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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र लेखक स्वामी गंभीरानंद जी महाराज जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं उसका नाम है वधु उन दिनों की बात है जबकि ठाकुर के साथ में मां शारदा देवी का विवाह तो हुआ था किंतु मां अभी भी दक्षिणेश्वर नहीं गई है तो अभी इस चैप्टर का प्राय अंत आ चुका है इस दिन की बात बता रहे हैं जबकि ठाकुर 186 7 में 186 7 में कमार पुकुर लौटे थे अभी कल हमने ठाकुर की साधना और उनके जीवन की क्रोनोलॉजी शुरू में डिस्कस की थी कि किस तरह से ठाकुर की साधना का प्रथम पर्व कामर पुकुर में बीता था द्वितीय पर्व दक्षिणेश्वर में कलकत्ता में जबकि वह अपने बड़े भाई के साथ में रहते थे और फिर धीरे-धीरे करके मां काली के पुजारी भी हुए और अपने अंतर के आवेग से मां को पुकारते थे और मां ने उनको दर्शन दिया था यह हुआ उसके बाद में चंद्रा मणि देवी को खबर पहुंचा कि उनका बेटा पागल हो गया है तो फिर उनको बुलाओ घर बुलाओ गांव में शादी कर दो तो हो सकता है उसका मन थोड़ा सा ठीक हो तो फिर वह कामर पुकुर आए विवाह हुआ मां के साथ फिर से दक्षिणेश्वर गए किंतु हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर का पृथ्वी पर आगमन है धर्म चक्र को प्रवर्तन करना नए सिरे से अपनी जो पुरानी भारतीय परंपरा और अभी यहां पे एक चीज देखने की जरूरत है कि पूरे विश्व में तो यह बात फैले गी अभी तो जो कोर प्रिंसिपल से वही लेना है आप यह कहेंगे कि अच्छा चलो हिंदू धर्म का फैलाव करना है हिंदू धर्म का प्रचार करना है तो हिंदू धर्म की जितनी पूजा एं हैं हिंदू धर्म के जितने उत्सव है हिंदू धर्म के जितने ट्रेडिशनल में फैलाओ तो इससे इसकी वजह से हमने देखिए कि स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो वो पूरे वेदांतिका ही उन्होंने प्रचार किया था नहीं कि चलो अभी महाकाली की पूजा ठाकुर किए हैं तो अमेरिका में भी महाकाली की पूजा का प्रवर्तन करें इस तरह से नहीं माने सभी प्रदेश की अपनी-अपनी लोकल ट्रेडिशनल ट्रेडिशनल फेस्टिवल लोकल वरशिप लोकल कस्टम्स वह सब वैसे का वैसे ही रहेगा लोकल लैंग्वेज सब वैसे का वैसा रहेगा किंतु वेदांत के जो कोर टेनेट्स है कोर प्रिंसिपल है उसका फैला वा पूरे विश्व में होना चाहिए चाहिए तो इसके लिए ठाकुर का आगमन हुआ था विधिवत उनको यह हिंदू धर्म की साधना करने की जरूरत थी तो तृतीय पर्व में यह सब हुआ और इसके बाद में 186 7 में तृतीय पर्व समाप्त होकर के ब्रह्म विज्ञान में संपूर्ण रूप से अधिष्ठान कामर पुकुर वापस आए थे तो उनके साथ में था यह हृदय उनका भांजा और फिर साथ में थी भैरवी ब्राह्मणी उनकी गुरु जिन्होंने भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को शक्ति साधना में दीक्षित किया था शक्ति साधना करवाई थी अच्छा यह जो अभी कि हिंदू धर्म का प्रचार होना चाहिए तो किंतु हिंदू धर्म का क्या प्रचार विश्व में पूरे विश्व में होना चाहिए सिर्फ भारत में नहीं स्वामी जी कहते हैं ना कि मेरी इच्छा सिर्फ यह नहीं है कि गुलाम भारत सिर्फ आजाद हो माने फ्रीडम हमको मिले मेरी इच्छा तो है कि पूरे विश्व पर भारत विजय प्राप्त करें पूरे विश्व में हिंदू धर्म की जय पता का विजय पता का लहर है किंतु इस बात से मेरा मतलब क्या है स्वामी जी कहते हैं कि बात यह नहीं है कि हिंदू धर्म के जितने फेस्टिवल वगैरह है जितु कितने कोर प्रिंसिपल है उसका फिलावा करना अच्छा अभी इसके ऊपर में एक सुंदर प्रसंग है एक बार स्वामी जी लंडन में थे तो वहां पर एक यंग मैन एक युवान आदमी एक एक लड़का उनके पास पास में आया और जिस तरह से क्यूरियोसिटी होता है कि हां यह वेदांत क्या है और फिर देखिए कि जनरली आप इस तरह से किसी अननोन पर्सन के पास में दीक्षा उपदेश लेने के लिए जाते हैं क्यों जाते हैं क्योंकि आपके मन में कुछ ना कुछ वो प्रॉब्लम्स इश्यूज चिंता है कोई ना कोई आपकी कोई प्रश्न है जिसका कि हल और कहीं से नहीं मिल रहा या तो फिर जीवन में ऐसी कोई समस्या है जिसका कि कोई आसान हल नहीं है तो आप इस तरह से किसी गुरु के पास में उपदेश लेने के लिए जाते हैं तो यह यंग लड़का आया स्वामी जी के साथ में बात की स्वामी जी ने उसको वेदांत वगैरह समझाया अभी ये लड़का क्या कहता है पता है स्वामी जी को कि अच्छा देखिए अभी ऐसा तो है नहीं कि आपका यह जो वेदांत है उसकी जो फिलोसोफी है यह ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या या तो फिर यह आपके उपनिषदों के एक के बाद एक प्रमाण है कि हां इस जगत में मैं जो कुछ भी देख रहा हूं दृश्य श्राव्य वह सब मिथ्या है उस सब से मुझे अपने मन को डिटैच कर लेना चाहिए यह जो विचार मार्ग है स्मरण मनन निदिद्यासन का जो कि वेदांत का साधना के रूप में जिसको प्रिस्क्रिप्शन प्रिसक्राइब करें तो रिचुअल तो एक कर्म ही है ना कि हां इस तरह से आप पूजा कीजिए जैसे कि क्रिश्चियनिटी में भी वह वशिप होती है तो जीसस को यह ब्रेड है वाइन है वगैरह ऑफर किया जाता है फिर वहां पर वह यह होता है सिंगिंग होता है व वहां के भजन वगैरह तो वो वेल एस्टाब्लिशड वहां की रिचुअलिस्टिक वरशिप है तो यह लड़के ने स्वामी जी को पूछा कि आप मुझे इस तरह के कुछ रिचुअल प्रिस्क्रिप्शन जिसको कि मैं अपने हाथों से एक्शन ले सकूं क्योंकि कोई मानसिक तपस्या करना या ये योग वेदांत ये तो कैसे होगा कोई रिचुअल होगा कोई पूजा होगी तो मैं प्रतिदिन अपने कार्य करूंगा शरीर से उसको कर्म करूंगा तो फिर धीरे-धीरे करके फिर ये मानसिक साधनाएं जो है विचार मार्ग की साधना में उसकी ओर चला जाऊंगा तो स्वामी जी को यह बात बड़ी पसंद आई कि बात तो सही है इस लड़के की ये योग और वेदांत राजयोग है यह भक्ति योग है वगैरह जो सिखा तो रहे हैं किंतु यह जो मेंटल वरशिप है कितने लोग कर पाएंगे फिजिकल वरशिप होने से इनका काम शुरू