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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 20 Aug 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी की जीवनी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं। ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह से कल गंभीरानंद जी कह रहे थे कि ठाकुर रंग रस के माध्यम से हास्य विनोद के माध्यम से ह्यूमर के माध्यम से कभी-कभी मां का यह जो जगत जननी का रोल है भविष्य में जो रामकृष्ण संघ के गुरु पद पे गुरु की पदवी पर उनको आरूढ़ होना है। उस रोल के लिए मां को तैयार करने के लिए भक्तों को बताने के लिए, भक्तों को सिखाने के लिए कि मां की यह महत्ता है। ठाकुर कभी-कभी हास्य विनोद का ह्यूमर का भी सहारा लिया करते थे। तो कल तो हमने एक कहानी ऑलरेडी देख ली। गंभीरानंद जी हमको दो उदाहरण देने वाले थे। एक उदाहरण देखा कि किस तरह से गौरी मां एक बार मां के साथ में बैठी हुई थी नबत में। ठाकुर वहां पर आए नबत के सामने खड़े रहकर के गौरी मां को पूछते हैं कि तुमको कौन ज्यादा पसंद है? तुम किसको ज्यादा श्रद्धा और प्रेम करती हो मुझे कि मां को? तो इस तरह का धर्म संकट में डालने वाला प्रश्न जब गौरी मां को किया गया तो गौरी मां ने भी बड़ी ही चतुराई से उसका उत्तर दिया। राई होते तुम्ही बोड़ो नो हे बांका बंसीधारी लोकेर विपद होले डाके मधुसूदन बोले तोमार विपद होले परे बांशी ते बोलो राई किशोरी तुम राई अर्थात कि राधा रानी से बड़े नहीं हो हे बांके बंसीधारी जब लोगों को विपद होती है तो वह लोग पुकारते हैं मधुसूदन बोल के किंतु तुम्हारे सर पर जब विपद आन पड़ती है तब बांसई में बंसूरी में सूर छेड़ते हो राई किशोरी बोलकर के अर्थात कि अभी इसका अर्थ बड़ा ही स्पष्ट है। जगत पूरा जब मुसीबत आन पड़ती है तो मधुसूदन के श्री चरणों में उपस्थित होता है। जबकि मधुसूदन स्वयं उनके ऊपर में मुसीबत आन पड़ती है तो राधा रानी के पास में उपस्थित होते हैं। तो गाने गान का जो तात्पर्य था बड़ा ही सहज था और सुनकर के ठाकुर हंसते-हंसते वहां से चले गए। हार मान के देखिए यहां पर गंभीरानंद जी स्पष्ट लिखते हैं ठाकुर हार मान के हार स्वीकार करके वहां से हंसते-हंसते चले गए। अब जबकि मां थी लज्जाशीला थी तो उन्होंने गौरी मां का हाथ पकड़ कर पकड़ लिया इस आश्रय से कि ठाकुर के सामने मेरी इस तरह से प्रशंसा क्यों कर रही हो? तो वो एक ह्यूमरस एक इंसिडेंट यहां पर आज गंभीरानंद जी दूसरे एक इंसिडेंट की दूसरे एक प्रसंग का लिपिबद्ध करते हैं हमको दिखाते हैं और यह भी थोड़ा सा ह्यूमरस तो है ही है किंतु इसके भीतर में और एक गहरा संदेश छुपा हुआ है जिसको कि हम जब इस इंसिडेंट को पढ़ेंगे तब उसको डिस्कस करेंगे। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी अपोर दृष्टांतोती आमरा पाई

कहानी: जब कालीपद की पत्नी ठाकुर से अपने पति के आचरण में सुधार लाने की बिनती करती है तो ठाकुर कहते हैं कि इस मामले में माँ की शक्ति उनसे भी अधिक है।

श्री श्री रामकृष्ण पंथीटे और एक दृष्टांत है वह हम रामकृष्ण पंथी में पाते हैं रामकृष्ण पंथी में लिखा हुआ पाते हैं एक दिन श्रीजुक्त तो कालीपदो घोषेर पत्नी कालीपदो घोष अर्थात कि दाना काली यह दाना काली का नाम पता ही है हमारे संग में जो कुछ कुछ भैरव हुए थे ठाकुर मा ठाकुर ठाकुर और मां के भक्तों के रूप में उसमें सबसे प्रथम और सबसे ज्यादा ख्यात नाम तो है ख्यात नाम कहे ना कुख्यात का है वो है गिरीश घोष इसके बाद में ही यह दाना काली का नाम आता है और मां का इसी तरह का एक भक्त है ललित बाबू ललित बाबू के बारे में कोईकोई लोग कहता था कि मां का इतना उन्होंने आदर श्रद्धा मां के प्रति इतनी श्रद्धा थी उनकी किंतु फिर भी मद नहीं छोड़ पाए थे। अर्थात कि शराब पीते थे तो शराब नहीं छोड़ पाए थे। तो देखिए कि अभी किसके कपाल में क्या लिखा है। किस तरह से किसको किस रास्ते से मां या तो फिर ठाकुर या तो फिर ईश्वर उनको उनकी आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर किस रास्ते से ले जाते हैं वह तो कहना मुश्किल ही है। तो यहां पर भी देखिए कि यह है काली पदोघोष अर्थात कि दाना काली उसकी पत्नी अति विषण बोने ओ आकुल प्राण श्री रामकृष्ण निकट आशिया निवेदन करलेन उसकी पत्नी ने बहुत ही विषंडण वदन अर्थात कि दुखित चेहरा लेकर के विषण प्राय चेहरा लेकर के आकुल प्राण से प्राण में बड़ी ही आकुलता लेकर के ठाकुर के पास में आकर के निवेदन किया कि ताहार स्वामी कुसंगे और कुकार मत था क्या पारिवारिक जीवन बीमय कोरिया तुलिया चैन उसका पति कुसंग में और कुकार्य में मत्त होकर के पारिवारिक जीवन को उसने विषमय करके रखा है। सुतरान ठाकुर जदी दया करिया कोनो औषध देन तबई तनी आकुले तबई तनी अकुले कुलपान तो यदि ठाकुर दया करके कोई दवाई औषध मंत्र जड़ी बूटी विधि विधान ऐसा कुछ कर दे तो यहां पे वो अकुले कुल प्राप्त करेगी अर्थात कि उसके हृदय में शांति होगी जीवन अच्छे से बीतेगा ऐसा करके उसने विनती तो क्योंकि अभी हम सबको पता है कि ठाकुर तो इस तरह से कोई मंत्र, औषधि, दवाई इसका प्रयोग नहीं करते थे। ठाकुर ने खुद ने एक बार कहा था कि मैं देख चमत्कार वगैरह करना शुरू कर दूं। यहां पर एक बहुत बड़ी लाइन हो जाएगी। एक बड़ी हॉस्पिटल ने यह सब बन जाएगा यहां पे। किंतु इसके लिए ठाकुर का आगमन नहीं हुआ है। देखिए ठाकुर वैसे तो है सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर। सर्वश्रेष्ठ आप क्या कहेंगे विच डॉक्टर भुआ यानी कि यह जो भूतों को भगाने वाला जितने भी मंत्र तंत्र है वो सब ठाकुर को आते हैं किंतु कौन से मंत्र कौन से तंत्र कौन सी विधि और कौन सी जड़ी बूटी और औषधि यह भवर रोग को ठीक करने वाली बाकी जितने भी रोग हैं वह तो आज है कल नहीं है और भी कोई कोई लोग होते हैं इस जगत में जो कि इस सब समस्याओं का कोई ना कोई समाधान करते हैं किंतु भवर रोग जो रूपी जो रोग हमको लगा है हमारे मन में काम कांचन रूपी विष जो बैठ गया है अष्टपाश पंच क्लेश रूपी यह जहर हमारे भीतर में बैठ गया है उसका निराकरण करने के लिए उसको ट्रीटमेंट करने के लिए ठाकुर ही है सर्वश्रेष्ठ ओझा यानी कि भुआ या तो फिर कहेंगे डॉक्टर भवर रोग के डॉक्टर तो ठाकुर के पास में इस तरह की कोई विनति ले आना कि मेरा पति दारू पी रहा है, शराब पी रहा है, कुसंग में पड़ा है। तो फिर इस तरह की विनती का ठाकुर क्या कोई उपाय करेंगे? इनफैक्ट हमको पता है कि इस तरह की विनती का एक आदमी फेमस घटना है। एक आदमी ठाकुर बरांडे में खड़े थे। देखा कि घोड़ा गाड़ी में बैठकर के वहां से गेट से कोई प्रवेश कर रहा है। उसके सर पर तमस के ऐसे घने का बादल मंडरा रहे थे। ठाकुर डर करके अपने कमरे में चले गए और फिर राजा महाराज को बोल दिया राखाल उस समय वहीं पर था। उसको जाकर के कह दिया कि कहो कि यह यहां से चला जाए। तो राजा महाराज बाहर आकर के बात कर रहे हैं। वह आदमी बोलता है थोड़ा विधि करना है। क्या यहां पर हो पाएगा? तो राजा महाराज कहते हैं वो यहां पर नहीं वो दूसरा लोग है यह सब करने के लिए आप वहां पर चले जाइए तो देखिए कि इस तरह के लोगों को ठाकुर वैसे तो कोई यह नहीं देते थे पत्ता किंतु क्या होता है कि आप किस किस तरह के भाव से ठाकुर के पास में आए हैं। यह आदमी था वह इतना संसारी था और ठाकुर से कोई एक चीज प्राप्त करके पैसा देकर चले जाना चाहता था। जबकि यह दाना काली की पत्नी थी। शुद्ध सात्विक थी, तपस्या थी उसके भीतर में और ठाकुर के प्रति शरणागति का भाव लेकर के आई थी। यदि आप शरणागत होकर के ठाकुर के पास में आएंगे, ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति रखेंगे, अपने खुद के जीवन में तपस्या होगी, त्याग होगा, संयम होगा, तितक्षा होगी। तो क्या है कि फिर ठाकुर भी इस तरह की प्रार्थना को उत्तर देंगे तो क्या करते हैं ठाकुर दाना काली तोखोनो ठाकुर श्री रामकृष्ण निकट जाता आरंभ कोरे नाई एवं कोलकाता लोक तखनो ठाकुर संसार संबंध शून्यो सात्विक भाव सहित परिचितो होए नाई दाना काली उस समय ठाकुर के पास में आगमन मन नहीं करता था। आना जाना नहीं करता था। और कोलकाता के लोग भी उस समय ठाकुर का यह संसार संबंध शून्य सात्विक भाव था। उसके साथ में परिचित हुए नहीं थे। यह उस दिनों की घटना है। जबकि ठाकुर शोडशी पूजा तो हो गई थी और धीरे-धीरे करके ठाकुर अपना प्रभाव कोलकाता शहर में विस्तरित कर रहे थे। मोस्ट प्रोबेबबली ये आई थिंक 1872 ना कि ऐसी ही कोई घटना होगी क्योंकि बाद में जब दाना काली ऑलमोस्ट 10 साल ना कि 12 साल के बाद में ठाकुर के पास आया था तो यह गिरीश घोष दाना काली इन लोगों का आगमन 1883 ना 84 उसी टाइम के आसपास में हुआ था। इसका अर्थ हुआ कि यह घटना है ऑलमोस्ट 1872 7374 की मां दक्षिण दक्षिणेश्वर में आई थी उसके शायद एकद साल के भीतर की ही यह घटना है। देखिए कि तभी से ठाकुर मां का यह जो जगत गुरु का रोल था यह जो जगत जननी का उनका जो कार्य था वह तभी से लेकर के ठाकुर जैसे कि मां को तैयार कर दे रहे थे। ताई घोष पत्नी ताहा के उच्च शक्ति संपन्न साधु मात्र भाियाई औषध याचना कोलेन और इसीलिए ठाकुर का जो आध्यात्मिक उपलब्धि थी ठाकुर के भीतर में यह जो एक पावर था देवी शक्ति थी अवतार स्वयं जब पृथ्वी पर आगमन करते हैं तो मनुष्य के मन की यह जो कमजोरियां है यह जो गंध गंदगी है उसको साफ करने के लिए मनुष्य के मन का जो मेल है उसको साफ करने के लिए तो अवतार आते हैं। किंतु यह घोष पत्नी को तो यह पता नहीं था। उन्होंने सिर्फ यह सोच लिया था कि एक उच्च शक्ति संपन्न साधु ही है ठाकुर और इसीलिए उनसे औषध की मांग की थी। इहा ठाकुर दृष्टि दे विषदष होले ओ रहस्य कोबार जन हो किबांबा घोष पत्नी कातरताए विचलित होया हो अथवा कोनो अज्ञात देव प्रेरणाए दब प्रेरणाए तहां के निरस्तो ना करिया नबते जते परामर्श दिल ठाकुर की दृष्टि से इस तरह की प्रार्थना कि वह उसके पति की यह जो सब बेड हैबिट्स है उसको दूर करने के लिए कुछ औषध मंत्र ऐसा कुछ दे दे। ठाकुर की दृष्टि से इस तरह की मांग इस तरह की प्रार्थना विसदृश्य अर्थात कि विचित्र या तो फिर एक निम्न प्रकार की ही उनकी दृष्टि से दिखी होगी। किंतु फिर भी रहस्य करने के लिए रहस्य बंगाली शब्द है। इसका अर्थ हिंदी में जो होता है वह नहीं करना है। रहस्य अर्थात ह्यूमर या तो फिर विनोद या तो फिर ऐसा ही कुछ। तो ह्यूमर या तो फिर एक तरह का आनंद रंग रस लेने के लिए ही हो सकता है या तो फिर घोष पत्नी की कातरता जो थी उसकी बेचारी की जो विनती थी उसकी जो उसके मन का जो कष्ट था उसको देखकर के विचलित हो गए हैं शायद या तो फिर और कोई अज्ञात दैव प्रेरणा से ठाकुर ने उसको निरस्त ना करके अर्थात वापस ना भेज के उसको कहा कि नहबत में जाओ। देखिए तीन कारण यहां पर गंभीरानंद जी तीन कारण यहां पर गंभीरानंद जी कहते हैं कि क्यों ठाकुर ने इसको मोहब्बत में जाने के लिए कहा। एक तो हो सकता है कि एक तरह का ह्यूमरस सिचुएशन रंग रस करने के लिए ठाकुर ने उसको भेजा होगा शायद नहबत में यहां पर किसी ने लिखा कि उसका हिंदी होगा मजाक। देखिए मजाक करना अर्थात कि हम दूसरों को एक तरह से क्या करते हैं? उनका एक तरह से एक्सप्लइटेशन करते हैं। उनकी एक तरह से हम क्या कहेंगे कि निंदा करते हैं या तो उनको सबके सामने नीचा दिखाते हैं। ठाकुर मजाक नहीं करते थे। मजाक शब्द यहां पर यूज करना उचित नहीं होगा। बेस्ट शब्द होगा रंग रस या तो फिर हास्य विनोद या तो फिर इंग्लिश वर्ड है ह्यूमर। तो इसके लिए हो सकता है शायद ठाकुर ने उसको मां के पास में भेजा हो या तो फिर उसकी यह जो कातरता है उसकी यह जो बेचारी का कष्ट है और कष्ट की वजह से उसको जो दुख पहुंच रहा है उससे विगलित होकर के उससे उसके ऊपर में करुणा से परवश होकर के हो सकता है कि उसको नौबत में भेजा हो मां के पास में या तो फिर हो सकता है कि ऐसी कोई एक दैवी प्रेरणा से आवेश होकर के दैवी प्रेरणा के बल से यहां पर लिखा है अज्ञात दैव प्रेरणा अर्थात कि कोई अज्ञात दैव प्रेरणा अभी ठाकुर के जीवन में अज्ञात दैव प्रेरणा क्या है वो हम सबको पता है कि मां काली ही जैसे कि उनको डायरेक्ट करती थी ठाकुर कहते हैं ना आमी गाड़ी तुम्ही इंजीनियर आमी घर तुम ही घरणी जेमन बलाओ तेमनी बोली जैमन चलाओ तेमनी चली तो मां काली ने ही ठाकुर के कठपुतली करके वह जैसे कि सब कुछ रंग रस यहां पर कर रही है। यह जितनी भी लीला चल रही है मां काली के ही यह कंट्रोल में सब कुछ है। तो हो सकता है कि मां काली के ही विधान से मां काली की ही प्रेरणा से उन्होंने उसको निरस्त नहीं किया। यह नहीं कहा कि मैं तो इस तरह का कोई औषध देता नहीं हूं। जिस तरह से वह एक तामसिक पुरुष को ठाकुर ने भगा दिया था वहां से। इस तरह से उसको भगा नहीं देकर के कहा कि नहबत में जाओ श्री श्री मां के पास में और क्या कहा शेखा ने एक स्त्री लोग आन वहां पर एक स्त्री रह रही है एक औरत रह रही है ताके तुम सब खुले बोलले त ठीक ठीक औषध देवेन उसको तुम यदि सब कुछ विस्तृत रूप से विवरण करोगी अपने मन का भार उनके सामने जाकर करके हल्का करोगी। अपनी यह जो विनती है उनके श्री चरणों में रखोगी तो तुमको ठीक-ठीक औषध देगी। ऐसा करके ठाकुर ने उसके पास में भेजा और साथ में क्या कहा? तार सब मंत्र औषधि जाना आचे उसको सब यह मंत्र और औषधि उसको पता है उसको ज्ञात है ए विषय तार शक्ति आचे बेश इस विषय में उसकी शक्ति मेरे से ज्यादा है देखिए यह जो स्टेटमेंट

ठाकुर की सत्यनिष्ठा: क्या माँ भक्तों के सांसारिक कल्याण करने में उनसे अधिक समर्थ हैं?

है इसका बहुत ही एक गहरा तात्पर्य है। सबसे पहली बात तो ठाकुर को पता है कि मां इस तरह से मंत्र और औषध यह मंत्र औषधि अर्थात कि मंत्र और औषध इसका प्रयोग तो कभी करने वाली नहीं थी। यदि मां कोई एक आशीर्वाद देती तो वह एक हो सकता है। किंतु मां को क्या इस तरह के मंत्र और औषध पता था? और साथ-साथ में ही कहते हैं कि इस विषय के बारे में उसकी शक्ति मेरे से ज्यादा है। और फिर ठाकुर आगे क्या कहते हैं? ठीक-ठीक औषध देगी वह तुमको। अर्थात कि मां के पास में सही में ऐसी औषध देने की शक्ति है। औषध यानी कि मेडिसिन दवाई। तो इस तरह का औषध देने की शक्ति है। मेडिसिन या मंत्र देने की शक्ति है। क्या मां में सही में है? और यहां पर भले ही चाहे गंभीरानंद जी महाराज ने स्टार्टिंग में लिखा हो कि रंग रस हास्य विनोद करने के लिए शायद ठाकुर ने ऐसा कहा हो किंतु हमको तो पता है कि ठाकुर असत्य वचन कभी भी उनकी जीवा से उनके मुंह से बाहर नहीं निकलेगा। असत्य वचन और ठाकुर यह दो शब्द एक साथ में एक सेंटेंस में कभी हो ही नहीं सकते हैं। तो इस केस में ठाकुर ने ऐसा क्यों कह दिया कि उसको सब मंत्र और औषध पता है। वह तुमको ठीक-ठीक औषध देगी। देखिए यह उसकी शक्ति मेरे से ज्यादा है। यह तो चलो यह तो मान भी सकते हैं। आध्यात्मिक शक्ति में ठाकुर ने स्वामी जी ने दोनों ने यह स्वीकार किया है। ठाकुर ने तो आगे ही कह दिया था कि आमी आर की कोरे छ तो अनेक बेशी करते होवे। मैंने और क्या किया है? तुमको मेरे से भी बहुत ज्यादा कुछ करना होगा। तो इस तरह के सेंटेंस ठाकुर ने खुद कहे हैं। इस स्वामी जी ने कहे हैं। इस बात में कोई प्रश्न नहीं है। यह तो सब जग जाहिर है। किंतु इसके पहले वाले जो दो सेंटेंस है कि मां को सब मंत्र और औषध पता है और वह तुमको ठीक-ठीक औषध देगी। इसके बारे में सोचने की आवश्यकता है। ठाकुर सिर्फ हंसीज़ाक यहां पे नहीं करते हैं। ठाकुर कभी भी कुछ भी बात में झूठ नहीं बोलेंगे। राजा महाराज की वह घटना है। हम सब ने काफी बार उसका डिस्कशन भी किया है कि एक बार ठाकुर के पास में आए तो ठाकुर ने कहा कि तुम्हारे चेहरे पर जैसे कि एक काला पर्दा लग गया है। मैं तुम्हारे सामने देख नहीं पा रहा हूं। क्या तुमने बहुत कोई बुरा कार्य किया है? तो राजा महाराज बोलते हैं कि मैं तो यही समझता था कि बुरे कार्य का क्या अर्थ है? चोरी करना, लूटपाट करना, लोगों की हत्या करना, अपने चरित्र को भ्रष्ट कर देना। यह सब तो बुरे कार्य है। ऐसा तो मैंने कुछ किया नहीं है। किंतु फिर सडन उनको याद आया कि हास्य मजाक में हंसी मजाक में उन्होंने उस दिन कुछ झूठ बोल दिया था। तो अभी उनको यह बात सुन अभी जब यह उनके मन में यह बात प्रकट हुई उनको इतना आश्चर्य हुआ कि हंसी मजाक में भी आपको झूठ नहीं बोलना है। यह कैसी बात हो गई? तो किंतु ठाकुर का यह जो थिंकिंग था बड़ा ही क्लियर था। यहां तक कि हास्य मजाक में तो आपको झूठ नहीं ही बोलना है। यह जो गिरीश घोष के वहां पर वो जो एक अभिनय देखने के लिए नाटक देखने के लिए ठाकुर गए थे। एक अभिनेता गिरीश घोष ही एक पात्र अभिनय कर रहा था। कहता है कि धरातल पर से मैं शिव का नाम मिटा दूंगा। तो यह ठाकुर सुनकर के बड़े ही नाराज हो गए और फिर कहा कि इस तरह से अभिनय करते-करते भी इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। तो देखिए अभिनय करने में भी आपको असत या अधर्म का सहारा नहीं लेना है। आपको हंसी मजाक में भी झूठ नहीं बोलना है। इतना स्ट्रिक्ट यदि ठाकुर का एथिकल फाउंडेशन है। सत्य के प्रति उनकी इतनी प्रचंड निष्ठा है। तो फिर यही सत्यवा सत्य के यह जो एग्लीफाई जिन्होंने किया है इस तरह के ठाकुर उनके मुंह से ऐसी बात कैसे बोल देंगे कि मां को सब तरह के मंत्र और औषध पता है और उसके पास में जाओ। उसको जाकर के खुलकर के अपने हृदय की बात बताओ और देखो कि वह तुमको ठीक-ठीक औषध देगी। ठीक ठीक तुमको इसका कोई उपचार बताएगी। ठाकुर ने इस तरह की बात कैसे कर दी? तभी की होगी जब को जबकि मां को यह सब पता होगा और मां को क्या पता है? देखिए सांसारिक दुख, कष्ट, विपद जब हमारे जीवन में आती है तो ठाकुर ने स्वयं यहां पर यह स्पष्ट रूप से कहा है कि मां को सब मंत्र और औषध पता है और इस विषय में उसकी शक्ति मेरे से भी ज्यादा है। किस तरह का कंट्रास्ट यहां ठाकुर के सामने खड़ा हो रहा है। जो आप सिर्फ कथामृत या लीला प्रसंग पढ़ेंगे। ठाकुर का जीवन का ही सिर्फ अध्ययन करेंगे तो हमारे मन में एक ऐसा भाव प्रकट हो जाएगा या तो एक दृढ़ धारणा बैठ जाएगी कि रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा है या तो फिर श्री रामकृष्ण भाव गंगा जो है इसमें क्या है कि सिर्फ आपको आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही प्रयास करना है। सांसारिक उन्नति या संसार में कोई भी दुख कष्ट आते हैं तो उसके बारे में डायरेक्टली आपको कोई प्रार्थना नहीं करनी और यदि कर भी देंगे तो ठाकुर उसको सुनने वाले नहीं है। किंतु यहां पर ठाकुर स्पष्ट रूप से हमको कहते हैं सत्य के ऊपर में उनकी संपूर्ण निष्ठा होने के बावजूद यह कहते हैं यह बात कि मां को सब मंत्र और औषध पता है। मां के पास में अपना हृदय खोल करके प्रार्थना करने से मां यह औषध ठीक-ठीक दे भी देगी और सिर्फ इतना नहीं इसके बारे में उसकी शक्ति मुझसे भी ज्यादा है। यदि यह बात हम सिर्फ हंसीज़ाक में लेते तो इस सेंटेंस का ज्यादा कोई अर्थ नहीं रहता कि ठाकुर ने मजाक करते-करते रंग रस हास्य विनोद करते-करते ऐसा कुछ स्टेटमेंट दे दिया है जिसका कि कोई फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस नहीं है। इसका कोई स्पिरिचुअल डेप्थ इस सेंटेंस में नहीं है। किंतु जैसे ही इस सेंटेंस के सामने हम ठाकुर का सत्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा को रखते हैं तब इस सेंटेंस का जो तात्पर्य है महात्म है महत्ता है वो लाखों गुना करोड़ों गुना बढ़ जाती है कि मां जो है मां सिर्फ आध्यात्मिक शक्ति आध्यात्मिक आशीर्वाद ही प्रदान नहीं करती किंतु संसार के जो दुख कष्ट है हमारे सामने जो सब दिन दैनंदिन जीवन में जो सब समस्याएं खड़ी होती है जिसको कि ठाकुर को निवेदन करने में हमको लज्जा या शर्म अनुभव होती है वह हम मां के पास में जाकर के कर सकते हैं। ठाकुर का स्वयं देखिए कि वह जो शशधर पंडित मोस्ट प्रोबेबबली शशधर पंडित ही उसने जब ठाकुर को कहा कि आप मां काली के पास में प्रार्थना क्यों नहीं करते? आपका यह कैंसर ट्रीट करने के लिए गले का रोग हो गया है आपको। आपका तो जगत जननी के साथ में वह हॉट लाइन है। डायरेक्ट आपका वो वो वार्तालाप होता रहता है। आप उनको प्रार्थना कीजिए। तो ठाकुर ने कहा यह तुम कैसी बात कर रहे हो? जिस मन को मैंने संपूर्ण रूप से मां काली के चरणों में समर्पित कर दिया है। उस मां काली के पास में जाकर के मैं अपने दैहिक सुस्थता के बारे में दैहिक स्वास्थ्य के बारे में प्रार्थना करूं। यह कैसे हो सकता है? तो देखिए कि ठाकुर के जीवन में यह तो बड़ा ही स्पष्ट है। और फिर जब यह पंडित चला गया और फिर यह नरेंद्र वगैरह ने ठाकुर को आकर के घेर लिया। कहा कि महाशय आपके खुद के लिए नहीं तो फिर एटलीस्ट हमारे लिए तो आपको यह प्रार्थना करनी ही होगी। और जब ठाकुर ने मां को प्रार्थना की तो मां काली ने क्या दिखा दिया कि वह एशियाटिक सोसाइटी में वह जो स्केलेटल है वह हार्ड पिंजर उसको कहते हैं गुजराती में कि वो जो मनुष्य की सभी हड्डियां होती है उसको वहां पर तार देकर के बांध करके पूरे मनुष्य का स्केलेटन वहां पर खड़ा किया है। तो ठाकुर ने कहा कि देखो इस तरह से तार देकर के जिस तरह से हड्डियों हड्डियों को बांध करके रखा है वैसे ही मां ने मेरे शरीर को बांध करके रखा है। और फिर जब ठाकुर कहते हैं कि मां मैं खाना नहीं खा सकता हूं। आहार नहीं कर सकता हूं। थोड़ा सा इसको तुम ठीक कर दो। तो मां क्या उत्तर देती है? मां काली जगत जननी कि इतने लोगों के मुंह से तुम ही तो खा रहे हो। और कौन खा रहा है? तुम्हारे जितने भी त्यागी संतान है इनके मुंह से तुम ही तो आहार ग्रहण कर रहे हो। सर्वोच्च अद्वैत वेदांत ठाकुर ने जब उसको प्राप्त किया तो ऐसा आप कैसे कह सकते हैं कि मेरा देह अन्य के देह से अलग है। मेरी जो भीतर में यह जो हंगर है, क्षुदा है, उसकी पूर्ति मैं दूसरों के मुंह से नहीं कर पा रहा हूं। देखिए इस तरह के जो फिलॉसोफीस होती है उसका जब हम उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचने का प्रयास करें तो हमको कितना कष्ट सहन करना पड़ता है। तोतापुरी स्वयं अद्वैत वेदांत के आचार्य उनको भी पेट में दर्द हुआ। देह त्याग करने को गए। देह हत्या करने के समय उनको समझ में आया कि यह जगत जो है यह शक्ति का इलाका है। यह शक्ति का राज्य है। जगत में रहते आपको शक्ति को स्वीकार करना ही होगा। यानी कि आपकी साधना की जो चरम समाप्ति है, जो लॉजिकल कंक्लूजन है, वहां पर पहुंचने के समय में आपको आपके जितने भी चेरिष्ट आइडियोलॉजीस होती है, यह चेरिष्ट बिलीफ जो होती है, यह बिलीफ मुझे बड़ी पसंद है। मैं अद्वैत वेदांती हूं। मैं शक्ति में विश्वास नहीं करूंगा। या तो फिर मैं मां काली का आराधना करता हूं। मैं मां काली का पुजारी हूं। तो फिर यह अद्वैत वेदांत के जो सर्वोच्च कंक्लूजन जो है अल्टीमेट कंक्लूजन उसको स्वीकारने की जरूरत नहीं। इस तरह से बोलने से नहीं चलेगा। आपको यह जो आध्यात्मिक चरम शिखर है स्पिरिचुअल एवरेस्ट है वहां पे पहुंचने के लिए सब तरह की आपकी खुद की ये चेरिस्ट बिलीफ, आपकी आईडियोलॉजीस, आपकी यह मनपसंद जितने भी विचार हैं सबको त्याग करना ही होगा। तो यहां पर जिस तरह से तोतापुरी को वह त्याग करना पड़ा था विचार कि शक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे। यहां पर हालांकि ठाकुर ने अद्वैत वेदांत को स्वीकार तो अवश्य कर लिया था। निर्विकल्प समाधि अवश्य प्राप्त कर ली थी। किंतु अद्वैत वेदांत की यह जो सब स्टार्टलिंग कंक्लूजंस जो है एक चौंका देने वाले यह जो सब उसके यह एप्लीकेशन या तो फिर यह सिद्धांत जो है उसको भी उनको फेस करना था। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर स्वयं तो मां काली के पास में अपने खुद के औषध अपने खुद के रोग की पूर्ति के लिए औषध नहीं मांग सकते हैं। मांग मांगते यदि है भी तो भी मां काली उनको नहीं देती है। तो यहां पे देखिए कि मां के जीवन में किस तरह का कंट्रास्ट हम यदि यह जो दाना काली की पत्नी या तो फिर हम यदि ठाक मां के पास में इस तरह से विनती लेकर के जाएंगे अपने हृदय के अंतः स्थल से बड़े ही एक सरल भाव से बड़े ही शुद्ध सात्विक भावना से मां को प्रार्थना करेंगे तो मां हो सकती है इस तरह की मंत्र या औषधि धि या जड़ी बटी या ऐसा कुछ हमको दे दे जिससे कि हमारे सांसारिक दुख कष्ट है वह भी दूर हो जाए। तो देखिए जब ठाकुर ने दाना काली की पत्नी को मां के पास में भेजा क्या हुआ? श्री मां तखन पूजा बोशिया छे मां उस समय पूजा करने के लिए बैठी थी। ताहार मोहन तो जागतिक पंखिलतार उध एक अति करुणा पूर्ण राज्य विचरण करते छ उसका मन मां का मन उस समय यह सांसारिक कीचड़ है पंकीलता ये कादव कीचड़ यह जो मेलापन है इस संसार का जागतिक विश्व का उससे कहां ऊपर में कहां उर्ध्व एक अति करुणा पूर्ण राज्य में विचरण कर रहा था घोष पत्नी समस्त कथा सुन्या त बुझते पार ले जे ठाकुर रंग कोते छ घोष पत्नी की जब यह घोष पत्नी वहां पर उपस्थित हुई मां को विनती की तो मां समझ गई कि ठाकुर रंग रस कर रहे हैं तथापि तनी ए आर तो हृदय के निराश को ते ना पारिया बोली लेन आमी आर की जानी बाछ तशुद्ध जाने तुम तारी काछे जाओ तो मां कहती है कि अब देखिए देखिए कि उनको मां को पता तो चल गया कि ठाकुर रंग रस कर रहे हैं। किंतु फिर भी यह जो आर हृदय है यह जो आर हृदय लेकर के यह जो आई है उसको निराश ना करके मां ने कहा कि मुझे क्या पता है बेटा तुम उन्हीं के पास में जाओ। उन्हीं को सब इस तरह के औषध पता है। देखिए अभी मां ने भी इस तरह से स्टेटमेंट दे दिया कि ठाकुर के पास में भी इस तरह के मंत्र है, औषध है, जड़ी बूटी है जिसका कि इस्तेमाल करेंगे तो आध्यात्मिक जगत तो ठीक ही है। किंतु यह जागतिक जगत है, यह जो हमारा सांसारिक विश्व है, उसमें भी जो समस्या हम फेस कर रहे हैं, उसका कुछ ना कुछ उत्तर मिलेगा। किंतु क्या है कि देखिए अभी आप यदि यह कहना चाहते हैं कि मां सांत्वना देने के लिए इस तरह की बात करती है। मां की तो सत्य निष्ठा नहीं थी ठाकुर की तरह। यह तो हमने बार-बार देखा भी है। तो वो फेमस कहानी कि झूठ बोल के ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती है। तो ठाकुर मां ने ऑलरेडी यह सब कंडीशन करके रखा था। यह जो एब्सोल्यूट आइडियल जो है सत्य का इस एब्सोल्यूट आइडियल में भी यदि एक तरह की सिचुएशन एक स्पेशल कंडीशन खड़ी होती है तो उस एब्सोल्यूट आइडियल में भी उसको आप नजरअंदाज उस पार्टिकुलर सिचुएशन के लिए कर सकते हैं। तो यहां पर उसी उसी मां का उस बिहेवियर को उस घटना को याद करके हम कह सकते हैं कि मां ने जो यहां पर कहा है कि ठाकुर को भी यह सब औषध जड़ी बूटी पता है। तो यहां पर शायद हम इस तरह का कंक्लूजन ले सकते हैं कि उसको सांत्वना देने के लिए ही मां ने ऐसी बात कही है। नहीं कि ठाकुर के पास में सही सही इस तरह की जड़ी बूटियां थी। तो जो भी है मां का यह स्टेटमेंट है। उसके दो अर्थ निकलते हैं। मां सांत्वना देने के लिए शायद इस तरह की बात कर भी सकती है। और दूसरी ओर यह भी इतना ही पॉसिबिलिटी है कि ठाकुर के पास में सही में इस तरह के मिरेकुलस पावर थे जिसका कि इस्तेमाल करके ठाकुर इस जगत के कष्ट जो है वह हर सकते थे और उन्होंने किया भी था ऐसा। ऐसा नहीं है कि नहीं किया था। वो एक बड़ी फेमस घटना है। वर इट्स अ वेल नोन इंसिडेंट कि जब वो मथुर बाबू की पत्नी बीमार हुई तो मथुर बाबू ठाकुर के पास में आए बड़े ही वो विनती करके बड़े ही दुखित होकर के कि ठाकुर यदि मेरी पत्नी का देहांत हुआ तो यह कालीवाड़ी के ऊपर में मेरा जो कंट्रोल है मेरा ऑथॉरिटी है वह चला जाएगा। अभी इसके बारे में अब क्योंकि क्या है कि मथुर बाबू तो एक उसके जामाई थे ना रानी रासमणि के उसका खुद का तो यह वारसे में नहीं था वारसा या तो फिर इन्हहेरिटेंस किसको मिलेगा रानी रासमणि की पुत्रियों को मिलेगा वो जमाई है बोलकर के अपनी पत्नी का जो वारसा है उसके वह वहीवट कर रहे थे तो वह तो वहीवटकर्ता थे मालिक नहीं थे तो मथुर बाबू कहते हैं कि देखिए मेरी पत्नी का देहांत होगा कालीवाड़ी का वहीवट मेरे हाथ से चला जाएगा मुझे इस बात का दुख नहीं है कि कालीवाड़ी का वहीट मेरे हाथ से चला गया। इस बात का दुख है कि मैं आपकी सेवा नहीं कर पाऊंगा। तो ठाकुर ने क्या किया था कि मथुर की पत्नी का रोग जो है वह अपने पे ले लिया था और इसके लिए उनको छ महीना बड़ा ही भुगतना पड़ा था। किंतु एज अ रिजल्ट मथुर की पत्नी बच गई। और मथुर बाबू ने अप टू हिस डेथ यह 1871 के आसपास में जो उनकी मृत्यु हुई तब तक उन्होंने ठाकुर की बहुत सेवा की थी। तो देखिए कि और यह घटना हुई थी ठाकुर ने उसकी पत्नी का रोग अपने पर ले लेने का यह ठाकुर ने निर्विकल्प समाधि के बाद की घटना है। यानी कि यह 1868 के आसपास की यह घटना होगी। तो देखिए कि ठाकुर ऐसा नहीं है कि लोगों का रोग दुख वगैरह कष्ट दूर नहीं कर सकते हैं। आध्यात्मिक पाप उन्होंने लोगों के हर लिए तो उनको कैंसर हुआ तो वह तो एक घटना है। किंतु ये जागतिक रोग इस पंचमहाभूत का जो रोग है वह भी ठाकुर जैसे कि अपने पर ले सकते थे और उसका जो भोग था रोग का वह उन्होंने भोग करके रखा था। अभी मथुर बाबू ने इतनी सेवा की तो अभी क्या है कि उसकी सेवा के बदले में उसको कुछ तो देना होगा। तो ठाकुर ने इस तरह से मथुर बाबू पर कृपा की। तो ठाकुर दोनों चीज कर सकते थे। हमारे कर्म है। कर्म को भी हर ले सकते थे। साथ-साथ में ही हमारे दैहिक आधि व्याधि जो है उसको भी हर ले सकते थे। तो यह घटना तो है ही है फेमस। तो जब मां यहां पर यह कहती है कि मुझे क्या पता है बेटा वही सब औषध जानते हैं। तुम उन्हीं के पास में जाओ तो यह कोई सिर्फ सांत्वना देने के लिए नहीं है। इसके पीछे में वास्तविकता भी है। विपन्ना नारी के फिरिया आशीते देखिया ठाकुर बोध होए बुझले जे रंग जमिया छे अब ये बेचारी विपन्न स्त्री थी उसको नहबत से वापस अपने पास में आते जैसे ही ठाकुर ने देखा उनको लगा कि यह रंग रस अभी जमा है सुतरा आरो रस संचारे जन तनी ताहा के पुनर्बार नबते पाठाई लेन इसलिए और ज्यादा रस संचार करने के लिए ठाकुर ने उसको फिर से नहबत में भेजा ए रूप घोष जाया के बार त्रय जाताज जातात करीते देखिया करुणामई माए हृदय विगलित होइलो इस तरह से घोष पत्नी को तीन बार इधर से उधर करती हुई देखकर के करुणामई मां के हृदय विगलित हो गया तनी समस्त व्यापार टाटा के सुधु रंग रश आवृतो तो कोरिया से व्यथित प्राण आरो आघात दीते चाहिले ना उन्होंने इस समग्र घटना को सिर्फ रंग रस से आवृत्त करके स्त्री के व्यथित प्राण को और ज्यादा आघात देना चाहा नहीं। देखिए यहां पे और भी एक

माँ का हास्य-रस और संदेह-पूर्ण सत्यनिष्ठा: एक भक्त को कहती है की गोलाप माँ ही असली माँ सारदा है

घटना है। ये जो तीन बार ये घोष इस दाना काली की पत्नी ठाकुर से स्वामी मां के पास में मां से फिर से ठाकुर के पास में जाती है। इसी तरह की एक घटना मां के जीवन में दूसरी भी है। और वो भी थोड़ी इसी तरह से रंग रस से भरी हुई है। वहां पर मां स्पष्ट रूप से झूठ बोलती है। यह मैंने कहा ना कि मां की जो सत्य निष्ठा थी वह थोड़ी गड़बड़ वाली थी। तो इस घटना में तो मां एकदम स्पष्ट रूप से झूठ बोलती है। क्या यही रस संचार करने के लिए क्या है वो मोस्ट प्रोबेबबली ये काशी की ही घटना है। मां और गोलाप मां। यह दोनों वहां पर थे उस समय। तो मां कमरे के एक कोने में बैठी थी। कमरे के दूसरे कोने में गोलाप मां बैठी थी। अभी एक स्त्री मां का दर्शन करने के लिए मां का प्रणाम करने के लिए आई। अभी वह बिल्कुल पहली बार आ रही थी। मां का दर्शन उसने पहले कभी नहीं किया था। तो जैसे ही वह आई देखा कि एक ही कमरे में दो वृद्ध स्त्रियां बैठी है। अभी मां का वैसे तो प्रोफाइल उसको पता ही था कि इस भक्त स्त्री को कि ठाकुर की पत्नी थी। ठाकुर की अर्धांगिनी थी और फिर ठाकुर की महासमाधि के बाद में वो अभी भी जीवित है और उस भक्तों को आशीर्वाद देती है यानी कि उनकी वृद्ध अवस्था होगी अभी तो दे और फिर वह बड़ी धार्मिक है तो बैठकर के जप करती होंगी ऐसा एक चित्र इस स्त्री के मन में था अभी जैसे ही कमरे में प्रवेश किया देखती है दो वृद्ध स्त्रियां है दोनों अभी यह गोलाप मां और मां दोनों बैठकर के जप न की ऐसा ही कुछ कर रही है तो अभी ये स्त्री को लगा स्त्री भक्त को कि दोनों में से मां कौन होगी किंतु क्या है भीतर का एक यह होता है ना कि प्राणर टान अर्थात कि ईश्वरीय शक्ति के प्रति अपने हृदय में एक सूप्त आकर्षण होता ही है। तो इस आकर्षण से आकर्षित होकर के वो सीधी मां के सामने आई और मां को प्रणाम करना चाहा। अभी किंतु मां की तो एक ऑब्जरर्वेशन शक्ति है तो अवलोकन शक्ति है। तो जैसे ही स्त्री ने भक्त स्त्री ने कमरे में प्रवेश करके वो थोड़ा सा हेजिटेट जैसे ही हुई थी कि दोनों में मां कौन है तो मां ने यह स्पष्ट समझ लिया कि वह मुझे पहचानती नहीं है। किंतु देवी आकर्षण की वजह से ही वह मेरे पास में आई है प्रणाम करने के लिए। तो मां ने वैसे ही साथ-साथ प्रणाम करें। उससे पहले ही उसको रोक करके मां ने कहा कि अरे मां का दर्शन करने के लिए आई हो तो वो है मां गुलाब मां की ओर इशारा करके कहती है मां शारदा कि वो है मां जाओ उसको प्रणाम करो तो यह स्त्री भक्त ने सोचा कि अभी ये देखिए कोई भी हम लोगों में से कि इस तरह की महासत्ता आध्यात्मिक महाशक्ति के सामने उपस्थित होंगे तो यह महाशक्ति झूठ बोलेगी सरासर झूठ बोलेगी ऐसा तो हम कोई भी पहले तो यह अनुमान ही नहीं करेंगे। तो यह बेचारी स्त्री भक्त भी उसने सोच लिया कि यहां जो भी कहा गया है सत्य ही होगा। मां की प्रेजेंस में थोड़ी ना कोई झूठ बोलने वाला है। और मां स्वयं जगत जननी स्वयं थोड़ी ना झूठ बोलने वाली है। तो बोल कर के वो गई बेचारी वो गुलाब मां को प्रणाम करने के लिए। गुलाब मां सब पूरा देख रही है। रंग रस क्या चल रहा है। तो वो गुलाप मां नाराज हो गई। मां बोलकर के कोई उनको प्रणाम करे ऐसा तो ठीक नहीं है ना। वो तो ठीक नहीं रहेगा। तो गुलाब मां नाराज होकर के बोलती है जाओ जाओ यहां से। क्या तुम देख रहे हो? देखते समझ नहीं पा रही हो। मां तो वो स्वयं है। मैं मां थोड़ी ना हूं। जाओ जाकर उनको प्रणाम करो। तो ये बेचारी भक्त महिला थोड़ी सी कंफ्यूज होकर के फिर से मां के पास में आई प्रणाम करने के लिए। तो मां ने फिर से कहा अरे अरे नहीं नहीं देखो मां क्या है कि अपना स्वरूप छुपाना चाहती है। दिखाना नहीं चाहती कि मैं मां हूं। जाओ जाकर के उन्हीं को प्रणाम करो। फिर से गुलाब मां के पास भेजा। तो गुलाब मां फिर से नाराज होकर के गुलाब मां का नेचर था पड़ता है अग्रेसिव नेचर था डांट देती थी क्रोधित हो जाती थी तो फिर से डांट के कहा जाओ जाओ वो तो मां तो वो है तुम मेरे पास में क्यों आ रहे हो प्रणाम करने के लिए तो यह बेचारी स्त्री भक्त अभी पूरी कंफ्यूज हो गई है फिर से मां के पास में आई तो अभी मां ने देखा कि यह रंग रस जमा है और रस संचार यह जो सब शब्द यहां पे गंभीरानंद जी महाराज यूज़ कर रहे हैं ऐसे ही एग्जैक्ट वहां पर हो रहा तो मां ने देखा रस जमा है रंग रंग जमा है और ज्यादा रस संचार करना चाहिए। तीसरी बार उसको जाकर के गुलाब मां के पास में भेजा कि वही मां है जाओ उन्हीं के पास जाओ। अभी जब यह स्त्री भक्त गुलाब मां के पास में गई तो गुलाब मां का गुस्सा क्रोध जैसे कि फट पड़ा। वो चिल्ला करके बोली कि तुमको समझ में नहीं आता है ईश्वर का चेहरा और मनुष्य का चेहरा। मैं क्या तुमको ईश्वर दिखती हूं। उनका चेहरा देखो। मेरा चेहरा देखो। मूर्ख की तरह क्यों मेरे पास में आ रही हो? ऐसा करके चिल्ला करके डांट करके कहा। तब यह भक्त महिला का जो संदेह है संपूर्ण रूप से समाधान हो गया और फिर मां के मना करने पर भी फिर से मां के पास में जाकर के उनको प्रणाम किया। तो देखिए कि झूठ बोलना मां के लिए असत्य वचन ऐसा कोई बड़ी बात नहीं थी। किंतु जब यहां पर मां यह कहती है कि मुझे क्या पता औषध तो उन्हीं को पता है वही देंगे तो इस बात में सत्य है। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है कि ठाकुर इस तरह के जो दैहिक रोग थे उसका भी समाधान कर सकते थे। किंतु देखिए अभी यह घटना को समाप्त करके इसके बारे में और थोड़ा सा चिंतन करेंगे कि यह जो मां का यह जो व्यवहार था, बिहेवियर था, इसके पीछे में रहस्य क्या है? तो देखिए यहां पर क्या लिखते हैं महाराज जी ए रूपे घोष जाया के बारत्रय जाता करीते देखिया करुणामई माए हृदय विगलित होइलो घोष पत्नी को तीन बार इधर से उधर करके देख के करुणामई मां का हृदय विगलित हुआ तनी समस्त व्यापार के सुधु रंग रश आत कोरिया से व्यथित प्राण आरो आघात दते चाहिले ना इस समग्र घटना को सिर्फ रंग रस से आवृत्त करके इस व्यथित प्राण स्त्री के हृदय में और आघात करना चाहा नहीं अ तापिता नारी के आश्वस्त कोिया और इसलिए ये जो तापिता स्त्री थी संसार के कष्ट से तापित स्त्री उसको आश्वस्त करके पूजा एक्ट बिलो पुत्रो तहार हाथ दिया स्नेहो माखारे बोलीले बाछा एटीए जाओ एते ही तुम्हार वासना पूर्ण होवे। पूजा में से एक बिल पत्र उसके हाथ में देकर के स्नेह भरे स्वर से कहा बेटा इसको तुम ले जाओ। इसी से तुम्हारी वासना पूर्ण होगी। इसी से तुम्हारी मनोकामना मनोवांछा पूर्ण होगी। घोष गहिणी से आशीर्वाद माथाई तुल्या लोलेन जथाकाले माय अमोग वाणी सफल होइया छिलो घोष गहिणी ने इस आशीर्वाद को अपने मस्तक पे सर पर धारण कर लिया समय आने से यथाकाले इवेंचुअली समय बीतने से मां की यह अमोग वाणी जो थी वह सफल हुई थी दाना काली श्री रामकृष्ण अनुचर वृंदेर अंतर्भक्त तो होया चिलेन यही दाना काली जो कुसंग में पड़े थे पत्नी को कष्ट देते थे संसार को विषमय करके रखे थे यही दाना काली ठाकुर के जो अनुचर वृंद है ठाकुर के ये जो भक्त वृंद है उसमें वह अंतर्भुक्त हुए थे वह शामिल हुए थे देखिए

सत्यनिष्ठा के विविध आयाम—ठाकुर और माँ की दृष्टि से

यहां पे मां का यह जो बिहेवियर और ठाकुर का यह जो बिहेवियर है इसके पीछे का रहस्य क्या है पता है ठाकुर का तो सही में हमको आश्चर्य होगा कि ठाकुर इस तरह से जो कहते हैं कि उसके पास में यह मंत्र और औषधि की शक्ति है। सत्य निष्ठा 100% होने के बाद में भी ठाकुर जब मां के पास में भेजते हैं तो ठाकुर का मामला तो बड़ा क्लियर है कि मां के पास में सही में ऐसी शक्ति है ही है। अदरवाइज ठाकुर भेजते ही नहीं। तो क्योंकि असत्य बोलने का हंसी मजाक में भी वह तो ठाकुर के लिए संभव नहीं है। तो ठाकुर का तो यहां पर एकदम क्लियर कट समझ में आ जाता है और हुआ भी तो आखिर में वही मां ने जैसे ही यह पूजा का बिल पत्र दिया स्त्री को तो उसके मन की जो कामना है पूर्ण हुई। उसका पति जो कि संसार को विषमय करके रखा था। संसार को जहर करके रखा था। उसका हृदय परिवर्तन हुआ और इस तरह का 180 डिग्री उसमें चेंज आया कि सिर्फ वह संसार के भीतर में उसने शांति वो प्राप्त की। संसार में वह शांति दे सका। उसकी पत्नी को सिर्फ इतना ही नहीं किंतु ठाकुर का यह जो भक्त परिवार है उसमें भी वह शामिल हो गया था। तो मां के पास में यह मंत्र की शक्ति थी। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु मां ने जो है इस भक्त स्त्री जो दूसरा इंसिडेंट हमने देखा उसमें मां ने इस तरह से स्पष्ट रूप से मिथ्या वचन क्यों कहे कि यह गोलाप मां ही है मां उनको प्रणाम करो। तो और खास करके ठाकुर के साथ में जब हम कंट्रास्ट करते हैं तो यह मां का इस तरह का बिहेवियर हमको बड़ा ही अद्भुत प्रतीत होता है। तो मेरा अभी देखिए जगत जननी के बिहेवियर के ऊपर में व्याख्या करना इसमें बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी फेल हो जाते हैं। तो हम किस मुंह से इस तरह की व्याख्या या तो किस तरह से उसका सॉल्यूशन दें छोटी सी बुद्धि लेकर के किंतु फिर भी अब बुद्धि तो दी है मां ने ही दी है तो इसी बुद्धि का इस्तेमाल करके मुझे जो ऐसा लग रहा है कि देखिए कि मां जो है और ठाकुर है ठाकुर का ये जो आध्यात्मिक जगत में जैसे हमने पहले भी डिस्कस किया था कि ठाकुर एग्ेंंपलीफाई अ स्पिरिचुअल पर्स्यूट ऑफ ह्यूमैनिटी एक मनुष्य का दिव्यत्व की ओर जो यात्रा है जो उसकी यह जो गति है उसको सीखो उस एस्पेक्ट को एग्ेंंपलीफाई करते हैं श्री रामकृष्ण जबकि यह कम्युनिटी जो है यह जो सांसारिक जगत है उसमें कैसे रहना यह शिक्षा हमको देती है मां शारदा और यह जो ओवरऑल सिविलाइजेशनल राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन जो है वो क्यों सिविलाइजेशन राइज होती है फॉल होती है उसको किस तरह से भारत को या तो फिर पूरे विश्व की मनुष्य प्रजा को हम एक उच्च से उच्चतर इस इवोल्यूशन के स्टेजेस तक ले आ सके। दैट सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग हमको स्वामी विवेकानंद देते हैं। तो ये आइडियल भी जो है उसको आइडियल को उसके कॉन्टेक्स्ट में देखना है। सत्य का आइडियल आप देखिए। ठाकुर के जीवन में आध्यात्मिक जगत जहां तक प्रश्न है मनुष्य का ईश्वर के साथ में जो रिलेशन है वहां पर सत्य एब्सोल्यूट होना चाहिए। हंसी मजाक में भी मिथ्या बात नहीं करनी है। असत्य वचन नहीं कहना है। जबकि ये जागतिक सांसारिक जगत है। यहां पे यह त्याग वैराग्य सत्य वगैरह आदर्श जो है उसको अभी यह नहीं कहता हूं कि डाइल्यूट कर देना चाहिए। वरना तो वो आदर्श रहेंगे ही नहीं। आज मुझे अच्छा लगा मैंने सत्य वचन कहा कल मुझे वो मेरे मेरे बेनिफिट के लिए मैंने असत्य भी बोल दिया तो ऐसा तो नहीं चलेगा किंतु फिर भी कुछ-कुछ स्पेसिफिक सोशल सिचुएशंस जब खड़ी हो जाती है तब निस्वार्थ होकर के हम इस आदर्श से एक स्टेप नीचे आ सकते हैं। निस्वार्थ सबसे बड़ा इंपॉर्टेंट फैक्टर है। मां के हृदय में थोड़ा सा भी स्वार्थ होता तो वो ठाकुर को झूठ बोलकर के ज्यादा दूध नहीं पिला सकती थी। यदि मां के हृदय में नेम और फेम या तो गुरुत्वपन का जो थोड़ा सा भी भाव होता थोड़ी सी भी गुरुगिरी मां के भीतर में होती तो फिर मां उस महिला को मिथ्या वचन कह करके गुलाब मां के पास में नहीं भेज सकती थी कि जाओ उन्हीं को प्रणाम करो। वही तो श्री श्री मां है। देखिए हो सकता है ठाकुर के केस में मां का जो मोटिवेशन बड़ा क्लियर दिखता है कि हां ठाकुर के स्वास्थ्य की रक्षा हो और ठाकुर के स्वास्थ्य की रक्षा से जगत कल्याण चलता रहे। इसलिए यदि मां को मिथ्या वचन कहना पड़े तो उसमें दोष नहीं है। और यहां पर इस महिला का आध्यात्मिक कल्याण उसके हृदय में जो संदेह ऑलरेडी कमरे में प्रवेश करने के समय था वह संदेह का संपूर्ण निराकरण हो जाए क्योंकि जब तक हमारे हृदय में यह संशय राक्षस बैठा रहता है तब तक हम लोग आध्यात्मिक जगत में ज्यादा विकसित नहीं हो पाते हैं। कल भी हमने वो कहानी देखी थी कि हमारे संघ में ही जॉइ करने वाला एक साधु विश्वविद्यालय का यह विद्यार्थी अपने गांव में जाकर के अनपढ़ गुरु को वो जो पंडित थे वहां के ब्राह्मण उसको कहता है पूछता है मां से दीक्षा तो लेनी है किंतु मुझे थोड़ा सा संदेह है कि ठाकुर के बारे में इतना सब लिखा गया है। ठाकुर की महिमा महत्ता विश्व को पता है पूरे किंतु मां के बारे में तो ऐसा कुछ लिखा नहीं गया तो यह अनपढ़ ब्राह्मी गांव का गवार वो कह देता है इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी को कि देखो भाई मैं तो अनपढ़ हूं तुमने इतना सा सब जो स्टडी वगैरह किया है किंतु फिर भी यह मेरे मन में तो यह बात आती है कि जो अवतार है नारायण है उनकी धर्मपत्नी कोई सामान्य स्त्री नहीं हो सकती वो शक्ति नारायणी स्वयं है। तो क्या है कि एक सहज और फिर यह बात सुनकर के यह लड़के के मन में यह जितने भी डाउट थे चले गए। उन्होंने उसने मां के पास में दीक्षा भी ली। भविष्य में रामकृष्ण संघ उसने ज्वॉइ भी किया। तो देखिए कि हमारे मन में थोड़ा सा भी संदेह बना रहेगा तो आध्यात्मिक जीवन में हम ज्यादा उन्नति नहीं कर पाएंगे। स्वामी जी की तरह हमारे में शक्ति होनी चाहिए कि संदेह है तो संदेह को निराकरण करके उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचे और फिर अपने को संपूर्ण समर्पित कर दें। यहां पर हम लोगों के साथ में ज्यादातर होता क्या है? संदेह का संपूर्ण रूप से निराकरण भी नहीं होता। संदेह हम पोषण करते ही रहते हैं। दूसरा कि यानी सरल विश्वास भी नहीं आता। दूसरा कि स्वामी जी की तरह कैरेक्टर की शक्ति भी इतनी नहीं कि हम संदेह को संपूर्ण रूप से निराकरण करके परीक्षा करके अवतार की परीक्षा करके संदेह का निराकरण करके फिर हम शरणागति प्राप्त करें और दोनों हमारे में नहीं है बोलकर के हम संसार विष चक्र में झोले खाते रहते हैं। तो इस औरत के साथ में ऐसा ना हो मां के ऊपर में संदेह भविष्य में कभी ना हो। गोलाप मां ने जब स्पष्ट कहा कि मनुष्य का चेहरा और ईश्वरी का चेहरा इन दोनों में क्या तुमको फर्क नहीं लग रहा है तो मां के भीतर में नारायणी जगत जननी स्वयं विराजमान है मां का चेहरा जगत जननी का चेहरा है यह एक बार दृढ़ रूप से बैठ गया स्त्री के मन में फिर कभी भी उसके आध्यात्मिक जीवन में बहुत बड़ी विपत्ति नहीं आने वाली तो वहां पे निस्वार्थ पूर्वक ठाकुर के कल्याण के लिए यहां पर निस्वार्थ ार्थता पूर्वक उस महिला के कल्याण के लिए मां ने थोड़ा सा असत्य वचन का सहारा लिया था। तो अभी यह मेरा डेफिनेशन है। इसके बारे में बहुत सारा आप कह सकते हैं। बहुत सारा माने इस इंसिडेंट के ऊपर में एक पूरा पीएचडी थीसिस लिख सकते हैं कि किस तरह से मां और ठाकुर एक कंट्रास्ट किस तरह से है। आध्यात्मिक जो हमको शिक्षा देते हैं इसमें। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट कल मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। ओम