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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णा यते नमः मा शारदा देवी की किताब गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका हम पाठ कर रहे थे है अध्याय का नाम है वधु अभी इस अध्याय का अंत आ चुका है ठाकुर अपनी साधना समाप्त करने के बाद में कामर पुकुर पधारे थे ठाकुर के साथ में थे उनका भागना हृदय और भैरवी ब्राह्मणी उनकी गुरु कि जिनके द्वारा उन्होंने तंत्र साधना या तो फिर शक्ति साधना की थी अभी हमको पता है अभी तक हमने जो पढ़ा इस अध्याय में कि ठाकुर ने किस तरह से मां को धीरे-धीरे करके शिक्षा दीक्षा सब तरह से इस जगत में रहना सिखाना शुरू कर दिया था जोखन जेमोन तोख तमोन हम जिस परिस्थिति में है उस परिस्थिति के अनुसार अपने को ढालना है जेखाने जेमोन शेखाने ते मोन जिस जगह पर रह रहे हैं उस जगह की जो आवश्यकताएं हैं उसके अनुसार अपना वर्तन होना है जर संगे जेमोन तार संगे तमोन माने जिसके साथ में जिस तरह का वर्तन करना उचित है वह हमको करना है यहां तक कि मने मनुष्य की तो बात ही छोड़ दीजिए एक बार जयराम बाटी में ऐसा हुआ था यह बहुत बाद की बात है हम तो उस समय की बात कर रहे हैं यह वधु चैप्टर जो है उसमें तो अभी मां दक्षिणेश्वर गई ही नहीं है यह अभी जो मैं बता रहा हूं दक्षिणेश्वर में जाने के बहुत सालों के बाद में ठाकुर की महा समाधि के बाद में मां जब जयराम बाटी में रह रही थी फिर से उस समय की बात कि एक बिल्ली वहां पे खेला करती थी तो एक महिला भक्त एक लेडी डिवोटा वहां पर खड़ी थी तो जैसे बिल्ली को आदर करते हैं हेत करते हैं इस तरह से उसने किंतु हाथ से नहीं किंतु पैर से बिल्ली के सर को छुआ तो जैसे ही मां ने देखा कि यह लेडी यह बिल्ली के सर को अपने पैरों से छू रही है तो उन्होंने कहा कि अरे मां ने इमीडिएट कहा कि अरे यह क्या करती हो सर तो है गुरु स्थान अपना सर है वह तो गुरु स्थान है वहां पर तो गुरु के आशीर्वाद रखने के लिए गुरु अपने हाथ रखते हैं वहां पे पैर रखना उचित नहीं है बिल्ली को प्रणाम करो माने ऐसा कहा तो वह महिला भक्तो को बिल्ली को प्रणाम करना पड़ा तो देखिए कि जिसके साथ जैसा उसके साथ वैसा व्यवहार होना चाहिए मनुष्य तो है ही है इस इ में आते हैं किंतु मनुष्य के अलावा पशु पक्षी पेड़ पौधे जो कोई भी है उसके साथ में उसके उचित आदर करना चाहिए यहां तक कि एक बार क्या हुआ कि एक लेडी डिवटी वैसे ही वहां पे जयराम बाटी में ही मां के घर में झाड़ू लगा रही है तो झाड़ू लगाने के बाद में जो यह जो झाड़ू होता है उसने जोर से फेंका एक कोने में तो इमीडिएट मां ने कहा अरे यह जो झाड़ू है उसको भी उचित सम्मान देना है उसको इस तरह से फेंक करके उसकी जगह पर रखना उचित नहीं उसको बड़े ही शांति से उसको आराम से उसकी जगह पर रखो यानी ये यह जो जितने भी मां यह सब बाद के जीवन में जब मां के पास में भक्तों का समागम होता था मां यह जो उनको सिखाती थी मां ने खुद ने अपने जीवन में जो आचरण किया है सब कुछ ठाकुर ने मां को सिखाया था प्रश्न हो सकता है कि मां जगदंबा है ठाकुर के पास से सीखने की क्या जरूरत है वो जो एक ठाकुर कथामृत में कहते हैं ना कि ये वैष्णव और शाक्त दोनों के बीच में झगड़ा हुआ तो वो वैष्णव कहता है कि यह जो हमारे भगवान कृष्ण है वह भवसागर के नाविक है जो भव ये जो नौका होती है आपकी नौका को भवसागर पार करके ले जाएंगे बताइए ऐसा हमारे भगवान कृष्ण है तो शाक्त क्या कहते हैं कि हमारी जो जगदंबा है उन्होंने ही इस कृष्णा को भवसागर की नौका का संचालन करने के लिए लिए रख दिया है मां तो राज राजेश्वरी स्वयं है वो थोड़ी ना नौका का संचालन करने को आएगी वो आदेश देगी तब यह कृष्णा जाकर के नौका आपको नौका में बिठा कर के भवसागर पार करवा देंगे तो यहां पे भी ये किंतु देखिए वो तो एक हंसी मजाक में हो गया कि शाक्त और वैष्णव का झगड़ा ऐसे चलता रहता है किंतु यहां पर सही में ऐसा है ठाकुर ने स्वयं अपनी जो शिक्षा है उनकी जो जो कोई भी उपलब्धि है वो तो मां काली से ग्रहण की है और मां शारदा तो काली का ही एक अंश है तो किंतु देखिए कि ये जब पंचमहाभूत का ये शरीर धारण होता है माया के जगत में हम आते हैं तो जैसे ठाकुर ने खुद ने कहा था राम जैसे सीता के लिए रोए थे राम पूर्ण ब्रह्म सनातन स्वयं मां सीता भगवती स्वयं किंतु फिर भी मां सीता के लिए राम रोए थे जब मां का अपहरण हुआ था तो यसे माया के जगत में यह मधुर खेला यह मधुर खेल चलता रहता है जिसको देख कर के हमको आनंद आता है आजकल यह उद्बोधन से यह जो किताब है गंभीरानंद जी की उसकी ऑडियो बुक करके ने के लिए आपको मन की एकाग्रता चाहिए और फिर एक आपको अभ्यास और अध्ययन चाहिए किंतु जब मन कभी-कभी असु स्थ होता है अशांत होता है मायूस होता है तब हमारे मन को बल कौन देता है यह जो मल्टीविटामिन टेबलेट्स जो आती है मार्केट में बाजार में जो मिलती है थोड़ा सा वीकनेस लेने से होने से लोग मल्टीविटामिन टेबलेट लेना शुरू कर देते हैं फिर यह वो जो हॉर्लिक्स वगैरह ये जो दूध में डालने वाले पाउडर आते हैं वो वैसा वो एडवरटाइज करते हैं मां-बाप को बुलाने के लिए कि