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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 30 Oct 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे। कल हमने ऑलरेडी देखा कि किस तरह से वह

क्यों माँ सारदा का मातृत्व ही उनका सबसे बड़ा ‘चमत्कार’ है? दो हृदयस्पर्शी कहानियाँ

एक पागली की कहानी ठाकुर के पास में आई है। पहले तो ठाकुर की उसके प्रति बड़ी सिंपथी थी। किंतु फिर जैसे ही उसने यह जाहिर किया कि ठाकुर के प्रति उसका मधुर भाव है। वैसे ही ठाकुर नाराज हो गए और उसको गालागाली देना शुरू कर दिया। और जैसे एक छोटे बच्चे के साथ में होता है उनकी धोती भी निकल गई और फिर वह कमरे में टहलते टहलते उसको गाली दे रहे हैं। तो मां यहां पर यह पूरी बात सुन रही थी तो उन्होंने दुखित होकर के गुलाब मां को कहा कि देखो यदि पागली की बात उनको अच्छी नहीं ही लगी तो उसको तो यहां पर भेज देते। इस तरह से एक स्त्री को गाली देने से क्या लाभ है? ऐसा बोल के मां ने गोलाप मां को भेजा। गोलाप मां वह पागली को लेकर नहबत में आई और फिर मां ने कहा कि ठाकुर के पास में जाने से यदि ठाकुर नाराज होते हैं तो फिर वहां पर जाने की जरूरत ही क्या है? तुम यहां पर मेरे पास में आना। तो देखिए कि इवन एक ऐसी स्त्री जो कि उनके पति के प्रति मधुर भाव प्रदर्शित कर रही है। ऐसी स्त्री के प्रति भी मां का मातृत्व ममत्व इतना था। तो और यह भी हमने कल देखा कि ठाकुर की लीला प्रकट काल अर्थात कि ठाकुर के जीवित रहते रहते मां का मातृत्व जिस तरह से प्रकाशित हो रहा था उसकी यह सब कहानियां है। ठाकुर के लीला अप्रकट काल अर्थात कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में वह तो मातृत्व का जो प्रकाश मां के जीवन में है वह तो अद्भुत है। ऐसी एक के बाद एक कहानियां हमको सुनने को मिलेगी, पढ़ने को मिलेगी कि हम लोग अभिभूत हो जाएंगे कि सही में इतना मातृत्व देखिए जनरली हम देवी को किस अर्थ में देखते हैं। किसको हम सम्मान श्रद्धा या किसकी हम पूजा करते हैं। जिनके पास में देवी शक्ति हो। हां असुरों का संहार किया। हां घर में आपत्ति है तो फिर उसको पूजा करने से तो श्रीफल ऑफर करने से घर की सब आपत्तियां दूर हो गई। यह सब यदि कोई देवी करती है तो फिर अब जैसे शीतला मां है तो वह बीमारी होती है तो मां शीतला को ज कुछ नैवेद्य ऑफर किया उनके नाम की कोई मिन्नत रखी तो फिर वह हमारी बीमारी दूर हो गई बोलकर के हम उस देवी की आराधना करते हैं तो हमारी यह जो सांसारिक विपद है यह जो आर्थिक विपद है यह जो दैहिक विपद है रोग वगैरह उसको जब देवी दूर करती है तब हम उनकी आराधना करते हैं। किंतु मां की आराधना हम क्यों करते हैं? सिर्फ इसीलिए अब ऐसा नहीं है कि मां के पास में यह सब देवी संपद नहीं थी। वो तो सबसे पहला केस ही सबसे पहला किस्सा ही गंभीरानंद जी ने वो घोष काली पदो घोष दाना काली उसकी पत्नी की कहानी से ही तो यह सब पूरी मां की जीवन की घटनावली प्रकाशय जाहिर में आना शुरू हुई है। वह उसका पति इस तरह से शराबी था, जुगारी था तो उसका सम उस समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए दाना काली की पत्नी कोई मंत्र या कोई औषध प्राप्त करने के लिए ठाकुर के पास में आई थी। ठाकुर ने मां के पास में भेजा और मां ने जब पूजा का बिल्व पत्र उसको दिया तो सही में दाना काली ठाकुर के मुख्यतम भक्तों में से एक भक्त वह बना। तो वह शक्ति तो थी ही थी मां के पास में कि सांसारिक विपद दूर कर दे, कोई आर्थिक विपद दूर कर दे। यह सब तो था ही था मां के पास में। किंतु इससे भी आगे यह सब विपद दूर हो। इससे भी आगे मां के भीतर में एक ममत्व था, मातृत्व था। जो कि मां को सर्वश्रेष्ठ देवी के रूप में प्रतिष्ठित करता है। एक सुंदर कहानी है कि जय राम बाटी के दिनों की ही बात है। ठाकुर की महासमाधि के अनेक सालों के बाद की बात कि मां जय राम बाटी में है और आसपास के गांव से बहुत सारे भक्त जो है कोलकाता वगैरह से जो लोग मां के लिए कुछ ना कुछ भेजेंगे। अह फल भेजेंगे या तो सब्जी भेजेंगे या तो अनाज भेजेंगे। क्योंकि पता है कि मां का तो शिव का संसार है। वहां पर मां के भाई जो है उनकी खुद की तो आय सब उनकी जो इनकम है बिल्कुल मिनिमम है। वे लोग खुद मां के ऊपर में भरोसा करके बैठते हैं। तो फिर एक कहानी है कि मां के घर के सामने एक कुआं खोदने की बात हुई जिससे कि क्या है सबको पानी मिले। तो नारायण आयंगर बेंगलुरु का वह बाद में वह सन्यासी भी हुए अपने संघ में तो वही नारायण आयंगर उस समय डिवोटी था मां के घर में घर में रहता था मां का सानिध्य प्राप्त करने के लिए तो जय राम बाटी में ही तो उसने यह प्रपोज किया कि मैं कुआं खोदवा देता हूं। अभी कुआं खोदने से तो सभी को लाभ होगा ना। मां अकेली थोड़ी ना पानी पिएगी। ये जो काली मामा है, वर्दा मामा है, वे उनके परिवारजन सभी तो पानी पिएंगे। किंतु देखिए कि उन लोगों के भीतर में यह जो लोभ इतना था कि काली मामा जिनकी यह जमीन थी जिस जमीन के ऊपर में कुआं खोदने की बात थी। उसी काली मामा ने यह नारायण आयंगर को कहा कि यह जितनी जमीन आपको चाहिए उतनी ही जमीन को आप रुपयों से बिछा दें। रुपयों की नोट जो है उस जमीन पर बिछा दीजिए। रुपयों की नोट से आपको जितनी जमीन चाहिए वह आप कवर कर दीजिए और फिर इतने रुपए मुझे देंगे तभी मैं आपको यह जमीन दूंगा। अदरवाइज मैं नहीं दूंगा। तो इस तरह का लोभ इन लोगों के मन में था। अभी पता है कि कुआं खुदवाने से खुद ही को लाभ है। इसके बावजूद यह पैसों का लोभ यह लोग जाने नहीं देते थे। किंतु इस तरह के परिवार में रहकर भी मां का देखिए कि मां के भीतर की जो ममत्व या तो फिर यह था मातृत्व इतना ग्रेट था इतना सर्वश्रेष्ठ था कि मां भी इन लोगों को यथाशक्ति सहाय करती थी। तो यहां पर प्रॉब्लम क्या है कि मां का तो शिव का संसार ना ही भाइयों की कोई माने दो तरह से भाइयों की शक्ति भी नहीं थी मां को सहाय करने की और यह इच्छा भी जो होती है इंटेंशन जो होता है वह विपरीत ही था कि मां के बड़े धनी भक्त हैं तो उनके पास में से हम अपना कुछ बेनिफिट उठा लें तो यह मां के संसार की परिस्थिति तो फिर भक्तों को तो पता है कि मां के घर में ऐसा तो वे लोग कोई कुछ ना कुछ बीच-बीच में मां के पास में कोई ना कोई सामग्री भेजते थे। अभी हुआ ऐसा कि एक मजदूरन थी, एक लेडी थी जो कि अपने सर के ऊपर में यह सब सामान लेकर के वह जयराम बाटी आया करती थी। अभी वह जयराम बाटी आती थी और फिर कभी-कभी होता ऐसा था कि आते-आते देरी हो जाएगी। तो देरी हो जाएगी। तो बोल के फिर वह उसी रात को निकल नहीं पाएगी। तो फिर मां उसको कहेगी कि अच्छा तुम रात को यहीं पर लेट जाओ। तो वह वृद्धा महिला उसी दिन रात को एक दिन मां के वहां पे मां के घर के सामने ही जो वरांडा है वहां पे ही रात को सो गई। मां ने सोने के लिए उसको एक चटाई दी होगी। अभी हुआ ऐसा कि वह रात को सोई हुई है। अभी वृद्धा है। पूरा दिन भर का परिश्रम किया है। धूप में चल के आई है। प्लस उसको उस समय मलेरिया हो गया था। गांव देहात में तो ऐसा होता ही है कि मलेरिया वगैरह यह सब तो सामान्य है। और जिसको हम शहर में क्या है? थोड़ा सा भी बुखार हुआ, थोड़ा सा भी यह हुआ, हम आराम से सो जाते हैं। पूरे-पूरी ट्रीटमेंट लेते हैं। रिकवर होने के बाद में खड़े होंगे। किंतु क्या है? यह शहर में रहने वाले मिडिल क्लास, अप्पर क्लास फैमिली के लिए यह सब पॉसिबल है। गांव में तो क्या है कि वैसे तो मलेरिया वगैरह लगा ही रहता है। दूसरा कि आप उस दिन खा काम नहीं करेंगे, लेटे रहेंगे तो खाने को कौन देगा? तो वह एक समस्या है। रोज काम करो रोज खाओ जो कि वहां की इकोनॉमिक परिस्थिति थी। तो यह वृद्धा को भी बेचारी को हे वृद्ध हे मलेरिया हो गया है। ऐसी ही परिस्थिति में सर के ऊपर में बोझा लेकर के वहां मां के घर आई है। मां ने जब सहानुभूति पूर्वक कहा कि अभी रात को लौटने की वजह रात को यहीं पर लेट जाओ। यहीं पर सो जाओ। तो वह बेचारी बड़ी आनंदित होकर के सो गई। किंतु रात को ही रात को उसने अपने वह जो चटाई जिसके ऊपर में सोई हुई थी सोते-सोते ही उसने शोच कर दी। अब जैसे यह छोटे बच्चों के साथ में ऐसा कभी-कभी होता है। वृद्ध लोगों के साथ में कभी-कभी ऐसा होता है। खास करके यह लोग बीमार होते हैं। तो अभी यह वृद्धा भी थी बीमार और ऐसा ही सब कुछ मिलकर के वही चटाई पे ही वरांडे में ही उसने शोज कर दिया। अभी हुआ ऐसा दूसरे दिन अर्ली मॉर्निंग को मां सबसे पहले उठती है। जैसे कि मां का हैबिट है। बाकी सब लोग अभी भी सोए हुए हैं। मां सबसे आगे सूर्योदय होने के पहले ही उठ जाएगी। तो मां जैसे ही उठी और जैसे ही अपने कमरे के बाहर में आई देखा कि वही चटाई में लेटी हुई वृद्धा महिला वहीं पर उसने बिस्तर में ही शौच कर दिया है। तो मां ने सोचा कि यदि अभी अभी क्या है यह नाथ जात का भी तो एक बड़ा रहता है ना गांव में यह ब्राह्मण है अब्राहण है वगैरह तो इस वृद्धा ने चटाई में ही सोच कर दी यह देखकर के वो तो बाकी जो जितने भी थे यह नलिनी है वो पागली मामी है फिर वो सब तो मां के साथ में रहते थे ना सब भूत पिशाच उस बंदरों को ले मां रहती थी तो वे लोग पता नहीं किस तरह का हल्ला मचाएंगे पता नहीं इस वृद्धा को इतना कोसेंगे उसका अपमान करेंगे उस वृद्धा को भी बुरा लगेगा। तो मां ने उसको धीरे से आवाज देकर के उठाया और कहा कि देखो जो भी हुआ उसकी चिंता मत करो। यह थोड़ा सा खाने के लिए मुड़ी वगैरह लो खाओ और शांति से सुबह-सुबह ही यहां पर से चली जाओ जिससे कि तुमको धूप ना लगे। तो वृद्धा भी बड़ी खुश हो गई। उसने सोचा कि चलो मां की सिंपैथी मुझे मिली है। बोल के वो मुड़ी लेकर के खाती खाती वहां से निकल गई। यहां पे मां ने उस वृद्धा ने जो चटाई थी उसको बिगाड़ा था उसको पूरा धोया। उसको जो तालाब था उसके किनारे उसको सूखने के लिए रखा दिया। और फिर वरांडे में तो वह जो सब पड़ा होगा शौच वगैरह तो अभी वहां पर तो क्या है कि गोबर लिपा हुआ यह सब तो है ना वहां पे अपनी टाइल्स जैसा तो नहीं है कि फटाक करके आपने साफ किया थोड़ा सा पोछा लगाया निकल गया वो तो गोबर लपेटा हुआ है तो वहां पे क्लीन करके आपको फिर से गोबर लगाना पड़ेगा तभी वह ठीक ठीक क्लीन होगा तो मां ने अपने हाथों से वरांडा साफ किया और वहां पर सुबह-सुबह ई और किसी के उठने से पहले ही फ्रेश गोबर लिप दिया वहां पे और चुपचाप अपने घर में जाकर के बैठ गई जैसे कि किसी को पता ही ना चले। अब सही में हुआ ऐसा कि किसी को पता ही नहीं चला कि अर्ली मॉर्निंग यह सबके उठने के पहले ही यह पूरा कांड हो गया है। पूरी कहानी हो गई है। किंतु एक डिवोटी थी जो मां के साथ में रहती थी। उसकी नजर थोड़ी सी शार्प थी। उसने देखा कि सुबह को उठ के ही यह जैसे फ्रेश गोबर वरांडे में लिपा किसने? जनरली यह सब सब काम तो यह डिवोटी वगैरह मिलकर करेंगे। दोपहर को ऐसा कुछ करेंगे। ये सुबह-सुबह वरांडे में किसने यह फ्रेश गोबर लिपा है? तो फिर उसने इंक्वायरी करना शुरू किया और इंक्वायरी करते-करते यह पूरी कहानी उसको जानने में आई। देखिए यह मां का ममत्व और कोई भी स्त्री होती उसके वरांडे में और किसी मजदूर ने इस तरह से इस तरह से गंदा किया होता तो कितनी चिल्लाती और यदि चिल्लाती नहीं तो नाराज तो रहती ही रहती भीतर में से किंतु मां को देखिए कि सिर्फ वो मुंह से चिल्लाती नहीं है। इतना ही नहीं मुंह से तो सहानुभूति प्रदर्शित करती ही है। साथ-साथ में ही हृदय में भी उसके प्रति इतनी सहानुभूति है कि उस वृद्धा का कहीं अपमान ना हो जाए। क्योंकि उस वृद्धा को तो बार-बार आना पड़ता है मां के घर पे तो अभी नेक्स्ट टाइम जब आएगी तो सब लोग नाराज होकर के उसको कोसेंगे, गाली देंगे, कहेंगे और फिर से कभी रात रुकने की बारी आ जाए तो उसको तो बरांडे में सोने ही नहीं देंगे। बोलेंगे भागो यहां से और कहीं जाकर सोना हो सो फिर से यहां पे ऐसा करोगी तो कौन धोने को जाएगा वगैरह-वगैरह तो उस वृद्धा को भी अस्मान ना हो उसके प्रति भी मां की नजर अपनी वृद्ध शरीर होने के बाद में मां खुद तो वृद्ध थी ऐसा नहीं है कि मां पूरा फिजिकली फिट उस समय थी और सब काम कर पाएगी। उसके बावजूद मां ने अपने से यह पूरा वरांडा क्लीन किया। चटाई क्लीन किया। चटाई को रो धूप में सूखने के लिए रखा। सब कुछ मां ने इस तरह से किया कि जैसे किसी को पता ना चले। तो देखिए यह है अपनी मां शारदा। और यह कहानी तो हमको सिर्फ इसीलिए पता चली कि वह जो शार्प आई जिस डिवोटी की थी उसने यह खोज निकाला। उसको यह समझ में आ गया कि यह फ्रेश गोबर लिपा गया है वरांडे में। तभी तो हमको पता चला। अभी इस तरह की कितनी कहानियां होंगी जो कि हमको पता ही नहीं है। तो देखिए कि मां का जो ममत्व है मां का जो मातृत्व है वही मां शारदा को अन्य सब देवियों से एक स्टेप ऊपर में ले जाता है। और कोई देवी होगी उसमें विद्या होगी और किसी देवी में लक्ष्मी के तरह धन वैभव हमको प्राप्त करवाती होगी और कोई देवी होगी हमारे सांसारिक दैहिक आर्थिक सब समस्याओं का समाधान करेगी किंतु संपूर्ण हृदय से हमारे प्रति करुणा ममता और प्रेम बहाए ऐसी तो एक मां शारदा का ही जीवन हमको को देखने को मिलता है। एक सुंदर कहानी है जय राम भाटी की ही है ठाकुर की महासमाधि के बहुत सालों के बाद की कि मां का जन्मदिन तो मां का जन्मदिन आयोजन हो रहा है और जितने भी यह त्यागी संतान है बड़े ही उत्साह पूर्वक सब कुछ आयोजन कर रहे हैं। अभी मां का हैबिट ऐसा है जयराम भाटी में भी और कोलकाता में भी कि जब यह त्यागी संतान है वह लोग भोजन करेंगे उसके बाद में ही मां और मां वहां पर खड़ी हुई उनको देखेगी तृप्त होगी तभी मां को तृप्ति प्राप्त होंगी कि हां मेरे बच्चे जो है वह पेट भर करके मन भर के आहार कर रहे हैं। जब तक पॉसिबल था जयराम बाटी में मां अपने हाथों से खाना पकाती थी और जब पॉसिबल नहीं था अपने हाथों से खाना पकाना उम्र की वजह से बीमारी की वजह से तब मां वहीं पर खड़ी रहती या बैठी रहती और पूरा देखती कि बच्चे पेट भर के खाते हैं कि नहीं। जिसको जो चाहिए एक्स्ट्रा वह सब अपने हाथों से देती या और किसी से दिलवाती। बच्चों को जब तृप्ति हो तभी मां अपने से खाने को बैठेगी। बाकी सब लेडी डिवोटी के साथ में। तो वह थी मां की प्रथा। अभी आज तो है मां का जन्मदिन। तो एक त्यागी संतान ने सोचा कि मां तो सब समय बाद में खाती है। मां को खाने में देरी हो जाती है। आज हम इस तरह से आयोजन करते हैं कि मां सबसे पहले आहार करें। उसके बाद में हम सब त्यागी संतान गण है। हम लोग बाद में खाएंगे। तो उसने जाकर के मां को विनती की। पहले तो मां ने मना ही कर दिया। किंतु अभी यह त्यागी संतान जो है अभी वह तो पीछे लग गया है। उसने विनती के बाद में विनती करना आरंभ कर दिया है कि नहीं मां आप ही को आज पहले भोजन करना होगा। आपकी शुभ जन्म तिथि है। साल में एक दिन तो आप हमको मौका दीजिए कि आप आहार कर रही है और हम आपको परोस रहे हैं। तो अब जब यह त्यागी संतान बार-बार विनती कर रहा है तो फिर मां ने भी हां बोल दिया। अच्छा ठीक है चलो इस बेचारे की यह इच्छा है तो आज मैं पहले आहार कर लेती हूं। बोल करके मां आहार के लिए उस दिन तो ठाकुर का विशेष भोग और आरती हुआ। ठाकुर को बहुत सारे पकवान ऑफर किए गए। बहुत सारी आइटम्स बनी थी। विशेष पूजा भी हुई। मां के श्री चरणों में पुष्प वगैरह भी अर्पित किए गए। जितने भी भक्त उपस्थित थे सब ने मां को प्रणाम भी किया। मां ने सबको आशीर्वाद भी दिया। तो वह पूरी कहानी तो हो गई खत्म। अब जब भोजन का समय हुआ तो भक्त ये जो त्यागी संतान थे। मां को बड़ा सुंदर आसन बना के मां को पहले बिठाया और फिर बड़े ही सुंदर थाले में सब तरह की भोग की जो वस्तुएं हैं जो भी सामग्री बनाई गई है छोटी-छोटी कटोरियों में सुंदर रूप से सजा करके जैसे कि देवता को ऑफर करने के लिए भोग किस तरह से देते हैं वैसे ही मां के लिए सब सजा करके मां के सामने रखा गया और फिर विनती की कि मां आप सबसे पहले आहार कीजिए। यहां पर किंतु मां की परिस्थिति बिल्कुल अलग है। मां बेचारी बड़े ही निश्वास पूर्वक बड़ी ही दुखी होकर के करुणा पूर्वक यह खाने का थाला देख रही है। और उसके मन में वही बात है कि मेरे बच्चे इस सब अच्छा अच्छा खाना कब खाएंगे? बोलकर के मां बेचारी ठीक से खा भी नहीं पा रही है। यह जो सुंदर थाले में सब चीजें सजाई गई थी उसमें से थोड़ा यहां से मुंह में डाला, थोड़ा यहां से डाला, थोड़ा यहां पे कुछ लिया और फिर इमीडिएटली मां ने कहा कि बस अभी मैं और खाना नहीं खा पाऊंगी। जब तक मेरे संतान भूखे रहेंगे तब तक यह खाना मेरे गले के नीचे ही नहीं उतर रहा है। ऐसा बोलकर के मां खड़ी हो गई। हाथ धो दिए। जितने भी संतान थे सबके लिए थाला सजा दिया गया और फिर वहां पर खड़ी रह के मां की निगाहों में माने मां के सुपरविजन में सभी बच्चों को खाना परोसा गया और जब बच्चे खाना खा रहे हैं तब मां के हृदय को तृप्ति हुई और यह जब पूरा देखा तब वह त्यागी संतान जो कि आगे पढ़कर के आगेवाणी लेकर के मां को विनती कर रहा था कि मां आज पहले खा लीजिए तब उसकी की अकल ठिकाने आई कि देखो उसी की वजह से आज मां को तृप्ति पूर्वक खाना नहीं मिल पाया। कहां वह मां की बर्थडे मां की शुभ जन्मति थी। मां पेट भर के खाएगी। उसकी वजह मां बिल्कुल भूखी ही उस दिन रह गई। तो देखिए कि यह थी हमारी मां। तो मां की यह जो मातृत्व लीला है उसके दो चरण है ठाकुर के रहते-रहते ही जो कि बड़ा ही गुप्त था, सीक्रेटिव था क्योंकि बहुत कम डिवोटी को ही ठाकुर मां के पास में भेजते थे। खास करके त्यागी संतान को भेजते थे और यह लेडी डिवोटीज को भेजते थे। तो अभी एक लेडी डिवोटी की बात तो हमने देखी। अभी

रोटी खिलाने की कहानी—जब माँ सारदा ने अपने त्यागी संतानों की आध्यात्मिक प्रगति का भार स्वयं उठाया

त्यागी संतानों के बारे में मां का जिस तरह का उनके प्रति मातृभाव था। उसकी एक कहानी गंभीरानंद जी हमको बताते हैं। बड़ी ही फेमस कहानी है। जिन लोगों ने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का इवन ऊपर ऊपर से भी स्टडी किया होगा। सबको यह कहानी पता है। वही रोटी खिलाने वाली बात कि वह ठाकुर आकर के मां को कह देते हैं इसको इतनी रोटी रात को खिलानी है। उसको इतनी ही रोटी जिससे कि रात को कम खाएंगे। तो सुबह को जल्दी उठकर के जब ध्यान करेंगे। किंतु फिर जब मां ने उनको पेट भर के खिलाना शुरू किया तो फिर ठाकुर नाराज होकर मां के पास में कंप्लेन करने को गए। तो वह जो पूरी कहानी है यहां पर गंभीरानंद जी उसका उदाहरण देकर के कहते हैं कि ठाकुर के रहते-रहते मां का मातृत्व भाव किस तरह से प्रकट हुआ था। तो क्या है वह कहानी से समय बालक भक्तों दे अनेके दक्षिणेश्वर जाति जा रात्रि जापन करते उस समय बालक भक्तों में से बहुत सारे दक्षिणेश्वर में ही रात्रि बिताते एवं ठाकुर निर्देश साधनादिते रोतो थाकीतेन और साथ-साथ में ही ठाकुर के निर्देश अनुसार साधन भजन में रत रहते भूरी भोजन ने ध्यान व्याघात तो होबे जानिया ठाकुर तहा दे आहारादर प्रति तीक्ष्ण दृष्टि राखी दे ज्यादा खाने से ध्यान करने में व्याघात उत्पन्न होगा बाधा खड़ी होगी यह समझ करके यह जानकर के ठाकुर वे लोग क्या खाते थे क्या नहीं खाते थे उसके प्रति तीक्ष्ण दृष्टि रखते श्री मां के बोलिया दिया छीले मां को बोल दिए थे राखाल के छह खाना लाटू के पांच खाना और बूढ़ो गोपाल और बाबूराम के चार ही खाना कोरिया रोटी दी मां को बोल के रखा था कि राखाल को छह लाटू को पांच और बूढ़ो गोपाल और बाबूराम को चार करके रोटी देनी है। देखिए सब रोटी का कैलकुलेशन ठाकुर का यह फेमस रोटी का कैलकुलेशन मां मां को खुद को पूछते हैं तुम रात को कितनी रोटी खाती हो? मां बेचारी लज्जाए माटी ते मिशिया गले लज्जा में लज्जा में मां जैसे कि भूमि में मिलित हो गई वो जो मां सीता किस तरह से भूमि फट करके मां सीता को उन्होंने ग्रहण कर लिया था वैसे ही अब रात को कितनी रोटी खाती है मां बेचारी कैसे बोलेगी कि तो ठाकुर तो छोड़ने वाले नहीं थे बार-बार पूछ रहे हैं बोलकर के मां ने कह दिया यही पांच छह खाना खाई ए रकम ही कुछ मां ने कहा था तो फिर ठाकुर उन्होंने उसके हिसाब से कैलकुलेशन करके वो ₹200 ना कि जितना भी है उन्होंने वो बलराम बाबू की जमींदारी में वो वहां पर डिपॉजिट करवा दिया था वो ऐसे और फिर उसका जो इंटरेस्ट आता था उसमें से मां के जीवन भर का वो कितना रोटी खाएगी उतना रोटी का वो जुगाड़ उसके इंटरेस्ट से हो जाने वाला था। तो देखिए कि ठाकुर रोटी की गिनती करते हैं। वह हमेशा करते रहते हैं। मां के बारे में भी ऐसा करते हैं। और यह त्यागी संतानों के बारे में भी ऐसा करते हैं। अभी देखिए किंतु मां की महिमा ठाकुर को ऐसा नहीं कहा कि मैं जितनी रोटी खाऊंगी खाना चाहती हूं उतनी खाऊंगी। उससे तुमको क्या है? अपने बारे में तो नहीं कहा किंतु त्यागी संतानों के बारे में यह बात मां से सहन नहीं हुई। मातृत्व ए ऊपर ए रूप कड़ा शासन किंतु श्री माय शज हो तो ना मातृत्व के ऊपर में इस तरह का कठिन अनुशासन परंतु मां को सहन होता नहीं था अत ए त बालक भक्त दिग के ताहा देर खुदार अनुपाते ठाकुर निर्धारित परिमाण अपेक्षा अधिक खते दतेन इसीलिए वह बाल बालक भक्तों को उनकी भूख के अनुसार ठाकुर ने जो निर्धारित परिमाण कहा था इसको इतनी उसको इतनी उससे भी ज्यादा अधिक रोटी खाने को देती श्री रामकृष्ण एक दिन श्रीजुक्त तो बाबूराम के जिज्ञासा कोरिया जानी ले जे तीन रात्रि पांच छ खानी रोटी खया थाके ठाकुर ने एक दिन बाबूराम को भविष्य के स्वामी प्रेमानंद को पूछा और पूछ के उनको पता चला कि वह रात को पांच छह रोटी खाते हैं। उनके लिए कितना बंदोबस्त कर दिया था। ठाकुर ने रेशन कर दिया था। तो बाबूराम के लिए बाबूराम महाराज के लिए कितना रेशन में आता था तो चार रोटी आती थी। तो चार की वजह वो पांच छह रोटी खा लेते थे। आर ए अधिक खावान और जन श्रीमाई दाई और यह जो अधिक करके खिलाने के लिए जिम्मेदारी तो मां की ही थी उसके पीछे में मां का ही हाथ था सुतरा तनी श्री माय निकट जया अनुजग को ले जनी ए रूप विवेचना हीन स्नेह द्वारा बालक दे भविष्यत नष्ट करते छे इसी वजह से उन्होंने ठाकुर ने श्री मां के पास में जाकर करके कंप्लेन की अनुयोग किया कि वह इस तरह की विवेचना हीन स्नेह विवेचना अर्थात कि सोचा समझा और बिना विवेचना हीन अर्थात कि बिना सोचे समझे हुए स्नेह के माध्यम से इनडिसक्रिमिनेट लव जिसको कहते हैं विवेचना हीन स्नेह के माध्यम से मां बालकों का भविष्य नष्ट कर रही है। इतनी बड़ी बात उन्होंने ठाकुर ने मां को कह दी तो फिर मां तो चुप नहीं रहने वाली है। जहां तक खुद की रोटी का प्रश्न था तो बेचारी ने सब कुछ चुपचाप सुन लिया। किंतु अभी तो यहां पे अपने बच्चों के लिए रोटी का प्रश्न है। तो यहां पे तो मां चुप नहीं रहेगी। इहार प्रतिबादे श्री मा बोली ले इसके प्रतिवाद में इसके प्रति म विरोध में देखिए गंभीरानंद जी इसके उत्तर में ऐसा शब्द नहीं यूज करते हैं इसके विरोध में इस तरह का शब्द यूज करते हैं प्रतिवाद में यह शब्द यूज करते हैं मां सिंपल उत्तर भी दे सकती थी किंतु सिंपल में सहज रूप से उत्तर नहीं देकर के विरोध के टोन उनका जो बात करने का जो ढंग है जैसे कि ठाकुर की बात का विरोध कर रही है। इस तरह से मां ने कहा उत्तर दिया वह दुखानी रोटी बेशिक खले तुम यह तो भाप छो के नो वो दो रोटी ज्यादा खाई है उसने बोलकर के तुम इतनी चिंता क्यों कर रहे हो देखिए तुम्ही अपनी नहीं मां और ठाकुर का कितना सुंदर संबंध है ठाकुर मां को कभी तूई नहीं कहते थे अर्थात कि वो बंगाली में पता है ना अपनी तुम्ही तू अर्थात कि आपनी अर्थात कि आप तमी अर्थात कि तुम और तू अर्थात कि तू जैसे छोटा छोटा बच्चा होता है उसको बोलेंगे क्या कर रहा है तू और फिर कोई अपना जो समवयस्क होगा बंधु होगा उसको हम कहेंगे तुम क्या कर रहे हो और कोई वृद्ध होगा वल होगा तो उनको कहेंगे आप क्या कर रहे हैं तो फिर यह ठाकुर कभी यूजुअली ऐसा कभी-कभी जनरली होता ही होगा कि पति जो है अपनी पत्नी को इस तरह से तूई करके पुकारता होगा किंतु ठाकुर मां का इस तरह से अपमान कभी नहीं करते थे तुम ही कहते थे तू कभी नहीं कहते थे और मां भी ठाकुर को बिना मतलब सर के ऊपर में चढ़ा करके नहीं बैठती थी कि सब समय अपनी आप आप ऐसा नहीं तुम्ही यानी कि दोनों एक दूसरे को तुम ही करके पुकारते हैं तुम करके पुकारते हैं वि इज वेरी इंटरेस्टिंग तो मां ठाकुर को एकदम मुंह पर बोल देती है वो दो रोटी ज्यादा खाई है बोलकर के तुम इतना चिंता क्यों करते हो तादेर भविष्यत आमी देखो उनका भविष्य मैं देखूंगी तुम ओदे खानी ये केनो गालागाली करो ना तुम उन लोगों का खाना उनके खाने की बात लेकर के किसी भी तरह की गालागाली मत करो ठाकुर का भी म लगता है यहां पे भी जाकर के यहां पे तो देखिए गंभीरानंद जी तो संस्कृत में सब लिखते हैं ना इसलिए उन्होंने संस्कृत में लिखा है कि तुम विवेचना हीन स्नेह के माध्यम से बच्चों का भविष्य बिगाड़ रही हो। यह पूरा संस्कृत भाषा हुई। किंतु मां जब उत्तर देती है तो मां स्पष्ट कहती है कि तुम किसी भी तरह की गालागाली मत करो। अभी मां के उत्तर से हमको ऐसा लगता है कि ठाकुर ने जाकर के मां के साथ में वही ग्राम्य भाषा का उपयोग किया होगा जिसको कि गंभीरानंद जी ग्राम्य भाषा कहते हैं। अर्थात कि गालागाली की होगी। तो मां ने स्पष्ट उत्तर दे दिया तुम ओदे खाबानी कोनो गालागाली करो ना। तुम उनका खाने की बात लेकर के किसी भी तरह की गालागाली मत करो। जब ऐसा मां ने स्पष्ट बोल दिया तब क्या हुआ? श्री रामकृष्ण आर ध्वप्त ना कोरिया मने मने सर्व विजयनी मातृत्व शक्ति के सनान प्रदर्शन पूर्वक तखनेशित बदने शेषान होते विदाई ले लेन ठाकुर ने और कोई बात ना करके द्वक्ति अर्थात कि दूसरी कोई उक्ति उसको न बोल करके मन में ही मन में सर्वविजयनी मातृत्व शक्ति किस तरह की मातृत्व शक्ति जो कि सब तरह के विरोध के ऊपर में विजय प्राप्त करती है। सब तरह की निंदा ईर्ष्या द्वेष के ऊपर में विजय प्राप्त करती है। इस तरह की सर्व विजयनी मातृत्व शक्ति को सना प्रदर्शन पूर्वक ऐसे वैसे नहीं स्मान प्रदर्शन पूर्वक उसी समय स्मित वद ने वहां से विदाई ली। अभी यहां पर तो गंभीरानंद जी ने लिखा है कि उन्होंने ठाकुर ने स्मित वदन अर्थात कि हंसते-हंसते विदाई ली थी। किंतु मुझे लगता नहीं कि ठाकुर वहां पे से हंसते-हंसते गए होंगे। छोटा बच्चा जब मां के साथ में झगड़ा करता है और मां जब बच्चे को डांटती है तो बच्चा कैसे ही अपना मुंह ऐसा बड़ा ही यह करके वो वहां से मां के बारे में बोलना तो कुछ चाहता है सामने उत्तर तो देना चाहता है किंतु मां के भय से मां के डर से वह बोल नहीं पाता है तो मन में ही मन में मां को कुछ ना कुछ बोलता हुआ वहां से जैसे विदाई लेगा मुझे लगता है कि ठाकुर वैसे ही वहां से निकले तो होंगे कि अब देखो कि मां ने अब सब यह चार्ज ले लिया। अभी बच्चों को अपने कंट्रोल में कर रही है। मैं वह बच्चों का भविष्य सुधारना चाहता हूं। तब वह विवेचना हीन मातृत्व अर्थात कि अपनी मातृत्व शक्ति से बच्चों का भविष्य बिगाड़ रही है। पता नहीं बच्चों का क्या होगा। ऐसा कुछ ना कुछ सोच के नाराजगी पूर्वक ठाकुर वहां से गए होंगे। किंतु देखिए गंभीरानंद जी ने जो लिखा है स्मित वदन है वो गलत नहीं है। क्यों गलत नहीं है? ठाकुर का यह जो बचपना है, ठाकुर का यह जो बालक भाव है, वह तो एक मुखौटा ही तो था। वह तो एक लीला का ही एक था। जब ब्राह्मण जब अब जैसे कि नेति नेति करके ब्रह्म साक्षात्कार होगा बोलकर के अभी क्या हुआ कि जितना भी काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर जो कुछ भी है वह तो कितना कहीं वह तो अदृश्य हो गया। किंतु जब आप इति इति करके वापस आना चाहते हैं तब आपको रजस और तमस का एक अंश तो धारण करना ही होगा। इसके बिना तो देह धारण संभव ही नहीं। इसीलिए यह जो परमहंस होते हैं, वह बालकवत, पिशाचवत, जड़वत इस तरह का आचरण करते हैं। तो यहां पर भी ठाकुर का तो बालक भाव है। हम सबको पता है। तो ठाकुर ने बालक भाव में आकर के नाराजगी जताते जताते शायद वहां से प्रस्थान तो किया होगा। किंतु भीतर का जो ब्रह्म भाव है वह ब्रह्म भाव हमेशा वह मां के इस तरह से मातृत्व शक्ति की उद्दीपना से मातृत्व शक्ति के स्फुरण से वो ब्रह्म भाव अवश्य वो खुश हुआ होगा। ब्रह्म भाव ने अवश्य वहां से स्मित वद ने विदाई ली होगी। तो किंतु देखिए इनकी लीला इतनी सुंदर है। दो लेयर है। एक तो है कि हमारी नजर के सामने एक मधुरता पूर्ण जैसे कि छोटी-छोटी सांसारिक चीजों को लेकर के हस्बैंड वाइफ में कभी-कभी होता है। हमने तो अपने घर में सभी के घर में देखा ही है। अपने ही मां-पिताजी को देखा है। हस्बैंड वाइफ या मां-पिताजी में 100% सभी चीजों के ऊपर में वो एक ही तरह का उनका ओपिनियन हो। यह तो संभव ही नहीं। कहीं ना कहीं आर्गुममेंट वगैरह होती ही है। तो जो हमने घर में देखा है वही चीज हम ये ठाकुर और मां में देखते हैं। वही बात है कि यह जो ठाकुर और मां का जो यह मधुरता पूर्ण यह मीठा झगड़ा जो था यह पूरा ऊपर ऊपर से था। भीतर में तो मां है नारायणी ठाकुर है नारायण और यह जो त्यागी संतान है वह कहीं कोई अर्जुन का अवतार है तो कहीं कोई यह नर ऋषि है ना कि कोई कहां से आए हैं शिव का अवतार यही तो सब आए थे राम अवतार में जो बंदर थे शिव अवतार में जो भूत थे वही आज यह बंदर और भूत यह डायरेक्ट डिसाइपल के रूप में आए हैं। तो 10 रोटी खाएं ना कि एक रोटी खाएं इससे फर्क कुछ नहीं पड़ता है। किंतु देखिए कि हमारे हृदय की तृप्ति के लिए यह पूरी लीला इन्होंने रची है। तो फिर जब मां ने ऐसा कहा तो फिर ठाकुर ने और कुछ नहीं बोल के वहां से विदा ली। श्री मां श्वेच्छाय श्वय भावी कर्म क्षेत्र प्रवेश करते छ देखिया ठाकुर निश्चय से दिन आनंदित होइया छिलेन मां अपनी इच्छा से अपने भावी कर्म क्षेत्र में प्रवेश कर रही है देखकर के ठाकुर निश्चय उस दिन आनंदित हुए थे। देखिए यह जो छोटी-छोटी घटनाएं मां को तो ठाकुर ने इतना यह सब लज्जा के पार्ट में आवृत्त होकर के जो रखा था वही जब लज्जा का यह जो आवरण है उसमें से बाहर आकर के अब ऐसा नहीं कि लज्जा को छोड़कर के किंतु वह जो कुछ चंद लोकों तक सीमित थी मां की लीला वह जनसाधारण तक जब पहुंचती है मां का मातृत्व तब किस तरह की कहानी कहानियां वही यह वृद्धा महिला की कहानी जिसका वैसे तो मां के साथ में कोई रिलेशन नहीं है। इसके बावजूद मां उसने जब बिगाड़ा है तो पूरा अपने हाथों से साफ करती है। वही त्यागी संतान मां को पहले खाना खिलाना चाहते हैं। किंतु मां जब तक बच्चे खाते नहीं है। मां स्पष्ट कहती है कि तुम लोगों ने खाया नहीं है बोलकर के मेरा खाना मेरे गले के नीचे नहीं उतर रहा है। तो यह मातृत्व जो उसकी चरम सीमा पर जाकर के वह प्रकाशित हुआ था वह कार्य क्षेत्र में मां ने प्रवेश कर दिया है। बच्चों का भविष्य अपने हाथ में लेकर के तो ठाकुर इस बात से अवश्य वो आनंदित हुए होंगे कि मां ने अपने भाविक पर कर्म क्षेत्र में प्रवेश अपनी इच्छा से करना शुरू किया है। ठाकुर ने मां को प्र्प नहीं किया कि तुम इस तरह से बच्चों के भविष्य का जिम्मा अपने हाथ में लो। या तो फिर हो सकता है देखिए ठाकुर तो चालाक भी तो बहुत थे ना। तो हो सकता है कि ठाकुर को मां की साइकोलॉजी समझ में आई होगी कि जब तक यह अपने मातृत्व के इलाके में हाथ नहीं डालेंगे मां के तब तक मां जो है शायद बच्चों का भविष्य अपने हाथ में ना ले। तो हो सकता है कि इसीलिए ठाकुर ने कैलकुलेशन करके प्लान करके यह सब त्यागी संतानों को मां के पास में भेजा होगा रात का खाना खाने के लिए और सब प्लान करके ही प्रीप्लांड उन्होंने मां को यह सब कहा होगा कि इसको छह रोटी इसको पांच रोटी इसको चार रोटी पता ही होगा कि मां किस तरह से रिएक्ट करेगी तो जिससे जिससे कि मां इस तरह से रिएक्ट करें कि जिससे कि वह बच्चों का भविष्य अपने हाथ में ले तो हो सकता है ठाकुर ने प्लान भी किया होगा। हो सकता है कि यह सब और वैसे तो पता ही तो है कि ठाकुर को प्लान करने की वैसे अपने से ऐसी कोई जरूरत नहीं थी। वैसे तो मां काली ही सब ठाकुर और मां के माध्यम से सब कार्य करवाती थी। तो मां काली का प्लान हो। कैसे भी हो देखिए अनंत संभावनाएं हैं। जितना चिंतन करेंगे उतना ही इसमें से मधुरता पूर्ण यह भाव निकलता ही रहेगा। किंतु बात वो जो गंभीरानंद जी आखिर में जो कहना चाहते थे मां के मातृत्व का प्रकाश जो है वह धीरे-धीरे ठाकुर के रहते-रहते ही प्रारंभ हो गया था। अभी और एक कहानी योगिन

योगिन माँ की भक्ति: माँ सारदा के प्रति प्रेम और समर्पण का उज्ज्वल उदाहरण

मां की कहानी पूजनीया जोगिन मार प्रदत्त विण होते जाना जाए जे श्री मां आपना होते स्त्री भक्त दिग के आत्मीय बोधे ग्रहण करते पूजनीय योगिन मां के द्वारा दिए गए विवरण से जाना जाता है कि श्री मां अपने से ही स्त्री भक्तों को आत्मीय बोधे ग्रहण करती अर्थात कि वह उनकी अपनी है। इस तरह से मां ठाकुर के पास में आई हुई स्त्री भक्तों को प्रेम और सहानुभूति देती एवं तद दर्शने ठाकुर विशेष प्रीत होइते और उसको देखकर के उसका दर्शन करके ठाकुर विशेष रूप से आनंदित होते विशेष रूप से प्रीत होते भक्ति मती जोगिन मा जे दिन प्रथम दक्षिणेश्वर जान से दिन आहार होई नहीं शून्य ठाकुरता कहां के नबते पाठया दिल भक्तिमती योगिन मां जिस दिन प्रथम दक्षिणेश्वर में गई थी उस दिन उसका उनका आहार हुआ नहीं था सुनकर के ठाकुर ने उनको नहबत में भेज दिया था शेखा ने भात तरकारी से खाओगे और क्या कहा था वहां पर भात और सब्जी है जाकर के खाओ श्री मां अमनी भात लुची तरकारी प्रवृति जहां छिलो ताप होस्ते खिप्रो हो शो जोत ने तहा के खव ने माने साथसा में ही भात पूरी तरकारी वगैरह जो कुछ भी था वह क्षिप्र हस्ते अर्थात [हंसी] कि बड़े ही एफिशिएंटली और क्विकली उनको सयत्ने यत्न पूर्वक उनको खिलाया श्री प्रथम दर्शने श्री माय शंगेता तहार खूब घनिष्ठता होइया गेलो लो यही प्रथम दर्शन से ही उनका मां के साथ में बहुत ही घनिष्ठता हो गई। उहा एतो गंभीर छिलो किु दिन परेश श्री मां जखन रामलाल दादा विवाहो पलखे देश जय बार जन नौका उठलेन तखन जोगिन मा जतोण नौका देखा जाए ततोण शेदी के चाहििया रो रही वह घनिष्ठता इतनी गंभीर थी कि कुछ दिन के बाद मां जब रामलाल दादा के विवाह उपलब्ध देश जा रही थी कमारपुकुर जा रही थी और जाने के लिए नौका में उठी। उस समय योगिन मां जितनी देर तक नौका दिखा दी थी दिख रही थी तब तक उसकी ओर देख रही थी एवं और नौका अदृश्य होया गले कादिया भाषाई ते लागी लेन और जब नौका अदृश्य हो गई तब आंसुओं से उनका चेहरा भर गया श्री रामकृष्ण ताहा के ओई रूप अवस्थाएं देखिया शांतना दिलन योगिन मां रो रही है, रो रही है। तो ठाकुर ने जब उनको इस अवस्था में देखा तो उनको सांत्वना दी। एवं यथाकाले श्री मां फिरिया आशीले बोलीले और जब मां वापस आई कामार पुकुर से तब ठाकुर ने मां को कहा से जे डागर डागर चौक मेटी आशे से तोमा के खूब भो वाशे वह जब बड़े-बड़े नेत्र नयन वाली जो लड़की आती है वह तुमको बहुत ही प्रेम करती है तुमको बहुत ही स्नेह करती है योगिन मां के बारे में ठाकुर मां को बोल रहे हैं तुम ही जाबद्दीन से नोबोते बोशे खूब कह दे छिलो जिस दिन तुम गई थी यहां से उस दिन वह नहबत में बैठकर के बहुत रोई थी मां बोली लेन हां तार नाम जोगेन मां ने कहा हां उसका नाम है योगेन जोगिन मां ऊपर माय एतो विश्वास भो भाषा छिलो जे प्रति विषय तहार परामर्श लतेन योगिन मां के ऊपर में मां का इतना विश्वास और स्नेह था कि सभी विषयों में मां उनका का परामर्श लेती उनकी सलाह लेती योगिन मां ता केश बंधन करिया दिलेले उहा तीन चार दिन परे ओ स्नानेर समय खुली देना योगिन मां जब मां के केश जो है बाल जो है वह जब बांध देती उस समय त्रती दिन तक स्नान के समय भी मां उस बालों को खोलती नहीं बोली ते ना वो जोगेनेर बांधा चूल कहती अरे नहीं यह बाल तो मेरे जो है उसने गांथ दिए हैं योगेन ने से जे दिन आशबे से दिन खुलबो मैं अपने बालों को जिस दिन योगेन आएगी उसी दिन मैं खोलूंगी

पान बनाने की वह कहानी—जब माँ सारदा ने कहा: “भक्तों को जोड़ना है, ठाकुर तो अपने ही हैं”

जोगिन मां एक दिन देख लेन श्री मां कतगुली पान शुधु चू सुपारी दिया शालेन एक दिन योगिन मां ने देखा कि मां कुछ पान जो है बना रही है और पान में क्या किया है कुछ पान में सिर्फ चू चुना और सुपारी लगाया है और इस तरह से बनाया है एवं कतगुली भालोकरिया शालेन और जो कुछ पान थे उसको अच्छे से सजाया अर्थात कि ज्यादा मसाला डाला होगा दो तरह के पान मां बना रही है एक पान में सिर्फ चूना और सुपारी लगाया है दूसरे पानों में सब एक्स्ट्रा मसाला लगाया है तीन जिज्ञासा कोर ले योगिन मां ने पूछा ये तो गुली मसला इलाज दिल ना माने ए गुली ते मसला इलाज दिल ना यह जो पान है उसमें मसाला है इलायची है वह सब दिया नहीं वही गुलीकार एगुलीबाकार माने जिसमें वो जो सिंपल पान बनाया है वह किसका है और यह जो मसाला इलायची जिसमें डाला है वह पान किसके है मां उत्तर दिलन मां ने कहा जोगेन एगुली अर्थात भालो गुली भक्तो देर यह जो अच्छे से जो पान सजाया है मसाला इलायची डालकर के यह पान है भक्तों के लिए ओदेर आमा के आदर जत्नो करे आपनार करे नित होवे भक्तों को हमको आदर यत्न पूर्वक हमारे अपने बनाने होते हैं आर एगुली अर्थात कि यह जो सामान्य पान है मसाला इलायची नहीं डाले हैं और जन अर्थात कि ठाकुर के लिए उन्हीं तो अपना रा तो हमारे अपने है ही देखिए ये कितनी गहन बात है कोई भी स्त्री अपने पति के लिए यदि कुछ भी बनाएगी तो वह बेस्ट ऑफ द बेस्ट ही बनाएगी। फिर आने वाले गेस्ट के लिए फिर जो बाकी का जो कुछ बचा होगा वह उनके लिए होगा। तो यह एक सामान्य स्त्री की बात है। और मां और ठाकुर का जो स्नेह, प्रेम, श्रद्धा एक दूसरे के प्रति भक्ति वो तो कहां वो तो उर्ध्व वह तो विराज कर रहा था। तो हम तो सहज रूप से अनुमान लगाएंगे कि ठाकुर के लिए मां जो कुछ भी बनाएगी इट वुड बी द बेस्ट ऑफ द बेस्ट। जो सर्वश्रेष्ठ होगा वही तो ठाकुर को अर्पण करेगी। बाद में भी देखिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में भी जब ठाकुर को मां भोग लगा रही है तो भी वो सर्वश्रेष्ठ खाना जो है वो पूरा शुद्ध है। निर्मल है। वही तो ठाकुर को अर्पण किया जाएगा ना। एक लड़का जय राम भाटी की ही बात है। एक दिन वह ठाकुर को अर्पण करने के लिए ठाकुर के सामने रखने के लिए कुछ पद्म फूल लेकर के आ रहा था। तो यह लड़का जब आ रहा था उसने रास्ते में एक साधु को देखा। अब मां के साथ में तो बहुत सारे त्यागी संतान रहते थे। तो इसी तरह से यह महाराज भी मां के साथ में रहते होंगे। तो यह लड़का जो कि पद्म फूल ले आ रहा था। उसने जैसे ही साधु को देखा तो दोनों हाथ उठाकर के ऐसे साधु को प्रणाम किया। अभी उसके हाथ में पद्म फूल है और पद्म फूल वाले ही हाथ से उसने साधु को प्रणाम भी किया। अब मां यह पूरा दृश्य देख रही थी। तो यह लड़का जब आकर के मां को पद्म फूल देकर चला गया तब वह साधु जब वापस आया मां के पास में तो मां ने कहा कि यह पद्म फूल जो है वो ठाकुर को ऑफर मत करना। क्यों? क्योंकि इसी पद्म फूल वाले हाथ से उसने तुमको प्रणाम किया है। अर्थात कि पद्म फूल जो है अभी झूठे हो गए हैं। वह भी वह ठाकुर को देने के लिए उपयुक्त नहीं है। तो उसको अभी ठाकुर को मत देना। देखिए कि इतनी छोटी-छोटी बातें भी ठाकुर के बारे में मां इतना सतर्क रहती थी। ठाकुर की सेवा, ठाकुर की पूजा उस सब के बारे में। उसी ठाकुर को मां इस तरह से करती है कि अच्छा वाला पान जो है वह भक्तों को देना है जिससे कि भक्त हमारे अपने हो जाए और ठाकुर को यह सब सामान्य पान है वह देने से चलेगा क्यों? क्योंकि ठाकुर तो अपने है ही है। देखिए मां की यह जो ठाकुर के प्रति श्रद्धा भी है एक और। दूसरा कि ठाकुर को कितना वो अपना खुद का वो मानती है। जैसे कि ठाकुर उनके संतान है। मां उनकी जननी है। अब जैसे एक कहानी है जय राम भाटी जा रहे थे। क से और बैलगाड़ी में अभी क्या है वहां पे तो बैलगाड़ी से जाना वो वो तो लंबा रास्ता है दो-तीन दिन की जर्नी है आजकल की तरह नहीं बादबाद में भी यह ट्रेन वगैरह हो गई थी यह अर्ली डेज की बात है तो ठाकुर की महासमाधि के बाद की ही तो अभी यह त्यागी संतान है कुछ और कुछ भक्त वगैरह है मां भी है बैलगाड़ी में जा रहे हैं और रास्ते में अभी रुकना पड़ा क्योंकि भोजन भी तो करना है तो एक वहां वहां पे चोटी अर्थात कि एक एक उसके जैसा था। हट जैसा था। झोपड़ी जैसा था। अभी ये जो झोपड़ी वगैरह होती है वो रास्ते में बनाई जाती है। जैसे कि ये मुसाफिर जो होते हैं वहां पे विश्राम कर सके और अपने से खाना बना के खा पाए। यह होटल वगैरह ऐसा तो इतना था नहीं ज्यादा। तो यह चोटी अर्थात कि यह जो झोपड़ी जैसा था वो हट जैसा जो था वहां पे उसके सामने सब खड़े रहे। बैलगाड़ी में से सब भोजन बनाने का सामान निकाला। वह चूल्हा जलाया गया। लकड़ियां वह जो सूखी लकड़ियां है उसका जुगाड़ किया गया। अग्नि प्रज्वलित करके चूल्हा जला करके उसके ऊपर में वह हांडी रखी गई। तो उस समय तो यह सब मिट्टी के बर्तन होते थे। तो मिट्टी का बड़ा सा हांडी उसके भीतर में पानी डाल के चावल को सिद्ध करने के लिए वो बॉईल करने के लिए रखा गया। अब जैसे चावल का राइस भात हो गया तो वैसे ही वो हांडी वो जो लकड़ियां जल रही है उसके ऊपर में से निकालने के लिए उसको उठाया गया। किंतु अब यह तो सब मिट्टी के बर्तन है ना उसका तो कोई कुछ ठिकाना है नहीं। तो जैसे ही उस हांडी को उठाया गया वैसे ही हांडी टूट गई और जितना भी भात था पूरा जमी मिट्टी में बिखर गया। तो अभी सभी लोग बेटे तो एकदम यह हो गए किंग कर्तव्य विमूढ़ जो शब्द यूज किया है अर्थात कि अवाक हो गए माने एक कंप्लीटली स्टंट इंग्लिश शब्द है स्टंड अभी क्या करें जो खाने के लिए भात बनाया था भात ही पूरा मिट्टी में बैर बिखेर हो गया मिट्टी में गिर गया तो अभी क्या खाएंगे क्या करेंगे लंबा जर्नी है भूख तो लगी है और ऐसा नहीं है कि खाने का इतना सारा सामान है और वगैरह-वगैरह तो सब सब लोग बेचारे खड़े थे। क्या करें, क्या ना करें समझ में नहीं आ रहा था। उस समय मां ने क्या किया कि एक लकड़ी ली एक दूसरी लकड़ी और उसकी मदद से यह उपभात जो था ऊपर ऊपर से सब कलेक्ट करना शुरू किया। एक पात्र में रखा और फिर उस पात्र में से ही भात के तीनचार दाने जो है मां के साथ में एक डिब्बा रहता था छोटा। जब मां इस तरह से यात्रा करती थी तो ठाकुर के जिस फोटो की ठाकुर की जिस अस्थियों की मां पूजा करती थी उस एक डिब्बे में रखती थी बॉक्स में रखती थी तो वो बॉक्स खोल करके ठाकुर के फोटो को सीधा रख के वही जो भात जमीन पर गिरा हुआ था जिसको कि ऊपर ऊपर से नीचे का भात जो है उसको तो मिट्टी लग जाएगी किंतु ऊपर में जो भात होगा उसको ले ले करके कलेक्ट करके जो मां ने सेपरेट रखा था उसमें से भात के तीन-चार दाने माने ने वो डिब्बे में जो बॉक्स में जो ठाकुर रखे हैं उनके सामने रख दिया और कहा शिगिर शगिर खे रूपी मेपेज हो ए रकम ही मेपेज हो अर्थात जल्दी-जल्दी खा लो आज तुमको यही मिलने वाला है ऐसा बोल के वो जो मिट्टी में पड़ा हुआ भात निश्चय उसमें मिट्टी नहीं लगी है किंतु फिर भी वो जमीन पर गिरा हुआ भात के तीन-चार दाने ठाकुर को ऑफर किए और फिर उसी पात्र में से मां ने कहा चलो सब लोग आकर के एक साथ में बैठ जाओ एक पात्र में से खाओ तो देखिए कि ठाकुर के प्रति मां का श्रद्धा प्रेम स्नेह सब कुछ है। साथ-साथ में ही जो प्रैक्टिकल जो है सेंस ठाकुर की सेवा में कहीं ठाकुर की सेवा करते-करते दूसरों को कष्ट ना हो। ठाकुर की सेवा करते-करते यह प्रैक्टिकल सेंस ना कहीं चली जाए। इंप्रैक्टिकल कहीं ना हो जाए। यह सब भी मां की तीक्षण दृष्टि यह सबके ऊपर में थी। इसके बाद की बातें जो है अभी हमारे नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: जब ठाकुर को कैंसर हुआ था, तब माँ काली ने उनसे कहा—“तुम इतने लोगों के मुँह से खा रहे हो," उसी प्रकार माँ अपने संतानों के मुँह से खाती हैं। यही तो सर्वोच्च अद्वैत वेदांत है!

वाह ये बड़ा सुंदर पैरेलल [हंसी] वाह किंतु यहां यहां पे एक बात है आपने जो कहा ठीक ही कहा कि ठाकुर और स्वामी जी उनके लिटरेचर में जो अद्वैत जो है जो कि हमको फिलॉसोफिकली और हमको जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है मां के जीवन का एनालिसिस करके हम यह नहीं कहेंगे कि ये मां का अद्वैत भाव है। हम कहेंगे मां का मातृभाव है। किंतु मां के मातृभाव में जो हमने अद्वैत भाव देखा, वह तो ठाकुर और मा स्वामी जी को पढ़कर के ही तो समझ में आया। यहां पे देखिए भारत में हमेशा से प्रॉब्लम क्या होता रहा है। स्वामी जी ने स्पष्ट कहा। हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफी बट द वर्स्ट ऑफ द इंप्लीमेंटेशन। जो स्वामी जी ने कहा कि और कोई देश नहीं है कि जिसने इतनी भव्य फिलॉसोफी सिखाई हो। और ऐसा कोई देश नहीं है जिसने कि मानवों का गला घोट करके लोगों पे इतना अत्याचार किया हो। ये दोनों भारत में है तो अद्वैत या तो ये हायर फिलॉसोफी इसके प्रति एक तरह का जो रेबेलियन जो है जो कि बादबाद में हमको ये आंबेडकराइट मूवमेंट है और इवन उस समय भी बुद्धिज्म बुद्धिज्म वो क्या था कि बहुत बड़ी-बड़ी बातें तो करते हो तो प्रैक्टिकल में क्या है आप लोगों के पास में? सो वो जो एक रेबेलियन जो भारत में आया जैनिज्म बुद्धिज्म बोथ वेर द रेबेल्स अगेंस्ट दिस वैदिक परंपरा। तो वही रेबेलियन बाद में ये कम्युनिज्म जो है ये अंबेडकराइट मूवमेंट जो है अभी ये दलित लोगों की जो मूवमेंट है बार-बार हमको यही दिखता है कि इतनी हाईएस्ट फिलॉसोफी है प्रैक्टिकल कहां है आपका सो यहां पे हमको दोनों चीजें मिलती हुई कब दिखती है जब हम ठाकुर और स्वामी जी को पढ़कर के पहले तो फिलॉसोफी समझेंगे। ये फिलॉसोफी हम समझते ही नहीं। इवन मेरा एक हो गया था एक कम्युनिस्ट माइंडसेट बन गया था मेरे स्टूडेंट डेज में कि मैं इंडियन फिलॉसोफी यानी कि लोगों का शोषण करने वाली फिलॉसोफी ऐसा ही मेरे माइंड में बैठ गया था ठाकुर और स्वामी जी को पढ़ा तभी तो उसकी ग्रेटनेस समझ में आई और फिर जब मां को पढ़ा तब ये उसका उसका जो नेक्स्ट स्टेप है प्रैक्टिकल एप्लीकेशन वो समझ में आया। सो ठाकुर और स्वामी जी आर सॉर्ट ऑफ ए गेटवे उनको आप ठीक ठीक समझेंगे तभी मां की महिमा ठीक समझ में आएगी। अदरवाइज मैंने जब मां को पहली पहली बार पढ़ा था मुझे ऐसा एकदम बोरिंग लगता था यह ठीक है क्या है वो आओ बैठो खाओ इसमें है क्या

प्रश्न: स्वामीजी का संदेश है कि वेदांत को वनवास से निकालकर दुनिया के कर्मक्षेत्र में ले जाना चाहिए। माँ का पूरा जीवन इसी सिद्धांत की जीवित प्रतिमा है। इसलिए स्वामीजी और माँ को साथ पढ़ना अत्यंत आवश्यक है।

और वो भी डायरेक्टली जो दिखता है वो डोमेस्टिक लाइफ में दिखता है। समथिंग वी नेवर एसोसिएट विद वेद वेदांत कि हां घर छोड़कर के वही गिरी कंदराओं में चले जाओ तभी वह वेदांत आएगा। माने गिरी कंदराव से वेदांत को जो यहां पे लाया है इसी पर्पस के लिए लाया गया है कि हमको खींच करके गिरी कंदराओं में ले जाए। [हंसी] वो [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] जो चंद्रामणि देवी को डर लगता था ना ये जो साधुओं के साथ में मिल रहा है बालक गदाधर और साधु लोग उसको कहीं भगा करके ना ले जाए। [हंसी] ये हम जितना एनालिसिस करेंगे ना देखिए चंदन का लकड़ी जितना घिसेंगे ना उतना खुशबू आएगा। तो इस सब कहानियों का भी ऐसा है। एक बार पढ़िए फिर उसके ऊपर में चिंतन कीजिए और स्मरण मनन निधिद्यासन क्या है? हम लोग कहां वो महावाक्य विचार करने को जाएंगे कि मैं देह नहीं, पंच ज्ञानेंद्रिय नहीं, पंचकर्मेंद्रिय नहीं। किससे होता है यह सब? किंतु यह मां की कहानियों पर स्मरण मनन निधिद्यासन कीजिए। देखिए वो आनंद मतलब इंटरप्रिटेशन भी इतने आएंगे और आनंद भी इतना आएगा। यह मिश्री की बात से कहानी याद आई। यह बाबूराम महाराज को ही शायद पेट खराब था तो मां ने उनको यह साकर का पानी पीने के लिए दिया। तो ठाकुर ने देख लिया तो ठाकुर ने जाकर के फिर मां को कहा अरे इनको तो साधु होना है। तुम यह सब बेड हैबिट क्यों लगवा रही हो कि पेट खराब हो गया तो साकर का पानी भविष्य में तो साधु होंगे। उनको कुछ मिलने वाला नहीं। तो यह सब बेड हैबिट मत लगाओ। तो मां कहती है वह सब चिंता मैं करूंगी। तुमको करने की जरूरत नहीं है। इसीलिए तो मां ने फिर वो वो वहां पे बोधगया गई थी। देखा कि बौद्ध भिक्षु लोग अच्छे से वो मठ वगैरह में रहते हैं। तो मां ने फिर तो इसीलिए तो प्रार्थना की थी कि इन लोगों के लिए रहने खाने के लिए तो कुछ व्यवस्था करो ठाकुर। देखिए ठाकुर और स्वामी जी की जो पूरी फिलॉसोफी है ना उसका पूरा प्रैक्टिकल मां ने किया है। और दूसरा कि डोमेस्टिक सेटअप में किया है व्हिच इज इवन मोरेंट। हम लोग अब पुरुष लोग हैं घर छोड़ के निकल जाएंगे। अभी शिव ज्ञान है जीव सेवा गांवगांव जाओ ये मुक्ति का संदेश फैलाओ उपनिषद का संदेश फैलाओ वो एक चीज हो गया अब घर के बाहर निकल कर के आप अपने से स्ट्रगल कर रहे हैं जैसे युद्ध क्षेत्र में वो एक चीज हो गया घर में रह के करके दिखाइए तो एक तो पता चले ना फैमिली सेटअप में आप करके दिखाइए ओम