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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी द्वारा रचित इस किताब में से हम लोग पाठ कर रहे हैं अवतरण का ट इ द इंट्रोडक्शन और गंभीरानंद जी महाराज ने ने इतने सुंदर रूप से इसका इंट्रोडक्शन दिया है किस तरह से अपने भारतीय शास्त्र में शक्ति साधना के बारे में क्या कहा गया है और शक्ति अभी जैसे कि भैरवी ब्राह्मणी भैरवी ब्राह्मणी जब दक्षिणेश्वर में आई तो वैसे तो ठाकुर का बड़ा ही सन्मान था मथुर बाबू स्वयं ठाकुर के शिष्य तो नहीं कहेंगे किंतु ठाकुर के प्रति मथुर बाबू की श्रद्धा भक्ति और निष्ठा इतनी जबरदस्त थी कि किसी का भी कोई भी साहस नहीं करता था कि ठाकुर के बारे में कटो वचन कहे या ठाकुर का अपमान करें और जनरली ठाकुर के प्रति बहुत सारे लोगों की कालीवाड़ा गांव जो था उसमें रहने वाले लोगों की भी श्रद्धा थी किंतु उस समय ऐसा हुआ कि यह गौरी पंडित है यह पद्म लोचन है फिर यह भैरवी ब्राह्मणी है इन लोगों ने आने के बाद में एक के बाद एक प्रूव करना शुरू किया कि ठाकुर के शरीर में जो भाव महाभा के लक्षण दिख रहे हैं उनकी जो आध्यात्मिक उपलब्धियां है और इसके श जो उपलब्धियों की वजह से उनके शरीर पर जो निशान दिख रहे हैं जो साइंस सब दिख रही है इंग्लिश में यदि कहे तो यह सब अवतार के लक्षण है हमारे शास्त्र में अवतार जब अवतर भगवान विष्णु अवतार धारण करके मनुष्य शरीर धारण करके पृथ्वी पर जब अवतरित होते हैं और वह जो साधना करते हैं तब इस तरह के उनके शरीर में विकार दिखाई देते हैं जैसे कि गौरांग महाप्रभु गौरांग महाप्रभु के शरीर में देखिए अष्ट सात्त्विक भाव अष्ट सात्विक गुण जिस जिसको कि कहा जाता है कि स्वेद रोमांच कंपन और अश्रु पूलक यह जो सब अष्ट सात्त्विक जो भाव है जो निशानियां है वो उनके शरीर में महाभा जब होता था तब दिखाई देती थी तो यह सब निशानी यह सब विकार यह सब साइंस तो ठाकुर के शरीर में भी दिखाई देती है ठाकुर की जो अनुभूतियां है जो दर्शन है वो भी तो इस तरह के अवतार के साथ में मैच हो रहे हैं तो ठाकुर निश्चय भगवान विष्णु के अवतार है ये उन्होंने सिद्ध किया तो अभी मथुर बाबू वगैरह सोचते होंगे कि अरे ठाकुर के प्रति हमारी संपूर्ण श्रद्धा भक्ति है इस बारे में कोई दो मत नहीं है किंतु ठाकुर वह अवतार राजा राम भगवान कृष्ण येन भगवान गौरांग महाप्रभु उनके जितने श्रेष्ठ अवतार क्या हो सकते हैं यह बारे में इसके बारे में शायद इन लोगों के मन में थोड़ा बहुत संदेह होगा किंतु जब ठाकुर के सही सही अंतरंग आना शुरू हुए ये योगेन महाराज और यह रामचंद्र दत्त ये जो सबसे पहले पहले जो आए हैं और उसके बाद में तो पूरा एक फ्लड गेट ही ओपन हो गया था स्वामी जी थे राजा महाराज थे मास्टर महाशय थे बलराम बाबू थे योगिन मा थी गोलाप मा थी कितने ही लोग आए ठाकुर को अवतार के रूप में उन्होंने स्वीकार किया किंतु सर्वप्रथम यह गौरी पंडित है या भैरवी ब्राह्मणी है या पद्म लोचन है यह वैष्णव चरण है उन लोगों ने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया था कि ठाक अवतार है किंतु अभी मां के जीवन में इस तरह से नहीं देखा जाता कि किसी ने आकर के मां को शक्ति के रूप में उनका उनका स्वीकार किया हो ऑफकोर्स ठाकुर ने शोड़े श पूजा की मां के श्री चरण में अपनी जपमाला उन्होंने अर्पण कर दी तो शोशी पूजा निश्चय देवी की भी की ही होती है किंतु फिर भी क्या है कि बंगोल में देखिए कि कुमारी पूजा की प्रथा है किसी एक बच्ची है छोटी सी उसकी हम पूजा करते हैं बेलूर मठ में भी होता है और हृदय ऐसा कुछ करने को गया था वो मथुर बाबू की नहीं द्वारिकानाथ बाबू की छोटी बच्ची उसकी पूजा की तो द्वारिकानाथ बाबू थोड़े से नाराज इसलिए हो गए थे कि हृदय तो ब्राह्मण है और यह लोग भले ही चाहे कितने ही धनवान क्यों ना हो वे लोगों की जो कास्ट है वो वो नीची जाति के थे वो मछुआरे जाति के तो इन्होंने इनकी पूजा की ब्राह्मण ने इनकी लड़की की तो लड़की का कुछ अशुभ होगा कि नहीं इस डर के मारे द्वारिकानाथ बाबू ने हृदय को कालीवाड़ा दिया था किंतु जो भी है छोटी बच्चियों को इस तरह से कुमारी के रूप में मां दुर्गा के रूप में पूजा करना वह तो बंगाल की प्रथा है तो जिस तरह से बेलूरमठ में कुमारी पूजा की जाती है तो यहां पे मां शारदा की ठाकुर ने पूजा की सड़सी रूप में ये तो कौन सी बड़ी बात हो गई उसमें और इसमें डिफरेंस क्या है किंतु डिफरेंस यह है कि शास्त्र सम्मत दृष्टि से देखा जाए तो जिस तरह से भगवान विष्णु के अवतार ठाकुर थे यह प्रतिपादित हुआ है तो वैसे ही शक्ति के अवतरण के बारे में जो कुछ भी कहा गया है इसके अनुसार मां का जीवन भी इसके साथ में मेल बैठता है मां का जीवन भी इसके साथ में मिल जाता है तो मां भी इस तरह से शति शक्ति का अवतरण मां के शरी में शुभ देह में श्री देह में हुआ है तो यह प्रतिपादन गंभीरानंद जी महाराज इस अवतरण का में करते हैं तो हम लोग इसको पढ़ रहे थे थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं महाराज जी क्या लिखते हैं गीता श्री कृष्ण जद इंगित कोरिया छिले ज गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि भगवान स्वयं मानव देह धारण करिया आशी लेओ भगवान स्वयं मानव देह धारण करके आने से भी क्षुद्र चित्त मानुष क्षुद्र चित्त मानुष संस्कृत शब्द है क्षुद्र चित्त जिसका चित्त या तो फिर जिसकी धारणा शक्ति बड़ी ही सीमित है जिसका मन जिसकी बुद्धि जिसकी मेधा बड़ी ही संकुचित है इस तरह का मनुष्य उनके तहर परमेश्वर तोव ना बुजिया साधारण नर बुद्धि तहा के अजा कोरिया था के उनके उनके परमेश्वर क्व उनका परमेश्वर क्व जो है उसको नहीं समझ करके वह सामान्य मनुष्य ही है ऐसा समझ कर के उनकी अवज्ञा करते रहते हैं फिर से बोलता हूं गीता भगवान श राम गीता श्री कृष्ण जद इंगी तो कोरिया छिले ज भगवान स्वयं मानव देहो धारण कोरिया आश लेओ खुद्रो चित्तो मानुष तहर परमेश्वर तोव ना बुजिया साधारण नरो बुद्धि ते तहा के अबोक कोरिया थाके गीता में भगवान कृष्ण ने यह इंगित किया है यह सचय उन्होंने कहा है कि भगवान स्वयं मानव देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते हैं किंतु फिर भी भगवान की इस वाणी पर अविश विश्वास करके भगवान की इस वाणी को अपने मन में धारण ना करके क्षुद्र चित्त मनुष्य यानी कि जिसकी मेधा शक्ति बड़ी ही सीमित है इस तरह के मनुष्य इस तरह के व्यक्ति जब अवतार धारण करके आते हैं तो उनका परमेश्वर तोव नहीं समझते और उनको वह भी सामान्य व्यक्ति ही है ऐसा समझ कर के उनकी अवज्ञा करते हैं देखिए इसमें एक दृष्टि से यदि देखा जाए आज की आधुनिक दृष्टि से तो एक हेल्दी स्केप्टिसिजम हम सब में होना चाहिए अभी ठाकुर तो चलो अवतार थे किंतु आजकल तो इतने लोग जब ठाकुर के खुद के समय की बात है कि वेस्ट ईस्ट बंगाल आज का बांग्लादेश वहां पर भी कोई एक आदमी अपने को अवतार बोलकर प्रचार कर रहा है कोई कोई अपने को प्रचा अवतार बोल कर के प्रचार कर रहा है वहां पर वो हरिद्वार में वो एक है ना शक्तिधाम एक है मैं उसका नाम भूल गया वहां पर एक पंडित और उसकी वाइफ उसके स्थापक है तो वो पंडित जी कहते हैं कि मैं भगवान रामकृष्ण का अवतार हूं और मेरी धर्म पत्नी है वह मां शारदा देवी का अवतार है ऐसे अपने को अवतार करके प्रचार करने वाले लोगों की भारत देश में कमी नहीं है अभी सबको तो अभी मान लीजिए कि किसी किसी को कोई धार्मिक आध्यात्मिक अनुभूति हुई भी होगी कोई कोई लोग अपने को जेनुइनली ऐसा सोचता भी होगा कि हां च मेरे में दिव्य शक्ति का अवतरण या तो प्रकाश हो रहा है