अपने बच्चे को यह सब खिलाइए वरना बच्चा बड़ा होकर के शक्तिशाली कैसे बनेगा ये स्पोर्ट वगैरह में कैसे पार्टिसिपेट करेगा और यह एडवर्टाइज देख कर के फिर माताजी पिताजी क्या करें बेचारे पियर प्रेशर भी होता है चलो यह सब महंगी चीजें ले लो हमको जदी किंतु मन जदी हमारा अशांत होता है तो हमको वह सब महंगी चीजें खरीदने की जरूरत नहीं है यह मां की किताब है पढ़ने से ही हमारा मन शांत हो जाएगा मन में आनंद आने लगेगा तो यह लीला इसीलिए होती है वरना जो सनातन सत्य है सब कुछ तो उपनिषदों में लिख दिए गए हैं उसके बाद में भगवान शंकराचार्य ने उसके ऊपर में कितनी टिकाई भी लिख दी है भाष्य भी लिख दिए है और शंकराचार्य के भाष्य के ऊपर में और कितनी टिकाई और वार्तिक लिख दिए गए हैं जद हमको वेदांत को समझना ही है जगत में किस तरह से रहना है और जगत के परे कैसे जाना है तो वो बहुत कुछ लिखा गया है किंतु मन को शांति तो अवतार की लीला का अध्ययन चिंतन मरण स्मरण और निदिद्यासन ऐसा करके ही मिलेगा तो यह सब लीलाएं हैं कि ठाकुर ने मां को पूरा शिक्षा और दीक्षा दिया और उसके बाद में किंतु एक संसार में जैसे कि यह मैंने ठाकुर कहते हैं ना जटिला और कुटिला होने से ही लीला की पुष्टा होती है अर्था लीला पुष्टा होए अ अ की यह लीला में जो रसा स्वाद है जैसे आप खीर बनाते हैं तो खीर में जैसे केसर डालेंगे खीर में जैसे काजू डालेंगे खीर में जैसे बादाम डालेंगे तब खीर का टेस्ट जो है स्वाद है और भी निखर करके आएगा तो वैसे ही यह जो लीला है उसमें फिर जटला टीला जैसे कुछ पात्रों को डाला जाता है जो कि झगड़ा करवाते हैं फिर झगड़े का समाधान भी होता है तो यह देख कर के हमको और भी पढ़ने का आनंद आता है तो हां पर जटिला कुटिला का पात्र का अभिनय किया था अभिनय ही है यह पूरा तो जगत संसार तो वो शेक्सपियर ने कहा ना कि होल वर्ल्ड इज अ स्टेज मुझे लगता है कि वेदांत के बारे में जद ये ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या का जद हमको ट्रांसलेशन करना है कि वर्ल्ड इज अभिनय जयराम बाटी में हो रहा था उसमें यह विलन का पात्र का अभिनय किया उस समय भैरवी ब्राह्मणी ने और भैरवी ब्राह्मणी ने एक समय जब वह दक्षिणेश्वर में आई थी ठाकुर को शक्ति साधना सिखा रही थी तब उसने ऐसा सोचना शुरू कर दिया कि हां मेरी ही वजह से ठाकुर आज इतने बड़े हुए हैं तो अच्छी बात है चलो ठाकुर ने उनसे साधना सीखी तो क्या है कि गुरु से तो यह जो अपने गुरु को आदर सम्मान देने की प्रथा है उसके अनुसार ठाकुर भैरवी ब्राह्मणी को उचित आदर तो देते ही थे किंतु एक समय ऐसा आया कि भैरवी ब्राह्मणी के मन में थोड़ा सा घमंड प्रवेश कर गया थोड़ा सा अहंकार जागृत हुआ कि हां यह जो ठाकुर जो आज इतने बड़े हैं वह मेरी ही वजह से है एक्चुअली जब भैरवी ब्राह्मणी दक्षिणेश्वर आई थी तो ठाकुर को साधना सिखाने से पहले ही एक्चुअली उसने यह प्रचार करना शुरू कर दिया था कि ठाकुर के शरीर में मन में जो लक्षण प्रकट है वो तो सब अवतार के लक्षण है तो ठाकुर को बड़ा बनाने में मेरा ही हाथ है मेरा ही हिस्सा है ऐसा मानना शुरू कर दिया था और जब जयराम बाटी आई तो देखा कि मां शारदा स्वयं वहां पर विराजित है और अभी का जो अभी का जो ये अंक नाटक में ये जो एक्ट होता है ना एक्ट वन एक्ट टू एक्ट त्री प्रथम अंक द्वितीय अंक तृतीय अंक तो जो ठाकुर का ये जो लीला विलास है पृथ्वी के ऊपर में उसमें ये जो नया अभिनय एक होने वाला था उसमें मुख्य पात्रता मां शारदा का यह भैरवी ब्राह्मणी जिस अभिनय में थी वह अभिनय समाप्त हो चुका था वह चैप्टर समाप्त हो रहा था और मां शारदा का नया चैप्टर प्रारंभ हो रहा था तो अभी भैरवी के ब्राह्मणी के मन में ऑलरेडी एक ईर्षा का उदय हुआ फिर देखा कि ठाकुर मां को लेकर के बड़े व्यस्त रहते हैं मां को सिखाते हैं मां के साथ में बातें करते हैं मां के लिए समय देते हैं तो भैरवी ब्राह्मणी ने कहा क्या ठाकुर को कि आप यदि अपनी धर्म पत्नी धर्म संगिनी के साथ में यदि ज्यादा समय बिताएंगे तो हो सकता है कि आपकी साधना का पतन हो अभी देखिए कि ईर्षा प्रकट होने से किस तरह के चित्र विचित्र बातें मुंह से निकलती है यही ठाकुर कि जिसको कि भैरवी ने अवतार के रूप में घोषित किया तो यह भी समझ ना पाई कि अवतार की साधना का भंग कभी नहीं होता अवतार कभी साधना से नहीं होते एक चीज दूसरा की अवतार के साथ में हमेशा शक्ति का अवतरण होता है मां के साथ में विवाह हुआ है तो मां कोई सीधी साधी सरल ग्राम्य बाला तो नहीं होंगी जगदंबा का अंश स्वयं प्रकाश का एक किरण स्वयं वो होगी तो भैरवी ये भूल गई ठाकुर को चेतावनी देने की शुरुआत की अभी किंतु क्या है कि ठाकुर तो भैरवी के प्रति इतने श्रद्धावन थे कि भैरवी को सामने से तो कुछ बोलेंगे नहीं मां खुद भैरवी को अपनी सास की तरह श्रद्धा भक्ति करती थी तो मां भी तो कुछ बोलने वाली नहीं है किंतु जगदंबा और भगवान स्वयं तो इस नाटक के डायरेक्टर है तो उन्होंने भैरवी के जो पात्र है उसको वहां से स्टेज के ऊपर से रंग मंज के ऊपर से रंग मंच के ऊपर से विदाय देने का उन्होंने ठान लिया था और आखिर में एक घटना हुई अभी इसके बारे में हम