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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हम पाठ कर रहे थे कल देखा कि किस तरह से मां दक्षिणेश्वर आई है और हृदय ने मां का अपमान किया और मां को वहां से जाना पड़ा तो यह सब घटनाओं के पीछे अभी हृदय ने मां का अपमान किया चलो यह तो ठीक है किंतु ठाकुर क्यों नहीं मां का बचाव कर पाए यह बात को लेकर के हमारा थोड़ा सा डिस्कशन हुआ था सही में बताए तो यह सब प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है तो हम लोग सिर्फ बस मन में थोड़ा सा दुख लेकर के थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं इसी घटना को लेकर के कि हृदय अहंकारे मत होया मोरजादा लंघन करी लेन हृदय अर्थात की ठाकुर का भांजा ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में रहता था ठाकुर की सेवा करता था ठाकुर की सेवा भी बहुत की और ठाकुर को कष्ट भी बहुत दिया तो इस हृदय ने मां जब जयराम दक्षिणेश्वर आई थी जयराम बाटी से तो मां का अपमान करके मां को वहां पर जाने से चले जाने पर मजबूर किया और यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि हृदय अहंकार में मत्त होकर के उसने मर्यादा का उल्लंघन किया है आपात तो तिनी निज इच्छा अनुरूप कार्य सिद्धि कररिया हो तो आत्म तृप्ति लाभ करी लेन किंतु विधाता अदृश्य होतो तो खन तार भावी जीवन अन्न रूपे गीते लो क्षण भर के लिए तो उसने बड़ी ही आत्म संतुष्टि प्राप्त की उसका घमंड को पोषण मिला तो वह बड़ा खुश हो गया होगा कि मैं जो चाहूं वह मैं कर सकता हूं किंतु यही एक घटना के बाद में विधाता ने हृदय के भविष्य को अन्य रूप से घड़ करने का प्रारंभ किया यदि हृदय ने ठाकुर के साथ में या तो फिर मां के साथ में इस तरह का मर्याद मर्यादा उल्लंघन करके ऐसा कुछ व्यवहार ना किया होता तो ठाकुर की सेवा का उसको कितना फल मिलता यह तो हम अनुमान भी आज नहीं कर सकते देखिए कि यह लाटू महाराज है शशि महाराज है राजा महाराज है इन सब लोगों ने तो कुछ ही साल ठाकुर की सेवा की थी कुछ ही साल ठाकुर के अ ठाकुर के सत्संग का आनंद मिला था ठाकुर के सत्संग का उनको लाभ मिला था जबकि यहां पर हृदय बिल्कुल शुरू से अपने मामा के साथ में ठाकुर के साथ में था और ठाकुर की सेवा हृदय ने उस समय की थी जबकि ठाकुर सबसे ज्यादा वल्नरेबल थे उस समय ठाकुर साधन राज्य में ऐसा डूब गए थे कि खुद की संभाल लेने की उनको कोई यह ना ही फिक्र थी ना ही उनमें वह कैपेसिटी थी ना ही ठाकुर को कोई पहचानता था वह मथुर बाबू थे एक जो कि ठाकुर के वैसे तो रक्षक थे किंतु वह तो सब समय कालीवाड़ा प्रति क्ण ठाकुर की जो रक्षा करनी पड़ती थी उसके लिए तो वह स्वयं उपस्थित नहीं हो गए और यदि किसी नौकर को रख दिया मथुर बाबू ने तो ठाकुर की अवस्था ऐसी थी कि मुहूर मुहू बार-बार समाधि होती थी और बार-बार समाधि होने के समय यदि कोई उनको स्पर्श करता तो उनको बड़ा कष्ट होता यानी कि समाधि के समय कुछ ही लोग ठाकुर को स्पर्श कर सकते थे उन कुछ लोगों में यह हृदय भी है इनफैक्ट हमारे पास में इसका विजुअल प्रूफ भी है वह जो केशव सेन के ब्राह्मण समाज में ठाकुर समाधि स्थ होकर के खड़े हैं वो जो उनकी बड़ी ही फेमस मुद्रा में एक हाथ इस तरह से है एक हाथ हाथ ऐसे हवा में है और हृदय उनको धार करके खड़ा है हृदय उनको इस तरह से पकड़ के खड़ा है कि ठाकुर जैसे कि समाधि में गिर ना जाए तो यह तो हमारे पास में ये विजुअल प्रूफ है कि ठाकुर जब समाधि में जाते थे तो हृदय उनको स्पर्श कर सकता था तो कितने शुद्धाओ का एक वर्णन बड़ा ही सुंदर है ठाकुर ने अपने भक्तों को कहा यह सब लड़के भक्त आते थे ना सब यंग उनके भक्त आते थे तो ठाकुर ने कहा कि तुम लोग तो आजकल के यंग बंगोल हो तुम लोगों को तो यह ट्रेडिशनल उत्सव वगैरह क्या है पता नहीं चलो पानी हाटी चलते हैं तो सब लोगों ने नौका में बैठ कर के नौका किराए प करके पानी हाटी बोलकर के तीर्थ क्षेत्र है जहां पर चैतन्य महाप्रभु के नाम पर उत्सव होता कीर्तन वगैरह होता है तो वहां पर गए और वहां पर उत्सव में जाकर के बड़ा ही कीर्तन वगैरह प्रारंभ हो गया और ठाकुर को बार-बार समाधि हो रही है उस समय जो लोग ठाकुर को स्पर्श करते थे ठाकुर को इतना कष्ट होता था जैसे बीछी काट लेता है ऐसा दंश उनको होता था तो दूसरा भी एक इस तरह की एक घटना है एक दासी थी दक्षिणेश्वर में अभी दासी शब्द तो वैसे आजकल यूज करना ठीक नहीं उस समय यह सब शब्द यूज प्र व्यवहार होते थे तो एक स्त्री थी जो कि दक्षिणेश्वर में कार्य किया करती थी एक बार ठाकुर के अभी वह रिटायर वगैरह हो गई है उसका एक अपना घर भी है एक बार ठाकुर के दर्शन करने के लिए आई है तो आकर के ठाकुर के सामने बैठी है और ठाकुर ने कहा कि तुमने तो तुमको तो यह सब पैसा भी तो काफी मिला होगा यह सब कोलकाता के बाबू जो है अ मथुर बाबू वगैरह उनकी तो तुमने काफी सेवा की है तो अभी वो दास जो स्त्री है वो कहेगी कि व ठाकुर सामने पूछते हैं पैसा तो मिला होगा तो क्या दान दक्षिणा कुछ किया तो यह स्त्री अपने मुंह से क्या कहेगी वो कहती है कि मैं अपने मुंह से क्या कहूंगी किंतु फिर भी जब ठाकुर ने कहा कि बताओ तो तब उसने कहा कि वो वृंदावन में एक घाट बना दिया है तो इस तरह से अभी वह सब वार्तालाप कर रहे हैं एकाएक स्त्री ने इसी स्त्री ने साहस करके ठाकुर के पेर स्पर्श कर दिए उनके चरण स्पर्श कर दिए प्रणाम करने के लिए तो जैसे ही चरण स्पर्श किए ठाकुर एकदम चिल्ला उठे जैसे कि वी ने 10 लिया हो और खड़े होकर के अपने और फिर अभी ऐसा होगा तो निश्चय वो स्त्री की तो कैसी अवस्था हुई होगी कि उसने स्पर्श किया तो ठाकुर को कष्ट हुआ इतना अर्थात कि उसने कितना पाप किया है कि ठाकुर जैसे शुद्ध चरित्र व्यक्ति को स्पर्श करने का भी उसमें साहस नहीं या अधिकार नहीं अभी वह बेचारी स्त्री चुपचाप बैठी रही जीवन मृता होकर के यह शब्द जहां प यह रेमसंस लिखा गया है वहां पर लिखते हैं यह लेखक कि यह दासी जीवन मृता होकर के बैठी रही जैसे कि कितनी ही शर्म में पड़ गई हो कितनी ही अपने को कोस रही हो कि अरे मैंने स्पर्श किया तो ठाकुर को इतना कष्ट हुआ ठाकुर खड़े होकर के गंगाजल का वह जो घट था उसमें से गंगाजल से अपने पैर धोने लगे हां पर इसने स्पर्श किया था किंतु फिर ठाकुर ने बैठ कर के देखा कि जब यह इतनी संकुचित हो गई है तो फिर उसको फिर से साहस बंधा के लिए उसको ियर अप करने के लिए ठाकुर ने एक के बाद एक गीत गाना शुरू किया तो जैसे कि उसको थोड़ा सा सध्या मिले कि नहीं वह इतनी भी निम्न कक्षा की नहीं कि ठाकुर को स्पर्श ना कर सके या तो फिर ठाकुर को स्पर्श ना कर सके यह तो ठीक है किंतु एटलीस्ट ठाकुर उसके साथ में बड़े ही सहृदय वार्तालाप तो कर सकते हैं ठाकुर उसके सामने भजन कीर्तन वगैरह तो कर सकते हैं तो यह ठाकुर को स्पर्श करना जब भी वह समाधि में होते थे यह अधिकार या तो फिर यह गुड फॉर्च्यून कितने कम लोगों का था तो अभी यहां पर हृदय का यह गुड फॉर्च्यून था कि ठाकुर को व स्पर्श कर सकता था ठाकुर जब समाधि में होते थे तो उनकी केयर कर सकता था यदि उसने थोड़ा सा भी मान लीजिए कि साधन भजन नहीं भी किया होता और किंतु यह सब जो जो उल्टा पुल्टा जो कार्य करता था वो यदि उसने ना किया होता तो उसका भविष्य पता नहीं कितना उज्जवल होता यहां तक कि मान लीजिए कि यह भी संभव है कि रामकृष्ण संघ के प्रथम प्रेसिडेंट के रूप में शायद राजा महाराज नहीं होक के यह हृदय भी हो सकता था तो यह सब उज्जवल भविष्य उसका संभव था किंतु जिस दिन उसने मां का अपमान किया उस दिन उस उस क्षण पर भर तो उसके मन को बड़ा ही संतुष्टि मिली होगी उसके घमंड को काफी पोषण मिला होगा किंतु उसी क्षण से विधाता ने उसके भविष्य को निम्न गामी अधोगामी करना शुरू कर दिया था उसी दिन से उसका भविष्य अंधकारमय होने लगा था श्री मायर प्रति श्री मायर प्रति हृदय दुर्व्यवहार ही प्रथम न मां के प्रति हृदय का दुर्व्यवहार यह पहली बार नहीं है आर एक दिन तहर अनुरूप व्यवहार देखिया श्री राम कृष्ण तहा के सावधान कोरिया दिया लेन और एक दिन उसने इसी तरह से मां के साथ में कोई दुर्व्यवहार किया था तो ठाकुर ने हृदय को सावधान करके कहा था ओरे हृदय एके तई तुता छल्लो कोरे कथा बोली बोले ओके आर कखन एमन कोथा बोली शनी अरे हृदय इसको अर्थात कि अपने शरीर की ओर इशारा करके ठाकुर कहते हैं कि इसको तुम जो तुच्छ ता चल्य करके जो बात करते हो तो इस तरह की बात तुम मां के साथ में मत करना मेरा जो बार-बार तुम अपमान करते हो ऐसा कितनी ही बार हुआ है ठाकुर को पेट का रोग था खा नहीं पाते थे तो हृदय ठाकुर के सामने बैठ कर के अच्छा-अच्छा खाना खाता था फिर कहता था देखो मैं यह सब खा रहा हूं और तुम यह सब पागलपन के चक्कर में पड़े हो गले में से यह जनोई उठा कर के फेंक दे रहे हो यह सब कर रहे हो इसीलिए आपको खाने को भी आप खा भी नहीं सकते ऐसा करके करके तो ऐसा हृदय ने कितनी ही बार ठाकुर के साथ में यह सब किया था एक दिन तो यहां तक हृदय का अत्याचार बढ़ गया था कि ठाकुर ने खुद कहा आमी गोंगा झाप दते गय छिल अर्थात कि मैं गंगा में डुबकी मार कर के मैं आत्महत्या करने के लिए गया था तना इस हद तक हृदय ने ठाकुर को परेशान किया था किंतु यहां पर ठाकुर क्या कहते हैं कि तुम मेरा जितना ही अपमान चाहे कर लो उनका अपमान मत करना एर भतरे जे आछे से फश कर ले होई तो रखा पहले ओ पते पारिश किंतु और भतरे जे आचे से फश कर ले तो के ब्रह्मा विष्णु महेश्वर रखा करते पार बेना इसके भीतर में अर्थात मेरे भीतर में जो है वह फोंस करेगा अर्थात कि सांप की तरह फूफा जद मारेगा तो शायद हो सकता है कि तुम्हारे तुम्हारी रक्षा हो पाए किंतु उसके भीतर में जो है अर्थात कि मां के भीतर में वह जद इस तरह से दंश देने के लिए फोंस भी करेगा य फफा भी मारेगा तो तुमको ब्रह्मा विष्णु महेश यह जो तीन देवता त्रि देव भारत के सर्वश्रेष्ठ देवता वे लोग भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएंगे क्यों क्योंकि ठाकुर के भीतर में नारायण है और मां के भीतर में है भगवती नारायण की सेवा करके आप नारायण को प्रसन्न कर सकते हैं जैसे कि रावण जैसे कितने ही लोग थे हालांकि रावण ने तो भगवान शिव की आराधना की थी किंतु यह जितने भी पुरुष देवता है इन सबका ऐसा है कि है तो बड़ा ही मातृ हृदय जब भी चाहे आप उनकी आराधना करके उनको प्रसन्न कर सकते हैं किंतु जिनका जो मातृ स्वरूपा स्वयं है मां काली या मां दुर्गा जो कि मां के भीतर में थे उनका अपमान करके किंतु यह जो पुरुष देवता जितने भी है उसमें से कोई भी आपकी रक्षा नहीं कर पाएगा तो ठाकुर कहते हैं कि मेरे भीतर में नारायण है उनका अपमान करने से हो सकता है कि तुम्हारे पुण्य इतने हैं कि तुम्हारा बैलेंस मने वो ये हो जाए अकाउंट तुम्हारा बैलेंस हो जाए जितना तुमने पुण्य किया उतना पाप किया अकाउंट बैलेंस हो गया तुमको ना ही ज्यादा कुछ मिलेगा ना ही तुमसे ज्यादा कुछ छीना जाएगा किंतु मां के भीतर में भगवती जगदंबा स्वयं है उनका अपमान करने से तीनों लोगों में रक्षा नहीं है हृदयर अभिमान कठिन मने से सावधान का बाणी दाग बचाते पारे नाई तरान दैव निर्बंध तहा के दक्षिणेश्वर छाड़ या मायर पुनरागमन पथ परिष्कार करिया दते होई लो हृदय का मन किंतु अभिमान से भरा हुआ था तो हृदय ने ठाकुर की बात सुनी नहीं किंतु देखिए कि विधाता ने क्या किया हृदय के अभिमान और यह घमंड ने एक ऐसी परिस्थिति लाकर खड़ी कर दी कि हृदय को आखिर में दक्षिणेश्वर छोड़ कर के जाना पड़ा और मां के पुनः आगमन का पद परिष्कार कर देना पड़ा मां के पुनः आगमन के लिए रास्ता छोड़ देना पड़ा और वह बात तो हमको पता है कि किस तरह से हृदय को वहां से जाना हुआ था हृदय ने वह कुमारी पूजा की थी त्रैलोक्य बाबू की कन्या की और त्रैलोक्य बाबू यह सोच कर के भयभीत हो गए कि वह खुद तो ब्राह्मण नहीं है और हृदय ब्राह्मण है तो ब्राह्मण ने अब ब्राह्मण की बेटी की पूजा की है अब ब्राह्मण कन्या की पूजा की है तो शायद उसका अमंगल हो सकता है तो इस बात से नाराज होकर के त्रैलोक्य बाबू ने हृदय को दक्षिणेश्वर छोड़ कर के जाने को कहा था साथ में यह भी हुआ था कि जो व्यक्ति जो आदमी यह मैसेज लेकर के आया कि हृदय को जाना होगा उसने बात-बात में ठाकुर को भी कह दिया कि आप भी चले जाइए तो ठाकुर ने तो क्या ठाकुर तो बिल्कुल निर्विकार निर्लिप्त है तो उन्होंने गमछा अपने कंधे पर डाला और सीधा गेट की ओर जाना शुरू कर दिए यहां पर त्रैलोक्य बाबू यह सब देख रहे थे ठाकुर को जाते हुए देख कर के वह दौड़ा दौड़ा आया और ठाकुर के चरणों में गिर गया कहा कि मैंने तो आपको जाने को नहीं कहा है आप कृपया रुक जाइए अच्छा ठाकुर जो रुक गए उसके पीछे में भी एक बात है मथुर बाबू को एक बार ठाकुर ने कहा था कि आपका जब निधन होगा तुम्हारा जब तुम्हारा जब निधन होगा तो रा मृत्यु होगा उसके बाद मैं दक्षिणेश्वर में नहीं रह पाऊंगा मेरा दक्षिणेश्वर में रुकना दक्षिणेश्वर काली मंदिर में रुकना इतने ही दिन संभव है जितना दिन तुम्हारा शरीर है क्योंकि तुम मेरी इतनी सेवा करते हो किंतु तुम्हारे बाद में तुम्हारे लड़के वगैरह मेरी सेवा करेंगे यानी कि मेरी इतना सम्मान करेंगे नहीं किसको पता ठाकुर ने यह बात अपने मुंह से नहीं कही थी किंतु सिर्फ इतना कहा था मथुर बाबू को कि आपके मृत्यु के बाद में मेरा यहां पर रहना नहीं होगा तो उस समय मथुर बाबू एकदम व्याकुल होकर के ठाकुर को कहने लगे अरे नहीं नहीं आप मेरे जाने के साथ में आप चले जाएंगे तो मेरे वंश का क्या होगा क्योंकि मथुर बाबू के जो पूरा उसका जो गुड फॉर्च्यून है उसका जो यह अच्छा नसीब जो है धन वगैरह उसकी प्रतिष्ठा वो जो दिन प्रतिदिन बढ़ रही है उसको पक्का भरोसा था कि वोह ठाकुर की वजह से ही है वरना तो वो तो गरीब के घर का लड़का है कहां पर वो रानी राम ने उसको खोज करके अपनी बेटीया का विवाह करवाया तो यह वह मथुर बाबू इमीडिएट ठाकुर को ऐसा कहने लगे कि आप मेरे निधन के बाद मत जाइएगा तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है चलो तुम्हारा लड़का जब तक रहेगा तब तक मैं रहूंगा तो यहां पर भी ऐसा ही हुआ वो ठाकुर कुछ समय तक ये त्रैलोक्य बाबू के रहने तक रहे और उसके बाद में उनको सही में कैंसर हो गया और उनको दक्षिणेश्वर काली मंदिर छोड़ कर के जाना पड़ा तो यहां पर देखिए कि हृदय ने मां के साथ में जो अपमानजनक वाणी का अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया उसके बाद में ही उसको दक्षिणेश्वर छोड़ कर के जाना पड़ा और फिर मां जब फिर से वापस आई थी उस समय हृदय वहां पर नहीं था मां का फिर से अपमान करने के लिए अतः पर रामलाल दादा काली मंदिरे पुजारी होलेन इसके बाद में रामलाल दादा हुए काली मंदिर के पुजारी ओई पदर गरबे आत्म विस्तृत होईया तीनी भाब लेन आर की ए बार मां काली पुजारी होए छी और जब मां काली के पुजारी हुए तो यह तो सबसे सम्मानजनक पोजीशन है पूरे काली मंदिर में तो इस बड़े ही प्रतिष्ठा जनक पद को पा कर के यह सोचने लगे रामलाल दादा कि और क्या बस अभी तो मैं मां काली का पुजारी हुआ हूं अभी ठाकुर की सेवा करने का ठाकुर के पीछे दौड़ते रहने का ठाकुर क्या करते हैं क्या खाते हैं क्या पीते हैं यह सब देखने की मुझे आवश्यकता क्या है तो बोलकर के ठाकुर को रामलाल दादा ने ठाकुर को निगले करने की शुरुआत कर दी सुतं तीनी श्री श्री ठाकुरे आर ते मन देखा सोना कोरीते ना मां काली के पुजारी हुए हैं तो अभी रामलाल दादा ठाकुर की इतनी केयर नहीं करते थे ठाकुरर तखन मुहूर मुहू समाधि होई तो काजे के हो जोतनो कोरिया ना खवाले मां काली प्रसाद घोरे पड़िया था किया सुकाया जातो ठाकुर की उस समय बार-बार समाधि में मग्न हो जाते थे बार-बार समाधि होती थी तो अभी समय पर तो खा नहीं पाएंगे समाधि के नशे में जब ब कभी-कभी समाधि में रहते थे कभी-कभी समाधि के नशे में रहते थे तो खाना खाने का किसको इतना अकल है किसको इतना समय है किसका इतना ये दृष्टि है उस चीज के प्रति तो ठाकुर खाना नहीं खाते थे अपने से और मां काली का प्रसाद जो ठाकुर के लिए आता था उनके कमरे में पड़ा पड़ा सुक जाता था अथ च एमन आर के हो छलो ना जे अपनार बोधे तहर सेवा कोरीते पारे और इस समय ऐसा कोई था नहीं कि जो ठाकुर को अपने अपने खुद के मान कर के ठाकुर की कोई सेवा करें ठाकुर को अपना आत्मीय मान के कोई उनकी सेवा करें ऐसा कोई उस समय था नहीं ताई तहर खावा दवार असुविधा हुवाई ओई अचलर जे के हो दक्षिणेश्वर होई ते देश जाई तो ताहा के दिया तीनी श्री मा के पुनः पुनः बोलिया पाठई तेन दक्षिणेश्वर आशी बार जन्नो ठाकुर को आत्मीय समझ कर के सेवा करने वाला कोई नहीं था इसीलिए दक्षिणेश्वर से कलकत्ता से जो कोई भी कामर पुकुर जयराम बाटी जाता उनके पास में ठाकुर बार-बार मां को मैसेज पहुंचाते बार-बार संदेश पहुंचाते दक्षिणेश्वर में आने के लिए ए रूपे कामर पुकुरे लक्ष्मण पाइन के दिया तीनी संवाद पठाई लेन खाने अर कष्ट होचे रामलाल मां काली पुजारी होए बामर दोले मिसे छ खन आमा के आर अतो खोज करे ना इस तरह से एक लक्ष्मण पाइन थे कामर पुकुर के तो वह वहां पर जा रहे थे कलकाता में तो ठाकुर ने उनके द्वारा यह संदेश पहुंचाया कि रामलाल अभी यह सब ब्राह्मण लोगों के दल में मिल गया है ब्राह्मण लोगों के साथ में अभी वह उठक बैठक कर रहा है और मेरी इतनी खबर नहीं ले रहा है तुम्ही अवश्य आश बे तुम पक्का आना तुम अवश्य आना डोली करे हो पालकी करे हो 10 टा लागू बीटा का लागू आमी देवो ली करके या पालखी करके जैसे भी तुमको सुविधा हो तुम आना रप लगेगा 20 रप लगेगा जितना भी लगेगा मैं दूंगा र अच्छा तो अभी देखिए कि ठाकुर उस समय जब हृदय था और हृदय हृदय ने मां का अपमान करके मां को वहां पर जाने पर मजबूर कर दिया था तो उस समय तो ठाकुर कुछ बोले नहीं अभी हृदय का वहां से दक्षिणेश्वर से चले जाना हुआ है और रामलाल दादा ठाकुर की सेवा नहीं कर पा रहे तो ठाकुर को अभी चिंता हो गई है कि अभी यह खाना पीना वगैरह सब तो अनियमित हो गया है अभी वह क्या करेंगे बेचारे तो उन्होंने मां को बार-बार संदेश भेजा कि डोली में हो ना कि पालखी में हो कैसे भी हो तुम पालखी करके भी आ जाना मैं तुमको 10 लगेगा तो ₹10 दूंगा ₹ लगेगा ये पालखी भाड़ा का तो ₹ भी दूंगा किंतु तुम यहां पर अवश्य आना तो यह पढ़ कर के थोड़ा सा हमको यह कष्ट भी होता है प्रश्न भी होता है कि ठाकुर ने पहले तो मां का अपमान रोक नहीं पाए पहले तो ठाकुर मां का अपमान रोक नहीं पाए दूसरा कि अपने को खुद को असुविधा हो रही है तब वह मां को बुलाते हैं मां के प्रति या तो मां की सुविधा के प्रति या तो मां को दक्ष कामर कुर या तो फिर जयराम बाटी में जो कष्ट करना पड़ता है इसके प्र क्या ठाकुर की कोई दृष्टि नहीं थी क्या ठाकुर इतने ही सेल्फिश थे यह प्रश्न हो सकता है किंतु देखिए कि अगेन इसका कोई उत्तर तो है नहीं अपनी जो क्षुद्र बुद्धि से अपनी जो एक सामान्य बुद्धि जो है उसको लेकर के इसका विश्लेषण करें तो मेरा एक उत्तर ऐसा है कि ठाकुर ने तो अपना अहम अपना खुद का जो पर्सनालिटी है वह तो जगदंबा में संपूर्ण रूप से विलीन कर दिया था अपना ु का अहंकार अपना खुद का घमंड कहो कि अपनी अपना जो अपना खुद का अस्तित्व कहो वह सब कुछ तो महाकाली के श्री चरणों में अर्पण कर दिया था ठाकुर तो स्वयं महाकाली में विलीन हो गए थे तो खुद का कष्ट खुद को आवश्यकता है यह खुद यह जो अहम बुद्धि ठाकुर की थी ही नहीं उस समय उस समय ऐसा ही था कि ठाकुर के शरीर में मां काली विलास कर रही है और यह मां काली ही मां काली ने अपना दूसरे स्वरूप को ठाकुर में जो विराजित मां काली है इस मां काली ने मां के भीतर में मां शारदा के भीतर में विराजित जो मां काली है उसको आमंत्रण दिया था उसको आवाहन दिया था तो यहां पर ठाकुर का खुद का बुद्धि या ठाकुर का खुद का आवश्यकता या ठाकुर की खुद की नीड वो नहीं कारण भूत होकर के ठाकुर के भीतर में जो मां काली है उनके बुलाने से मां शारदा फिर से दक्षिणेश्वर आई थी और देखिए कि मां जब भी दक्षिणेश्वर आई है पहली बार जब मां आई थी उसके बारे में भी हमने कल देखा कि किस तरह से मां पहली बार दक्षिणेश्वर यात्रा के समय रास्ते में बुखार के मारे प्राय बेहोश होकर के पड़ी है और वहां पर काले वर्ण की कृष्ण वर्ण की एक स्त्री जाकर के बड़ी ही सुरूपा सुंदर स्त्री जाकर के मां को कह रही है कि खड़ी हो जाओ तुम्हारे लिए ही तो मैंने उनको अर्थात कि ठाकुर को वहां पर के आट के रेखे जीी वहां पर बिठा करके रखा है तुम्हारे ही लिए तो उस समय मैंने पहली बार भी मां काली के आगमन से ही आमंत्रण से ही मां दक्षिणेश्वर आ पाई थी और यहां पर भी ठाकुर का खुद का सुविधा असुविधा नहीं व मने रदर देन की ठाकुर की खुद की सुविधा असुविधा ठाकुर के भीतर में जो मां काली है उनके आवाहन से मां शारदा ने फिर से दक्षिणेश्वर आगमन को स्वीकार किया था यह तो एक रीजन हमको दिखता है दूसरा एक क्या है पता है जैसे कि ठाकुर को भी तो मनुष्य देह धारण करके इतनी सारी तपस्या करनी पड़ी थी यह पंचभूत फांदे ब्रह्म पड़े काधे अर्थात कि यह जो पंचभूत का पंच महाभूत का यह पिंजरा है यह अपना शरीर यह देह धारण करके ब्रह्म खुद यदि पृथ्वी पर आ जाते हैं तो उनको भी इस देह के गुण धर्म के अनुसार रोना पड़ता है हंसना पड़ता है जगत के जितने भी अच्छे बुरे अनुभव है उन सबसे पसार होना पड़ता है तो मां को भी यह सब अनुभवों में से पसार होना होगा या होना पड़ेगा इसलिए शायद हो सकता है कि मां को इस तरह से वहां से जाना पड़ा दक्षिणेश्वर से और हृदय ने मां का अपमान किया था तो यह सब तो खैर अपने कल्पना मात्र है यह शुद्र बुद्धि की एक सामान्य बुद्धि के कुछ विचार मात्र है इसके पीछे में सही सही क्या रीजन है वह तो समझना मुश्किल है किंतु देखिए कि घटना परंपरा कितनी सुस्पष्ट है मां आई दक्षिणेश्वर में हृदय ने मां का अपमान किया और यह घमंड जो बढ़ गया इसी घमंड ने हृदय को मार दिया इसी घमंड की वजह से उसने त्रैलोक्य बाबू की पुत्री की कन्या कुमारी पूजा की इसी घमंड से त्रैलोक्य बाबू नाराज होकर के उसको दक्षिणेश्वर से भगा दिए और मां को फिर से दक्षिणेश्वर आने का रास्ता वो उन्मुक्त हो गया स्वच्छ हो गया अभी देखिए कि यह जो घमंड की वजह से दूसरे लोग ना आ पाए ठाकुर के पास में इसका एक दूसरा भी एक उदाहरण है वह है राजा महाराज का राजा महाराज का एक ऐसा हो गया था एक समय कि ठाकुर के हमको तो राजा महाराज की कहानी पता है राजा महाराज अर्थात की राखल भविष्य में स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट तो यही राजा महाराज प्रथम प्रथम ठाकुर के पास आते थे तो ऐसे नादान थे कि ठाकुर जैसे कि मां अपनी गोद में बिठा कर के बच्चे को स्तनपान कराती है वैसे ही ठाकुर राजा महाराज को अपनी गोद में बिठा कर के उसको इतना लाड़ करते थे ठाकुर बोलते जेमन जेमन छले मायर माई खाई एमनी राजा राखल अर कोले बसे माई खातो तो यह राजा ठाकुर ने ऐसा राखल को बिल्कुल अपने पुत्र वत उसको यह ट्रीट किया है यहां तक कि राजा महाराज के आगमन से पहले ठाकुर को स्वप्न में दिखाई दिया दर्शन में दिखाई दिया कि उनको वो एक लड़का वहां पर है और फिर मां काली ने दर्शन देकर के कहा कि यह तुम्हारा लड़का का है तो फिर ठाकुर जब दर्शन से बाहर आए सामान्य परिस्थिति में तब वह हृदय को कहने लगे उस समय हृदय वहां पर था कि अरे मैंने देखा कि एक लड़के को देखा इस तरह से तो हृदय तो मजाक करके कहने लगा कि अ आपका एक संतान होगा तो ठाकुर नाराज होकर के बोले अरे मेरा तो मातृ योनी है मेरा संतान किस तरह से होने वाला है किंतु जब राखल अर्थात कि राजा महाराज वहां पर आए तब वह मां काली ने फिर से प्रकट होकर के ठाकुर को बता दि या वही वह लड़का है और यही है तुम्हारा मानस पुत्र तो राजा महाराज ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं थे और आध्यात्मिकता में स्वामी स्वामी विवेकानंद ने कहा है आध्यात्मिकता राजा अर चे बड़ो अर्थात कि आध्यात्मिकता में राजा मेरे से भी बड़ा है तो इतने सब कुछ राजा महाराज की इतनी ऊंचाई पर आध्यात्मिक जीवन में अवस्थित होने के बाद में भी एक समय ऐसा आया था कि ठाकुर के पास में यदि दूसरे भक्त आते ठाकुर यदि दूसरे भक्तों के साथ में बातें करते तो राजा महाराज को बड़ा ही ईर्षा होने लगती थी तो उस समय फिर जैसे कि होता है मा काली का यही विधान है कि ठाकुर के पास में तो लोगों का आगमन होना ही है वह चाहे मां हो मां शारदा ना कि फिर बाद में यह स्वामी जी वगैरा जो मास्टर महाशय वगैरह दूसरे लोग हैं ठाकुर के प्रति जो अपना अधिकार जमा करके बैठेगा उसको वहां से जाना ही पड़ेगा कोई भी ठाकुर पर अपना अधिकार नहीं जमा सकता है कोई यह नहीं कह सकता ठाकुर सिर्फ मेरे ही साथ में बात करेंगे और दूसरों के साथ में बात करें ऐसा तो नहीं होगा तो फिर राजा महाराज को वहां से जाना पड़ा व बलराम बाबू के साथ में वह वृंदावन गए थे और ठाकुर ने बाद में कहा भी था कि देखो वो मा मां ने ही उसको यहां से निकाल दिया माई व के खांत के शोर्य दिए ज अर्थात कि मां काली ने ही राजा राखल को यहां से निकाल दी क्यों वो जदी थक तो आर के वास्ते पार तो ना वो जद रहता तो और कोई आ नहीं पाता मेरे पास में तो मैंने जब यह पहली बार पढ़ा था तो मैंने मैं मुझे ऐसा लगा कि ठाकुर यहां पर हृदय के बारे में बात करते हैं कि हृदय यदि रहता तो और यह जो भक्त वगैरह है ठाकुर के पास नहीं आ पाते हृदय सबको डराता धमका आता पैसा वसूल करता क्या-क्या पता नहीं नाटक करता किंतु बाद में मुझे लगा कि नहीं यह बात ठाकुर ने राजा महाराज के बारे में कही है क्योंकि राजा महाराज को भी बाद बाद में यह सब पसंद नहीं आता था कि दूसरे भक्त आकर के ठाकुर के साथ में बात करें ऑफकोर्स राजा महाराज और हृदय में यही फर्क है कि राजा महाराज को अपनी भूल समझ में आ गई और ठाकुर को फिर से वापस आकर के ठाकुर के शरणागत हो गए और राजा महाराज ने बहुत बाद में वराह नगर मठ में यह बात स्वीकार भी की है कि एक समय था कि मैं नहीं चाहता था कि दूसरे लोग ठाकुर के पास में आए मुझे ईर्षा होती थी किंतु फिर ठाकुर ने मुझे यह भी समझा दिया कि नहीं और यह बात पता है राजा महाराज ने कब कही है वह उस समय की घटना है मेरे ख्याल से अभी मुझे थोड़ा रेफर करना पड़ेगा किंतु मोस्ट प्रोबेबली उस समय की बात है जबकि ठाकुर को काशीपुर में लाया गया था कैंसर की ट्रीटमेंट के लिए और यह जो लड़के भक्त थे निरंजन महाराज है शशि महाराज वगैरह इन लोगों ने ठीक किया था कि अभी सभी को ठाकुर के पास में नहीं आने देंगे क्यों क्योंकि ठाकुर के पास में जो कोई भी आएगा ठाकुर के चरण स्पर्श करके और ठाकुर के चरण स्पर्श करेगा ठाकुर के साथ में वार्तालाप करेगा तो ठाकुर उसके पाप हर लेंगे और उनका पाप ले लेक के ही तो ठाकुर को तो कैंसर हुआ है तो लोगों को ठाकुर से दूर रखो यह सब जो बात हो रही थी उसी समय शायद राजा महाराज ने यह बात कही थी कि मेरे मन में भी एक था एक समय कि ठाकुर के पास में सिर्फ मैं ही आऊं किंतु ऐसा नहीं करके ठाकुर तो सबके हैं सबको ठाकुर के पास आने देना चाहिए यह भैरवी ब्राह्मण का भी ऐसा ही हुआ था ऐसा एक घमंड आ गया कि वह बार-बार जब खास करके ये जो जरा कामर पुकुर आई थी भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर के साथ में और मां उस समय मां के साथ में ठाकुर को वार्तालाप करके भैरवी को बड़ी ही ईर्षा होती थी भैरवी बार-बार सबको कह रही है कि ठाकुर को तो मैंने ही बनाया है ठाकुर के भीतर में जो आज आध्यात्मिकता देख रहे हो मैंने उनके पास में जो साधना करवाई उसी का यह परिणाम है ऐसा वोह बार-बार लोगों को कह रही है तो उसी समय फिर से भैरवी के भीतर में जो अहंकार आया तो हृदय के साथ में झगड़ा हो गया और फिर हृदय ने वो एक कलसी वगैरह कुछ था उठा कर के भैरवी को मारा और कपाल पर लगा और खून निकलने लगा वह सब घटनाएं है और उसी की वजह से भैरवी को वहां से जाना पड़ा तो यह भैरवी ब्राह्मणी हो कि हृदय हो ना कि फिर आखिर में यह राजा महाराज हो जिन जिन लोगों ने ऐसा कहा है कि ठाकुर मेरे एक लोतेसोल मेरे अलावा ठाकुर की कोई सेवा नहीं करेगा उनके साथ कोई वार्तालाप नहीं करेगा तो यह बात ठाकुर के भीतर में जो मां काली है वह कभी भी सहन नहीं कर पाती और इसीलिए देखिए कि मां शारदा का हृदय कितना बड़ा है कितनी बार ऐसा हुआ है कि मां रहती है नौबत में ठाकुर रहते हैं अपने कमरे में बीच में कितना 20-30 फुट का मुश्किल से डिस्टेंस होगा किंतु ऐसे महीनों के महीनों चले जाते हैं कि मां को ठ का दर्शन नहीं होता था ठाकुर की सेवा करने का ठाकुर के साथ में बात करने का मौका प्राप्त नहीं होता था एक सिर्फ एक अपॉर्चुनिटी था मां के लिए कि ठाकुर का आहार प्रस्तुत करके वो ठाकुर के पास में लेकर जाती थी और ठाकुर को आहार करवाती थी उसमें भी वह गोलाप मा कहीं से वोह आ गई बीच में और मां को कहने लगी मां मुझे दो खाने का थाली मैं जाकर के ठाकुर को खिलाती हूं तो वो वो वो सेवा भी मां ने बड़े हृदय से इस बात को भी स्वीकार कर लिया और अपने मन को मनाती थी कि मन तू ऐसा तो कौन सा पुण्य करके आया है कि तुमको प्रतिदिन ठाकुर का दर्शन होगा ठाकुर की वाणी सुनने का मौका मिलेगा तो इस तरह से मां अपने को संभालती थी समझाती थी तो मां का वह हृदय था मां को पता था कि ठाकुर सिर्फ उनके लिए या सिर्फ एक्सक्लूसिवली उनके अधिकार में नहीं है ठाकुर सबके लिए है तो इसलिए जिन लोगों ने इस बात को स्वीकार किया मां ने तो पहले ही स्वीकार कर लिया था राजा महाराज को थोड़ा सा समय लगा और भैरवी ब्राह्मणी और हृदय को तो वहां से जाना ही पड़ा यह बात स्वीकार नहीं करने की वजह से तो यहां पे भी हृदय ने हृदय का वहां से जाना हुआ और फिर ठाकुर की सेवा के लिए मुश्किल होने लगी ठाकुर ने मां को पत्र लिख कर के पत्र तो नहीं इस तरह से लोगों के माध्यम से संवाद पहुंचा करके मां को दक्षिणेश्वर आने के लिए कहा रूप आह्वान पाया श्रीमा अश से दक्षिणेश्वर आशीन इस तरह से आह्वान पा कर के इस तरह से आमंत्रण पाक के मां आखिर में दक्षिणेश्वर में आई एक बशर परे तहर पंचम बार आगमन एक साल के बाद में जो ऊपर में जो घटना हुई उस घटना के एक साल के बाद में मां का ये पांचवी बार दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ इ हार पर पिा लय जाया श्रीमा सात आठ मास लेन इस पांचवे दौरे के बाद में पांचवे आगमन के बाद में फिर से मां पिलयसेंटर से समय भाबे घोरे पड़िया जाबाई ठाकुरर बाम हाथेर हाड़ स्थान चु तो होय एवम खूब कोटो ईते था के इसी समय ठाकुर वहां पर गिर गए थे और उनके हाथ में फैक्चर हो गया था ठाकुर को बहुत पीड़ा होती थी श्री मां आशिया ठाकुरे घोरे काप ठाकुरे घोरे कापडे पटटी राखिया प्रणाम करीबा मात्र ठाकुर जिज्ञासा कोरी लेन कोबे रोबा ना होए छो मां जैसे ही आई अपने कपड़ों की पटली ठाकुर के घर में एक कॉर्नर में रखी और ठाकुर को प्रणाम किया तो ठाकुर ने सबसे पहले यही पूछा कि तुम जयराम बाटी से कब रवाना हुई थी श्री मायर उत्तरे ठाकुर जही जानी लेन ज तिनी बृहस्पति बारे बार बेलाई बाहर होया लेन ओमनी बोली लेन माने जैसे ही कहा उत्तर दिया कि कब रवाना हुई थी वैसे ही ठाकुर को पता चला कि मां बृहस्पतिवार की बार बेला को वहां से प्रस्थान किया था माने अभी यह बृहस्पतिवार की बार बेला है अभी इसका कोई डिटेल मुझे नहीं पता किंतु यह एक अशुभ शुकन माना जाता है अशुभ समय माना जाता है यात्रा करने के लिए तो वैसे ही जैसे ही ठाकुर ने जाना वैसे ही उन्होंने कहा तुम बृहस्पति बार बार बेला रवाना होए छो बोले हमार हाथ भें छे यह जो तुम बृहस्पतिवार की बार बेला को रवाना हुई थी यात्रा की थी जयराम बाटी से इसीलिए मेरा हाथ टूट गया है मेरे हाथ में फेक्चर हो गया है जाओ जाओ यात्रा बोले बदले यशो ग जाओ जाओ फिर से यात्रा बदल करके आओ बृहस्पति बार बेला को जो निकली थी वहां पर इसीलिए हाथ में इजा हुई है फिर से जाओ दूसरी यात्रा में वहां से निकलना और किसी शुभ शुभ सुकून में वहां से निकलना श्री मां सेही दिने फिरते चाहिले ठाकुर बोली लेन आज था काल जव मां तो जैसे ही मां ने सुना हम अनुमान कर ही सकते हैं कि कितना कष्ट करके मां यात्रा करके आई है और जैसे ही ठाकुर को प्रणाम किया ठाकुर ने कह दिया जाओ जाओ फिर से वापस चली जाओ मां का हृदय में क्या बीती होगी अभी क्या पता किंतु मां तो फिर मां ने तो अपने मन को मक्कम करके कहा ठीक है तो मैं अभी जाती हूं तो ठाकुर कहते हैं नहीं आज रुक जाओ कल जाना पर दिन श्री मां जात्रा बदलाई ते देश गले दूसरे ही दिन मां यात्रा बदल करने के लिए देश वापस चली गई अभी इस घटना का भी क्या तात्पर्य है क्या इसका व्याख्या है पता नहीं ठाकुर जिस तरह से मां को इतना नेगलेक्ट करते हैं जितना अपमान करते हैं पता नहीं इस तरह से यह जो कम्युनिस्ट लोग है ना यह लोग इस तरह के आर्टिकल लिखते हैं कि फेमिनिज्म बोलकर के एक आइडियो जीी है कि हां स्त्रियों को तो सम्मान देना ही चाहिए तो स्त्रियों को सम्मान अभी उसके पति जो है स्त्रियों का अपमान करेंगे मारपीट करेंगे तो यह नहीं चलेगा तो यह सब वो कम्युनिज्म में बहुत चलता है तो यह लोग फिर इस तरह के लिखते भी है कि जिस रामकृष्ण परमहंस को आप लोग इतना सम्मान देते हैं वह भी अपनी पत्नी की इस तरह से अवगणना अपमान किया करते थे तो यह सब घटना पढ़ कर के उनको तो बड़ा मजा आ जाता होगा किंतु हमारे लिए हमको पता है कि देखिए कि बाह्य दृष्टि से हमको तो गुस्सा आएगा ही आएगा सर्वप्रथम दो बार ऐसा हुआ कि जैसे दक्षिणेश्वर मां आई वैसे ही मां को वापस जाना पड़ा एक बार हृदय की वजह से और दूसरी बार तो ठाकुर ने स्वयं ऐसा कहा और हृदय की समय भी ठाकुर चाहते तो मां को रोक सकते थे मां के बचाव कर सकते थे किंतु उन्होंने नेगलेक्ट किया इस उस समय कुछ भी बोलना तो वन टाइम बाय ओमिशन अनदर टाइम बाय इंटेंशन तो इस तरह से दो बार ठाकुर की वजह से मां को दक्षिणेश्वर छोड़ कर के जाना पड़ा इसका क्या इसका एक व्याख्या तो यही है कि ठाकुर के भीतर में जो मां काली है और मां मां के जो भीतर में जो मां काली है उन दोनों ने मिलकर के ठीक किया होगा कि ठाकुर तो ड़ने के लिए आए हैं भागने के लिए नहीं आए तोड़ने के लिए नहीं अर्थात कि जो सनातन आदर्श है टू द डोट उसको फॉलो करना होगा उसके आखिरी पर्याय तक उसको आखिरी समय तक यह जो सनातन आदर्श को हमको सनातन धर्म को फॉलो करते जाना है इसके लिए हमारे खुद के आराम अपने खुद के जो सब कंफर्ट है उन सबको यदि बलि स्वरूप भी देना पड़े तो उसमें भी कोई दिक्कत नहीं है उसके लिए भी तैयार है यह जो श्रेय और प्रेय यह जो दोनों हमारे सामने आते हैं सब समय 2 करने के लिए मुझे जो प्रिय है वह मैं करूंगा नहीं तुम्हारे लिए जो श्रेष्ठ वो तुमको करना है और यहां पर श्रेष्ठ जो है वह सिर्फ ठाकुर और मां के लिए श्रेष्ठ है व नहीं देखना है भविष्य की जनरेशन को कितने 1500 साल तक तो स्वामी जी ने कहा है कि रामकृष्ण संघ कार्यरत होगा उसके बाद में भी यह जो भावधारानी तो यह रामकृष्ण भावधारानी ग्रहण करें कि आदर्श के लिए धर्म की स्थापना के लिए अपना खुद का जो कोई भी यह प्रिय हमारी जो जो जो भी प्रिय चीजें हैं प्रिय व्यक्ति है इनका त्याग करना पड़ेगा यह जो भगवान राम ने मां सीता का त्याग किया था गांव में जाकर के वह सुना किसी के किसी को बोलते हुए कि मां सीता वहां रावण के वहां पर रहकर आई पता नहीं इनका चरित्र कैसा होगा वगैरह वगैरह तो इमीडिएट भगवान राम ने मां सीता का त्याग किया बात ऐसा नहीं है कि भगवान राम को कोई कष्ट नहीं हुआ होता किंतु उनको पता है कि धर्म की स्थापना करने के लिए उनका अवतरण हुआ है और धर्म को लेकर के ही उनके सभी कार्यकलाप है धर्म को लेकर के ही उनका जीवन है और इसकी स्थापना करने के लिए भविष्य की जनरेशन को शिक्षा देने के लिए यदि कष्ट भी सहन करना पड़ता है अपने प्रिय पात्र का त्याग भी करना पड़ता है तो उसके लिए वह तैयार थे तो यहां भी यही जो सनातन आदर्श उसकी स्थापना करने के लिए ठाकुर को यदि मां का इस तरह से दो बार त्याग करना पड़ा तो ठाकुर ने यह स्वीकार किया यही बोल कर के तो हम अपने मन को मनाएंगे अदर वाइज इस बात की कोई और व्याख्या हमको नहीं मिलती है इ हार परे श्री मां कबे दक्षिणेश्वर आसेन एवं कबे देश जान ताहा अनिश्चित इसके बाद में मां फिर कब दक्ष ेश्वर आई थी फिर कब कामर पुकुर वापस गई थी यह सब अनिश्चित है तबे इहा जाना आछे जे 1291 सने भासुर पुत्र रामलाल ब बाहे तीनी कामर पुकुरे जान एवं ओई बसर फाल्गुन मासे दक्षिणेश्वरी फिरिया सेन तब अभी बहुत सारी बार मा दक्षिणेश्वर आई है गई है तो सब डिटेल तो पता नहीं किंतु एक बार की बात पता है कि जब राम लाल का विवाह हुआ था उस समय मां कामर पुकुर गई थी फिर उसी साल में दक्षिणेश्वर में आई थी ए समय हैते श्री श्री ठाकुरे लीला बसान पर जंतो श्री श्री माता ठाकुरानी संभव तो आर देश जानना इस समय से लेकर के ठाकुर के लीला अवसान तक मां फिर से देश अपने वापस गई नहीं थी बाकी कोई बशर दक्षिणेश्वर श्यामपुकुर और काशीपुर काटा अी ले जितना समय फिर व वहां पर थी दक्षिणेश्वर में श्यामपुकुर में जब ठाकुर को कैंसर ट्रीटमेंट के लिए ले गए थे श्यामपुकुर काशीपुर तो उतना दिन फिर मां वहीं पर रही थी तो आज यही तक भी कल तो सैटरडे है अभी मिलेंगे मंडे को ओम शांति शांति शांति हरि ओम त श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु जैसे वाली का पीछे से वध किया भगवान राम ने किंतु यह बात अच्छी कही कि यदि मां सीता को वन में भेजना था खुद भी तो जा सकते थे लॉजिक बढ़िया है कि जद आदर्श का पालन दूसरों से को क्यों करवाते हो भाई अपने भी तो करो साथ साथ में तो बात सही है कि सही में देखा जाए तो यह सब चीजों की कोई व्याख्या होती नहीं है किंतु एक व्याख्या जो है जो एक सहज व्याख्या जो है कि अपने खुद के जो प्रिय विषय है उसका त्याग करना यही है आध्यात्मिकता तो यह त्याग का संदेश इतना डीप जाए अपने मन में यह समझाने के लिए यह सब घटनाएं होती है वैसे मुंह से सिर्फ बोलते रहे कि भाई त्याग करो त्याग करो तो वह शायद हमारे मन में इतना नहीं जाएगा किंतु यह लोग ऐसी कोई घटना के माध्यम से कुछ करके दिखा दे तो फिर यह सब समय के लिए हमारे मन में बैठा रहेगा अभी रामायण में ऐसी कितनी घटनाएं हैं कितने उपदेश है अभी किसको याद है किंतु भगवान राम ने मां सीता का त्याग किया था यह सबको याद है तो ये ठाकुर के जीवन में भी इतना बड़ा कथामृत है इतना बड़ा लीला प्रसंग है कितनी ही बातें ठाकुर ने कही है सब कुछ कौन याद रखने को बैठता है किंतु यह दो बार ऐसा हुआ कि मां दक्षिणेश्वर आई और ठाकुर ने या तो रोक नहीं पाए हृदय को या तो फिर अपने से खुद को जाने को उसको मां को कह दिया तो यह सब समय हमको याद रहेगा तो यह घटना परंपरा के माध्यम से त्याग का जो संदेश है वह हमारे हृदय में दृढ़ भूत हो ऐसा लग रहा है मने यह एक सहज व्याख्या हो सकती है अभी देखिए कि नरेंद्र जो था ठाकुर को इतना परेशान किया करता था ठाकुर को बार-बार कहता था कि आपके मन का भ्रम है वगैरह वगैरह किंतु उस समय हम ठाकुर का पक्ष लेकर के नर के साथ में झगड़ा करने को नहीं जाते उस समय सोचते हैं हां हां ठाकुर उत्तर दे हम भी सुनते हैं ठाकुर को बेचारे को सिंपी नहीं मिलती है यहां पर मां को सिंपति मिल जाती है वहां पर नरेंद्र को मिल जाती है ये गिरीश घोष है गिरीश घोष ठाकुर का इतना अपमान करता था फिर भी हम लोग गिरीश का पक्ष ले रहे हैं हां हां तो देखें तो हम भी कि ठाकुर क्या कहते हैं