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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 22 Dec 2025

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित उसका हम पाठ करेंगे आज चीर सधवा चीर सिमंततीनी जो चैप्टर अभी हम प्रारंभ किए हैं। भार समर्पण चैप्टर समाप्त हो गया और चीर सधवा चीर सीमंतिनी चैप्टर प्रारंभ हुआ है। अभी इस चैप्टर में

षोडशी पूजा से तारकेश्वर हत्या तक: ठाकुर और माँ का विद्या का संसार

पहले ही हमने देखा कि किस तरह से श्री रामकृष्ण देव का देह जीवन लीला अवसान की ओर आगे बढ़ रहा है और मां तारककेश्वर जाकर के भगवान शिव के सामने हत्या देती है। हत्या देने का अर्थ वही हुआ कि भगवान के सामने अपने मन की जो इच्छा है, अपने मन की जो आरती है, वह ईश्वर के सामने उसको रखना है। यदि ईश्वर उसको पूर्ण करते हैं तो तो बहुत अच्छा है। और यदि ईश्वर पूर्ण नहीं करते हैं मन की आरती को तो फिर बिना आहार किए, बिना जलपान किए वहां पर पड़े रहना है। यदि देह जाए तो जाए। या तो फिर देह त्याग करेंगे या तो फिर ईश्वर को मेरी प्रार्थना पूर्ण करनी होगी। इसको कहते हैं हत्या देना। तो मां भी वहां पर बिना आहार के बिना जलपान किए पड़ी है। और हमने यह भी देखा था कि बिना खाए तो आप हो सकता है कि 10-15 दिन निकाल दें। किंतु बिना जलपान के बिना पानी पिए दो-तीन दिन निकालना भी बड़ा ही कष्टकर होता है। तो इस तरह से निर्जला उपवास करते हुए मां ने भगवान शिव के सामने हत्या दी है कि श्री रामकृष्ण देव का देह अभी भी पृथ्वी पर और रख दीजिए कुछ समय के लिए। किंतु देखिए कि हमने देखा कि एक दिन रात को मां वहां पर पड़ी है भगवान शिव के सामने और एकाएक जैसे कि मिट्टी की हांडी है बहुत सारी एक के ऊपर एक सजा के रखी हुई उसको आप जोर से लाठी से मारेंगे तो कैसा उनके टूटने का आवाज होगा धड़ाम करके तो ऐसा आवाज हुआ और साथ में ही मां के मन में यह प्रकट हुआ एक एक अशरी शरीरी वाणी या तो फिर मां के हृदय में से ही इस जगत में कौन किसका स्वामी कौन किसका क्या है जिनके लिए किन के लिए मैं यहां पे प्राण हत्या करने को बैठी हूं देखिए शोडशी पूजा से ठाकुर और मां इन दोनों के बीच में जो अतूट दे संबंध स्थापित हुआ था इसके बाद में यह एक घटना है तारकेश्वर की जैसे कि मां के भीतर में से सहसा यह आया कि मैं किसके लिए यहां पर प्राण हत्या करने को बैठी हूं। कौन किसका है इस संसार में? तो यह एक इट्स अ वेरी सिग्निफिकेंट इवेंट। अभी हमको तो पता है कि नित्य देह से शिव और शक्ति की लीला तो हमेशा चलती ही रहेगी। किंतु जहां तक इस मर्त्य जगत का प्रश्न है, यहां पर जितने भी संबंध है यहां पर जितने भी अपने यह मित्रताएं हैं, अपने जितने भी कांटेक्ट्स हैं, यह सब कुछ तो जैसे कि इस वैराग्य की अग्नि में एक ना एक दिन सबको भस्मीभूत हो ही जाना है। या तो चिता की अग्नि में इसको भस्मीभूत करें ना कि वैराग्य की अग्नि में भस्मीभूत करें। चिता की अग्नि में यदि इस संबंध को डालना यदि हुआ तो हमारे मन को बहुत कष्ट पहुंचेगा। जो अपने मन का प्राण प्रिय व्यक्ति है उसका देहांत हुआ तो हमको बहुत ही कष्ट पहुंचेगा। किंतु देखिए भारतीय सनातन हिंदू परंपरा जिस तरह से हमको कहती है कि हां 25 साल है ब्रह्मचर्य का पालन करके ईश्वर प्राप्ति के लिए जो साधना हो सके वह कर लीजिए। उसके बाद में 25 से 50 साल आपको गृहस्थश्रम में रहकर के संसार की जो आपके प्रति अपेक्षाएं हैं जो संस्कार है आपके वैदिक संस्कार कहते हैं ना विवाह वगैरह जो संस्कार है तो वह आपका जो गृहस्थ धर्म है उसका आपको पालन करना है। किंतु फिर यह वानप्रस्थ आश्रम अर्थात कि ये धीरे-धीरे करके आपको संसार की जितनी भी मायाजाल है उसमें से अपने मन को समेट लेना है और फिर आखिर में आता है सन्यास आश्रम वही वैराग्य की अग्नि में आपके जितने भी संबंध है पति का पत्नी के साथ पत्नी का पति के साथ मां-पिताजी का अपने संतान के साथ जितने भी संबंध है वह वैराग्य की अग्नि में उसको भस्म भूत कर देना है और फिर भले ही चाहे आप संसार में रहे भले ही चाहे वही स्त्री पुत्र भाई बांधव वगैरह से घिरे हुए रहे किंतु हृदय में अभी पक्का बैठ गया है कि नहीं अभी ईश्वर आराधना ईश्वर प्राप्ति ही अभी मेरे जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है तो वह सन्यास आश्रम प्रारंभ होता है तो यहां पर भी देखिए कि वह जैसे कि शोडशी पूजा थी एक तरह से कहे तो गृहस्थ आश्रम का प्रारंभ तो यह तारकेश्वर का यह इंसाइट जो है जो मां के मन में यह प्रस्फुटित हुई यह वाणी इस संसार में कौन किसका है देखिए कितनी बड़ी बात है मां ठाकुर के बारे में ऐसा सोचे हम कल्पना भी नहीं कर सकते दक्षिणेश्वर के दिनों के बारे में हमने जो पढ़ा था मां का मन प्राण हृदय किस तरह से श्री रामकृष्ण कृष्ण के चरणों में समर्पित था। और इतना ही नहीं श्री रामकृष्ण भी मां के प्रति कितने प्रोटेक्टिव थे। मां को सब समय प्रोटेक्शन में रखना है। मां को सब समय भविष्य की यह जो जवाबदारी है, जिम्मा है, उसको स्वीकार करने के लिए तैयार करना है। और यह जो इस सबसे भी परे जो एक दिव्य प्रेम होता है, राधा और कृष्ण भगवान राम और मां सीता, शिव और शक्ति वो दिव्य प्रेम तो इन दोनों में था ही था। जिसको कि हम हमारी भौतिक दृष्टि से ये हमारी लौकिक दृष्टि से ना ही समझ सकते हैं ना ही इसकी हम व्याख्या कर सकते हैं। तो वो तो था ही दोनों में तो इतना गहन इन दोनों का हृदय का मिलन वो भी देखिए कि ये जैसे कि हिंदू सनातन धर्म की इस जो सन्यास आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम जैसे कि ये चार आश्रमों की जो रक्षा करने के लिए उन्होंने इस पूरा जो लीला है उसमें यह एक आया है। जैसे मां ने कहा ना कि ठाकुर तो भांगते आशे नहीं ठाकुर तो गड़ते ऐसे छ ठाकुर कोई तोड़ने के लिए नहीं आए। ठाकुर तो कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं। यानी कि यह जो सब वैदिक प्रथाएं हैं, उसका भी जैसे कि एक तरह से देखिए कि भगवान रामकृष्ण और मां शारदा देवी ने इसका पालन किया है। तो यह शोडशी पूजा थी। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का वह एक द्वार। तो यह हो गया यह तारकेश्वर में हत्या। वही जो पूरी लीला थी गृहस्थ लीला संसार लीला जैसे कि शिव और शक्ति की इसका एक बाह्य उससे निकलने का एक दूसरा ध्व यहां से हमने श्री रामकृष्ण देव और मां शारदा की जो गृहस्थ आश्रम लीला है शोडशी पूजा से प्रवेश किया है और यही तारककेश्वर हत्या से उसमें से अभी हम बाहर निकले हैं और अभी देखिए कि जैसे-जैसे ठाकुर का जीवन अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है, मां के जीवन में एक नया अध्याय प्रारंभ होगा। जो संघ की रचना ठाकुर करके गए हैं। उस संघ के सर्वोच्च शीर्ष पद पर मां को स्थापित होना है। किंतु वह एक दिन की बात नहीं है। ठाकुर गए और फिर मां ने स्थान संभाल लिया। ऐसा नहीं होने वाला है। हमको पता है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी विवेकानंद का मुख्य कार्य प्रारंभ होने वाला है। यह 1886 अगस्त ठाकुर की महासमाधि से लेकर के 192 स्वामी जी की स्वयं की महासमाधि तक वही है जो कि हमारे संघ को गाइड करने वाले हैं। बाह्य दृष्टि से भीतर में से तो मां जैसे कि ठाकुर के रहते-रहते ही सबको गाइड कर रही थी। अपने संतानों का जिम्मा संभाल रही थी। वही फेमस घटना ठाकुर जाकर मां को कहते हैं इनको इतना रोटी देना है। इनको इतना तो मां कहती है मेरे बच्चों को जितनी शुद्धा होगी, जितनी भूख होगी, उतनी मैं रोटी खिलाऊंगी और उनके आध्यात्मिक जीवन की संभाल मैं रखूंगी। आपको उससे टेंशन लेने से कोई जरूरत नहीं है। तो वहां से ही देखिए कि गंभीरानंद जी लिखते हैं कि ठाकुर मन में ही मन में प्रसन्न होकर के कि मां ने अपना जिम्मा स्वीकार करना प्रारंभ किया है। मन में ही मन में प्रसन्न होकर के वहां से विदाई ली थी। तो देखिए कि वहां से वैसे तो जहां तक संघ के मुख्य सदस्य कोर कंपोनेंट्स जो है जो डायरेक्ट डिसाइपल और ये जो लेडी डिवोटी इनका जिम्मा लेने का तो मां ने प्रारंभ कर ही दिया था। किंतु ये जो जनसाधारण जो कि बाहर से हमारे संघ को देखने वाले उन सबके प्रति मां की करुणा मां की मां के आशीर्वाद मां की आध्यात्मिकता वो कब से धावित होना शुरू हुआ तो स्वामी जी की महासमाधि के बाद से तो ये 1886 से 192 ऑलमोस्ट 5 से छ साल का ये पीरियड है जो 15 से 16 साल का ये पीरियड है जिसमें की मां को तपस्या करनी है। तो अभी यहां पर देखिए कि धीरे-धीरे करके तारककेश्वर में यह घटना हुई और फिर गंभीरानंद जी कहते हैं यह जैसे कि रुद्र के प्रलय विषाण की असफुटनी नाद प्रलय विषाण अर्थात कि रुद्र के पास में वो जो भगवान शिव जब उनके जो सहचर आप देखते होंगे कोई नगारा बजाता है कोई डमरू बजाता है कोई वो सिंह बजाता है ऐसा कर्वड शेप का आता है ना सिंह तो इसको कहते होन कहते हैं इंग्लिश में एच ओ आर एन ऑन तो उसको प्रलय विषाण जैसे कि प्रलय के आगमन की चेतावनी दे रहा हो इस तरह से यह सिंह जो बजता है तो यह सिंह प्रलय विषाण की असफुटनी नाद इस तरह का आवाज जो कि बाहर से कानों में नहीं सुनाया जाता माने नहीं सुन सकते हैं किंतु हृदय में सुन सकते हैं तो यह रुद्र के प्रलय विषाण की असफूट निनाद से जैसे कि मां मां के मन में से माया अपश्रुत हुई अपश्रुत यानी कि संकुचित वो सर गई वहां से वहां से चली गई वहां से समाप्त हो गई तो मां के हृदय में से माया अपश्रुत होकर के वहां पे प्रार वहां पर प्रस्फुटित हुई असीम वैराग्य की भास्व दीप्ति इस तरह का वैराग्य जिसका ना ही कोई स्पेस और टाइम से परे रहे हैं भास्वर प्रचंड प्रज्वलित उज्ज्वलित दीप्ति यानी कि अग्नि यानी कि यह होमा अग्नि तो देखिए कि यह मां के जीवन में एक बहुत बड़ा परिवर्तन इस तारककेश्वर की घटना से आया है। यहां से फिर मां आई है

वैराग्य संकुचित कठोरता नहीं—करुणा की व्यापकता है, हृदय की उदारता है

वापस दक्षिणेश्वर में और देखिए कि हमने यह गंभीरानंद जी का यह एक सेंटेंस भी पढ़ा था इतना लंबा और इसके ऊपर में काफी हमने चिंतन भी किया था कि खंड मानव मन कभी-कभी कोई ना कोई विशेष समय श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा से जागतिक ससीमता से उर्ध्व अवस्थित विराट मन के साथ में एकीभूत होकर के ऐसी एक अखंड दृष्टि प्राप्त होता है जिसके प्रभाव से वह मर जगत के संबंध वगरा से अविछेद भावे ग्रथित समस्त पूर्व संकल्प की अयोक्तिकता दर्शन से उसका स्वेच्छाय अपनी इच्छा से वर्जन करता है। तो, यह यह पूरा एक संस्कृत पे थीसिस लिख सकते हैं इस सेंटेंस से। तो, इसके बारे में भी हमने काफी विस्तार से चर्चा की थी कि किस तरह से ऐसा एक समय आता है जब खंड खंड में विभाजित मानव मन। यह खंड खंड में विभाजित अर्थात कि मैं इस माइक को माइक के ही रूप में देखता हूं। इस चश्मे को चश्मे के रूप में ही देखता हूं। इस वस्त्र को वस्त्र के रूप में ही देखता हूं। इसको कहते हैं खंड खंड में विभाजित मेरी दृष्टि। किंतु जिस समय मुझे पता चलेगा कि माइक भी ब्राह्मण है। यह चश्मे भी ब्राह्मण ये वस्त्र भी ब्राह्मण। वही जो नरेंद्र हाजरा के साथ में मजाक कर रहा था। हास्य कौतुक कर रहा था। यह घटी भी ब्रह्म है, बाटी भी ब्रह्म है। तो ठाकुर ने जाकर उसको स्पर्श कर दिया। तो वह खंड खंड वाली नरन की दृष्टि थी। घटी को घटी के ही रूप में देखता था। बाटी को बाटी के ही रूप में देखता था। तो उसकी जगह उसको अभी सब कुछ ब्रह्ममय दिखने लगा। तो फिर यही यह खंड खंड में विभाजित मनुष्य की दृष्टि ऐसा एक समय आता है जबकि हम बहुत बड़े ट्रोमा का शिकार बने होते हैं। या तो फिर हमारे हृदय में स्वाभाविक रूप से वैराग्य वैराग्य अग्नि प्रज्वल होता है। जो भी है एक ऐसा समय यह इस तरह का समय सबके जीवन में आता ही है। तो ऐसा एक विशेष समय में श्री भगवान की अचंतनीय प्रेरणा से यह जागतिक ससीमता ससीम अर्थात कि लिमिटेड और असीम अर्थात कि अनलिमिटेड तो यह जागतिक लिमिटेड जो जगत है उससे उर्ध्व अवस्थित विराट मन के साथ एकीभूत हो जाता है। वही ब्रह्म साक्षात्कार होता है। पता चलता है कि वही ब्रह्म समुद्र ही है जिसको कि मैं यह मैं मेरा पति के रूप में जिसको पहचानता हूं, मेरी पत्नी के रूप में जिसको पहचानता हूं, मेरे पुत्र के रूप में जिसको पहचानता हूं, मेरे भाई-बहन के रूप में जिसको पहचानता हूं, वह तो सब मुखौटा पहने हैं। यदि मुखौटा हटा ले तो पीछे में तो ब्राह्मण ही है। वही विराट अनंत महासमुंदर ब्रह्मण रूपी सत चित आनंद विराट समुंदर वही चारों ओर फैला हुआ है। उसमें जो एक के बाद एक तरंग उठती है और विलीन हो जाती है। उठती है विलीन हो जाती है। तो वही तरंगों को मैं अपने सगे संबंधी के रूप में पहचान रहा हूं। जब तरंग उठी तो मेरे हृदय में भी हर्षोल्लास उठा कि हां चलो मैं अपने अपने भाई के साथ में अपनी बहन के साथ में वार्तालाप कर रहा हूं। किंतु जब वही तरंग वही समुंदर के साथ में मिलित होने को जाएगी तो हमारा मन दुख से भर जाएगा कि अरे मैं अपने भाई या बहन को गवा रहा हूं। किंतु देखिए कि एक के बाद एक तरंगे उठती ही जाएगी। हृदय इतना विशाल हो जाना चाहिए कि यह विश्व में जितने भी भाई स्त्री और पुरुष है मेरे ही भाई-बहन मेरे ही संतान संतति है। मैं अपने भाई-बहन के साथ में जितना स्नेह रखता हूं, अपने मां-पिताजी के साथ में जितना स्नेह है, मेरा श्रद्धा है। तो इतना ही श्रद्धा और स्नेह सीनियर सिटीजन की ओर होना चाहिए। भाई बहन के साथ में जो स्नेह का रिश्ता है वह मेरी उम्र के जितने भी है सबके साथ में होना चाहिए और जो मेरे संतान संतति है उनके प्रति मेरा जो प्रेम है तो जितने भी मेरे से जूनियर है छोटे हैं उन सबके प्रति वही प्रेम होना चाहिए जो स्वामी जी अल्मोड़ा की गुफा में गए और वहां पर ध्यान करने का प्रयास किया सोचा कि मैं एकमात्र तरंग हूं और मुझे इस विराट महासमुंदर में सच्चिदानंद समुंदर में विलीन होना है। ऐसा बोलकर के उन्होंने इस तरह से निर्विकल्प समाधि में जाने का प्रयास तो किया किंतु जैसे ही उनकी बहन का मृत्यु का संवाद मिला साथ में ही स्वामी जी की आंखें जैसे कि खुल गई। ये जैसे मां को ये तारककेश्वर में जो अनुभूति हुई है कि खंड खंड में विभाजित मानव मन अखंड सत्ता के साथ में वो जब विलीन हो जाता है और फिर उर्ध्व अवस्थित विराट मन के साथ में एकीभूत हो जाता है तब वह एक अखंड दृष्टि प्राप्त होता है। तो मां को जो अनुभूति यहां पर तारकेश्वर में हुई थी वही अनुभूति स्वामी जी को वहां पर अल्मोड़ा में हुई थी। देखिए इसका रामकृष्ण संघ में वैराग्य का अर्थ क्या है? आप एक ट्रेडिशनल कांसेप्ट देखेंगे कि हां मुझे ऐसा लगा कि यह जो मेरा देह, मन, प्राण, बुद्धि, ये जो हाथ, पैर पंच ज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय जिसको जो भी कुछ है मेरा वो सब मिथ्या है। बस एक महासमुंदर की लहर है। मुझे महासमुंदर में विलीन हो जाना है। तो इसको हम जनरली वैराग्य कहते हैं। किंतु यहां पे रामकृष्ण संघ में आप देखिए मां के साथ में भी और स्वामी जी के साथ में भी। वैराग्य का क्या अर्थ है? वैराग्य का अर्थ है जो अपने स्नेही जन होते हैं जो अपने परिवारजन होते हैं बंधु बांधव मित्र वगैरह जो होते हैं उनके साथ में जो माया का संबंध है वो माया का संबंध टूट जाना और पूरे जगत में पूरे विश्व में जितने भी स्त्री पुरुष नर नारी आबाल वनिता वृद्ध संस्कृत में जैसे कहते कोई भी कहानी होगी ना कहानी में कहेंगे आबाल वता वृद्ध इस राज्य के जितने भी थे उन सब ने मिलकर के मीटिंग की या ना कि जो भी है तो वो जितने भी बच्चे जितनी भी स्त्रियां जितने भी वृद्ध लोग हैं जितने भी युवान लोग हैं वो सब जैसे कि मेरे ही स्नेह के पात्र है। वह सभी मेरी ही करुणा के पात्र है। यानी कि हमारा वैराग्य जैसे रामकृष्ण संघ में वैराग्य आपको जगत का त्याग करके वन में जाने को नहीं कहता है। हमारा वैराग्य कहता है कि जिस कमरे में आप बैठे हुए हैं खिड़की दरवाजा बंद करके और कमरे के भीतर में जो दो-तीन लोग हैं उन्हीं को लेकर के आप एक माया का संसार गठित कर रहे हैं। अविद्या का जो संसार बना रहे हैं तो आप अपने कमरे के अपने घर के खिड़की दरवाजे खोलिए। घर से बाहर आइए। देखिए कि आपके आसपास में कौन गरीब गुरबे ताड़ित प्रताड़ित जो भी निम्न जाति के तथाकथित जो भी दरिद्र नारायण चंडाल नारायण है उनको ही आप अपना जीवन सर्वस्व मान करके उनकी आप सेवा कीजिए। तो यह पॉजिटिव वैराग्य है। यहां पर आपको विद्या का संसार बनाना है। वह था आपके घर में जब थे तो था अविद्या का संसार और जब घर से बाहर आए तो आपने देखा विद्या का संसार। तो यह हमारे वैराग्य में और एक जो ट्रेडिशनल कांसेप्ट है वैराग्य का उसमें यह डिफरेंस है। इसीलिए आप देखिए कि यह जो मां के हृदय में जो ठाकुर के प्रति एक जो स्नेह और प्रेम का जो बना हुआ था रिश्ता वो रिश्ता जब टूटा तो ऐसा नहीं है कि हां मां गई थी वृंदावन। वृंदावन के दिनों की जब हम घटना पढ़ेंगे तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे कि मां ये ट्रेडिशनल वैरागी की तरह जगत संसार छोड़कर के तीर्थ क्षेत्र में भ्रमण कर रही है अपने मन को शांति दिलवाने के लिए। ऐसा एक हमको कुछ समय के लिए आभास होगा। किंतु हमको यह भी पता है कि तीर्थ भ्रमण समाप्त करके मां कामारपुकुर आई थी वापस। कामार पुकुर से कोलकाता जय राम भाटी अल्टीमेटली जय राम भाटी में मां ने निवास किया था और जैसे कि अपने हृदय के दरवाजे अपने हृदय के द्वार सबके लिए खोल दिए थे सबके लिए दरवाजा उन्मुक्त है आए जो भी आए मां के घर में आओ बसो खाओ एशो बसो खाओ मां का जो था आओ बैठो और खाओ आहार ग्रहण करो और सिर्फ यह अन्न रूपी आहार नहीं यह करुणा रूपी आहार ममता रूपी आहार यह स्नेह और आशीर्वाद रूपी आहार यह मंत्र दीक्षा रूपी आहार यह सब आहार मां अपने बच्चे को करवाती थी। तो देखिए कि मां के जीवन में भी ट्रेडिशनल वैराग्य जिसको हम कहते हैं कि संसार से परे चले जाना वनवास करना ईश्वर चिंता में ही जैसे कि मग्न हो जाना वो ज्यादा दिन टिका नहीं है एक साल दो साल मुश्किल से उसके बाद में ही धीरे-धीरे करके मां आइदर जयरा कोलकाता आती थी या तो फिर यह कोलकाता से कुछ-कछ भक्तों ने प्रथम तो कामार पुकुर और फिर बाद में जब मां जय राम बाटी गई तो फिर जय राम बाटी आना प्रारंभ हो चुका था। तो देखिए कि रामकृष्ण संघ का वैराग्य और एक ट्रेडिशनल वैराग्य वैराग्य का अर्थ तो वैसे दोनों जगह पर स्पष्ट है कि जितने भी यह सांसारिक जागतिक लौकिक संबंध है माया के राज्य में उसका त्याग करना है। यह तो एकदम स्पष्ट है। किंतु इसके बाद का जो स्टेज है ट्रेडिशनल वैराग्य कहेगा कि आप अभी अरण्य में जाकर के रिट्रीट करिए। किंतु रामकृष्ण संघ का वैराग्य कहता है अरण्य से बाहर आइए। अपने घर का दरवाजा खिड़की खोल दीजिए। और यह विराट संसार है। यह ईश्वर की ही एक-ए किरण है। ब्राह्मण के ही लहरें हैं ब्रह्म समुद्र की। ऐसा समझ करके उनकी सेवा के लिए उनके प्रति अपना स्नेह, करुणा और अपना केयर उनको देने के लिए प्रस्तुत होइए। तो यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस। सो यहां पे भी देखिए यह पूरे सेंटेंस का हमने इस तरह से एनालिसिस किया था। इसके बाद

व्यष्टि का समष्टि में पूर्ण विलय — यही है वैराग्य

गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? समष्टि मध्य व्यष्टिर ए निमंजन निमज्जन के आमरा वैराग्य नाम में अभहितो करी समष्टि के भीतर में व्यष्टि के इस विसर्जन को ही हम वैराग्य नाम से अभिहित करते हैं। चिन्हित करते हैं। समष्टि के भीतर में व्यष्टि का संपूर्ण रूप से विसर्जन हो जाना। यह जो वेस्ट इंडिया या नॉर्थ इंडिया उसमें गुजरात महाराष्ट्र यहां पर जो रहते हैं उन्होंने यह गणेश विसर्जन देखा होगा और यहां पर बंगाल साइड में जो रहते हैं उन्होंने मां दुर्गा का विसर्जन देखा होगा। तो देखिए कि जब देवता की आराधना करके नदी में समुंदर में हम उस जो मृणमय प्रतिमा है उसको विसर्जन करते हैं। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो मेरा छोटा अहम है मैं अपने को यह देह मन रूपी एक जो अस्तित्व के रूप में पहचानता हूं कि हां मेरा इस समय जन्म हुआ। इस तरह से मैं बड़ा हुआ। यह मेरे संस्कार है। यह मेरी एसेट्स है। यह मेरी डेट है। यह जो जीवन का बैलेंस शीट जो हम निकालते हैं बैठ के उसमें से कुछ भी मैं नहीं हूं। मैं हूं वही अनंत सतचित आनंद रूपी समुंदर की एक लहर। आज मैं प्रकट हुआ हूं और कल मैं विलीन हो जाऊंगा। तो यह व्यष्टि का समष्टि के भीतर में विलीन हो जाना। उसके भीतर में समाहित हो जाना। उसके भीतर में विसर्जित हो जाना। इसको कहते हैं वैराग्य। किंतु जैसे अभी हमने देखा रामकृष्ण संघ में जब आप सच्चिद आनंद में विलीन हो जाते हैं। फिर से आप विसर्जित हो जाते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप अरण्य में चले जाते हैं। आप वन में चले जाते हैं। गिरी कंदराओं में चले जाते हैं। हिमालय कैलाश चले जाते हैं। नहीं आप अपने घर को छोड़कर के रास्ते पर बाहर आते हैं। जैसे स्वामी जी ने कहा कि वन के वेदांत को मैं किसान की कुटिया में किसान के खेत में गृहिणी के यह किचन के भीतर में विद्यार्थी के क्लासरूम के भीतर में मैं ले आना चाहता हूं तो हमको भी इसी तरह से किसान की कुटिया किसान का खेत गृहिणी का किचन और विद्यार्थी के क्लासरूम में जाना है और हमको वही वेदांत की वाणी इनको सुना सुनानी है। तो हमारे यहां पे वैराग्य का अर्थ है संसार में आकर के एंगेज होना। साथ-साथ में ही किंतु भीतर में यह वैराग्य की अग्नि प्रचंड रूप से प्रज्वलित हो रही है। मैं संसार में रहता भी हूं किंतु संसार मेरे भीतर में नहीं है। मैं सबके साथ में स्नेह करुणा पूर्वक व्यवहार करता हूं। सबको आशीर्वाद देता हूं। सबको मेरे पास में जो कुछ भी लिमिटेड नॉलेज है उसको बांटता हूं। किंतु साथ में मेरे मन में यह एकदम क्रिस्टल क्लियर है कि यह संसार में ईश्वर ही मात्र है। यह जो विभिन्न नाम रूप मैं देख रहा हूं यह नाम रूप के पीछे में वास्तविक सत्ता तो ईश्वर मात्र ही है। यदि यह क्रिस्टल क्लेरिटी नहीं होगी और मैं ऐसा कुछ करने को जाऊंगा संसार में आकर के लोगों को हेल्प करना तो पैर फिसलने की पूरी संभावनाएं हैं। क्योंकि एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति आकर्षण होना, दैहिक आकर्षण, वासनाओं का आकर्षण यह तो स्वाभाविक है। तो यदि यह भीतर में हृदय में ब्रह्म ज्ञान रूपी अग्नि प्रज्वलित नहीं होता है। और मैं संसार में आकर के लोगों को सहाय करने का प्रयास करूंगा तो अपने मुंह के बल गिरूंगा और चोट लगेगी। हाथ पैर टूट जाने की संभावनाएं हैं। तो यह है हमारे रामकृष्ण संघ की भावधारा। अच्छा स्वामी जी किंतु देखिए स्वामी जी बिल्कुल ही नए-नए कांसेप्ट लाते हैं। अपने मद्रास डिसाइपल को कहते हैं कि आप लोगों को कर्म योग में खुद पढ़ना है। वैराग्य वैराग्य जो है वह बाद में आता रहेगा। तो स्वामी जी यह सब चीजों को किस तरह से समझाते हैं? देखिए वन रेडिकल आईडिया आफ्टर अनदर आप ठाकुर को देखेंगे ही वास क्वाइट रेडिकल फॉर ह टाइम उसके बाद में यदि मां को देखेंगे तो और भी ज्यादा रेडिकल आइडियाज दिखेंगे कि ठाकुर की तरह पंचवटी के नीचे बैठकर के जगत संसार को त्याग करके एक के बाद एक साधना मां ने नहीं की मां की तो साधना कहो कि मां का जीवन कहो वही था कि अपने संतानों की संभाल लेना उनको को आशीर्वाद देना। तो यह आईडिया यदि हमको रेडिकल लगता है तो स्वामी जी के आइडियाज और भी रेडिकल लगेंगे। यह जितना भी अपना कन्वेंशनल विज़डम है उसको कि जैसे स्वामी जी की खिड़की के बाहर फेंक देते हैं कि पहले वैराग्य फिर सेवा यह सब भूल जाओ। सीधा सेवा में कूद पड़ो। गिरोगे हाथ पैर टूटेंगे तो भी कोई दिक्कत नहीं तो भी टेंशन नहीं लेना है। चिंता नहीं करनी है। फिर से खड़े हो जाओ और फिर से वही महामाई का कार्य करते रहो। हाथ पैर टूटेंगे तो मां फिर से ठीक करके फिर से काम करने योग्य कर देगी। तो वो स्वामी जी का और भी रेडिकल आईडिया दैट वी विल सी स्टेप बाय स्टेप देखेंगे। देखिए आईडिया का इवोल्यूशन भी है अपने संग में। किस तरह से होता है। ठाकुर की साधनाओं का वर्णन हम लीला प्रसंग में पढ़ ही रहे हैं। हालांकि बहुत ही ट्रेडिशनल लगता है किंतु ट्रेडिशन के भीतर में रेडिकल जो कांसेप्ट है कि जितनी भी प्रथाएं हैं, जितनी भी ट्रेडिशन है, जितनी भी स्कूल्स ऑफ साधना है, सबका कैसे ठाकुर ने समन्वय किया है। किंतु समन्वय में ऐसा नहीं कि ठाकुर ने खिचड़ी बना दी है और अपना एक नया स्टार्ट किया है। आजकल जैसे समन्वय का नाम अर्थ क्या करते हैं लोग? खिचड़ी बनाना कि हां मैंने यह पद्धति का भी अभ्यास किया है। उस पद्धति का भी किया है। उसका भी किया है। वो सबको मिलाकर के मैंने एक नई मेथड स्टार्ट की है। आप लोग यह नई खिचड़ी मेथड का प्रयास कीजिए, प्रैक्टिस कीजिए। नहीं, ठाकुर ऐसा खिचड़ी नहीं बनाते। ठाकुर ऐसा नहीं कहते हैं कि यह द्वैत और अद्वैत ये ज्ञान कर्म भक्ति योग इन चारों का समन्वय करके मैंने एक नई मेथड तैयार की है। रामकृष्ण योग तैयार किया है। ऐसा नहीं कहते हैं। फॉलो जहां तक आप भक्ति मार्ग को फॉलो करते हैं। भक्ति मार्ग को ही फॉलो कीजिए जो ट्रेडिशनली चला आ रहा है। बस अपने मन में यह क्लेरिटी होनी चाहिए कि मैं सही बाकी गलत ऐसा जो गोंडामी या तो फेनेटिसिज्म जिसको कहते हैं वो फनेटिसिज्म नहीं होना चाहिए। हृदय विशाल होना चाहिए। आप यदि ज्ञान मार्ग को फॉलो करते हैं तो एग्जैक्टली वही कीजिए जो कि ट्रेडिशन में लिखा है। किंतु साथ में ही एक तरह का सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स कि भक्त लोग जो है वो निम्न अधिकारी है। मध्यम अधिकारी है और मैं उच्च अधिकारी हूं जिससे कि मैं ज्ञान योग की प्रैक्टिस कर रहा हूं। इस तरह का घमंड मत रखिए। तो वह ठाकुर का जब इस तरह से सभी साधन पद्धतियों को वैलिडेट करके इन सबके भीतर में किस तरह से कोपरेशन कोऑर्डिनेशन हो सके वो दैट वास ठाकुर रेडिकल आईडिया यहां पर मां का रेडिकल आईडिया है कि वैराग्य का अर्थ यह मां चाहती तो कालाबाबू कुंज वृंदावन में अपना पूरा जीवन आसानी से बिता सकती थी। कोई मां कोलकाता आकर के जयराम भाटी कामारपुर जाकर के इतना कष्ट करना कोई आवश्यकता नहीं थी। वो जो भैरवी ब्राह्मणी जैसे कि वहां पर रहती है जिस तरह से इतने जो योगेन मां स्वयं यह कालाबाबू कुंज में निवास करके साधन भजन कर रही थी तो मां भी आसानी से कर सकती थी। किंतु नहीं यह अपने वैराग्य की डेफिनेशन यह घर छोड़कर के वन में चले जाना वह नहीं है। सो जैसे यह मां का एक रेडिकल कांसेप्ट है स्वामी जी का कर्म योग दैट इज अनदर रेडिकल कांसेप्ट। ये जो रेडिकल कांसेप्ट्स आफ्टर रेडिकल कांसेप्ट से अपना जो लिटरेचर है वह भरा हुआ है। किंतु जब हम यह सब डिस्कस करते हैं हम उसको प्रॉपर उसको कैटेगराइज करना चाहिए। बहुत बार हम रेडिकल कांसेप्ट के रूप में उसको एक चीप एक्सप्लेनेशन दे देते हैं जो कि उसको जस्टिफाई नहीं करता है जो कि उसको न्याय नहीं देता है। यह एक्सप्लेनेशन के भी लेयर्स आफ्टर लेयर्स आफ्टर लेयर्स है। ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को एक साथ में स्टडी करके एक साथ में आप कंपेयर कंट्रास्ट करेंगे तब हमको यह कुछ लेयर दृष्टिमान होंगे। सब नहीं सब लेयर तो तभी दृष्टिमान होंगे जब कि हम आध्यात्मिक जीवन में एक के बाद एक समिट सर करते जाएंगे। एक के बाद एक शिखर जय करते जाएंगे। तभी तो डीपर स्ट्रक्चर जो है वह प्रकट होगा। किंतु जहां तक हम अभी जमीन पर ही खड़े हैं तो जमीन पर खड़े रहकर के जो बेस्ट वे है यह सब उच्च से उच्चतर शिखरों को देखने का कंपेयर कंट्रास्ट करने का वो है ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को एक साथ में पढ़ा जाए तीनों को एक साथ में इक्वलेंस दिया जाए। मेरी फिलॉसोफी के अनुसार स्वामी जी इज ग्रेटर। ठाकुर और मां है तो गुरु थे, गुरु पत्नी थे। बोल के साथ में रखना पड़ता है। तो मैं रखता हूं। अब जैसे वो कोई कोई एनजीओस, कोई कोई संस्थाएं हैं इस तरह की स्वामी जी के नाम से ही सब कुछ करते हैं। फिर कोई कोई ऐसा रिवर्स वाले भी होते हैं। वह कहेंगे अरे ठाकुर और मां तो असली है ना। स्वामी जी तो क्या ये सब बिना मतलब का कर्म योग ले आए हैं। बिना मतलब म वो जो शांत सरोवर है जलाशय उसमें पत्थर फेंक रहे हैं। तो स्वामी जी को हटाओ सिर्फ ठाकुर और मां को ले लो। फिर उसमें कोई कोई ऐसा होता है मां को रखने की जरूरत नहीं। स्त्री है स्त्री गुरु क्या कभी होती है? ठाकुर को ही सिर्फ रखो। तो ये जो सब खंड खंड ये जो खंड खंड दृष्टिभंगी तो ये अखंड दृष्टिभंगी है कि ठाकुर मा स्वामी जी एक तीन तीन एक वो हो गई हमारे लिए अखंड दृष्टिभंगी और हमारे लिए खंड अखंड हो गया कि तीन में से या तो फिर एक को ही लेना या तो बड़े जोर ज्यादा से ज्यादा दो को लेना। सो खंड खंड दृष्टिभंगी से अखंड की ओर हमको जाना है। यह अपने क्लास में

तारकेश्वर से भग्न मनोरथ हो माँ सारदा ठाकुर के पास लौट आती है

समष्टि के बीच में समष्टि के भीतर में व्यष्टि के इस निम निमज्जन को ही व्यष्टि के इस विसर्जन को ही हम वैराग्य नाम से अभिहित करते हैं। वैराग्य नाम की उपमा देते हैं। वैराग्यो प्रभावे संकल्प श्री मां काशीपुर फिरिया आशीले उसी वैराग्य के प्रभाव से संकल्पचत मां ने संकल्प किया था कि भगवान शिव के सामने हत्या देगी यानी कि या तो ठाकुर जीवित रहेंगे या तो मां जीवित रहेगी। तो इस अर्थ में कि यदि ठाकुर का देहांत होता है तो मां का भी देहांत हो जाएगा और यदि मां ठाकुर जीते हैं तो मां भी जीवित रहेगी। तो इस अर्थ में मां ने संकल्प लिया था किंतु वैराग्य के प्रभाव से संकल्पचत हो गई। संकल्प का त्याग करके श्री मां जब काशीपुर में फिर वापस आई ठाकुर सब जानिया शूनिया ओ रहस्य कोरिया बोलीले कीगो किु होो किु ही ना ठाकुर ने सब विवरण सुना और फिर रहस्य करतेकरते थोड़ा सा हास्य विनोद करते करते पूछा क्या कुछ हुआ कुछ नहीं हुआ अर्थात कि देखिए कि ठाकुर के मन में भी अभी यह बात फिट बैठ गई है कि उनका लीला अवसान होने वाला है। और यदि भगवान शिव भी इस बात में अभी कुछ बीच में बोल नहीं सकते हैं क्योंकि वही तो शिव एक रूप से श्री रामकृष्ण होकर के पृथ्वी पर अवतरे हैं। तो उन्होंने एक बार डिसाइड कर लिया कि यह पृथ्वी लीला समाप्त हुई है। संसार लीला समाप्त हुई है। अभी फिर से कैलाश लीला का प्रारंभ होना है। तो फिर भगवान शिव भी उसमें कुछ बोलने नहीं वाले हैं। इसलिए ठाकुर ने थोड़ा सा रहस्य बंगाली शब्द रहस्य इसका अर्थ मिस्टिसिज्म नहीं होगा मिस्टरी नहीं होगी इसका अर्थ होगा विनोद करके हास्य करके पूछा क्या कुछ हुआ कुछ नहीं तो यह तारकेश्वर की घटना समाप्त हुई इसके बाद में देखिए क्या कहते हैं मां गंभीरानंद जी अभी मां को तो पता चल गया है

