Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Agamani Songs ·

आगमनी गीतों का अर्थ || माँ पार्वती और माँ सारदा || दो युग - एक लीला || 17 Sep 2025

देवी स्तुति

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः पहले तो स्टार्ट करेंगे लाली दी आप स्टार्ट कर रहे हैं तो स्वाहाम स्वधा तम बस स्वरा सुधा नित वधा मात्रा अध मात्रा नित्या तमे साम सा तम देव जननी प्यते विश्व वती जगत पत देवी नम सर्वदा सृष्टि रूपातम स्थित रूप पालनी तथा संगीति रूप जगतोस जगतय महा विद्या महामाया महा महा स्मृति महा मोहा महापति महादेवी महासुरी प्रक सर्वस्य गुरया विभा काल महत्री मोह सदा व श्रीश्वरी वम बुद्धि बोध लक्षणा लज्जा पुष्टि सखा दुष्टि सं शांति शांति रे बचा हरि त्रिशूलनी कोरा गनी चाणी तथा शंख चा सम्येश सम्यति सुंदर री पराम परमा तमे परमेश्वरी य सच वस्तु सवा विला तस सर्वस्या या शक्ति साम किम सुयसे यया जगत सष्टा जगत पाता जगत सो निद्रा बस कसोत महेश्वर विष्णु शरीर ग्रहणम तस कस्तुत तुम शक्तिमान भवे स्वात प्रभा सदा संता मुहा दुरा बसो मधु प्रभु जगत स्वामीता तो गोस प्रियता ह महासुरम जगत स्वामी प्रियता बोधस प्रियता त महा सुर थैंक यू लाली दी वेरी गुड

देखना हो, सुनना हो या ध्यान करना — सदैव हृदय में करो

आज सुबह को मैं समुंदर के किनारे बैठा हुआ था वॉकिंग के लिए जाता हूं। समुंदर का किनारा है तो अ वहां पे कभी-कभी बैठता हूं रेती के ऊपर में और सूर्योदय होता है तो दर्शन करता हूं। तो आज सुबह मैं वहां पर बैठा हुआ था। उगते हुए सूर्य का दर्शन कर रहा था। एकाएक मेरे मन में विचार आया कि जब हनुमान जी को महावीर हनुमान को भगवान राम का अपने पूरे देह में मन प्राण में भगवान राम व्याप्त है वह दिखाना था। तो उन्होंने हृदय चीर करके दिखाया नहीं कि कपाल ची चीर करके अर्थात कि हृदय जो है वो आध्यात्मिकता का वो किला है हृदय है आध्यात्मिकता की सीट और ब्रेन जो है वो है कर्म की जगह तो मैंने सोचा कि ऐसा क्यों नहीं मैं ट्राई करता हूं कि मैं सूर्योदय को अपने हृदय से देखने का प्रयास करता हूं। ब्रेन को शटडाउन कर देता हूं कुछ समय के लिए और हार्ट से देखता हूं कि सूर्योदय दिखता है कि नहीं। एनीवे ये एक म इट वास वेरी गुड एक्सपीरियंस एक्चुअली मतलब थोड़ा सा ट्राई करके देखा थोड़ा सा विचित्र लगता है। किंतु देखिए कि यह जो आध्यात्मिक गान है, भजन है, कीर्तन है, यह जो देवी स्तुति है, हम लोग अपने ब्रेन से नहीं सुनकर के अपने हार्ट से सुनने का प्रयास करें। ब्रेन को थोड़ा सा शट डाउन कर दें कुछ समय के लिए तो देखेंगे कि एक बहुत ही अच्छा अनुभूति आपको होता है। मैंने अभी यह सुनने का ट्राई किया अपने हृदय से हार्ट से कैसे सुना जाता है। हालांकि कान तो है अपने ब्रेन के साथ में एसोसिएट किंतु ऐसा कुछ नहीं है। अपनी कॉन्शियसनेस जो है वो कोई ब्रेन पे नहीं बैठती। हम लोग तो सब कुछ अल्टीमेटली कॉन्शियसनेस तो ग्रहण करती है ना। अपना ब्रेन तो एक इंस्ट्रूमेंट मात्र है। ज्ञान योग में हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि इंद्रियां जो है वो सिर्फ एक हार्डवेयर है। इस हार्डवेयर के माध्यम से यह सॉफ्टवेयर रूपी या तो नॉलेज रूपी यह जो सेंसरी परसेप्शन है हमारे भीतर में प्रवेश करते हैं और अल्टीमेटली तो अपनी कॉन्शियसनेस ही उसको ग्रहण करती है। सो कॉन्शियसनेस का सीट यदि हृदय है तो हृदय से यह सब सुन सकते हैं। आध्यात्मिक प्रवचन, आध्यात्मिक गान और हृदय से देख भी सकते हैं। थोड़ा सा प्रयास करना होगा। तो एनीवे दैट वास वन थ आज का जो स्पेशल जो

