक बीमार होता है तो दूसरे की फर्ज है उनकी सेवा करने की उनको उनको ट्रीटमेंट देने की या उनकी केयर करने की जनरली ऐसा तो होना ही चाहिए मां को खुद को देखिए कि जब भी ठाकुर को बीमारी होती है मां ठाकुर की कितनी केयर करती है यहां तक कि एक बार जब वह हृदय ने वो तो एक फेमस किस्सा है कि एक बार मां और श्यामा अपनी मां के साथ में श्यामा सुंदरी देवी के साथ में दक्षिणेश्वर आई जयराम बाटी से तो हृदय ने क्या सब उलट पुलट बोल कर के इन दोनों को वहां से रवाना कर दिया बोला कि आप यहां पर क्यों आए हैं किस चीज के लिए आए हैं ऐसा करके जब मां का अपमान करने का शुरू किया तो श्यामा सुंदरी ने सोचा मैं अपनी बेटी शारदा को यहां पर किसके पास में रख के जाऊंगी ऐसा बोलक के वो श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा को लेकर के जयराम बाटी वापस चली गई अब जब ऐसा हुआ उसके काफी समय तक मां फिर दक्षिणेश्वर वापस नहीं आई थी और उसके बाद में क्या हुआ कि ठाकुर की सेवा तो वैसे हृदय करता था किंतु हृदय को तो वो त्रैलोक्य बाबू ने भगा दिया उनकी लड़की की वो छोटी बच्ची की कुमारी पूजा करके वो कुमारी बोल कर के जो पूजा की थी उसके लिए अहित हो जाएगा अपना ये सोच कर के और यहां पर रामलाल दादा थे जो जो भी ठाकुर की सेवा करते थे वो अभी मां काली के पुजारी हुए हैं तो ठाकुर ने मां को बार-बार मैसेज करते हैं कि रामलाल एकन काली पूजरी हुए छ और निजे के एको नामी माहाकाली पुजारी हुए छ आर अमर की दरकार कार सेवा करार अर्थात कि मैं अभी माहाकाली का पुजारी हूं मुझे अभी और बामने दोले मिसे ठाकुर है वो बामुन अर्थात की मां काली जो बाकी सब जो काली मंदिर के वो जो पुजारी वगैरह होते हैं ना वो ब्राह्मण लोग बड़ा मंदिर है बहुत सारी छोटी मोटी पूजा होती है और भी मां का भोग राधना है व अन्न बनाना है तो बहुत सारे कार्य के लिए बहुत सारे ब्राह्मण बड़े मंदिर में रहते हैं तो अभी वह ब्राह्मणों के ग्रुप में जाकर के रामलाल दादा मिल गए हैं और ठाकुर कहते हैं अभी मेरी केयर नहीं कर रहा मेरी संभाल नहीं रख रहा तो मां ठाकुर बार-बार मां को ऐसा जयराम बाटी में मैसेज करते हैं कि तुम आओ अभी मेरी केयर करने वाला और कोई नहीं है तो ऐसा जब ठाकुर ने मैसेज भेजा तब कहीं जाकर के मां जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर वापस आई तो देखिए हमको प्र प्रश्न यह होगा कि ठाकुर को जब खुद को उनकी संभाल लेने वाला कोई नहीं था और मां को मैसेज करके बुलाते हैं कि तुम पालकी करके आना ₹ लगेगा ₹ लगेगा जितना भी रुपया लगेगा मैं दूंगा अब अपने को जरूरत पड़ गई है तब मां की इतनी अभी खबर ले रहे हैं और मां को खुद को अभी बीमारी हो गई है और मां की ट्रीटमेंट चल रही है और मां ने जब ऐसा सोचा कि नहीं ठाकुर को बिना मतलब तकलीफ नहीं देनी मैं यहां से जाऊं तो ठाकुर ने क्या मां को रोकने का प्रयास नहीं किया होगा क्या ऐसा प्रश्न हो सकता है कि यह जो रिश्ता है पति और पत्नी का वह तो समान होना चाहिए पत्नी जद पति की जितनी संभाल रखती है जितनी केयर करती है उतना ही केयर और संभाल तो पति को भी पत्नी का रखना चाहिए और यहां पर तो इन दोनों का संबंध तो उससे भी उच्च कोटि का है जब शोड़ी पूजा के समय दोनों को जब समाधि हो गई तो गंभीरानंद जी महाराज कितना सु र लिखते हैं पूर्ण भाव में अपने आत्म स्वरूप में दोनों का पूर्ण रूप से वह एक दूसरे में समाहित हो गए थे तो अर्थात कि जब अद्वैत भूमि में चले गए ठाकुर मां ऐसा भेद समाप्त हो गया आत्म स्वरूप में दोनों एकाकार एकही भूत हो गए थे तो इतना उच्च कक्षा