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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 14 Sept 2023

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ओम स्थापतयेचा धर्म मनुष्य तो कल हमने देखा भगवान श्री रामकृष्ण देव के जीवन में मधुर भाव का क्या प्रयोजन है किस तरह से उन्होंने साधना करने की शुरुआत की किस तरह से उन्होंने साधना की किंतु यह देखने से पहले यह लीला प्रसंग पुस्तक में से श्री राम कृष्णा लीला प्रश्न हमने देखा की यह मधुर भाव का इतिहास क्या है यह खास करके किस तरह से श्रीमती राधा रानी के जीवन में मधुर भाव का प्रगातीय हुआ और किस तरह से यह मधुर भाव हमारे भागवत में तो लिखा गया किंतु बीच में एक ऐसा लंबा समय आया की हमारे भारत के सड़क शादी का शायद यह विस्मृति हो गए की किस तरह से इस भाव को अपने जीवन में उसका आचरण किया जाए तो इस भाव का पुनः जागरण करने के लिए चैतन्य देव का आगमन हुआ गौरांग महाप्रभु पृथ्वी पर अवतरित हुए फिर से राधा रानी के भाव के जितने भी लक्षण थे उनके शरीर अंग में प्रगति होना शुरू हुए तो ये मधुर भाव आ चैतन्य महाप्रभु ने उसका फिर से प्रचार आरंभ किया नदियां से वेस्ट बंगाल से और यही भाव की साधना ठाकुर ने की तो हमने इस भाव का जो प्रिलिमनरी हिस्ट्री है वो कल हमने लीला प्रसंग में देखा शरद महाराज स्वामी शारदानंद इस पुस्तक के रचयिता है रामकृष्ण देव के साक्षात शिष्य और रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी शरत महाराज तो उनकी लिखी हुई यह किताब श्री श्री राम कृष्णा लीला प्रसंग उसमें अभी हम और थोड़ा सा आगे देखते हैं की मधुर भाव का आचरण भगवान श्री रामकृष्ण देव के जीवन में किस तरह से ये दिखाई देता है हमको है वैष्णव आचार्य गण मधुर भाव के शांत आदि अन्याचारी प्रकार भवर शश समझती एवं तत्व अधिक बोलियां वरना कोरिया वैश्णवाचार्य ने कहा है की मधुर भाव जो है वो बाकी के जितने भी भाभी उनकी समष्टि है और समष्टि के रूप में इसकी वर्णन हुई है अभी हमको ये बात सुनकर के आश्चर्य हो सकता है की आ अभी ठाकुर खुद कहे हैं ठाकुर ने खुद कहा है की ये मधुर बाउ जो है वो सिर्फ वैसा भाव नहीं है ये महाभाव है महाभारत की अभी यशोदा का भगवान कृष्णा के ऊपर में जो मातृ भाव था बाल गोपाल के ऊपर में बाल गोपाल का मां के ऊपर में मां यशोदा के ऊपर में जो संतान भाव था या तो फिर जो सुल्तान के रूप में वह मां यशोदा को देखते थे या तो फिर सुदामा भगवान कृष्णा को शाखा के रूप में देखते थे जो की सखियां भाव है भगवान महावीर का भगवान राम के प्रति दासिया भाव था और ऋषि मुनियों का जो शांत भाव था तो ये बाकी के जितने भी भाव है उन सब भागन की समष्टि हमको मधुर भाव में मिलती है तो ये बात हमको पहले एक प्रश्न हो सकता है की अब ऐसा तो नहीं है की दासिया भाव या तो शांत भाव या तो सच्चे भाव या तो मातृभाव या फिर संतान भाव इतने सारे भाव एक भाव में किस तरह से प्रेरित हो सकते हैं तो इसका स्पष्टीकरण हमको कथामृत में मिलता है रामकृष्ण देव कहते हैं की जो पत्नी होती है अपने पति की जी तरह से सेवा करती है या तो फिर गोपिया भगवान कृष्णा की जी तरह से सेवा करती थी या तो भगवान कृष्णा के प्रति जी तरह से उनका संबंध था रिलेशन था जैसे की वो पत्नी अपने पति को जैसे की वो अपना संतान है इस तरह से उसको खिलाती है पिलाता है इस जैसे की उसकी दासी है उसे तरह से उसकी सेवा करती है जैसे अपना मित्र है उसे तरह से उसके साथ में बातें करती है यानी की बाकी सब भाव का जी तरह का