किंतु यह जो संपूर्ण अवतार जो होते हैं जिसके जो कि शास्त्र की दृष्टि से शास्त्र की परक से वो सही उतरते हैं वैसे तो कितने हैं पूरे मानव जाति के इतिहास में मुट्ठी भर होंगे तो ऐसा थोड़ी ना है कि हर साल एक दो एक दो अवतार आते रहेंगे तो एक हेल्दी स्केप्टिसिजम हम सब में होना चाहिए कि कोई भी अपने को अवतार घोषित कर दे ना कि कोई भी अपने को कोई बहुत बड़ा धार्मिक एक व्यक्ति घोषित कर दे तो हम उसकी परीक्षा करें जांच पड़ताल करें ठाकुर के खुद के जीवन में योगेंद्र महाराज की घटना है ठाकुर के साथ में रात को सोए हुए थे ठाकुर के कमरे में ही और आधी रात को नींद खुल गई देखा ठाकुर अपने बिस्तर पर नहीं है एकदम बेचारे डर गए योगेंद्र महाराज अरे ठाकुर दिन रात बोलते रहते हैं प्रतिदिन बोलते रहते कामिनी कांचन का त्याग करो अभी आधी रात को अपने बिस्तर में नहीं है क्या वह अपनी पत्नी जो मां शारदा देवी वहीं पर पास में ही रह रही थी नबत में तो क्या उनको मिलने के लिए गए हैं इस तरह का संदेह जब योगानंद जी के मन में हुआ योगेन महाराज के मन में तो बड़े ही विचलित हो गए और मां जिस नबत में रह रही थी वहां पर सामने जाकर के खड़े रह गए और सोचा कि जैसे ही ठाकुर बाहर आते हैं मैं उनको पकडू और पूछूंगा महाशय आप इस तरह से लोगों को वो ठक क्यों रहे हैं खुद अपनी पत्नी के पास में रात को जाते हैं और दिन में कहते हैं काम कांचन का त्याग करना चाहिए ऐसा सोच के खड़े थे चांद का प्रकाश आ रहा था वो रात का समय तो गंगा किनारे कितना शांत सुमधुर सुंदर समय होगा कालीवाड़ा बागान है तो वहां पर खड़े इतने सुंदर वातावरण में किंतु फिर भी हय में कुछ धड़ कम मची हुई है एकाएक उन्होंने क्या देखा कि ठाकुर वहां पर झावतला से आ रहा है झावतला अर्थात कि वहां पर तो उस समय टेज बाथरूम टॉयलेट नहीं था आपको कभी भी जाना होगा टॉयलेट बाथरूम तो आपको तो बाहर में कहीं पर जाना होगा एकांत जगह पे तो यह झाऊ तला यानी कि झाऊ नाम का एक वृक्ष उसके तला अर्थात कि ये झाऊ बोल कर के मुझे इसका हिंदी नहीं पता पता नहीं उसका दूसरा इंग्लिश नाम क्या है बांगला में झाऊ वृक्ष बोलते हैं तो वो बहुत सारे इस तरह के वृक्ष थे उसकी नीचे में थोड़ा सा एकांत जैसा था वहां पर लोग सोच के लिए जाया करते थे तो देखा कि ठाकुर वहां से आ रहे है तो अरे योगन महाराज बेचारे बड़े ही शर्मिंदा हो गए सोचा कि मैंने ठाकुर पर इतना अविश्वास किया और देखिए ठाकुर तो सरलता और पवित्रता की मूर्ति है वो तो वहां से आ रहा है मुझे तो लज्जित होना चाहिए शर्मिंदा होना चाहिए तो ठाकुर देख लिए ठाकुर ने जैसे ही योगेंद्र महाराज को देखा कि नबत के सामने खड़े व उनकी तो तीक्षण बुद्धि इमीडिएट समझ गए कि उनके मन में क्या चल रहा है तो ठाकुर ने क्या कहा बेश बेश साध के दिने देख भी साधु के रात देख भी तब साधु रपर विश्वास करवी ठाकुर ने कहा बहुत अच्छा बहुत अच्छा साधु को दिन में देखो और साधु को रात में देखो तब कहीं जाकर साधु पर विश्वास करो अपने रयान जी महाराज कहते थे मरवेल उड़ बे छाई तबे साधुर गुण गाई अर्थात कि साधु का जब मृत्यु होगा और साधु की चिता जलेगी उसकी राख उड़ेगी तब मैं कहीं जाकर के किसी साधु का गुणगान गाऊंगा क्यों उन्होंने ऐसा कहा कि यदि ये अपना मन तो इस तरह का एक चंचल मन है तो हमको लगेगा कि अभी तो जवानी बीत गई है बुढ़ापा आरंभ हो गया है तो अभी किसी कामिनी कांचन में फंसने का कहां कोई मौका है अभी तो इंद्रिया शिथिल हो गई है इंद्रियों का जो तेज था जो छोटी उम्र में वो तो बढ़ती उम्र में यह सब धीरे-धीरे क्षय होता जाता है तो थोड़ी ना मैं कोई अभी कोई इस तरह का घृणित कार्य करूंगा या तो शास्त्र सम्मत नहीं है इस तरह का कार्य में बुढ़ापे में करूंगा ऐसा कोई संभव है किंतु बार-बार हमने देखा है कि इस तरह भी होता है जब इंद्रियां विचलित होती है तो बढ़ती उम्र में भी लोग इस तरह का कार्य कर बैठते हैं जिससे कि सबके सामने उनको लज्जित होना पड़े तो इसीलिए रयान जी कहते थे मरबे साधु उड़ बे छाई तबे साधुर गुण गई साधु का मृत्यु होगा चीता जलेगी उसकी राख उड़ेगी तब साधु का मैं गुणगान गाऊंगा स्वामी जी को खुद को देखिए कितनी ठाकुर की परीक्षा किए है वह बिस्तर के नीचे में एक सिक्का रख दिया ठाकुर बोलते रहते हैं ना पैसे को स्पर्श नहीं कर सकता इतना मेरा त्याग प्रचंड है उतना स्ट्रांग है स्वामी जी ने टेस्ट करने के लिए एक सिक्का उनके बिस्तर के नीचे रख दिया अभी ठाकुर को पता नहीं है बिस्तर पर जाकर बैठने को गए एकदम जैसे कि बिच्छू ने काटा हो फट करके ऐसा उनको इस तरह का उनकी पीड़ा हुई इस तरह से उनको लगा तो फट करके वो करके उठ खड़े हुए फिर उन्होंने कहा कि देखो तो क्या है यहां पर पता चला कि वहां पर सिक्का रखा था नरेद ने रखा था टेस्ट करने के लिए नरेण इस तरह से स्वामी जी ने पता है कि वो नर नारायण के अवतार है फिर भी इस तरह से उन्होंने टेस्ट किया था आखिरी दिन तक ठाकुर का जब देह त्याग होने वाला था महासमाधि में प्रवेश होने की तैयारी थी काशीपुर में लेटे हुए थे मुंह में से एक अक्षर भी नहीं निकल सकता गले में कैंसर का घाव है जो खाते थे सब निकल जाता था अभी रिसेंटली मुझे किसी ने सोशल मीडिया पर एक फोटो भेजा ठाकुर के मृत्यु ठाकुर का देह त्याग होने के बाद में पता है ना ठाकुर का एक फोटो लिया गया है जब सभी डायरेक्ट बहुत सारे डायरेक्ट डिसाइल है गृहस्थ डिसाइल है वो सब वहां पर खड़े हैं जिस बिस्तर पर ठाकुर लेटे हुए हैं उसके पीछे में सब लोग खड़े हैं रामकृष्ण मिशन में अभी हम लोग यह फोटो नहीं प्रिंट करते और जब करते भी है तो ठाकुर का ठाकुर को छुपा देते हैं और जो सब पीछे में खड़े हुए हैं उनका फोटो हम देते हैं जिससे कि हम सबकी पहचान कर पाए कि ये बलराम बाबू है यह मास्टर महाशय है ये नरेण है यह राखल है इस तरह से पहचान करने के लिए हम हम उस फोटो को यूज करते हैं किंतु ठाकुर को हम नहीं कहीं पे भी वो पर्टिकुलर फोटो ठाकुर का हम कभी अभी रिसेंटली प्रिंट नहीं करते पहले की किताबों में शायद होगा तो होगा तो अभी रिसेंटली मुझे किसी ने भेजा कि ऐसा कह के कि देखो कि रेयर पिक्चर ऑफ श्री रामकृष्ण और कहीं पर भी नहीं देखा होगा इस तरह का पिक्चर ठाकुर का हम आपको भेजते हैं देखिए ठाकुर कैसे दिखते थे तो अभी यह फोटो में जब यह सब नया-नया सब कुछ पढ़ रहा था तो मुझे पता चला कि इस तरह का एक फोटो है तो मैंने किसी को हमारे सीनियर महाराज को मैं उस समय बेलूरमठ में था ट्रेनिंग सेंटर में तो किसी सीनियर महाराज को मैंने पूछा कि महाराज जी मुझे वो फोटो देखना है तो कहां देखने को मिलेगा तो उन्होंने मुझे बताया कि अरे वो किताब है वो पुरानी किताबों में था तो उसकी पुरानी एडिशन में वो भी नई एडिशन में नहीं मिलेगा अे मैं भूल गया वो कौन सी किताब थी उसका नाम तो उसकी किंतु नई एडिशन में तो नहीं है पुरानी एडिशन में तो वो किताब खोल करके देख लो तुमको लाइब्रेरी में यदि मिल जाता है तो मैं सही में लाइब्रेरी में गया वो पुरानी एडिशन निकाली ठाकुर का फोटो देखा जो हम लोगों को तो सब कुछ पता होना चाहिए कि ठाकुर के बारे में क्या लिखा गया है क्या प्रिंट हुआ है क्या है तो इस हिसाब से मैंने वो फोटो देखा था उस समय अभी तो इतने साल हो गए इस बात को बीच में मैंने उस फोटो को नहीं देखा था था अभी जस्ट कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने भेजा यह फोटो कह के रेयर फोटो है तुमने कभी नहीं देखा होगा देखो अभी ठीक है उसको तो कौन बताने को जाएगा कि यह रामकृष्ण मिशन के साधु ने तो इसको देखा ही है हमारा कॉन्शियस डिसीजन