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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

दैवाधीन : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 17 Sep 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका हम पाठ कर रहे थे बहुत पहले जबकि मैं राजकोट में था उसके बाद में बीच में यह पूरा सीरीज हमारा यह बीच में ब्रेक हो गया अभी इसको फिर से प्रारंभ करते हैं गंभीरानंद जी का जीवन गंभीरानंद जी का गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित श्री मां का जीवन इसका पाठ हम लोगों ने कुछ चैप्टर तक किया था यह चैप्टर का नाम था देवाधि दैव के आधीन और अभी तक मां के जीवन में क्या-क्या हुआ है इसका एक आउटलाइन देख लेते हैं ठाकुर तो दक्षिणेश्वर में साधना में रत थे और एक के बाद एक साधनाएं करते जा रहे थे फिर आखिर में कामर पुकुर में चंद्रा मणि देवी अर्थात की श्री राम कृष्ण देव की मां को एक समाचार मिला दक्षिणेश्वर से कि आपका लड़का पागल हो गया है पता नहीं क्या-क्या करता है मां का नाम लेकर के कभी रोता रहता है मां अर्थात कि मां का दक्षिणेश्वर माहा काली का मंदिर था और श्री रामकृष्ण देव उस समय महाकाली के पुजारी थे और मं काली के दर्शन प्राप्त करने के लिए जो करना चाहिए जो करना उचित है जो करना संभव है इस मनुष्य देह में रह कर के वह सब कुछ वह कर रहे थे रो रहे थे जप ध्यान साधन भजन सब कुछ और उसमें भी ऐसा समाचार आया कि कभी-कभी दिगंबर होकर के घूमते हैं तो कभी-कभी अपना जो पैता है यानी कि जनोई है जनोई उठा कर के फेंक देते हैं तो यह सब समाचार जब कामर पुकुर में आया तो कुछ लोगों ने सलाह दी मां चंद्रा मणि देवी को कि अपने बेटे का विवाह करवा दीजिए जब बहू आएगी घर में तो ऑटोमेटिक रिस्पांसिबिलिटी आएगी लड़का ऑटोमेटिक ठीक हो जाएगा तो यह बात सुनकर के ठाकुर को कामर पुकुर बुलाया गया पात्री का संधान चलने लगा बहुत संधान हुआ ठीक समय से मतलब जो उचित पात्र है मिल नहीं रहा था और ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह यह सब कुछ देख रहे थे आखिर में उन्होंने कहा कि एक काम कीजिए जयराम बाटी में जाइए वहां पे पात्री कुटो बांधा रेखे आछ कूटो बांधा अर्थात कि जो फल जिसको कि देवता को अर्पित करना हो उसको किसी प्लास्टिक या इसी किस तरह से उसमें उसको बांध करके रख देते हैं जिससे कि कोई भी पक्षी आकर के उसके ऊपर में अपनी चाच ना मारे चोंच ना मारे इस तरह से इस फल को रक्षित रख कर के आखिर में देवता को अर्पण किया जाता है तो इसी तरह मां को भी रक्षित रखा गया था सेफ रखा गया था श्री रामकृष्ण देव के साथ में उनका विवाह होना था बोलकर के तो फिर वह पात्री का संधान मिला उनको उन्होंने भी हां कह दिया ठाकुर का विवाह भी हुआ और फिर उस समय तो मां की उम पा साल की ही थी विवाह के बाद में ठाकुर दक्षिणेश्वर चले गए और फिर साधन भजन में फिर से डूब गए किंतु फिर से जब कामर पुकुर आए थे भैरवी ब्राह्मणी को लेकर के तब उस समय मां को मां शारदा देवी को जयराम बाटी से बुलाया गया कि आप आइए कामर पुकुर में रहिए तो उस समय कामर पुकुर में ठाकुर के साथ में मां रही उन दिनों का बड़ा ही सुंदर वर्णन है उसके बाद में ठाकुर फिर से चले गए यहां पर मां की उम्र भी अभी 14 साल की हो गई है और मां यहां पर रह रही है जयराम बाटी में और वही न्यूज़ जो कि चंद्रा मणि देवी को सताया करते थे कि आपका लड़का पागल हो गया है वही सब समाचार मां के पास में आ रहे हैं मां शारदा के पास में कि पता नहीं ठाकुर वहां पर किस तरह का पागलपन कर रहे हैं तो फिर मां ने सोचा कि जब ठाकुर कामर पुकुर आए थे उस समय तो मेरे साथ में इतना सुंदर रूप से बात किया था मेरे साथ में इतना सुंदर व्यवहार किया था इस तरह के महापुरुष पागल कैसे हो सकते हैं मैं एक काम करती हूं मैं ही वहां पर जाकर के उनका दर्शन कर कर के आती हूं तो फिर वह मां ने ठीक किया कामर पुकुर जाएगी दक्षिणेश्वर जाएगी पिताजी को साथ में लिया जा रहे थे रास्ता में फिर वोह तेलो भेलो माठ की घटना डाकत बाबा की कथा फिर दक्षिणेश्वर गए और फिर ठाकुर के साथ में रही मां ने दर्शन किया ठाकुर का और चक्षु कर्ण का जो विवाद है वो मिट गया जो सब अवाए जो आज की लैंग्वेज में कहेंगे फेक न्यूज़ तो जो कोई भी फेक न्यूज़ दक्षिणेश्वर से कलकाता से मां के पास आता था वह फेक ही साबित हुआ और फिर मां वहां पर रहने लगी और फिर वह शोड़ी पूजा की जगत प्रसिद्ध घटना ठाकुर ने मां की पूजा की थी शोड़ी के रूप में तो वह घटना उस उसका तात्पर्य भी हमने बड़ा ही विषद रूप से देखा था उसके बारे में चर्चा की थी फिर से जो समय था देवाधि अर्थात कि यह जो चैप्टर पार्टिकुलरली हम पाठ कर रहे थे उसमें था कि मां कभी दक्षिणेश्वर आती है तो कभी जयराम बाटी वापस चली जाती है क्यों क्योंकि दक्षिणेश्वर में भी उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता था तो उससे परेशान होकर के जयराम बाटी आती थी जयराम बाटी में मां के परिवार का जो दारिद्र्य था वो इस तरह का था कि घर में खा खाने को भी परिस्थिति अच्छी नहीं थी खाने को भी वह तकलीफ होती थी इसीलिए तो श्री मां शारदा देवी की मां श्यामा सुंदरी देवी ने अपने लड़कों को अपने रिलेटिव्स के वहां पर अपने परिचित जनों के वहां पर भेज दिया था जिससे कि लड़के लोग वहां पर जाकर के पढ़ाई लिखाई करें और उनको अच्छा खाने को भी मिले तो यह सब घटनाएं हमने देखी अभी आखिर में जो घटना हम देख रहे थे वह थी जगद धात्री पूजा की जगद धात्री पूजा जयराम बाटी में किस तरह से प्रारंभ हुई उस घटना का इतिहास देखा और फिर जिस तरह से मां ने कहा मां शारदा देवी ने अपनी मां श्यामा सुंदरी को कहा कि एक बार जगत धात्री पूजा हुई तो हुई अभी हर बार करने की क्या जरूरत है उस समय उस दिन रात को मां जगद धात्री देवी ने आकर के मां शारदा देवी को दर्शन दिया और कहा कि क्या तो मैं फिर यहां से जाऊं तो मां ने कहा क्यों अरे नहीं क्यों जाऊंगी नहीं आप रुक जाइए आपको मैं हर साल मैं आपकी पूजा करूंगी तीन सत्य त्रि सत्य करवा लिया जगत धात्री देवी ने मां के पास में तीन बार पूछा क्या मैं जाऊं क्या मैं जाऊं क्या मैं जाऊं और तीनों बार मां शारदा देवी ने कहा नहीं आप रुक जाइए हम आपकी पूजा करेंगे प्रतिवर्ष हम आपको आनन करेंगे आप आपका बोधन करेंगे और आपकी पूजा होगी तो यह जगत धात्री पूजा का इतिहास अब यह चैप्टर ऑलमोस्ट समाप्त होने को आया है और इसमें जो आखिरी जो पेज है वह भी जगद धात्री पूजा के बारे में ही है उसको मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं प्रथम बचोर बिशर जनेर दिन बृहस्पतिवार छलो बोलिया श्री मा आपत्ति तुलिया लेन पहली साल जब विसर्जन का दिन था वह गुरुवार था बृहस्पतिवार था तो माने आपत्ति उठा कर के कहा था कि इस दिन को विसर्जन क्यों कर रहे हैं अभी यह बृहस्पतिवार को विसर्जन नहीं करने का क्या तात्पर्य है वह मुझे नहीं पता वह थोड़ा सा कभी बैठ कर के देखना पड़ेगा अच्छा यहां पर लिखा है लखी बारे मां के विदाई देवा चले ना लक्ष्मी वार लखी बार जो लक्ष्मी का वार है उस दिन को मां को विदाई देने से चलेगा नहीं उ हार परेर दिन उसके बाद के दिन संक्रांति एवं तृतीय दिन नूतन मासिर पहेला छलो उसके बाद में संक्रांति थी और उसके बाद में नए मास का नए महीने का पहला दिन था अत एब चतुर्थ दिन रविवारे विसर्जन देवा होया छलो इस वजह से रविवार को चौथे दिन अर्थात कि रविवार को विसर्जन मां को दिया गया था प्रथम चारी बर पुजार संकल्प श्री जुक्ता श्यामा सुंदरी देवीर नामे द्वितीय चारी बक्षर श्री मायर नामे तृतीय चारी बक्षर तहर खुलता श्री जुक्तो नील माधवे नामे होया चलो पूजा में संकल्प होता है यजमान के नाम से तो पहले चार साल यजमान के रूप में श्यामा सुंदरी के नाम से संकल्प हुआ था उसके बाद में चार साल श्री मां शारदा देवी के नाम से संकल्प हुआ था और उसके बाद में मां के काका खुलता अर्थात की काका अर्थात की मां के पिताजी के भाई उनका नाम था नील माधव तो उनके नाम से संकल्प हुआ था बारो बसर पुजार परे श्री मा आर पूजा करी बार प्रयोजन बध करे नाई 12 साल पूजा करने के बाद में मां ने सोचा कि अभी मैं पूजा कर नहीं करूंगी पूजा करने की जरूरत नहीं है कारण श कोलेर नामे पूजा होया गया छ क्यों क्योंकि सभी के नाम पूजा हो गई है तीनी ज दिन रूप अभिप्राय प्रकाश कररी लेन सेही दिन रात्रे देवी ताहा के स्वप्ने दर्शन दिया जाना लेन जे मधु मुख जर पीशी मा देवीर आराधना करते चाहते छन जिस दिन मां ने कहा कि 12 साल संक पूजा की और जितने तीन परिवार जन थे वडील जो कि सबसे बड़े थे परिवार में तीनों के नाम से संकल्प हुआ है चार-चार बार तो अभी पूजा करने की क्या जरूरत है उसी दिन रात को जगद धात्री देवी ने आकर के मां को दर्शन देकर के कहा कि मधु मुख्य वहां पर कोई रहता होगा उनकी जो एक रिलेटिव है पीशी मां वो देवी की आराधना करना चाहती है और तीन बार मां ने पूछा जगद धात्री देवी ने तो मैं क्या जाऊं यहां से श्री मां बुझीते पारि लेन जगद धात्री त्रि सतो कोराया चाहिया जाते छन माने समझा तीन बार जब जगत धात्री ने पूछा मैं जाऊं मैं जाऊं मैं जाऊं तब मां समझी कि श्री जगद धात्री श्री मां जगद धात्री त्रि सत्य करवाना चाहती है तीन सत्य अर्थात कि बाद में कोई यह ना कहे कि भाई मेरे मुंह से गलती से ना निकल गया तीन सत्य हुआ अर्थात कि उस कथा का उस बात का प्रमाण अभी साबित हो गया तो तीन बार जब पूछा तब मां ने कहा अत एब ताहर पद धव धिया साग्रह बोली लेन इसलिए मां श्री मां शारदा देवी ने मां जगत धात्री के पैर पकड़ कर के बड़े ही आग्रह पूर्वक कहा आमी आर छाड़ बो ना तोमाके आमी बछर बछर तोमाके अनबो मैं अभी आपको छोडूंगी नहीं अभी मैं आपको यहां से प्रस्थान नहीं करने दूंगी आपको मैं प्रत्येक साल प्रत्येक वर्ष आपको यहां पर पुकार करके आपकी पूजा करूंगी ही संकल्पा अनु सारे पूजा चालाई बार जन्नो तीनी किंचित अधिक साढे दो बखा शेर जमी देबोत्तर कोरिया गया छन और इस संकल्प के अनुसार प्रत्येक साल पूजा करने के लिए माने तकरीबन साढे 103 विखा जमीन देवोत्त अर्थात की श्री जगद धात्री को नाम पर करके गई है अभी 10 विघा वो एकर में कितना होगा व थोड़ा देखना पड़ेगा किंतु माने इस तरह से अच्छा यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने एक फुटनोट भी दिया है क्या लिखते हैं 18944 जनन ओई जमी क्रय करा होय 18946 कुड़ी टाका दान करेन स्वामी शारदानंद जी ने कहा था तो फिर मास्टर महाशय ने 350 पैसा 300 20 इसके लिए दान में दिए थे और 18 18 196 अर्थात कि 1916 की तारीख में क्वाल पाड़ा आश्रम में जगद धात्री नाम श्री माय अर्पण नामा रजिस्ट्री होय और यह 1916 में क्वाल पाड़ा आश्रम में मां के नाम से और यह जगत माने जगत धात्री के नाम पर इस जमीन को अर्पण किया था और ये जिस दिन अर्पण हुई थी जमीन जगत धात्री के नाम पर यह जो रजिस्ट्रेशन हुआ था क्वाल पाड़ा में उस दिन की एक बड़ी ही सुंदर घटना मैंने पहले भी एक दो बार कही है कि तो ये अभी ये प्रसंग आ गया है तो उसको फिर से दोहराता हूं अ शरत महाराज यानी कि स्वामी शारदानंद जी रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी महाराज उस समय कलकाता में थे और सब तरह से मां का तत्वावधान करते थे मां की केयर करते थे मां को कुछ भी जो भी जरूरत होती थी जो भी सेवा होती थी सब कुछ शरद महाराज देखते थे तो यह ठीक हुआ था कि क्वाल पाड़ा आश्रम में जब इस तरह से जमीन जगत धात्री देवी के नाम पर अर्पण रजिस्ट्री होने वाली है तो शरत महाराज स्वयं वहां पे क्वाल पाड़ा में आकर के सब कुछ मैनेज कर रहे थे बाद में दूसरे भी साधु सन्यासी मां के सेवक बहुत सारे लोग थे फिर जो रजिस्ट्रेशन का समय आया तो रजिस्ट्रार जो होता है उसको वहां पर आकर के जमीन को रजिस्ट्रेशन जो ये दस्तावेज होते हैं डॉक्यूमेंट उसमें सही सिक्के करवाने थे तो जैसे ही वह रजिस्ट्रार आया पालखी में तो वैसे ही शरत महाराज खड़े होकर के थोड़ा सा आगे जाकर के उनकी अभ्यर्थना करके स्वागत करके उनको बुला कर के वह आश्रम में ले आइए बड़े ही विनय पूर्वक नम्रता पूर्वक साग्रह पूर्वक कि आइए आइए आइए बैठिए फिर वो रामदे में उनके लिए चेयर रख कर के उनको बिठाया गया फिर उनके लिए नाश्ता और पानी का जो व्यवस्था की गई थी तो शरत महाराज ने अपने हाथों से उनको परोसा अपने हाथों से उनको पान दिया और अभी यह जो अभी यह जो रजिस्ट्रार था वह उम्र में बड़ा ही यंग था और फिर मुस्लिम था तो इन लोगों को यह जो सब कंपनी के और यह ब्रिटिश गवर्नमेंट के यह जो होते हैं सब कर्मचारी उनको वो लोग जब गांव में जा हैं तो यही लगता है कि हम लोग यहां पर राजा है और यह लोग हमारी प्रजा है हम लोग जितना ही बद सलूक करना चाहे इनके साथ में हम कर सकते हैं क्योंकि सत्ता के ऊपर में हमारी मोनोपोली है और खास करके यह जमीन वगैरह का जो मामला है उसको लेकर के प्रायः झगड़ा होता रहता है प्रायः मर्डर होता रहता है और जब रजिस्ट्रेशन करना होता है जमीन का अपने ऑथेंटिकली अपने नाम पर करना होता है तो वो बहुत बड़ा एक घटना माना जाता है तो यह लोग को पता होता है कि गांव में जाएंगे ये लोग बड़ी ही खातिर करने वाले हैं हम लोग राजा की तरह वहां पर काम करेंगे तो यह भी ऐसा कुछ सोच कर के आया होगा किंतु जब यह देखा कि शरत महाराज उम्र में इतने बड़े हैं और वह इतना विनम्रता पूर्वक मेरे साथ बात कर रहे हैं और बाकी जितने भी साधु सन्यासी है वे लोग शरत महाराज को इतना उनको सामने सम्मान दे रहे हैं तब इस मुस्लिम रजिस्ट्रार जो था यंग लड़का उसको थोड़ा सा एक अस्वस्थ होने लगी वह थोड़ा सा अनकंफर्ट बल होने लगा वह सोचने लगा कि ऐसा तो यह आदमी कौन है गेरुआ पहना है अर्थात साधु तो है अभी यह मुस्लिम है तो वैसे तो साधुओं के हिंदू साधुओं के प्रति वैसे तो कोई इतना रिस्पेक्ट नहीं होगा किंतु यह बाकी लोग जब उनको इतना रिस्पेक्ट देते हैं उसका अर्थ है कि उनके भीतर में सही में कुछ तो उपलब्धि होगी तो वह भी थोड़ा सा अनकंफर्ट अनकंफर्ट बल हो गया और यह जब शरत महाराज इस रजिस्ट्रार की इतनी मतलब विनम्रता पूर्वक उसके साथ में बात कर रहे हैं उनके साथ में इस तरह का सलूक कर रहे हैं बिहेवियर कर रहे हैं तो शरत महाराज के साथ में जितने भी यंग साधु आए थे कोलकात्ता से वे लोग भी अनकंफर्ट बल महसूस करने लगे अभी जो लोग कोलकात्ता से आए हैं उन लोगों में थोड़ा सा एक रेबेल स्पिरिट जो होता है वह थोड़ा सा ज्यादा होता ही है बड़े शहर में से जो गांव में जाते हैं तो उनका भी यह एटीट्यूड रहता है कि गांव वाले तो गंवार है और गांव के ये जो सरकारी कर्मचारी है वे लोग भी गंवार हैं हम तो बड़े सिटी से आए हैं और हम लोग तो बड़े ही फ्रीडम के साथ में अपना जो इंडिविजुअल ह्यूमन राइट्स है उसको एक्सप्रेस करने में हम लोगों की बड़ी ही उसमें महारत है तो कलकता से जो लोग आए थे वे लोग भी अनकंफर्ट बल हो रहे हैं कि शरत महाराज रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी होने के बावजूद यह दो कोटि का एक कर्मचारी है दो टक्के का कर्मचारी वो उसके सामने इतना विनम्रता क्यों दिखा रहे हैं तो वे लोग भी अनकंफर्ट बल हो रहे हैं और ये जो रजिस्ट्रार था वो भी बेचारा थोड़ा सा ये हो गया किंतु आखिर में जब यह समाप्त हो गया रजिस्ट्रेशन का कार्य और जब व शरत महाराज ने उसको विदाई दी तब बड़े ही चैन की सांस लेकर के शरद महाराज वहां पर बैठे रामदे में और उस समय वरदा महाराज मोस्ट प्रोबेबली जो यह रेमसंस लिख रहे थे उन्होंने कहा कि देखिए कि इस घटना से हम सबको एक सीख मिली हम सबको एक चीज जानने को मिली कि जब मां का कार्य करते हैं मां शारदा देवी का तब अपना अहंकार अपना प्रतिष्ठा अपना पद वह सब विस्मृत होकर के वह सब भूल जाकर के संपूर्ण जी जान लगा कर के मां का कार्य करना है तो ये शरत महाराज मां के द्वारी थे मां के सेवक थे तो वह वैसे ही नहीं थे यह मने अपना अहंकार उसको कुचल देना उसको संपूर्ण रूप से मां के श्री चरणों में समर्पित कर देना यह कितनी बड़ी बात है वह चाहते तो रामकृष्ण मिशन यानी कि उसी समय उसका बहुत बड़ा नाम था स्वामी विवेकानंद तो जगत प्रसिद्ध थे तो शरद महाराज चाहते तो बड़े ही एरोगेंटली इस रजिस्ट्रार के साथ में बात कर सकते थे यंग भी था उसको डरा भी सकते हैं और और एक दूसरी घटना के बारे में हमने देखा था ना कि वह मां के घर में ब्राह्मण भोजन था और वह कोई सन्यासी वो परिवेश कर रहा था वह सर्विंग कर रहे थे तो अ यह सन्यासी तो कोवाल पाड़ा के थे सबको पता है कि यह तो ब्राह्मण नहीं है तो ब्राह्मण भोज में ब्राह्मण लोग ही तो सर्विंग करेंगे नॉन ब्राह्मण कैसे करेगा सन्यासी है तो क्या हुआ तो यह बोलकर के ब्राह्मण लोग खड़े हो गए और मां फिर दोनों हाथ जोड़ कर के प्रार्थना कर रही है बार-बार वो कि आप बैठ जाइए भोजन ग्रहण कीजिए आहार ग्रहण कीजिए तो इन लोगों में का घमंड ऐसा आ गया था कि नहीं आपको दंड देना पड़ेगा तभी हम लोग यह आहार फिर से लेंगे तो मां के पास में से दंड वसूल करवाया था अभी ये ललित बाबू वहां पर थे जिनको कि भक्त लोग काइजर बोलते थे जो केजर ये जो जर्मनी का राजा था जिसका बड़ा ही हाई टेंपर था और बड़ा ही वो घमंडी था तो उसका नाम था केजर वो जर्मनी के राजा का तो उसी केजर के नाम से इनको भी ये लोग काइजर करके बुलाते थे वो ललित बाबू को तो ललित बाबू को पता चला कि मां के पास में से इस तरह से दंड वसूली की गई है तो वो गए जयराम बाटी में और मां को मां समझ गई थी कि अभी ये ललित बाबू कुछ ना कुछ करने वाले हैं साथ में मां ने मास्टर महाशय को भी बुला लिया था और जब मां ने कहा कि देखो तुम यहां पे कुछ भी उपद्रव मत करना यहां पर तो मैं रहती हूं यह गांव वालों का तो अधिकार है वगैरह वगैरह तो ये ललित बाबू क्या कहते हैं कि मां देखो अभी आज मैं हूं आपका दुष्ट लड़का मैं आपका अच्छा लड़का नहीं हूं आज मैं आपका दुष्ट लड़का हूं और जिन लोगों ने आपको इस तरह से दंड देने का साहस किया है उनको मैं देख लूंगा तो इस तरह से वो फिर अच्छा मास्टर महाशय उस समय नहीं आए थे वो एक दूसरी घटना थी एनीवे तो फिर यह ललित बाबू फिर वहां गांव में गए वो ग्रामोफोन बजाना शुरू किया सभी लोग इकट्ठा हो गए उनमें वे लोग भी थे कि जिनमें यह जिन्होंने मां के पास में इस तरह से दंड वसूल किया था तो इन लोगों को देख कर के फिर यह उन्होंने ललित बाबू ने एक बंदूक निकाला और हवा में शूटिंग करना शुरू कर दिया तो यह लोग बड़े ही डर गए कि अरे यह बंदूक और यह अभी क्या कर देगा मर्डर कर देगा कि नहीं तब इन्होंने जोर से कहा था धमक दे कर के मां के पास में से जो दंड वसूली की गई है वह सब वापस दो इस तरह से मां को धमकी देने से थोड़ी ना चलेगा तो मां के पास में इस तरह के भी सेवक थे भैरव एक के बाद एक वो गिरीश घोष था ऑलरेडी वो माने सभी भैरव का बाप और इस तरह के वो काइजर ये लोग भी थे तो ऐसा नहीं है कि कोई गवर्नमेंट ऑफिसर को यदि धमकाना है डराना है तो यह लोग नहीं कर पाएंगे किंतु यहां पर शरद महाराज एक दूसरा आदर्श देकर के गए हैं कि यदि मां का काम करना है तो किस तरह से करना है तो इस तरह से जगद धात्री के नाम पर यह जमीन को अर्पण किया गया था अच्छा यह जो दूसरी घटना जो है जिस समय मास्टर महाशय स्वयं उपस्थित थे तो इस उस समय क्या हुआ था यह जो पागली मामी थी पागली मामी के कुछ गहने थे तो उसके पिताजी अभी जो पागली मामी पागल हुई थी उसका कारण बहुत सारे थे एक के बाद एक बहुत सारे मृत्यु उन्होंने अपने परिवार में देखे थे और घर में भी यह गांव में क्या होता है स्त्रियों को कितना तुच्छ का पूर्वक उस समय उनके साथ में बिहेव किया जाता था तो उस उसके जो पिताजी थे व पिताजी ने क्या किया कि पागली मामी के गहने लेकर के वो चले गए गहने छीन कर के उनके पास से चले गए तो पागली मामी तो एकदम रोना धोना शुरू कर दी और मां शारदा देवी के पास में आकर के जोर-जोर से रो रही है संताप कर रही है तो मां ने कहा कि अरे अभी क्या होगा यह तो ऑलरेडी पागल है इसके गहने छीन लिए उसके पिता ने तो अभी और भी ज्यादा पागल हो जाएगी तो उस समय ये ललित बाबू थे ना कि कौन थे मोस्ट प्रोबेबली ललित बाबू को ही मां ने बुलाया था उस समय साथ में मा मास्टर महाशय भी थे तो इन लोगों ने जब कहा कि हम लोग जाकर के पागली मामी के पिता के पास में से गहना छीन कर के ले आएंगे तो मां थोड़ी सी डर गई मां ने सोचा कि अरे वृद्ध ब्राह्मण है और यह लोग वहां पर जाएंगे और उसको धमका एंगे तो उसका अपमान होगा जो भी है अभी परिवार जन तो है ना तो और फिर वृद्ध ब्राह्मण है उसका अपमान तो कैसे चला सहन करेंगे तो ये लोग जब निकले गहना लेने के लिए तो मां ने मास्टर महाशय को पीछे-पीछे भेजा बोला कि आप भी जाइए देखिए कि ये लोग ब्राह्मण का अपमान ना करें तो अभी ये जो लोग गए थे मोस्ट प्रोबेबली ललित बाबू ही थे मुझे नाम एक बार चेक करना पड़ेगा तो ललित बाबू ने फिर क्या किया कि उनके कुछ दो-तीन लोगों को उन्होंने एक साहिब की तरह कपड़े पहने माने वो जो ब्रिटिश लोग होते हैं ना उस तरह के कपड़े पहने और फिर उसके घर जाकर के क्या कहते हैं कि हम पुलिस के बड़े ही अफसर हैं और आप गहने दीजिए वापिस वरना तो मैं आपको पकड़ कर के जेल में डाल दूंगा और डंडों से पिटाई करूंगा इस तरह से जैसे ही कहा तो वह ब्राह्मण ने बेचारे ने डर करके गहने दे दिए और फिर यह लोग गहने लेकर के आ गए अभी वहां ब्राह्मण को और ज्यादा कुछ धमकी या तो फिर मारपीट नहीं करनी पड़े थी वह जो साहिब के कपड़े अर्थात कि यह ब्रिटिश लोगों के कपड़े कोर्ट पेंट वगैरह देख कर के वह वैसे ही डर गया था कि इस गरीब के वहां पर ये बड़े-बड़े ब्रिटिश लोग कहां से आ गए हैं तो जो भी है तो मां के पास में ऐसे भक्त भी थे तो यह साम दाम दंड भेद सभी तरह से मां काम कर पाती थी करने की क्षमता थी बात वही है कि नीति के रास्ते पर धर्म के रास्ते पर चल कर के हमको विद्या का संसार गठित करना है यदि हम विद्या का संसार नहीं करेंगे उसमें यह अविद्या के एलिमेंट प्रवेश करवाएंगे तो गोल घुमा कर के एक दिन यही घटनाओं का एक्सक्यूज देख कर के फिर लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि करना शुरू कर देंगे मां के लिए इस तरह से झूठ मुठ का कार्य किया मां के नाम पे ये सब झूठ बोला एक बार तो अभी झूठ बोलने का यह कहां रुकेगा ठाकुर ने तो कहा है कि सत्य और ब्रह्मचर्य कली की सबसे बड़ी तपस्या है वह हंसी मजाक में भी झूठ नहीं बोलना चाहिए तो मां का कार्य करने के लिए मैंने झूठ बोल दिया कौन सी बड़ी बात है मैंने मुझे तो कोई पर्सनल बेनिफिट नहीं हो रहा है तो यह झूठ बोलना एक बार प्रारंभ करेंगे तो कहां जाके अटके ग वो उसका कुछ ठीक नहीं है तो यह सब घटनाओं का आस्वादन हम लेते हैं यह सब घटनाओं का माधुर्य रस पान करते हैं किंतु यह सब घटनाओं का बहाना दे कर के हमको इस तरह से कार्य करने से उसमें प्रवेश नहीं करना है अभी गंभीरानंद जी आगे लिखते हैं इस यह जो साढ़े विघा जमीन की जो जगत धात्री के नाम पर रजिस्ट्रे रजिस्ट्री करवाई गई थी उसके बारे में ना 103 बखा यहां पर लि 3.5 एकर अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा सा ए संकल जमीर आय संग्रहित अर्थर सहज आजो जयराम बाटर मातृ मंदिरे प्रति बसर पूजा अनुष्ठान होया था के इस जमी की जो प्रॉफिट है इस जमीन में जो उपज होती है पाक होता है उसको बेच करके जो आता है उसी पैसों से आज भी जयराम बाटी में मातृ मंदिर में प्रति बसर हर साल जगद धात्री देवी की पूजा होती है प्रथम बसरे न्याय एनो तीन दिन पूजा होए पहले साल की तरह आज भी तीन दिन पूजा होती है प्रथम दिन सड़ शोप चारे एवं परेर दुई दिन साधारण भावे पहले दिन शश उपचार में पूजा होती है और फिर सामान्य पूजा पंचोपचार पूजा जिसको कहते हैं दो दिन वह इस तरह से होती है देवीर उभय पार्श्व जया और विजया प्रतिमा स्थापित और पूजि तो होय देवी के दोनों साइड में जया और विजया की प्रतिमा स्थापित होती है और उनकी भी पूजा होती है भक्त गुण विश्वास करे ज जगद धात्री श्री मायर मूर्ति ते अब तीण होया लेन भक्त लोग विश्वास करते हैं कि वही जगद धात्री देवी जिनकी हम लोग पूजा करते हैं वह श्री श्री मां शारदा देवी के श्री शरीर में श्री अंग में अवती हुई है पृथ्वी पर और तरान देवी आराधी लेओ देवी आराधी होले श्री माओ स्वतः ही आराधिता तरी देवी की पूजा कर हैं तो श्री मां शारदा देवी की ही पूजा वो होती है या तो फिर जब मां शारदा देवी की पूजा करते हैं तो मां जगद धात्री की ही पूजा होती है देखिए उस समय यह साढ़े तीन एकड़ जमीन में से पूजा का सब व्यय वहन करते थे आज श्री मां के संतान पूरे विश्व में फैले हुए हैं और इतना डोनेशन आता है इतनी प्रणामी आती है कि मां की पूजा के लिए कभी भी कभी भी किसी भी तरह की यह अनटिल किसी भी तरह का अभाव बनने की कोई संभावना ही नहीं है प्रसंग तो जगत धात्री पुजार विवरण पर आमरा आभार श्री मायर अशु खेर परवर्ती काले फिरिया जाई यहां पर हमने जगत धात्री देवी की पूजा का विवरण किया अभी हम फिर से उसी समय में पहुंच जाते हैं कि मां को बार-बार बीमारी होती थी कभी वह दक्षिणेश्वर में बीमार होती थी कभी जयराम बाटी में कभी सिंहवाहिनी के सामने धरना देती थी और सिंहवाहिनी के सामने धरना देकर के मां को औषध भी प्राप्त हुआ था तो उस समय में हम फिर से चले जाते हैं श्री जुक्तो मास्टर महाशय दीन लिपि होते जाना जाए श्री श्री ठाकुरर माता ठाकुरानी देह त्याग संवाद पाइया अशोक शारी बर अ परेई अर्थात 17 मार्च 187 6 187 6 श्रीमा दक्षिणेश्वर उपस्थित होन एवं श्री श्री ठाकुरे सेवाय आत्म नियोग करेन ठाकुर की दिन मास्टर महाशय तो दक्षिणेश्वर में बाय दैट टाइम जाना शुरू कर दिए थे ना यह उस समय मास्टर महाशय नहीं जाते थे 187 की बात थी 187 6 की यह घटना है किंतु मास्टर महाशय जाना शुरू किए थे 18 81 के बाद में किंतु मास्टर महाशय ने सुना होगा तो मास्टर महाशय ने अपनी डायरी में लिखा है कि मां चंद्रा मणि देवी का देहांत दक्षिणेश्वर में हुआ था चंद्रा मणि अर्थात कि श्री रामकृष्ण देव की मां तो श्री रामकृष्ण देव की मां का देहांत हुआ था दक्षिणेश्वर में 17 मार्च 187 6 को और मां की देहांत के बाद में ही चंद्रा मणि के देवी के देहांत के बाद में ही श्री मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर उपस्थित हुई और ठाकुर की सेवा करने का उन्होंने प्रारंभ फिर से किया इहा तहर तृतीय आगमन यह मां शारदा का दक्षिणेश्वर में तृतीय आगमन था पर बसर कार्तिक अग्रण मासे तीनी देश फिरिया जान एवं संभवत ओई बसर शीतो काले पुनरा दक्षिणेश्वर आसेन इसके अगले साल मां अग्रण महीने में फिर से अपने देश जयराम बाटी चली गई थी और संभवतः उसी साल ठंडी के दिनों में शरत ऋतु में माघ महीने में पुनः दक्षिणेश्वर में उन्होंने आगमन किया था इहा ताहर चतुर्थ आगमन यह था मां का जयराम बाटी में चौथा आगमन यहां पर यह चैप्टर समाप्त होता है अभी नया चैप्टर हम देखेंगे फिर कल ओम शांति शांति शांति हरि ओम त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ललित बाब तो व जो व राधु के गहने उठा लिए थे अच्छा पागली मामी के नहीं राधु गना अच्छा अच्छा और गहना लेने वाले राधू गहना अच्छा अच्छा और ये राधू गहना लेने वाले जो ब्राह्मण थे वो थे कौन क्या रिलेशन था इनके पिताजी थे क्या हां बस वही वही वही स्मृति कथा है वही स्मृति कथा है हां हां हा मां कहती है कि नींद भी मुझे नहीं आई थी वो टेंशन में गेस हो गया था मां ने कहा था सही बात है सही बात है