रिलेशन होता है वही सभी रिलेशन की समष्टि महाभाव में एक साथ में प्रकट होती है अभी ये महाभारत समस्त महाभाव की समष्टि हमको श्री राधिका के जीवन में तो देखने को मिलती ही है किंतु भगवान रामकृष्ण देव के जीवन में भी देखने को मिलती है मां काली के प्रति देखिए की भगवान राम कृष्णा देव का जो महाभाव था महाकाली को किस तरह से वो संतान भाव के रूप में देखते थे और अभी ये जो भाव समझती है वो किस तरह से उनके जीवन में यह प्रकट हुई है तो यह भाव समष्टि वैष्णव आचार्य का कहना है जितने भी भाव है सब महाभाव में मिले हुए हैं यहां पर महाराज इसका उसका डिटेल विवरण देते हैं करण प्रेमी का नई का करता शेर न्याय प्रेयर सेवा करें अर्थात प्रेमी का जो नई का है कृत दासी यानी जो उनकी दासी है इस तरह से अपने प्रिया की सेवा करती है शाकिर न्याय शर्मा बा स्थाई था के शुभ परामर्श दानपूर्वक तहर आनंदी उल्लशिता अर्थात शक्ति की तरह अपने पति है उनको वो सूप परामर्श देती है उनके साथ में वार्तालाप करती है और उसके आनंद में वो उल्लासित रहती है वो दुखी क्षंवेदना युक्त हुए वो दुख में संवेदना उसका यदि दुख है तो उसका दुख वह प्रेमिका को भी या तो पत्नी को भी भुगतना पड़ता है वो भुगत्ती है वो समावेदना कितना सुंदर शब्द है वह mp3 इंग्लिश में जिसको कहते हैं की उसका जो दुख है वो भी मेरा भी दुख है इस तरह से वह उसको अनुभव होता है मटर न्याय षटोत्ताहार शरीर मुनीर पोषण एवं कल्याण कामनाएं म्यूजिक तट मां की तरह हमेशा पति के कल्याण कामना के लिए भरण और शारीरिक पोषण को खाना खिलाकर के या तो फिर और किसी भी तरह प्रयोजनीय कार्य है वो करके उसमें वो नियुक्त रहती है एवं कोई रुपए शर्मन प्रकार है अपना के बुलिया प्रिया तो मेयर कल्याण अक्लुटो कोरिया थके वो इस तरह से अपने को उसके कल्याण साधन में संपूर्ण रूप से चित विनोद संस्कृत जैसा है मैंने संस्कृत का थोड़ा बहुत अभ्यास किया है तो वैसे मैं जब पहले बार बंगाली सीखने की मैंने जब शुरुआत की तो बहुत सारे लोग मुझे ऐसा कहते थे की अरे यह जो बंगाली तो जो तुम सिख रहे हो वो ठीक है लीला प्रसंग वगैरा पढ़ पाओगे मां की बातें वगैरा पढ़ पाओगे क्योंकि वो सब सरल बांग्ला में लिखी हुई किंतु जब तुम लीला प्रसंग पढ़ने क्या आरंभ करोगे तब तुमको पता चलेगा की सही सही बंगाली कैसे किसको कहते हैं और बंगाली में जैसे की साधु बांग्ला और चलित मंगल तो चलित बांग्ला में बाकी सब ग्रंथ लिखे गए हैं खासकर के यह कथामृत कहो ना की मां की बातें मेयर को था मेयर पद प्रांटे श्री मां और जय रामबाती मातृ सनी थे मातृ दर्शन ये सब जितने और अपने राम कृष्णा देव के जितने भी डायरेक्ट भी साइकिल है उनकी स्मृति कथाएं हैं वो सब चलित बांग्ला में लिखी गई है क्योंकि वो तो जो डिस्कस होता था इस का मतलब अभी जैसे की एक बहुत ही सुंदर प्रश्न है अपने सुना होगा विज्ञान आनंद जी महाराज उसे समय बेलूर मठ आए हुए थे और बेलूर मठ की स्थापना हो चुकी थी और स्वामी जी भी वहां पे थे तो एक दिन स्वामी जी ने ब्रह्मानंद महाराज को राजा महाराज को बुलाकर के कहा की राजा देखो की ये गंगा का किनारा है यहां पे यहां पे घाट हमको वंदना पड़ेगा और यहां पे और जैसे की क्या है की लोग आकर के गंगा में ठीक तरह से स्नान कर पे तो एक घाट वंदना है और घाट थोड़ा सा लंबा होना चाहिए बहुत सुंदर होना चाहिए और बड़ा ही स्ट्रांग होना चाहिए जिससे की वो लंबे समय तक टिक पे तो तुम अभी ये जो पेशेंट है विज्ञान महाराज को स्वामी जी हरि प्रश्न उनका नाम था तो वो पेशेंट करके