ज्यादा पढ़ते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज अभी क्या लिखते हैं देखिए महाराज जी का जो प्रोज है लिखने की स्टाइल है कितनी सुमधुर है तीनी श्री रामकृष्ण अच्छा यह तो पूरा हमने पढ़ लिया है अभी आगे तीनी बुझीते पारले ना ज ए ब्रथा चेष्टा तिनी जलिया मोरी बेन भैरवी ब्राह्मणी यह समझ ना पाई कि ठाकुर को मां से दूर ले जाने की वृता चेष्टा व्यर्थ चेष्टा व्यर्थ प्रयास से वह जलिया मरी बेन अर्थात की जल कर के मर जाएगी दगद बीज दगद हो जाएगी क्यों क्योंकि यह तो मां दुर्गा स्वयं है दुर्गा को जद अवतार से दूर करने का प्रयास करेंगे तो वो तो त्रिशूल तो है ही मां के हाथ में तो मां खुद यदि त्रिशूल नहीं उठाए तो य परिस्थितियां ऐसा करेगी किंतु कितना सुंदर लिखा है लिया मरी बेन दगद हो जाएगी तिनी देखिया देखिले ना ज पट भूमिका परिवर्तित होई ते छ ब्राह्मणी ने देख कर के भी देखा नहीं देख कर के भी नजर अंदाज कर दिया कि पट भूमिका परिवर्तित हो रही है एक प्रकरण समाप्त हो रहा है नया प्रकरण का प्रारंभ हो रहा है रंग मंच के ऊपर में एक अंक समाप्त होकर के नए अंक का प्रारंभ हो रहा है और नए अंक में जो मुख्य पात्र है वह है मां शारदा स्वयं किशोरी शारदा देवी क्रम श्री राम कृष्णेर साधना उत्तराधिकारी रूपे जगते मातृत्व महिमा प्रचार जनन प्रस्तुत होते छन देखिए किशोरी शारदा देवी बालिका थी अभी तो वो मां शारदा धीरे-धीरे क्रमशः श्री राम कृष्ण की साधना की उत्तराधिकार रूपे जगत में मातृत्व महिमा के प्रचार के लिए तैयार हो रही है प्रस्तुत हो रही है जैसे नाटक में अभिनय होता है रंग मंच के ऊपर में तो जो अभिनेता का पात्र अभी स्टेज पर होने वाला है वे लोग क्या करते हैं वहां पर स्टेज के पीछे में सज दज करके तैयार होकर के खड़े रहते हैं और जैसे ही उनका पात्र अभिनय का समय आता है वह रंग मंच के ऊपर में अवतरण करते हैं तो वैसे ही मां को ठाकुर की साधना की उत्तराधिकार होना था ठाकुर ही तो मां को जगत में मातृत्व भाव का प्रचार करने के लिए रख कर के जाने वाले थे जब ठाकुर की महासमाधि 18864 यह भी एक अभय की भी एक बड़ी सुंदर कहानी है मां के भाइयों के बारे में हम जब भी पढ़ते हैं तो यह काली मामा ये वरदा मामा ये दोनों के खास करके काली मामा के बारे में ये वरदा मामा और प्रसन्न मामा तो कलकाता में आते जाते रहते थे और कोलकात्ता में ही यजमान का कार्य करके विधि विधान करके अपना पैसा उपार्जन करते थे किंतु काली मामा गांव में रहते थे खेती करते थे और मां का सब संभाल वो रखते थे अभी काली मामा का जितने भी प्रसंग पढ़ेंगे वह इतना क्रोध उनके भीतर में कभी-कभी और एक तरह की लालच भी रहती थी जब भी वह जगत धात्री पूजा की बात आई तो काली मामा जाकर के मां को बोलेंगे कि मां जगत धात्री पूजा करनी है चलो मैं सब बाजार में से चीजों चीजों को खरीद के ले आऊं तो अभी मां मां को पता है कि काली मामा जद बाजार में जाएंगे तो पता नहीं महंगी चीजें भी ले आए और फिर पता नहीं पैसों का क्या करें तो मां अपने बाकी जो भक्त संतान होते थे यह तो उस समय की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद की तो कितने सारे त्यागी संतान मां के साथ में जयराम बाटी में रहते थे तो मां उनको कहती थी देखो तुम लोग थोड़ा सा मार्केटिंग करना परचेस करना और बाकी का काली को देना वरना वह नाराज होकर के पता नहीं क्या चखेगा चिल्लाएगा तो इस तरह से देखिए फिर और एक दिन की बात है बड़ी सुंदर कहानी है कि जरा क्वाल पाड़ा से कुछ लड़के मां के लिए मां को ऐसी बात थी कि मां कल जाएगी तो कोवाल पाड़ा के कुछ लड़के जयराम बाटी जाएंगे और मां को पालखी में बिठा करके ले आएंगे और साथ में बेल गाड़ियां भी रहेगी तो मां के साथ में जो लोग बाकी लोग यात्रा करने वाले हैं वे लोग बेलगाड़ी में आएंगे अभी जिस दिन को जयराम बाटी जाना था कुवाल पाड़ा से देखा कि जो मने इतनी प्रचंड बारिश होना शुरू हो गया सुबह से ही मने बिजली गिर रही है और वह जो बीच में नदी है उसमें तो पूर आना शुरू हो जाएगा फल डिंग शुरू हो जाएगा तो अभी ये लोगों ने सोचा सब लड़कों ने यह केदार बाबू है जो वहां क्वाल पाड़ा आश्रम के अध्यक्ष थे फिर ये बाकी सब ये वरदा महाराज वगैरह कि क्या करें क्या करें कि हम लोग क्या मां को तो वचन दिया है कि हम इस दिन को आएंगे आपको पालखी लेकर के किंतु एक और वचन दिया है दूसरी ओर यह बारिश हो रही है प्रचंड बारिश कैसे जाएंगे जयराम बाटी और मां हम लोग तो चलो चले जाए कैसे भी करके किंतु मां को क्या इस बारिश में वापस ले आना उचित है क्या तो अभी सोच रहे सोच रहे क्या करें फिर आखिर में निश्चय किया कि देखो वचन दिया है तो हम लोग वहां पे जाएंगे चाहे रास्ते में कोई भी विपत्ति ना आ जाए जाकर के मां के सामने हाथ जोड़ के खड़े रहेंगे फिर मां जो कहेंगी वैसा करेंगे तो ये लोग निकले यहां से पालखी लेकर के कैसे भी करके अरे बाप रे गांव में बारिश होती है तो रास्ते वगैरह तो सब एक ही हो जाता है कादवनद में पूर कैसे भी करके इतनी बाधा विपत्ति में पहुंचे और जाके मां के घर में जैसे ही प्रवेश किया देखा कि काली मामा और मां दोनों अपने बरामदे में खड़े थे अब जैसे ही ये क्वाल पाड़ा वाले त्यागी सन्यासी सब अपने घर में प्रवेश किए वो तो चौक वहां पे कोर्टयार्ड था तो उसके भीतर में जैसे ही प्रवेश किए काली मामा ड़ करके त्राण पाड़ करके चिल्ला उठे अरे मूर्ख लोग तुम लोगों को अकल नहीं है क्या इस तरह की बारिश में मां को लेने दीदी को लेने के लिए आए वो तो उनके छोटे भाई थे मां के तो मां को दीदी करके पुकारा करते थे अकल नहीं है तुम लोगों में थोड़ी सी भी कि दीदी को लेने को आए हो केदार जेवन ती बुद्धि तेतो बुद्धि अभी ये ते तो अर्थात की वहां की एक जात है और मैंने उस समय की जो परिस्थिति अनुसार यह सब मैंने बोला जाता था तो केदार की भी ऐसी मोटी बुद्धि है कि तुम लोगों को भेज दिया तो अभी लड़के लोग बेचारे क्या करेंगे दोनों हाथ जोड़ कर के खड़े रहे मां के सामने कहा कि मां वचन दिया था तो इसलिए आए हैं वचन का मने मिथ्या ना हो जाए हमारा वचन अभी आप आए हमको पता है कि आप नहीं आ सकती किंतु फिर भी हमको तो वचन का पालन करना है यह बेचारे इतने विनय पूर्वक बारिश में भजते भजते ऐसा कहा कि काली मामा जोर से हंस उठे और मां भी हंस उठी तो काली मामा के ऐसे बहुत सारे प्रसंग हमको पता है तो यहां पर भी देखिए कि मां का यह परिवार और मां के परिवार में यह लोग सब रहा करते थे तो अभी क्या है कि ये मातृत्व महिमा का प्रचार करने के लिए ठाकुर मां को रख कर के गए हैं अभी भैरवी ब्राह्मणी को यह पता नहीं है रंग मंच के पीछे में मां अभी तैयार होकर के खड़ी है जैसे ही ठाकुर पुकारेंगे मां रंगमंच पर अवतरण करेगी इस पृथ्वी की लीला में मां का पात्र त्र धीरे-धीरे करके उसका महात्म्य बढ़ता जाएगा मां के पात्र के मां के बारे में एक बड़ी सुंदर कहानी है देखिए कि जब तक ठाकुर थे तब तक ठाकुर किसी भी अपने इतने सारे गृही भक्त थे ठाकुर के इतने घनिष्ठ थे किंतु फिर भी ठाकुर मां को किसी के सामने मां को हमेशा मर्यादा में रखते थे यहां तक कि ये मास्टर महाशय यह बलराम बाबू गिरीश घोष यह लोग ठाकुर के इतने घनिष्ठ इतने अंतरंग थे इनको भी कभी-कभी ठाकुर ऐसा कहा कर जब बाकी पुरुष भक्त होते थे तो ठाकुर कहा करते थे अरे वोह पिंजरे में वह तोता और मेना है उनके लिए कुछ खाना ले जाओ ऐसा करके ठाकुर अपने भतीजे रामलाल को बोला करते थे अभी तोता और मेना अर्थात की मां और लक्ष्मी दीदी वो पिंजरा अर्थात कि वो छोटा सा नबत दक्षिणेश्वर में ठाकुर का कमरा है गंगा किनारे वहीं पास में ही नबत है जहां पर मां और लक्ष्मी दीदी रहा करती थी तो उनको कुछ खाने को देना है उनको कुछ इंस्ट्रक्शन पहुंचाना है रामलाल दादा के द्वारा तो ठाकुर ऐसा कहा करते थे पिंजरे में तोता और मेना है तो उनके पास में यह देके आओ या उनको यह बता के आओ भक्त लोग जब आएंगे तो मां को खाना बनाना है तो ठाकुर जब ऐसा कहते थे मास्टर महाशय खुद अनेक दिन तक ऐसा सोचते हैं कि सही में ठाकुर के पास में एक पिंजरा होगा और सही में उसमें एक तोता और मेना को रखा होगा गिरीश घोष गिरीश घोष एक बार जब अपनी ठाकुर की महासमाधि की बात है गिरिज घोष अपने मकान की छत के ऊपर में टहलने के लिए एक बार गए और जैसे ही देखा कि पास में ही बलराम भवन है बलराम भवन के मकान की छत के ऊपर में मां बैठी हुई है अभी उस समय की जो प्रथा थी मां तो गांव में पली बड़ी हुई है और क्या है कि गांव में तो लड़कियों को थोड़ा सा स्वातंत्र्य होता है और गांव में वैसे भी काम करना पड़ेगा कुए में से पानी ले आना है नदी के किनारे जाकर के कपड़े धोने हैं स्नान करना है खेत में जाकर के काम करना है गायों की संभाल रखनी है अपने छोटे-छोटे भाइयों की संभाल रखनी है तो गांव में मां को जो स्वातंत्र्य था वह कलकाता में नहीं था कोलकाता में क्या है कि वह जो उस समय की प्रथा के अनुसार सब समय चेहरा एक घुंघट से आवृत करके रखना पड़ता था और घर में भी जब रहेंगे तो अंदर महल में रहेंगे पुरुषों की जगह अलग स्त्रियों की जगह अलग तो मां कभी-कभी बड़ी ही ये हो जाती थी कभी-कभी मायूस हो जाती थी इतना छोटी सी जगह में रहना तो एक दिन मां ने क्या सोचा चलो छत के ऊपर में जाकर के बैठते हैं तो थोड़ा सा आराम से बैठेंगे थोड़ा सा धूप सकेंगे थोड़ा सा एक खुली आकाश खुले आकाश को देखेंगे बोलकर के मां वहां पे थी अभी जैसा गिरीश घोष अपने छत के ऊपर में गए और देखा कि मां वहां पर बैठी है तो वैसे ही गिरीश इमीडिएट छत के ऊपर में से नीचे उतर आए क्यों उसने कहा कि इस आंखों ने बहुत सारे पाप कार्य देखे हैं इस आंखों से मैं मां का दर्शन नहीं करूंगा तो ठाकुर जब तक थे ठाकुर के गृही भक्त थे गृही संतान थे उन्होंने कभी भी किस मां के सामने नजर उठा कर के नहीं देखा था यहां तक कि स्वामी जी स्वयं अमेरिका से वापस आए काश्मीर गए थे मां को दर्शन करने के लिए आए काश्मीर से वापस होकर के वहां कलकाता में मां थी मां को दर्शन करने के लिए गए मां पूरे शरीर पर चादर चेहरे पर घूमता टान कर के खड़ी है स्वामी जी बड़े ही भक्ति भाव पूर्वक मां के सामने झुक कर के प्रणाम कर रहे हैं और मां बड़े ही मृदु स्वर से उनके साथ बात कर रही है पास में ही एक यंग ब्रह्मचारी खड़ा है लड़का तो वह मां की एकदम मृदु बात सुनक के बड़े आवाज में स्वामी जी को सुना रहा है तो यहां तक कि मां अपना चेह छुपा कर के रखती थी अपनी आवाज को भी छुपा कर के रखती थी इतनी मर्यादा में मां रहती थी किंतु जैसे जैसे समय बीतता गया जैसे-जैसे यह नई जनरेशन आती गई यह क्वाल पाड़ा के लड़के फिर यह विरजानंद जी महाराज काली कृष्णा वगैरह जितने भी नई जनरेशन के यंग लड़के आते गए सबको मां अपने खुद के संतान के रूप में ग्रहण करना शुरू करती रही तो यह नया अंक इस रंग मंच पर उसका अभिनय होने वाला है और यह बात भैरवी ब्राह्मणी समझ ना पाई वह ठाकुर को मां से अलग करने की जो प्रयास कर रही थी समझ ना पाई कि उसी आग में वह खुद जल कर के मर जाएगी आर लीला विग्रह बान भव गन तनु श्री राम कृष्ण ओ ताहा बीती तो था किया सहधर्मिणी के तद अनुयाई प्रस्तुत कर लीला विग्रहवां लीला के इस विग्रह में जो श्री राम कृष्ण है भाव घुन तनु जिन तनु अर्थात की देह जिनका देह घनीभूत भाव से बना हुआ है वह श्री रामकृष्ण को किंतु पता था कि हां मां का अभिनय इस रंग मंच पर क्या होने वाला है और ठाकुर भी मां को इसी तरह से तैयार कर रहे थे से उच्च तत्व हृदय उद् भाषित ना हु वाय भैरवी स्वयं मर्म पीड़िता होया अपर के ओ ब्रतो करते लागी लेन यह उच्च तत्व हृदयम उसके हृदय में प्रवेश न करने की वजह से भैरवी ब्राह्मणी अज्ञान वसत खुद तो परेशान हो रही है दूसरों को भी परेशान करने लगी परे तिनी निज दो बुझीते पारिया ठाकुरे निकट खमा चाहि लेन बाद में उसको अपना दोष समझ में आया ठाकुर के पास में क्षमा प्रार्थना की एवं तहर अनुमति लोया काशीधाम चलिया गलन और ठाकुर की अनुमति लेकर के काशी धाम चली गई ई हार पर भैरब शहिद श्री मायर नरो लीला आर कोन संबंधो रही लोना इसके बाद में भैरवी ब्राह्मणी के साथ में मां की नर लीला का और कोई संबंध नहीं रहा देखिए जो दो-तीन सेंटेंस में गंभीरानंद जी ने यह बात यहां पर समाप्त कर दी है इसका थोड़ा सा विस्तार हमको शारदानंद जी महाराज ठाकुर की जीवनी श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में देते हैं घटना कुछ ऐसी हुई थी कि श्रीनिवास सांखारी के बारे में तो हम सबको पता है ठाकुर का बचपन का मित्र था ठाकुर का बड़ा ही मने ठाकुर के प्रति बड़ी ही श्रद्धा थी बड़ा ही भक्त हृदय था ईश्वर के ऊपर में बड़ी ही उनकी आसक्ति थी तो यह श्रीनिवास शंकरी एक दिन यह उसी दिनों की घटना है जब ठाकुर वहां पर थे भैरवी वहां पर थी एक दिन श्रीनिवास आया शंकरी और ठाकुर के साथ में बातें करने लगा और ठाकुर ने भी भैरवी का परिचय करवाया तो भैरवी भी उनका परिचय पाक के उनकी विनम्रता देख कर के उनका ये ईश्वर के ऊपर में भक्ति देखकर के बड़ी ही प्रसन्न हो गई अब वहां की रीति के अनुसार श्रीनिवास सांखारी को बोला गया कि आप भोजन करके जाइए अभी भोजन करने के बाद में जैसे ब्राह्मण घरों की प्रथा थी कि ब्राह्मण जो गृहिणी होती है वह अब्राह्मण जो होंगे वह खाना खाने के बाद में जो उच्छिष्ट होगा उसको परिष्कार नहीं करेगी उसको साफ नहीं करेगी उनके खाने की जगह खाने का पात्र ब्राह्मण गृहिणी साफ नहीं करेगी अब ब्राह्मण जो होगा वह अपने से साफ करके जाएगा वह जो उस समय की प्रथा के अनुसार तो भैरवी ब्राह्मणी किंतु इतनी प्रभावित हो गई थी श्रीनिवास शंकरी की यह भक्ति से कि उसने कहा कि अच्छा देखिए आप जाइए हम ही लोग इसको परिष्कार कर लेंगे हम ही लोग इस जगह को दो देंगे तो जैसे ही भैरवी ब्राह्मणी ने ऐसा कहा ठाकुर के परिवारों के अन्य गृहिणी बड़ी ही नाराज हो गई बड़ी ही परे हो गई कि कहा कि देखिए हम लोग तो इस छोटे से गांव में रहते हैं आप तो भैरवी है आपको तो संसार के साथ कोई लेना देना नहीं है आप आज यहां पे है कल कहां पे चली जाएगी हमको तो इस गांव में रहना है अभी यह जो अब्राह्मण जात जो है इसकी उसका जो झूठा हम परिष्कार करेंगे तो गांव वाले क्या कहेंगे तो यह बात सुनकर के भैरवी ने तो कोई माने उनको पत्ता ही नहीं दिया कि अरे ये लोग तो बोलते रहेंगे बोलने दो किंतु धीरे-धीरे करके बात बढ़ती ही गई बढ़ती ही गई और ठाकुर का दर्शन करने के लिए दूसरी ब्राह्मण कन्याएं जो वहां पर उपस्थित थी उनका आगमन हुआ था उन्होंने भी इस मामले में अभी अपना ओपिनियन मता मत जाहिर करना शुरू कर दिया कि अरे यह अब्राह्मण है उसका खाना आप कैसे भैरवी कहती है मैं करूंगी किंतु ऐसा भी तो नहीं चलेगा जो नियम है सो नियम है अभी यह हल्लागुल्ला जो मच र चल रहा है तो हृदय आया अभी हृदय का भी गुस्सा ऐसा था तो हृदय आकर के जोर से वह भैरवी ब्राह्मणी के साथ में झगड़ा करने लगा तो अभी अभी यहां पर शारदानंद जी महाराज ने जो घटना इतना सब कुछ लिखा है किंतु वो जो क्रिटिकल पॉइंट है ऐसा नहीं लिखा कि गुस्से में आकर के हृदय ने एक छोटी सी कलसी थी वह उठा कर के भैरवी के सर पर मारी तो भैरवी के सर कट गया थोड़ा सा और खून भी बहने लगा तो जो भी है उस समय तो यह मामला समाप्त हो गया किंतु धीरे-धीरे करके भैरवी को यह समझ में आया कि वह जिस तरह से यहां पर रहती है उस तरह से झगड़ा ही बढ़ता जाता है ठाकुर को ही परेशानी होती है तो बेटर है कि मैं यहां से विदाय तो इसके बाद में भैरवी ने वहां से विदाय ली और मां के साथ में तो हालांकि भैरवी की दूसरी मुलाकात नहीं हुई थी किंतु ठाकुर जब तीर्थ यात्रा करने के लिए काशी गए थे तब उन्होंने देखा कि चौ ब्राह्मणी बोलकर के एक जगह है वहां पर 64 भैरवी ऐसा बोलकर के एक जगह है वहां पर यह भैरवी ब्राह्मणी रह रही थी और वहां पर ठाकुर ने उनका आखिरी दर्शन किया था तो यह हो गई भैरवी ब्राह्मणी की कथा समाप्त उनके पात्र का अभिनय का यह आखिरी अंक इसके बाद में जो होगा मां का आगमन होता है और धीरे-धीरे करके गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं कालीबाड़ी चांदनी शमा जुक्तो बृहत घाटे अच्छा य मैं लीला प्रसंग से पढ़ रहा हूं अच्छा लीला प्रसंग नहीं मां की बात है भैरवी विदाय पर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर फिरले भैरवी की विदाई के बाद में श्री राम कृष्ण दक्षिणेश्वर में वापस आए एवं श्री माओ सात मास जाब श्री राम कृष्ण पूतो सानिध्य अनुपम आनंद लाभ करिया अग्र हाय मा जयराम बाटी ते चोलिया आशील जब यह कामर पुकुर की यात्रा समाप्त हुई कामर पुकुर का वहां पर निवास समाप्त हुआ ठाकुर कलकाता में कोलकाता में दक्षिणेश्वर में कालीबाड़ी में आ गए सात मास सात महीने वहां पर थे मां भी अपने पिता के घर में जयराम बाटी वापस चली गई ठाकुर पुत सानिध्य अनुपम आनंद लाभ करिया ठाकुर के पवित्र सानिध का अनुपम आनंद आनंद लाभ करने के बाद में ठाकुरे ठाकुरर शाह चर जनि तो पूर्वक तो उल्लासे उपलब्धि ते ताहर चलन बल आचरण आदि सकल चेस्टार भीतर एकन एकटा परिवर्तन ज उपस्थित होया लो एक कोथा अमरा बेश बुझीते पारी अभी यहां पर यह जो आखिरी पैराग्राफ है वधु चैप्टर का इस प्रकरण का आखिरी पैराग्राफ गंभीरानंद जी महाराज लीला प्रसंग में से सीता वह उसको उधत करते हैं उसको रेफर करते हैं कि जब ठाकुर के साहचर्य में ठाकुर के पवित्र संघ का लाभ करके मां जब जयराम बाटी वापस आई तो अभी वह बालिका में से किशोरी में और परिणत हो रही है और मां का यह चलना फिरना बातें करना सभी ों में एक परिवर्तन आ रहा है वह हम अनुमान करके कह सकते हैं चलन बल आचरण चलन व चलना फिरना और आचरण सभी के भीतर में एक परिवर्तन उपस्थित हुआ था हो रहा था यह हम अनुमान करके सोच सकते हैं किंतु साधारण मानव उहा देखीते पाया छलो किना संदे हो जो बाकी सब साधारण लोग थे गांव में रहते थे जयराम बाटी में उनको यह परिवर्तन नजर में आया कि नहीं इसके बारे में संदेह है कारण उहा तहा के चपोला ना कोरिया शांतो शो भाबा कोरिया लो देखिए यह जो पूरा पैराग्राफ है मैंने उसको हाईलाइट करके रखा है क्योंकि यह परिवर्तन है इस परिवर्तन ने मां को चपड़ या तो फिर चंचल न बना कर के शांत बनाया था शांत स्वभाव किया था प्रगल्भ ना कररिया चिंता शिला कररिया छलो चिंता शलाला अर्थात की जो बहुत गहनता से गहराई से किसी के बारे में सोचती है प्रगल्भ अर्थात कि बिना सोचे समझे जो कार्य करता है वह स्वार्थ दृष्टि निबद्ध ना करिया निस्वार्थ प्रेमिका कोरिया छीन स्वार्थी न बना कर के निस्वार्थ प्रेमिका बनाया था मां को अच्छा इसके बारे में भी एक सुंदर एक उदाहरण के रूप में एक बात है यह बात भी मां की ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जब जयराम बाटी में रह रही थी एक औरत वहां पर एक दिन मां को मिलने के लिए आई अभी जैसे ही अभी मां को तो पता है कि बहुत सारे भक्त आकर के मां के सामने मिठाई है फल है वगैरह क्या-क्या मां को अर्पण करते थे मां के सामने वो प्रणामी के रूप में ऑफर करते थे तो यह सब देखकर के यह जो महिला है भाविनी देवी मोस्ट प्रोबेबली उनका नाम था पास में ही उनका घर था तो यह देख कर के बड़ी ही गहरी दुख की निश्वास लेकर के क्या बोली कि परमहंस महाशय के साथ में विवाह की मेरी भी बात चली थी किंतु मेरा उनके साथ में विवाह नहीं होकर के आपका हो गया यदि मेरा उनके साथ विवाह होता तो यह फल मिठाई वस्त्र वगैरह मेरे ही पास में आते हैं अब जैसे ही उन्होंने यह बात कही सब लोग जोर जोर से हसना शुरू कर दी और मां ने भी कहा अरे यह सब तुम्हारा ही है ना ले जाओ ले जाओ सबको बोला जाओ इसको इनको दे दो अभी अभी ऐसा हो सकता है क्या कि ऐसे लोगों के साथ में ठाकुर का विवाह हो जो भी है ये स्वार्थ परता नहीं बना कर के निस्वार्थ प्रेमिका बनाया था मां का जो कुछ भी था सब ठाकुर का था देखिए हम लोग सोचते हैं कि अवतार के सामने असत्य वचन नहीं बोलना है ठाकुर तो सत्य के अवतार यह बार-बार ठाकुर कहते हैं कि सत्य और ब्रह्मचर्य यही इस जीवन में साधक जीवन में कलयुग की असली तपस्या है किंतु मां का आचरण देखिए कि ठाकुर के लिए असत्य भी बोलना पड़े ठाकुर के लिए तो मां बोलने के लिए तैयार है पाप लगेगा तो मुझे लगेगा ठाकुर की भलाई के लिए मैं असत्य बोल सकती हूं जब ठाकुर बीमार थे और ठाकुर के लिए दूध देना था तो ठाकुर ने कहा पेट की बीमारी है थोड़ा सा ही दूध पिऊंगा तो मां क्या करती थी इतना एक तपेली भर एक बड़ी सी मने दूध लेकर के उसको उबाल द थी उबाल उबाल से जैसे-जैसे पानी जलता जाएगा दूध घट्ट होता जाएगा तो उसकी दूध का परिमाण कम हो जाएगा किंतु उसका पावर जो है उसके भीतर का प्रोटीन वगैरह है वो उतना ही रहेगा फिर वो उबाला हुआ दूध गाढ़ा किया हुआ दूध मां ठाकुर के पास भेजती थी और ठाकुर भी उसको बड़े आराम से वो पी जाते थे अभी एक दिन गुलाप मां आई गुलाप मा अभी ठाकुर को तो थोड़ा-थोड़ा संदेह तो होने लगा कि जब मैंने ऐसा कहा कि इतना ही दूध पिऊंगा तो मां ने इतना सहजता से स्वीकार क्यों कर लिया क्यों कोई विरोध नहीं किया मन में यह संदेह प्रकट हुआ तो एक दिन गुलाप मां आई तो गुलाप मां को पूछा कि अच्छा ये कितना दूध होगा तो गुलाप मां ने उसका जो सही परिणाम है बोल दिया तो ठाकुर एकदम चमक मने चमक उठे अरे इतना सारा दूध मां मुझे खिला रही है बुलाओ बुलाओ मां को बुलाओ तो मां को बुलाया ठाकुर ने पूछा अरे इसमें कितना दूध दिया मुझे बताओ तो मां ने बोला इतना सही है जितना आपने मांगा था तो ठाकुर बोलते हैं अरे मां तो सत्य नहीं बोलेगी मिथ्या नहीं बोलेगी अच्छा ठीक है पहली बार तो विश्वास कर लिया फिर दूसरी बार मने संदेह हुआ फिर जाकर के मां को बुलाया तब कहीं जाकर के आखिर में पता चला कि मां ने दूध को गाढ़ा करके ठाकुर को खिलाती थी तब ठाकुर बोले अरे इस तरह से क्या करना होता है पता तो है कि मेरी पेट की बीमारी है किंतु देखिए मां जो दूध घड़ा करके पिलाती थी ठाकुर को कहीं प पेट में वो जलन कुछ नहीं हो रही थी किंतु जब ठाकुर के मन में संदेह हुआ तभी ठाकुर को मैंने पेट में द दर्द होना शुरू हो गया और यह लूज मोशन हो गया यह तो ठाकुर की बात है ना कि वो विभीषण को किसी ने कहा कि मुझे भारत में जाना है समुंदर पार करना है तो विभीषण ने एक पत्र के ऊपर में कुछ वस्त्र के ऊपर में लिख कर के दे दिया वो फिर वो समुंदर बढ़िया सा मजे से पार करके जा रहा है उसने बोला कि इस इसके भीतर में ऐसा तो कौन सा महामंत्र विभीषण राजा थे लंका के उन्होंने लिख दिया होगा कि मैं समुंदर पार हो रहा हूं जरा खोल के देखूं तो जैसे ही खोल के देखा तो उसमें सिर्फ एक शब्द लिखा था श्री राम तो उसने सोचा अरे बस इतना ही भगवान राम का नाम लिखा है राम नाम लिखा है और कुछ नहीं है तो जैसे ही संदेह हुआ समुंदर में डूब के वह मर गया तो ठाकुर के साथ में भी ऐसा हुआ जब तक मां के ऊपर में विश्वास था कि मां थोड़ा सा ही दूध खिला रही है तब तक उनके पेट में कोई दर्द नहीं कुछ प्रॉब्लम नहीं जैसे ही किंतु संदेह हुआ मां के ऊपर में कि मां ज्यादा ज्यादा दूध खिला रही है तो जैसे संदेह हुआ वैसे ही उनका पेट बिगड़ा ये निस्वार्थ प्रेम का क्यों क्योंकि अपने प्रियतम है उनकी सेवा करने के लिए खुद को पाप में पढना पड़े तो कोई फिकर नहीं है इसलिए निस्वार्थ प्रेमिका करिया लेन किया था एवं अंतर होते सर्व प्रकार अभाव बोध तिरोहित कोरिया मानव साधारण दुख कष्ट सहित अनंत सम वेदना संपन्न कोरिया क्रम ताहा के करुणा साखा प्रतिमा परिणत कोरिया छलो बापरे यह सेंटेंस के बारे में सोचना शुरू करेंगे तो पूरा एक क्लास जाएगा इसको कल के लिए रखते हैं आज यही तक ओम शा शांति श्री
Questions & Answers
राम देखिए यहां पर तो लिखा है कि अभी से यह परिवर्तन होना शुरू हो गया था ठाकुर के पास में जब मां आई थी देखिए विवाह के साथ में ही इसका तो प्रारंभ हो चुका था किंतु आप ठीक कहती है शक्ति का बोधन करने के बाद में जगत में धर्म चक्र प्रवर्तन किया जाता है एक्चुअली इसके बाद का जो चैप्टर है उसका टाइटल ही है बोधन तो ऑफकोर्स हम कह सकते हैं कि शोशी पूजा के बाद में ही मां का असली जगदंबा स्वरूप था वह मां को पता चला था एक्चुअली क्वाल पाड़ा आश्रम के स्थापक वही थे वहां पर एक सरकारी स्कूल में सरकारी मुझे एक्जेक्टली पता नहीं कि स्कूल में वो टीचर प्रिंसिपल थे आचार्य थे और उन्होंने यह स्वदेशी का उस समय बहुत चल रहा था तो तो उन्होंने सोचा चलो स्वदेशी का कुछ कार्य करते हैं और यह जो वरदा महाराज वगैरह तो उनके स्टूडेंट ही थे तो सबने मिलकर के आश्रम प्रारंभ किया और उस समय केदार बाबू को को पता चला कि अरे परमहंस महाशय की धर्म पत्नी अभी भी जीवित है और पास के ही जयराम बाटी गांव में रहती है तो फिर जाकर के उनका संपर्क किया फिर जब मां क्वाल पाड़ा आई क्वाल पाड़ा में आकर के मां ने क्या किया देखो तुम लोग स्वदेशी वगैरह करते हो बहुत अच्छी बात है किंतु एक हाथ से ठाकुर को पकड़ के रखो भक्ति और ईश्वर के प्रति यह जो आपकी गति नहीं होगी तो यह सब काम है ना पॉलिटिक्स जैसे हो जाएंगे तो फिर आकर के यह पहली बार देखिए कि ठ ने आकर के ठाकुर के फोटो की स्थापना की साथ में अपना एक मने वो वहीं के आश्रम में से वरदा महाराज की जो रेमसंस से महाराज लिखते हैं कि हमको तो पता है कि मां आकर के ठाकुर के फोटो की स्थापना करेगी किंतु हमको तो पता है कि सशक्ति अवतार की पूजा ही वि अपने शास्त्रों का विधान है तो मां का फोटो भी तैयार रखा था और मां ने अपने हाथों से अपने फोटो की स्थापना की तो ये कल पड़ा फिर धीरे-धीरे करके यह यंग लड़के थे उन्होंने सन्यास लेना शुरू किया केदार बाबू की मां थी पत्नी भी थी शायद तो फिर क्या है कि वो सन्यास ले ना ले क्या करें क्या ना करें तो किंतु आखिर में ऐसा ठीक किया कि अरे मेरे ही सब स्टूडेंट संन्यास ले रहे हैं तो मैं क्यों ना लू तो फिर उन्होंने भी संन्यास लिया किंतु जब तक मां के पास जाते थे वो लंबा समय तक वैसे ही वो गृहस्थी थे इसलिए रेमसंस में हर जगह पर उनका नाम केदार बाबू के रूप में ही आता है हृदय की वो आखिरी आखिरी बात पता है जहां तक मुझे याद है सबसे आखिरी ना आखिरी घटना तो एक है वरा नगर मठ की एक घटना है वरा नगर में ये लोग रहते थे ना राजा महाराज वगैरह तो वरा नगर में एक दिन आया तो अभी अपने लड़के के साथ में तो राजा महाराज ने तो देखा था हृदय को मने हष्ट पृष्ट राक्षस जैसा शरीर उसका और अभी देखा तो बिल्कुल दुबला पतला से झुक गया है तो राजा महाराज ने पूछा अरे तुम्ही तो तो गंडा सुंडा लेन एकन की होलो माने तुम तो ऐसे हष्ट पृष्ट राक्षस ज अभी क्या हुआ तो हृदय ने क्या कहा कि आप एक रात को दो तीन भैरवी चक्र करेंगे तो फिर तो ऐसा ही होगा अभी भैरवी चक्र क्या है तंत्र साधना के नाम पर व्यभिचार तो जैसे ही राजा महाराज ने सुना तो अरे कहा कि अरे यह क्या बेतुकी बातें अपने खुद के लड़के के सामने करते हो छोड़ो छोड़ो इस बात को ऐसा करके वो बात को टाल दिया तो देखिए कि यह हृदय का एक एस्पेक्ट कि मने ठाकुर के रहते रहते या तो फिर ठाकुर के जाने के बाद में क्या सब नाटक करता बमता था यहां तक कि अपने यह जो रामचंद्र दत्त जिन्होंने ठाकुर के अस्थि की काकड़ गाछी में स्थापना की तो एक पुजारी ब्राह्मण तो चाहिए तो हृदय देखा कि हृदय को जरूरत है पैसों की और फिर उनको भी एक पुजारी की जरूरत है तो हृदय ने तो ठाकुर की सेवा की तो उसके अच्छा पुजारी कौन होगा तो हृदय को बुलाया बोलो कि पूजा करो अच्छा सा रुपया भी देंगे तो वहां प यदि रहता तो अच्छा रहता किंतु उसके मन में क्या सब भर गया था कि बोला मैं भी ठाकुर की तरह ठाकुर का वंशज हूं तो मैं तो ठाकुर की तरह मैं भी उटपटांग साधना करूंगा ठाकुर को देने वाला जो जैसे माहाकाली को देने वाला नैवेद्य ठाकुर अपने से खा लेते थे माहाकाली को देने वाला अर्पित करने वाला पुष्प ठाकुर अपने सर पर रख देते ऐसा सब जो ठाकुर करते थे वो सोचा मैं भी करूंगा तो ऐसा तो थोड़ी ना चलेगा वो थोड़ी ना ठाकुर है जैसे ही रामचंद्र दत्त को पता चला कि पूजा में गड़बड़ कर रहा है तो उसको भगा दिया तो मने वो उसकी आखिरी आखिरी ये सब घटना है मैं यह घटना बोलने वाला था किंतु फिर होता क्या पता है एक में से दूसरी दूसरे में से तीसरी इतनी सारी बातें चली जाती है कि फिर ओरिजिनल बात रह जाती है और यह सब नाटक हुआ था नारद को लेकर के नारद ने पूछा कि आपका सबसे बड़ा भक्त कौन है तो कृष्णा ने कहा कि तो टेस्ट करना है तो कर लो टेस्ट जाओ तुमको लगता है य मेरी रानियां सबसे ज्यादा भक्ति करती है देखो कि सही बात क्या है फिर नारद मुनि गए वृंदावन में पूछा पहले तो रानियों के पास गए मना कर दिया व वृंदावन में गए तो वृंदावन ले लो जितनी धूल चाहे ले लो हम नरक में जाएंगे तो भगवान मने आराम होगा तब कहीं जगह नारद को पता चला कि वृंदावन में सही भक्ति है सत्य से भी बड़ी त मने गुण है निस्वार्थ का देखिए यह बात सुन कर के तो हमको तो ऐसा ही लगता है मुझे नहीं लगता कि इस अभी इस बात की और कोई व्याख्या होगी मां के आचरण की मुझे पता नहीं मुझे तो यही लगता है कि जो आपके प्रियजन है ईश्वर है उनके लिए खुद नरक में जाए असत्य बोल कर के तो भी चलेगा य ये ठाकुर और मां के बीच में डिफरेंस है ठाकुर सब कायदे कानून की बात करते हैं कि ब्रह्मचर्य पालन करना है त्याग करना है सत्य का पालन करना है मां है प्योर प्योर भक्ति के मने भक्ति ऐसी की अपने को जला दो जैसे वो य ये होता है ना बटरफ्लाई वो आगुण होता है उसके भीतर में जाकर के अपने को जला देता है अपने को होम कर देता है माने ऐसी भक्ति होने से यह सब निय का नियम कानून कहां पड़े रहेंगे वो उसका कोई विषत नहीं है मैं सोच रहा था ऐसे एक अभी अपना यह दो रेगुलर सीरीज चल रहा है ज्ञान योग वाला और मां का तो बीच-बीच में डायवर्जन के लिए मैं एक बार तो लेटर लिए अभी एक बार मैं क्या सोच रहा था कि ये ग्रेट समर मैंने जोसेफाइन मैक्लाउड का फेवरेट ग्रेट समर जो है उसके ऊपर में कुछ क्लास लिए जाए स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका गए थे तो वहां पर रहे थे रिजली मेनर में तो मैंने एकदम शांत परिवेश और सिर्फ उनके भक्तगण तो उस समय जो स्वामी जी की जो दिव्यता जो प्रकट हुई थी वो जो प्रसंग है एक के बाद एक इतने सुंदर प्रसंग है और उस पूरे मने ग्रीष्म ऋतु थी तो तो जोसेफाइन मे क्लाउड उसको ग्रेट समर बोला करती थी मैंने ज्योत में उसके बारे में आर्टिकल्स लिखे थे दिव्य ग्रीष्मा बोल कर के तो मेरी इच्छा थी कि वो एक कुछ डायवर्जन के रूप में लिया जाए एक्चुअली प्रॉब्लम यह है ना देखिए अपना लिटरेचर इतना विराट है मैं कभी-कभी सोचता हूं संग चालू कर दो चलो यह भक्त मालिका चालू कर दो स्वामी जी की लाइफ युग नायक चालू कर दो तो प्रॉब्लम ये है कि अपना एक-एक पैराग्राफ में एक-एक क्लास चला जाता है और ये जो बात मैंने अभी जो नहीं कही थी मेरे मुंह पे ही थी मेरी जीवा पे ही थी कि यह बात करूं मैं वृंदावन की और कृष्णा की फिर मैंने सोचा नहीं ये बहुत लंबा हो जाएगा अभी एक जगह प तो मुझे छोड़ना होगा इसको