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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज अव तरणिका में से हम लोग पाठ कर रहे थे हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज शक्ति के अवतरण की क्या प्रथा है उसको हमको समझा रहे हैं महाराज ने कहा था कि गीता में भगवान ने कहा है चंडी में भी देवी ने कहा है कि बार-बार हम लोग पृथ्वी पर जन्म धारण करेंगे खास करके भारत की इस पुण्यभूमि के ऊपर में पुण्य भूमि पर असुरों का संहार करने के लिए इसके बावजूद भी जब भी अवतार सही सही में आते हैं अवतार या शक्ति बहुत सारे लोग उनके ऊपर में संदेह करते हैं किंतु इस संदेह के बावजूद अवतार मनुष्य देह धारण करके ही आएंगे शक्ति नारी देह धारण करके ही आएंगी क्यों क्योंकि तभी जद जब हम इन लोगों को देखेंगे कि हां मनुष्य सहज उनका उनके जीवन में सफरिंग भी है और इस सफरिंग के बावजूद इनके भीतर में से यह देवी प्रकाश प्रकट हो रहा है तब तो कहीं जाकर के हम उनमें से कुछ शिक्षा लेंगे वरना यदि मां काली स्वयं पृथ्वी पर आ जाए तो फिर मां काली तपस्या करती है या फिर वह धर्म का पालन करती है तो क्या फर्क पड़ता है किसी को व हम लोग कहेंगे कि अच्छा वो तो मां काली स्वयं है उनके लिए धर्म का पालन करना कौन सी बड़ी बात है हम लोगों की तरह जो हम लोग संसार की चक्की में पीसते हैं तो हम लोगों की तरह उनको तो कोई यह सब ना ही जवाबदारी है ना ही कोई रिस्पांसिबिलिटी है ना ही कोई शारीरिक पीड़ा व्याधि ऐसा कुछ है ना ही हमारी तरह उनको कोई संसार निभाना है नौकरी करनी है बिजनेस करना है या कुछ भी करना है उनको तो यह सब है नहीं फिक्र तो उन लोगों के जो आदर्श है वह हमारे जीवन में कहां हम लोग इंप्लीमेंट करने वाले हैं इस का एक प्रश्न अवश्य आ जाएगा किंतु हम देखते हैं कि यदि वह मनुष्य देह धारण करके आते हैं और फिर जब देखते हैं कि हमारी तरह ही पीड़ा में से व्याधि में से बीमारी में से बुढ़ापे में से यह सांसारिक जवाबदारी में से रिस्पांसिबिलिटी में से पीसते पीसते सांसारिक चक्र में उसके बावजूद यदि वह धर्म का आदर्श वेदांत का आदर्श पकड़ कर के जीते हैं तब हमको लगेगा कि हां इनमें से थोड़ा बहुत तो हमको ग्रहण करना ही चाहिए मां के जीवन की आखिरी घड़ियों की एक बात हमने पहले भी कही थी कि एक लड़का आया और बोला कि मुझे मां का दर्शन करना है मां से दीक्षा लेनी है मां का आखिरी समय चल रहा था काला ज्वर इतना मां को शरीर में इतनी पीड़ा हो रही थी पथारक्वरी जी को शरत महाराज तो वहां पर सब कुछ देखभाल करते थे उद्बोधन में तो उनको पता था कि मां जैसे ही किसी को दीक्षा देगी वे लोग जैसे मां को स्पर्श करके प्रणाम करेंगे तो वैसे ही इनका पाप मां अपने शरीर में ग्रहण कर लेगी इनको तो मुक्ति मिल जाएगी किंतु मां का बिचारी का क्या होगा देखिए सोच करके तो सबका प्रणाम भी बन था दीक्षा भी बन थी और सब कुछ तो यह लड़का अभी जोर जोर से हल्ला मचाने लगा कि अरे क्या मां के ऊपर में सिर्फ काफी लोगों का अधिकार है हम लोग क्या मां के पास जाकर के प्रणाम वगैरह निवेदन नहीं कर सकते यह कौन सी बात है ऐसा आप क्यों कर रहे हैं तो मां जब मां ने जब सुना अपने कमरे में लेटी हुई थी व पूछा किसी को कि अरे ये किस चीज का हल्ला हो रहा है बाहर में तो किसी ने बोला कि अरे मां कोई आपको प्रणाम करने को आया है दीक्षा लेने को शायद तो महाराज जी उनको भीतर में नहीं आने दे रहे तो माने इतना कष्ट पूरा शरीर जैसे कि क्षय हो गया था कुछ ही दिनों में तो शरीर चला भी जाने वाला था उस अवस्था में बड़ी मेहनत करके अपने बिस्तर पर बैठ कर के खड़ी हुई और कहा कि बुलाओ उसको मैं उसको दीक्षा दूंगी तो यह देख कर के मां के जो सेवक सेविका आए थी वो बड़े ही परेशान