है कि इसको पब्लिश नहीं करना है जो भी है मैं फोटो को देखा फिर से मुझे वोह स्ट्राइक हुआ उस समय मुझे जो स्ट्राइक हुआ था ठाकुर का शरीर देखिए पूरे हार्ड पिंजर की तरह पूरे स्केलेटन की तरह है पूरी हड्डियां दिख रही है चेहरा पूरा बैठ गया है जैसे कि मतलब किस तरह की उनकी अभी मृत देह इस तरह का है तो सोच के देखिए कि वह जब आखिरी आखिरी समय में उनको कितना कष्ट होता होगा किंतु फिर भी चेहरे के ऊपर में जो दिव्य आध्यात्मिक शक्ति का जो प्रभाव है जो प्रकाश है जो ओजस है वह तो वैसा ही वैसा ही रहा होगा किंतु इस समय भी इस समय भी नरेण के मन में संदेह होता है और नरेण पूछता है कि यदि इस समय ठाकुर कहे कि वह अवतार है तो मैं उनके ऊपर में विश्वास करूंगा ठाकुर इमीडिएट नर के मन की बात समझ जाते हैं और कहते हैं जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिख दिएना जो राम थे जो कृष्ण थे वही इस देह में राम कृष्ण होकर के अवती हुए हैं किंतु तुम्हारे वेदांत की दृष्टि से नहीं वेदांत की दृष्टि से वेदांत के है कि हम सबके भीतर में वही आत्मन प्रकाशित है अहम ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्मण हूं किंतु ऑफकोर्स यह इंद्रियों से चालित जो मेरा मन है जो बाद बाद बातों बातों में विचलित हो जाता है जो बातों बातों में वह इंद्रियों के भोग की ओर बह जाता है वो मन नहीं किंतु इस मन का जब निरोध करेंगे नेति नेति मैं यह इंद्रियां नहीं हूं मन नहीं बुद्धि नहीं नहीं चित्त नहीं अहंकार नहीं यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच करण पंच कर्मेंद्रिय में यह सब कुछ भी नहीं हूं तब कहीं जाकर के जो अंतिम सत्ता जो सर्वोच्च सत्ता जो रहती है वह ब्रह्मण मैं वो ब्रह्मण हूं अहम ब्रह्मास्मि तो यह वेदांत कहता है ठाकुर कहते हैं तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं किंतु भक्ति शास्त्र की दृष्टि से ईश्वर स्वयं अवती होते हैं वो मैं हूं तब कहीं जाकर के नरेण को विश्वास हुआ तो देखिए कि यहां पे महाराज जी कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानि भवतु भारत भारत देश में जब भी धर्म की गलानी होगी जब भी दुराचार का अत्याचार बढ़ जाएगा जब भी धार्मिक लोग है ऋषि मुनिया है उनके ऊपर में अत्याचार बढ़ने लगेगा तब मैं स्वयं शरीर धारण करके असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होऊंगा तो वह वचन भगवान कृष्ण ने दिया हुआ है किंतु फिर भी कोई भी जब आकर के अपने कोई भी महापुरुष है तो हमको उनके ऊपर में श्रद्धा होती है आजकल देखिए कि इस तरह के राजनेताओं के प्रति लोगों की श्रद्धा बहुत बढ़ जाती है कभी-कभी और उनके फोटोग्राफ को मंदिर में रख कर के पूजा करने की शुरुआत कर देते हैं अभ ये नेता लोगों का भी ऐसा है ना घमंड भीतर में होता है तो मुंह से तो बोलेंगे अरे भाई ऐसा यह तो गलत हो गया ऐसा काम मत करो क्यों मेरी पूजा कर रहे हो मैं थोड़ी ना भगवान हूं ऐसा मुंह से बोलेंगे किंतु मन में मन में बड़ा ही उनको हरक होता होगा अरे देखो मेरे पास में इतना पॉलिटिकल पावर है लोग मेरी पूजा कर रहे हैं तो आजकल यह सब हम नाटक देखते हैं तो हमेशा एक स्केप्टिसिजम होना चाहिए ऐसे हलते घूमते फिरते कोई भगवान शरीर धारण करके नहीं आ जाते कोई बहुत बड़ी आपत्ति विपत्ति आई हो और उस समय मानव सभ्यता का बचना या तो फिर मानव सभ्यता की यह धरोहर नीव फाउंडेशन इट सेल्फ यदि भय में आ जाए खतरे में आ जाए तब कहीं जाकर के भगवान अवती होते हैं और अवती होते हैं तो स पार्षद स शक्तिक अवती होते हैं उनके पार्षद भी आते हैं साथ में शक्ति मां जगदंबा भी आती है और उनका जो मैसेज है वह 10 साल 20 साल 50 100 साल में पूरी पृथ्वी पर फैल जाता है तो इनको कहेंगे अवतार नाही कि जो कोई भी धार्मिक