बेलूर मठ में मेरी पहली दुर्गा पूजा — एक अविस्मरणीय अनुभव

क्लास है सीरीज ऑफ क्लास आगमनी गीत के ऊपर में हम प्रारंभ किए हैं। देखिए कि पहले तो मैं अपना पर्सनल एक्सपीरियंस बताता हूं। आपको तो पता ही है कि मैं तो बंगाली हूं नहीं और दुर्गा पूजा के बारे में जब तक मैं पूर्वाश्रम में था अपने घर में था तब तक तो यह दुर्गा पूजा वगैरह कहीं न्यूज़ पेपर में कुछ आता है तो देखा था बस न्यूज़ पेपर में पढ़ा था वहीं तक हमारे यहां पे गुजरात में तो यह गणेश पूजा है या तो फिर यह नवरात्रि यह जो नवरात्रि जो कल से स्टार्ट होगा तो वो माता जी की स्तुति वगैरह तो होता है किंतु गुजरात में फेमस है जो कि शायद शायद आपको पता होगा यह गरबा तो यह गरबा वगैरह जो है वह सब तो देखा था नवरात्रि में किंतु यह दुर्गा पूजा जो है ठाकुर की ऐसी कृपा है कि मैं बेलूर मठ में जॉइ करने के लिए आई थिंक मैं फर्स्ट टाइम गया था तो यही यह शरद ऋतु में ही आया था और मेरे आने के बेलूर मठ में आने के एकद महीने बाद ही दुर्गा पूजा थी तो क्या है कि सब ब्रह्मचारियों की ड्यूटी लगती है कि तुमको यह करना है, तुमको यह करना है। मेरा था कि अर्ली मॉर्निंग को पुष्प चयन करके वो मंदिर में देना है। एक बास्केट वह देंगे हमको। फिर वह पुष्प चयन करके वो मंदिर में हम लोग यह बास्केट वगैरह रख देंगे। और फिर और फिर पूरा दिन फ्री है। एक्चुअली जो नए जॉइ करने के लिए आते हैं ब्रह्मचारी उन लोगों के सर पर इतना टेंशन नहीं होता। जितना टेंशन यह सीनियर साधुओं पे या तो ट्रेनिंग सेंटर के ब्रह्मचारी पे होता है। तो फिर ज्यादातर समय मेरा पूरा फ्री ही था। क्लासेस वगैरह तो थे नहीं उस दिन कुछ दिनों के लिए। तो मैं पूरा दिन मंडप में बैठा रहता था। तो वो जो एक इस तरह का आनंद मैंने वहां पे अनुभव किया है कि जिसके बारे में मैं बता भी नहीं सकता। फर्स्ट टाइम अपने जीवन में मैंने दुर्गा पूजा देखा और यह आगमनी गान होता ऐसा था कि दुर्गा पूजा के एक महीने ऑलमोस्ट एक महीने से पहले से हम जो नए आए हुए ब्रह्मचारी हैं उन लोगों को आगमनी गान सीखने की प्रैक्टिस स्टार्ट कर दी जाती थी। तो क्योंकि क्या है मंडप में सबके साथ में एक साथ में गाना है। पहले तो मंदिर में ही स्टार्ट हो जाएगा। उसके बाद में मंडप में गाना है। दुर्गा पूजा का जो मंडप है आप लोग यदि दुर्गा पूजा दर्शन किए होंगे बेलून मठ में तो पता होगा कि एक ओर है गंगा और एक है अपना दूसरी ओर है श्री रामकृष्ण देव का मंदिर दोनों के बीच में जो बड़ी लोन है बड़ा सा मैदान है वहां पर बहुत बड़ा दुर्गा मंडप होता है वहीं पर मूर्ति की प्रतिष्ठा की जाती है मां दुर्गा की और वहीं पर पूजा वगैरह होता है तो मंडप में जब शिफ्ट होगा यह आगमनी गान यह काली कीर्तन श्याम संगीत वगैरह उससे पहले कुछ दिन मेन टेंपल में गाया जाता है और इससे पहले कुछ दिन तक हम लोगों की अलग से एक प्रैक्टिस होती है। तो वहां पर मैंने बिल्कुल पहली बार यह आगमनी गीत सुने थे। आगमनी गीत गाए थे और मुझे इतना अच्छा लगा था। देखिए मुझे उसका अर्थ तो नहीं समझ में आता था क्योंकि मैं तो बिल्कुल नया था। बंगाली सीखने का प्रयास भी मैंने प्रारंभ नहीं किया था। किंतु उसका जो ट्यून है, उसका यह जो राग है, वो इतना अच्छा लगता था और हम लोगों को क्या है? हिंदी स्क्रिप्ट में यह आगमनी गान दिए जाते थे। बंगाली लोग तो बेंगली स्क्रिप्ट पढ़ पाएंगे। हम तो बंगाली स्क्रिप्ट पढ़ेंगे नहीं। तो हिंदी स्क्रिप्ट पढ़प करके हमको साथ-साथ में गाना है। आशय यही है कि ऐसा नहीं है कि आप लोगों को यह जो कल्चरल ये फेस्टिविटी है उस सबको आपका फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस समझाएं। बात यही है कि जब सबके साथ में मिलकर के गाना है तो यह जो कुछ नए आए हुए ब्रह्मचारी हैं वह बिल्कुल ही अलग ही ट्यून में गाना ना शुरू कर दे। सुर को असुर ना बना दे। यही एक आशय था। तो आशीष महाराज उस समय बाद में प्रमेयंद जी के सेक्रेटरी हुए थे। आज अभी आई थिंक कल्याणी आश्रम के हेड है। तो वो हमारे म्यूजिक लीडर थे उस समय मतलब बेलूर मठ में वो जो म्यूजिक इंचार्ज थे तो आज वो शिवािशानंद जी है मोस्ट प्रोबेबबली आई थिंक वो मेरा बैचमेट ही है। तो एनीवे वो जो आशीष महाराज जो थे वो हमको सिखाते थे आगमनी गान। तो इतना सुंदर एक वातावरण बनता था उस समय जब अलग से हम लोग ब्रह्मचारी गाते थे उस समय भी और जब खास करके जो मेन जो पेंडोल में जब वहां पर हमने गाना शुरू किया आगमनी और श्यामा संगीत वो अनुभव वो अनुभूति सही में शब्दों में वर्णना करना मुश्किल है। मेरा जैसा ड्यूटी था कि अर्ली मॉर्निंग को यह फूल चयन करके वहां मेन टेंपल में दे देना। उसके वो उस समय बाय दैट टाइम आई थिंक सूर्योदय होने की प्रारंभ हो जाता था। माने सुबह को आकाश में लालिमा प्रसर जाती थी। जब तक मैं अपना कार्य समाप्त करता था यह फूल चयन करने का बाय दैट टाइम। तो फिर अभी क्या है कि ऑलरेडी हमारे क्लासेस तो ऑफ ही है दुर्गा पूजा की वजह से। तो और उस समय क्या था कि गंगा का किनारा है वह खुला था एकदम आज वह बैरियर वगैरह बना दिया है जैसे कि बच्चे लोग जो है वो पानी में ना गिर जाए वगैरह तो उस समय तो जो जो घाट था एकदम प्लेन था खुला घाट था यहां पे जो लोन है एंड होती है और वहां से घाट प्रारंभ होता है कोई बैरियर नहीं था तो बहुत सारे साधु अर्ली मॉर्निंग को घाट के ऊपर में बैठकर के ध्यान करते थे जप करते थे तो मैं अभी क्या है कि बिकॉज़ कि हम लोग नए आए हुए ब्रह्मचारी हैं। हम लोगों को वहां पे बैठने का ऐसा कोई अनुमति नहीं था। हमको यदि जप करना है, ध्यान करना है तो मेन टेंपल में ही करना है और फिर वहां से सीधा वो ट्रेनिंग सेंटर में वापस आ जाना है। तो उस समय कुछ दिनों के लिए क्योंकि कोई शेड्यूल वगैरह तो था नहीं, टाइम टेबल तो था नहीं। तो मैं वहां पर गंगा के घाट पर गंगा के किनारे बैठा रहता था और सूर्योदय देखता था। ऐसा नहीं कि जप वगैरह कुछ कर रहा हूं। बस यह प्रकृति का आनंद लेता था और उस समय क्या होता था? अर्ली मॉर्निंग को दुर्गा मंडप में यह संस्कृत स्तुतियां प्रारंभ हो जाती थी। तो वहां पे मंडप में इस तरह से स्तुति के बाद स्तुति स्तोत्र के बाद स्तोत्र चल रहे हैं और यहां पे सूर्योदय हो रहा है। गंगा के इतनी विराट विशाल गंगा है। थोड़ा सा उस साइड में देखेंगे तो आपको दक्षिणेश्वर के मंदिर का शिखर दिखाई देगा और यहां पे इतना सुंदर नजारा तो वो इतना सुंदर एक अनुभव था मेरे लिए। मैं पूरा दिन भर अभी ऐसा कोई आवश्यक नहीं था हमारे लिए कि आपको मंडप में ही बैठना है या यह करना है वो करना है। बेलूर मठ में ज्वॉइ करने के लिए जब जाते हैं तो यह एक बहुत बड़ा एक प्रिविलेज होता है। आप मेन ट्रेनिंग सेंटर में होते हैं तो आपकी इतनी सारी ड्यूटीज होती है कि आपको एंजॉय करने का टाइम ही नहीं मिलता। और वहां पर पोस्टिंग होता है तो बाय दैट टाइम क्या होता है? उम्र बढ़ जाती है तो फिर यह सब तो देख लिया है तो हर साल देखते हैं तो यह भी एक देख लिया किंतु आप ज्वॉइ करने को जाते हैं माने उम्र भी यंग होती है इंप्रेशनेबल माइंड होता है एक एंथूजियाज्म होता है लाइफ के प्रति और प्रथम बार देख रहे हैं यह सब और खास करके मेरे केस में और ऐसा ड्यूटी वगैरह कुछ नहीं है। सो इट्स अ परफेक्ट प्लेस टू एंजॉय दुर्गा पूजा। तो ऐसा कोई हमारे लिए आवश्यक नहीं था कि आप मंडप में ही बैठे रहे। किंतु मैं तो पूरा दिन भर या तो गंगा के किनारे बैठा रहता था या तो फिर मंडप में बैठा रहता था। सो इट इज वन ऑफ द बेस्ट एक्सपीरियंस इन माय स्पिरिचुअल लाइफ। और फर्स्ट टाइम फिर जैसे होता है ना धीरे-धीरे जिस तरह से आपका एज बढ़ता जाता है तो यह सब चीजें हमने बहुत देख ली। चलो दुर्गा पूजा तो हर साल होती ही है। मेरा जब बेलूर मठ में पोस्टिंग हुआ था 2015 तो उस समय मैंने सोचा कि अच्छा अभी तो पोस्टिंग हुआ है। ट्रेनिंग सेंटर की तरह ड्यूटी वगैरह तो है नहीं और फिलॉसोफी भी अभी मुझे अच्छे से समझ में आता है। जब मैंने पहली बार दुर्गा पूजा के आगमनी के गीत सुने थे। उस समय क्या था कि बंगाली आता नहीं था। उसके बाद में ट्रेनिंग सेंटर में मैं जब था तो वैसे बंगाली तो आता था किंतु बाकी सब बहुत सारा सर पर रहता है। ट्रेनिंग सेंटर में एक तरह का प्रेशर रहता है। आप इजीली सब कुछ एंजॉय नहीं कर पाएंगे। या तो फिर मेरे साथ में ऐसा हुआ। व्हाटएवर मैं जब किंतु जॉइ बेलूर मठ में मेरा पोस्टिंग हुआ था। उस समय ना ही ऐसा कोई स्पेशल मेरा अलग से ड्यूटी था ना ही ऐसा कोई प्रेशर था सर के ऊपर में और बेंगली और रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य बाय दैट टाइम मुझे अच्छे से समझ में आने लगा

माँ पार्वती और माँ सारदा — दो युग, एक ही दिव्य लीला

था। उस समय जब मैंने फिर से आगमनी गीतों को सुनना और गाना प्रारंभ किया आगमनी और श्यामा संगीत दोनों तब मुझे लगा कि अरे देखिए कि मां के जीवन के साथ में यह मां पार्वती का किस तरह से सादृश्य है। किस तरह से समानता है। देखिए कि जिस तरह से यह शक्ति पूजा का भारत में विकास हुआ है। इवोल्यूशन हुआ है। जिस तरह से देवी की आराधना देवी की स्तुति देवी के जो कार्यकलाप है देवी का जो चरित्र है देवी का जो स्वभाव है वो जिस तरह से भारत में इस हजारों सालों से ऋषि मुनियों ने कवियों ने इस उसको गाया है उसको समझा है हमारे सामने प्रस्तुत किया है उससे जो एक देवी का चरित्र निर्माण होता है एक साधक के सामने एक भक्त के सामने सामने तो यह हजारों सालों का इवोल्यूशन यहां पे आप मां का जीवन देखिए। मां शारदा का जीवन एकदम आपको दोनों के बीच में इस इतना सुंदर एक तादात्म दिखाई देगा। इतना सुंदर दोनों के बीच में आपको हार्मोनी दिखाई देगी कि आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि कितना मतलब कॉम्प्लीमेंटिटी है। ऐसा लगता है कि वही मां पार्वती वही मां दुर्गा फिर से मां शारदा का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुई है और वही शिव स्वरूप श्री रामकृष्ण के साथ में फिर से उन्होंने विवाह किया है। जिस तरह से मां पार्वती ने श्री भगवान शिव के लिए आराधना की थी, तपस्या की थी, वैसे ही आप देखिए कि किस तरह से वो बालिका मां शारदा है। हम लोग बहुत बार सोचते हैं कि ठाकुर ने तो मां का चयन किया है ना सिलेक्शन किया है। जब ठाकुर के विवाह की बात कामार पुकुर में चल रही थी तो ठाकुर उस सब बालक स्वभाव है। वो जैसे कि अपने साथ में कोई रिलेशन ही नहीं है। पूरा ये जो घर में चल रहा है। बहू को खोजने का उनकी पत्नी को खोजने का जो पूरा कार्यक्रम जैसे उनके साथ में कोई संबंध ही नहीं है। वह एक के बाद एक लड़कियों के साथ में वार्तालाप होता है। किंतु कहीं पर भी वह मेल नहीं पड़ता है। तब ठाकुर जैसे बालक स्वभाव में ही कहते हैं कि देखो जयराम बाटी में वो राम मुख की लड़की जो है कुटो बांधा है। अर्थात कि जो फल होता है सीजन में जो प्रथम फल आता है वो ईश्वर को अर्पण करते हैं। इष्ट देवता को अर्पण करते हैं। अभी यह सबसे सुंदर फल है जो कि पेड़ के ऊपर में हो रहा है। उग रहा है। अभी एक किसान देखेगा कि इसको कोई पंखी जो है चोंच वगैरह ना मार दे उसके ऊपर में तो उसको बांध करके प्लास्टिक से वगैरह से किसी चीज से उसको बांध के रखते हैं। यानी कि उसको प्रोटेक्ट करके रखते हैं जिससे कि देवता को अर्पण किया जाए। इसको कहते हैं कुटो बांधा। तो ठाकुर कहते हैं कि वहां जो पात्री है कुटो बाधा आचे अर्थात कि ईश्वर के लिए उनको संरक्षित करके रखा गया है। तो यह कहानी तो सबको पता है वैसे किंतु हमको जब हम मां का जीवन पाठ करते हैं तब हमको एक दूसरी कहानी पता चलती है। वो कौन सी है कि मां शारदा जब सिहोड़ में थी जब छोटी बालिका ही थी और अपनी किसी एक रिलेटिव की गोद में बैठी हुई थी तो वह जो स्त्री है वो कहती है बालिका शारदा को कि अच्छा देखो इतने सारे लड़के हैं सामने किसके साथ में तुम्हारा विवाह होगा तो मां शारदा ने छोटी सी बालिका शारदा ने अपना हाथ उठा के सीधे श्री रामकृष्ण की ओर इशारा करके दिखा दिया अर्थात कि मामला उल्टा है एक्चुअली एक ुअली ठाकुर को कुटो बाधा रख छ माय जनो ठाकुर को जैसे कि संरक्षित करके रखा गया है मां के लिए तो जिस तरह से पार्वती ने भगवान शिव के लिए आराधना की तपस्या की तो वैसे ही मां की जो तपस्या या आराधना या तो फिर देवी शक्ति है उससे आकर्षित होकर के ही जैसे कि श्री रामकृष्ण उनके लिए अटूट चीर बंधन से बंधे हुए थे तो वह तो एक हैं। उसके बाद में देखिए कि किस तरह से वैसे तो मां पार्वती है। वह तो इतने धनी के घर में इतने वैभव में इतने प्रेम में उसका जैसे कि बचपन बीता है। किंतु जब भगवान शिव के वहां पर जाती है तो भगवान शिव तो रहते हैं शशान में। वो भूत पिशाच है उनके सहचर गले में है जैसे कि सर्प की माला और जटा में है जैसे कि शशांक स्वयं तो इस तरह के एक किसी के साथ में अपनी इतनी लाडली पुत्री का विवाह करवा दिया बोलकर के जो पार्वती की मां है उनको जितना जो दर्द होता है दुख होता है उसकी जो यह गीत है उस गीतों में हमको उनका पार्वती वती की मां का जो दर्द है, दुख है, वह छलक करके आता है। तो वही तो जैसे कि मां शारदा के साथ में ही तो हुआ था। जब ठाकुर के साथ में विवाह हुआ उसके बाद में ठाकुर जब दक्षिणेश्वर वापस आ गए तब आए दिन कुछ ना कुछ संवाद आता है दक्षिणेश्वर से कि यह जो गदाधर है वहां पर वह पागल हो गया है। दिगंबर होकर के घूमता रहता है। कभी मामा बोलकर के चिल्लाता है। कभी क्या हरकतें करता है। कभी क्या नहीं करता। तो यह सब कहानियां जय राम बाटी आती है और बेचारी मां को यह सब लोगों के जो यह है कटाक्ष सुनने पड़ते हैं। लोग कहते हैं कि श्यामा मेयर पागला जामायर शंगे बेहोए छ अर्थात कि श्यामा सुंदरी की देवी की लड़की यह शारदा का एक पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है। तो यह प्रति जो यह जो कटाक्ष है, यह जो टाने हैं, वह सब कुछ मां को सहन करना पड़ता था। तो आखिर में फिर मां ने सोचा कि क्यों नहीं मैं खुद अपनी नजरों से जाकर के देखूं कि वह किस तरह के हैं। क्योंकि मां जब वो कामार पुकुर गई थी तो मां ने तो देखा था कि कितना प्रेम से कितना आदर से श्री रामकृष्ण ने उनको ग्रहण किया था। किस तरह से उनको शिक्षा देते थे। किस तरह की उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि है। तो यह तो उन्होंने नजरों से देखा था। किंतु लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं। तो किस तरह से बेचारी मां सहन कर पाएगी। तो वही है दक्ष यज्ञ की कहानी कि जब वह पिताजी अपने पति का अपमान करते हैं तो मां सती उसको सहन नहीं कर पाती और अग्नि में अपना देह त्याग करती है। तो यहां पर मां शारदा है। उन्होंने ठीक किया कि मैं दक्षिणेश्वर जाऊंगी और उनके साथ में मैं उनका दर्शन करूंगी। अपनी नजरों से देखूंगी। किंतु यह जो जिस तरह से मां सती ने अग्नि में अपने को झोंक दिया वही तपस्या मां को मां शारदा को दक्षिणेश्वर जाने के समय करनी पड़ी थी। उसी तरह की तपस्या देखिए हमने गंभीरानंद जी की मां की जीवनी है। उसमें हमने पाठ किया था। जब मां वहां पर जा रही है दक्षिणेश्वर तो रास्ते में मां को बुखार हो गया और कितना मां को उसकी वजह से कष्ट सहन करना पड़ा था। उसके बाद में किंतु मां काली स्वयं वहां पर प्रकट हुई और फिर उन्होंने मां को कहा कि देखो मैं दक्षिणेश्वर से आई हूं। और फिर जैसे ही मां ने ऐसा सुना कि वह दक्षिणेश्वर से आई है तो मां ने कहा कि अरे मैं भी तो वहां पर जा रही हूं। मैं भी तो उनका दर्शन करूंगी। तो फिर मां काली कहती है कि तुम्हारे लिए ही मैंने उनको वहां पर रखा है। तुम ठीक हो जाओगी और तुमको वहां पर जाना है। तो यह आशीर्वाद जैसे ही मिला मां काली का उसके नेक्स्ट डे मां शारदा जैसे कि धीरे-धीरे करके सुस्त होना शुरू शुरू हुई और फिर से यात्रा का आरंभ किया। तो यह जो मां सती की अग्नि परीक्षा और यह मां शारदा का रास्ते में इस हद तक बीमार हो जाना। तो देखिए कि और भी बहुत सारे पैरेलल्स है। हम लोग क्या करेंगे कि एक के बाद एक गीत यह जो गान है मैं लाली दी को कहूंगा कि वो गाएगी और फिर उसका जो एक सहज हिंदी अनुवाद है वो मैं आपको बताऊंगा और फिर उसके बारे में मां के जीवन के साथ में कहां पर वो मैच होता है वो थोड़ा सा हम लोग देखेंगे। अभी यह प्रारंभ करने से पहले पहले से ही मैं डिस्क्लेम अच्छा यह मैंने आपके साथ में शेयर किया है पीडीएफ आपने देखा होगा कि कल ही मैंने अपने ग्रुप में रखा था तो उसके उसको ओपन करके आप लोग भी यह गान को देख सकते हैं साथ में गा भी सकते हैं किंतु अपना माइक ऑफ रखिएगा और उसके बाद में मैं यह हिंदी अर्थ बताऊंगा तो हिंदी अर्थ बताने से पहले यह तो पहला मैं डिस्क्लेमर दे दूं कि मैंने एक किताब अच्छी सी खोजने का प्रयास तो किया कि आगमनी गान जो है उसके हिंदी या इंग्लिश में अर्थ मिलते हैं कि नहीं। इवन यदि बंगाली में भी मिले कि इस यह जो गान है इसका क्या अर्थ है तो अच्छा रहता। मेरे पास में एक ऑथेंटिक सोर्स होता है बताने का कि इसका अर्थ इस तरह का है। जो कवि ने जिस कवि ने इस गान की रचना की है उसने इस भाव से इसकी रचना की है। तो अनफॉर्चूनेटली वो किताब या तो इस तरह का कोई सोर्स मुझे मिला नहीं है। यदि आपको पता होगा तो आप मुझे भेज सकते हैं। अभी जो ट्रांसलेशन जो है वह बेसिकली मैंने ही किया है। इधर-उधर से थोड़ा सा हेल्प लेकर के तो ट्रांसलेशन पक्का है। इस तरह का कोई गारंटी मैं नहीं दूंगा। दूसरी बात कि मैं इसका जो अर्थ कर रहा हूं आगमनी गीतों का तो अगेन मैं वही डिस्क्लेमर पहले कर दूं कि बंगाली मेरी लैंग्वेज नहीं है। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य बंगाली में जो है उसको मैं अच्छे से समझ सकता हूं क्योंकि इसके पीछे की फिलॉसोफी जो है वह मुझे समझ में आती है। किंतु यह जो आगमनी गीत है या तो श्यामा संगीत है वह जिस भाव से लिखे गए हैं वह शक्ति साधना तो वो शक्ति साधना में मेरा कोई इतना डीप रीडिंग नहीं है कि मैं आपको सब कुछ परफेक्ट बता पाऊं। तो विद दिस डिस्क्लेमर हम लोग प्रारंभ करते हैं। आप देखेंगे कि मैंने आपको जो पीडीएफ दी है

आजी शंखे शंखे मंगल गाओ जननी एशेछे द्वारे

उसमें सबसे पहला गीत है शंखे शंखे मंगल गाओ जननी ऐसे छे द्वारे। अच्छा अच्छा खूब भो हां महा श्वेता दी काजी शके शके मो गा जननी छारी आज शखे शखे मंगल गा जननी ऐसे छे शधु पल लो शधु पल लो पेजे छे श तारे जननी छे दारे आज शखे पंखे मंगल गा सुर शो तुले छे तान श ऋ सुर शो तुले चेत तान शब्द ऋषि गाने शो स्वर्ग दूर टाने शु श स्वर्ग धुहे रूप तानी अंतर आज शक्त सुर नव जागो रण सुरे जननी ऐसे से द आज शखे शख मंगल गा सात रांगा रूपी राम धनु हाथ मरने रोने शब्द कोटि सुानो विजय मान लो सात रांगार राम धु हाथ मरने बा श कोटि छू संतानो विजय माल आ तीर्थ एक साथ हो रिद्धि मंदिर दारी शो तीर्थो श मंदिरों दारे शो तीर्थो रक्षा हो रिधि मंदिर दारे तुले ना बुके तारे जननी से तारे तू ना तारे जननी दारे आज शख शख मंगल गा सिंधु पल लो बे छ तारे जननी छ आज शखे शखे मंगल गा जननी दारी प्रणाम क्या बात है। वाह खूब भो बहुत अच्छा बहुत अच्छा वेरी गुड। देखिए इतना सुंदर यह गीत है। शंखे शंखे मंगल गाओ जननी ऐसे छे द्वारे शंख बजाकर के मंगल गाओ मां द्वार पे आई है। जननी अर्थात की मां सप्त सिंधु कल्लोल रोल बेजे छे सप्तारे सा सात समुद्र की लहरों की ध्वनि सात तारों पर बज रही है। सुरो सप्तक को तुले छे तान अर्थात कि सात सुरो सप्तक तुले छे तान सप्त ऋषिर गाने सात ऋषियों के गान में सप्तक सूर तान छेड़ रहे हैं। सप्त स्वर्ग धुंदु भी घोषे सप्त ग्रहे रो टाने सात ग्रहों के खिंचाव से सातों स्वर्गों में दुंदु भी बज रही है अंतरे आज सप्त सुरेर नवो जागरण स्वर आज हृदय के भीतर सात सुरों की नई जागृति का स्वर है। देखिए इसका जो माने लेरिक्स है इतना सुंदर रूप से यह बनाया गया है। यदि बंगाल में आप ये शरद ऋतु में जाएंगे और सिर्फ बंगाल ही कहां पूरे भारतवर्ष में यह प्रकृति की जो शोभा है यह हार्वेस्ट का टाइम है तो और यह जो माने जो खेत है वह हरे जो ये जो धान से लहरा रहे हैं और आकाश जैसे कि स्वच्छ है गर्मी का सीजन समाप्त हो गया और यह बारिश का सीजन भी समाप्त हो गया है और ठंड अभी जो है जो प्रचंड ठंड जो एक समय होती थी। अभी आजकल तो ठंडी थोड़ी कम हो गई है। किंतु एक समय जो अच्छे से जो ठंड लगती थी वह भी अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। तो ये जो स्प्रिंग सीजन एक है और यह शरद ऋतु एक है। यह दोनों का आप देखेंगे कि प्रकृति का नजारा, प्रकृति का सौंदर्य इतना सुंदर है और जो किसान होते थे, जो अपनी जो माताएं जो होती थी, उनके हृदय में वैसे ही यह हार्वेस्ट जब आता है घर में जैसे कि लक्ष्मी स्वयं जैसे कि प्रकट होती है। लक्ष्मी स्वयं जैसे कि प्रवेश करती है। तो इसकी वजह से जो आनंद आता है तो देखेंगे कि इसी भाव को जैसे कि इस गान में धर दिया है अंतरे आज सप्त सुर नव जागरण स्वरे अंतर में हृदय के भीतर सात सुरों की नई जागृति का स्वर है सातरांगा रवि राम धनु हाथे मरण बाण सप्तंगी सूर्य अपने इंद्रधनुष हाथों से मृत्यु मृत्यु का बाण चलाता है। सप्ति सुसंतान विजय माल्य आने सात करोड़ सुपुत्र विजय की माला लेकर आते हैं। सप्त तीर्थ एक साथ होए रदी मंदिर द्वारे तुले नाओ बुके तारे सातों तीर्थ हृदय मंदिर के द्वार पर एक साथ आ गए हैं। उसे अपने हृदय से लगा लो। अर्थात कि मां का जब आगमन होता है तो सभी तीर्थ जो होते हैं सभी गान जो होते हैं सभी ऋषि मुनि जो होते हैं हृदय के जो सुच्च सुप्रसिद्ध जो भाव होते हैं सब जैसे कि एक साथ में अपने घर में प्रवेश करते हैं। ये गुजरात में खास मैंने देखा है। मुझे बाकी जगह पर नहीं पता कि अब जब यह दीपावली वगैरह जो प्रारंभ होता है तो घर के जो द्वार होता है वहां पर वो साथियां दौड़ते हैं और फिर लिखते हैं शुभ और लाभ अर्थात कि देखिए कि एक एक मां का हृदय है। मां अपने संतान के लिए क्या चाहती है? संतान का जो जीवन है वो शुभ जो जितने भी भाव है आशीर्वाद से वो भर जाए और उसको जो लाभ होने वाला है जागतिक जगत में जो लाभ होने वाला है वही तो मां चाहती है ना योग और क्षेम यही तो अपने जीवन में है आध्यात्मिक उन्नति हो और बाह्य जगत में सांसारिक उन्नति हो यह दोनों यदि साथ में चलते हैं तो हमारा हृदय हमारा जीवन जैसे कि भराभरा भरा हो जाता है। मैं जब छोटा था और मैं जब अपने गांव जाता था तो मैं देखता था दीपावली के उत्सव में कितने हमारे रिलेटिव्स है सब जगह से आते थे। एक छोटा सा घर था। ऐसा नहीं कि घर बहुत बड़ा था। किंतु जो घर में रहने वाले लोग थे उनका हृदय बहुत बड़ा था। तो रात को सोना भी होता है तो एक ही कमरे में सभी लोग इधर-उधर करके वो जमीन पर वो पथारी डाल के वो बेड लगा के सो जाएंगे। इतनी जगह भी नहीं थी। खाने को भी बैठेंगे तो ऐसा सबको ऐसा साथ-साथ में बैठना पड़ता था। किंतु उस समय जो आनंद आता था वो आनंद एक बिल्कुल अलग तरह का था। तो यह जो आप देखिए कि सब तरह के शुभ भाव यह हार्वेस्ट यह जो लाभ होता है सांसारिक जीवन में यह जितने भी अच्छे गुण है यह अच्छा जो कुछ भी है जीवन में वह सब मां के आगमन से हमारे हृदय में प्रवेश करता है। हमारे घर में प्रवेश करता है। तो यह इतना सुंदर यह एक गान इसके बाद

आज आगमनीर आबाहने की सुर उठेछे बेजे

का जो गान है आज आगमनीर आबाहो ने तो यह गान भी मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि लाली दी गा रही है। सर वेरी गुड प्लीज स्टार्ट आज आओ मोबा यशु रूठे बे जाो मोरी आने यशु रूठे से बे दो श्यामा डाक दिए दो श्यामा डाक लो श्यामा राो से आ जा यशु रूठे बेरो को नीती कालो फूल को निरो शेयर ताली शेर की ताली द ताली नाचता को तो शिशु गीता ना तो आ जा मो यशु उठे छ बेटा में जाए पूरा दीप आ शत छटा में जा खुले छाता हलता खुले छ र तो आकाश दी बता का रक्त आकाश खासी बुके शीश होना चाश बुके शीश नी चार सोब आले मुझे रे बे बोले सोजो आले मुझे रे बे बोले थुनी श्यामला से जे सो आला से आज जाने यशु रूठे बे दो श्यामा डाक लो श्यामा डाक लो आ जा यशु रूठे से जय जय राो मोबा यशु रूठे वाह खूब भो खूब भो देखिए ये एक सुंदर दूसरा गान इसका अर्थ देखते हैं आगों नीर आहोने की सुर उठे छे बेजे अर्थात आगमनी के आवाहन पर अर्थात कि मां दुर्गा के आगमन पर यह कौन सा सुंदर सुर बज रहा है दोयल श्यामा डाक दिलोताई बरोर एो सेजे दोयल और श्यामा पक्षियों ने आवाज दी है इसलिए सुहाग ने मां के स्वागत के लिए थाली सज गई है भरा भादरे भरा नदी कुलु कुलु छूटे निरवधी भरे हुए भादो महीनों की उपफनती नदी कुल कुल ध्वनि के साथ निरंतर बह रही है शेर गीताली देह कर ताली नाचे तरंग दोलने रे वह धुन गीतों पर तालियां दे रही है और लहरें झूलते हुए नृत्य कर रही है पूरबो दीपको आरती दीप दीप शतो छटा मेघ जाले पूरब का दीपक अर्थात कि सूर्य पूर्व का दीपक कौन है तो भगवान सूर्य भगवान आरती के दीप की तरह अपनी सैकड़ों छटा बादलों के जाल पर बिखेर रहा है दीपक बालात ताय आलता घुले छे रक्तो आकाशो थाले और दिशाओं की बालाओं ने उस लाल आकाश रूपी थाली में मानो आलता घोला है घासेर बुकेते शिशिरो नीर धोयाबे और रांगा चरण धीर घास की छाती पर ओस का जल मां के सुंदर लाल चरणों को धीरे-धीरे धोएगा सबूज आंचले मूछे नेबे बोले धरणी श्यामला सेजे छेरे और अपने हरे आंचल से इसी मां के श्री चरणों को पोंछने के लिए ही मानो धरती हरी भरी होकर के सज गई है। मां के आगमन से देखिए कि पूरी प्रकृति जैसे कि आनंद के गीत गा रही है। पूरी प्रकृति जैसे कि मां का स्वागत करने के लिए सजधज करके तैयार होकर के बैठी है।