हो गए बड़े ही भयभीत हो गए कहा मां आपकी यह परिस्थिति यह लड़के को आप दीक्षा देगी उसको प्रणाम उसका स्वीकार करेगी उसका पाप आपके शरीर में प्रवेश करेगा तो यह परिस्थिति में ऐसा जब होगा तो क्या से क्या नहीं हो जाएगा तो मां ने क्या उत्तर दिया था कि हम लोग क्या रसगुल्ला खाने के लिए यहां पर आए हैं तो मां ने लड़के को बुलाया मां की आज्ञा से उसको प्रवेश मिला दीक्षा भी दी उसने प्रणाम भी किया फिर जब उसके कुछ दिनों के बाद में ही मां का देह त्याग हुआ जब हम इसको पढ़ते हैं तब हमको लगता है कि देखो दया करुणा जिसको कंपेज कहते हैं जिसको कि दूसरों के प्रति स्नेह और ममत्व जो कहते हैं वह हम में जद मां जितना ना हो तो एक थोड़ा सा रत्ती भर तो हम में होना चाहिए वरना यदि हमारा मन दूसरों के दूसरों के प्रति विवेश से भर जाएगा तो फिर हमारा जीवन तो जहर हो ही जाएगा किंतु हम जिस समाज में रहते हैं हम जिस परिवार में रहते हैं उसको भी पूरे पूरा नष्ट कर देंगे तो हमको समाज के लिए आशीर्वाद होना है तो यह जो द्वेष यह वेर भाव यह चारों ओर चल रहा है वह हमारे सामने जब आए तो हमको नीलकंठ की तरह जब देव असुर का युद्ध हुआ और उसके लिए समुद्र मंथन करके शस्त्र निकालने की बात आई तो सबसे पहले वह हला हर जहर निकला तो ये हलाहल कौन पान करेगा इसको वैसे ही फेंक देंगे पृथ्वी में तो पृथ्वी जल जाएगी संसार भस्मा हो जाएगा तो फिर भगवान शिव को बुलाया गया भगवान तो भोले नाथ है आकर के विष पान कर लिया तो विष पान करने से गला जो है उनका पूरा नीला हो गया इसलिए उनको नीलकंठ कहते हैं तो यह संसार का विषपान यदि हम लोग नहीं करेंगे थोड़ा बहुत तो यह संसार में विष फैलता ही जाएगा फैलता ही जाएगा और अभी देखिए ये कितना युद्ध कितना सब कुछ हो रहा है मैं मुझे थोड़ा सा ये न्यूज पढ़ने की एक हैबिट है तो मैं आधा घंटा एक घंटा जैसा कुछ न्यूज़ वगैरह देखता हूं प्रति दिन तो मैं देखता हूं कि अरे बाप रे ये जो भी युद्ध आरंभ करता है जो भी दूसरों की हत्या आरंभ करता है उसका उस हमेशा एक जस्टिफिकेशन रहता है कि हां मेरे साथ में अन्याय किया गया इसके लिए मैं दूसरों के साथ में अन्याय करूंगा किंतु भाई अपने साथ में अन्याय हुआ तो फिर उसका सॉल्यूशन यह नहीं है कि हम दूसरों के ऊपर में अत्याचार करें यदि मेरे साथ में अन्याय हो रहा है मेरे ऊपर में अत्याचार हो रहा है तो भारत के जितने भी हमारे संविधान के ये जो फाउंडर्स थे भारत देश के जो फाउंडर्स है हमारे फ्रीडम फाइटर्स थे देखिए उन्होंने क्या सोचा कि सबसे पहले तो हमारे में ही वीकनेस है हम हिंदुओं में और पहले हमारी जो वीकनेस है कि इतने सारे बड़े एक अपना सोसाइटी का एक हिस्सा जिसको कि हमने अछूत बोल कर के या तो फिर निम्न जाति के बोलकर के हमने यह सब अधिकारों से सुविधाओं से वंचित किया है है उनको फिर से प्रॉपर हिंदू फोल्ड में लिया जाए फिर से उनको सब उनके अधिकार वापस दे दिए जाए तब कहीं जाकर के हमको हमारे ऊपर में स्वतंत्र हमारे ऊपर में जो विदेशी लोग अत्याचार कर रहे हैं उसका सामना करने का तब हमको हक मिलता है मैं दूसरों का अधिकार हनन कर रहा हूं और फिर मैं जाकर के इन लोगों को कहूंगा कि आप मुझे अधिकार दीजिए जद हमने भारत के खुद के जो समस्याएं हैं जो कि ठाकुर ने स्वामी जी ने और बाद के फ्रीडम फाइटर्स ने सभी ने रिकॉग्नाइज की थी कि जब तक हम हमारे खुद का घर ठीक नहीं करेंगे तब तक जदी हमको फ्रीडम भी जदी मिलेगा तो वो फ्रीडम को हम डाइजेस्ट नहीं कर पाएंगे ठाकुर ने एक बार क्या कहा था हृदय को कि यदि मैं चाहता तो पूरे कामर पुकुर को सोने का मड़के जाता किंतु इससे क्या लोगों की गरीबी दूर होती या लोगों की समस्याए दूर होती नहीं होती जो कुछ लोग अपने हाथ में पावर हथिया लेंगे और कुछ जिनके पास में सब कुछ वह कलेक्ट कर लेंगे और फिर फिर से वही अत्याचार जो अत्याचार आज पहले यह जो अफगानिस्तान से आए हुए जो सब लोगों ने किए इसके बाद में जो अत्याचारी य ब्रिटेन से आए हुए उन लोगों ने किए ईस्ट इंडिया कंपनी बाद में ब्रिटिश एंपायर यही अत्याचार हमारे ही राजा लोग हमारे पर करेंगे जब तक हम अपने को खुद को रिफॉर्म नहीं करते तो यह सेल्फ रिफॉर्मेशन की प्रोसेस से ही हमको अपनी रियल रियल फ्रीडम प्राप्त होती है तो दिस इज द डेफिनेशन ऑफ रियल फ्रीडम कि स्पिरिचुअल फ्रीडम सबसे पहले चाहिए सबसे पहले अपने मन को काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर इस तरह के दुर्गुण जो है इससे अपने को मुक्त करें तब कहीं जाकर के हम इस समाज के लिए कुछ अच्छा कर पाएंगे या तो फिर मेरे पर जो अत्याचार हो रहा है उसका मैं प्रतिकार कर पाऊंगा यदि कोई मुझ मेरे साथ में इस तरह का व्यवहार करता है जो कि मुझे नहीं पसंद है तो सबसे पहले मैं क्या सोचूंगा कि मेरे पास में थोड़ा सा पावर आ जाने दो मैं इसको दिखा दूंगा किंतु यह दिखा देने वाली बात जो है इससे क्या होगा जो मेरे पर अत्याचार कर रहा है उसके पास में आज पावर है इसलिए वह पावर का शक्ति का दुरुपयोग कर रहा है कल वह शक्ति मेरे पास आ गई तो उसी शक्ति का दुरुपयोग मैं फिर दूसरों के ऊपर में करना शुरू कर दूंगा फिर वो दूसरा वो सोचेगा कि अच्छा मेरे पास में शक्ति आ जाने दो मैं उसको दिखा दूंगा अभी इसके पास में अभी तो संसार चक्र तो चलता ही रहता है ना आज कोई राजा है तो कल रंग कहे आज रंग कहे तो कल राजा है तो उसके पास में शक्ति आ गई तो वो अभी उसको दिखा देगा माने ये संसार में यह वेर का चक्र ये चलता ही रहेगा ये रिवेंज साइकल ऑफ रिवेंज एंड वायलेंस चलती ही रहेगी जब तक हम में से से कोई खड़ा होकर के विष पान करने को तैयार ना हो जाए वह कहेगा कि अच्छा मेरे पर जो अत्याचार हुआ है इस तरह का अत्याचार मेरे पास में जब शक्ति आ जाएगी मैं दूसरों पर नहीं करूंगा इनफैक्ट आई विल लर्न फ्रॉम दिस पन यह जो शैतानिया यह जो हैवानियत फैला रहे हैं जिसका कि मुझे भोग बनना पड़ रहा है जिसको कि मुझे सफर करना पड़ा है जदी मेरे पास में शक्ति आएगी तो मैं इस समाज में से यह कुप्रथा ही यह कु व्यवस्था ही यह दुरावस्था ही मैं इस समाज में से मिटा दूंगा सबके लिए समान अधिकार रहेंगे सबको समान हक प्राप्त होंगे सबको अपने जीवन जीने के लिए एक सुंदर एक एटमॉस्फियर में खड़ा करूंगा एक प्रॉपर लीगल सिस्टम है प्रॉपर ज पुलिस सिस्टम है प्रॉपर आर्मी है प्रॉपर सोशल इंस्टिट्यूशन है प्रॉपर गवर्निंग इंस्टिट्यूशन है इस तरह का फ्रेमवर्क में खड़ा करूंगा रामकृष्ण मिशन जो आज कर रहा है जब स्वामी राजा महाराज बाबूराम महाराज यह लोग पूरा ईस्ट बंगाल गए थे आज का बांग्लादेश तो उस समय ढाका में ना कि कहीं पे वो सब लड़कों के साथ में बात हो रही थी तो लड़के बड़े रेवोल्यूशन थे वो बोल रहे हैं कि बम फेंकें गोली मारेंगे और यह सब ब्रिटिश ऑफिसर को हटा देंगे यहां से और फ्रीडम प्राप्त करेंगे तो राजा महाराज कह रहे हैं देखो यह सब तुमको करना हो तो करो किंतु यह रामकृष्ण मिशन की प्रथा नहीं है स्वामी जी ने पहले ही कहा है कि हम लोग पॉलिटिक्स में इवॉल्व नहीं होंगे इनफैक्ट निवेदिता जब पॉलिटिक्स में इवॉल्व होने का प्रयत्न कर रही थी शुरुआत कर रही थी तो हमको अपने हृदय पर पत्थर रख कर के निवेदिता स्वामी जी की कितनी प्रिय शिष्या थी निवेदिता के प्रति रामकृष्ण संघ के साधुओं का कितना श्रद्धा भक्ति था कितना ही उन उसके ऊपर में स्नेह था तो फिर भी अपने हृदय पर पत्थर मुख करके राजा महाराज को ये एडवर्टाइज न्यूज़पेपर में देना पड़ा कि सिस्टर निवेदिता के साथ में रामकृष्ण मिशन का अभी कोई भी संपर्क नहीं है वो जो कुछ भी कर रही है वो अपने खुद के इनिशिएटिव से कर रही है तो तब से लेकर के हमने ठीक किया है कि किसी भी तरह की पॉलिटिकल एक्टिविटी में नहीं जाएंगे भारत देश को भीतर से स्ट्रेंथ करेंगे जैसे कि अपनी इम्यून सिस्टम होती है यदि हमको हमारी इम्यून सिस्टम वीक हो जाएगी तब क्या होगा कोई भी बीमारी आ कर के हमको पकड़ लेगी किंतु यदि हमारी इम्यून सिस्टम स्ट्रांग रहती है तो भले चाहे बाहर में कोरोना फेल रहा है ना कि वह प्लेग फेल रहा है ना कि जो भी पडेम फेल रहा है हमारे शरीर पर आक्रमण करेगा तो कुछ दिन एक दो दिन बुखार आएगा किंतु फिर इम्यून सिस्टम फाइट बैक करेगी जो भी यह वायरस फायरस है सबको मार के भगा देगी तो हमको भारत की इम्यून सिस्टम भीतर से स्ट्रेंथ करनी है एजुकेशन दे कर के वेदांत का प्रचार करके यह स्कूल्स एंड हॉस्पिटल बंधा करके फिर यह रूरल डेवलपमेंट का ट्राइबल डेवलपमेंट का कार्य करके स्कूल चिल्ड्रेंस जो है व बच्चों के लिए बाल संस्कार शुरू करके यह हमारे आश्रम में कितनी ही बहने आती है कितना अच्छा काम करती है आश्रम में कितना अच्छा वॉलंटिली देखिए तो इस तरह से हमको सोसाइटी को स्ट्रेंथ करना है दिस इज द वे ऑफ रामकृष्ण मिशन तो राजा महाराज यह सब समझा रहे थे तो वह फिर वहां पर एक लड़का था वो लड़के ने बोल दिया कि स्वामी जी आप महाराज जी आपको स्वामी जी कौन है व समझ में ही नहीं आया आप स्वामी जी को पूरा मिसअंडरस्टूड किए हैं जैसे ही वोह लड़के ने ऐसा कहा बाबूराम महाराज बड़े ही नाराज हो गए बोले कि अरे स्वामी जी के साथ नरेंद तो जब दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास आ रहा था तब से ही तो यह सब लोग ठाकुर के नरेण को पहचानते हैं बोला कि जिनके साथ में हमने भोजन किया आहार किया जिसके साथ में हमने चर्चा की वार्तालाप की खेले झगड़ा भी किए एक साथ में रहे ठाकुर के साथ में भी और बाद में वरा नगर मठ में भी एक साथ में ठाकुर के पास हमने शिक्षा ली और तुम बोल रहे हो कि उस स्वामी जी को हम नहीं पहचानते तो बाबूराम महाराज बोले चलो तुम घोड़ा हो मैं तुम्हारी पिठ पर बैठूंगा ऐसा बोलके ये लड़के को ऐसा वो घोड़े की तरह उसको बिठाया और उसके उसके पीठ पर बैठ गए बोला चलो अभी तुम घूमो पूरे कमरे में तो लड़का घूमा और तब कहीं जाकर के उसमें अकल आया देखिए ये सब डायरेक्ट डिसाइल के पास में किस तरह का स्पिरिचुअल पावर होता है स्पर्श मात्रा से किसी का संस्कार पूरा उलट पुलट कर देते हैं कुसंस्कार होने से या दुर्बुद्धि होने से सब उसको भगा देते हैं तो इस तरह से करने से बच्चे का भीतर में जो भी संस्कार होगा इस जन्म का पूर्व जन्म का वह जागृत हो गया और फिर उसने कहा कॉलेज का लड़का था कि नहीं नहीं अभी डायरेक्टली तो मुंह से नहीं कहेगा किंतु भीतर में जो घटना वली एक बार शुरू हुई एक नया चिंतन प्रवाह शुरू हुआ तो बाद में फिर वही बेलूरमठ में आकर के न्यास ग्रहण किया और स्वामी निखिलेश्वर निखिलानंद महाराज जो कि अभी वो बाद में न्यूयॉर्क के हेड हुए और बहुत अच्छी-अच्छी किताबें वगैरह लिख कर के ही इज वन ऑफ द ग्रेट मंक ऑफ अवर ऑर्डर तो देखिए कि किस तरह से लोगों का जीवन परिवर्तन रामकृष्ण मिशन करता है और इसी तरह से सोसाइटी को स्टन करना है तो जब हमको महाराज यहां पर लिखते हैं कि नर देह धारण करके इनको बार-बार आना पड़ेगा हमको संस्कार और और अच्छे सदगुण सिखाने के लिए संस्कार और सद्गुण से ही हम अपने को अच्छा बना पाएंगे और सोसाइटी को हम फ्री कर पाएंगे सोसाइटी को अत्याचार से मुक्त कर पाएंगे नहीं कि बार-बार यह युद्ध और विग्रह के चक्र में वि चक्र में फस करके इसीलिए आध्यात्मिकता जहां पर जिस सोसाइटी में स्ट्रांग है वही सोसाइटी सही सही फ्री है वही सोसाइटी सही सही खुश हैप्पी है वही सोसाइटी सही सही रहने के लिए लायक है आजकल लोग विदेश में जाने के लिए इतना उत्सुक हो रहे हैं विदेश में इतना पैसा मिलता है इतना यह मिलता है किंतु देखिए कि वही लोग उल्टा ऊपर से योगा मेडिटेशन सीख रहे हैं यह इजराइल के बारे में मैंने पहले कहा था कि वहां के सोल्जर है यहां ऋषिकेश वगैरह में घूमते हुए मिल जाएंगे किसी बाबा को खोजते हुए ना कि किसी धर्म गुरु को खोजते हुए उस साधु को खोजते हुए उसके पैर के पास में बैठेंगे उसकी बातें सुनेंगे क्योंकि उनको पता है कि भोग की जो सीमा चरम सीमा के ऊपर वो लोग पहुंच गए उससे भी उनके मन को शांति नहीं मिली है और हां ऐसा नहीं है कि हमको यह जो मटेरियल प्रोस्पेरिटी है उसका त्याग करना है रामकृष्ण मिशन में आप देखेंगे कि साधु लोग जो भी हमारी एक्टिविटीज हो रही है मंदिर में ठाकुर की सेवा हो रही है सब कुछ एक अच्छे अच्छे रूप से हो रहा है यहां पर गरीबी आपको नहीं देखने को मिलेगी गरीबी कोई अच्छी चीज है इस तरह की बात कोई नहीं करता जीवन निर्वाह करने के लिए जीवन धारण करने के लिए जो कोई जरूरत है हमको अपने स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए वह हमको करना ही करना है किंतु फिर उसके पीछे में पागल नहीं हो जाना है वही एक चीज हमको याद रखनी है महाराज जी आगे लिखते हैं ए शिखा दन बहु प्रकारे होया थाके जब वे लोग नरदह धारण करके आते हैं शिक्षा देने के लिए तब क्या होता है जो शिक्षा देते हैं वो बहुत रूप से बहुत विभिन्न प्रकार से हो सकती है कोनो खेत्रे उपदेश छले किंबा शयो आचरण आदि सहाय कोई कोई विषय में उपदेश देकर के या तो फिर अपने आचरण की सहाय से महाजन समा दृत भाव राशिर पराकाष्ठा प्रदर्शित होए या तो फिर उपदेश देकर के या तो फिर अपने जीवन में प्रकट करके अपने जीवन के प्रसंग के द्वारा इनकी भाव राशि जो है वह प्रकट होती है ठाकुर का वोह है कि एक आदमी बेल दक्षिणेश्वर में वह सोच रहा है कि यह ठाकुर बार-बार यह जो भाव का आवेश होता है व भाव का आवेश कुछ नहीं है मां का दर्शन वगैरह कुछ नहीं है वह नाटक कर रहे हैं और इस तरह से नाटक करके मथुर बाबू का सहानुभूति अर्जित करना चाहते हैं जिससे कि उनको धन प्राप्ति हो बाबू खुश हो जाएंगे उसको पैसा दे देंगे तो ऐसा सोच कर के उसके मन में ठाकुर के प्रति बड़ा ही वैमनस्य भाव था बड़ा ही विद्वेष भाव था एक दिन क्या हुआ ठाकुर भाव में पड़े हुए थे पूरे आधे बेहोश की तरह पूरे भाव में मां का दर्शन करते हुए तब इस आदमी ने जाकर के ठाकुर को अपने पैरों से बहुत सारे बार मारा ठाकुर के श्री अंग पे आघात किया जब ठाकुर भाव में से बाहर आए देखा कि पूरे शरीर पे वो इस तरह से जो आघात हुए उसके निशान लग गए जब ठाकुर के वो जो सब सेवक वगैरह वहां पर आए देखा कि यह अवस्था ठाकुर की तो वो इतने क्रुद्ध हो गए इतने गुस्सा हो गए कहा कि चलो जाकर के मथुर बाबू को बताते हैं मथुर बाबू ने कहा था एक बार जब ठाकुर भाव में आकर के वो शिव महिमन स्तोत्र का पाठ कर रहे थे वो द्वादश शिव मंदिर जहां पर उसके सामने तब मथुर बाबू खुद वहां पर खड़े थे तलवार लेकर के कि बोला कि जो भी ठाकुर का ये जो पाठ कर रहे हैं उसमें खले पहुंचाएगा उसका सर मैं काट दूंगा तो मथुर बाबू का तो ऐसा गुस्सा था ठाकुर के ऊपर में कोई ठाकुर जो शिव महिमन स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं उसमें कोई व्याघात करेगा तो सर काट देंगे तो ठाकुर को जिसने आघात किया उसके साथ में तो क्या से क्या नहीं करेंगे तो ठाकुर ने कहा कि अरे छोड़ दो उसको बेचारे से गलती हो गई मथुर बाबू को पता चलेगा तो उसके साथ में क्या नहीं करेंगे छोड़ दो इसको जाने दो तो मैं उसको क्षमा करता हूं तब जब हम ठाकुर की यह घटना सोचते हैं सुनते हैं तो हमको लगता है कि चलो हम में भी क्षमा का थोड़ा सा गुण सद्गुण हम डेवलप करें तो यह कि कभी-कभी उपदेश देकर के तो कभी-कभी अपने जीवन के प्रसंगों से दिखा करके यह लोग यह नया वेदांत का भाव है उसका प्रचार करते हैं पराकाष्ठा प्रदर्शित होए एवं उहा देर अधिकतर गंभीर जो संपादित होए उनके खुद के जीवन के प्रसंग से उपदेशों की पराकाष्ठा हमारे सामने प्रकट होती है और उसका गंभीर भी प्रकट होता है बात ऐसी नहीं है कि ठाकुर ने कहा कि क्षमा धैर्य शल इस तरह के सद्गुण तुम लोगों अपने में स्थापित करो सिर्फ मुंह से बोलने से नहीं होता उन्होंने अपने जीवन में दिखा दिया है जिससे कि इस सद्गुणों का ंभ भीर प्रभाव महत्व हमारे जीवन में और ज्यादा अच्छे से वह छलके या तो फिर हम लोग उसको और अच्छे से ग्रहण कर पाए कोनो स्थले लीला विग्रह अवलंबन उन्नत चरित्र गठने जन्म जुगो प जोगी नवीन पंथा निर्धारित होए कभी-कभी लीला विग्रह के अवलंबन से उन्नत चरित्र के गठन के लिए इस युग के उपयोगी जो नवीन पंथा है वह निर्धारित होता है वह प्रदर्शित होता है लीला विग्रह धारण करके नर देह धारण करके नए समय के अनुसार क्या व्यवस्था है जो हमारे मैत्री र्गी मैत्रेई या तो फिर याज्ञवल्क्य या तो फिर वशिष्ठ भृगु यह सब ऋषि मुनियों यह जो सब ब्रह्मवादिनी इनके जीवन में आज से हजारों साल पहले जो आदर्श उन्होंने अपने जीवन में दिखाया था जिस धर्म के रास्ते पर चले थे वही धर्म का रास्ता इस युग में क्या फिर से उसके ऊपर में चलना उचित है नहीं है कि नहीं यह नरदह धारण करके लीला विग्रह करके अपने जीवन में प्रदर्शित करते हैं फिर उस जीवन को हमको अनुसत करना है आबार क्षेत्र विशेष लीला छले विविध विविध चित्त मोहन चित्त विमोह भगवत भावे प्रति मानव हृदय के अधिकतर आकृष्ट करा होय और कुछ कुछ क्षेत्रों में लीला छले लीला यानी कि उनके जीवन की घटना वली के माध्यम से छल अर्थात की अभी माने छल करना यह देखिए ये सब वैष्णव भाव है कि एक्चुअली ईश्वर को तो कोई य सब चीजों की जरूरत नहीं है वो लोग छल करते हैं वो जैसे कि वे लोग एक तरह से एक हमारे हमारी नजर के सामने एक एक तरह का आभास प्रकट करते हैं कि उनको यह सब करने की जरूरत है सीता का मां सीता का हरण हुआ तो भगवान राम को रोना आया अभी भगवान राम रोए ये कु छल है उनके हृदय में सब कुछ क्लियर है कि लीला का धर्म का स्थापन करने के लिए उनका अवतरण हुआ है अपने खुद के जीवन की घटना वली से उनको स्थापित करना है कि अधर्म के ऊपर में धर्म की जीत होती है सब कुछ पता है सब कुछ पहले से ही ठीक है रावण आएगा मा सिता का अपहरण करेगा भगवान राम रावण का वत करेंगे मा सता को मुक्त करेंगे सब कुछ ठीक है किंतु फिर भी एक छल कर रहे हैं जैसे कि हमारे सामने एक तरह का आभास उत्पन्न कर रहे हैं कि हां यह सब कुछ सही सही उनके जीवन में हो रहा है और वे लोग सही सही इसमें इवॉल्व है तो लीला छले विविध चित्त विमोह भगवत भावे प्रति ये चित्त विमोह भगवत भाव जो है जैसे कि वृंदावन में बालकृष्ण वो मस्ती कर रहे हैं मजाक कर रहे हैं नटखट जैसे कि बच्चे की तरह गोपियों के घर में घुस जा रहे हैं माखन चोरी करके खा रहे हैं अब गोपियों के हृदय में भी मातृ भाव का इतना प्रबल आवेश यह देख कर के होता है किंतु फिर भी ऊपर ऊपर से जैसे कि नाराज होकर के मां यशोदा के पास जाती है कंप्लेन करने के लिए कि आपका बच्चा आकर के फिर से हमारे घर में तूफान मचा रहा है फिर से मक्खन चोरी कर रहा है उसको ठीक कीजिए उसको संभालिए वरना फिर अभी हमको ना गुस्सा करना पड़ेगा ये मुंह से ऐसा बोलती है किंतु भीतर में इतना हरक इतना आनंद हो रहा है कि हां बालकृष्ण हमारे घर में आए और हमारे घर में यह लीला की ये लीला देखकर करके उनके भीतर में जो हरक येय हर्षो लास हर्षत फुल मन जो होता है उससे उनके जन्म जन्मांतर के जितने भी कर्म है सब किट जाते हैं और हमको यह भी कहना पड़ेगा जो ईश्वर के साथ में अवतरण करते हैं उनका कर्म वगैरह कोई नहीं रहता यह तो पार्षद है उनके यह तो लीला संगी है लीला संगी निया है जो कि बार-बार इनके साथ में युग युगांतर लीला करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होते हैं लीला सहाय होने के लिए तो इनके कर्म वगैरह कुछ होता नहीं है यह सब चलना है यह सब एक दिखावा है जिससे जिसको देख कर के हम लोग जो आम आदमी है जन साधारण महाराज ने जो शब्द प्रयोग आगे में किया हम जो जन साधारण है हमको इसमें से शिक्षा मिले उपदेश मिले आदर्श और प्रेरणा मिले आबार क्षेत्र विशेष लीला छले विभ विविध चित्त वि मोहन भगवत भावे प्रति विविध चित्त विमोह भगवत भाव के प्रति मानव हृदय के अधिकतर आकृष्ट करा हो ठाकुर कामर पुकुर में रहते थे तो उनका एक ऐसा था कि किसी को भी वो घमंड किसी का सहन नहीं कर पाते थे कोई घमंड में आकर के बात करेगा तो ठाकुर उसका इतना एक्यूरेट मिमिक्री करेंगे कि लोग हंसते हंसते पागल हो जाएंगे और जो घमंड करता था जो आदमी वो इस तरह की मिमिक्री ने कहा वो बेचारा पूरा शर्म के मारे पानी पानी हो जाएगा उसका तभी मुक्ति है तभी उसका निस्तार है जब वह जाकर के बाल गदाधर के वो शरण में ना आ जाता और गदाधर का था जो शरण में आएगा उसको अभयदान देगा फिर उसकी मजाक मस्करी नहीं करेगा तो अभी जिन लोगों ने गदाधर की बाल गदाई की यह लीला कामर पुकुर में देखी है इसका कुछ-कुछ वर्णन हमको लीला प्रसंग में मिलता है तो वह वर्णन पढ़कर के हमको इतना अपने हृदय में आनंद होता है और हमको लगता है कि देखिए कि जिन लोगों ने इस वर्णन को जो वर्णन कर रहे हैं इन लोगों ने जो लीला को देखा है वे लोग कितने नसीबदार होंगे कितने भाग्यवान होंगे कितने ग्रेट गुड उनका फॉर्च्यून होगा कि अवतार की स्वयं की लीला उन्होंने अपनी आंखों से देखी है लीला प्रसंग का जो यह वर्णन है में हमको कल या पर ज भी टाइम मिलेगा उसमें से हम थोड़ा सा पाठ करेंगे कि किस तरह से बाल गदाधर की लीला कमार पुकुर में थी और इसका उपभोग आनंद उपभोग वहां के स्थानिक निवासियों ने किस तरह से किया था अवश्य भाव अवश्य अवतार कार जावली ए भाव गंभीर जो संपादन नवीन आदर्श संपादन बा मानव चित्ते आकर्षण मात्र निशित हो ना अवश्य अवतार की जो कार्यावटम वह इस भाव के गांर के संपादन करने में या तो स्थापन करने में नवीन आदर्श की सं स्थापना करने में या तो फिर मानव का चित्त आकर्षण करके ही सिर्फ समाप्त नहीं हो जाते मन अवतार का जो कार्य सिर्फ इतने से समाप्त नहीं होता इसके अलावा भी वस्तुत भाव घन मूर्ति ईश्वर अवतारे उद्देश्या दी मानव बुद्धि सहाय संपूर्ण रूपे परिमाण कोरा बा बाक्य प्रकाश कोरा संभव न वाक्य प्रकाश कोरा संभव न है महाराज जी लिखते हैं सही अर्थ में देखें तो भाव घन मूर्ति ईश्वर अवतार कितना सुंदर उनको एक विशेषण दिया है भाव घन मूर्ति जितने भी मनुष्य समाज के भाव है वो मधुर भाव हो ना कि शांत भाव हो दास भाव हो कि मातृ भाव हो ना कि बालक भाव हो ना कि वीर भाव हो सभी भाव घन रूप से इस अवतार के भीतर में जो समाहित है भाव घन मूर्ति ईश्वर अवतार का उद्देश्य या तो फिर प्रयोजन मनुष्य की बुद्धि से संपूर्ण रूप से हम एनालाइज नहीं कर सकते संपूर्ण रूप से उसको ग्राह्य नहीं कर सकते संपूर्ण रूप से समझ नहीं पाएंगे वाक्य प्रकाश कोरा संभव न है हम अपने शब्दों में उसका प्रकाश भी नहीं कर पाएंगे स्वामी जी जब अमेरिका गए वेदांत का प्रचार करने की शुरुआत की तो यह वरा नगर मठ में और बाद में आलम बाजार मठ में गुरु भाइयों के मन में एक संदेह प्रकट हुआ कि नरेंद्र जाकर के ठाकुर का नाम नहीं ले रहा और यह वेदांत वगैरह क्या सब उल्टा-पुल्टा बोल रहा है यह तुर्या जी का अनुभव है वेदांत का पाठ करते थे ठाकुर ने जाकर के पूछा कि तुम्हारे वेदांत में में क्या लिखा है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वही तो इसके अलावा तो और कुछ नहीं तो तुर्या अंद जी ने कहा हां महाशय ठाकुर को ये लोग परमहंस महाशय करके पुकारते थे तो हां महाशय यह तो बात सही है इसमें वही लिखा है वेदांत में जो भी वेदांत की जितनी भी किताबें आप पढ़ लीजिए ना कि ये तत्व मंजरी कहो ना कि यह पंचदशी कहो ना कि विवेक चूड़ामण कहो ना कि शंकराचार्य का वो जो चतु सूत्री भाष्य कहो ना कि जो कुछ भी कहो ये आप जो है जो पढ़े उसके भीतर में वही सार है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या तो फिर ठाकुर ने कहा तुम इसके ऊपर में उसको प्रैक्टिस करने की आरंभ कर दो नहीं कि उसको पढ़के पढ़ के अपना अपने दिन वेस्ट करते हो अपने दिन गवाते हो तो सूर्या अंद जी ने वेदांत की जितनी भी किताबें थी सब गंगा में उन्होंने जल समाधि दे दी तो यह ठाकुर ऐसा कहते थे वेदांत के बारे में और वही स्वामी जी जाकर के वेदांत का प्रचार कर रहे हैं अपना खुद का नाम कर रहे हैं अपने खुद के फोटोग्राफ वो न्यूजपेपर में पब्लिश करवाया पेंपलेट बना कर के पब्लिश करवा रहे हैं यह क्या सब नाटक उन्होंने आरंभ किया है तो यह गुरु भाइयों के मन में भी यह संदेह था जब स्वामी जी का इनके साथ में साक्षात्कार हुआ गुरु भाइयों का तब स्वामी जी ने क्या कहा था तो तो मादर थे के भेंगे ठाकुर के पूर जगत फैले दे अर्थात तुम लोगों की समझ जो है ठाकुर के बारे में एक संकुचित समझ उसमें से वो समझ को तोड़फोड़ करके ठाकुर को इसमें से बाहर निकाल कर के पूरे विश्व में फ ला दूंगा अनंत भाव मय ठाकुर के अनंत उनके ये जो प्रयोजन है जगत में आप लोग अपनी क्षुद्र बुद्धि से क्या ठाकुर को समझे यह बात स्वामी जी उनके डायरेक्ट डिसाइल को गुरु भाइयों को कहते हैं तो यदि गुरु भाई ठाकुर के अनंत भाव को नहीं समझ पाए तो हम जनसाधारण कोई भी अवतार के भाव को किस तरह से समझ पाएंगे स्वामी जी ने कहा था कि ठाकुर के अवतरण से ब्रह्म कुंडलिनी जागृत हो गई है जैसे कि लाटू महाराज कहते थे ना कि ब्रह्म समाज में तो इतने सारे लोग आते हैं और हम जब गिनते हैं तो इतनी सारी घोड़ा गाड़ी बाहर में पड़ी रहती है पार्किंग लॉट में और दक्षिणेश्वर में देखिए कितने कम लोग आते हैं आज इतनी ही घोड़ा की घोड़ा गाड़ी बाहर पड़ी है वो उन लोगों से कम है तो अभी देखिए कि ये लोग भी सोचते थे कि वहां पे केशव सैन के पास में इतने लोग जाते हैं ठाकुर के पास इतने कम आते हैं किंतु जो कम लोग 50 100 200 300 हजार लोग ठाकुर के जीवन दरमियान उनको मिले होंगे आशीर्वाद प्राप्त किया होगा प्रत्यक्ष रूप से तो उनके तक ही ठाकुर का आशीर्वाद और ठाकुर की कृपा सीमित नहीं है पूरे विश्व ब्रह्मांड के ऊपर में ठाकुर का आशीर्वाद कृपा है और किस तरह से यह फैलती है हमको समझ में भी नहीं आएगा वह जो प्रसंग है कि एक बार ठाकुर भाव में मग्न थे और वहां पर एक ताजा वो जो ग्रास घास उगा हुआ था तो बागान में कोई उसके ऊपर में चलके गया तो ठाकुर का विश्व के साथ में इस तरह का तादात इस तरह की एक तान होता हो गई थी एक इस तरह की हार्मोनाइजेशन हो गया था कि जो घास के ऊपर में चलकर जा रहा है तो उसके मतलब ठाकुर के श्री अंग के ऊपर में उसके घाव के निशान जैसे कि कोई ठाकुर के शरीर के ऊपर में पैर रख के जा रहा है ऐसा हो गया पूरा लाल लाल हो गया उनके शरीर पे तो ठाकुर का तादात के साथ में था किस तरह से ठाकुर का आशीर्वाद इस धरा के ऊपर में भूमि के ऊपर में उतरा है और उसके थ्रू हम सब में प्रवेश कर रहा है हम लोग इसको समझ भी नहीं पाएंगे तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु