<Untitled Chapter 1>
ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां का जीवन पाठ कर रहे थे हमने देखा
रामकृष्ण संघ का सुवर्ण युग
कि किस तरह से मां और ठाकुर दक्षिणेश्वर में रह रहे हैं और दक्षिणेश्वर में जैसे मैंने कल डिस्कस किया हमने कल डिस्कस किया कि यह एक गोल्डन एज था अपने संघ का यह जो अपने संघ का 102 साल का जो हिस्ट्री है इस संघ में देखिए कि सबसे सुंदर समय कौन सा था ऐसा
चित्त शुद्धि का सहज उपाय
कौन सा समय था कि जिस समय हम लोग यह जद जैसे कि हमने देखा कि लीला चिंतन जब ध्यान करने का एक सबसे सुंदर तरीका है यह जैसे कि हम लोग इमेजिन करते हैं कि मैं ठाकुर के साथ में जैसे कि कल जो बात हुई थी कि ठाकुर और एक दूसरा वहां पर कालीवाड़ा उसको ठाकुर ने कहा कि आप और मैं इन दोनों में से गोरा कौन ज्यादा है किसका वर्ण ज्यादा शुभ्र है और मां को कहा गया कि आप यहां पर आप ये ठीक कीजिए आपको अंपायर होना है आपको निर्णय लेना है तो इस तरह से निर्णय लेकर के मां ने कहा कि जो प्रतिद्वंदी था ठाकुर का वही ज्यादा गोरा था तो देखिए कि यहां पर हम लोग जब यह सोचेंगे कि मुझे अपने चित्त को निर्मल करना है मुझे अपनी कामना वासनाओं पर जय प्राप्त करना है तो उसके लिए दो साधन पद्धतियां है सर्वप्रथम साधन पद्धति है वह है विल पावर और दूसरी साधन पद्धति है वह है भक्ति या तो फिर शरणागति अभी विल पावर के द्वारा क्या होता है हम अपने मन को जब भी एकाग्र करने का प्रयास करते हैं उस समय अपने मन में दुनिया भर की बातें आ जाती है जैसे कि यहां पर मैं कुछ स्टूडेंट्स को प्रतिदिन उनका क्लास कंडक्ट करता हूं तो मैं उनको सिखाता हूं कि मेडिटेशन कैसे करना है ध्यान कैसे करना है तो मैं उनको कहूंगा कि ओमकार का चैटिंग करते हैं ओम ओम ओम ऐसा करके और सब समय आप चैटिंग करें तो ध्यान रखिए कि आपका कंसंट्रेशन या तो जहां पर आप उंगलियों के माध्यम से जप कर रहे हैं तो दो उंगलियों के बीच में है जैसे कि मैं इस तरह से हम काउंट करते हैं अपने संघ में जिन्होंने दीक्षा ली होगी उन सबको पता होगा कि इस तरह से काउंट करते हैं व 1 2 3 4 5 6 7 8 ना 10 तो अभी जब ओमकार चैटिंग करते हैं तो जैसे कि ओम ओम ओम इस तरह से हम काउंट करेंगे 108 टाइम 108 बार चैटिंग करेंगे और जब भी चैटिंग करेंगे दो तरह से अपने मन को केंद्रित कर सकते हैं सर्वप्रथम है कि जहां पर हमारी दो उंगलियां इकट्ठा होती है यहां पर अपने मन को कंसंट्रेट कर और यह इमेजिन करना कि यहां पर ओमकार है और ज जैसे-जैसे मेरी उंगली घूमती जाती है वैसे-वैसे जहां पर भी दो उंगलियां इकट्ठा होती है वहां वहां पर इमेजिन करना है कि हम लोग यहां पर ओमकार है तो यह एक तरीका हो गया अपने मन को एकाग्र करने का दूसरा एक तरीका है ओमकार चैटिंग में ही जब हम ओमकार चैटिंग करते हैं ओम ओम तो अपने मन को अपने हृदय पर एकाग्र करते हैं इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपने हृदय में ओमकार का ओमकार को विजुअल करेंगे यदि हमने मंत्र अभी यह स्टूडेंट्स क्या है कि यह तो सब अपने संघ से कोई जुड़े हुए नहीं है वे लोग तो कंप्यूटर सीखने को आते हैं तो मैं उनको थोड़ा बहुत 1015 मिनट उन लोगों के साथ बात कर लेता हूं किंतु अपने संग से जुड़े हुए भक्त या तो त्यागी संतान हम लोगों के लिए तो ठाकुर का मंत्र हमको मिला हुआ है ठाकुर का या तो मां का जहां से भी दीक्षा ली हो तो वह मंत्र हमको मिला है तो जब चैटिंग करेंगे मंत्र का मंत्र जप करेंगे तो यदि उंगलियों प गिनते हैं मंत्र को तो कर जप इसको कहते हैं तो अपनी उंगलियों के बीच में जब भी हम काउंट करते हैं हमको विजुलाइज करना है जैसे कि जय श्री राम जय श्री राम तो फॉर एग्जांपल यदि मैं भगवान राम का मंत्र पाठ कर रहा हूं मंत्र जप कर रहा हूं तो जब भी मैं बोलूंगा जय श्री राम तो भगवान राम का श्री वदन श्री मुख या तो फिर उनके श्री चरण में दो उंगलियों के बीच में विजुलाइज करूंगा जब मैं अपने मन को उंगलियों के बीच में एकाग्र करता हूं तब दूसरा तरीका है अपने हृदय में भगवान राम को मैं विजुलाइज करूंगा तो यह हो गया एकाग्रता उसके बाद में बहुत सारी मेथड्स है जप करने की किंतु यह जो दो मेथड है वह सर्वश्रेष्ठ है सहज है इसके बाद में जैसे-जैसे हम एडवांस होते जाते हैं तो नई-नई मेथड्स ऑटोमेटिक हमको प्राप्त होती जाती है तो किंतु देखिए कि जब हम इस तरह से अपने मन को एकाग्र स्टूडेंट्स लोगों को जब मैं सिखाता हूं तो मैं हम सब समय उनको पूछता रहता हूं कि देखिए कि मैंने जब आपको यह बताया कि इस तरह से ओमकार करना है फिर फिर हम लोग एक साथ में चैटिंग करेंगे ओमकार का ओम ओम ओम ऐसा करके तो फिर े समाप्त हो जाएगा मैं उनको पूछूंगा कि आप में से कितने लोगों का मन वहां पर एकाग्र हुआ यदि कर जप करते हैं तो दो उंगलियों के बीच में क्या आपने ओमकार को विजुलाइज किया यदि हृदय में जप करते हैं तो क्या हृदय में ओंकार को विजुलाइज किया तो 50 पर कहेंगे हां और 50 पर कहेंगे ना नहीं कर पाए मन को एकाग्र और जो 50 पर हां कहते हैं उसमें से सही सही हां कहने वाले कितने हैं वो हमको पता नहीं है तो देखिए कि यह जो आध्यात्मिक जीवन है वह जप और ध्यान के ऊपर में बना हुआ है इसके अलावा आप कुछ भी कर लीजिए अपने जीवन में यदि अच्छे से कपड़े प वो पीतांबरी पहन कर के सर के ऊपर में तिलक लगा कर के गले में माला पहन कर के मंदिर में करके पूजा पाठ करके व तीर्थ यात्रा करके फिर यह दान दक्षिणा देकर के उत्सव का उत्सव वगैरा मना करके हम चाहे बाह्य आचार एक लाख कर ले किंतु जब तक हमारे अंदर में हमारे अंतर्मन में हम अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाते हैं तब तक हम अपना यह जो आध्यात्मिक जीवन है उसमें प्रथम पेर भी हमने नहीं रखे हैं तब तक हम भले ही चाहे दिखावा 1000 कर ले कि हां मैं धार्मिक हूं मैं बड़ा ही भगवान में विश्वास करता हूं वगैरा वगैरह किंतु यह दिखावा ही रह जाएगा जब ध्यान ही है साधन भजन के राज्य में प्रवेश करने का मुख्य द्वार जब तक हम सीरियसली प्रतिदिन नियम करके लंबे समय तक जब ध्यान ना कर पाए तब तक हमने कुछ प्राप्त ही नहीं किया है तब तक तो हमने प्रथम पे भी नहीं उठाया है इस यात्रा में इस यात्रा की प्रारंभ करने में तो अभी जब भी जब ध्यान करते हैं देखिए कि मन सब समय चंचल रहता है अभी यह 50 पर स्टूडेंट ने जो मना किया हो सकता है कि वह बड़े ऑनेस्ट थे उन्होंने मुंह पर स्वीकार कर लिया कि नहीं हम लोग मन को एकाग्र नहीं कर पाते हैं जो दो 50 पर ऐसा कहते हैं कि ना हमने मन को एकाग्र कर पाए थे हम लोग तो उनमें से वह ऑनेस्ट कितने है वो एक डाउट है तो सभी को मिला कर के देखिए कि मन की चंचलता अपने जप ध्यान साधन भजन में सबसे बड़ा एक रोड ब्लॉक है सबसे बड़ा एक विघ्न है तो इस विघ्न को कैसे हम दूर करें विघ्नहर्ता गणेश जैसे कि कहते हैं गणेश की पूजा करने से भी देखेंगे कि भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करना सहज नहीं है तो सबसे सहज उपाय सबसे सरलतम उपाय जैसे मैंने अपने जीवन में प्राप्त किया है वह सहज सरल उपाय है यह स्मृति कथाओं का पाठ और स्मृति कथाओं का चिंतन मनन और स्मरण यह स्मरण मनन चिंतन करके ही देखेंगे कि अपना मन शुद्ध पवित्र निर्मल होता जाता है जैसे-जैसे अपना मन निर्मल होगा जैसे-जैसे अपना मन शुद्ध होगा वैसे-वैसे देखेंगे कि जब भी सुबह हो न कि शाम आप एक बार बैठ कर के ईश्वर का नाम स्मरण करना प्रारंभ करेंगे जप ध्यान प्रारंभ करेंगे तो वैसे ही आपका मन बहुत ही सहजता से एकाग्र हो जाएगा तो यह है स्मृति कथाओं के चिंतन मनन स्मरण उनका पाठ उनका श्रवण करने का फायदा तो अभी जदिया जो कि ऐसा कौन सा पीरियड है ऐसे कौन से लोग है 18 लोग 18 फाउंडर्स गिन लीजिए अपने संघ के 16 डायरेक्ट डिसाइल और सन्यासी संतान और ठाकुर और मां 16 प्स दो 18 यह 18 यह जो है अपने फाउंडर्स या तो फिर अपने देवता अपने इष्ट इन सभी की अति मने बहुत सारी स्मृति कथाएं बहुत सारी इनके उनके आर्टिकल्स उनकी वाणी उनकी रचना उनके द्वारा रचित पोयम स्तोत्र सब कुछ हमारे पास में उपलब्ध है किंतु इसमें भी यदि हमको गोल्डन एज खोजना है उनको खोजना है कि श्यर फायर इनका इनका स्मरण करने से अपने मन को निर्मल होना ही होना है कहां जाएगा वह तो इस तरह से यदि सोचे तो वह दो लोग होंगे ठाकुर और मां और वह युग होगा जिस युग की स्मृति कथाएं हमारे मन को सबसे ज्यादा भा जाएगी वह है यह मां का दक्षिणेश्वर में निवास ठाकुर और मां यह दोनों मिलकर के जब दक्षिणेश्वर में रहते थे वह है अपने संघ का सुवर्ण युग और इस सुवर्ण युग में देखिए कि अपने पास में इतनी सारी सु सुंदर सुंदर कथाएं इतनी सुंदर बातें हैं कि इस बातों का हम जब स्मरण करेंगे मनन करेंगे तब अपना मन इतना ही निर्मल होता जाएगा देखिए आध्यात्मिक जगत में भी कभी-कभी क्या होता है कि हम लोग प्रवेश तो कर लेते हैं किंतु कल जैसे परसों हमने डिस्कस किया था ना एक वल्नरेबल का पीरियड आता है एक ऐसा समय आता है भीतर से हम बहुत कमजोर हो जाते हैं कभी-कभी क्यों सबसे पहले तो जब हमारे पे आक्रमण होता है तो इस आक्रमण का हमको किसी तरह से प्रतिकार नहीं करना है क्योंकि आध्यात्मिक जगत में तो यही है भले ही चाहे बाह्य जगत में आपको अपने देश की रक्षा के लिए अपने परिवार जनों की रक्षा करने के लिए शस्त्र उठाने पड़े किंतु आध्यात्मिक जीवन में हमेशा ख्याल रखिए कि प्रतिकार नहीं करना ही सबसे बड़ी साधना है किसी कोई हमको कुछ बोलता है हम फट करके उसका उत्तर दे दे तो यह उत्तर दे देना बड़ा सहज है कोई भी दे सकता है आप रास्ते में बाहर में जाइए हजार लोग व गाड़ी में आते जाते हैं एक दो गाड़ियों का टकराव हो गया तो सीधा दोनों लोग मारामारी प आ जाएंगे तो यह तो प्रतिकार करना झगड़ा करना यह सब चीजें तो बड़ी ही सहज सरल है किंतु आक्रमण होने के बाद में प्रतिकार ना करना सब त्याग कर देना वह जो कहानी है ठाकुर की एक पंखी उसने एक मछली पकड़ कर के हवा में उड़ रहा है अभी चार ओर में जितने कौवे हैं सब इस पंखी के पीछे में लगे हुए हैं अब यह पंखी उड़ता उड़ता बेचारा परेशान हो गया कौओं का दल पूरा पीछे में पड़ा है तो इस पंखी ने क्या किया यह जो मछली है मछली उसने त्याग कर दी उसने फेंक दी जैसे ही उसने मछली को फेंक दिया वैसे ही जितने कौवे थे उस मछली के लिए उस पंखी के पीछे में पड़े थे तो उन्होंने पंखी का पीछा छोड़ कर के मछली का पीछा करना स्टार्ट कर दिया तो यह त्याग और त्याग के बाद में अपति काता अहिंसा अहिंसा शब्द क्या है कि उसके साथ में कुछ नेगेटिव चीजें जुड़ी हुई है इसलिए मैं अहिंसा शब्द प्रेफर नहीं करता मैं कहता हूं अपति काता प्रतिकार ना करना जो आता है बाहर से कटो वचन ना कि आक्रमण उसको सहन कर लेना यही है आपकी आध्यात्मिक जगत में यात्रा का एक सक्सेस का एक मानदंड एक आप एक माइलस्टोन पार कर लिए हैं यह माइलस्टोन पार करने का यह एक उदाहरण है या तो एक यह एक यह है कि हां मैं इस लेवल पर तो अभी आ गया हूं किंतु जब हम प्रतिकार नहीं करते हैं उस समय हम बड़े ही विचलित हो जाते हैं भीतर से क्योंकि जैसे हमने उस दिन डिस्कस किया था कि करोड़ों सालों की यह इ पोल्यूशन की उत्क्रांति की यात्रा है इस उ उत्क्रांति की यात्रा में हमने एक ही चीज सीखा है कि बड़े-बड़े शिकारी प्राणी जब हम पर आक्रमण करते हैं या तो फिर दूसरी ट्राइब वाले अपनी एक छोटी सी ट्राइब में रह रहे हैं जंगल में जब हम हंटर गैदरर्स थे दूसरी ट्राइब वाले अपने पर आक्रमण करते हैं तो हमको कैसे भी करके उसका सामना करना है तो यह इवोल्यूशन का जो करोड़ों साल का प्रवाह है इस प्रवाह के सामने में हमको लड़ना है तो यह हो गया कि भीतर में से तो हम सब समय कुछ भी होने से कोई भी कटु वचन कहेगा कोई आक्रमण करेगा कोई हमारा अहित करने को आएगा इमीडिएट भीतर में से तो हम तलवार लेकर के खड़े हो ही जाएंगे उस समय उसको मना करना अपने अहंकार को अपने घमंड को या तो फिर बेटर शब्द है सर्वाइवल इंस्टिंक्ट को हम सबके भीतर में सर्वाइवल इंस्टिंक्ट है फाइट और फ्लाइट रिफ्लेक्स इसको कहते हैं यदि आप रास्ते से जा रहे हैं और रास्ता क्रॉस कर रहे हैं एकाएक एक वाहन जोर से आपकी ओर चला आ रहा है उस समय आप क्या करेंगे इमीडिएट आप उछल करके दौड़ कर के वाहन के रास्ते से निकल जाएंगे तो ये अभी वाहन के साथ में तो फाइट करना मुश्किल है किंतु फ्लाइट अर्थात कि इंस्टेंट रिएक्शन उस समय आप अपने ब्रेन से सोचेंगे भी नहीं कि हां यह वाहन जोर से मेरी ओर आ रहा है मुझे अपना बचाव करने के लिए अपनी रक्षा करने के लिए इस रास्ते से निकल जाना है यह विचार यह लॉजिकल थिंकिंग चलता ही नहीं है उस समय यह जो हायर ब्रेन फंक्शन है प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स इसको कहते हैं अपने ब्रेन का स्ट्रक्चर देखिए यह जो सामने वाला जो भाग है उसको कहते हैं प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स और यहां पे जो यह लॉजिक है मैथमेटिक्स है पोएट्री है यह जो जितना भी हायर थिंकिंग है वह सब यह प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स में होता है और अपने ब्रेन का यह जो पीछे का जो भाग है ब्रेन का जो बेज है वहां पे उस तरह का जो एरिया है वहां पे इंस्टिंक्ट प्रोसेस होती है जैसे कि मेरे हृदय के हार्ट बीट है यह हार्ट बीट मेरा प्रीफ ल कॉर्टेक्स नहीं सोचेगा यह मैं सोचूंगा नहीं कि हां मेरे हार्ट बीट चलने चाहिए तभी मैं जिंदा रहूंगा मुझे कंटीन्यूअस सांस लेने की आवश्यकता है तभी मैं जिंदा रहूंगा ऐसा यदि मैं सोचने को जाऊंगा तो प्रॉब्लम पता है क्या होगा मेरा सांस लेना या मेरे हृदय की धड़कन या तो फिर यह ब्लड सर्कुलेशन ये जब यदि ये सब जो फंक्शंस है मेरे शरीर के एसेंशियल फंक्शंस ये जदी मेरे विचार के ऊपर में ये जो हायर थिंकिंग है उसके ऊपर में डिपेंडेंट रहते है तो मान लीजिए कि मैं और किसी चीज में व्यस्त हूं कुछ लिख रहा हूं या तो मैं किसी के साथ में बात कर रहा हूं इस समय में सांस लेना भूल गया तो वहीं पर मैं मर जाऊंगा किंतु हम लोग सा कितना ही बिजी हो कितना ही हम किसी भी कार्य में व्यस्त हो ना ही सांस लेना भूलते हैं ना ही यह हृदय की जो धड़कन है उसको भूल जाते हैं यह सांस लेना हृदय की धड़कन ब्लड सर्कुलेशन यह लंग्स का फंक्शन लीवर का फंक्शन इंटेस्टाइन का फंक्शन यह सब चलता ही रहेगा इन स्पाइट ऑफ थट कि हम किसी भी कार्य में कितने ही बिजी क्यों क्यों ना हो तो ऐसा क्यों होता है अपने ब्रेन में हायर फंक्शन और लोअर फंक्शन ऐसे दो डिवीजन है हायर फंक्शंस डिवीजन से हम लोग बाहर का सब कार्य करते हैं जिसमें कि हम व्यस्त होते हैं और बाकी सब चीजों को भूल जाते हैं ठाकुर की वो कहानी है कि एक आदमी तालाब के किनारे पर बैठ कर के मछली पकड़ रहा है अभी मछली पकड़ते पकड़ते एकाएक उसने अभी एक आदमी पीछे से जा रहा है वो किसी का घर खोज रहा है उसने इस मछली पकड़ने वाले को पूछा महाशय मैं मुझे उस घर पर जाना है मुझे पता नहीं है पता रास्ता आप मुझे क्या बता देंगे तो जो आदमी मछली पकड़ रहा है वह इतना मग्न हो गया है वोह मछली पकड़ते पकड़ते उसका मन पूरा उसमें चला गया है क् पीछे वाला व्यक्ति कितना ही उसको पुकारता है वो उत्तर ही नहीं दे रहा है क्यों क्योंकि उसकी आंखें उसके कान उसकी जितने भी सेंशुअल ये जो यह है वो इंद्रिय सब उस मछली पकड़ने में लगे हुए हैं फिर वह आदमी परेशान होकर के चला गया इस जो मछली पकड़ने वाला उसने मछली पकड़ने के बाद में उसको बुलाया अच्छा तुम जो बोल रहे थे ना उसका घर वहां पे है तो बोला कि उस समय क्यों नहीं बताया बोला कि मैं इतना व्यस्त था मैं सुन भी नहीं पाया बाद में मुझे स्ट्राइक हुआ कि नहीं यह मुझे पता पूछ रहा था एड्रेस पूछ रहा था तो देखिए कि यह जो अपना हायर फंक्शन है वह कभी-कभी इतने व्यस्त हो जाते हैं कि पूरे जगत को भूल जाते हैं किंतु इस उसके बावजूद अपने बॉडी का जो फंक्शनिंग है एसेंशियल फंक्शनिंग वो तो चलता ही रहेगा यह जो एसेंशियल फंक्शनिंग अपने बॉडी का चलता रहता है वो यह जो एक ब्रेन का एक हिस्सा यह सब ठीक करता है यह जो अपनी स्पाइनल कोर्ड है और स्पाइनल कोर्ड और ब्रेन यदि आपने एनाटॉमिकल कोई पिक्चर्स देखे होंगे तो आपने देखा होगा कि इस तरह से अपनी स्पाइनल कोर्ड है फिर स्पाइनल कोर्ड के ऊपर में इस तरह से अपना ब्रेन है यह ब्रेन का जो सामने वाला हिस्सा है यह है प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स और यह जो बेज है जहां पे स्पाइनल कॉर्ड और ब्रेन इकट्ठा होते हैं उसको यह जो है लोअर ब्रेन कहते हैं जहां से यह सब इंस्टिंक्टिव फंक्शंस जो है हमारे सर्वाइवल के लिए एसेंशियल व सब फंक्शन वहां से कार्य करते हैं अभी देखिए कि यह जो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट है यह अपने ब्रेन लोअर ब्रेन के साथ में जुड़ी हुई है जैसे ही कोई व्यक्ति आपके ऊपर में आपका अहित करने को आएगा आपके ऊपर में आक्रमण करेगा इमीडिएट आप दो चीज सोचेंगे सामने वाला क्या मेरे मेरे से कमजोर है ना कि वह मेरे से ज्यादा शक्तिमान है यदि वह मेरे से ज्यादा शक्तिशाली है इमीडिएट मैं ऐसा सोचूंगा ही नहीं कि अरे मैं उसके साथ फाइट करूं कि ना करूं क्या कंसीक्वेंस है इमीडिएट मैं वहां से भाग जाऊंगा और यदि सामने वाला कमजोर दिखेगा तो इमीडिएट मैं उसके साथ में फाइट करूंगा यह जो फ फाइट एंड फ्लाइट रिफ्लेक्स यह अपने लोअर ब्रेन के साथ में जुड़ा हुआ है यह अपनी यह सर्वाइवल इंस्टिंक्ट के साथ में जुड़ा हुआ है स्पिरिचुअल लाइफ में प्रवेश करने का आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का अर्थ ही यही है कि आप यह जो लोअर ब्रेन है उसके साथ में युद्ध कर रहे हैं आपका यह हायर ब्रेन यह प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स और यह जो लोअर ब्रेन है वह लोअर ब्रेन और हायर ब्रेन इन दोनों में होती है हमेशा यह फाइट चालू रहेगी आपका हायर ब्रेन कहता है कि अपति काता सबके प्रति प्रेम करुणा मैत्री दया कंपैशन और फिर यह दूसरों के प्रति व्यवहार का तो हो ही गया दूसरा कि अपनी इंद्रियों के कुछ कुछ आकर्षण होते हैं अपनी जिवा के आकर्षण है कि मुझे अच्छा खाना खाना है अपना यह जो कामिनी और कांचन के प्रति जो आकर्ष है अपनी इंद्रिया सब समय उसको प्राप्त करने के लिए लालायित रहती है तो यह जो दोनों फंक्शन है यह तो फाइट और फ्लाइट इंस्टिंक्ट या तो फिर अपनी इंद्रियों के द्वारा यह जितने भी भोग विलास की साधन सामग्री है उसको प्राप्त करने के लिए भीतर में से एक लालसा इन सब जो है यह अपनी सर्वाइवल इंस्टिंक्ट के साथ में जुड़े हुए हैं कभी-कभी हमको प्रश्न होगा कि जब हम आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हैं तो हमको ऐसा क्यों कहा जाता है भाई कि जो चीज सभी पूरा जगत करता है उस चीजों का त्याग करना है अच्छा खाना मुझे लगता है अच्छा तो अच्छे खाने का त्याग करना है मुझे यदि पैसों के प्रति या तो पावर के प्रति या तो फिर प्रतिष्ठा के प्रति जो मोह है उसका त्याग करना है भगवान को यदि हमको दर्शन देना ही होता था तो उन्होंने यह सब चीजें हमको दी ही क्यों हमारे डीएनए में हमारे ब्रेन में ये सब मोह वासना लालसा उन्होंने रखा ही क्यों नहीं रखते तो इमीडिएट हमारा जीवन भी बचपन से जन्म से लेकर के ही आध्यात्मिक होता हम किसी बुरे कार्य में फंसते ही नहीं अभी यह क्रिश्चियन थियोलॉजी में देखिए कि इस प्रश्न का उत्तर किस तरह से दिया गया है कि वह एक गार्डन ऑफ इडन था उसमें एक एडम और एक इव एक पुरुष और एक स्त्री थे संपूर्ण रूप से इनोसेंट थे कामना वासना फिर यह प्रतिष्ठा फिर यह पावर यह भोग लाल उपसा यह सब उनमें कुछ भी नहीं था और ना ही किसी पर आक्रमण करने की इच्छा थी ना ही किसी का धन छीन लेने की वासना तो संपूर्ण रूप से आध्यात्मिक कहो ना कि इनोसेंट जीवन उनका था जैसे छोटे बच्चे होते हैं किंतु फिर वहां पर गार्डन ऑफ ईडन में एक सर्प का प्रवेश हुआ शैतान रूपी और उसने यह नॉलेज फ्रूट ऑफ नॉलेज अर्थात कि ज्ञान रूप रूपी फल इसका प्रलोभन दिया उन्होंने य ज्ञान रूपी फल खाया और इनकी भोग वासना लाल लालसा सब कुछ जागृत हो गई और इन दोनों का पतन हुआ यह गार्डन ऑफ इडन यानी कि स्वर्ग के इस बागान में से पृथ्वी पर आके पट पटका गए तो फिर अभी उनका फिर यह सांसारिक जीवन प्रारंभ हुआ यह क्रिश्चन थियोलॉजी का है हम लोग कहते हैं कि अविद्या है या तो फिर माया है यह अविद्या या माया क्या है कि मैं अपने मेरा सही स्वरूप क्या है वह है आत्मन या तो फिर ब्रह्मण इस सही स्वरूप का मैं इस देह के साथ में पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय पंच तन मात्रा पंचप्राण इन सबके साथ में मैं एक फॉल्स आइडेंटिफिकेशन कर दे रहा हूं एक झुठ मुटका इसके साथ में मेरा एक कनेक्शन बैठ गया है जब तक यह कनेक्शन टूटेगा नहीं जब तक मुझे यह मैं क् मेरे में नहीं आएगा जब तक यह भरोसा मेरे में नहीं आएगा कि नहीं इस देह के परे भी मेरा अस्तित्व है और वही सही सही अस्तित्व है देह के साथ में जो कुछ भी जुड़ा है इन सबका त्याग कर कर के ही इस देह के पर जो अस्तित्व है उसमें मैं स्थित होंगा यह अपना वेदांत हो गया और यदि मॉडर्न साइंस की दृष्टि से देखते हैं तो मॉडर्न साइंस कहेगा कि यह जो करोड़ों साल की य उ क्रांति की यात्रा है उसने अपना यह जो लोअर ब्रेन है इस लोअर ब्रेन में सर्वाइवल इंस्टिंक्ट को बिठा दिया है यदि मैं कामना वासना नहीं रखूंगा तो मैं धन प्राप्ति नहीं करूंगा तब मैं पावर को पावर को प्राप्त करने के लिए मैं लालायित नहीं होऊंगा मुझे पावर चाहिए मुझे धन प्राप्ति करनी है मुझे मेरे बच्चों को जन्म देना है प्रजनन या तो फिर यह प्रोजेनी का जो इच्छा है वो तभी तो मैं इस संसार में टिक पाऊंगा संसार में कौन टिक पाएगा वह फकीर है भिखारी है ना त्यागी है वोह टिकेगा ना कि जिसके पास में बहुत सारा धन है जो बहुत सारे लोगों पर राज्य करता है जिसकी बहुत सारी संतति है वह संसार में टिकेगा किसका ज्यादा चांस है इस इवोल्यूशन की यात्रा में सक्सेस होने का तो यह देखिए करोड़ों साल की इवोल्यूशन की यात्रा के अगेंस्ट में हमको फाइट करना है तीन तरह से या तो फिर आपकी जितनी भी मान्य है सभी मान्यताओं में देखिए कोई ना कोई उत्तर इस प्रश्न का दिया गया है कि हमारे भीतर में यह दूसरों पर राज करने की दूसरों को छोटा दिखाने की या तो फिर दूसरों पर अधिकार स्थापन करने की दूसरों का अहित करने की इच्छा क्यों है यह प्रश्न का उत्तर या यह तो एक प्रश्न है दूसरा कि इंद्रियों के यह जो सुख है उसके प्रति मेरी लालसा क्यों है इस प्रश् प्रश्न का उत्तर सभी जगह पर विभिन्न रूप से दिया गया है और इसका सोल्यूशन भी देखिए कि जितनी भी अपनी यह सिस्टम है धार्मिक जीवन की आध्यात्मिक स्कूल्स ऑफ फिलोसोफी या तो फिर स्कूल्स ऑफ स्पिरिचुअलिटी सभी में अलग-अलग उत्तर है अपना उत्तर है वेदांत का उत्तर है त्यागे नहीं के अमृत मानस हो यह त्याग के अलावा और कोई उपाय नहीं है यह अद्वैत वेदांत कहेगा और द्वैत वेदांत कहेगा कि शरणागति या तो फिर भाव साधना आप जैसे कि ठाकुर कहते हैं य बालक भाव है अर्थात कि मां काली मेरी मां है और मैं उनका बालक हूं इस तरह से मां काली के साथ में रिश्ता रखना है उनके साथ में संबंध बनाना है या तो फिर यह गोपियों का मधुर भाव है वह गोपियां थी भगवान कृष्ण के साथ में प्रेम करती थी उनके उनको प्रेम करती थी तो वह मधुर भाव है एक शांत भाव है ऋषि मुनि यो का था सख्य भाव है जैसे कि सुदामा का था दास भाव है जैसे कि महावीर का था महावीर हनुमान का था शत्रु भाव भी है दुशासन का और भगवान कृष्ण के साथ में इतनी दुश्मना आवट थी सब समय भगवान कृष्ण को वह कटु वचन कहा करता था किंतु कटु वचन कहने के लिए भी तो भगवान कृष्ण का नाम लेना पड़ेगा तो नाम लेते लेते वो मुक्त हो गया तो किसी भी तरह से ईश्वर के साथ में एक संबंध स्थापित करना है ईश्वर को सब समय अपने हृदय में बिठा करके रखना है तो यह दो रास्ते हैं और अपना संघ का रामकृष्ण संघ का देखिए कि ठाकुर महा स्वामी जी का पृथ्वी पर आगमन क्यों हुआ धरातल पे अवतरित क्यों हुए और इस इतनी सारी इतनी विभिन्न रूप से लीलाएं उन्होंने क्यों की व लीला तो की ही की साथ-साथ में इस लीला को लिपिबद्ध करने के लिए जिनकी आवश्यकता थी उनको भी खींच करके आए मास्टर महाशय कथामृत में लिखते हैं एक बार ठाकुर भाव में बोल रहे हैं जगन माता के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं तो वह क्या पूछा उन्होंने जगन माता को कि मां आप तुमने इसको एक भक्त के बारे में बात करते कहते हैं उस भक्त को सिर्फ एक कला क्यों दी माने ये 16 कलाएं जो होती है ना कहते हैं ना वो कवि कहते हैं कि 16 कलाओं से वह चांद खिल उठा है या तो फिर यह 16 कलाओं से इसका सौंदर्य प्रकाशित हो रहा है तो 16 कलाएं यदि होनी चाहिए तो उसमें से सिर्फ एक कला इसमें क्यों दी है आपने फिर वह बात करते-करते कहते हैं कि अच्छा तुम्हारा काम क्या सिर्फ एक कला से ही हो जाएगा तो ठीक है अर्थात कि मास्टर महाशय को ना ही स्वामी जी की तरह प्रवचन देने थे ना ही यह शशि महाराज यानी कि राम कृष्णानंद की तरह पूरे अपने दक्षिण भारत में राम कृष्ण संघ की स्थापना करनी थी ना ही फिर यह अपने शारदानंद जी की तरह रामकृष्ण संघ का संचालन करना था ना ही स्वामी ब्रह्मानंद की तरह संघ के प्रथम प्रेसिडेंट होना था मास्टर महाशय को यह सब कुछ नहीं करना था उनको सिर्फ और सिर्फ ठाकुर की वाणी को लिपिबद्ध करना था और यह लिपिबद्ध करने के लिए जितनी शक्ति चाहिए थी उतनी शक्ति मां काली ने उनको दे दी थी तो देखिए कि यह था कि अ ठाकुर ने सिर्फ अवतरण ही नहीं किया उन्होंने अपनी लीलाओं को लिपिबद्ध भी किया है प्रश्न होगा कि क्यों लिपिबद्ध की यदि वह उपदेश देकर के ही चले जाते सिर्फ यह कह के चले जाते जैसे कि भगवान कृष्ण ने गीता का ही संदेश देकर के चले गए होते तो भगवान कृष्ण के ऊपर में आधारित जो पूरा वैष्णव शास्त्र है उसकी रचना नहीं होती क्यों क्योंकि गीता में लिखे हुए उपदेश का पालन करना आसान नहीं है बड़ा ही कठिन है यदि आप रास लीला का आस्वादन ना ले ईश्वर के साथ में मधुर भाव से शांत भाव से दास भाव से बालक भाव से आप संबंध ना बनाए तब तक आपका चित्त निर्मल ही नहीं हो गीता में जो कहा गया है जो लिखा गया है उसका पालन करने की क्षमता ही अपने में डेवलप नहीं होगी तो ठाकुर एक बार कहते हैं कि वहां के जो उत्तर भारत के लोग हैं वे लोग सिर्फ मथुरा वाले कृष्ण को स्वीकारते हैं ये वृंदावन वाले कृष्ण का स्वीकार नहीं करते क्यों क्योंकि ये जो भगवान कृष्ण ने युद्ध के मैदान पर वो अर्जुन के सारथी होकर के जो गीता का उपदेश दिया यही भगवान कृष्ण का सही सही कंट्रीब्यूशन है यह वृंदावन रूपी जंगल में यह गोप गोपियों के साथ में यह रास लीला करते थे क्या यह सब इसका कोई क्या महात्म है इसका क्या आध्यात्मिक सार्थकता है इसको छोड़ दो त्याग दो और उनके गीता रूपी उपदेश को ही स्वीकार करो ऐसा सोचने वाले लोग भी है किंतु देखिए कि अपने संग में और यह वैष्णव शास्त्र में भगवान कृष्ण की जो महात्म्य है महत्ता है वो सिर्फ उनके उपदेश पर आधारित नहीं है उनकी एक दूसरी तरह की महत्ता है वो है वह हमको प्रेम करते हैं हम उनको प्रेम करते हैं और यह जो प्रेम का संबंध है वही अपने हृदय को निर्मल बनाता है यदि अपना हृदय प्रेम करके निर्मल नहीं बने का और हम सिर्फ यही सोचते रहेंगे कि मैं आध्यात्मिक रास्ते में मुझे प्रगति तो करनी है आध्यात्मिक शिखर को सर तो करना है किंतु मेरे शस्त्र क्या है मेरे टूल्स क्या है यदि आप माउंटेनियरिंग यदि करने को जाएंगे तो आपको वो पार्टिकुलर टूल्स चाहिए वो हैमर होती है वो सिकल होती है वगैरह वगैरह वो जो जो स्पेशल खास तरह के जूते पहनने पड़ते हैं वगैरह वगैरह टूल्स आपको साथ में रखने पड़ते हैं जद माउंटेनियर यदि पहाड़ चढ़ने को जाएंगे तो तो यहां पर आध्यात्मिक शिखर सर करने के लिए यदि मैं अपना विल पावर और त्याग सिर्फ इन दोनों के ऊपर मैं आधारित रहता हूं अद्वैत वेदांत को या तो ज्ञान मार्ग को फॉलो करते करते तो मेरे जीवन का एक संपूर्ण जो एक डेवलपमेंट है वह मिस हो जाएगा इतनी शक्ति किसमें है आज कि सिर्फ ज्ञान मार्ग का सहारा लेकर के अपने मन को सिर्फ एकाग्र करके अपने मन के भीतर में यह संकल्प शक्ति को प्रार प्रारंभ करके संकल्प शक्ति और एकाग्रता यह है ज्ञान मार्ग के सबसे इंपॉर्टेंट यह साधनाए त्याग संकल्प शक्ति एकाग्रता यदि त्याग नहीं होगा संकल्प शक्ति नहीं होगी एकाग्रता नहीं होगी ज्ञान मार्ग में हम थोड़ा सा भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे तो हम कहां अपनी कैपेसिटी है कितनी कि ज्ञान मार्ग में बहुत ज्यादा आगे बढ़े तो इसीलिए यह प्रेम मार्ग है साथ में ईश्वर के साथ में एक इस तरह से संबंध बनाना है ईश्वर को सब समय जैसे कि मां मां होए अपने किचन में खाना बना रही है किंतु उसका उसके जो कान है सब समय उस बच्चे के पीछे में लगे छोटा सा बच्चा है दो-तीन साल का नटखट है बड़ा इधर दौड़ता है उधर दौड़ता है कभी गिर जाएगा तो कुछ लग जाएगा तो किसी से टकरा जाएगा तो मां बड़ी अ मां का मां के जो कान है वह सब समय वह बच्चे के पीछे में ही लगे रहेंगे सब समय मां यही सोचती रहेगी कि मेरा बच्चा क्या कर रहा है भले ही चाहे वह खाना बनाती हो भले ही चाहे वह कोई भी काम करती हो घर का किंतु उसके कान और उसका मन उस बच्चे के पीछे में लगा रहेगा क्यों क्योंकि मां का जो प्रेम है बच्चे के प्रति वो अद्भुत प्रेम है इस जगत में इससे बड़ा और कोई प्रेम नहीं है तो जैसे ठाकुर कहते है ना कि मां का बच्चे के प्रति प्रेम सती का अपने पति के प्रति प्रेम यह जो इतने सारे जो प्रेम होते हैं विभिन्न तरह के वह जद इकट्ठा होते हैं किसी एक व्यक्ति में ईश्वर के प्रति प्रेम में जो कन्वर्ट होता है तो वह प्रेम है कि हमको यह भवसागर को पार करवा देगा तो अपने मन को निर्मल करना अपने निर्मल मन में ईश्वर को बिठाना उसको स्थापित करना यह है अपने जीवन का सबसे से बड़ा कर्तव्य तो यह जो कहानियां है ठाकुर मा स्वामी जी की यह स्मृति कथाएं हैं और कौन से पीरियड में से हमको सबसे सुंदर स्मृति कथाएं मिलती है वैसे तो जितना भी हम ये 108 साल क्या ठाकुर का जन्म 1836 से लेकर के अभेदानंद जी की महासमाधि आखिरी डायरेक्ट डिसाइल की महासमाधि 1938 102 साल के पीरियड के बाद में भी आप देखेंगे कि यह विशुद्धानंद जी महाराज है शंकरा अंद जी महाराज है भूतेशानंद जी महाराज है फिर यह अपने रंगनाथ आनंद जी है आत्मस्थानंद जी है गहनानंद जी है जितने भी अपने संघ के संघ गुरु है संघ गुरु के अलावा भी अनजान इतने सारे साधु है मैं नागपुर में था तो नागपुर के अध्यक्ष नागपुर मठ की स्थापना करने वाले थे भास्कर स्वरानंद जी महाराज तो उनके बारे में इतनी सुंदर-सुंदर कहानियां यदि आप नागपुर में जाएंगे तो आपको सुनने को मिलेगी कि महाराज का त्याग तपस्या तितीक्षा शास्त्र के प्रति प्रेम और साधुओं के प्रति प्रेम ईश्वर के प्रति ईश्वर प्राप्त करने की उनकी आराधना यह सब कितना मतलब था अभी भी सभी लोग महाराज जी को याद करते हैं तो अपने संघ में ऐसे साधुओं की कमी नहीं है जिनके बारे में सुंदर से सुंदर कहानियां है किंतु सर्वश्रेष्ठ कहानियां और सर्वश्रेष्ठ युग है वो गोल्ड एज अपने संघ का कि ये 18735 ऑलमोस्ट यह जो 12 साल का यह जो पीरियड है वह गोल्डन एज है अपने संघ का और इसी गोल्डन एज के बारे में अभी हम इस किताब में पाठ कर रहे हैं गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित मां की ये जीवनी चैप्टर का नाम है बिंदु वासिनी मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं वस्तुत ए देव दंपति प्रेम प्रवाह उभय कोल प्रसारी छलो यह देव दंपति जो थे देव दंपति थे ठाकुर और मां इनका जो यह दांपत्य जीवन था इनका यह जो संसार था जैसे कि भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी जैसे कि भगवान शिव और मां गौरी या मां सती तो या भगवान राम और मां सीता इस तरह से इनका एक देव दंपति तुल्य गृहस्थाश्रम था संसार था और इसमें इन दोनों का परस्पर जो प्रेम था वो जैसे कि पूरे जगत को आपल कर देता था ऐसा होता है ना प्रेम कभी-कभी स्वार्थी होता है मैं इसको प्रेम करता हूं क्योंकि मैं उनको वो मुझे पसंद है किंतु यह एक व्यक्तिगत आकर्षण के अलावा भी एक दिव्य प्रेम होता है इस दिव्य प्रेम भले ही चाहे एक किसी एक व्यक्ति की ओर डायरेक्टेड हो किंतु उस उस प्रेम में पूरा जगत जैसे कि उस प्रेम को पा कर के अपनी ये अपने जो प्यास ये जो अपना हृदय है रुखा सुखा हृदय उसको वो परितृप्ति कर सकता है तो यह ठाकुर और मां का दोनों का जो प्रेम था वो पूरे जगत को प्लाविनी वाला था श्री श्री ठाकुरर प्रति मायर जतोग मायर प्रति ठाकुरे टान तद पेखा कम छीलो ना ठाकुर के के प्रति मां का जितना प्रेम था तो मां के प्रति ठाकुर का यह जो भालो भाषा बांगला दे जो शब्द है यहां पर लिखा है टान टान अर्थात की अट्रैक्शन या तो फिर शुद्ध पवित्र प्रेम वो थोड़ा सा भी कम नहीं था हम मां और ठाकुर की बातों को सुन कर के हमारे मन में ऐसा होगा कि मां तो सब समय ठाकुर की सेवा करने के लिए तत्पर रहती है ऑन द अदर हैंड ठाकुर को देखिए कहां वो नृत्य की न करते रहेंगे भक्तों के साथ में उपदेश देंगे या तो भाव समाधि में मग्न रहेंगे मां के प्रति उनका कितना आकर्षण था मां के बारे में वह कितना सोचते थे मां की कितनी संभाल रखते थे कितनी चिंता करते थे पता नहीं ऐसा हो सकता है प्रश्न हो सकता है अपने मन में यहां पर महाराज जी कहते हैं कि मां का ठाकुर के प्रति जो प्रेम था ठाकुर का भी मां के प्रति उतना ही प्रेम था वही है कि देखिए कि इस प्रेम का जो प्रगट करण है उस उसको एक पार्टिकुलर कांटेक्ट में होना है जो प्रेम है तो सब कुछ जो उसको तो प्रकाशित नहीं कर सकते क्योंकि दिव्य प्रेम का प्रकाश भी इस जगत में संपूर्ण रूप से करना थोड़ा सा मुश्किल है जिस परिप्रेक्ष्य में रहते हैं जिस कॉन्टेक्स्ट में रहते हैं उस कॉन्टेक्स्ट में इसको प्रकाशित करना है जैसे कि वो एक उदाहरण है हमने कुछ समय पहले देखा था मां जयराम बाटी से बड़ी लंबी यात्रा कर करके कष्टदायक यात्रा करके दक्षिणेश्वर आई ठाकुर उसके आने के कुछ ही दिन पहले गिर गए थे और उनके हाथ में फ्रैक्चर हो गया था तो ठाक जैसे ही मां का आगमन हुआ ठाकुर ने पूछा कि तुम जयराम बाटी से कब रवाना हुई थी जयराम बाटी या कमरपुर से है तो मैंने जो उत्तर दिया कि इस समय रवाना हुई थी ठाकुर ने कहा कि अच्छा तुम बार बेला खान थे के रवाना होए छ भले हमार हाथ भें गए छ ये बार बेला अर्थात कि एक अशुभ सुकन है अमंगल शुकन है यह अमंगल क्षण है अभी इसमें कितना विश्वास करना नहीं करना वह अपनी इच्छा पे है ठाकुर यह सब चीजों को बड़ा मानते थे और ठाकुर जिस लेवल पर रहते थे उस लेवल की बात अलग है हम लोगों की बात अलग है तो ठाकुर ने कहा कि वह अमंगल क्षण में तुमने यात्रा प्रारंभ की इसी वजह से मेरा हाथ टूट गया मेरे हाथ में फेक्चर हो गया तुम जाओ और यात्रा बदल करके आओ फिर से वापस चले जाओ और शुभ क्षण में वहां से यात्रा करना तो अभी तो इमीडिएट जाने को तैयार हो गई किंतु फिर ठाकुर ने कहा नहीं अभी आज रुक जाओ कल जाना तो यह घटना पढ़ कर के हमको लगेगा कि क्या ठाकुर क्रूर हृदय थे मां की अवज्ञा करते थे मां के प्रति क्या उदासीन थे ऐसा कभी-कभी लग सकता है बहुत सारी ऐसी घटनाएं हैं जो कि हमको ऐसा सोचने के लिए मजबूर करेगी किंतु यह सब समय याद रखना है कि इनका जीवन है आदर्श की स्थापना करने के लिए यदि आप ठीक-ठीक आदर्श की स्थापना नहीं करेंगे तो हम 1500 साल तक जो संघ चलने वाला है हम इसमें से क्या सीखेंगे इसीलिए आदर्श की स्थापना करने के लिए जो करना पड़ा था उन्होंने किया था तो यह प्रेम था उतना ही ठाकुर का मां के प्रति किंतु यह आदर्श के लेंस से यह आदर्श की दृष्टि से हमको देखना है कि प्रेम कितना प्रकाशित होता था तो अभी महाराज आगे लिखते हैं श्री जुक्ता गौरी मा एक बार बोलिया छ गौरी माने एक बार कहा था ए जे दई जने मात्र प हाथ दूर थके कखन कखन छ मासियो होई तो एक दिन देखाना ये दोनों लोगों के बीच में सिर्फ 50 हाथ का फर्क था अर्थात कि यहां पर ठाकुर का कमरा है और यहां पर है यह मां का नबत इन दोनों में डिस्टेंस कितना होगा ज्यादा से ज्यादा 25 30 फुट का डिस्टेंस होगा इतना कम डिस्टेंस किंतु फिर भी मां ठाकुर को होई तो छ महीने तक दर्शन नहीं कर पाती थी तब दई जने भाबो छलो कतो मां हो सकता है कि ठाकुर का दर्शन ही नहीं कर पा रही एक के बाद एक महीने बीतते ही जा रहे हैं किंतु देखिए कि इन दोनों के बीच में प्रेम कितना था दई जने भावई छलो कतो दोनों में कितना भाव था कितना प्रेम था वो कहानी पता है ना बहुत सारी कहानियां है कि मां ठाकुर अभी दिन भर में मां को ठाकुर का दर्शन करने का उनके साथ बात करने का मौका कब मिलता था वह आहार के समय मां खाना पका करके थाली लेकर के जाएगी ठाकुर के पास में ठाकुर आहार करेंगे मां उनके साथ में थोड़ी सी बातें करेगी बस यही हो गया ठाकुर और मां का संबंध जागतिक दृष्टि से तो इतनी ही दोनों की बातें होती थी इतनी ही मुलाकात होती थी अभी ऐसा कितनी बार हुआ है कि मां खाना बना कर के थाली लेकर के जा रही है कोई एक स्त्री भक्त गई उसने थाली ले ली मां के हाथ में से यह कह के मां मुझे दो मैं जाती हूं बोल कर के ठाकुर के पास में बैठ कर के वह ठाकुर के सामने थाली रख के चली भी गई बाद में ठाकुर ने मां को कहा कि अरे तुमको पता नहीं उस स्त्री का चरित्र कितना खराब है तुमने क्यों उसको थाली दी मेरे भोजन की उसने स्पर्श किया अभी मैं कैसे खा पाऊंगा तब मां क्या कहती है कि जब कोई मेरे पास में मां बोल कर के आकर के कुछ मांगता है तो मैं दिए बिना नहीं रह पाऊंगी यह तो एक ऐसा है फिर ये गोपाल मां है गोपाल मां का भी स्वभाव ऐसा था मां के पास में से थाली लेकर के ठाकुर के पास में जाएगी ठाकुर के पास में बैठ कर के लंबे समय तक ठाकुर के साथ में बैठी रहेगी रात को देरी से मां के पास में आएगी यहां पर मां खुद खाना नहीं खाती है व गोलाप मां का खाना वो बचा करके वो बैठी रहती है जिससे कि उनकी थाली में कोई बंदर ये जो बिल्ली है ना कोई कोई चूहा है उसमें वो अपना मुंह ना मार दे तो थाली को ढककर करके गुलाब मां की थाली को ढक करके उसके सामने बां बैठी रहती थी जैसे कि खाने में कोई विघ्न न हो तो अभी देखिए कि मां इस तरह से रहती थी मां और ठाकुर के मिलन के बीच में इतने सारे विघ्न थे महीनों के महीने बीत जाते थे किंतु इन दोनों का जो एक के प्रति एक आकर्षण था दिव्य आकर्षण दिव्य प्रेम वह प्रवाह जैसे कि सब समय अखंड रहता था एक बार मायर माथा रीले ठाकुर बड़ो ई उत् फगन होईया पड़ी लेन एक बार मां को सिर दर्द हो रहा है ठाकुर बड़े ही उत् फिकन हो गए एवं पुनः पुनः रामलाल दादा के जिज्ञासा कोरीते थाकी लेन और बार-बार रामलाल दादा को पूछ रहे हैं ओरे रामलाल माथा धर लो केनो रे अरे रामलाल उसको सर दर्द क्यों हो रहा है देखिए कि ठाकुर उद्विग्न हो जाते थे और ठाकुर का बालक स्वभाव था तो गले में कैंसर हो गया सबको बोल रहा है अरे गले में व्यथा हो रही है क्या करूं क्या करूं तो खोका महाराज है तो खोका महाराज आकर के ठाकुर को कह देते हैं कि महाशय हम लोगों को गले में कुछ भी व्यथा होने से कुछ भी होने से हम लोग चाय पीते हैं आप भी चाय पी लीजिए ठाकुर है बालक स्वभाव बोला किसी को अरे चाय दो खोका बोल रहा है कि चाय पीने से ठीक हो जाएगा अभी वहां पर अच्छा हुआ कि राजा महाराज थे राखल था उसने इमीडिएट कह दिया उन्होंने कह दिया कि अरे वो तो चाय तो बड़ी गर्म रहती है ऑलरेडी आपको तो गले में वह घाव जैसा हो गया है ऊपर से गर्म चाय पिएंगे तो क्या होगा तो बोलकर के ठाकुर निरस्त हो गया अभी इसने कहा चाय पियो तो चाय पीने को तैयार हो गए उन्होंने कहा कि चाय मत पिए तो फिर वो ठाकुर युक्ति देक के वो भी बच्चे को जैसे वो मनाना होता है ना छोटे बच्चे को उसकी उस तरह की युक्ति देकर के उसको समझाना पड़ता है तो इस तरह से भी ठाकुर बो अच्छा ठीक है चलो चाय नहीं पी सकते और फिर खोका महाराज नाराज ना हो जाए तो खोका महाराज को समझा कर के कहते हैं अरे भैया देखो मैं तो चाय पीना चाहता था तुम्हारे कहने से किंतु वह कह रहा है वोह ठीक ही है यदि गले में गाव है गर्म चाय पिऊंगा तो और ज्यादा दर्द होगा तो यह ठाकुर बालक स्वभाव थे और बालक स्वभाव में आकर के वह रामलाल दादा को बार-बार पूछ रहे हैं कि अरे मां को सिर दर्द क्यों हो रहा है अभी जो भी है बाद में ट्रीटमेंट की कुछ व्यवस्था की होगी व सब यहां पर नहीं लिखा है किंतु जो इन दोनों के पीछे का आपस में जो प्रेम था प्रेम प्रदर्शित करने के लिए ही यह सब घटनाएं यहां पर लिपिबद्ध की गई है अभी आगे क्या लिखते हैं सारा दिन कर्म तत्परा श्री मायर कर्तव्य भार जते ओजो बर्धी तो ना होई से दिके ठाकुरे सतर्क दृष्टि था की तो पूरा दिन मां को कर्म करना पड़ता था कार्य करना पड़ता था तो यह कार्य के ऊपर में ज्यादा बोझ मां के सर पर ना पड़ जाए इस बात के लिए ठकुर हमेशा सतर्क रहते थे ऑलरेडी मां इतना काम कर रही है जितने भी भक्त आएंगे सबका खाना बनाना है जितनी महिला भक्त आएगी सब मां के साथ में बैठ कर के गप लगा रही है और फिर एक एक तरह की ना इन सेंसिटिविटी होती है जो सेंसिटिव होते हैं जिनमें श्रद्धा भक्ति होती है वो लोग देखेंगे कि मां काम कर रही है तो इमीडिएट चलो मां को मां को काम करने में हाथ बटा हैं और अब जैसे जयराम बाटी में जयराम बाटी में एक भक्त दंपति गया और फिर वह सब सब तरह की सुविधा ले रहा है मां के पास में से मां उनके लिए खाना बना रही है मां उनकी खाना बनाने के बाद में उनके जो बर्तन है वह भी दो रही है जिस पात्र में खाना खाया उस पात्र को थाली को भी मां धो रही है और यह लोग जैसे बड़े मजे से आनंद कर रहे हैं अभी मां यहां पर खाना बना एक दिन आटा बेल रही थी सामने वह एक वो वही भक्त दंपति स्त्री वो बैठ कर के ध्यान कर रही है तो फिर मां के मां को भी रहा नहीं गया मां से रहा नहीं गया वो मां हंसते हंसते बोल ठी अरे बहुमा अरे अर्थात कि वह स्त्री भक्त को पुकार के कहती है कि अरे बिटिया तुम जिसका ध्यान करते हो वह भी यहां पर आटा बेल रही है मने जिस जगदंबा का ध्यान कर रही है वह जगदंबा उनको खिलाने के लिए आटा बेल रही है रोटी पकाए गी खाना करेगी उनको खाना परोसे गी खाना खाने के बाद में उनकी थाली भी धोएगी अभी मां तो कंप्लेन नहीं कर रही है मां का हृदय है किंतु फिर उनकी भी तो कोई होनी चाहिए ना सेंसिटिविटी खुद में तो कुछ अकल होना चाहिए कि अरे मां मेरे लिए उतना कर रही है तो मुझे भी तो हाथ बटाना है बढ़िया मजे से बैठ कर के सेवा लेना यह किस तरह का भक्ति हो गया भाई तो कोई कोई लोग ऐसे होते थे मां बना कर के खाना बना कर के खिला रही है वो बढ़िया मजे से खा कर के ठाकुर के पास चले जाएंगे और ठाकुर के साथ में गप लगाएगी कोई कोई स्त्री भक्त ऐसी भी होती थी और कोई होती थी कि अरे नहीं मां जद इतना काम कर रही है तो चलो थोड़ा सा हाथ बटाए तो ठाकुर जो अलर्ट रहते थे मां का इतना ना काम है उस परे और ज्यादा कोई काम कोई ज्यादा भार मां के सर पर ना आ जाए इसके बारे में ठाकुर सतर्क रहते थे तो एक दिन क्या हुआ एक बार सिंथी ते बेनी पालेर बागा ने श्री जुक्तो राखल के लैया बेडई ते बड़ाई ते तिनी अकस्मात प्रेतात्मा देर देखा पान एक बार क्या हुआ सिंथी के वेणी पाल बोल कर के जो उनका एक भक्त था उसके बागान में वो उस उनके बगीचे में उसके गार्डन में राखल अर्थात की राजा महाराज को लेकर के वो घूमने के लिए गया घूमते घूमते उन्होंने वहां पर प्रेतात्मा को देखा एक भूत को देखा अभी होता क्या है भूत देर निकट ठाकुरर पवित्र हवा अजज वाय तहरा ताहा के उद्यान छड़िया जाते अनुरोध करें भूत के लिए ठाकुर की जो पवित्र हवा है वह असह्य हो गई तो उन्होंने ठाकुर को विनती की कि आप बगीचा छोड़ कर के गार्डन छोड़ के चले जाइए आपका यहां पर आगमन आपकी उपस्थिति हमारे लिए बड़ी कष्ट काक है तो इमीडिएट ठाकुर ने क्या किया श रात्रि उद्याने काटा बार कथा छलो किंतु प्रेतो देर आकुल ताय ठाकुर तख नहीं गाड़ी डाका इया काली बाड़ी ते फिरी लेन एवं अधिक रात्रि होई लेयो फटक खलाया भीतरे डुकी लेन वो रात्रि उस रात को ठाकुर को वहीं पर रहना था किंतु इस प्रेत लोगों ने आकर के उनको विनती की तो ठाकुर ने इमीडिएट गाड़ी को बुलाया और फिर गाड़ी लेकर के दक्षिणेश्वर में आए और वो दक्षिणेश्वर मंदिर का गेट तो बंद हो गया था गेट खुलवाया और भीतर में आए ए दि के शे बार थे सदा उदग्रेस बस्ते बिछाना छड़िया उठ लेन यहां पे ठाकुर के प्रति सतक कर ठाकुर क्या कर रहे हैं कहां आ रहे कहां से जा रहे हैं उनको भूख लगी है कि नहीं क्या बात कर रहे हैं सब कुछ मां सतर्क रूप से सुनती थी अभी जैसे वो उदाहरण दिया मां अपने घर का जितना भी कार्य करती है उसका एक दो साल का बच्चा इधर-उधर दौड़ा दौड़ी कर रहा है उसी के प्रति किंतु उसका मन होगा कहीं वो गिर ना जाए कहीं वो चिल्ला ना उठे कहीं वो रोना ना शुरू कर दे कहीं वो ऐसा कुछ ना कर रहा हो जिससे कि वो कहीं को होता है ना वो बिस्तर के ऊपर में उठ कर के वो जंप लगाते हैं छोटे बच्चों का तो कोई ठीक नहीं तो ऐसा कुछ ना करें जैसे कि उसको हानि हो सब समय उसका मन वहां पर रहता है तो यहां पे भी मां रहती थी नबत में में और यहां पे 20-30 फुट के डिस्टेंस पे ही ठाकुर का कमरा था ठाकुर कहां पर आते हैं कहां से जाते हैं क्या बोलते हैं क्या मांगते हैं सब मां सतर्क रूप से सुनती रहती थी तो जैसे ही ठाकुर प्रवेश किए अपने कमरे में मां ने क्या किया मां को पता चल गया और मां नीचे वो मां सोई हुई थी तो बिस्तर में से उठकर के बड़ी व्यस्त होकर के वो कहने लगी कि अभी खाने की तो कोई व्यवस्था नहीं है ठाकुर तो वहां पर खाना खा कर के आने वाले थे तो मां बड़ी व्यस्त होकर के कह रही है कि वो जदुबई काम वाली थी तो काम करने के लिए एक स्त्री को रखा था तो मां ने बड़ी ही व्यस्त होकर के उसको कहा अरे यदु की मां यदु बच्चे का नाम है उसकी मां अर्थात कि यदु की मां अरे यदु की मां अभी क्या होगा अर्थात कि ठाकुर के लिए खाना तो है नहीं और ठाकुर आ गए हैं अभी क्या करेंगे तो नबत एक कथा होई होई ते छलो श तोर को ठाकुर शनिया डाकिया बली लेन तोमरा भेबोना गो आमरा खे सेसी जिस तरह से मां सतर्क रहती थी अलर्ट रहती थी कि ठाकुर क्या बात करते हैं क्या डिमांड करते हैं कहां पर आते हैं क्या करते हैं तो ठाकुर भी अलर्ट रहते थे कि मां के साथ में कुछ अत्याचार नहीं हो रहा है कुछ मां को कोई तकलीफ तो नहीं है तो जैसे ही ठाकुर ने यह सुना मां को कहते हुए कि खाना तो है नहीं अभी इतनी देर से आए हैं तो क्या खिलाएंगे उनको तो इमीडिएट ठाकुर ने सतर्क होकर के मां को कहा चिला उनको पुकार करके कि अरे तुम लोग चिंता मत करो मैं खाना खाके आया देखिए कहानी है छोटी बड़ी सिंपल किंतु इसके भीतर में भी परस्पर इन दोनों का जो दिव्य प्रेम है दिव्य प्रेम का जो सेतु है हमको कितना सुंदर रूप से देखने को मिलता है तो आज यहीं तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु ये जो लक्ष्मी दीदी थी ना उनका ऐसा भाव था वैष्णव भाव था वो इस तरह से वह झांझर पहन कर के नृत्य गीत कर कर के यह सब मधुर भाव के गीत वगैरह गाती रहती थी तो ठाकुर ने मां को कहा था कि लक्ष्मी के भाव में तुम ताल से ताल मिला कर के अपना भाव भंग मत करना लक्ष्मी का भाव अलग है तुम्हारा भाव अलग है यानी कि देखिए कि ठाकुर के साथ में जो रहते थे उनमें से मधुर भाव वाले लोग भी थे वो एक पागली नहीं आती थी वो पागली एक स्त्री वो ठाकुर वहां काशीपुर में है वो जाकर के हल्ला मचा रही है ठाकुर को कहती है मेरा मधुर भाव है तो ठाकुर दिगंबर होकर के एकदम भाव में आकर के दिगंबर होकर के वो वहां पे वो नाराज हो करर के बात करते हैं तो मधुर भाव वाले लोग थे और ये एक बड़ा प्रश्न है ठाकुर कहते हैं ना महा भाव यानी कि मधुर भाव मधुर भाव में सब तरह के भाव का संगम है किंतु यही ठाकुर ऑन वन हैंड मधुर भाव की महत्ता गाते गाते थकते नहीं है यही ठाकुर मधुर भाव के विरोध में मां को सावधान कर देते हैं यह लक्ष्मी दीदी है या यह पागली नहीं जो है वो इस तरह के भाव में मां को कभी भी नहीं जाना है ठाकुर ने कहा कि लक्ष्मी के ताल में ताल देकर के तुम अपनी लज्जा को भंग मत करना यह लज्जा जो कि स्त्रियों के सबसे भूषण माने सर्वश्रेष्ठ आभूषण कहेंगे स्त्री का तो वोह है लज्जा यह बात ठाकुर किंतु मां को बार-बार कहते हैं अभी यह जो राधा रानी का प्रेम है वो व्या भिचारी प्रेम है एक्चुअली उनकी शादी हुई है वह किसी एक व्यक्ति के साथ में और वो मने एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर जिसको कहेंगे इस तरह से भगवान कृष्ण के साथ में उनका संबंध था तो यह जो व्यभिचारिणी प्रेम वैष्णव शास्त्र में जिसको कहा गया है यह प्रेम कि तो ठाकुर इसकी प्रशंसा करते करते थकते नहीं किंतु साथ में ही मां को कहा है कि लज्जा जो है क्या कहते हैं ठाकुर कि तुम्हारा कमार पुकुर में घर है उसको कभी भी छोड़ना मत यह भक्त लोग तुम्हारी कितनी ही सेवा करें तुमको कितना ही प्रणामी दे दक्षिणा दे श्रद्धा भक्ति करें घर तुम्हारा कामर पुकुर में ही होना चाहिए तो मने किसी के घर में जाना मतलब आप तो उनके ये हो ग ना डिपेंडेंट तो ये जो डिपेंडेंसी किसी पर नहीं होनी चाहिए लज्जा हमेशा बनाए रखनी है सो दिस इज अ कंट्रास्ट और यह फिर प्रश्न होगा मन में कि ठाकुर ने कहा भले चाहे कुछ भी हो मधुर भाव के बारे में किंतु लज्जा रूपी प्रेम ही ठाकुर की दृष्टि से सर्व सर्वश्रेष्ठ है वह मां को दिखा कर के उन्होंने बताया है वह जो स्वामी जी जब वहां से वापस आए अमेरिका से बेलूरमठ में कीर्तन बेलूरमठ नहीं वहां प नीलांबर गार्डन में कीर्तन चल रहा है तो स्वामी जी ने कहा कि शिव के भाव से अपने को भर दो क्या इस देश में यह मृदंग है नगार है बचते नहीं है सब समय यह मंजीरा लेकर के क्या वो कीर्तन कीर्तन करके रहना क्योंकि क्या है कि जब तक त्याग नहीं आएगा तब तक मधुर भाव का कोई अर्थ नहीं है फिर वह कामना वासना में डूब जाएगा त्याग ही है उसका फाउंडेशन और त्याग होना कितना कठिन है वह गोपियों का त्याग था राधा का त्याग था अपने भीतर में वह त्यागी नहीं है तो हम यदि मधुर भाव में जाएंगे तो बिल्कुल गड्ढे में गिरेंगे ये हां हां नृत्य गोपाल नृत्य गोपाल साधु सावधान ठाकुर जिसको कहते हैं ना वो भाव में आकर के कीर्तन तो बहुत कर रहा किंतु फिर बाद में ठाकुर ने उसको सावधान किया था कि तुम जो स्त्री भक्तों के साथ में बहुत ज्यादा यह जो तुम्हारा संपर्क है उसके बारे में सावधान हो जाओ जब भाव में जब आओगे बहुत ऊपर उठोगे किंतु त्याग रूपी शस्त्र अपने पास में नहीं तो इतना ही डीप गड्डे में गिरो गया ठकर खोका महाराज की आज तिथि मुझे आज मंदिर में बोलना है खोका महाराज के बारे में एक्चुअली मुझे आज सुबह को पता पता चला एक्चुअली दूसरे महाराज को बोलना था वह हम लोगों का एक रूटीन रहता है शेड्यूल रहता है तो बोलना था दूसरे महाराज को किंतु फिर अभी वो बाहर जा रहा है तो फिर मुझे बोलना पड़ेगा अभी जैसे देखिए उस दिन हम लोगों ने बात की थी ना कि मेडिटेशन इज द ग्रेटेस्ट सर्विस आप कर्म करते हैं तो क्या अर्थ क्या है आप अन्नदान या तो फिर यह ज्ञान दान या तो फिर यह विद्या दान इस सबसे ऊपर में है किंतु डायरेक्ट अभी देखिए ज्ञान दान और डायरेक्ट सेवा में क्या फर्क है ज्ञान दान का अर्थ क्या है आप लोगों को दीक्षा देते हैं या तो किसी भी तरह से आध्यात्मिक मदद करते हैं किंतु वह ज्ञान दान भी इनडायरेक्ट हुआ भगवान शिव इज एन इटरनल अवतार नित्य मुक्त है उनके लिए किसी भी तरह का कार्य नहीं है जगत में किंतु फिर भी वह कैलाश पर समाधि स्त होकर के बैठे रहते हैं हमारे कल्याण के लिए ध्यान करते हैं तो उस लेवल पर जद चले जाते हैं तो ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ सेवा हो जाती है डायरेक्ट सेवा हो जाती है उनके संपर्क में आकर के ही अपने यह जो जन्म जन्मांतर के ये सब है व सब मिट जाएगा और जो एक सामान्य गुरु है वो यदि आपको आध्यात्मिक शिक्षा देगा तो जैसे कि हम लोग है ठाकुर महा स्वामी जी की चर्चा करते हैं फिर उनके वो सब उपदेश का पाठ करते हैं किंतु यह पाठ करने से इमीडिएट तो आपका वो सब संस्कार दूर नहीं हो जाने वाला है राइट तो वो जो ध्यान सर्वश्रेष्ठ सेवा डायरेक्ट सेवा दैट इज ट वो वे लोग किया करते थे माने ईश्वर यदि अवतार होकर के आते हैं तो फिर उनको ध्यान करने की जरूरत ही क्या है जो तो प्राप्त व्य चीज है वह प्राप्त है ही है और फिर देखिए कैंसर क्यों हुआ कि हमारे पाप ग्रहण करके तो कैंसर हुआ तो पाप तो सिर्फ वो आसपास में जितने लोग थे उनके नहीं पूरे जगत के जो सिंचित कर्म कितने ही थे अभी वह कम कर दिए अभी आज हमको लगता है मेरे जीवन में कष्ट है थोड़ा सा सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय जो लोग जीते थे या उससे पहले उन लोगों के कष्ट के कंपेयर में अपना देखिए कुछ नहीं है जैसे मेरा जो व्यक्तिगत अनुभव जैसे मैं कहता हूं कि यह जो स्मृति कथाएं हैं ना उसका एक स्मरण मनन करते रहे कितनी छोटी-छोटी कहानियां है और उसमें कुछ ज्यादा याद रखना कठिन भी नहीं है अभी वह जैसे वह बूढ़ी अम्मा जयराम बाटी गई है वो मजदूर वो भार वो लेकर के वो बोझा लेकर के अपने सर के ऊपर में और मां के पास में रखती है वह सब्जी वगैरह जो कुछ भी होगा मां पूछती है कि अरे इतने दिनों से क्यों नहीं आई अभी मां की सिंपैथी जैसे प्राप्त की वह बेचारी रोती रोती कहती है कि मेरा जवान बच्चा मर गया वह तो रोजगार करता था अभी मुझे कौन खिलाएगा तो यह सुन कर के ही मां चित्कार करके रोने लगी मां की चित्कार सुनक के वह भी चित्कार करके रो रही है सब लोग इकट्ठा हो गए देखिए यह स्मृति कथा छोटी सी है बाहर से कुछ नहीं लगेगा किंतु इसके बारे में सोच मतलब इसका चिंतन कीजिए अपने मन में इस कहानी को दोहराए कितनी छोटी-छोटी कहानियां इसको दोहराते रहिए जब ध्यान करने के पहले देखेंगे कि यह जो भाव है भक्ति है मां के प्रति यह बालक भाव अपने लिए बालक भाव बेस्ट है जैसे ठाकुर ने खुद ने कहा कि मैं संतान भाव में अभी रहता हूं और मां का जन्म भी हुआ है मां ने खुद कहा कि ठाकुर के जाने के बाद में ठाकुर मुझे छोड़ कर के क्यों गए मैंने मुझे जीवित रख के क्यों गए वरना तो वो सती जो हो तो भगवान विष्णु के साथ में चली जाएगी किंतु जगत में मातृभासा करने के लिए ठाकुर मुझे रख कर के गए हैं तो ये मां के प्रति ये संतान भाव प्रकट हो इवन ठाकुर के प्रति संतान भाव प्रकट हो तो ये कहानियों को सोचते रहिए देखिए ऑटोमेटिक रस से मन भर जाएगा और इसको याद रखना कोई कठिन नहीं है ब बड़ा सहज है इतनी सारी छोटी-छोटी कहानी