महासमाधि की आहट: ठाकुर ने पहले ही बताए थे ये चार संकेत

कि अभी यह ठाकुर का देह रहने वाला नहीं है महासमाधि के दिन एक के बाद एक आगे बढ़ते ही रहे हैं। रहते हैं। और फिर महासमाधि के पूर्व जो घटनावली होने वाली थी होने वाली है। ऐसा जो आभास ठाकुर ने ऑलरेडी दिया था वो घटनावली अभी प्रारंभ हो गई है। ठाकुर पांच वर्ष पूर्व तहार महासमाधि काले सूचक घटनावली कथा बोलिया छिले 5 साल पहले ही ठाकुर ने उनकी महा समाधि के समय की महा समाधि सूचित करती हुई घटनावली की बातें उन्होंने कही थी क्या तीन जार तार हाथ खब यानी कि ठाकुर जिसके हाथ से खाना शुरू कर देंगे वो माने वन ऑफ द साइन कि हां अभी महासमाधि का समय आन पड़ा है। तो उसमें से एक जो साइन थी महासमाधि की कि हर किसी के हाथ से ठाकुर आहार करेंगे। अब देखिए कि ठाकुर की जो आहार निष्ठा है उसके बारे में तो हमने ऑलरेडी देखा है कि किस तरह से काली मंदिर का जिस दिन कंजक्रेशन हो रहा था उस दिन जब रामकुमार तो खुद उन्होंने ही तो मां काली की आराधना की थी। अन्नभोग प्रस्तुत किया था। अन्नभोग निवेदित किया था। तो वही रामकुमार ठाकुर के बड़े भाई जब ठाकुर को कहते हैं बालक गदाधर को युवा गदाधर युवा गदाधर बालक नहीं उस समय तो युवा हो चुके थे ठाकुर तो ये युवा गदाधर को जब कहते हैं उनके बड़े भाई रामकुमार कि भाई तुम यहीं पर खा लो तो गदाधर क्या कहता है कि नहीं उनके पिताजी तो अशुद्र याजक थे अर्थात कि जो शूद्र है उसका अन्न ग्रहण नहीं करेंगे तो फिर यह रानी रास मणि तो कई वर्त है तो फिर यह सब तथाकथित उस समय की हिसाब से आज के अनुसार नहीं उस समय की चिंतन के अनुसार तो रानी रास मणि तो कई वर्त है तो उनके मंदिर में कैसे आहार करेंगे तो बोल के फिर ठाकुर जब वहां पर आहार करने को तैयार नहीं होते हैं तो वही उनके बड़े भाई कहते हैं कि अच्छा तुमको तो गंगा के ऊपर में इतनी भक्ति है मां गंगा के जो किनारा जो है वह जो शोर जो है वहां पर जो कुछ भी अन्न तुम रंधोगे बनाओगे पकाओगे वह तो पवित्र ही हो जाएगा। गंगाजल से बनाया हुआ गंगा की हवा का जो जहां तक जाती है गंगा की हवा वहां तक का। तो ठाकुर ने कहा हां जब गंगा भक्ति की बात आ जाती है तो ठाकुर तो पीछे रहने वाले नहीं है। तो फिर ऐसा हुआ कि काली मंदिर से वह भिक्षा ग्रहण करके यानी कि यह जो धान वगैरह ग्रहण करके फिर वहां पर ठाकुर ने स्वहस्त गंगा के किनारे गंगा के पानी से आहार बनाया। भोजन पकाया और उस भोजन का उन्होंने आहार किया। तो वह जो ठाकुर की आहार निष्ठा तो यहां पर किंतु जैसे भक्तों के घर जाना शुरू करते हैं जो कोई भक्त है ठाकुर एक बार कहते हैं कि केशव सेन के घर गया था तो वहां पर कोई या कोई हजाम ना कि ऐसा कोई व्यक्ति यानी बाल काटने वाला ना कि ऐसा ही कोई व्यक्ति आकर के यह जो कचोरी वगैरह ले आया तो ठाकुर कहते हैं मैंने बड़े प्रेम से खाया बड़े चाव से खाया तो ये ठाकुर खुद कहते हैं कि कौन था वो आदमी पता नहीं कौन जाति का था वह जो ले आया मैंने खा लिया केशव सेन के घर पे तो यहां पर ठाकुर का हृदय भी जो एक ट्रेडिशनल जो पद्धति जिस ट्रेडिशन में एक ब्राह्मण रहता है वो ट्रेडिशन को तोड़ के ठाकुर का हृदय जैसे कि जितने भी भक्त हैं सबको अपने मान करके उनके साथ में उनके घर पर आहार कर हालांकि अन्न ग्रहण नहीं करते थे। यह ठाकुर का था। ठाकुर कहते हैं कि बलराम का अन्न शुद्ध है क्योंकि बलराम की जगन्नाथ की सेवा है। तो बोलकर के अन्न यानी कि राइस चावल वो चावल खाते थे सिर्फ बलराम बाबू के घर का। किंतु फिर ये कचोरी है, पूरी है। वो सब खाने के ठाकुर के बड़े शौक थे। तो वो सब ठाकुर आराम से खा लेते थे लोगों के घर जाकर के। इनफैक्ट वो कहानी भी है कि ठाकुर वो घोड़ा गाड़ी में बैठ के जा रहे हैं रामलाल दादा के साथ में एकाएक भूख लग गई उनको। तो वो जो फागगू बोलकर के एक व्यक्ति है तो फागगू की दुकान कि वहां की कचोरी ठाकुर को बड़ी अच्छी लगती है। तो रामलाल दादा ने बीच में घोड़ा गाड़ी रुकवाई फागगू की दुकान पर गए कचोरी बढ़िया गरमगरम वो एक वो पैकेट में बांध के ले आए और फिर ठाकुर ने उसको बड़े प्रेम से खाया। सो ठाकुर के खाने के ये सब शौक तो थे। किंतु बाद बात बाद बात बाद में देखिए प्रारंभ में जिस तरह से वह ट्रेडिशनलिस्ट थे कि या तो स्व अस्त से पकाया अन्न या तो फिर ब्राह्मण के द्वारा सब रिचुअल्स को फॉलो करके पकाया हुआ अन्न ही ग्रहण करेंगे वो सब जैसे कि धीरे-धीरे करके ठाकुर का यह सब दूर होने लगा। तो यहां पर ठाकुर ने ऑलरेडी कहा कि जिस दिन यह सब प्रारंभ होता है समझ लेना कि महासमाधि की घड़ी अभी आन पड़ी है। तो जो साइन तीन साइन तीन जो थे कि लक्षण वो ठाकुर की महासमाधि के तो प्रथम था कि वो जिस तिस के हाथ से खाएंगे। दूसरा था कोलकाता रात्रि बास कोरीबेन अर्थात कि कोलकाता में रात्रिवास करेंगे। यह भी ठाकुर का कि दक्षिणेश्वर छोड़कर के वैसे तो कहीं जाते नहीं थे किंतु कोलकाता में कभी बलराम के घर में रह गए बलराम मंदिर में रह गए तो ऐसा करके जब कोलकाता में रात्रिवास करना प्रारंभ करेंगे इसका अर्थ देखिए कि जो ठाकुर का जीवन मन प्राण संपूर्ण रूप से काली मंदिर में मां काली के श्री चरणों में समर्पित हुआ था वहां से जैसे कि ठाकुर वही ही मां काली को अपने भक्त के भीतर में देख रहे हैं। वो जो ठाकुर का जो हाथ टूटा था ना वही कि ठाकुर ने कहा कि वो श्री भगवान को मैं आलिंगन करने को गया तो मैं गिर गया और फिर हाथ टूटा और फिर बहुत ही दर्द हो रहा है। फिर मां ने आकर के कहा कि इन्हीं भक्तों के भीतर में ईश्वर दर्शन करो। तो वही है कि यह भक्तों के भीतर में मां काली का दर्शन करतेकरते अभी ऐसी परिस्थिति हो गई कि सुबह शाम रात कहां मां काली का चिंतन मनन या तो फिर यह ब्रह्म भाव में रहना वो नहीं करके अभी भक्तों के घर भी रह रहे हालांकि वहां पे भी तो ब्रह्म भाव में ही रहते थे ठाकुर का ऐसा तो था नहीं मां काली को छोड़कर कभी भी रह पाए किंतु एक जो रिचुअलिस्टिक एक जो था उनका लाइफ वो सब रिचुअलिस्टिक जो बंधन थे उनके ऊपर में वह टूटने लगे और मुक्त पंखी की तरह उनका मन अभी विचरण कर रहा है। तो यह कोलकाता में रात्रिवास करेंगे और फिर तीसरा जो साइन