में आसान होगा फॉर फिजिकल वरशिप इज अ फर्स्ट स्टेप टुवर्ड्स अ हायर साधना हायर स्टेजेस ऑफ साधना ऐसा करके स्वामी जी भी थोड़े से कन्वींस हो गए और फिर उन्होंने क्या किया लंडन में यह सब घटना हुई है तो स्टर्डी ने उनको बताया उन्होंने स्टडी को बोला अभी यह उस समय की बात है कि जबक ईटी स्टडी जो जो कि लंदन में जिन्होंने स्वामी जी को इनवाइट किया था इट स्टडी का बैकग्राउंड स्टोरी तो शायद पता ही होगा कि इट स्टडी एक लंडन का एक रहवासी था एक ब्रिटिशर था और उसके मन में पता नहीं ऐसी इच्छा आ गई कि मैं हिमालय जाकर तपस्या करता हूं अभी उस समय तो ब्रिटिश लोग हमारे पर राज करते थे पता नहीं इसके मन में कहां से यह बात आ गई कि मैं तो फिर वो हिमालय गया और वहां पर महापुरुष महाराज को मिला महापुरुष महाराज अर्थात स्वामी शिवानंद जी महाराज ठाकुर के सन्यासी शिष्य स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई और रामकृष्ण संघ के द्वितीय अध्यक्ष तो वह महापुरुष महाराज उस समय वहां पर हिमालय में तपस्या कर रहे थे तो उनको जाकर के मिला तो अभी उनसे बड़ा ही इंप्रेस हो गया था फिर वह जब लंडन आया तो महापुरुष महाराज से उसको पता चला होगा इट स्टर्डी को कि हां यह स्वामी जी इस तरह से अमेरिका में है और उनके ही गुरु भाई है और अमेरिका में वेदांत का प्रचार कर रहे है तो उसने क्या किया कि जी को अमेरिका में पत्र लिखा कि आप लंडन आइए और यहां ब्रिटेन में भी वेदांत का प्रचार कीजिए जैसे आप अमेरिका में करते हैं तो स्वामी जी तो बड़े ही खुश हो गए कि चलो सामने से रास्ते खुलते जा रहे हैं और जब वो लंडन आए ब्रिटेन आए तो पता है स्वामी जी एक्चुअली शुरू शुरू में ब्रिटेन के बारे में क्या लिखते हैं वो लिखते हैं कि देखिए मैं अमेरिका में इतनी मेहनत की किंतु अमेरिका में जितने लोग मेरी उपदेशों को ग्रहण करते हैं एक्चुअली अमेरिका में क्या है कि सक्सेस होना बड़ा ही आसान है है क्यों क्योंकि वहां पे लोगों का है ना एक फेड होता है एक फैशन होती है उनको हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए एक एक्साइटमेंट की सर्च है वो अमेरिका का देश ही ऐसा है उन लोगों को नई-नई एक्साइटमेंट चाहिए तो स्वामी जी जब वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में खड़े होकर के बोल दिए अमेरिकन ब्रदर्स सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका तो ये लोग इतने प्रभावित हो गए तो इमीडिएट स्वामी जी को पकड़ लिया कि हां दिस इज अ न्यू फेड दिस इज अ न्यू फैशन तो ऐसा बोलकर के स्वामी जी इमीडिएट सक्सेसफुल तो हो गए किंतु स्वामी जी बाद में क्या कहते हैं कि जितना इजली ये लोग पकड़ लेते हैं इतना ही इजली छोड़ भी देते हैं छोड़ देते हैं इस अर्थ में नहीं कि शुरू में स्वामी जी का सम्मान करेंगे बाद में स्वामी जी का अपमान करेंगे ऐसा नहीं किंतु ये लोग डीप में नहीं जाएंगे सन्मान तो बना ही रहेगा स्वामी जी को अपने घर में बुलाएंगे स्वामी जी को पार्टीज में बुलाएंगे स्वामी जी को इंट्रोड्यूस करवाएंगे स्वामी जी के लेक्चर ऑर्गेनाइज करवा देंगे क्लासेस ऑर्गेनाइज करवा देंगे सब कुछ करेंगे किंतु उनके शिष्य बन कर के साधना नहीं करेंगे अच्छा अभी शिष्य नहीं बनना है तो मत बनिए किंतु साधना वगैरह कोई बात उनके सामने नहीं करनी जीवन परिवर्तन की बात नहीं करनी हम लोग जो भोग विलास में डूबे हुए हैं सतत एक के बाद एक नई एक्साइटमेंट मांगते रहते हैं वो हमारा ऐसा ही रहेगा आज आप नई एक्साइटमेंट है आज आप एक नया फेड है कल एक दूसरा नया फेड खड़ा हो जाएगा तो सब लोग वहां प दौड़ के चले जाएंगे मने एक फेडी सोसाइटी है जबकि स्वामी जी ब्रिटेन में आए उन्होंने देखा कि ब्रिटिश लोग बड़े ही रिजर्व है बड़े ही सीरियस है और किसी भी बात को इजली एक्सेप्ट नहीं करेंगे स्वामी जी जैसे पहले ही दिन पूरे अमेरिका के न्यूज़पेपर में उनका नाम आ गया ब्रिटेन में ऐसा हल्लागुल्ला बिल्कुल नहीं हुआ बड़ा ही रेयरली आपको मिलेगा कि किसी ब्रिटिश न्यूज़पेपर में लंदन के न्यूज़पेपर में स्वामी जी का कोई आइटम न्यूज़ आइटम है किंतु जो लोग स्वामी जी को एक बार उनके ऊपर में विश्वास करना शुरू कर दिया यह लोग स्वामी जी को इतना सीरियसली स्वीकार करेंगे कि अपना जीवन उस स्वामी जी की शिक्षा के अनुसार योग और वेदांत की शिक्षा के अनुसार अपना जीवन परिवर्तित करना यह लोग शुरू कर देंगे तो इस तरह से हमारे पास में चार नाम है एक तो है कि मिस्टर एंड मिसेस सेवियर तीसरी है निवेदिता और चौथा है ये गुडविल चार ब्रिटिश स्वामी जी के शिष्य थे जिन्होंने एक्चुअली अपना जीवन परिवर्तित किया था मिस्टर एंड मिसेस सेवियर और निवेदिता और गुडविन चारों स्वामी जी के साथ में भारत आए थे और फिर मिस्टर और मिसेस सेवियर ने तो वहीं पर मायावती में अद्वित आश्रम की स्थापना करने में बड़ी ही महत्व की भूमिका उन्होंने निभाई है निवेदिता के बारे में तो क्या कहना भारत के वो जो मैंने सिर्फ रामकृष्ण मिशन की ही नहीं निवेदिता ऑफ इंडिया मने निवेदिता तो पूरे भारत की वो एसेट है पूरे भारत की वो एक एक एक आदर्श रूप में वो स्थापित हुई है अपनी टेक्स्ट बुक में निवेदिता का नाम माता है इतना उसका निवेदिता का देशप्रेम था और गुडविन के बारे में तो पता ही है शुरू में उसको लिया गया स्टेनोग्राफी करने के लिए स्वामी जी के लेक्चर नोंद करने के लिए नोट डाउन करने के लिए किंतु स्वामी जी से इतना प्रभावित हो गया कि फिर उसने स्वामी जी से ब्रह्मचर्य दीक्षा ली स्वामी जी के साथ में भारत आया और यह जो सब इट स्टर्डी और मिस मुलर बोलकर के दो-तीन लोग थे जो कि नहीं अभी ब्रिटेन में क्या है वो लोग हमको इंडिया इंडियन इंडियंस को बोलते हैं ना कि आपके यहां पर कास्ट सिम है अपर कास्ट लोअर कास्ट बोले हम हमारे यहां कास्ट सिस्टम नहीं वहां पे क्लास सिस्टम है यह गरीब है यह अमीर है तो अमीर लोग गरीब लोगों के साथ में नहीं रहेंगे उनके साथ में घूमेंगे नहीं एक टेबल पर बैठ के खाना नहीं खाएंगे ऐसा उनका बड़ा रहता है जो ये लोअर क्लास लोग होंगे उनके लिए अलग टेबल रहेगा अलग से खाना रहेगा और स्वामी जी के साथ में तो सभी बराबर है भले ही चाहे वो स्टेनोग्राफर के रूप में आया हो स्वामी जी के साथ में ही एक ही टेबल पर बैठ के खाना खाता था तो ये मिस मुलर वगैरह जो बाकी जो ब्रिटिश उनके डिसाइल थे वो उनको अच्छा नहीं लगता था तो उन्होंने झगड़ा करवा करवा करके स्वामी जी को मजबूर किया फोर्स किया कि आप इस गुडविन को यहां से भगा दीजिए तो फिर मैंने क्या करें बेचारे स्वामी जी भी सबको लेकर को तो चलना है तो फिर आखिर में स्वामी जी ने गुडविन को कहा कि तुम एक काम करो चेन्नई में यह जो ब्रह्मवादिनी चल रहा है वहां पर जाकर के एडिटोरियल वर्क में तुम सहाय करो तो गुडविन ऐसा करके वहां पर गया और आखिर में उटी में वहीं पर आसपास में ही एक जगह है हिल स्टेशन जैसा वहां पर रह रहा था एक बार उसको बुखार हुआ और बुखार में ही उसकी मृत्यु हो गई और वहीं पर उसको दफन भी किया गया और फिर स्वामी जी ने एक बड़ी ही सुंदर कविता गुडविन की मां को लिखी है रेक्स केट इन एन पेस ये लैटिन वर्ड है इंग्लिश होगा रेस्ट इन पीस आर आईपी तो एक बड़ी ही सुंदर कविता भी स्वामी जी ने कंपोज की है तो देखिए कि इस तरह से यह मने बड़े ही डेडिकेटेड लोग थे तो उस समय की यह बात है कि यह लड़के ने कहा कि स्वामी जी आपका यह योग और वेदांत का उपदेश उसको पालन करना उसकी प्रैक्टिस करना तो बड़ी ही कठिन है आप एक काम कीजिए कुछ रिचुअल हमको प्रिस्क्रुटनी साधना वहां पर हम जाएंगे तो स्वामी जी बड़े खुश हो गए और इट स्टडी को कहा कि देखो इस तरह से ये लड़का कहता है कि इस तरह से कोई रिचुअल प्रिस्क्रिप्शन कहते थे लोगों को बुलाते थे और फिर कहते थे कि आपके जो मृत जो यह है पूर्वज उनके साथ में मुलाकात करवा देंगे अने वो प्रेत तत्व तो एक अलग था यह थियोसोफिकल सोसाइटी का था कि वह तिबेट के दो-तीन महात्मा है उनके साथ में परिचय करवा देंगे उनको बुलाएंगे उनकी एडवाइस लेंगे यानी क्या है कि एक तरह का बिल्कुल ये स्पिरिचुअलिज्म के नाम पर नाटक चलता है मृत लोगों को लाकर के खड़ा करना और उनके पास में से एडवाइस लेना तो यह सब और उस समय क्या हुआ था कि इनका भांडा फूट गया था शुरू शुरू में तो यह थियोसोफिकल सोसाइटी ब्रिटेन में बड़ी चल पड़ी थी हालांकि ब्रिटिश लोग स्वामी जी ने खुद ने कहा है फेडी नहीं है इतना फटाक करके कोई नई चीज एक्सेप्ट नहीं करते किंतु पता नहीं ये ये लोग जो प्रमोटर्स थे जो मिसेस एनी बेसेंट और कर्नल ओल कोट तो उनका करिश्मा ऐसा था कि ब्रिटिश लोग बड़े ही प्रभावित हो गए और स्वीकार कर लिया बाद में पता चला कि भीतर में सब गोलमाल है सब झूठ मूठ है कोई महात्मा फमा है नहीं तो यह सब जब उनका भांडा फुट गया था उनका स्कैंडल चल रहा था न्यूज़पेपर में प्रतिदिन प्रतिदिन ऐसा चल रहा है कि वहां अमेरिका का जो चैप्टर है थियोसोफिकल सोसाइटी का उसका इंचार्ज है जो मिस्टर जज उसने लोगों को मैंने ठग करके रुपया लिया है अपने पॉकेट में डाल दिया ऐसा न्यूज़ प्रतिदिन वहां प न्यूज़पेपर में आता था तो स्टर्डी कहता है स्वामी जी को कि आप इस तरह से कोई भी रिचुअल्स यहां पर स्टार्ट करेंगे ना तो ये रिचुअल्स को करप्ट होते देरी नहीं लग लगेगा आपको ऐसा लगता है कि रिचुअल इज अ फर्स्ट स्टेप टुवर्ड्स हायर स्टेजेस ऑफ साधना स्मरण मनन निदिद्यासन किंतु सोसाइटी में ऐसा नहीं होता लोगों का मन जो है लोगों की मानसिकता है रिचुअल विल बिकम द फर्स्ट स्टेप टुवर्ड्स द डीपर करप्शन लोग इसको इस तरह से उल्टा पुल्टा कर देंगे लोगों को पैसा ठगना शुरू कर देंगे कि यह रिचुअल कर देंगे तुम्हारा यह रोग दूर हो जाएगा तुम हमको इतना रुपया दो ठाकुर ने कहा ना कि बहुत सारे लोग यहां पर नहीं आते हैं अच्छा ही है वरना तो यहां पे एक अस्पताल खुल जाता एक डिस्पेंसरी जैसा अस्पताल जैसा खुल जाता कि लोग ठाकुर के पास आएंगे बोलेंगे यह रोग दूर कर दो वो रोग दूर कर दो एक आदमी आया था ठाकुर के पास में तो घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के आ रहा है ठाकुर ने देखा कि वहां गेट ठाकुर उस समय अपने कमरे के बाहर में ही खड़े थे उस आदमी को दूर से आते हुए देखा घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के गेट के भीतर में तो ठाकुर क्या कहते हैं उसके सर के ऊपर में मुझे तमस का ऐसा एक घना बादल देखा कि मैं मैं डर गया ठाकुर ने खुद कहा है कि मैं डर गया कि इतना घना तमस का बादल इस आदमी के सर पे है पता नहीं किस तरह का आदमी पता नहीं मेरे से क्या चाहता है तो ठाकुर खुद ये घटना का वर्णन करते हैं कहते हैं मैं दौड़ कर के अपने रूम में जाकर के छुप गया और यह रामलाल के हृदय जो कोई भी पास में था उसको जाकर के बोल दिया कि अरे वो आदमी जो आ रहा है उसको बाहर से ही रवाना कर दो बोलना मत कि मैं यहां पर हूं तो वो आदमी आया अपनी घोड़ा गाड़ी में से उतरा और फिर ये रामलाल के हृदय मुझे एगजैक्टली याद नहीं कि कौन था उनको पूछा कि ठाकुर है क्या यहां पे तो उन्होंने बता दिया कि नहीं ठाकुर नहीं है तो फिर वो वही घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के वापस चला गया तो माने क्या है कि लोग इस तरह से क्या-क्या सोचकर क्या मिन्नत मान कर के क्या अपेक्षाएं करके ठाकुर के पास में आते हैं अपने मतलब जिन लोगों के पास में इस तरह से कोई स्पिरिचुअल पावर दिखता है तो स्टर्डी ने स्वामी जी को जो मना किया कि किसी भी तरह का रिचुअल आप प्रिस्क्रिप्शन तब स्वामी जी ने सामने लेटर लिखा कि हां तुम जो बोल रहे हो मुझे अभी अभी ठीक लग रहा है ना उस समय वोह लड़के की बात सुन कर के मुझे ऐसा लग गया था कि नहीं इस तरह के रिचुअल बनाने चाहिए किंतु तुम्हारी बात सुनक के मुझे ठीक लग रहा है कि नहीं रिचुअल नहीं होने चाहिए एटलीस्ट वेस्ट में नहीं होने चाहिए पश्चिमी दुनिया में नहीं होने चाहिए भारत में तो जब स्वामी जी आए थे तो स्वामी जी को तो दर्शन हुआ था कि गंगा में से मां दुर्गा आ रही है और फिर बेलूरमठ में उन्होंने मां दुर्गा की पूजा शुरू करवाई तो वो तो चलो भारत की बात अलग है भारत के संस्कार अलग है यहां पर सबको पता है यदि आप रिचुअल को मिसयूज भी करते हैं सभी के मन में यह बात पक्की है कि रिचुअल्स है कि हायर साधना की ओर स्मरण मनन निदिद्यासन मानसिक वरशिप की ओर जाने का पहला रास्ता और फिर इवन ठाकुर को तो देखिए स्वामी जी ने कहा है कि आइडल वरशिप करके यदि ठाकुर के जैसा हुआ जाए यदि हो सकते हैं तो हजार आइडल वरशिप करो तो वो तो भारत की बात अलग है और पश्चिम की बात अलग है तो इस तरह से यदि भारत के यह जो आदर्श का विश्व में प्रसार करना है तो क्या करना है बात यह नहीं है कि भारत की दुर्गा पूजा भारत की काली पूजा भारत की दीपावली वो सबका प्रसार करें अच्छा अभी अमेरिका में तो देखिए कि दीपावली वगैरह त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाए जाते हैं तो दैट इज ओके कि अमेरिका का एक कॉस्मोप्रोफ इवन वाइट हाउस में भी दीपावली सेलिब्रेट करते हैं प्रेसिडेंट खुद अमेरिका का प्रेसिडेंट खुद दीपावली की शुभेच्छा है वो सबको देता है तो वो एक चलो उनका एक मल्टीकल्चरल नेचर है किंतु जब हम प्रचार करेंगे हिंदू धर्म का विदेश में तो हम प्रिंसिपल्स का प्रचार करेंगे आइडियाज का प्रचार करेंगे नहीं कि रिचुअल्स का अच्छा और एक भी जब ठाकुर ने यह कहा मैं इसके बारे में सोच रहा था कि ये उसको कह दो कि मैं नहीं हूं यहां पर उसको चले जाने को बोलो तो क्या यह मिथ्या कथा नहीं हो गई क्या ठाकुर तो सत्य के इतने बड़े पुजारी थे और इस आदमी को ऐसे बाहर से ही भगा दिया तो पता नहीं अभी इस इसको किस तरह से लॉजिक में बिठाया जाए कि ये यहां पर सत्य कहां से चालू होता है मिथ्या का आरंभ कहां होता है माने यह जो बॉर्डर लाइन जो है ना कभी-कभी इतनी यह हो जाती है कि अपने जो पूरे धर्मशास्त्र जो लिखे गए ना इसी तरह से वो जो मोरल ग्रे जोन जिसको बोलते हैं ना उसी पर आने लिखा गया गया है माने जो ब्लैक है वो ब्लैक है जो वाइट है वो वाइट है किंतु ये जो मोरल ग्रे जोन है वहां पर किस तरह से आपको बिहेव करना है वही उसी ये हमको यह चाहिए वरना हमको लगता है कि ये सही है तो हम सही भले चाहे हम गलत करें मन में पता है सही है और जदी गलत काम है भले सही काम है तो वो करेंगे ही करेंगे गलत काम भी यदि करते हैं मन में पता है कि ये सही नहीं है किंतु ये जो जब ग्रे न में जब चले जाते हैं सही क्या गलत क्या उसका पता नहीं चलता है उसी के ऊपर में हमको यह धर्मशास्त्र पढ़ कर के हमको वह ज्यादा डिटेल में जानकारी चाहिए होती है तो अभी यह ठाकुर भी इस तरह से कमार पुकुर आए थे अपनी पूरी साधना को समाप्त करके रिचुअलिस्टिक शक्ति साधना वेदांत साधना उसमें स्थित होकर के ब्रह्म विज्ञान में स्थित होकर के फिर वह कामर पुकुर लौटे थे तो वहां से अभी हमारी कहानी आगे बढ़ती है कल हमने देखा कि किस तरह से तोतापुरी ने कहा था कि जद भले ही चाहे तुमने मने ठाकुर तो उनके शिष्य थे तो भले ही चाहे तुमने सन्यास ग्रहण किया है तुम ब्रह्म विज्ञान में स्थित हो तुम यदि अपनी धर्म पत्नी के साथ में रहोगे तो इससे अनाचार नहीं होगा सन्यास धर्म का भंग नहीं होगा हां तुम यदि बिना किसी कामना वासना के रह सको तो यह प्रूव करेगा ऑन द अदर हैंड माने यह धर्म का भंग तो नहीं होगा बिना किसी कामना वासना के रह सको तो तुमको यह प्रूव करेगा कि यह सही सही धर्म विज्ञान में ब्रह्म विज्ञान में प्रतिष्ठित हो तो इसके बारे में हमने पूरा देखा अभी देखिए कि ठाकुर तो इस तरह से मां के साथ में रहने को तैयार थे किंतु यहां पर प्रॉब्लम एक कहां पर होता है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं किंतु भैरवी ब्राह्मणी ऊपर इ हार फल अन्य रूप होलो भैरवी ब्राह्मणी के ऊपर में यह जो ठाकुर अब मां को अपनी धर्म पत्नी के रूप में स्वीकार करके मां को व धार्मिक शिक्षा देने के लिए उन्होंने जो प्रयत्न प्रारंभ किया इस घटना का परिणाम इस घटना की असर भैरवी ब्राह्मणी के मन पर पूरी विपरीत रूप से हुई क्यों विपरीत रूप से हुई देखिए श्री मायर प्रति तहर व्यवहार प्रीति पूर्ण छलो भैरवी ब्राह्मणी का व्यव ार मां के प्रति प्रीति पूर्ण ही था अच्छा अभी भैरवी ब्राह्मणी की जो बात आ रही है तो थोड़ा सा उनका बैकग्राउंड कि हमको सबको पता है कि यह धर्म साधना और वो भी कठिन धर्म साधना जिसके लिए आप घर छोड़ कर के निकल जाते हैं वन में चले जाते हैं यह सब तो जनरली पुरुष लोग ही करते हैं बहुत ही रेयरली जैसे मीराबाई वगैरा है वे लोग तो क्या है कि राजमहल में रहकर के उनके घर में रहकर के ही उन्होंने साधना की है किंतु तो भैरवी ब्राह्मणी में एक ऐसा साहस था कि उस समय की यह बात है ठाकुर के पास में वो आई थी 1800 63 64 के आसपास में उस समय तो उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली थी और उनकी उम्र शायद 50 के आसपास होगी मैं अनुमान करके कह सकता हूं साधना में सिद्धि प्राप्त कर ली थी उन्होंने इसका अर्थ यह हुआ कि भैरवी ब्राह्मणी ने घर छोड़ कर के स्मशान में वगैरह पर रह कर के साधना कर ने की शुरुआत शायद 1850 या 1860 के आसपास में प्रारंभ कर दी होगी 1840 1850 के आसपास में तो उस समय के जमाने में इस तरह से घर छोड़ के निकल जाना और शक्ति साधना या तंत्र साधना तो बड़ी विकट साधना है आपको स्मशान में रह कर के मृत देह के साथ में यह सब साधना करनी पड़ती है एक दिन भैरवी ब्राह्मणी ने एक मनुष्य की ये जो स्कूल होता है ना मनुष्य का यह जो अपना जो सर है सर के भीतर में वह जो हड्डी उसको गुजराती में बोलते हैं खोपड़ी और इंग्लिश में बोलते हैं स्कूल मुझे पता नहीं उसका हिंदी शब्द मुझे याद नहीं आ रहा तो ह्यूमन स्कूल मनुष्य का यह जो ये है कंकाल इसके भीतर में एक मांस का टुकड़ा रांत करके ठाकुर को दिया और कहा कि अभी इसका भक्षण कीजिए तो ठाकुर तो शुरू शुरू में एकदम ये हो गए घृणा हो गई कि एक तो मनुष्य का स्कूल है उसके भीतर में मांस राधा हुआ है वो भी मने प मने सड़ा हुआ मांस कैसे खा सकते हैं तो भैरवी ब्राह्मण ने कहा देखिए घृणा का त्याग करके साधना करनी है ये लज्जा घृणा भय ये ठाकुर कहते हैं ना लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं तो ये सब जो नेगेटिव इमोशंस है उसको संपूर्ण रूप से त्याग करके आपको साधना करनी है तो ये लीजिए मनुष्य की एक खोपड़ी ये खोपड़ी के भीतर में ये जो मैंने सड़ा हुआ मांस इसको खाइए तो तुम्हारी घृणा चली जाएगी तो यह साधना करने में आवश्यक है ठाकुर ने खुद ने घृणा त्याग करने के लिए ब्राह्मण के संस्कार त्याग करने क्या से क्या नहीं किया अपने बाल लंबे हो गए थे तो लंबे बालों से वह रसिक बोलकर के वहां पर मेहतर था जो कि मेहतर का काम तो पता है ना ब्राह्मण की जात कहां मेहतर की जात कहां लोगों के वो शौचालय जो क्लीन करता है स्वच्छ करता है क्लीन करता है वो मेहतर तो वो तो कालीवाड़ा वगैरह क्लीन करता था हालांकि वहां पे इनबिल्ट वगैरह तो था नहीं शौचालय वो तो मने जो भी है तो उसका वो जहां पे सोच करने के लिए जाता था रसिक वो जगह ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन की है क्यों क्योंकि य ब्राह्मण होने का घमंड चले जाना चाहिए वो रसिक मेहतर और मैं ब्राह्मण मेरे हम दोनों में कोई डिफरेंस नहीं है तो ऐसी अपने अहंकार को तोड़ने के लिए बहुत सारी साधनाएं करनी पड़ती है हम लोग नहीं करते रामकृष्ण मिशन में मैंने रेयरली किसी को देखा है कि किसी ने किया होगा तो जाहिर में उसको डिस्कस नहीं करता मैं तो कभी करने वाला नहीं क्योंकि क्या है पता है कि यह जो अपने घमंड को एकदम चूर मार कर देना यह सब कब चलता है जबकि आपको मने निर्विकल्प समाधि में स्थित होने में अभी कुछ ही दिन बाकी है और उस समय जो घमंड का जो थोड़ा सा तीन का भी बचा है तो उसको तोड़ देना है उसके लिए यह सब साधना करनी पड़ती है हमारे लिए तो निर्विकल्प समा में जाने के लिए जन्म जन्मांतर की देरी है तो जब वो आएगा समय तब यह सब साधना करेंगे अभी हम लोग यह सब नहीं करते मैं तो कभी नहीं करने वाला इस जन्म में नहीं करने वाला तो यह घमंड तोड़ने के लिए यह सब साधना है तो सोचिए कि भैरवी ब्राह्मणी उस समय इस तरह की साधना करती थी और म उनका साहस कितना होना चाहिए कि स्त्री होने के बावजूद स्मशान में जाकर के घर छोड़ कर के उन्होंने साधना की और फिर साधना में सिद्धि प्राप्त करके भैरवी ब्राह्मणी को आदेश मिला कि तुमको तीन शिष्यों को उपदेश देना है तीन शिष्यों को साधना करवानी है तो भैरवी ब्राह्मणी इस तरह से प्रवास करते करते भ्रमण करते करते देख रही है सोच रही है मने ये तो ईश्वरीय आदेश होता है तो तो ईश्वरीय आदेश का पालन तो करना ही है तीन शिष्यों को शिक्षा देनी ही है तो पहला शिष्य उनको एक जगह पर मिल गया फिर दूसरा शिष्य एक जगह पर मिल गया उन दोनों का नाम था गिरिजा और चंद्र इस तरह से दो शिष्य तो उनको मिल गए फिर तीसरे शिष्य की तलाश में वो घूम रही थी भ्रमण कर रही थी तो वो कालीवाड़ा नौका में नौका में ही शायद आई होंगी वो वहां पर ठाकुर के साथ में मुलाकात हुई और देख कर के ही पता चल गया कि यही ये उपयुक्त शिष्य है माने ऐसा वैसा भी तो कोई भी जाकर के बोल देगा आप भैरवी है तो आप मुझे शिक्षा दीजिए तो ऐसा वैसा तो सभी को नहीं दिया जाता उपयुक्त शिष्य देखा जाता है जैसे कि तोतापुरी के साथ में ठाकुर को जिन्होंने वेदांत साधना करवाई नौका में बैठ कर के दक्षिणेश्वर आ रहे हैं देखा कि चांदनी के घाट प ठाकुर बैठे हुए देख कर के तोतापुरी ने कहा कि मैं तुमको वेदांत का उपयुक्त अधिकारी समझता हूं क्या तुम साधना करोगे मैं तुमको सिखाऊंगा तो ठाकुर तो बच्चे की तरह बिल्कुल बोलते हैं मैं मां को जाकर के पूछ के आता हूं तो तोतापुरी हंसने लगे अच्छा ये तो बच्चे जैसा स्वभाव है मां को पूछ के आएंगे फिर बाद में पता चला मां अर्थात की जगनमाथा मां काली स्वयं अभी मां काली को जाकर पूछा मैं साधना करूं मां ने कहा कि हां करो साधना तुम्हारे लिए ही इनको यहां पर बुलाया है तो इस तरह से आदेश प्राप्त करने के बाद में तो साधना की जाती है तो इस तरह से भैरवी ब्राह्मण ठाकुर को मिली दक्षिणेश्वर में ठाकुर ने भी मां के पास में आदेश ग्रहण किया मां काली के पास में और फिर तंत्र साधना करने की शुरुआत की और ठाकुर को एक के बाद एक तंत्र में जो जो पद्धतियां होती है सब पद्धति के अनुसार साधनाएं करवाई सभी पद्धति में ठाकुर सिद्ध हुए और फिर इतना ही नहीं भैरवी ब्राह्मण ही थी जिसने सभा बुला कर के सबके सामने ये ऐलान किया कि ठाकुर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है वो अवतार वरिष्ठ है तो यह था भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के जीवन में अवदान और भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के ऊपर में एक अधिकार जैसा भाव था कि अरे यह तो बच्चे ही थे मैंने ही इनको साधना करवा करके सिद्धि प्राप्त करवाई है और ठाकुर का भी भैरवी ब्राह्मणी के प्रति अपनी मां की तरह मां की दृष्टि से देखते थे एक बार भैरव अभी साथ में साधना करते तो विभिन्न भाव भी प्रकट होते हैं तो एक बार भैरवी ब्राह्मणी के मन में ठाकुर के प्रति मधुर भाव प्रकट हुआ तो यह देख कर के ठाकुर थोड़े से नाराज हो गए कहा कि मुझे यह भाव पसंद नहीं है तो इमीडिएट भैरवी ब्राह्मणी ने मधुर भाव का संवरण कर दिया ठाकुर के प्रति मातृ भाव ही रखा है तो अभी देखिए कि यह जो एक ट्रेडिशनल होता है ना कि सास और बहू की लड़ाई तो यहां पर भी कमार पुकुर में वही ट्रेडिशनल सा और बहू की लड़ाई यह भैरवी ब्राह्मणी और मां शारदा के बीच में हो रही है भैरवी ब्राह्मणी सोचती है कि ठाकुर को तो मैंने ही बड़ा किया है मैंने ही उनको इतना सिद्धि प्राप्त करवाई है अभी मां कौन होती है मां शारदा कौन होती है कि अभी आकर के एकाएक ठाकुर के ऊपर में ठाकुर के हृदय के ऊपर में इतना अधिकार जमा देगी ठाकुर मां के साथ में जितना समय बिताते थे मां को जितना सम्मान देते थे मां को मां को उपदेश देने के लिए जितना समय व्यतीत करते थे तो नेचरली भैरवी ब्राह्मणी के के साथ में इतना समय तो नहीं दे पाएंगे तो भैरवी को लगा कि ठाकुर अभी उनकी वजह से मां की वजह से मेरे से दूर हो जा रहे हैं तो यह जो ट्रेडिशनल सास बहू का जो इक्वेशन होता है अपने भारतीय संयुक्त परिवार में हिंदू जॉइंट फैमिलीज में वह यहां पर पूरा अभिनय हो रहा है तो जब ठाकुर ने मां को उपदेश देने की शुरुआत की तो गंभीरानंद जी कहते हैं कि भैरवी ब्राह्मणी के ऊपर में इसका एक विपरीत फल हुआ विपरीत असर हुई श्री माय प्रति तहर व्यवहार प्रीति पूर्ण छलो मां के प्रति भैरवी ब्राह्मणी का व्यवहार वैसे तो प्रीति पूर्ण था माए योस खन अल्पो मा की उमर कम थी तीनी भैरवी के शासुर न्याय श्रद्धा करी तेन मां भैरवी को सास की तरह अपनी सास है इस तर से उनको श्रद्धा करती थी आबार भयो जथ छलो मने माको भैरवी का भय भी बहुत लगता था भैरवी माझे माझे अधिक लौका दिया पूर्व बंगर मो तोन तरकारी राधी तेन अच्छा अभी यहां पर जो लिखा है ना भैरवी के ऊपर में भय भी था तो ऐसा होता है जो ये तंत्र साधना करते हैं जो भैरव या तो भैरवी होते हैं तो उनका जो मिजाज होता है ना टेंपर होता है ना बड़ा हाई होता है एक बार दक्षिणेश्वर में ऐसा हुआ था कि एक एक भैरवी आई थी वहां पे तो भैरवी मां के पास ठाकुर ने ही भैरवी को माने ये दूसरी भैरवी बहुत बाद की बात है तो इस भैरवी को ठाकुर ने मां के पास में भेजा तो ये टेंपर तो बड़ा हाई होता है इनका तो हाथ में त्रिशूल होता है फिर सर के ऊपर में वो लाल कलर का तिलक होता है लाल कलर के कपड़े होते हैं बड़ी-बड़ी मालाएं वगैरह होती है तो मां को जाकर के कहा कि एकदम मने नारा धमकी के सुर में कि इस तरह से मेरे लिए खाना बनाना और खाने बनाने में थोड़ा सा भी इधर-उधर हुआ याद रखना त्रिशूल मार दूंगी मैं तुमको तो इससे बड़ी भयभीत हो गई और ठाकुर के पास में जाकर के बोली देखिए वो मुझे ऐसा कह र त्रिशूल मारने की धमकी दे रही है तो ठाकुर ने कहा अरे डरो मत वो ठीक ठीक भैरवी है इसलिए उसका टेंपर हाई ही रहेगा तो माने ये भैरव मने शक्ति साधना करने से वो थोड़ा सा मिजाज तो गर्म रहता ही है इसलिए मां थोड़ी उनसे डरती भी थी तो अच्छा अभी क्या हुआ कि भैरवी माझे माझे अधिक लोका दिया पूर्व मुंगेर मोत रकारी राधी तेन माने भैरवी बीच-बीच में ज्यादा मिर्च देकर के पूर्व बंग अर्थात कि आज का बांग्लादेश पूर्व बंगाल उस उस प्रदेश के अनुसार उनकी रीति है कि ज्यादा मिर्च डाल कर के कभी-कभी साक सब्जी तरकारी बनाते हैं तो उनकी रीति के अनुसार पूर्व बंगाल की रीति के अनुसार वहां की प्रथा के अनुसार ज्यादा मिर्च डाल कर के तरकारी बनाती थी एवं रामलाल जननी और श्री माहेर पाते परिवेश करिया स्वाद संबंध मता मत जानी ते चाहि रामलाल जननी अर्थात की ठाकुर के वो जो बिचले वाले भाई है मने ठाकुर के ठाकुर तीन भाई थे सबसे बड़े रामकुमार बिचले वाले रामेश्वर तीसरे आखिर में थे गदाधर श्री राम कृष्ण तो यह रामेश्वर की पत्नी उनका उनका लड़के का नाम था यह रामकुमार तो उनको यह रामेश्वर की मां सॉरी ये रामलाल दादा रामलाल दादा की मां इनको वो बुलाती थी और उनको और मां को दोन को यह ज्यादा मिर्च दी हुई तरकारी देती थी और पूछती थी कि अच्छा यह कैसा हुआ है बोला बताओ तो तो रामलाल जननी बोलिया फेली तेन हां जे झाल होए छ तो रामलाल की मां है अभी रामलाल वही जो कि बाद में कालीवाड़ा हुआ था मने ठाकुर के रहते रहते क्योंकि ठाकुर तो पूजा नहीं कर पाते थे तो रामलाल पूजा करता था तो रामलाल की मां कहती थी अरे बाप रे इसमें इतना मिर्च डाला है किंतु भरवीर क्रोध होई ते आतो रोख जन्नो मां श भय बोलते बेश होए छ तो रामलाल की मां तो कहती थी उनकी भैरवी की तरकारी खा करर के अरे कितना मिर्च डाल दिया है किंतु मां थोड़ी डरती थी भैरवी से और वो जदी वो भी कहेगी कि अरे बहुत तीखा लग रहा है तो भैरवी तो नाराज हो जाएगी पता नहीं क्या से क्या नहीं कर देगी तो भैरवी नाराज ना हो इसलिए मां बड़े ही शांति से कहती थी कि अरे बाप रे नहीं बहुत अच्छा हुआ है बहुत अच्छा हुआ है यहां पर प तीखा खा भी रही है और मुंह से बोल भी रही है बहुत अच्छा हुआ है बोली ते बोली ते होई तो चोखे जोल रीते थाकी तो माने बहुत अच्छा अच्छा हुआ ऐसा बोलते बोलते मैंने तीखा खाते खाते आंख में से पानी भी आ रहे है किंतु क्या करी ते भैरवी शदी के ना चाहिया स गौरवे रामलाल जननी के बोली तेन तो भैरवी अभी देखिए एक तो एक होता है ना गर्व होता है कि मैंने बहुत अच्छा खाना बनाया है तो अभी मां ने तो कह दिया कि बहुत अच्छा है तो फिर वो तो एक गर्व होता है कि देखो मेरा इतना अच्छा खाना तो फिर अभी ये नहीं देख रही कि मां की आंखों में से आंसू आ रहे तीखा खाते खाते तो वो बड़ी ही गर्व पूर्वक कहती ये रामलाल की मां को कि देखो बहु मा तो बोल से भलो होए छ मने बहु मां तो कहती है कि अच्छा हुआ है तोमार बापू किछु ते भालो होए ना मने तुमको कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती तुम्हारे लिए कोई भी चीज अच्छी नहीं है तो मा के आर बेनन देबोना मने तुमको भी अभी मैं तरकारी नहीं दगी उत्तर काले घटना ती बोलिया श्री मां प्राण खुलिया हाश बाद बाद में मां ये घटना कहती थी कि आंखों में से आंसू आ रहे हैं फिर भी मैं कहती थी कि अच्छा हुआ है अच्छा हुआ है किंतु रामलाल की मां को तो ऐसा कोई डर नहीं था बोल देती थी कि बड़ा ही तीखा हुआ है तो भैरवी ब्राह्मणी थोड़ी नाराज हो कर के बोलती थी कि बहु मां को देखो कि वो तो बोल रही है अच्छा हुआ है ही को जब जितने भी प्रॉब्लम यह नहीं अच्छा है यह नहीं अच्छा है अभी तुमको तरकारी नहीं दूंगी और यह बोलते बोलते मां हस्ती भी बड़ी थी माने ये सुमधुर एक प्रसंग है भैरवी ब्राह्मणी एक दिन श्री रामकृष्ण के मालदी द्वारा श्री गौरांग बेसे सजले एक दिन भैरवी ब्राह्मणी ने क्या किया माला वगैरा पहना करके ठाकुर को गौरांग के वेश में सजाया एवं ई मनोहर बेश दर्शन जन्नो श्री मा के डाकिया आनील और ठाकुर इतने सुंदर दिखते थे गौरांग के वेश में सज करके माला वगैरह अच्छे कपड़े पहन के कि भैरवी ब्राह्मणी ने मां को बुलाया कि आओ ठाकुर का दर्शन करो देखो कितने सुंदर दिखते हैं तीनी आशिया देखिले ठाकुरे भावेश होया छ मां ने आकर के क्या देखा ठाकुर को भाव का आवेश हुआ है इहा ते तहर केमन जनो भय होलो यह देख कर के मां को थोड़ा सा डर लगा तरान ब्राह्मणी जखन प्रश्न कोरी लेन केमन होए छ इसलिए मां को डर लगा माने तो कभी इस तरह से भाव समाधि वगैरह देखा नहीं है ठाकुर के साथ में कुछ दिन रही थी किंतु यह ठाकुर बार-बार भाव में चले जाते थे और उनका एक दूसरा स्वरूप प्रकट होता था बेचारी मां को तो डर लगेगा ही लगेगा तो भैरवी ने जब पूछा कि अच्छा कैसा सजाया है मैंने बताओ तो तुम तुम्हारा क्या ओपिनियन है तो खन तीनी बेश होए छे बोलिया प्रणाम नंते रतो चलिया गले मां ने कहा भैरवी ने कहा कि कैसे हुए हैं कैसा सजाया है मां ने कहा बहुत सुंदर सजाया है ऐसा बोलकर ठाकुर को प्रणाम करके वहां से भाग करके चली गई दौड़ करके चली गई संभवत ही अनिर्वायता है कि यह जो भय था भय के साथ में एक लज्जा भी मिश्रित थी कारण आमा दिग के मने राखी ते होई बे जे श्री मा तखन लज्जा पटा वृता नव बधु माने हमको याद रखना होगा कि लज्जा के आवरण में आवृत नव वधु थी मां उस समय भी इस तरह से नव वधु थी श स्वश थानिया ब्राह्मण सम्मुख पति सन्निन तहर अज्ञात सारे ओ कोनो चपलता चोलेना यह जो सास की तरह उनकी सासरी की तरह भैरवी ब्राह्मणी थी अभी अज्ञान वसत भी मने बिना सोचे समझे भी यदि गलती से भी ठाकुर के सामने कोई उनका व्यवहार चपलता या तो फिर चंचलता प्रकाशित ना हो जाए यह देखना बड़ा ही आवश्यक था आर स्वभाव तो धीरा श्री मायर चरित्रे उ हार नितांत अभाव छलो स्वभाव से ही मां का स्वभाव धीर स्थिर था तो मां के स्वभाव में इस तरह की चपलता या चंचलता होना वैसे ही मने था ही नहीं मां के स्वभाव में अच्छा ये जो कहा है इसको थोड़ा सा सोचना पड़ेगा कि ठाकुर के सामने चपलता या चंचलता के न हो प्रगट इसका क्या अर्थ है थोड़ा सा डिटेल में इसका डिस्कशन करना पड़ेगा जो कि हम कल करेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु
Question Answer
और ठाकुर ठाकुर कहते थे ना कि मां बेचारी दक्षिणेश्वर आती है और बीमार होती है डा जेंट्री वगैरह हो जाता है तो फिर बेचारी को जयराम बाटी जाना पड़ता था तो ठाकुर ने एक बार हृदय को बोला था ये देखो कि यह ऐसा ही है मां के साथ में बेचारी आती है दक्षिणेश्वर और चले जाना पड़ता है आश बे आर जाबे मानुष जीवन एई जन्म मृत्यु जरा व्याधि आती है और जाती है क्या करेंगे सुंदर प्रश्न है कि भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को पहचान लिया कि उच्च कक्षा के साधक है और बाद में ठाकुर को ही अवतार वरिष्ठ के रूप में उनका प्रचार किया तो मातो मने वो फिर शक्ति साधक थी मने शक्ति साधना में ही जगदंबा की बात आती है तो मां की धर्म ठाकुर की सहधर्मिणी तो ऐसी वैसी कोई गांव की कोई बाला नहीं होगी जगदंबा स्वयं होगी वो भैरवी ब्राह्मण यह पहचान नहीं पाई आश्चर्य की मैंने सही में मैंने भी ऐसा नहीं सोचा था यहां तक कि देखिए ना ठाकुर के ये बाकी सब भी ये स्वामी जी ने मां का प्रचार सबसे पहले किया विज्ञानानंद जी महाराज का वो फेमस है ना इंसिडेंट कि मां आई है तो स्वामी जी ने विज्ञानानंद जी को बोला जाओ पेशन जाओ मां को प्रणाम करके आओ तो विज्ञानानंद जी महाराज अपने अपने हाथ से लिखते हैं एक बात अपने मुंह से कहते हैं कि मैं मां को प्रणाम किया और खड़े खड़े ही प्रणाम करके आ रहा हूं तो जैसे ही पीछे मुड़ा एकदम डर गया स्वामी जी स्वामी जी पीछे खड़े थे मैंने स्वामी जी ने सिर्फ ऐसा नहीं कहा कि तुम जाकर प्रणाम करके आओ स्वामी जी पीछे पीछे गए और देखा कि किस तरह से प्रणाम करता है देखा कि खड़े खड़े प्रणाम किया तो स्वामी जी ने धमक दिया कि अरे ऐसा प्रणाम नहीं करते मां को साष्टांग हो प्रणाम करो तब कहीं जाकर विज्ञानानंद जी ने साष्टांग प्रणाम किया भैरवी ब्राह्मण तो नहीं पहचान पाई डायरेक्ट डिपल नहीं पहचान पाए थे मने डायरेक्ट डिपल कौन थे जो कि ठाकुर के साथ में जन्म जन्मांतर से आते थे मने वो अपने पुराने साधु जो कहते है ना कि लोग स्वामी जी को पढ़ के पहले कन्वींस होते हैं फिर यहां पर आते हैं [हंसी] भावधारानी करने को जाऊंगा ऐसा तो होने वाला किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता ये अहंकार की बात है मुझे लगता हैय मां का ग्रेस है मैंने आप जितनी ही चाहे साधना कर लो जब तक मां का ग्रेस नहीं होगा ना मने मोर देन मोर देन ठाकुर एंड स्वामी जी स्वामी जी को पढ़ने के लिए इंटेलेक्चुअल एक्यूमेंट चाहिए समझने के लिए ठाकुर को समझने के लिए साधना करनी पड़ती है बट मा इज प्योर ग्रेस आप हजार साधना कर लो ना कर लो मुझे पर्सनली मेरा जो ओपिनियन है कि जब तक मां का ग्रेस कृपा नहीं होगी हम नहीं पहचान पाएंगे व वहां पर साधना और अहंकार मुझे नहीं लगता कि मां के पास में वो सब चलता है डिस्क्लेमर स्मल प्रिंट स्मल प्रिंट वहां पर बड़े बड़े अक्षर लिखा है कि 000 में आपको बाइक मिल जाएगा फिर वहां पर छोटे अक्षर में लिखा है फिर इतनी इतनी कंडीशन अप्लाई होगी सलूशन नहीं है ठाकुर ने खुद अजामिल के बारे में है ना अजामिल का क्या हुआ पूरा जीवन भगवान को गाली दिया आखिर में जाने के समय अपने लड़के को बुलाया नारायण तो उसी में उसको मुक्ति मिल गई तो उसका सोल्यूशन क्या है कि बाद के जन्म में अजामिल ने बहुत तपस्या की थी तो मैंने इस तरह से आप इसको गोल गोल घुमा ही सकते हैं आखिर में यह बात होगी कि यदि नारायण को इतना गाली देते हैं तो नारायण का नाम अपने बच्चे को क्यों दिया वह भी तो कहीं सबटेरेनियन वो चल रहा होगा एक काउंटर मने कल्चर तोय अपने पुराणों में जहां पर भी देखि उदाहरण कुछ कॉन्फ्लेट मिलेगा ही मिलेगा इसमें प्योर सोल्यूशन नहीं है पैराडॉक्स ह्यूमन नेचर ह्यूमन नेचर है और देखिए अभी आजकल का जो ट्रेंड चला है ना कि घर माने मैरेज होने से ही सेपरेट हो जाना तो ठीक है माने अभी जद दोनों में इतना मैच्योरिटी है सास बहू में कि वह जब नई बहू आती है तो उसको इतना फ्रीडम दे उसको उनका एक्सप्रेशन करने का मौका दे तो यह नहीं होगा आजकल क्या होता है बहुत सारे लोग बहु को हीने उसी को दोष देते हैं कि व सास की सेवा नहीं करनी चाहती इसलिए सेपरेट होना चाहती है किंतु मैंने तो उनका भी जद पॉइंट ऑफ व्यू देखेंगे तो फिर उनको बात बात में उनको आप दबा करके रखेंगे मने तो भी तो ठीक नहीं है ना सास का तो मातृभासा में जितना प्रेम करेगी उतना ही प्रेम सास को बहू के साथ में करना चाहिए माने ये तो दोनों हाथ से ताली बजती है ना आप यदि एक ऐसा एक ट्रेडिशनल अप्रोच रखेगी सास जदी कि अभी बहू आई है तो घर का काम निकाल दो मने मने एक मुफत की घर काम वाली ही एक मिल गई है एक ऐसा जद एटीट्यूड रखेंगे तो यह भी तो ठीक नहीं माने आजकल जो बह की जो बारबार निंदा होती है य जितने भी सास बहु ड्रामा है बहुत बार देखेंगे कि बह की निंदा होती है किंतु तो ताली तो दोनों हाथ से बचती है मैं कह रहा हूं कि दोनों हाथ से ताली बजती है ऐसा ऐसा नहीं एक ही दोनों हाथ से ताली बजती ताली बजेगी दोनों हाथ से बजेगी एक्चुअली बुद्धिस्म में एक है बुद्धिज्म में ये जो क्वान बोलते है ना अ पजल देंगे पोएट के रूप पोएट्री के रूप में तो एक पजल ऐसी होगी कि आपको वो इंस्टेंट इनलाइटनमेंट का होता है ना वो जन बुद्धिज्म में खास करके तो एक एक पजल देंगे आपको उसको बोलते हैं कन तो ऐसा एक उसका कोई सलूशन नहीं है तो एक ऐसा है क्वान कि द साउंड लिसन टू द साउंड ऑफ क्लेपियरे गुरु शिष्य को ये पजल देंगे अभी शिष्य बेचारा सो सोते सोचते परेशान हो जाएगा कि अरे एक हाथ से कैसे ताली बजेगी एक हाथ से तो ऐसा आप हवा में हाथ मारते रहेंगे ताली थोड़ी ना बजने वाली है तो जैसे जैसे सोचता जाएगा सोचता जाएगा उसको पता चलेगा कि एक हाथ से ताली बचती ही नहीं है फिर इसका मेटा फिजिकल मीनिंग क्या है ये जगत है ही नहीं जगत में जो देख रहा हूं वो सब मिथ्या है तो ये जैसे ही उसको समझ में आएगा जगत मिथ्या है वैसे ही उसको इनलाइटनमेंट हो जाएगा तो सास बहु के मामले में यही है कि एक हाथ से कभी ताली नहीं बजने वाली है दो हाथ से ही बजने वाली है जब इसको यह पता चलेगा तब वह सास बह का झगड़ा मिट जाएगा किंतु जब ठाकुर की बात आती है ना अब कृष्णा की एक कॉन्टेक्स्ट था ठाकुर ने खुद कहा है मां को कि ये लो तुम्हारी सूची ये लो असू च ऐसा करके मां के चरणों में सब कुछ दे दिया किंतु यह नहीं कह पाया कि यह लो तुम्हारा सत्य यह लो तुम्हारा असत्य मैं सत्य को मां को नहीं दे पाया क्यों क्योंकि कलयुग में सत्य ही तपस्या है ठाकुर के साथ में बार-बार हुआ है बलते है कि हंसी मजाक में भी मिथ्या कथा मत बोलो एक बार राजा महाराज आए आए थे तो बोला ठाकुर ने उनका चेहरा देख कर के बोला अरे तुम कोई महापाप करके आए हो तो अभी यह तो राजा महाराज खुद अपने हाथों से लिखते हैं कहते हैं कि अरे हम लोग तो पाप का अर्थ समझते थे कि चोरी करना डके डालना किसी पर अत्याचार करना इसको हम इस तरह से पाप करते हैं ठाकुर क्यों ऐसा कह रहे कि तुम बड़ा ही अन्याय काम करके आए हो तब ठाकुर ने कहा कि तुम सोच के देखो तो फिर राजा महाराज को लगा कि हां मैं हंसी मजाक में एक बार झूठ बोला था ऐसा मजाक मजाक में तो ठाकुर ने कहा मजाक मजाक में भी झूठ मत बोलो तो ठाकुर के लिए जो ये आपने कहा ना कि एब्सलूट क्या है जिसके ऊपर में आप सब कुछ मेजर कर सकते हैं तो ठाकुर के लिए वो एब्सलूट सत्य था मने एब्सलूट मानदंड था मेजरमेंट था सत्य का तो अभी अभी जैसे मैंने बोलने के समय तो बोल दिया किंतु अभी मुझे भी थोड़ा सोचना पड़ेगा कि ठाकुर ने एगजैक्टली क्या कहा था ठाकुर ने ऐसा कहा था कि तुम कह दो कि मैं यहां पर नहीं हूं या तो फिर तुम उनको कैसे भी बोल कर के विदाई कर दो ऐसा कहा था अभी एक्जेक्टली ठाकुर के शब्द मुझे याद नहीं आ रहे मुझे देखना पड़ेगा किंतु एनीवे ये तो ऐसा तो हुआ ही हुआ कि ठाकुर है वहां पे और वो ऐसा कैसा बिना बहाना करके उसको वापस ले जा रहे हैं माने ये मोरल ग्रे जोन में तो आ ही गया सत्य और असत्य के बीच में कहीं पे आ ही गया तो अभी इसके लिए इस घटना का इतना एक ये हो जाता है भगवान कृष्ण ऐसा हजार चीज करेंगे हमको कोई फर्क नहीं पड़ता गोपियों को अपने पति के साथ में से निकाल कर के उनके साथ में रास लीला करने के लिए बुलाते थे तो कृष्णा के लिए तो सब संभव है ठाकुर के लिए सत्य एक एब्सलूट मेजरमेंट था तो इस घटना का मैंने अभी मैं बोल रहा था ना तभी मुझे स्ट्राइक हुआ कि इसमें असत्य तो नहीं आ गया सत्य की तपस्या भंग तो नहीं हो गई मुझे इसके बारे में सोच कर के थोड़ा उन्हे मैंने रिसर्च करना पड़ेगा कि एक्जेक्टली क्या है क्योंकि इसके पहले मैंने भी इसके बारे में ऐसा नहीं सोचा था और ठाकुर का सत्य मैंने एकदम पकड़ के रखा है बाकी सब चीजों में कुछ भी हो जाए सत्य में गड़बड़ नहीं होनी चाहिए ऐसा ठाकुर का था इसलिए घटना का ज्यादा महत्व हो जाता है मैं थोड़ा सा और सोचूंगा और फिर थोड़ा सा और इसके बाद डिस्कस करेंगे ये पहली बार मेरे मन में आया है तो थोड़ा सोचना पड़ेगा