बुलेट थे तो पेशेंट को लेकर के मुझे एक एस्टीमेट हो की क्या होने वाला है इसका खर्चा कितना होगा तो अभी हरि मिर्च को हरि प्रश्न महाराज को विज्ञान महाराज को कंसर्ट किया गया विज्ञान आनंद जी महाराज हमको पता है की वो तो जिला इंजीनियर र चुके थे और कन्स्ट्रक का उनको बड़ा ही अच्छा उनको अनुभव था तो विज्ञान आनंद जी महाराज ने चिंता सोच समझकर के एस्टीमेट दिया की 3000 का खर्चा यहां पे होगा तो स्वामी जी बड़े खुश हो गए और राजा महाराज को बुलाकर के बोलते हैं अरे राजा तीन हजार तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है क्या कहते हो हम घाट बना दें तो राजा महाराज भी कहते हैं की हां चलो यह तो 3000 का व्यवस्था तो हम आराम से कर लेंगे घाट बनाने में कोई असुविधा नहीं होगी अभी ये बात करके वो घाट का वो बनाने का आरंभ किया गया और विज्ञान महाराज जो है वहां पे वो पूरा उसका तवा धन करते थे पूरा सुपरविजन करते थे उसे समय ऐसा हुआ कुछ दोनों के बाद में विज्ञान आनंद जी महाराज को पता चला की उन्होंने 3000 रुपए का जो एस्टीमेट दिया है वो एस्टीमेट कंप्लीट नहीं है इससे तो बहुत ज्यादा खर्चा होने वाला है अभी जैसा उन्होंने उनको जी दिन समझ में आया उसे दिन से तो उनकी रात की नींद भी उड़ गई अब ये स्वामी जी को जाकर के कौन आएगा की अरे हमने आपको 3000 का जो एस्टीमेट दिया था उससे तो कहानी ज्यादा ये खर्चा होने वाला है तो बेचारे बड़े ही टेंशन में ए गए उन्होंने जाकर के राजा महाराज को कहा बड़े डरते डरते हैं की महाराज मैंने तो 3000 का एस्टीमेट दिया है और कम तो भी आधा भी खत्म नहीं होगा तीन हजार तो खत्म हो ही गए और अभी कंप्लीट करते-करते और कितना खर्च हो जाएगा किसको पता अभी हम क्या करें तो राजा महाराज कहते हैं की देखो यह घाट बनाने का कम अभी तो आरंभ हो गया है आधे कर आधे से रोकना उसको उचित नहीं है इस घाट को हम कंप्लीट कर देते हैं बाद में हम देखते हैं की क्या होगा और बाद में मैं जवाबदारी लेट हूं ज्यादा पैसा कल करने की जरूर पड़ी तो मैं जवाबदारी लूंगा और स्वामी जी को भी मैं समझाऊंगा ऐसा बोलकर के राजा महाराज ने इस बात को वहां पे समाप्त कर दिया कुछ दोनों के बाद में स्वामी जी सब एक्सपेंड अकाउंट देख रहे थे तो उन्होंने देखा की ऑलरेडी कंप्लीट नहीं हुआ 3000 का खर्चा हो चुका है तो उन्होंने राजा महाराज को बुलाया की अरे राजा यहां पर तो 3000 का खर्चा दिखा रहा है ऑलरेडी और यह तो घाट समाप्त भी नहीं हुआ तो क्या हुआ ये तुमने तो 3000 का एस्टीमेट दिया था तो अभी राजा महाराज ने तो इतना बड़ा उनका हृदय है की ऐसा नहीं कहा की ये एस्टीमेट तो विज्ञान मां राजनी दिया था उन्होंने पूरा ब्लेम पूरा दोष अपने सर पे ले लिया वो चुपचाप खड़े रहे ऐसा नहीं कहा की विज्ञान पैशन की वजह से इस तरह से हुआ है ये मिस एचडी में पेशेंट की वजह से हुआ है तो राज्य स्वामी जी तो ये बैकग्राउंड शायद इनको इतना नहीं पता होगा वही तो इमीडीएटली गुस्सा हो गए गुस्सा होकर के राजा महाराज को जो गली गलौज देना शुरू किया है उनको इतना उनके ऊपर नाराज इतना दांत है इतना दांत है इस तरह की गली दी है की राजा महाराष्ट्र मतलब वो तो रजत है ना ठाकुर ने उनको कितना स्नेहा पूर्वक कितना प्रेमपूर्वक उनको अपने पास में रखा था जीवन भजन करवाया था जमींदार के लड़के थे सभी लोग उनको जन्म से ही सम्मान देते थे इस तरह का गली गलौज उन्होंने पूरे जीवन में कभी सुना नहीं था इस तरह की दांत उन्होंने पूरे जीवन में उन्होंने सनी नहीं थी तो अभी जब तक स्वामी जी बोलते