मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य [गाना गाने की आवाज़] सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार [गाना गाने की आवाज़][संगीत] वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
Method of Meditation
ध्यान के इस क्लास में अपना सेकंड क्लास है और सुबह का जो अपना क्लास है उससे इसमें डिफरेंस यही है कि हम सबको जिस तरह से मैं गाइड करता हूं सबको प्रैक्टिस करनी है और इसीलिए भले ही चाहे अल्पसंख्यक ही क्यों ना हो हम किंतु यह जो वाइब्रेशन खड़ा होगा ध्यान का आई होप कि इवन ऑनलाइन भी हम सब शेयर कर पाएंगे। जैसे कल ही हमारा यहां पर आश्रम में मेडिटेशन गाइडेड मेडिटेशन का क्लास होने वाला है। सो मैं वहां पे जो मेथड्स सीखा हूं ऑलमोस्ट वन एंड हाफ इयर्स से मैं यह प्रैक्टिस अह इन लोगों को सिखा रहा हूं। तो वहां पर जो मेथड्स मैंने सीखी है वही मेथड हम यहां पर अप्लाई करेंगे। बस वही डिफरेंस है कि वहां पर हम सब लोग एक ही साथ में मेरी ऑफिस में बैठते हैं। मेरा ऑफिस बहुत ज्यादा नहीं बड़ा है। 15 लोग आराम से आ जाएंगे किंतु इससे ज्यादा नहीं। तो जो पार्टिसिपेंट है वह भले ही कम है संख्या में किंतु बड़े सिंसियर हैं। और इसका परिणाम यह है कि जब हम ग्रुप में चटिंग करते हैं या तो ग्रुप में मेडिटेशन करते हैं तो होता क्या है कि एक मल्टीपाइंग इफेक्ट होता है। वैसे तो हम सबको पता ही है कि किस तरह से रामकृष्ण संघ में हमको ध्यान करने को सिखाया जाता है। रामकृष्ण संघ की जो स्टैंडर्ड पद्धति है जपात सिद्धि ही जपात सिद्धि ही जपात सिद्धि ही श्री मां शारदा देवी ने हमको कह दिया है तो यदि हम जप करते हैं तो वह एक अकेले बैठकर के करने हो गया। वहां पर आपको ग्रुप में यदि जप करेंगे तो बेनिफिट अवश्य है। जैसे कि हमारे किसी भी मंदिर में जाइए बेलूर मठ में यदि आपको रहने का सौभाग्य मिला होगा तो आपने देखा होगा कि वहां का जो मेन टेंपल है मेन टेंपल में सुबह को अर्ली मॉर्निंग को सभी ब्रह्मचारी ट्रेनिंग सेंटर के और मठ के सभी साधु एक साथ में बैठकर के जप करते हैं। ऑलमोस्ट 60 70 साधु मिनिमम होंगे सुबह को जप करते हुए तो क्या है कि वो एक ग्रुप प्रैक्टिस हो गया। वहां पर इंटरेक्शन नहीं है। सब लोग अपना अपना ही जप करते हैं। किंतु क्या है कि वह एक भाव खड़ा होता है। अभी हम लोग पूरे भारत में बिखरे हुए हैं। अ कोई यहां पे ईस्ट, कोई वेस्ट, कोई नॉर्थ तो कोई साउथ तो कोई सेंटर। तो अभी यहां पर यदि हम सिर्फ जप करेंगे तो वह जो एक वाइबेशंस खड़े होने चाहिए अ होंगे ऐसी मैं आशा रखता हूं। किंतु इसके लिए ना एक बेटर उपाय है और वो है कि हम लोग गीता का पाठ करेंगे और गीता का पाठ करके आखिर में क्या करेंगे? गीता का पाठ हुआ। फिर हमने ध्यान किया। पाठ हुआ फिर ध्यान किया। पिछली बार मैंने देखा कि मैं तीन-तीन श्लोक के बाद में ध्यान करवाता था। तो कभी-कभी ऐसा शायद हो सकता है कि तीन श्लोक के बाद में ध्यान करना फिर तीन श्लोक के बाद में ध्यान करना। ऐसा करके एक कंटीन्यूअस ध्यान का एक्सपीरियंस है। वह शायद नहीं आता। वैसे यहां पर मैं तीन श्लोक इसलिए करवाता हूं क्योंकि सब स्टूडेंट ही है। उनको ध्यान का ऐसा कोई अनुभव नहीं है। किंतु अभी यहां पे बिकॉज़ कि आप लोगों का इनफ एक्सपीरियंस है मेडिटेशन का, जप का तो बेटर है कि श्लोकों की संख्या बढ़ाई जाए। 16वें अध्याय के बारे में मैंने आपको कहा था श्रीमद्भगवत गीता के 16वें अध्याय में आप देखिए कि 24 श्लोक हैं। तो हम लोग क्या करेंगे? आठ आठ के तीन हिस्सों में बांट देंगे। पहले आठ श्लोक उसके बाद में ध्यान उसके बाद में आठ श्लोक उसके बाद में ध्यान फिर आखिर में आठ श्लोक फिर उसके बाद में ध्यान। देखिए यदि हम लोगों की ध्यान करने की कैपेसिटी बढ़ती जाती है तो फिर 10 श्लोकों के बाद में ध्यान और फिर ऐसा होगा तो इवेंचुअली पूरा चैप्टर पाठ करके ध्यान करेंगे। गीता के श्लोक का ध्यान करने से पहले महात्म क्या है? वह हमने पिछली बार भी डिस्कस किया था। इस बार भी देख लेंगे कि ध्यान करने के समय हमारा मन सात्विक अवस्था में होना चाहिए। तीन अवस्थाएं मन की सबको पता है। तमस, रजस और सत्व। अनफॉर्चूनेटली होता क्या है कि दिन भर का हमने काम किया है। दिन भर के रिस्पांसिबिलिटीज ली है। इसकी वजह से अभी इस समय हमारा मन या तो तमस में है या तो रजस में है। तो पहले तो मन को खींच करके सत्व में ले जाना होगा। इसके बाद में हम अच्छे से ध्यान कर पाएंगे। तो यह जो मन को खींच करके तमस और रजस में से सत्व में ले जाना यह सिर्फ ध्यान से नहीं होगा। बहुत बार हम ऐसा सोचते हैं कि चलो मैं ध्यान करके ही तमस से रजस में रजस में से सत्व में चला जाऊं। किंतु जनरली ना ऐसा होता नहीं है। मुश्किल होता है। क्योंकि ध्यान की कैपेसिटी ध्यान की क्षमता हमारी इतनी ज्यादा नहीं है। तो फिर हम क्या करेंगे? एक एसोसिएटेड प्रैक्टिस है यह गीता चेंटिंग उसका आश्रय लेंगे। गीता चेंटिंग के माध्यम से भगवान के कहे हुए इस दिव्य स्वरों के माध्यम से हम अपने मन को एलिवेट करेंगे। तमस में से रजस में ले आएंगे। रजस में से सत्व में ले आएंगे। इसके बाद में होगा क्या? गीता का पाठ करके अपने पास में वह क्षमता खड़ी होगी कि जिससे क्या होगा कि यह जो वाणी है यह स्वर है ईश्वरीय यह जो उपदेश है वो मेरे जो सराउंडिंग है उसमें स्प्रेड होगा और उससे मेरी जो संकल्प शक्ति है विल पावर है वह बढ़ेगा हमेशा याद रखिए कि ध्यान के भीतर में ध्यान करने के समय संकल्प शक्ति का आशरा लेना बड़ा ही आवश्यक है। कोई भी अन्य प्रैक्टिस है जैसे कि जप करना जैसे कि प्रार्थना करना जैसे कि भक्ति मूलक कोई भी साधना करना। उसमें आवश्यक होता है शरणागति और श्रद्धा। जबकि ध्यान एक ऐसी प्रैक्टिस है। ध्यान और ज्ञान। यह राजयोग और ज्ञान योग। यह दो ऐसे हैं कि आपको प्रचंड संकल्प शक्ति चाहिए। प्रचंड विल पावर चाहिए। बहुत सारे लोग इस की फैक्टर जो है उसको समझ नहीं पाते। बोलकर के वे लोग शरणागति के माध्यम से ध्यान करने का प्रयास करते हैं। ऑफकोर्स शरणागति के माध्यम से भक्ति श्रद्धा के माध्यम से यदि जप हो सकता है तो ध्यान क्यों नहीं होगा? पक्का होगा। किंतु यदि हम संकल्प शक्ति भी बढ़ाए साथ में शरणागति के साथ में तो ध्यान सहज हो जाएगा। वरना क्या है? फिर ध्यान में हमको थोड़ा सा स्ट्रगल करना पड़ेगा। तो वि दिस अंडरस्टैंडिंग कि गीता के श्लोक का क्या तात्पर्य है? क्या महात्म्य है? कि उसका चटिंग करके उसका पाठ करके एक पवित्र वातावरण हमारे चारों ओर प्रकट होता है। इस पवित्रता को हमको इंटरनलाइज करना है। रिवर्स करना है। अपने हृदय में बिठाना है और फिर इस पवित्रता के माध्यम से संकल्प शक्ति जागृत होगी। जो कि हमारे मन को जो कि 10 दिशाओं में दौड़ा चला जा रहा है। बार-बार खींच करके एक जगह पर बिठाएगा। जैसे छोटा बच्चा होता है शरारती शिशु बाल गोपाल की बहुत सारी कहानियां प्रसिद्ध है। तो मां यशोदा कैसे बार-बार पीछे में दौड़ के बाल गोपाल को अपनी गोद में लेकर बिठाती है। जैसे कि वह शरारत ना करें। तो अपना मन भी जो है इस तरह का शरारती मन है। अभी यहां पर दौड़ा कभी यहां पर दौड़ा। तो यह मां यशोदा की तरह स्नेह से बहुत सारे लोग मन के साथ में झगड़ा करने का प्रयास करते हैं। मन के साथ में फाइट करने का प्रयास करते हैं। वह भी एक है। कथामृत में ही देखिए ठाकुर कहते हैं तू या हमार की बिगड़ नेवी माने तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी? तुम मेरा क्या तुम मेरी क्या क्षति कर लोगी? तो ऐसा जब ठाकुर एकाएक बोल उठते हैं तो मास्टर महाशय अभी ठाकुर इसकी कोई व्याख्या तो नहीं करते कि क्यों ऐसा कहा है किंतु मास्टर महाशय इसकी व्याख्या करके कहते हैं कि क्या माया ठाकुर को कोई प्रलोभन में बांधने के लिए आई थी क्या तो इसके लिए क्या ठाकुर ने माया का विरोध किया क्या ऐसा करके मास्टर महाशय लिखते हैं तो क्या है माया रूपी मन माया तो मन में ही मन ही तो कभी अपना बंधु है। मन ही तो कभी अपना दुश्मन है। तो माया ही यह दुश्मन का रूप लेकर के हमारे साथ में झगड़ा करने को आती है। हमको प्रलोभन में फंसाने को आती है। तो इसके लिए हम फाइट करें कभी-कभी वह उचित है। उससे बच के भागना नहीं है फाइट से। किंतु अल्टीमेटली स्नेह पूर्वक मन को पकड़ना है। तो इसके लिए फाइट करना है या स्नेह करना है। संकल्प शक्ति चाहिए। तमस में से रजस में आना है। रजस में से सत्व में जाना है। गीता पाठ का महात्म है। यह दो चीजें हमको देना। संकल्प शक्ति को बढ़ाना। दूसरा कि मन को तमस से रजस। रजस में से सत में ले जाना। तो अभी हम गीता पाठ प्रारंभ करेंगे। यह 16वा अध्याय मैं प्रत्येक श्लोक प्रत्येक कड़ी जो है दो बार करके इसका पाठ करूंगा। यदि आपको आता है यह गीता चेंटिंग ऑलरेडी तो मेरे साथ में दो बार पाठ करेंगे तो अच्छा ही है। ज्यादा आपका यह डेवलप होगा संकल्प शक्ति और यदि आपको नहीं आता है तो एक बार सुन लीजिए। दूसरी बार मैं जब रिपीट करता हूं तो मेरे साथ में स्वर से स्वर मिलाकर के पाठ कीजिए।
Gita Chanting (1)
श्री भगवान उवाच [गला साफ़ करने की आवाज़] श्री भगवान उवाच अभयंम सत्व संशुद्धि ज्ञान योग व्यवस्थित दानम दमश्च यज्ञश्च दानम दम यज्ञ स्वाध्याय तप आवम स्वाध्याय तप आर्जवम अहिंसा सत्यम क्रोध त्याग शांति रपशम त्याग शांति शांति रपुनम दयाभूतेश्वलो लुप्तम दयाभूतेश्वलो लुप्तम मार्वम रे रचापलम मार्वम रे रचापलम तेज क्षमा धुतिह शौचंम तेजह क्षमा धुतिह शौचम अत्रो नातिमानिता अत्रो हो नातिमान मानिता भवती संपदम देवीम अभी जातस्य भारत अभसस्य भारत दंभो दर्पो भीमा मानस दंभो दर्पोमानस क्रोध पारुष्यवच अज्ञानम चा भिजातस्य अज्ञानम चा भिजातस्य पार्थ संपदमाम पार्थ संपद मासुरिम जब भी आप पाठ करते हैं एक बात का ख्याल रखना है कि आपका जो आवाज है वह एकदम क्लियर होना चाहिए। आपका जो आवाज है स्पष्ट होना चाहिए। जिससे कि क्या है कि यह वाइबेशंस तभी खड़े होंगे। अदरवाइज क्या होगा कि यदि आप मन में मन में बोलेंगे धीरे-धीरे करके बोलेंगे तो गीता पाठ का जो हमको बेनिफिट होना है वो नहीं होगा। मीनिंग मीनिंग के लिए हम एक दूसरा क्लास करेंगे। अभी क्या है कि गीता पाठ करके जो वाइबेशंस खड़े होते हैं उसका बेनिफिट ले हमको ध्यान करना है। ध्यान में यदि मैं लंबा एक्सप्लेनेशन देने को जाऊंगा तो वह मूड गड़बड़ हो जाएगा। इसके लिए श्लोक नंबर फाइव दवी संपत विमोक्षाय देवी संपद विमोक्षाय निबंधाया सुरी मता निबंधाया सुरी मता माशुच संपदम देवीम माशुच संपदम देवीम अभी जातो सी पांडव ध्वभ भूत सर्गो लोकेस्मिन दव आसुर एवच दवो विस्त स्तर श प्रोक्त देवो विस्त प्रोक्त आसुरम पार्थमेणु आसुरम पार्थमे श्रणु प्रवत्तिम च निवत्तिम च प्रवृत्तिम च निवत्तिम च जना विदुरासुराह जना विदुरा सुरा न शौचम ना पिचाो न शौचम ना पिचाचारो न सत्यम तेु विद्यते असत्यम प्रतिष्ठम ते असत्यम प्रतिष्ठम ते जगदाहुनीश्वरम जगदाहुनीश्वरम अपरस्परसभूतम अप परस्परसभूतम कीमन्यत कामहतुकम कीमन्यत कामहकम वेरी गुड अभी
Practice of Meditation (1)
ध्यान कैसे करना है? पिछली बार भी हमने डिस्कस किया था। सीधा होकर के बैठना है। जितना सीधा हो सके कंफर्टेबली बैठना है। कंफर्ट बड़ा इंपॉर्टेंट है। दूसरा कि नजरों को झुकाना है। कभी भी नजरों को बंद नहीं करना। हमेशा हमेशा ख्याल रखिए। पिछली बार भी यह जो कुछ नियम है हमने बात किया था कभी भी आंखों को बंद नहीं करना। दूसरा कि कभी भी अपने सर के भीतर में ध्यान नहीं करना। आज्ञा चक्र पर ध्यान नहीं करना। ध्यान हमेशा करना है अनाहत चक्र में। ध्यान हमेशा करना है अपने हृदय में। तो आंखों को झुकाया। हृदय पर मन को एकाग्र किया और इमेजिन [संगीत] किया कि भगवान राम कृष्ण वही दक्षिणेश्वर [संगीत] में अपने कमरे में विराजमान है। रात्रि का समय है। चारों ओर शांति फैली हुई है। [संगीत] और ठाकुर भी खाट पर बैठे हैं। बगल में जो छोटी खाट है मां शारदा देवी विराजमान है। स्वामी विवेकानंद प्रमुख गुरु भ्राता गण भी जमीन पर बैठे हुए हैं। हम भी इन गुरु भ्राताओं के साथ में ठाकुर के सामने ही विराजमान है। इस दृश्य को अपने मन में स्थिर कर देना है। [संगीत] और फील करना है श्री रामकृष्ण देव का आशीर्वाद। उनकी प्रेजेंस हमारे पूरे देह में फेल करके [संगीत] हमको शीतल निर्मल पवित्र कर रही है। [संगीत] यदि कोई जप करना चाहता है साथ में तो जप भी कर सकते हैं। हाथ में माला लेके [संगीत] या कर जप भी कर सकते हैं। जप और ध्यान दोनों एकत्र करना अच्छा ही है। बुरा कुछ नहीं। ओम ओम हम्म ओम धीरेधीरे करके अभी ध्यान से बाहर आइए। हरि ओम
Gita Chanting (2)
ठीक है? तो फिर अभी हम गीता के श्लोकों का फिर से पाठ करेंगे और उसके बाद में फिर से एक बार ध्यान करेंगे। आठ श्लोक हो चुके हैं हमारे। अभी न टू 16 [गला साफ़ करने की आवाज़] एताम दृष्टि मवष्टभ्य नष्टात्मोबुद्धय प्रभवंतग्र कर्माण प्रभवग्र करण क्षया जगत हिता क्षया जगतो हिता काममा शित्य दुष्पूरम काममा श्रित्य दुष्परम दंभमान मदानविता दंभमान मानविता मोहित्वा सदग्राह मोहित्वा सद्ग्राह प्रवरते चवता प्रवरते चवता चिंताम परिमेयाम चिंताम परिमेय च प्रलयता मुशता प्रलयता मुशता कामोपभोग परमा कामोपभोग परमा एता वदिति निश्चिता आशा पाश शत बद्धा काम क्रोध परायणा इहते काम भोगार्थम इहते काम भोगार्थम अन्यायनार्थ संचयान अन्यायनार्थ संचयान इद मध्य मया लब्धम इद मध्य मया लब् इम प्राप्त मनोरथम इदमस्त दम पीमे इदस्त दमपी में भविष्यति पुनर्धनम भविष्यति पुनर्धनम असौया हतः शत्रु असौया हतः शत्रु अनिश चाचा परापी अनिश चापी ईश्वरो महम भोगी सिद्धो हम बलवान सुखी आढ्यो भी जनवास्म कोन्योस्त सदृश ोया कोन्योस्ते सदृशोया यक्षेदास्यामोष्य यक्षेतास्यामोष्य इत्य ज्ञान विमोहिता इत्यज्ञान विमोहिता अनेक चित्त विभता अनेक चित विभता मोह जाल समावता प्रसक्ता काम भोगेशु पतती नरकेशु चौ पतती नरकेेशु चौ वेरी गुड सेकंड फेस फिर से वही ध्यान और
Practice of Meditation (2)
नॉट नेसेसरी कि आप सिर्फ दक्षिणेश्वर के बारे में ही सोचे और भी कोई भी सीन है आप अपने हृदय में प्रकट कर सकते हैं। जैसे कि मैं खुद बहुत बार सोचता हूं कि दक्षिणेश्वर जाने के लिए नौका में मैं बैठा हूं। रात्रि का समय है। चारों ओर आकाश तारों से भरा है। और वही तारे जैसे कि मां गंगा में भी बह रहे हैं। और इस तारों भरी मां गंगा के बीच में से छोटी सी नौका में मैं बेलूर मठ से दक्षिणेश्वर जा रहा हूं। तो यहां पर बेलूर मठ का मेन टेंपल दिखता है। यहां पर मां स्वामी जी सब समाधि मंदिर दिखते हैं। और सामने ही जैसे कि दक्षिणेश्वर है। और यह तो अपनी इमेजिनेशन की दुनिया है। तो आपको वहां दक्षिणेश्वर फिर यहां बेलूर मठ ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं। यहां एक ओर दक्षिणेश्वर तो दूसरी ओर बेलूर मठ। तो कोई भी एक ऐसा सीन [संगीत] आप पसंद कर सकते हैं जिससे कि आपके हृदय को सुकून मिले जैसे [संगीत] कि आपके हृदय को सांत्वना मिले। तो फिर से वही कमर जहां तक सीधी हो सके सीधी रख के बैठना है। नजरों को झुकाना है और अपने हृदय में यह ध्यान करना है। ्म धीरे से ध्यान से बाहर आइए। स्टेप बाय स्टेप अपना जो अंतर्मुख मन है उसको फिर से बहिर्मुख करना है। हरि ओम यदि कोई क्वेश्चन है तो कर सकते हैं। वरना फिर हम यह जो लास्ट फेज है 17 से लेकर के 24 तक वो करेंगे पाठ और आखिर में फिर से एक बार ध्यान करेंगे हां हां ए रकम करते पारे जे हृदय मध्य पदो फुले बोशे रहे छे माने जे कोनो एकटा कल्पना करते होवे शटा होो आशय जे कोनो एक चित्र खड़ा करते होवे और शी चित्र के हृदय मध्य स्थिर करते होवे शटा होलोक कथा अब जैसे मैंने कहा कि मैं नौका में बैठ के गंगा में ये मैं दक्षिणेश्वर की ओर जा रहा हूं वह भी एक सीन है। मेरा एक फेवरेट सीन है कि यहां पे सूर्योदय होता है। मैं समुंदर के किनारे जाकर के बैठता हूं। बड़ा ही सुंदर सीन। तो उसको भी मैं कल्पना कर सकता हूं। तो कोई भी कल्पना कर सकते हैं। यदि कुछ कल्पना नहीं करना चाहते तो मां के जो दो चरण है वो उद्बोधन में वो मिल जाएगा वो फोटो वो जो आलता दिए मां के चरणों का फोटो उसको भी हृदय में स्थापित कर सकते हैं। तो क्या हृदय में आप चित्र को स्थापित करते हैं वो आपके ऊपर है। ऐसा कोई चित्र स्थापित करना है जिससे कि आपके हृदय को सुकून मिले। वो है सीक्रेट चेष्टा प्रैक्टिस प्रैक्टिस प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट धीरे-धीरे प्रैक्टिस करो हो जावे
Gita Chanting (3)
श्लोक नंबर 17 [गला साफ़ करने की आवाज़] आत्म संभाविता स्तब्धा आत्म संभाविता स्तब्धा धन मानविता यजते नाम यज्ञस्ते दंभना विधि पूर्वकम दंभना विधि पूर्वकम अहंकारम बलम दर्पम अहंकारम बलम दर्पम कामम क्रोधम च संश्रिता मामात्मा परदेशु मामात्मा परदेहु पृथ्वी शंतोभ्य सूय्यका पृथ्वी शंतोभ्य सूय्यका तानहम द्वषत क्रूरान तानम द्वषत क्रूरान संसारेशु न राधमान संसारेशु न राधमान क्षिपाम्यजस्त्रम शुभान क्षिपाम्यजस्त्रम शुभान आसुरीशव योनिशु आसुरी योशु आसुरिम योमापन आसुरिम योमापन्ना मूढ़ा जन्मनी जन्मनी माम प्राप्त्यवतेय मा प्राप्त्य कौते ततो यांत्य धमा ततो यांत्य धमांगतिम त्रिवधम नरकसदम द्वारम नाशात्मनः काम क्रोधस तथा लोभ तस्मा देत्रयम तजेत तस्मा दे तत्रयम तजेत एत विमुक्त कौते तमो द्वारे स्त्रीभ भर नर तामो द्वारे स्त्रीभर नरह आचरत्यात्मन श्रेय आचरत्यात्मन श्रेय ततो याति परांगतिम यह शास्त्र विधिज्य यह शास्त्र विधिज्य वर्तते काम कारतः नस सिद्धि मवापनोति न सुखम न परांगतिम तस्म शास्त्रम प्रमाणम ते तस्म शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थितौ ज्ञत्वा शास्त्र विधानोक्तम कर्म करत हारहसी कर्म करतोहारसी ओम तत्सत इति ओम तत्सती श्रीमद् भगवत गीतासु उपनिषद उपनिषद सु ब्रह्म विद्यायाम ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण संवादे श्री कृष्ण संवादेवा संपद विभाग योगो नाम देवासुर संपद विभाग योगो नाम शोडशोध्याय शोडशोध्याय
Practice of Meditation (3)
वंस मोर सेम मेडिटेशन फिर से नजरों को झुकाना है। फिर से हृदय पर ध्यान केंद्रित करना है। कोई भी एक सीन हृदय में प्रकट करना है। धीरे-धीरे जैसेजैसे [संगीत] आपकी ध्यान करने की प्रैक्टिस बढ़ती जाएगी। आप बहुत सारे इस तरह के सीन डेवलप कर देंगे जो कि आप हृदय में स्थापित कर सकते हैं। अपने मन में से बाकी सब विचारों को हटा के बस वही [संगीत] हृदय के ऊपर में ही मन को एकाग्र कीजिए। ओम ऊ आप सब अपना ध्यान चालू रखिए। मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करता हूं। निर्वाण शटकम का पाठ करें मनो अहंकार चितम न चित न च ना जा ना जो बादा रूप बहा शिवो हम शिवो हम चिदानंद रूपो हम शिवो हम न संभा नवा पंच को नवा प मातो चिदंदम रूप शिवो शिवोम चिदानंद रूप शिवो हम शिवो हम नमेराम नम लो मधु न मा ना धमा ना मोदंद रूप शिवो हम शिव हम चिदानंद रूप रूप शिवो हम शिवो [गाना गाने की आवाज़] हम ना पुण्यम ना पापम ना सोम ना दुखम न मंत्रो न तीम न वे या हो चिदानंद रूप शिवो हम शिवो चिदंद रूप शिवो हम ना दूर ना शका में जाती थे पिता नहीं माता ना जनम गुरु श्री चिदंब रूप शिवो हम शिवो हम चिदानंद रूप शिवो हम शिवो हम अहम निर्ल निराकार रूप विवा सर्वत्र सर्व न मोना मेमंद रूप शिवो शिवा शिवो शिवोम चिदानंद रूप शिवो ओम शांति शांति शांति हरि ओम ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: ध्यान के समय ह्रदय में क्या कल्पना करनी चाहिए?
एक समय में एक ही कल्पना करना है। वरना तो क्या होगा? वह अननेसेसरी एक ट्रैफिक जाम हो जाएगा। यह तो एक चीज है। दूसरा कि कुछ भी कल्पना कर सकते हैं। आध्यात्मिक होना चाहिए। मेरी एक कल्पना है। जैसे मैंने कहा कि मैं समुंदर के किनारे यहां पर बैठा हूं। मेरी एक दूसरी कल्पना है। मैं नर्मदा किनारे मैंने भ्रमण किया है। अ एक महीने के लिए मेरे सन्यास से पहले भ्रमण करने के समय मैं नर्मदा के किनारे मां नर्मदा मैया के किनारे काफी समय बैठा रहता था। वो दोपहर को तो क्या है कि इतना शांत वातावरण इतना सुंदर वो जगह तो वह भी एक मैं कल्पना करता हूं। आप जितनी कल्पना करना चाहे कर सकते हैं। कल्पना नहीं करना चाहते हैं। ठाकुर की जो मूर्ति आप गर्भगृह में देखते हैं, फोटोग्राफ जो देखते हैं, सिर्फ उसी को आप बिठा सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं है। देखिए कि आप एक्सपेरिमेंट करके अपने लिए क्या बेटर है। मैं विविध कल्पना करता हूं। मुझे वह बेटर लगता है। किंतु आपको यदि ऐसा लगता है कि सिर्फ एक कल्पना करने से बेटर है तो एक कर सकते हैं। आपको अपने से यह एक्सपेरिमेंट करके प्रैक्टिस जैसे करेंगे आपको यह पता चलता जाएगा कि अल्टीमेटली आपके लिए अच्छा क्या है। गलत नहीं है। किंतु एक बात खूब ध्यान में रखना है। यदि आप जप करते हैं ना तो कर जप पे कीजिए या तो माला जप कीजिए। वो जो मन में है अवॉइड करना उचित है और यदि करते हैं ना तो हृदय में कीजिए। यह प्रैक्टिस आपको करनी होगी कि हृदय में जप करना नहीं कि सर के भीतर में वो एक आपको बहुत ख्याल रखना है। सर को बिल्कुल ही आपको स्विच ऑफ कर देना है। जो कुछ करना है सब हृदय में करना है। ना जब कीजिए किंतु हृदय में कीजिए। वो आपको ख्याल रखना है। शुरू-शुर में यह हमसे होता नहीं कि हम हृदय में जप करें। तो बेटर है कि कर जप या माला जप हृदय में कर सके तो अच्छा है। वरना कर जप या माला जप ओम