था निजेर खाबारे अग्र भाग अपोर के दिया पोरे निजे खबेन अपने आहार का अपने खाने का अग्र भाग और किसी को देकर के फिर बाद में खाएंगे। देखिए यह खाने का अग्र भाग किसको देना? अर्थात कि अब जैसे आप ठाकुर के लिए ठाकुर को ऑफर करने के लिए कुछ मिठाई लाए हैं आश्रम में और सिर्फ आश्रम अपने ही आश्रम में नहीं कोई भी तीर्थ स्थान में देवता को ऑफर करने के लिए मिठाई लाए हैं तो वह मिठाई में से ऑफर करने से पहले ही मिठाई एक टुकड़ा ले और किसी को दे देना। इसका अर्थ हुआ कि अग्र भाग आपने किसी को दे दिया है। देखिए मां के जीवन में अच्छा मैं पहले तो यह खत्म कर देते हैं कि अपने खाने के अग्रभाग और किसी को देकर के जब ठाकुर आहार करेंगे तो यह तीसरा साइन हुआ। तो एक्चुअली हुआ भी वही कि नरेंद्र आया है दक्षिणेश्वर। तो ठाकुर ने कहा कि अपना खुद का आहार जो था उसमें से नरेंद्र को खिलाने लगे। तो नरेंद्र भी आपत्ति कर रहा है। मां भी आपत्ति कर रही है। उनके खाने का अग्र भाग और किसी को देना यह तो उचित नहीं है। तो मां कहती है कि मैं दूसरा बना दूं क्या आपके लिए खाना? आप इतनी चिंता क्यों करते हैं? आपके लिए दूसरा बना दूं? नरेंद्र के लिए बना दूं। ठाकुर कहते हैं नहीं इसी खाने में से मैं नरेंद्र को दूंगा। तो और एक बात वह छिलिम छिलिम अर्थात कि वह जो वह यह होता है ना पाइप जिसको कहते हैं स्मोकिंग की तो वह ट्रेडिशनल पाइप तो वो ठाकुर स्मोक करते हैं फिर नरेंद्र को देते हैं वही झूठा पाइप तो नरेंद्र तो प्रसाद समझ करके उसमें से स्मोक करता है किंतु वही छिलिम जो कि नरेंद्र स्मोक करता है ठाकुर जैसे ही अपने मुंह में डालने के वो स्मोक करने का प्रयास करते हैं नरेंद्र ऐसे आपत्ति करके कहता है अरे महाशय आप क्या करते हैं क्या करते हैं? मेरे झूठा मेरा मुंह लगा हुआ आप फिर से अपने मुंह में डालेंगे। ठाकुर कहते हैं देखो तू क्या सब पागल जैसी बात कर रहे हो। जो तू जो है वही मैं हूं। जो मैं हूं वही तू है। तो नरेंद्र के साथ में ठाकुर का इस तरह से एकाकार हो जाना। यह मां सब कुछ देखती थी और मां के हृदय में वही आशंका उसी समय से प्रारंभ हो चुकी थी। ठाकुर ने कहा है कि अपने खाने का अग्रभाग और किसी को देकर के जब मैं ऐसा करना शुरू करूंगा उसका अर्थ है कि इस देह के जाने का समय आ चुका है। देखिए ये अग्रभाग के बारे में मां खुद कितनी कंजर्वेटिव थी। तो कंजर्वेटिव भी और आखिर में देखिए मां के जीवन में भी सेम चीज है। एग्जैक्टली सेम कि ये अग्रभाग और किसी को देना एक घटना है कि मां के एक त्यागी संतान वो रास्ते से जा रहे थे। अभी जय राम भाटी की ही बात है और एक भक्त था वहां पर आया था जय राम भाटी तो उसने बड़ी मेहनत करके पद्म फूल कलेक्ट किए थे तोड़े थे तालाब में से और पूरे सब सुंदर पद्म फूलों का ऐसा एक लेकर के अपने हाथ अपने हाथ में ले वह आ रहा था मां के घर जैसे कि मां को अर्पण करें मां ठाकुर को सजाए अपनी पूजा में उसका व्यवहार करें तो उसके मन की इच्छा बोल के पद्म फूल संग्रह करके मां के पास आ रहा था अभी मां अपने वरांडे में खड़े देख रही थी। तो यह भक्त आ रहा है। हाथ में पद्म फूल है और मां का त्यागी संतान सामने से जा रहा है। तो यह तो भक्त है। वह तो सन्यासी है। तो भक्त ने ऐसा हाथ उठा के सन्यासी को प्रणाम किया। हाथ में थे पद्म फूल। मां ने देख लिया। तो अब जैसे वह भक्त पद्म फूल देकर गया तो फिर यह त्यागी संतान मां के पास में वापस आता है तो मां कहती है कि देखो यह पद्म फूल है। उसको पूजा में व्यवहार मत करना। क्यों? वह हाथ में थे और उसने तुमको प्रणाम किए यानी कि अभी झूठे हो गए तो अभी इसको ठाकुर को नहीं दे सकते। तो यह मास थी कंजर्वेटिव किंतु आखिर आखिर की वो घटना हमने एक बार देखी थी कि वहां पे ही जयराम बाटी में एक लड़का था। उसकी दृष्टि थी बड़ी खराब थी। तो खाने का बड़ा लोभी था। किसी के भी घर में प्रवेश करके खाने की कोई चीजें रखी होगी। वो चुरा करके खा लेता था। तो एक बार ऐसा हुआ कि ठाकुर के लिए नैवेद्य पड़ा है। यह लड़का मां के घर के सामने खड़े रह के वो खिड़की में से नैवेद्य की ओर देख रहा है। तो मां ने देखा कि यह लोभी नजरों से नैवेद्य के सामने देख रहा है। तो मां ने कहा यह नैवेद्य झूठा हो गया। इस वो ठाकुर को नहीं दे सकते। अभी दूसरा नैवेद्य करो। तो यह ऑलरेडी हो चुका है। दूसरी बार अभी मां की खुद की समाधि उसके दिन नजदीक आ गए हैं। यही लड़का वही लोभी दृष्टि से ठाकुर के नैवेद्य के सामने देख रहा है। नैवेद्य अभी ठाकुर को ऑफर नहीं किया गया है। मां ने उसको देखा। तो जैसे कि करुणा से परवश होती हुई मां ने यह नैवेद्य में से कुछ-कुछ चीजें लेकर के लड़के को खिलानी शुरू की। तो एक त्यागी संतान वहां पर खड़ा था। वह बोल उठा, अरे मां यह क्या करती हो? नैवेद्य तो अभी ठाकुर को ऑफर ही नहीं हुआ है। बच्चे को खिला रही है। यह लोभी आदमी को खिला रही हो। मैं क्या दूसरा नैवेद्य बना देता हूं। ठहर जाइए। मां ने कहा नहीं नहीं। अरे अभी इसके भीतर में भी तो ठाकुर है। मैं दूसरा बनाने की क्या जरूरत है? वही जो वो जो फोटोग्राफ में जो ठाकुर है जिनकी मां इतने दिनों से आराधना करती थी। जिसको कि मां यह नैवेद्य ऑफर करती थी। वही ठाकुर इसी लड़के के भीतर में है और वही नैवेद्य मां लड़के को खिला रही है। क्या फर्क है जो वहां पे ठाकुर है फोटोग्राफ में जो दक्षिणेश्वर में ठाकुर थे वही ठाकुर इस लड़के के भीतर में है। यानी कि सर्वभूत में ठाकुर दर्शन करना मां ने शुरू कर दिया था। तो देखकर के ये मां के भी जीवन की अंतिम क्षण वापस आ गई। सबको पता चलना शुरू हुआ था। तो यहां पे भी अपने खाने के अग्र भाग को दूसरों में दूसरों को देकर के यानी कि मां काली को वही ब्राह्मण को सभी में जब ठाकुर साक्षात देखना शुरू कर देते हैं तो देखिए कि ठाकुर की महासमाधि की क्षण अभी समीप आ गई है। और फिर क्या लिखते हैं महाराज? दक्षिणेश्वर छाड़ी बार पूर्वे ए लखन गुली मिलिया गया छिलो दक्षिणेश्वर छोड़ने से पहले ही यह सब लक्षण मिल गए थे और फिर इसके बाद में एक चतुर्थ लक्षण है ठाकुर कहते हैं इसको अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णापणमस्तु

प्रश्न: रामकृष्ण संघ में वैराग्य की आपकी व्याख्या को और स्पष्ट कीजिए। आखिर में तो god in everything पे ही आकर आध्यात्मिक यात्रा समाप्त होती है

रेडिकल थिंग इज दैट कि स्वामी जी उसको उल्टा देते हैं। स्वामी जी कहते इति इति से प्रारंभ करो। व्हिच इज समथिंग सो डेंजरसली रेडिकल। म ठाकुर को पढ़ के लगता है कि नेति नेति फिर इति इति मां कहती है ठीक है इति इति मतलब इति इति में और ज्यादा मतलब हृदय के दरवाजे खोलना स्वामी जी इट पुट्स इट ऑन टर्न्स इट ऑन इट्स हेड कि पहले इति में नेति नेति

प्रश्न: उपनिषद् दोनों बातें कहते हैं — “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” भी और “अहं ब्रह्मास्मि” भी। किन्तु अधिकांश आचार्यों ने मुख्यतः “अहं ब्रह्मास्मि” पर बल दिया और संसार से निवृत्ति का मार्ग सिखाया। केवल स्वामीजी ने “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” को केंद्र में रखकर “शिव-ज्ञाने जीव-सेवा” का आदर्श प्रस्तुत किया।

मैं इसको इस तरह से इंटरप्रेट करूंगा कि आपने जो कहा वो बिल्कुल सत्य है कि उपनिषद में दोनों है सर्वम खलव इदम ब्राह्मण ईशावास्य मिदम सर्वम यह भी है और अहम ब्रह्मास्मि या तो फिर के प्रज्ञानम ब्रह्म यह भी है। बात यह नहीं है कि सिर्फ एक को डेवलप किया गया। बात है दोनों डेवलप हुए किंतु दोनों में दरार हो गई। यह हो गया भक्ति मार्ग जिसमें कि जीवे दया वो एक इंटीग्रल पार्ट है। वैष्णव सेवा जीवे दया व्हिच इज़ एन इंटीग्रल पार्ट ऑफ वैष्णव साधना भक्ति साधना। और यहां पर यह त्याग मार्ग है। बात है कि त्याग मार्ग और भक्ति मार्ग में एक तरह का स्प्लिट हो गया। यह जो स्वामी जी का जो इंसाइट है कि हमेशा से भारत में ऐसा होता रहा है कि ब्रेन एंड हार्ट इन दोनों के बीच में स्प्लिट लगा रहा। तो यह क्षत्रिय है कि एक समय ब्रेन को रिप्रेजेंट करते थे और हार्ट को रिप्रेजेंट करते थे और ब्राह्मण लोग ब्रेन को रिप्रेजेंट करते हैं। तो क्षत्रिय और ब्राह्मण पहले तो इन दोनों में एक स्ट्रगल प्रारंभ हुआ। उसके बाद में सेम स्ट्रगल कंटिन्यू रहा यह बुद्धिस्ट और यह ब्राह्मण के बीच में। ब्राह्मण ऑलवेज रिप्रेजेंट्स ब्रेन। तो यह क्षत्रिय लोग थे। अभी वो बुद्धिस्ट में परिणत हो गए और उनका हृदय खुल गया। सबको जैसे कि अपने भीतर में आवकार कर रहे हैं। इसके बाद में यही स्प्लिट कंटिन्यू रहा शंकराचार्य और चैतन्य महाप्रभु। ये आ चंडाल जितने भी है सबको कि अपने गले लगाना। यह चैतन्य महाप्रभु ने किया है। जबकि ये ब्रेन पार्ट जो है हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफी इट कंटिन्यू बाय शंकराचार्य। तो यह जो स्प्लिट जो आदिकाल से चली आ रही थी ऑन वन हैंड ब्रेन ऑन अनदर हैंड हार्ट दैट स्प्लिट हैज़ बीन को फुलफिल्ड वि अराइवल ऑफ ठाकुर कि ब्रेन और हार्ट एक ही जगह पर रहेंगे और ये स्प्लिट को पूरा करना होगा तभी तो भारत का नवनिर्माण होगा। दैट इज द रेडिकल आईडिया ऑफ़ आवर ऑर्डर।

रानी रासमणि और ठाकुर के बड़े भाई रामकुमार की निष्ठा और उदारता

ना किंतु देखिए ये जो स्प्लिट है ना वो किसने म इसको हील करने का पहला प्रारंभ किसने किया पता है ठाकुर से पहले रानी रासमणि ने अब दक्षिणेश्वर देखिए दक्षिणेश्वर का टेंपल इटसेल्फ इज सो रेडिकल यहां पे मां काली का मंदिर है पीछे में राधाकांत का मंदिर है यहां पे द्वादश शिव मंदिर है यानी शैव शाक्त और वैष्णव तीन जो मेजर ट्रेडिशन थी भारत की जो कि तीनों अपने रास्ते पर चलती थी। तीनों को रानी रासण ने एक मंदिर में इकट्ठा किया है। सो ठाकुर इस सिंपली फॉलोविंग दैट व्हाट रानी रासण रासवाणी का भी देखिए कि हमको स्वीकार करना होगा। सिर्फ विज़न हुआ सिर्फ मंदिर बनाया। यह नहीं वो तो मां का ही मंदिर बना सकती थी। वहां पे ना ही राधाकांत को रखने की जरूरत थी ना ही द्वादश शिव मंदिर रखने की। दैट इटसेल्फ इज म इसको मैंने कहीं पर देखा नहीं है, पढ़ा नहीं है कि यह आईडिया आया कहां से? हो सकता है कि बंगाल में इस तरह का आईडिया पहले भी दूसरी जगह पे भी हो, दूसरे मंदिर में भी हो। बट एस फार एस आई नो दिस इज अ रेडिकल म कांसेप्ट बाय रासमणि। तो अभी रासमणि के पुजारी रामकुमार ही हो सकते हैं और कोई नहीं हो सकते। यह देखिए जैसे रासमणि को हमने अंडर अप्रिशिएट किया है ना रामकुमार को भी अंडर अप्रिशिएट किया है। सो खुदराम रामकुमार ये दोनों का अपना-अपना एक स्टैंडिंग है। ठाकुर के जीवन पे दोनों का बहुत बड़ा प्रभाव था। खास करके रामकुमार का क्योंकि खुदीराम तो छोटी उम्र थी। ठाकुर की चल बसे थे। किंतु उसके बाद में रामकुमार ही जैसे कि ठाकुर के पिताजी के रूप में रहे थे। तो एक लिविंग विदिन द ट्रेडिशन एट द सेम टाइम फाइंडिंग ए वे आउट। यह जो था यह स्मार्टनेस बिलोंग टू रामकुमार जो कि ठाकुर ने धीरे-धीरे करके किंतु ठाकुर ने इसको कब अपनाया जबकि वह सही में सर्वभूत में ईश्वर दर्शन कर रहे हैं तब अपनाया। जबकि रामकुमार का था कि ट्रेडिशन को क्या है अपना गला नहीं घोट देना है। वो ट्रेडिशन के भीतर में रह के भी एक प्रैक्टिकल काम निकाल लेना है। दैट वाज़ रामकुमार। म जो जो ठाकुर के पास में से प्रैक्टिकल काम निकाल सकते हैं। उनकी ठाकुर की जो आहार निष्ठा तो गंगा के किनारे बिठा के आहार करवा दिया उनको ना किंतु ना किंतु उनको पता है कि डांटने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने ऑलरेडी ठाकुर को डांट लिया था। वो जो ठाकुर जब आए तो कहा कि यजमानगिरी वगैरह जो है तुमको करना होगा सीखना होगा पूजा वगैरह। तो ठाकुर कहते हैं चाल कला बांधा विद्या माने जो चावल और केला देने वाली विद्या मैं सीखने वाला नहीं हूं। तो उस समय रामकुमार ने डांटा था ठाकुर को। किंतु साथ में ही लीला प्रसंग में लिखते हैं शरद महाराज कि उनको इतना पश्चाताप हुआ कि देखो मां का लाडला लड़का मैं अपने खुद के स्वार्थ के लिए कोलकाता में ले आया हूं। जिससे कि मुझे हेल्प करे बोल के। वरना तो कहां वो स्नेह भरी मां के साथ में रहता। कामरार पुकुर में अपने स्वार्थ के लिए मां के पास में से छुड़ा करके उसको मैं यहां पे लाया। ऊपर से मैं उसको डांट रहा हूं। वो रामकुमार को इतना पछतावा कि फिर उन्होंने ठाकुर को कुछ नहीं कहा। फिर ठाकुर संपूर्ण रूप से मुक्त हो गए थे। मतलब किसी भी तरह के वो अपने जो सीनियर है उनकी डांट से। सो ये ऑलरेडी ये किस्सा हो चुका था। धनी म ठाकुर के भीतर में वो रेबेल स्ट्रिक पहले से ही था। ठाकुर की भी तपस्या थी वहां पर तो मतलब दोनों ओर से ना कि एक तो रामकुमार ने जो विधान दिया उसको आप टेक्निकली चैलेंज नहीं कर सकते। दैट वाज़ वन पार्ट फिर तो ठाकुर की जो दिव्यता है वो प्रकाशित होना शुरू हो गई। तो फिर वो दूसरा एक फैक्टर ऐड हो जाता है। ठाकुर कहते हैं ना फूल खिलता है तो भ्रमर अपने से आ जाते हैं। सो दैट वे रासवाणी इस सो लकी। देखिए दिस इज़ आल्सो इंडियन ट्रेडिशन ना कि मतलब ये भारत के साथ में देखिए एक और जाति प्रथा जैसी ऐसी एक दूषणीय प्रथा भी है। तो वैसे ही जाति प्रथा के जो सबसे बड़े हिमायती जो ब्राह्मण गण है उन्होंने ही आकर के जाति प्रथा को तोड़कर के कई वर्ष की काली मंदिर में रह के पूजा की और आराधना की। यह भी तो एक महामाया की खेल है ना। वरना तो कोई बड़े क्षत्रिय भी तो रास मण मतलब मंदिर बना सकते हैं। यदि भगवान को लीला ही करनी है तो भगवान के हाथ में तो सब कुछ है। कोई राजा के हाथ से कोई मतलब उच्च वर्ण के हाथ से मंदिर बनवा सकते वहां पर ठाकुर और बड़े भाई को भेज सकते थे। ऐसा नहीं करके रानी रासमणि के द्वारा मंदिर बनाया और फिर वहां पर रामकुमार और रामकृष्ण को भेजा। सो यह भी तो एक महामाया का एक खेल है। एक हाथ से बनाते हैं तो दूसरे हाथ से तोड़ते हैं। ना इसीलिए देखिए भारत में कम्युनिस्ट रेिवोल्यूशन कभी नहीं आया। इनस्पाइट ऑफ के सबसे दूषणीय सामाजिक प्रथा भारत में थी। आप चाइना देखिए, रशिया देखिए कि इतना ब्लडी कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन आया। सब तोड़फाड़ करके चला गया। भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। क्योंकि जो जाति प्रथा के सर्वोच्च शीर्ष पर जो बैठे हैं ब्राह्मण लोग उन्हें ही उन्होंने ही जाति प्रथा को अंडरमाइन करने का प्रयास किया था। माने जो बेस्ट ऑफ द ब्राह्मण थे उन्होंने ओम