रहे तब तक तो वो चुपचाप सुनते रहे किंतु फिर बाद में स्वामी जी का जैसे गुस्सा थोड़ा सा ठंडा हुआ अपने रूम में गए और दरवाजा खिड़की वगैरा सब बैंड करके अपने रूम में बैठ गए अभी थोड़ी डर के बाद में जब स्वामी जी का गुस्सा संपूर्ण रूप से शांत हुआ तो वो एकदम टेंशन में ए गए अरे मैंने राजा को यह क्या का डाला राजा तो ठाकुर खुद राजा को इतने सम्मान से रखें हैं अपना मानस पुत्र कहे हैं और स्वामी जी खुद बार-बार कहते हैं की आध्यात्मिकता में राजा मेरे से भी ज्यादा आगे निकाला हुआ है तो इस तरह के राजा महाराज को मैंने इतना बुरी तरह से दांत दिया वो अधीर हो गए और विज्ञान आनंद जी महाराज को बुलाया अरे पेशेंट देखो तो राजा क्या कर रहा है तो विज्ञान महाराज राजा महाराज को मिलने के लिए गए देखा की खिड़की दरवाजा सब बैंड है और तो फिर उन्होंने थोड़ा दरवाजे पे दस्तक दिया थोड़ा सा पुकार की मारा मारा कोई आवाज नहीं ए रहा है तो फिर विज्ञान महाराज जाकर के स्वामी जी को कहते हैं की मुझे पता नहीं वो क्या कर रहा है अपना कैमरा बैंड करके बैठे हैं तो ये बात सुनकर के स्वामी जी और ज्यादा गुस्सा हो गए उसे दिन स्वामी जी के पता नहीं क्या था लोग पहले तो पेशेंट मार आ विज्ञान महाराज को दांत दिया अरे मूर्ख मैंने तुमको बोला था की तुम मुझे खबर लेक दो ऐसा नहीं की दरवाजा बैंड करके बैठे मुझे क्या पता जो दरवाजा खटखटाओ रूम खोलो और बोलो देखो की क्या कर रहा है राजा तो यह दांत का कर के विज्ञान महाराज वापस गए और जोर-जोर से दरवाजा खटखटाना लगे महाराज जी दरवाजा खोलिए दरवाजा खोलिए स्वामी जी आपके बड़े में पूछ रहे हैं तो राजा महाराज ने थोड़ी डर के बाद दरवाजा खोल तो अभी जाकर के उन्होंने देखा तो राजा महाराज अपने बिस्तर पे लेते हुए वो रो रहे थे अभी ये देख कर के विज्ञान महाराष्ट्र सोने ग गए की ये खबर में किस तरह से जाकर के स्वामी जी को डन की राजा महाराजा रो रहे हैं तो इस मीन बाय स्वामी जी अपने कमरे में बैठे थे और अपेक्षा नहीं कर पे देख रहे हैं की डेरी हो रहा है मेरे पास में अभी भी न्यूज़ नहीं ए रहा है तो दौड़ करके आए आकर के देखा तो राजा महाराजा रो रहा है तो उनको रोटी हुए देख करके स्वामी जी भी जोर से चल आउट है और रोना शुरू कर दिया और खाने लगे अरे मैं कितना आदम हूं मैं कितना अधुरचारी हूं की जी राजा को तुमको ठाकुर ने अपना मानस पुत्र करके इतना आधार सम्मान प्रेम दिया था और उसे तुमको मैंने इतना बुरी तरह से दांत ऐसा करके रोना इस तरह से शुरू करती है की राजा महाराजा अपना रोना भूल गए और स्वामी जी को यह सब पूरा आलिंगन करके स्वामी जी को शांत करने उल्टा शुरू कर दिया की अरे भाई तुम तो हमारे मंत्र के मनी हो हमारे शरीर के ऊपर में तुम एक ताज की तरह हो एक राजमुकुट की तरह हो तुम्हारा इस तरह से रोना शोभा नहीं देता और तुम्हारा तो हक है अधिकार है बड़े भाई की तरह की तुम हमको चली हमारी भूल त्रुटि हुई है उसमें रन की क्या बात है ऐसा करके राजा महाराज ऊपर से स्वामी जी को शांत कर रहा है तो स्वामी जी तो रोटी रहे रोटी रहे इतनी क्षमा मांगते रहे और फिर आखिर में थोड़े से शांत हुए और राजा को बोला राजा महाराज को के भाई मेरा अपराध क्षमा कर दो विपरीत ना करूंगा की फिर से इस तरह से मैं गलती ना करूं हाल की स्वैप आई जिससे नो डांटना ऐसा तो कभी होने वाला नहीं था किंतु यह विज्ञान महाराज यह पूरा प्रसंग देख रहे थे पहले से आखिर तक उन्होंने देखा था एस्टीमेट भी उन्होंने दिया था एस्टीमेट गलत हुआ वह भी उनकी सामने वो वो भी उनको