का उनका वह संबंध था जैसे कि अर्धनारीश्वर भगवान शिव और मा माता पार्वती इस तरह का तो मां जब बीमार हो जा जाती है तो ठाकुर का ऐसा वोह कर्तव्य नहीं बनता कि हां सिर्फ वो शंभू बाबू को बुला कर के सिर्फ एक बार ट्रीटमेंट करवा दिया उसके बाद में जब मां ने कहा कि मैं जा रही हूं तो उन्होंने जाने दिया यह ऐसा ठाकुर ने क्यों किया या तो फिर ऐसा हो सकता है कि हमारे पास में पूरी जानकारी नहीं है ठाकुर ने मां को रोकने का प्रयास किया होगा किंतु मां ठाकुर के बारे में इतना चिंतित है कि ठाकुर मेरी चिंता करते-करते फिर मां काली की चिंता करना भूल ना जाए बोलकर के अभी वह तो मां शारदा ही मां काली है उस बात में कोई प्रश्न नहीं है किंतु जागतिक जगत पे मां की बीमारी है तो मां के बारे में नहीं मां की बीमारी के बारे में सोचेंगे बोलकर के ठाकुर की ईश्वर चिंता में विघ्न न खड़ा हो इसलिए मां चली गई ये डिटेल्स हमको नहीं पता है गंभीरानंद जी महाराज ने इतनी कोई डिटेल यहां पर नहीं लिखी किंतु हम लोग जो कि अपने को मां का संतान सबसे पहले गिनवाला पहले मां के संतान है तो जब हम मां और ठाकुर के जीवन का विश्लेषण करते हैं तो मेरा खास करके ऐसा है कि इस दोनों की जीवनी को मैं मां के दृष्टिकोण से देखता हूं लीला प्रसंग देखेंगे लीला प्रसंग शरत महाराज ने ठाकुर के दृष्टिकोण से लिखा है और यह किताब है गंभीरानंद जी महाराज ने मां के दृष्टिकोण से लिखी है तो ठीक है जब तक जहां तक ठाकुर की खुद की साधना हों का प्रश्न है ठाकुर अकेले-अकेले रहते हैं या तो फिर यह अपने लड़के शिष्यों के साथ में रहते हैं तब तक हम ठाकुर को उनके दृष्टिकोण से देखेंगे जितनी भी घटनाएं हो रही है किंतु जब मां और ठाकुर दोनों की सहिया री बात है तब तो मैं मेरा पर्सनल ऐसा है कि मैं मां के ही दृष्टिकोण से इन सब घटनाओं का एनालिसिस करता हूं ठाकुर के दृष्टिकोण से कर सकते हैं उसमें भी एनालिसिस करने को बहुत कुछ मिल जाएगा किंतु मेरा है कि मैं मां के दृष्टिकोण से करता हूं और यह घटना को पढ़ कर के और ऐसी कई घटनाएं हैं ठाकुर और मां के जीवन में जब हमको थोड़ा सा कष्ट होता है कि ठाकुर को मां की जितनी संभाल करनी चाहिए थी जितना केयर करना चाहिए था उतना शायद उन्होंने नहीं किया इसके पीछे क्या जवाबदार है व्हाट इज अ मने क्या-क्या पॉसिबिलिटीज है उस समय का माहौल ही ऐसा था पुरुष प्रधान के पुरुष की ही चिंता स्त्रियों को सबसे ज्यादा होती है पुरुष स्त्री की चिंता कम करते हैं ऐसा था कि क्या था जो भी है अभी ठाकुर और मां तो यह सब समय और काल के परे थे तो उस समय का इस तरह का विधान है बोलकर के थोड़ी ना इन दोनों को उसको फॉलो करना है तो जो भी है बहुत सारा कुछ स्पेक्युलेटिव हमने देखा है कि मां ने अपना सर्वस्व बलिदान करके सर्वस्व सैक्रिफाइस करके ठाकुर की ही चिंता सबसे पहले की है ऐसे बहुत सारे उदाहरण है जबकि ठाकुर मां के बारे ब में चिंतित दिखते हैं किंतु मां का ठाकुर के लिए जो सैक्रिफाइस है इट इज सो ग्रेट वो इतना बड़ा है कि ठाकुर का मां के प्रति जो सैक्रिफाइस है उसके सामने थोड़ा सा छोटा पड़ जाता है तो यह मेरा एनालिसिस है सभी लोग पढ़ कर के अपना अपना एनालिसिस कर सकते हैं व सभी को इस तरह का फ्रीडम है तो यह प्रकरण समाप्त हुआ देवी का बोधन इसके बाद का प्रकरण है देवाधि देव के आधीन मां का जीवन इसके बाद में मां जयराम बाटी जाती है दक्षिणेश्वर आती है फिर से जयराम बाटी जाती है ऐसा आना जाना मां के जीवन में लगा रहा क्योंकि ऐसा तो नहीं हुआ कि मां कंटीन्यूअस दक्षिणेश्वर में रहे कोई भी प्रसंग है कोई भी प्रॉब्लम है या कुछ भी है मां को वहां पर जयराम बाटी जाना पड़ता था तो उसी दिनों की यह सब घटनाएं और साथ-साथ में देखिए कि अभी यहां पे यह तो पूरा चैप्टर हमको मां के दृष्टिकोण से दिखा गया है लिखा गया है ठाकुर के दृष्टिकोण से देखें तो हमको पता है कि लीला प्रसंग में इसके बाद में सबसे इंपॉर्टेंट चैप्टर आता है ठाकुर का गुरु अभी ठाकुर का गुरु भाव अर्थात क्या ठाकुर का तो पहले से ही गुरु भाव था अवतार वरिष्ठ है बचपन से ही देखे कि चीनू सांखारी वगैरह के ऊपर में उनकी कृपा बरसती रही है जब वह साधक थे साधक भाव में थे तब भी अपने गुरुओं के प्रति भी उनकी साधना पूर्ण करवाने के प्रति उनकी दृष्टि थी हालांकि चाहे वह सब यह सब कॉन्शियसली ना सोचते हो माहाकाली सबकॉन्शियसली उनके पास में से करवाती हो किंतु गुरु भाव तो था ही जब तोतापुरी एकदम दृढ़ वैदा थे और यह सब शक्ति शक्ति को स्वीकार ही नहीं करते थे तब कहीं जाकर के उनके पेट में जो दर्द हुआ वह गंगा में आत्महत्या करने के लिए गए पानी कमर के ऊपर में ही नहीं आ रहा गंगा में चाहे जितने भी जाए आखिर में उनको अकल हुई क्या अरे यह माया के राज्य में है माया शक्ति के इलाके में है शक्ति को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा अर्थात ठाकुर तो गुरु भाव में थे ही थे किंतु सड़सी पूजा के बाद में यह जो प्रकाश जो हुआ गुरु भाव का जैसे कि प्रचंड अग्नि की तरह किंतु जिसका ज्योति स्निग्ध है शरीर को जलाता नहीं है मन को जलाता नहीं है मन को शीतलता देता है इस तरह की शीतल ज्योति की तरह कलकाता का यह जो मध्यम वर्ग है मिडिल क्लास के यह सब कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के इनके ऊपर में ठाकुर का प्रभाव विस्तारित होना शुरू हुआ और इसके बारे में सबसे इंपॉर्टेंट घटना कौन सी है ठाकुर जब केशवचंद्र सेन की मुलाकात करने के लिए जाते हैं ठाकुर ने कहा हृदय को कि मैं केशव के सा साथ में मिलना चाहता हूं उसके साथ में मुलाकात करना चाहता हूं तो तुम मुझे ले चलो और वह जो घटना का वर्णन ब्राह्मण समाज के लिटरेचर में इतना सुंदर रूप से दिया हुआ है हमने डिस्कस किया है कि किस तरह से पहले तो हृदय आया सब ये लोग सब वहां पर स्नान का उद्योग कर रहे थे केशव सेन और उनके सब बंधु बांधव गण उस समय हृदय आकर के कहता है कि मेरे मामा भी है जो कि ईश्वर का नाम लेते हैं और आपके साथ में ईश्वरीय बातें करना चाहते हैं तो केशव सन ने कहा कि गरीब अभरण अनपढ मां काली का पुजारी है तो किस तरह के सुपरस्टिशन में डूबा होगा पता नहीं किंतु ठीक है अभी आए हैं तो चलो ले आओ और ठाकुर ने आकर के ही सबसे पहले कहा देखी री लेज खोश ज अर्थात कि इसी की पूंछ निकल गई है ऐसा मैं देख रहा हूं तो सभी लोग हंसने लगे कुछ-कुछ नाराज भी हो गए इतना विश्व विख्यात केशव सेन की पूछ निकल गई ऐसी क्या अपमानजनक बातें करते हैं ये अनपढ पुजारी काली का तब केशव के भीतर में जो संस्कार था वो फट कर के जागृत हो गया उसका उसको इतना विश्व में सम्मान मिला है क्वीन विक्टोरिया के साथ में उसका मीटिंग हुआ है तो ऐसा नहीं कि कोई भी आके मुझे कुछ भी बोल जाएगा संस्कार भीतर में है तो उसने कहा कि नहीं नहीं पहले तो उनको पूछते हैं कि ऐसा उन्होंने क्यों कहा बाद में जो भी आपको बोलना है बोलना तब ठाकुर ने कहा कि इसका विवेक जागृत हुआ है इसके लिए यह टेड वो जो ये फ्रॉग की तरह वह पानी में भी रह सकता है जल जमीन पर भी रह सकता है संसार में भी रह सकता है संसार के बाहर भी रह सकता है तब ज केशव को लगा कि हां अरे सच में इनके भीतर में लगते हैं अनपढ़ किंतु भीतर में क्या सब आध्यात्मिक खजाना छुपा हुआ है तो उस दिन के बाद से केशव बार-बार ठाकुर के साथ में मुलाकात करने के लिए ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर जाता है वोह एक फेमस घटना कि पूरा जहाज लेकर के अपने ब्रह्म बंधव के साथ में केशव दक्षिणेश्वर आता है कथामृत में बड़ा ही सुंदर वर्णन है मास्टर महाशय भी उस समय वहां पर उपस्थित थे तो ठाकुर आते हैं जहाज में उठते हैं फिर जहाज में वो गंगा में जहाज जाता है नृत्य कीर्तन ईश्वरीय वार्तालाप करते-करते गंगा का भ्रमण करते हैं मैं कभी-कभी सोचता हूं उस जहाज में उपस्थित रहने का मौका हमको मिलता तो हम कितने सद नसीब होते तो सोच के तो देखिए पवित्र सनातन मां गंगा हमारी पवित्र भारत भूमि की एक चरण रज उसको पखार की कहां हिमाल से समुद्र में आकर के मिलती है वहां पर वह जहाज में वह भ्रमण कर रहे हैं सुंदर ठंडी हवा बह रही है और ठाकुर जैसे युगा वतार स्वयं इसी गंगा के किनारे जिस राम जिस कृष्ण ने विचरण किया था उसी गंगा के किनारे फिर से वही श्री राम कृष्ण आकर के हम भक्तों को उनकी अ अमृतम वाणी सुना रहे हैं कितना मतलब जो लोग उस जहाज में उपस्थित थे वोह ब्रह्म भक्त व मतलब उनका जीवन धन्य हो गया फिर फिर उनको कोई साधना करने की जरूरत नहीं रही इस सब चीजों में मेरा रामचंद्र दत्त वाला अभिप्राय है रामचंद्र ने कहा किय नर क्या सब उल्टी पलटी बातें सिखा रहा है अपने वो त्यागी लड़कों को य त्याग करो घर छोड़ के तपस्या करो अरे क्या है ये सब युगा उतार ने स्पर्श किया है युगवतार की वाणी सुनी है उनका दर्शन किया है और क्या तपस्या रह गई और क्या साधना रह गई मेरा भी कभी-कभी ये इनका वो रामचंद्र दत्त वाला मत है कि यदि हम हमको उनका दर्शन करने का होता तो हम लोग कहां पर बैठे होते किस आध्यात्मिक उच्च शिखर पर हम लोग बैठ गए होते फिर यह साधना बाध यह सब सुबह को उठना यह क्लास करना पढ़ाई करना यह सब कहां पर रह जाता है तो तो देखिए कि ये शोड़ी पूजा के बाद में ठाकुर और मां की ट्रेजक्ड कितनी डिफरेंट जा रही है ठाकुर पूर्ण रूप से जैसे कि यह अध्यात्म का पुनः जागरण करने स्वामी जी की वाणी में कहे तो ब्रह्म कुंडलिनी जागृत कर दी है ठाकुर ने क्यों क्योंकि इससे पूरे विश्व का कल्याण होगा तो यह स्वामी जी की ही वाणी में सड़सी पूजा थी ब्रह्म कुंडलिनी का जागरण और इसको जागृत करके ही ठाकुर ने फिर इस जगत में यह ब्रह्म धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रारंभ किया था तो ठाकुर की ट्रेजे क्टर बिल्कुल कि कलकाता में जाते हैं फिर पहले तो केशव सेन ब्रह्म समाज यों को मिलते हैं फिर केशव सेन ने न्यूज़पेपर में लिखना जो शुरू किया और केशव सेन के ब्रह्म समाज में जितने भी लड़के आते थे कितने सब ये ये राजा महाराज है ना कि ये स्वामी जी है ना कितने लोग ये अपने महापुरुष महाराज है वो ब्राह्मण समाज के पास में ही उनका वो ये था घर था वो वहां पे कमरा लेकर रहते थे तो ये कितने ही लोग सब ये ब्रह्म समाज के प्रभाव से ठाकुर के पास आना शुरू हुए ये ब्राह्मण समाज का जो रोल है अपने संघ में अपने संघ के इतिहास में बड़ा ही क्रिटिकल रोल है कि उस समय में यह जो चर्निंग हो रहा था इंटेलेक्चुअल फिलोसॉफिकल रिलीजियस और स्पिरिचुअल चर्निंग उसको एक डायरेक्शन दिया केशव सेन ने यह ब्राह्मण समाज ने सिर्फ केशव सेन नहीं ये टैगोर फैमिली है इ इन लोगों ने तो प्रथम ब्राह्मण समाज की स्थापना की थी उसके बाद में केशव सन ने इसका विस्तार यह सब किया इसको एक प्रतिष्ठा दी तो यह जो ब्राह्मण समाज था इसको हमको रामकृष्ण संघ को क्रेडिट देनी चाहिए इसको जद थोड़ा सा लैंग्वेज यूज करके कहे प्रोटो राम कृष्ण मिशन ऐसा ब्राह्मण समाज को कि यह राम कृष्ण मिशन के जितने भी एलिमेंट्स थे कि संग बद्ध होकर के पूजा करना प्रार्थना करना व सब यह लंग यंग लड़के जो वहां पर वो इकट्ठा हो यह सब एलिमेंट्स धीरे-धीरे करके ब्राह्मण समाज में इकट्ठा होना शुरू हो गए थे ठाकुर ने सिर्फ आ कर के उसको हाईजैक कर लिया यह जो केशव सेन के बारे में जो य ये जो साधारण ब्राह्मण समाज सेपरेट ट क्यों हुआ कि केशव सेन बार-बार ठाकुर के पास में जा रहा है और ब्रह्म समाज का था कि हम तो निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं तो यहां पे तो केशव सेन का इस तरह से ब्रेन वॉश हो गया है कि वो तो ढोल करताल लेकर के वो तो वो नृत्य करते-करते मां काली का नाम लेता है तो यह लोग तो बड़े ही परेशान हो गए उसमें भी यह जो ब्राह्मण समाज के नियम के अनुसार मिनिमम मैरेज एज ये जो होनी चाहिए शादी करने की मिनिमम उम्र उससे छोटी उम्र में अपनी लड़की की उन्होंने करवा दी तो अभी बाकी लोगों को लगा कि यह सब ठाकुर के ही प्रभाव से हुआ है परमहंस महाशय ने ही केशव सेन का यह ब्रेन वॉश किया है बोलकर के ये कुछ कुछ लोग ये शिवनाथ शास्त्री वगैरह उन्होंने ब्राह्मण समाज को सेपरेट साधारण ब्राह्मण समाज सेपरेट कर दिया तो किंतु देखिए कि वहां पर भी ये विजय कृष्ण गोस्वामी थे जिसको कि ठाकुर ने पकड़ लिया था यानी ये लोग जहां प भी जाए जितना ही नई नई ब्रांचेस इसकी बनाए ठाकुर पहले से जाकर के उपस्थित हो जाते थे और यही साधारण ब्राह्मण समाज के सबसे ब्राइटेस्ट स्टार थे स्वामी विवेकानंद उस समय कॉलेज में पढ़ते हुए लड़के नरेद तो ये साधारण ब्राह्मण समाज में जाते थे वहां पर जाकर के ठाकुर ने इनको कैप्चर करके अपने पास में उठा के ले आए थे तो देखिए कि ये ब्रह्मो समाज सॉर्ट ऑफ ए प्रोटो राम कृष्ण मिशन राम कृष्ण संघ सभी एलिमेंट्स इकट्ठा हो गए थे और ठाकुर ने जाकर के सीधा सधी जैसे कि थाला बना दिया है और खाना वगैरह सब सजा करके रखा हुआ है आपको बैठ कर के खाना खाने की शुरुआत कर देनी है से ही ठाकुर को सब बना बनाया मिल गया था तो यह था शोड़ी पूजा के बाद में ठाकुर की ट्रेजे क्ट्री और यहां पे मां की ट्रेजे क्ट्री देखिए कि मां ठाकुर के भीतर में ठाकुर की व्यक्तित्व में अपने को इस हद तक डाल दिया था कि ठाकुर को छोड़ कर के अपना कोई पृथक अस्तित्व ही नहीं रहा था अपनी आइडेंटिटी ठाकुर के भीतर में संपूर्ण रूप से मर्ज कर दी थी ठाकुर के भीतर में संपूर्ण रूप से समाहित कर दी थी कहां ठाकुर कलकाता में जाएंगे इसके घर जाएंगे उसके घर जाएंगे यह लड़के को मिलेंगे उस लड़के को ब्रेन वॉश करेंगे वह इतने भक्त लोग दक्षिणेश्वर में आएंगे तो उनके सामने नृत्य कीर्तन करेंगे ठाकुर कैसे यह इस जगत में यह जो आध्यात्मिकता का प्रवाह बहना है उसके भीतर में ठाकुर पूरे डूब गए थे और मां इंटर्न ठाकुर के भीतर में पूरी समाहित हो गई थी तो देखिए कि इनडायरेक्टली जद देख जाए ठाकुर को मां का ऐसा साइलेंट सपोर्ट नहीं रहता तो ठाकुर क्या मने सड़सी पूजा तो एक हो गया इवेंट किंतु बाद की घटनाएं देखिए कि ठाकुर को यदि मां का सपोर्ट नहीं रहता जागतिक सम रीते भी कि ठाकुर के लिए खाना बनाना ठाकुर को खाना खिलाना और ऐसा था कि ठाकुर से तो बार-बार भाव में चले जाते थे तो जद खाते खाते भी कुछ भी ऐसा कोई उद्दीपक हुआ कोई प्रसंग या घटना या कोई चित्र उनको दिख गया तो फट कर के ठाकुर समाधि में चले जाते थे तो मां ही एक ऐसी थी कि भुला भुला करके ठाकुर को खाना खिलाती थी मां जाकर के ठाकुर के पास में बैठेगी और खाना खिलाएगी और सब बातें करेगी सब मने इस तरह से ट्रिविया जिसको बोलते हैं ऐसी ट्रिविया बातें करेगी कि ठाकुर का मन इस भूमि पर रहे जागतिक जगत में रहे और एटलीस्ट कुछ खाना उनके शरीर में जाए उनको पोषण मिले तो इसी तरह की एक सुंदर छोटा सा प्रसंग है एक बार ठाकुर ने कहा कि मुझे तो क्या है ना कि बूढ़ा नहीं होना ये सफेद बाल सफेद दाढ़ी हो जाए तो लोग बोल इस तरह से मुझे बूढ़ा नहीं होना मैं बूढ़े होने से पहले ही चला जाऊंगा तो मां को तो यह सुनकर के दुख तो होगा कष्ट होगा तो मां बोलती है कि मां ठाकुर को भुलाने के लिए कि बूढ़ो केनो लोकेरा बोल जो कालीबाड़ी तो एक जन पीर बन साधु से अर्थात कि लोग बोलेंगे कि कालीबाड़ी में एक प्रवीण साधु है तो प्रवीण अभी मां तो वो गांव की भाषा है ना मां की तो पिर बीन प्रवीण को बोलती है पिर बीन कालीबाड़ी में एक पिर बीन साधु है तो अभी ठाकुर भी मां की ही शब्द को लेकर के क्या कहते हैं आमी तो और पिर बन टरबीन होगो ना मैं तुम्हारा पिर बन टरबीन होने वाला नहीं हूं अर्थात कि प्रवीण साधु मुझे नहीं होना है व ठाकुर को पता है कि मां उनको भुला रही है उन्हें वृद्ध नहीं प्रवीण होना है तो वैसे नहीं तो देखिए कि इसी तरह की सब बातें करके मां ठाकुर को बुलाबुला करके खाना खिलाती थी तो ये मां का साइलेंट सपोर्ट यदि ठाकुर को नहीं रहता तो ठाकुर क्या इतना जो जगत उद्धार का जो कार्य था वो ठाकुर कर पाते कि भी नहीं उसके ऊपर में संदेह है संशय है तो यह देखिए कि सड़सी पूजा के बाद में ठाकुर क्या लाइफ पूरा एक डायरेक्शन में जा रहा है मां का एक डायरेक्शन में ठाकुर पूरे जगत कल्याण में लगे हैं और मां सिर्फ ठाकुर का ही चिंतन ठाकुर की सेवा कैसे हो ठाकुर कैसे ठीक रहे उसी चिंतन में लगी है अभी इस दृष्टिकोण से यदि देखें कि हां मां ने सोचा कि अभी मैं बीमार हूं और यदि ठाकुर मेरी बीमारी की ही चिंता करते रहेंगे तो फिर ठाकुर को जिस कार्य के लिए उनका पृथ्वी पर आगमन हुआ है वह कार्य तो शायद वह नहीं कर पाएंगे इसीलिए मां ने सोचा होगा कि मैं यहां से छोड़ कर के मैं जाती हूं किंतु देखिए लॉजिकली तो हमको यह सब प्रश्नों का समाधान मिलता है कि मां क्यों चाहती थी कि ठाकुर उनकी चिंता ज्यादा ना करें क्योंकि मां को तो पता था ठाकुर का पृथ्वी पर आगमन ही हुआ है सर्व जगत के कल्याण के लिए हमारे कल्याण के लिए भक्तों के कल्याण के लिए तो फिर ठाकुर को ठीक अच्छा है कि ठाकुर को फ्री छोड़ दिया जाए वो ये सब उल्ट कोई चिंता ना करके उनके मन को फ्री रखेंगे तब कहीं जाकर के ठाकुर वो सब चीजों में ध्यान देंगे मां यदि बीमार है तो ठाकुर ऐसे उद्विग्न रहेंगे कि मां की बीमारी की बारे में सोचते रहेंगे तो यह जो ब्राह्मण समाज यों का ब्रेन वॉश करना है यह करना है वो सब कोलकाता में जाकर के ये सब शायद ठाकुर ना कर पाए इतना अच्छे से तो ये लॉजिकल उत्तर तो हमको मिलता है किय लॉजिकली तो ठीक लगता है किंतु मन जो है हमारा मन में तो हमेशा यह बात रह ही जाएगी कि ठाकुर ने मां की जितनी चिंता करनी चाहिए थी शायद उतनी नहीं की या तो फिर हमारा लिटरेचर पढ़ कर के ऐसा लगता है तो जो भी है तो यह है ठाकुर और मां का संबंध तो अभी यह चैप्टर जो है देवाधि देव की आधीन मां का जीवन गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं सड़सी पुजार प्राय एक बर परे 1280 साले श्रीमा देश आसेन एवं पर बसर बैशाख मासे दक्षिणेश्वर फिरिया जान सड़सी पूजा के प्राय एक साल के बाद में 1280 बंगा बंगोली साल अपने इंग्लिश यर होगा 187 4 क्योंकि 18 73 में व सड़सी पूजा हुई थी तो 187 4 187 4 में मां देश में अर्थात कि जयराम बाटी में वापस आई थी और उसके बाद में उसके बाद के वैशाख महीने में दक्षिणेश्वर वापस चली आई थी अभी जैसे कि गंभीरानंद जी महाराज ने भी नोट किया है मां कब दक्षिणेश्वर से जयराम बाटी गई कब जयराम बाटी कामर पुकुर से दक्षिणेश्वर वापस आई यह घटना चक्र है उसका संपूर्ण पूर्ण विवरण मिलना मुश्किल है कुछ-कुछ घटनाएं हमको पता है कुछ-कुछ घटनाएं हमको नहीं पता है जैसे कि ठाकुर जब विवाह के बाद में दक्षिणेश्वर वापस आ गए थे उस समय मां की उम्र तो बड़ी ही छोटी थी तो मां तो जयराम बाटी चली गई थी किंतु कभी-कभी जयराम बाटी से कामर पुकुर आती थी कामर पुकुर से फिर जयराम बाटी चली जाती थी तो उन सब दिनों की घटनाओं का विवरण जैसे कि गंभीरानंद जी महाराज ने एक ही चैप्टर में कर दिया था तो वैसे ही यहां पर कब मा जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर आती है दक्षिणेश्वर से जयराम बाटी जाती है उसका संपूर्ण डेट बाय डेट क्रोनोलॉजिकल विवरण तो अभी मिलना मुश्किल है बहुत सारी घटनाएं हैं हमको पता है कि हुई है किंतु कौन से समय हुई नहीं पता एक जनरल टाइम फ्रेम हमको पता है तो सभी घटनाओं का विवरण गंभीरानंद जी महाराज करते हैं लिखते हैं ए कोई मा सेर मध्य तहर शशर गृहे एवं पिा दटी मार्मा कीक घटना घटे यह जो कुछ महीने मां जयराम बाटी में रही थी उस समय मां के खुद के घर में और मां के शसुराल अर्थात की कामर पुकुर में दो बड़ी ही दुखद घटनाएं हुई थी 1200 आशी साले ताश अग्र हाय श्री श्री ठाकुरर मध्यमा ग्रज श्री जुक्तो रामेश्वर इधाम परित्याग कोरेन 1280 बंगा 27 अग्र हायन ठाकुर के मध्यम भरात श्री युक्त रामेश्वर हह धाम अर्थात की मृत्य लोक त्याग करके सनातन लोक में चले गए ए बशर काली मामार उपनयन चतुर्थ दिने राम नवमी तिथि ते अर्थात च चैत्र 26 मार्च 187 4 187 श्री माय रामो गोतो प्राण पितृदेव श्री जुक्तो रामचंद्र लोक त्याग कररिया जा और इसी साल की अर्थात की 26 मार्च 26 मार्च 187 4 काली मामा अर्थात की मां के छोटे भाई उनके उपनयन के चार दिन के बाद मां के पिताजी राम गत प्राण श्री जुक्तो रामचंद्र इस जगत को त्याग करके स्वधा फिरत चले गए पितृ स्नेह ललिता प्रथमा कन्या बुके शैव्य था कतो खानी बाजिया लो ताहा लिखिया बुझाई बारन पितृ स्नेह से लालि प्रथम कन्या मां शारदा के हृदय में इस घटना से क्या आघात पहुंचा होगा यह हमको लिख कर के वर्णन करने की जरूरत नहीं है हम समझ ही सकते हैं संभवत ही वेदना ईते मन के मुक्त करि बार जन्नो श्रीमा एक मास परे दक्षिणेश्वर चोलिया जान संभवतः पिताजी के मृत्यु से जो आघात हुआ था जो कष्ट हुआ था इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिए शायद मां ने एक महीने के बाद में फिर से दक्षिणेश्वर यात्रा करना उचित समझा था तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण
Questions & Answers
मस्तु सब तरह से कि ठाकुर का तो जीवन ही था जगत कल्याण के लिए उनका सेल्फिश तो कुछ नहीं था यदि उनका सेल्फिश इंटरेस्ट रहता तो तो हमको सही में कष्ट होता कि मां की चिंता क्यों नहीं करते किंतु ऐसा तो नहीं था जगत कल्याण के लिए सब कुछ था शरीर मन प्राण सब कुछ इसीलिए तो मां उनके भीतर में वो इतना आइडेंटिफिकेशन ने वाले नहीं है बार-बार पूछते हैं रात को कितनी रोटी खाती हो तो आखिर में मां ने बड़े ही लज्जा से कहा यही चार पांच खाई य चार पांच रोटी खाती हूं तो ठाकुर ने सब पूरा कैलकुलेशन करके देखा कि इतनी रोटी खाती है तो महीने में इतना रुपया रहेगा तो 00 कि इतना कुछ बलराम बाबू को दिया व अपनी जमींदारी में इसको इन्वेस्ट करेंगे और फिर इन्वेस्टमेंट में से चार पाच रुपया सुद जो जाएगा मां को हर महीने देते थे तो ठाकुर तो ऐसे तो थे प्रैक्टिकल तो थे एक तरह से बिल्कुल इंप्रैक्टिकल थे ऐसा तो नहीं था और यही सब देखकर कि ये रामलाल दादा को सब जेलस ईर्षा क्यों हो रही है कि ठाकुर की तो उन्होंने भी सेवा की है ऐसा नहीं है कि सेवा नहीं की है बाम कथामृत में वर्णन पढ़ते हैं बार-बार कुछ भी होता है तो ठाकुर बुलाते हैं अरे रामलाल ये देखो इसका तो लड़का भी हो गया है वगैरह वगैरह तो अभी उन लोगों के लिए ठाकुर ने ऐसी चिंता नहीं की कि उनके लिए कुछ वहां पर रुपया इन्वेस्टमेंट करके जाए मां के लिए किया तो फिर ठाकुर का देहांत हुआ तो रामलाल दादा जाकर के कालीवाड़ा को खजांची को कहते है कि ठाकुर को तो मा की सब संभाल करके गए हैं ठाकुर के बड़े धनी शिष्य है मां को यह सब पेंशन देने की जरूरत नहीं है ठाकुर के जाने के बाद जो ₹ पेंशन मिलता था वो बंद करवा दिया उन्होंने तो ये तो पता ही था ठाकुर को कि क्या बाद में होने वाला है क्योंकि मां को कष्ट करना पड़ा था ठाकुर के जाने के बाद में जो इसी जो वर्णन है जो कामर पुकुर के दिनों का वो जो कुछ एक साल ना कि इतना कुछ कामर पुकुर में मां रही थी बाद में जब श्यामा सुंदरी आई देखा मां फट कपड़े पहने हुई है तो बड़ी नाराज हो गई जाकर के उनको जयराम बाटी वापस ले आई तब फिर बाद में धीरे-धीरे करके किंतु मैंने देखिए बीमारी आती है जगत में तो हम लोग अपना कितना इन्वेस्टमेंट करके रखते हैं कि भाई यह मेडिकल इंश्योरेंस है यह इंश्योरेंस है कुछ भी हो जाए तो ठाकुर ने इतना सब कुछ नहीं सोचा सिर्फ रोटी का बंदोबस्त करके गए तो यह तो कंप्लेन करने जैसा है ठाकुर के प्रति जद इतनी ही प्रैक्टिकल बुद्धि थी थोड़ा और क्यों नहीं सोच लिया ठाकुर के वो जो था ना कि एक बड़ा बड़ा ही लीला संग में बड़ा ही सुंदर वर्णन है कि सबका एक सपना होता है ना एक एस्पिरेशन होती है ठाकुर की एस्पिरेशन क्या थी एक बाल विधवा होकर के लंबे बाल वाली एक बाल विधवा होकर के वो छोटे से गांव में रहेंगे और फिर पास में एक गाय होगी एक छोटा सा बागान होगा गाय का दूध कर निकालेंगे बागान में थोड़ी बहुत सब्जी बनाएंगे और फिर भगवान कृष्ण को भोग रेंगे और अपने से अकेले-अकेले रात को रोएंगे छुप-छुप करके भगवान कृष्ण के लिए और कहीं जाकर सडन भगवान कृष्ण आकर के उनका जो भोग है अन्न वह ग्रहण करेंगे तो ठाकुर की यह जो इच्छा है ना कि इस तरह से कि अकेली बाल विधवा की तरह रहना उन्होंने मां के माध्यम से उसको साकार किया किंतु जैसे ही वो ठाकुर का है ना कि वो मां मां जगदंबा के लिए तो यह सब खेला है यह सब खेल है किंतु हमारी जान जाती है तोसे ये ठाकुर की जो इच्छा थी बाल विधवा के रूप में रहने की मां के पास में उसको पूरा तो करा मां की जान उसका क्या ये सब ये कलकाता से सब भक्त लोग ये गोलाप मां वगैरह जाकर के देखा कि मां कैसी परिस्थिति में रहती है तो कलकाता आकर के सबको भक्तों को बोला सब भक्तों लोग तो आश्चर्य चकित हो गए ये वराह नगर मठ में ये जो सब लड़के बैठे थे अपने त्यागी लड़के वो बोलते हमको तो पता ही नहीं कि मां ऐसी कष्ट परिस्थिति में रहती है तब कहीं जाकर के भक्त लोग सब मां को कोलकाता वापस लेकर आए कि हां मां को कलकाता रखते हैं थोड़ा सा सेवा हम लोग करने को मौका मिलेगा तो ठाकुर को जद इतना प्रैक्टिकल सेंस था तो यह सब क्यों करवाया भाई