भी है चलो उनके प्रति हमारी श्रद्धा भी है किंतु वो कोई अवतार नहीं हो सकते धार्मिक संत महापुरुष ऋषि मुनि है यहां तक स्वीकार करते हैं बड़े ही निष्ठावान व्यक्ति है कर्मयोगी है कोई कोई उसके भा स्वीकार करते हैं कोई ज्ञानी है कोई बहुत बड़े त्यागी है किसी ने बहुत बड़ी साधना तपस्या की है कोई बहुत विद्वान है कोई आचार्य है ग्रंथ शास्त्रों की रचना कर दी है सब कुछ स्वीकार करेंगे उनको श्रद्धा भक्ति भी देंगे किंतु वह अवतार है ऐसा करके फट करके किसी को नहीं पकड़ लेंगे वह तो हमारा हृदय जब इस चीज को स्वीकार करता है भीतर से अंतर से आता है और कोई एक दो व्यक्ति के अंतर से नहीं लाखों करोड़ों लोग उनके प्रति श्रद्धावन होते हैं तब कहीं जाकर के हमको लगता है कि ना वे सही सही अवतार ऑफकोर्स मुझे किसी को अवतार के रूप में स्वीकार करने के लिए दूसरों की उनके प्रति क्या निष्ठा भक्ति है वो देखने की जरूरत नहीं है मेरे हृदय ने जब तक जब बोल दिया कि हां ये ये उनके जिस तरह इनके जितना इनके जैसा मनुष्य मैंने नहीं देखा इनके जैसा कोई व्यक्ति मैंने आज तक इस जगत में नहीं देखा तो फिर ठीक है चलो मैं उनको अवतार बोल कर के अपने हृदय में स्वीकार करूंगा ये हाजरा महाशय के प्रति यह नरेंद्र का जो थोड़ा बहुत फ्रेंडशिप था वो इसीलिए था हाजरा महाशय ठाकुर के कमरे के बाहर बैठे रहते थे पीतांबरी पहन के तिलक लगा कर के और वो माला जपते रहते थे और यह राखल वगैरह जो आते थे वो बोलते थे हाजरा महाशय उनकी निंदा किया करते थे किय राखल वगैरह को देखो हो हो करे बेड़ा है उने हल्लागुल्ला करके चारों ओर घूमते रहते हैं ना ही जप करते हैं बैठ कर के ना ही मेरी तरह वो इस तरह से तपस्या करते हैं अभी राजा महाराज और इनका कैलिबर कहां है और यह हजरा महाशय का कहां ठाकुर ने कहा था अपने गांव में थोड़ा सा ऋण हुआ है एक लाख दो लाख ना मैं अमाउंट भूल गया इतना कुछ का तो उसमें से थोड़ा या अभी थोड़ा ऋण बाकी है देना तो अभी कलकत्ता आ करके बैठा है लोगों को पीतांबरी और जपमाला दिखा रहा है यह कोई मोहित को उसमें वो पढ़ कर के उनकी माया जाल में वो कुछ पैसा दे देगा तो अपना गांव में ऋण शोध हो जाएगा इसके लिए हाजरा यहां पे बैठा है ठाकुर ने कहा था किंतु हाजरा महाशय किंतु ये सब होने के बावजूद नरेद बार-बार जाकर के हाजरा महाशय के साथ में बैठ कर के गप लगाता है और नरेण के कहने पर ही ठाकुर ने हाजरा महाशय को आशीर्वाद दिया था तो क्यों ऐसा तो लीला प्रसंग में ना कि युग नायक में एक्जेक्टली भूल गया लिखा है कि उस उनका जो संदेहाम नेचर था वह किसी भी धार्मिक व्यक्ति बात को किसी भी धार्मिक व्यक्ति को फट करके स्वीकार नहीं कर लेते थे वो पहले तो प्रश्न करते थे मैं ऐसा क्यों है वैसा क्यों है मैं ऐसा क्यों करूं ऐसा करने से क्या होने वाला है तो प्रश्न करना यह क्वालिटी नरेद को अच्छी लगती थी स्वामी जी को पसंद थी इसलिए जाकर के उनके साथ में फ्रेंडशिप करते थे तो यहां पे देखिए महाराज जी ने लिखा है कि हम लोग जो है हमेशा एक तरह का संदेह हमारे मन में रहेगा ही मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं वो अब ठाकुर का तो पता है ना छोटे बच्चे तरह का कभी-कभी ये वो भाव उनका रहता था वो पाच साल का वो कमरे में बैठे हैं सामने देखा एक एक बास्केट में लेबी रखी हुई है ठाकुर को जिलेबी बहुत पसंद थी तो सामने एक बास्केट में जिलेबी रखी हुई है 5 साल का एक लड़का उस कमरे में प्रवेश किया तो ठाकुर का एकदम भावांतर उपस्थित हुआ एकदम जैसे छोटे बच्चे हो गए और फिर वो छोटे बच्चे की तरह उन्होंने क्या किया छोटा बच्चा जब होता है उसको अच्छी खाने की चीत देते हैं और उसका जब मित्र आ जाता है तो वो सोचता है अरे मैं उसको दिखाऊंगा तो मुझे शेयर करना पड़ेगा उसको अपना हिस्सा देना पड़ेगा मुझे हिस्सा नहीं देना क्योंकि ये मुझे बहुत पसंद है तो छोटा बच्चा जैसे वो अपने वो पीछे छुपा देता है तो वैसे ही ठाकुर का इस तरह का भावांतर उपस्थित हुआ कि वो जो बास्केट था जिसमें जिलेबी रखी थी वह उठा कर के अपने पीछे में छुपा दी और पीछे में छुपा कर के ही वह समाधि में मग्न हो गए तो इस तरह का बचपना हम देखते हैं मां के जीवन में भी हम देखिए कि मां के जीवन में हम एक के बाद एक किस तरह की घटनाएं देखते हैं जब मां का मां का भी आखिरी समय था और सभी शरत महाराज फिर ये सभी लोग जो सरला दीदी जो कि उनकी सेवा करती थी सब वहां पर थे अभी सरला दीदी को तो हमको पता है कि बाद में वह शारदा मठ की सर्वप्रथम प्रेसिडेंट हुई थी प्रेसिडेंट माता जी के रूप में उनका वर्ण हुआ था तो वही सरला दीदी मां की सेवा कर रही है अभी मां का धीरे-धीरे करके बच्ची की तरह एक भाव छोटी बच्ची की तरह भावांतर हो रहा है वो कंप्लेन करना शुरू कर दी है कि वो थर्मोमीटर से वोह टेंपरेचर मेजर करेंगे ना तो मां बोलेगी कि मुझे यह नहीं करना वो नहीं करना क्या तुम लोग मुझे सब समय परे न करते हो तो यह बात गई शरत महाराज के पास में कि मां इस तरह से अभी बच्चे की तरह व्यवहार कर रही है तो शरत महाराज गए मां के पास में वो तो स्थूल काय थे और इतना उनका धीर गंभीर उनका स्वभाव था तो धीरे-धीरे करके सीढ़ी चढ़ के वो जो फर्स्ट फ्लोर न की जहां पर भी मां का कमरा है व वहां पर गए और धीरे से मां के सामने बैठे और बोला कि मां क्या हुआ बताओ तो मां एकदम बच्चे की तरह जो छो छोटी बच्ची अपने पिताजी को कंप्लेन करती है इस तरह से देखो शरत ये लोग किस तरह से मुझे परेशान कहते हैं बोलते हैं बगले काठी दाओ ना य करो पथ खाओ ही सब बोलते था क्या मने कि वो बगल में वो काठी काठी अर्थात की लकड़ी बगल में लकड़ी दो अर्थात कि वो टेंपरेचर लेने के लिए बगल में थर्मोमीटर रखो ऐसा सब समय मुझे बोलते रहते हैं वो क्या सब खिलाते रहते हैं मुझे यह सब खाने की कोई इच्छा नहीं तब शरत महाराज ने जाकर के शांति से कहा कि ठीक है मां अभी यह लोग आपको इस तरह से परेशान नहीं करेंगे मैं ही आकर के आपको जो पथ्य है यानी कि रोगी का जो खाना है जो कि उसमें टेस्ट नहीं रहेगा इस तरह से रहेगा वह मैं ही आपको खिलाऊंगा बोलक के शरत महाराज ने अपने हाथों से मां को खिलाया अभी देखिए यह बचपना था किंतु इसके पीछे भी एक स्टोरी थी पूरा जीवन भर मां ने शरत महाराज के सामने घूमता तान के रखा था शरद महाराज को अपना चेहरा कभी भी दर्शन नहीं दिया अपने चेहरे से तो शरत महाराज भी उनके वैसे तो सब कुछ पता है शरत महाराज को किस तरह से भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी चाहिए शरद महाराज खुद भारतीय संस्कृति के रक्षक थे और मां थी वो चेहरा घुमता उठा कर के शरद महाराज को दर्शन देना ऐसा कभी नहीं करेगी मां शरद महाराज को भी पता था किंतु मन में एक दुख भी रहता है कि मां के बच्चे की तरह है ना वो तो मा वो उनके बिल्कुल बच्चे की तरह है तो फिर बच्चे के सामने इतना वो क्या करना तो कभी-कभी शरद महाराज जब मां को प्रणाम करके वापस आते थे तो सब बाकी जो सब लोग बैठे होते थे उनके सामने जाकर के बोलते हैं कि मां इस तरह से घूमता तांती है जैनो आमीर आमी बेटीर ससुर जैसे कि मैं उनका स्सु हूं उनका ससुरा हूं इस तरह से वो मेरे सामने वो घुमता तांती है तो एक उनके मन में था एक वो दुख था तो आज जब अपने हाथों से मां को खिलाया तो मां का चेहरा दर्शन करके उनका जीवन धन्य हो गया तो इस तरह से मां ने उनको दर्शन दिया और ऐसी और भी एक घटना है कि वो मां को कुछ खाने की इच्छा हुई ना कि झाल मुड़ी ना कि ऐसा कुछ मैं एग्जैक्ट भूल गया तो अभी डॉक्टर ने तो मना किया था कि मां को यह चीज खाने को नहीं देनी है अभी मां ने क्या किया बच्ची का तरह स्वभाव है किसी सेवक को बोला कोई छोटा बच्चा होगा कि जाओ मेरे लिए वो चीज लेकर आओ तो अभी सेवक महाराज भी क्या करेंगे वो तो मां जगदंबा का स्वयं आदेश है थोड़ी ना तो उसका यह करेंगे उसको भंग करेंगे वो सेवक महाराज लाकर के कटोरी में जाकर के मां को दिया किंतु साथ-साथ में ही जाकर के उन्होंने शरत महाराज को बोला कि मां वो चीज खा रही है जिसको खाने को मैं भूल गया एगजैक्टली तो डॉक्टर ने मना किया है वो खा रही है तो शरद महाराज ने कहा अच्छा अभी सेवक महाराज खुद तो कुछ बोल नहीं पाएंगे सरला दीदी भी थोड़ी सी अभी मां मां का उनके ऊपर में थोड़ी नाराजगी चल रही थी सरला दीदी भी कुछ नहीं बोल पाएगी तो शरद महाराज ऊपर आए मां को दोनों हाथों से हाथ जोड़ कर के बड़ी विनती पूर्वक कहा मां मुझे आपका प्रसाद चाहिए तो मान तो मां ने जैसे ही शरद महाराज ऊपर आए पता चला वो कटोरी मां ने अपने पीछे छुपा दी है बिल्कुल बच्चे की तरह अभी शरद महाराज आए मां के सामने बैठे दोनों हाथ जोड़ कर के बड़े ही विनम्र सुर से कहा कि मां मां ने कहा कि बेटा क्यों अभी आए हो इस समय तो महाराज ने कहा मां मुझे आपका प्रसाद चाहिए तो मां ने कहा अरे शरद को प्रसाद चाहिए निश्चय प्रसाद देने का मां का क्या तरीका है ठाकुर को जो मिठाई वगैरह जो ऑफर किया गया है वह मां के पास में लाया जाएगा मां उसमें से थोड़ा सा एक छोटा सा कण तोड़ कर के अपने वो ग्रहण करेगी या तो फिर अपनी जीवा को स्पर्श करवाएगी व प्रसाद हो गया फिर भक्तों को देगी तो मां ने कहा चलो लेके आओ ठाकुर का प्रसाद या तो जो कुछ भी है तो किंतु शरत महाराज ने कहा मां वो प्रसाद नहीं चाहिए तुमने अपने पीछे में जो कटोरी में छुपाया है वो प्रसाद मुझे चाहिए तो मां मां को पता पता चल गया कि अभी इनको किसी ने कंप्लेन किया है तो मां बड़ी ही बच्ची की तरह नाराज होकर के अच्छा ठीक है ये कटोरी निकाल कर के महाराज के हाथ में दे दी ठीक है लो अभी इसको फिर अभी महाराज तो क्या करेंगे मां को इस तरह से पीड़ा दी है मां को कष्ट दिया है मां को खाने की इच्छा है मां के हाथ में से छीन लिया वो शरद महाराज के मन में इतना कष्ट इतना कष्ट मां का जब महासमाधि हुई उसके बाद में एक बार शरद महाराज ने राजा महाराज को स्वामी ब्रह्मानंद जी को उद्बोधन में बुलाया वहां पर बुला कर के वह जो कटोरी में जो खाना मां खाना चाहती थी वो उन्होंने अपने हाथों से स्पेशल अपने हाथों से बनाया मुझे याद नहीं है स्पेशल बनाया राजा महाराज को अर्पण किया बोला फिर दो हाथ जोड़ कर के राजा तुम इसको खाओ तुम तो मां के प्रतिनिधि हो मां का हाथ में से मैंने इसको छीन लिया था तुम इसको खाओ मैं अनुमान करूंगा मैं धारण करूं धारणा करूंगा कि मां स्वयं इसको ग्रहण कर रही है और यह धारणा करके मेरे हृदय को तृप्ति मिलेगी तब कहीं जाकर के राजा महाराज ने उसको ग्रहण किया शरद महाराज के मन में शांति हुई तो देखिए कि यह बचपना जब हम इन लोगों का देखते हैं तो हमको भी लगता है अरे यह अवतार स्वयं देह धारण करके आए हैं और इस तरह का बिहेव क्यों कर रहे हैं किंतु इसीलिए देखिए कि इस अवतरण का में सब कुछ जितने भी पॉइंट से गंभीरानंद जी महाराज ने हमको बताए हैं कि देवी गुरु मानवी या तो मां यह सभी गुण जब एक शरीर में एक साथ में अवस्था करते हैं तो उनका आचरण कितना सुमधुर होता है वोह जो लीला चिंतन जब हम करेंगे तो हमारे हृदय में हमारे मन को कितना हर्ष पहुंचेगा और हमको कितना शांति और सुकून मिलेगा तो इसीलिए अवतार की लीला का चिंतन करना है और इसीलिए अवतार कौन है वह भी समझना है और इसलिए यहां पर अवतार कौन है इसके सभी गुणों की चर्चा महाराज जी ने विस्तार में की है आज इतना ही कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पणम मस्तु