पता है की एस्टीमेट गलत था राजा महाराज ने पूरा दोस्त अपने सर पर ले लिया यह भी उन्होंने देखा था और स्वामी जी की दांत इतनी भयानक दांत की और कोई होता तो उसका हार्ट फेल हो जाता ये भी उन्होंने देखा और फिर स्वामी जी जी तरह से रोटी रोटी राजा महाराज की क्षमा मांग रहा है ये भी उन्होंने देखा तो ये प्रसंग का बहुत ही सुंदर वर्णन विज्ञान महाराज ने किया है और ये उनकी स्मृति कथा में लिपिबद्ध है तो मैं जब पहले बार मंगल सिख रहा था तो मुझे लगा था की यह बंगाली तो बहुत ही आसन है मैं फटाफट करके सिख जाऊंगा तो अभी जी बंगाली बाकी सब ब्रह्मचारी मेरे साथ में थे वो मुझे का रहे हैं की अरे भाई ये तो चलित मंगल है ये समझना कोई कठिन बात नहीं है तुम लीला प्रसंग पढ़ो तब तुमको पता चलेगा की सही सही बांग्ला किसको कहते हैं साधु बांग्ला में लिखा गया बंगाली लोगों को पढ़ने में दिक्कत होती है तो मैंने सोचा की होगा अभी इतना जल्दी कठिन वैसे तुम ये जो मुझे इस तरह से डराया गया था बोल करके मैंने लीला प्रश्न को पहले पड़ा नहीं मैंने थोड़ा पहले बाकी सब बंगाली किताबें मैंने समाप्त कर दी बाद में लीला प्रश्न पढ़ने की शुरुआत की और मुझे ऐसा लगा की एक्चुअली बाकी सब किताब चलित बांग्ला में जो लिखी गई है उससे ये साधु बांग्ला समझना ज्यादा आसन है क्यों क्योंकि चलित मंगल के जो शब्द है वो तो मेरे लिए बिल्कुल नए हैं और जैसे की आ कोई भी तरह का एक शब्द हो हमने एक वोट गलत वस्त्र वो हमने डिस्कस किया था अभी समझ में आता है की ये क्या कहना चाहता है किंतु ठीक-ठीक मैन शाब्दिक अर्थ समझ में आता है किंतु उसके पीछे का आइडिया समझ में नहीं आता तो ऐसे चलित बांग्ला में तो कितने ही शब्द है जो की मुझे किसी को कुछ नहीं पढ़ने हैं की अरे भाई इसका क्या अर्थ है किंतु लीला प्रसंग के जितने भी शब्द है ज्यादातर संस्कृत मेज है और फिलोसॉफिकल शब्द है तो अभी जिसने संस्कृत और फिलासफी को पढ़ा है उसके लिए लीला प्रश्न समझना बहुत ही आसन है इसके लिए ये जो सब बड़े-बड़े जो शब्द में पढ़ना हूं तो मुझे कभी भी नहीं होता की इसका क्या अर्थ हो सकता है या तो फिर इसको पढ़ने में यदि कोई तकलीफ हो तो यह यह संवेदना झुकता अर्थात की उसकी वेदना में सही सहयोगी हो करके वो पत्नी जो है अपने पति की जो वेदना है उसमें सहयोग ही होकर के उसे वेदना को वो भी उठी अनुभूत करती है अनुभव करती है जितना की उसका पति कर रहा हो यह जो लैंग्वेज है लीला प्रसंग की उसके एक-एक शब्द को लेकर के हम लोग कितना डिस्कशन कर सकते हैं क्योंकि ये पूरे जितने भी शब्द है हमारे शास्त्र के मध्य से इसको लिए गए हैं और शास्त्र का डेप्थ तो हमको पता है तो ये जैसे बाकी सब जितनी भी किताबें हैं हमको यह स्मृति कथा का यह जो प्रश्न हमने देखा की स्वामी जी का अपने भाइयों के प्रति प्रेम गुरु भाइयों के प्रति प्रेम पूर्व गुरु भाइयों का स्वामीजी के ऊपर में श्रद्धा भक्ति और निष्ठा देखिए राजा महाराज तो जमींदार के लड़के थे ठाकुर के स्वयं मानस पुत्र थे यदि स्वामी जी दांत रहे हैं तो फटकार के वो प्रतिबद्ध कर सकते हैं की भाई ये गलती तो मेरी नहीं है ये गलती तो पेशेंट की है और अभी विज्ञान महाराज की भी ये गलती नहीं गिनी जाएगी ये एस्टीमेट देना हम लोग तो जो लोग इस तरह से प्रैक्टिकल फील्ड में कम करते हैं सबको पता है की एस्टीमेट देने के बाद में कम जब आचार्य आरंभ होता है तो उसका कहानी उसका खर्चा कहां से कहां निकाल जाता है मेरा खुद का अनुभव है जितने भी रामकृष्ण मिशन के साधुओं ने कंस्ट्रक्शन वगैरा एक्टिविटीज में हिस्सा लिया है सबका यह अनुभव है की कभी भी एस्टीमेट के अनुसार कंस्ट्रक्शन नहीं होता और यह पहले भी कभी नहीं होता था जिला इंजीनियर होने के बावजूद इतना सर रोड कंस्ट्रक्शन वगैरा करने के बावजूद यदि मैं विज्ञान महाराज की एस्टीमेट देने में गलती हो शक्ति है तो यह गलती नहीं कहीं जाएगी यह स्थिति जी तरह से चेंज होती है इन्फ्लेशन है यह आपके वह जो डेली वेजेस है जो आप मजदूर को रखेंगे तो वह उनके जो उनको जो देना है प्रतिदिन का उनका मजदूरी वो बढ़नी रहती है कम होती रहती है तो वो तो एक इकोनॉमिस्ट के नियम के अनुसार जो होना है वो होता है तो उसमें किसी का गलती नहीं है ऐसा बोलकर के राजा महाराज प्रतिवाद कर सकते थे किंतु उन्होंने नहीं किया स्वामी जी की बात उन्होंने चुपचाप सुन ली और फिर अपने रूम में चले गए फिर स्वामी जी का भी सामने देखिए की अपने गुरु भाई के प्रति जो संवेदना युक्त यह वहां पर देखिए की वहां पर राजा महाराजा रो रहे हैं यहां पर स्वामी जी को पता चल गया है यह जो सब कॉन्शियस या तो सुपर कॉन्शियस लेवल पर जो रिलेशन होता है तो दूसरा आपका जो प्रियजन है वह क्या अनुभव करता है आप उसको अनुभव कर सकते हैं भले ही आपके सामने वो बड़ा हो भले ही वह कहानी और कहानी पर र उसकी वेदना उसका हसीन उसका उसकी खुशी उसका क्रंदन ये सब कुछ जो है हम अनुभूत कर सकते हैं हम अनुभव कर सकते हैं यह mp3 का एक कनेक्शन एक रिलेशन इन दोनों के बीच में बन जाता है तो ये भालोबासा ये रिलेशन ठाकुर ने अपने गुरु भाइयों में वो बंद करके गए थे इसीलिए यहां पे जड़ी भी हमको ऐसा लगता है की स्वामी जी कितने निष्ठुर्थ है अपने गुरु भ्राता को इस तरह से डांटना किंतु देखिए की यह तो क्या है ना की यहां पे दो चीज है स्वामी जी इस तरह से दांत रहे हैं पैसों को लेकर के इस तरह का एक प्रश्न नहीं बहुत सारे प्रश्न हैं शरद महाराज का एक प्रसंग है उसे समय शरत महाराज को कहा गया था की अकाउंट जो है एकदम परफेक्ट रखना स्वामी जी ने नियम बनाया है शकीरा कोड़ी मां से जा बिना मकर कुड़ी सके जावे ना था की सब्जी का जो रुपया आया है तरकारी का वो मछली खरीदने में नहीं जाएगा मछली खरीदने का जो रुपया आया है वो तरकारी खरीदने में नहीं जाएगा ये एकदम स्ट्रिक्ट अकाउंटिंग रूल्स को मेंटेन करना है तभी ये पब्लिक इंस्टीट्यूशन है उसके ऊपर में लोगों की श्रद्धा बनी रहेगी ऐसा स्वामी जी ने नियम बनाया है अभी ये तो क्या है की शरद महाराज वगैरा तो अभी अभी प्रभु राज या समाप्त करके मठ में आए थे स्वामी जी भी नए आए थे मटकी ये यही तो अभी कुछ दिन पहले स्थापना हुई है कहां वो ब्रह्मानंद में शरद महाराज का मां और खेल रहा होगा और कहां पे वो पृथ्वी पर आकर के ये अकाउंट को लेकर के अभी ये चिंता करनी है तो शायद उनसे शुरू के कुछ दोनों में अकाउंट रखना में थोड़ा सा असावधानी हो गई होगी तो स्वामी जी कोई नजर में यह आया फिर उन्होंने शरद महाराज को जोड़ डांटना की शुरुआत की है और जो प्रत्यक्षदर्शी थे अन्य साधु वह लिखने हैं की यह जो दांत है वो सुनकर के कच्चे पहुंचे के वो जो और कोई सामान्य आदमी राहत तो उसका आर्ट फेल हो जाता इस तरह की रुद्रा रूप स्वामी जी ने धरण किया था और किंतु यहां पे शरत महाराज इस तरह से चुपचाप शांत होकर के स्वामी जी के सामने बैठे हैं पुरी दांत सुन रहे हैं इसके बीच में एक वक्त ए गया अभी स्वामी जी ने इमीडीएटली एबल को संभल लिया भक्ति के सामने तो अपने गुरु भाई को नहीं दांत शक्ति है तो अपना इंटरनल मामला है ये तो भीतर में ही रहना चाहिए बाहर में ही इसका डिस्कशन नहीं होना चाहिए तो भक्ति वह आकर के बेटे सामने में वो भद्र लोग वो जो भी एक जेंटलमैन वो आकर के बैठे हैं और स्वामी जी के साथ में बात करना शुरू किया स्वामी जी ने भी हंसते हंसते उसके साथ में बात करना शुरू किया यह यहां पर शरत महाराज यह अभी तक इतनी दांत सुन रहे थे चुप उन्होंने भी हंसकर के भक्ति के साथ में हंसी मजाक करना शुरू कर तीनों लोग इस तरह से हंसी मजाक कर रहे हैं जैसे की कुछ नहीं हुआ है एक ब्रह्मचारी महाराज चाहे ले कर के आए तीनों ने मिलकर के चाय पिया एकदम जैसे की कुछ हुआ नहीं है पुराने यार दिन मिले हैं और पुराने दोनों की बात याद कर रहे हैं और इस तरह से आनंद कर रहा है जैसे की वो पुराने दक्षिणेश्वर में वापस चले गए और ठाकुर का गण कीर्तन ठाकुर की वो ठाकुर भी तो नहीं इतने मतलब हंसी मजाक करने वाले थे तो वह सब याद करके वो जैसे की दक्षिणेश्वर में चले गए थोड़ी डर के बाद में ये भक्ति जो है वो उन्होंने प्रयत्न किया उन्होंने वहां से वो चले गए अब जैसे भक्ति चले गए वैसे ही अपनी जी का गुस्सा फिर से वापस ए गया फिर से उन्होंने शरत महाराज को डांटना शुरू किया और शरत महाराज अभी बड़ा जोर से हंसी मजाक कर रहे थे फिर से चुपचाप शांत हो गए स्वामी जी की दांत सुन रहे हो यह देख करके थोड़ी डर के बाद में स्वामी जी कहते हैं अरे जा इसको बोलने का कोई अर्थ नहीं है और मच्छर रुक तो मछली का रक्त है मछली के जैसा खून है मछली का खून ठंडा राहत है तो इसका भी खून इतना ठंडा है की इतनी दांत सुनकर के ना ही नाराज होता है ना ही कोई रिएक्ट करता है इसको डांटना का क्या मतलब है तो स्वामी जी बहुत-बहुत में पीछे के पिछले के उन उनका जो आखिरी समय था महाप्राण के आगे का स्वामी जी थोड़े से आढ़ीर हो गए थे उनको लगता था की ठाकुर का यह जो संघ जो है उसकी स्थापना उन्होंने की है वो उतना झड़प से उतना गति से प्रभु उसकी उसका डेवलपमेंट नहीं हो रहा जितना वो इमेज वो चाहते थे तो इसके लिए वो दुखित होकर के या तो फिर उत्तेजित होकर के वो अपने गुरु भाइयों को दांते थे किंतु गुरु भाइयों के प्रति उनका स्नेहा और प्रेम ऐसा था की यदि किसी गुरु भाई के मां में थोड़ा सा भी दुख कष्ट हो इम्मीडिएटली उनको समझ में ए जाता एक और दांते थे एक और प्रेम भी करते थे ब्लू मठ में नियम बनाया गया की जो मंगल आरती में नहीं आएगा भिक्षा करके खाएगा राजा महाराज खुद मंगल आरती में एक दिन नहीं ए पे तो स्वामी जी ने कहा राजा यह तो नियम सभी के लिए है तो मानस पुत्र हो की मठ के प्रेसिडेंट हो जो भी हो तुमको भिक्षा करनी पड़ेगी तो राजा महाराज ठीक है नियम तो नियम है भिक्षा करने के लिए गए भिक्षा करके दोपहर को पूरे पसीने से और नहा करके वापस आए हैं क्लाइंट तक गए हैं पूरे आकर के देखा तो पेड़ के नीचे स्वामी जी खड़े हैं बड़े हसीमुख हंसते-हंसते बोला की राजा तुम भिक्षा ले हो चलो भिक्षा का एन खाता हैं स्वामी जी ने किचन में जाकर के खुद ने भी खाना नहीं खाया था वो र देख रहे थे गुरु भाई कब आते हैं कहते हैं की भिक्षा का एन बड़ा पवित्र एन चलो मिलकर बैठ करके बैठ करके खाता हैं तो जी तरह से उनको अनुशासन करते थे जी तरह से उनको दांते थे उतना ही प्रेम उनके मां में अपने गुरु भाइयों के प्रति था तो यह समावेदना युक्त यह समावेदना एंपैथी या तो फिर यह भालोबासा प्रेम का कनेक्शन यह उनके मां में उनके प्रति था तो ये महाभारत जो होता है मधुर भाव इसमें सभी तरह के भावों का सम्मिश्रण होता है इसीलिए महाराज जी एक के बाद एक वो बताते हैं संवेदना जुक्तो हुए शख्सियत न्याय शर्मा बस स्थाई था के शुभ परम वर्ष दानपूर्वक कहां आनंद उल्लशिता और दुखी क्षमावेदना जुक्तो हुए सखी की तरह पति की सब अवस्था में उसको अच्छा परामर्श देकर के उसके आनंद में उल्लासित होती है और दुख में दुखी होती है मटर न्याय शक तोहार शरीर मनेर पोषण एवं कल्याण कामनाएं निजुक्ता तक मां की तरह हमेशा पति के शरीर और मां के पोषण में और कल्याण कामना में नियुक्त रहती है एवं रुपेश शर्मा प्रकार अपना के बुलिया प्रिया ट्यूमर कल्याणपूर्वक तहर मौन अपर्बो शांति से अक्लुटो कोरिया थे और इसी तरह सब तरह से अपने को भूल करके अपने प्रियतम के कल्याण साधन और चित्र विनोथन पूर्वक कल्याण साधन और चित्र विनाेधनपुर जैसे सब संस्कृत शब्द है बड़े-बड़े वो सब शब्द है वह बंगालियों को शायद लगता होगा की यार ये इतने मतलब कठिन शब्द महाराष्ट्र क्यों प्रयोग करते हैं किंतु यदि आप थोड़ा सा संस्कृत साहित्य जिसको कहते हैं उच्च कक्षा का साहित्य यह गुजराती भाषा में हो एन की कन्नड़ एन की तेलुगू भाषा हमारी नॉर्थ इंडियन लैंग्वेज तो फिर भी ठीक है संस्कृत जैसी लगती है किंतु आप साउथ इंडियन लैंग्वेज में भी देखेंगे की वहां पर भी जो एकदम एक जिसको स्टैंडर्ड लिटरेचर कहते हैं क्लासिकल लिटरेचर कहते हैं उसमें भी संस्कृत के शब्द ज्यादा से ज्यादा आने की शुरुआत हो जाएगी क्योंकि संस्कृत जो है साहित्य और दर्शन का आधार है साहित्य और दर्शन का महासागर है और इस साहित्य और दर्शन के महासागर में डब लगानी है तो आप किसी भी लैंग्वेज में लिख रहे हो चाहे गुजराती हो ना की बंगाली हो ना की हिंदी नेकी कन्नड़ एन तेलुगू आपको संस्कृत साहित्य से संस्कृत भाषा में से शब्दों को अपना ना होगा और जैसे जैसे संस्कृत शब्द ज्यादा आते जाएंगे वैसे ही उसकी पेन इंडिया अपील ये इंग्लिश शब्द है पेन इंडिया अर्थात जो इंडिया अपील उसकी बढ़नी जाएगी किसी भी कलर से कोई सड़क किया उसका वाचन रीडर आएगा वो उसे साहित्य को उतना ही अच्छे से समझ पाएगा मेरे लिए शायद चलित बांग्ला में जो लिखा है उतना समझना जितना कठिन था उससे किंतु कहानी आसन ये संस्कृति बहस लीला प्रसंग है उसको समझना है क्योंकि ये इसका जो आधार है वो पूरा भारतीय दर्शन साहित्य भारत के जितने भी अवतार है उनके जीवन चरित्र जी हमारी जो सही-सही मातृभाषा है संस्कृत उसमें से ज्यादातर शब्द है यहां पे लिए गए हैं कल्याण साधन और चित्र विनोद धन पूर्वक उसके कल्याण की कल्याण की साधना करने के लिए साधन करने के लिए कल्याण सठित करने के लिए और चित का विनोथन करने के लिए तहर मौन अपर्बो शांति से अक्लुटो कोरिया उसका मां अपूर्व शांति से आप की फ्लड इंग्लिश का इंग्लिश में इसका अर्थ होगा फ्लड उसके मां को वो सूक्त कर देगी उसके मां को वो भरपूर कर देगी j9 का ₹1 प्रेमभाबे आत्मविश्रुत्व हुई या प्रिया कल्याण और सुखेर दिखे शरबतों भावे निर्बाध दृष्टि हो या था केन तहर प्रीमय सर्वश्रेष्ठ एवं तीन आई समर्थ प्रेमी का बोलियां भक्ति ग्रंथ है निर्देश तो हो ही अच्छे जी नाइक के इस प्रेम भाव जो नई का इस तरह के प्रेम भाव में आत्मविश्वमृत अपने को भूल करके उसके प्रेम को ही सर्वश्रेष्ठ प्रेम को ही सर्वेश प्रेमी को ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान करती है जानती है तीन ही समर्थन इस को समर्थन नई का बोलकर के भक्ति शास्त्र में निर्दिष्ट भक्ति शास्त्र में उसको निर्दिष्ट किया गया है भक्ति शास्त्र में उसे तरह से उसकी अच्छाई का या तो की व्याख्या की गई है ओम शांति शांति