स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में माँ सारदा — साक्षात् माँ दुर्गा

देखिए कि हम मां शारदा के जीवन को जब मां दुर्गा के साथ में कंपेयर करते हैं, तो यह कंपैरिजन स्टार्ट किसने किया? शायद हम सबको पता ही है कि यह कंपेयर करने वाले वैसे तो ठाकुर ही थे किंतु ठाकुर के बाद में सर्वप्रथम थे स्वामी विवेकानंद और स्वामी जी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्र है। जिन लोगों ने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का इवन कुछ ऊपर ऊपर से भी शायद अभ्यास किया होगा। उनको भी इस पत्र के बारे में पता होगा। 1894 में स्वामी जी ने महापुरुष महाराज को यह पत्र लिखा है। बड़ा ही इंपॉर्टेंट पत्र मां शारदा का क्या प्राधान्य क्या महात्म है? उनका सही स्वरूप क्या है? वो जैसे कि स्वामी जी सर्वप्रथम जगत के सामने प्रकट करते हैं। ऑफ कोर्स सर्वप्रथम प्रकट करने वाले ठाकुर ही थे शोडशी पूजा के माध्यम से। किंतु उनके बाद में जो है वो है स्वामी जी। तो देखिए यह पत्र है मेरे सामने। मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं इसमें से। आज वैसे तो समय समाप्त हो गया है। थोड़ा कल ही देखना पड़ेगा। किंतु एनीवे एक बार पाठ प्रारंभ कर लेते हैं। क्या कहते हैं स्वामी जी? मां ठाकुरन की बस्तु बुझते पारोनी एकनो के होई पारो पारो ना क्रमे पारबे माता ठाकुरानी कौन थी? कौन है? यह आपको अभी नहीं पता है। अभी कोई किसी को नहीं पता है। धीरे-धीरे करके समझ में आएगा। भाया शक्ति बिना जगत उद्धार होवे ना भाई बिना शक्ति के जगत का उद्धार होने वाला नहीं है। आमा देर देश शकोलेर अधम केनो शक्तिहीन केनो शक्ति अपमानना शेखाने बोले हमारा देश सबसे अधम क्यों है शक्तिहीन क्यों है? क्योंकि देश में शक्ति का अपमान हो रहा है। शक्ति का अपमान हो रहा है। मां ठाकुरानी भारत पुनराय महाशक्ति जागाते एच मां ठाकुरानी भारत में फिर से उस महाशक्ति को जागृत करने के लिए आई है। ताके अवलंबन कोरे आभार शब गार्गी मैत्री जगते जन्मावे। उनको अवलंबन करके उनके आशीर्वाद से भारत में फिर से गार्गी और मैत्रेई का जन्म होगा। जगत में जन्म होगा। सिर्फ भारत में ही नहीं। देखो कि भाया क्रमे सब बुझवे। क्या देख रहे हो भाई? धीरे-धीरे सब समझोगे। ए जनतार मठ प्रथमे चा इसीलिए मां का मठ पहले चाहिए। राम कृष्ण परमहंस वरम जाक आमी भीत नाई। कितना बड़ा स्टेटमेंट रामकृष्ण परमहंस भले ही चले जाए यदि जाना चाहते तो भले ही चले जाए इससे मुझे डर नहीं है। मां ठाकुरानी घे सर्वनाश किंतु मां यदि अपने जीवन से जाएगी मां का आशीर्वाद यदि हमें नहीं मिलेगा तो सर्वनाश हो जाएगा। शक्ति और कृपा ना हो लेकिन घोड़ा डीम अवे। शक्ति की कृपा नहीं होगी तो क्या घोड़े का अंडा होगा? यह घोड़े का अंडा होता नहीं है। घोड़ा मेमल है। बच्चे को जन्म देता है। अर्थात कि जो चीज नहीं है उसके बारे में बात करनी है। तो बंगाली में शब्द प्रयोग है घोड़ डीम अर्थात कि घोड़े का अंडा। तुमको कुछ नहीं मिलने वाला है। ऐसा यदि कहे तो कहेंगे तुम्हें तुमको घोड़े का अंडा मिलने वाला है। घोड़ा का अंडा होता नहीं है। इसलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि शक्ति की कृपा नहीं होगी तो कुछ मिलने वाला नहीं। अमेरिका यूरोप की देखची अमेरिका और यूरोप में मैं क्या देख रहा हूं शक्तिर पूजा शक्तिर पूजा शक्ति की पूजा शक्ति की पूजा तबरा अजान पूजा करें द्वारा करें किंतु वहां पर जो शक्ति की पूजा होती है वह अजान होती है बिना जाने हुए करते हैं काम के माध्यम से करते हैं आर जारा विशुद्ध भावे सात्विक भावे मातृ भावे पूजा करबे तादेर की कल्याण ही ना होवे किंतु जो लोग विशुद्ध भाव से सात्विक भाव से मातृ भाव से शक्ति की पूजा करेंगे उनका क्या कल्याण ही नहीं होगा अत्यंत कल्याण होगा आमार चौक खुले जा छे दिन सब बुझते पारछी मेरी आंखें खुल रही है दिन प्रतिदिन मैं सब समझ पाता हूं से जन आगे मायर मठेर जनो पैसा टाका इसीलिए लिए सर्वप्रथम मां के लिए मठ बनाना होगा। आगे मां आर मायर मेरा तार पर बाबा आर बापेर छेलेरा ए कथा बुझते पारो की प्रथम मां और मां की बच्चियां या तो फिर मां की पुत्रियां उसके बाद में बाबा और बाबा के पुत्र संतान यह बात क्या समझ पाते हो कि नहीं शकलें भालो शकल के आशीर्वाद करो सब अच्छे हैं सबको आशीर्वाद करो दादा दुनियामय तार घर छाड़ा आर शकल जाएगा ते भाबेर गरे चुरी दादा दुनिया भर में मैंने घूम करके देख लिया तार अर्थात कि श्री रामकृष्ण मां शारदा के घर को छोड़कर के सब जगह पर भाव के घर में चोरी है अर्थात कि मुंह से एक बात करते हैं मन में दूसरी ही बात रहती है हिंदी में जिसको कहते हैं मुख मुंह में राम बगल में छुरी इस तरह से दादा राग करो ना तोरा एकनो क्यों मां के बोझोनी दादा अर्थात कि बड़े भाई महापुरुष महाराज को स्वामी जी दादा करके पुकारते हैं। बड़े भाई करके पुकारते हैं। तो आप गुस्सा मत करना क्रोध मत करना। आप लोगों को अभी भी आप लोग अभी भी मां को समझ नहीं पाए हैं। माय कृपा हमार ऊपर बापर कृपा चे लाखों गुण बोलो बो मां की कृपा मेरे पे पिताजी की कृपा से लाख गुना ज्यादा है। ओई मायर दिखे आियो एक गोंडा मां का जब बात आता है तब मेरा भी थोड़ा सा फेनेटिसिज्म प्रकट हो जाता है। मार हुकुम होले ही वीर भद्र भूत प्रेत शोभ कोते पारबे मां का हुकुम होने से ही यह वीर भद्र भूत प्रेत सब कर पाते हैं सब कर सकते हैं तारक भाया आमेरिका आशबार आगे मां के आशीर्वाद करते चिट्ठी लिखे छिलम तनी एक आशीर्वाद दिलन अपनी हुप करे पगार पार ए बुझो तारक भाई अमेरिका आने से आगे मैंने मां को आशीर्वाद प्राप्त कर दे मुझे आशीर्वाद दे। ऐसा करके मैंने चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने एक आशीर्वाद दिया। वैसे ही मैंने हुप करके अर्थात कि महावीर हनुमान जैसे कि एक छलांग में कैसे समुंदर लांघ गए थे तो वैसे ही स्वामी जी कहते हैं महावीर की तरह जो हुप करके समुंदर पार कर दिया मैंने। यही तुम समझो। दादा ए दारुण शीते गायए घाय लेक्चर करे लड़ाई कोे टाकार जुगाड़ को छची मायर मठ होवे दादा इस भयानक ठंड में गांवगांव लेक्चर करता मैं घूम रहा हूं पैसों का जुगाड़ कर रहा हूं क्यों क्योंकि मां का मठ होगा इसके बाद में वो फेमस स्टेटमेंट वर्ल्ड फेमस स्टेटमेंट बाबूरामर मार बूढ़ो वसे बुद्धि हानि होए छे बाबूराम की मां की वृद्धावस्था में बुद्धि को हानि हुई है। बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। जानंत दुर्गा छेड़े माटी दुर्गा पूजा करते बोसे छ जीवंत दुर्गा छोड़कर के मिट्टी की दुर्गा की प्रतिमा की पूजा करने को बैठी है। दादा अर्थात कि वहां पर दुर्गा पूजा हो रही थी। निमंत्रण स्वामी जी को गया होगा। तो स्वामी जी कहते हैं जीवंत शारदा मां स्वयं जब है तो उनको छोड़कर के मिट्टी की प्रतिमा की पूजा यह वृद्धावस्था में बुद्धि को उनको हानि हो गई है दादा विश्वास बो धन दादा जानंत दुर्गा और पूजा दिखाबो तबे अमर नाम दादा विश्वास बड़ा धन है दादा मैं जब जीवंत दुर्गा की पूजा दिखाऊंगा तो मेरा नाम सार्थक होगा तुम जमी की ने जानंत दुर्गा दुर्गा मां के जे दिन बोशिए देबे शदीनामी एक बार हाप छाड़वो तुम लोग जिस दिन जमीन खरीद करके उसके ऊपर में मठ बना के जीवंत दुर्गा की जिस दिन आप प्रतिष्ठा कर लेंगे उस दिन मैं हाप छोड़कर के बचूंगा उस दिन मुझे मेरे हृदय को शांति मिलेगी तार आगे देश जाना उसके आगे मैं पहले देश में जाने वाला अर्थात कि भारत वापस नहीं आने वाला हूं जतो शीघ्र पारबे जितना जल्दी हो सके टाका पाठाते पारलेले आमी हा छेड़े बाजी जितना जल्दी हो सके आप जमीन वगैरह का व्यवस्था कर लीजिए मैं यहां से पैसा भेजूंगा तब मेरे हृदय को शांति मिलेगी तोरा जुगाड़ करे ए हम दुर्गोत्सव टी करे दाऊ देखी तुम लोग जुगाड़ करके मेहनत करके मेरा यह दुर्गोत्सव करके दिखाओ तो गिरीश घोष मायर पूजा खूब कर छे धन्य से तार कुल धन गिरीश घोष मां की बहुत पूजा कर रहा है। वह धन्य है। उसका कुल धन्य है। दादा मायर कथा मने पढ़ ले शब समय बोली को रामः दादा मां की बात मन में आने से ही मैं समयसमय पे कहता रहता हूं। को रामः राम कौन थे? सीता ही तो सब कुछ थी। दादा ओई जे बोलछी ओ खांटाय अमार गोंडामी यह जो मैं बता रहा हूं यहीं पर थोड़ा बहुत मेरा फनेटिसिज्म है रामकृष्ण परमहंस ईश्वर छिलेन कि मानुष छिलेन जा होए बोलो दादा रामकृष्ण परमहंस ईश्वर थे कि मनुष्य थे जो कहना हो वो कह दो किंतु मां किंतु जार माय ऊपर भक्ति नहीं ताके धिक्कार दियो किंतु जिसकी मां के ऊपर में भक्ति नहीं है उसको धिक्कार दो निरंजन लाठीबाजी करे किंतु तार माय ऊपर बो भक्ति निरंजन लाठीबाजी करता है किंतु उसकी मां के ऊपर में बहुत भक्ति है तार लाठी हजम होए जाए वो लाठीबाजी जो करता है वो सब हजम हो जाएगी निरंजन एमन कार जो करे छे जे तोमरा सुन ले अब खोए जावे आ खबर राची निरंजन ने जो काम किया है आपको पता नहीं है मैं यहां पे सब खबर रखता हूं हूं। देखिए यह स्वामी जी का जो वर्ल्ड फेमस लेटर कि जिसमें उन्होंने मां के प्रति अपना जो सही भाव है वो उन्होंने प्रकट किया है। इसके बारे में बहुत बात हम कर सकते हैं। किंतु आज समय समाप्त हो गया है तो अभी कल से प्रारंभ फिर से करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम