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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 6 Sept 2023

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ओम स्थापा का यॉट धर्म स्थाय रामकृष्ण तो कल हमने देखा की किस तरह या तो फिर शत्रु का पराजय रक्षा का विनाश बाहर के जगत में भी यानी की भौतिक राक्षसों का भी सहर हो सकता है और हमारे हृदय में जो कुब्रिटियां हैं उसका भी सहर हो सकता है और शक्ति का आगमन जिन सदगुण राशि के शक्ति का आगमन होने के बाद शक्ति नई देव धरण करके जिन सदगुण राशियों के द्वारा हमारे भीतर रहे वो दुष्कर्म है उसका विनाश कैसे करती है उसके बड़े में भी हमने सोचा हमने पढ़ा उसके बाद में थोड़ा सा आगे देखते हैं की गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं महाराज ने कल जैसे कहा था की लज्जा विनय सदाचार पवित्रता कल्याण सृह और इस अनुभूति इन सबके मध्य से मां हमारा हृदय जय करती है अभी एक प्रश्न जैसे हो सकता है की मां के रहते रहते तो मां लीजिए की वो अमजद बोलकर के वो एक डाकू था वो खुद मां के चरणों में आया था वो किंतु आज आज क्या होगा हमने डाकू लोगों को तो छोड़ ही दीजिए हम लोग जो है हम तो मां का संपर्क मां का स्नेहा प्राप्त नहीं कर पे हैं मां का सिर्फ तो फोटोग्राफ देखा है और मां की बातें पड़ी है तो क्या अभी इस समय मां के सादे में शरीर पृथ्वी पर नहीं रहने के बावजूद क्या मां की ये सदगुण राशि हमारे हृदय में प्रवेश करके हमारी जो दुर्गुण राशि है की नहीं और जल्दी करती है तो कैसे करती है तो इसके बड़े में भी हमने देखा है की जी तरह से हम यह स्मृति कथा पढ़ने हैं मां की बातें पढ़ने हैं मां का जीवन पढ़ने हैं मां के उपदेश पढ़ने हैं उससे हमारे मां में एक शांति एक स्नेहा भालोबासा करुणा का प्रगत्य होता है वो क्यों होता है क्योंकि मां के ही सदगुण धीरे-धीरे मां की बटन से हमारे शरीर में हमारे हृदय में प्रवेश करते हैं तो मां की बटन का यह इंर्पोटेंस जो है मां की बटन का यह महात्म्य है ये वही है की जैसे ही मां की बात पड़ी मां की मां के सद्गुरु हमारे मां में हमारे हृदय में प्रवेश करना शुरू किया वो एक छोटी सी घटना अभी देखा कहा की मां का तो घर भारती है और यह लोग तो बिल्कुल मां के घर में किसी को पहचानते नहीं है मां का तो सिर्फ नाम सुना है वो चले आए हैं अभी वो इतना पूरा घर भारत हुआ है अभी ये कर पांच बच्चे भी हैं औरत भी थकी हुई है उसका पति भी थक हुआ है इतनी लंबी जर्नी करके आया है अभी कौन उनकी देखभाल करेगा कहां पे उनको विश्राम के लिए जगह देखा बच्चे भूखे हैं तो बच्चों के लिए दूध उनके लिए बच्चों जैसा आहार प्रस्तुत करना यह सब मां के घर में कौन करने वाला है घर इतना छोटा सा मां वी वृद्धा हो गई है मां के जितने सेवक है वगैरा वह सब व्यस्त है मां के घर के जो परिवारजन है उन लोगों की अपनी समस्याएं है यह इतने सारे लोग एके चले गए कौन उनकी देखभाल करने वाला है किंतु जैसे ही मां के पास में खबर गया की यह दंपत्ति आया है बच्चों को लेकर के वैसे ही मैन उनको भीतर में बुलाया बच्चों के लिए खाने की व्यवस्था हो गई वह पत्नी के लिए पति के लिए विश्राम की व्यवस्था हो गई और थोड़ी डर के बाद में देखा की पत्नी जो है वो महिला वो मां के घर की दूसरी भक्ति महिलाओं के साथ में वो अपनी कोक में अपने हाथ में वह घड़ा लेकर के तालाब में से पानी भरने के लिए जा रही है जैसे की कोई लड़की अपनी मां के घर गई हो शादी के बाद में वो तो अपने ससुराल चली जाति है किंतु फिर जब मां के घर वापस आई है तो उसको सब कुछ कितना सुंदर दिखता है की हां यहां पर मैं खेलती थी यहां पे मैं अपनी मां के साथ में बात करती थी यहां पिताजी के साथ में अपनी यहां पे भाइयों के साथ में खेलती थी तो जब अपने मैं के वापस आई है तो उसको कितना सुंदर अनुभूति तो यह लड़की के साथ में भी ऐसा ही हुआ इस औरत के साथ में जैसे की अपने मैं के आई है के घर में और इस तरह से वह रही कुछ दोनों तक जैसे बिल्कुल पहले बार मिले हैं किंतु ग नहीं रहा है की प्रथम बार मिले जैसे की जन्म जन्मांतर का संबंध इसके बाद में एक दिन इन दोनों ने विदाई ली विदाई लेने के बाद में थोड़ी डर के बाद में देखा गया की इस औरत ने अपने साड़ी वो वहां तालाब के किनारे सूखने को दी थी वो भूल गई थी वो वैसे ही चली गई तो वह देख करके वहां बेचारी बड़ी ही परेशान हो गई की अरे वो मेरी मेरी बिटिया मेरी लड़की वह बेचारी कल साड़ी खोजेगी तो उसको साड़ी नहीं मिलेगी उसको पछतावा होगा की अरे मैं मां के वहां पर गई तो साड़ी छोड़कर के ए गई तो मे इस तरह से यह कर रही है शौक कर रही है देख करके सन्यासी शिष्य ने कहा की मां क्या मैं साड़ी जाकर के उनको डीके आऊं तो मां बड़ी प्रश्न हो गए बोले की बड़े ही धूप है और छाता लेकर जाना और वे लोग ज्यादा दूर नहीं गए होंगे तो गाड़ी देखिए वापस ए जो तो यह सन्यासी महाराज ब्रह्मचारी महाराज छाता लेकर बड़ी धूप में निकले वो साड़ी देकर के वापस आए अभी आकर के वहां वरांडा में बैठे हैं पता चला की उसने अपना गमछा भी वहां पे छोड़ के चली गई थी तो ये देखकर के वो नलिनी दी है माखुदी है वो बड़े ही नाराज हो गए की वो उसने इतने सारे कच्चे बच्चे पैदा कर दिए हैं उनकी संभलकर उनको संभालने की भी उसमें शक्ति नहीं है ताकत नहीं है वो मां के घर आई है सब छोड़ के चले जा रही है उसका मां भी कहां बिखरा पड़ा हुआ है मां केंद्रित नहीं है मां में अशांति कैसे लोग हैं बच्चे बना लेते हैं शादी कर लेते हैं अपना खुद का ध्यान नहीं रख पाते ऐसा करके कटु वचन बोलती जा रही है और यहां पर वहां बेचारी इतनी मतलब आंखों में से आंसू आने वाली स्थिति हो गई चेहरे मेरी बेटियां उसने अपना गमछा भी यहां पर छोड़ दिया वो कल गमछा वो उसका व्यवहार उसको जब करना होगा तब उसको याद आएगा क्या रे मां के वहां गम को छोड़कर आई अभी मैं क्या करूं तो ऐसा बोलकर के मां की आंख में आंसू ही आने बाकी थे तब वो सन्यासी महाराज फिर से बोले मां क्या मैं गमछा देख के आऊं तो मैन कहा हां बेटा तुम बिल्कुल देख के आओ अवश्य देख के आओ मां का चेहरा से प्रस्तुति हो गया जैसे गुलाब प्रस्तुतिक होता है इस तरह से तो वो नलिनी थी मां को ये बड़े ही नाराज हो गए अरे उसको अभी तो साड़ी दे के आए हो अभी तुम इतनी धूप में गमछा देने को जा रहे हो तुम्हारे में अकल है की नहीं है कोई जरूर नहीं है जान की किंतु सन्यासी महाराज ने देखा की मां की इच्छा है की मैं देखें हूं तो फिर वह इतनी धूप में फिर से गए कितना रास्ता पर किया देखा की वो भक्ति दंपत्ति बैठा हुआ था चल रहे थे वो रास्ते में तो जाकर के उनको मिले और गमछा दिया और बताया की मां ने कहा है की मेरी लड़की को यह देखकर के वो औरत बेचारी रन लगी वो सोच रही है की मैंने इतना प्रेम मेरे खुद के घर में कभी नहीं मिला और मां के पास में पहले बार आई हूं और मां का मेरे पर इतना प्रेम देखिए तो ये बात जो है मैंने जो पहले बार पड़ी थी तो मुझे भी थोड़ा सा ये नलिनी थी और मां को दी जैसा मेरे मां में हुआ था की अरे ये क्या पागल लोग हैं वो मां के घर में आते हैं सबको परेशान करते हैं चीज छोड़ कर के चले जाते हैं फिर मां बेचारी रोटी बेटी है और यह सन्यासी जिनको और क्या और कोई कम धाम नहीं है दौड़-दौड़ करके जाए उसको अपना गमछा साड़ी देकर के आए मुझे भी ये सब थोड़ा सा मां में घुसा हुआ था वो फिर सोचता हूं मां क्यों ऐसा कर रही है क्या वो क्या जरूर थी इनको लोगों को इतना भाव देने की ऐसे मूर्ख लोग तो आते रहते हैं जाते रहते हैं किंतु देखिए की अब मैं तो थर्ड परसों हूं यहां पर मामले में पूरा इंवॉल्व नहीं हूं किंतु यदि उसे लड़की की जगह यदि मैं होता और मेरे साथ में मैन इतना प्रेम दिखाए होता तो मेरा पूरा मेरे जितने भी करमत थे उन्हें वाले हैं वो थे भूतकाल में वर्तमान में भविष्य में यह प्रेम यह भालोबासा करके सब दुष्कर्म कहो सब कुकर्म कहो सब जितने ही को विचार कहो इस भालोबासा से ही इसने से ही वो विघलित हो जाते हैं मेरा हृदय विगलित हो जाता भविष्य में भी यदि मुझे ऐसा कोई ऐसा सोने की मां की ऐसा शॉर्टकट करके मैं अपना लाभ अपने लिए एक बेनिफिट कर लेट हूं ऐसा यदि मेरे मां में विचार भी आता तो मां की यह बात याद आई की मैन तो शॉर्टकट नहीं किया अपने जीवन में मां तो वो गमछा या साड़ी वो किसी को दे देती मैं दक्षिण में है की हां यह ले लो यहां पर पड़ा हुआ है मां के पास में तो बहुत सारे गरीब औरत देहाती थी तो क्या जरूर पड़ी थी साधु एक सन्यासी को दौड़ने की बार-बार इस तरह से धूप में तो ये विचार आने से ही मेरा हाथ इस तरह से कुकर्म करने के लिए उठाता तो अपने आप वापस ए जाता और देखिए की शुरू में मुझे ये थोड़ा सा क्या कहेंगे की थोड़ा सा एक गुस्से का भाव हुआ था नाराजगी का भाव ये पढ़ करके की मां को क्या जरूर है इतना सभी लोगों की केयर करने की किंतु अभी इतने दिन हो गए इस बात को पढ़े हुए और जिन जितना भी सोचता हूं उतना ही मुझे लगता है की देखो ये माही कर शक्ति है ये दिव्या शक्ति होने से ही बिल्कुल अनजाने व्यक्ति के प्रति इतना भालोबासा इतना स्नेहा इतना प्रेम किसी को एक दिव्या एक अवतरण नहीं होता दिव्या अवतार नहीं होता तो किसी सामान्य मनुष्य के हृदय में यह होना संभव नहीं है तो मैं भी यदि मेरे मां में कोई कुविचार आएगा या मैं कुछ सोचूंगा की अरे कुछ शॉर्टकट करके कुछ गलत कम करके ये मेरा कम है उसको समाप्त कर दिया जाए तो किंतु जब मेरे मां में ये मां की बात अब जब प्रगति होगी उत्पन्न होगी तो मैं भी दो बार सोचूंगा रे नहीं ऐसा तो नहीं करना चाहिए मां की शिक्षा तो ऐसी नहीं थी तो ये सदाचार राशि के द्वारा मनुष्य का कल्याण जगत का कल्याण किस तरह से करना है मां की बातें पढ़ के वो हमको यहां पे समझ में आता है यानी की वो एक शुभ और निशुंभ हो गए वो जगदंबा ने आकर के खड्ग से उनकी हत्या कर दी और बात खत्म हो गई अभी फिर से शुभ दिन शुभ आएंगे तो मां को फिर से आना पड़ेगा किंतु यहां पर देखिए की एक पर्पेटुअल मोशन मशीन मैन शुरू करके इंटरनल एक व्यवस्था माननीय इस तरह से विचार आए मां की बातें पढ़ कर के हमारे मां को हम तृप्ति प्रशांति दे सकते हैं अभी यहां से महाराज एक नया टॉपिक स्टार्ट करते हैं अभी तक तो यह आरी संघार के बड़े में असुरों के विनाश के बड़े में बताया की असुरों का विनाश करने का करने के लिए शक्ति का नई बेहद धरण करके अवतरण होता है तो यह एक प्रयोजन है दूसरे एक प्रयोजन के बड़े में अभी महाराज का रहे हैं महाराज कहते हैं सुधु विघ्न ऐप्स नहीं देवी कर्तव्य है वाइन का अपसरण अर्थात की ये दुराचारियों का सहर ही एक मंत्र विघ्न यानी की किसी भी तरह का वो वो किसी भी तरह का एक बेड वूमेन या तो फिर बेटी ये उसको वाइन करते है यानी वाइन को दूर करना ही एक मंत्र देवी का प्रयोजन नहीं है कर्तव्य नहीं है कहां के नवीन आदर्श छुपी तो कुरते नूतन उद्दीपन जो गए मां को नवीन आदर्श की स्थापना करनी होगी नए नए प्रेरणा उनको प्रगति करवानी होगी इस जगत में देखिए नया आदर्श क्या है नया आदर्श यदि स्थापित नहीं होता मां कभी मां ने कहा था ये वो वो एक कहानी है ना मां की बहुत ही सुंदर कहानी है की एक लड़का मां के पास में आया दीक्षा लेने के लिए तो मैन पूछा है तो उसको लड़के को देखकर की पता चल जाता है की वो डम है डम अर्थ की बंगाल की एक नीचे जाति तो नीचे जाति का लड़का है तो मां उसको दीक्षा देने के लिए थोड़ा सा संकोच कर रही थी मैन बोला की देखो यहां पे तो जयरामबाती इस आसपास के गांव में जी तरह से रूढ़ि चुस्त है जी तरह से और थोड़ी सी है मैं तुमको दीक्षा दूंगी तो लोग मेरे बड़े में क्या-क्या बोलेंगे हो सकता है नाथ बाहर कर दे सब उसे समय गांव में होता था तो बहुत ही वह मतलब जो आप ये जिसको क्या बोलते हैं की छुआछूत जिसको हिंदी में कहते हैं इसका पालनपुर नहीं करेंगे तो आपको फिर ये लोग बहिष्कार कर देंगे ये वो हिंदी में बोलते हैं हुक्का पानी बैंड कर देना वो आ हिंदी मूवी में यदि आप देखें होंगे तो बहुत बार बोलते हैं की गांव के नियमों का पालनपुर नहीं किया तो आपका खुद का पानी बैंड कर देंगे अर्थात की गांव में आपका बहिष्कार करेंगे कोई भी जो आम फेस्टिवल है आम प्रश्न है उसमें आपको हिस्सा नहीं लेने दिया जाएगा गांव का एक हुआ है वहां से आपको पानी नहीं लिया नहीं लेने देंगे फिर यदि आप बीमा हो गए एसुस्त हो गए तो गांव का जो वैद्य है या जो भी है वो आपकी चिकित्सा नहीं करेगा बहुत ही आपको कष्ट में दाल देंगे बहिष्कार होना मैन वहां पर रहना फिर मुश्किल हो जाता है वहां से आपको दूसरे गांव में चले जाना पड़ेगा तो अभी वहां पर आसपास में इस तरह से जो स्थिति है तो संकोच करके भूल रही है की तुम तो डम हो और बात भी सॉरी मैं तुमको दीक्षा दूंगी तो फिर ये ये सब होने की संभावना है तो ये लड़का बड़ा ही चला था उसने इम्मीडिएटली बोल दिया अच्छा एक बात भी को आप बोलते हुए तुमको शर्म नहीं आई अभी एक बागड़ी को लड़का बनाने में तुमको लज्जा हो रही ऐसा उसने बोल दिया मां एकदम आसपास में जो लोग बैठे थे वे लोग भी नाराज हो गए की अरे ये क्या बोल दिया और ये बोला तो गलत नहीं बोला है मां जब दक्षेश्वर जा रही थी जब वो ठाकुर को मिलने के लिए मां के संगीत थे मां तो बड़ी ही उनकी कम उम्र थी लड़की ही थी तो इतना लंबा रास्ता वह पर करना जयरामबाती कमर कुकर से दक्षिणेश्वर जान का किस तरह से वह छोटी लड़की कर पाएगी बेचारी तक गई और वो चलना बहुत बड़ी ही धीरे-धीरे चल रही थी अभी वह लोग बहुत बड़ा मैदान है तो वहां पर तो डाकुओं का उपद्रव था तो मां के जो संगीत थे उन्होंने सोचा की मां को छोड़ दिया जाए अपनी जान बच्चा ली जाए की वरना हम लोग यहां पे धीरे-धीरे चलेंगे रात हो जाएगी तो डाकू लोग आकर के हमको मार लेंगे बोलकर के इतनी कुर्ता के साथ में मां को छोड़कर के वे लोग आगे चले गए यहां पे रात हो गई मां के लोग ये लोग मार्ट में अकेली चल रही है वो एक आया डाकू मां के सामने बड़ा ही कल और लंबा चौड़ा पूरा रक्षा जैसा उसने आकर के ही बोला करे की आज से कौन हो रे कौन हो तुम क्या रे कौन हो तुम तो यह बात सुनकर के ही मां का मां के मां में वो दिव्या बालिका का एक भाव प्रगति हुआ अमिर्भव हुआ और मैन कहा की पिताजी मैं आपकी बेटी हूं मैं आपकी लड़की हूं तो यह जैसे ही मां का दिव्या पालिका का स्वरूप देखा वह डाकू एकदम शांत हो गया और की स्नेहपूर्वक आदरपूर्वक बोला की बिटिया तुमको डरने की जरूर नहीं है मेरी पत्नी अभी ए ही रही है हम लोग तुमको लेकर के पूरा रास्ता तुमको कोई तकलीफ ना हो इस तरह से हम तुम्हारे साथ में चलेंगे और ही लोग यहां तक की मां को दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास छोड़ के आए थे ठाकुर से आशीर्वाद भी प्राप्त किया था तो अभी वो डाकू ताबा थी तो अभी ये लड़के ने दीक्षा लेने के लिए आया है फैट करके बोल दिया की तुमको जब जरूर पड़ी तो बागड़ी को आप बोल दिया और अभी तुम बागड़ी को बेटा नहीं बना पाओगी ये किस तरह की तुम्हारी ये किस तरह का तुम्हारा न्याय है तो यह सुनकर के दूसरे लोगों को तो नाराजगी होगी किंतु हम लोग हनुमान करके का सकते हैं की मां हसी होगी अवश्य और मैन ठीक किया की ठीक है बेटा मैं तुमको दीक्षा दूंगी तो देखिए यह मां का आमिर भाव कोई समाज को तोड़ने के लिए नहीं हुआ था मैन एक बार तो सोचती थी की हां समाज के लोग का रहा है फिर समाज का नियमों का जहां तक पालनपुर हो वहां तक पालनपुर करना है किंतु उसके बाद में एक नई व्यवस्था एक नए भारत का आविर्भाव करवाना है तो यहां पर महाराज कहते हैं की मां का आगमन सिर्फ अरिहंत के लिए शत्रुओं के विनाश के लिए रक्सन के विनाश के लिए मंत्र नहीं हुआ एक नए भाव एक नए युग का विवरण जिसको कहते हैं प्रादुर्भाव एक नए युग का एक नया सूरज का प्रभात उसके लिए मां का आगमन हुआ है बिल्कुल ही नया भाव नूतन उद्दीपन नवीन आदर्श महाराज ने दो शब्द प्रयोग किया है नूतन उद्दीपन यानी की नया नई प्रेरणा नवीन आदर्श अर्थात की नया आदर्श स्थापित करने के लिए शत्रुओं का तो विनाश कर दिया हमारे मां में से कुकर भाव शायद धीरे-धीरे करके कम भी हो गए किंतु यदि एक नया एक सुंदर आदर्श नहीं मिलेगा एक एक अच्छे सदगुण नए नहीं मिलेंगे परिशुम हर द्वारा भक्ति और साधन मार्ग स्वयं भगवान के सहर या तो रक्षा के विनाश के लिए भक्ति का जो साधन मार्ग है उसमें से सभी निष्कंटक यानी की कंटक जो है वो कांटा जिसको बोलते हैं रास्ते में से कांटे को हटाने के लिए सिर्फ भगवान का आगमन पूर्ण भगवान का आगमन नहीं हो करके उनका आशिक या गन विशेष के आविर्भाव से ही वो कार्य हो सकता है यदि रक्सन का सहर करना है याद याद ही धर्मस्य भगवान कृष्णा ने कहा है की जब भी रक्सन का वीरभाव होगा यह साधु संत महात्मा ऋषि मनी गण है उनकी साधना में विक्षेप पड़ेगा तो उन साधकों की साधना में विक्षेप को दूर करने के लिए मेरा अमीर भाव होगा किंतु महाराज जी कहते हैं की इस तरह से राक्षसों का सहर करने के लिए ऋषि मुनियों को अभय प्रधान करने के लिए आशिक अवतार भी जल्दी पृथ्वी पर प्रकट हो जाए तो उससे भी कम हो जाएगा किंतु यदि एक पूरे जगत में ठाकुर स्वामी जी ने कहा है ना की ठाकुर ने आकर के ब्रह्मा कुंडलिनी को जगराता कर दिया है तो ब्रह्मकुंडली नीचे थी जागृत करनी है तो पूर्ण अवतार ही चाहिए किंतु मानव समाज के आध्यात्मिक अनुभूति और उच्चतर सोपान तू लेते हीले स्वयं ब्रह्म शक्ति कई प्रमुख इत्रवतईरान होते हुए परंतु मानव समाज को आध्यात्मिक अनुभूति के उच्चतम सोपान पे स्थापित करने के लिए स्वयं ब्रह्मा शक्ति को ही कर्म क्षेत्र में अवनी होना पड़ता है स्वामी जी ने जैसे कहा था की ब्रह्मा कुंडलिनी जागृत हो गई है पूरे मानव समाज को आज हम जहां पर है वो समय भी इस तरह का था की ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज पूरे साम्राज्य का झंडा पुरी पृथ्वी पर लहरा रहा था कहा जाता था की संन्यावर सेट्स ऑन ब्रिटिश अंपायर यानी की हांगकांग से लेकर के अमेरिका तक कनाडा तक ब्रिटिश साम्राज्य था और पूरे पृथ्वी चारों और फैला हुआ था तो कहानी ना कहानी जैसे पृथ्वी रोते करती है ना कहानी ना कहानी तो ब्रिटिश साम्राज्य के किसी एन किसी देश के ऊपर में राष्ट्र के ऊपर में सूरज प्रगति प्रकाशित होता ही होगा यदि ब्रिटेन में रात करती है तो भारत में सुबह है और यदि भारत में रात है तो वहां अमेरिका में दिन है तो संयवर सेट्स ऑन ब्रिटिश अंपायर पृथ्वी पर फैला हुआ है इस तरह से की कहानी ना कहानी ब्रिटिश अंपायर के किसी एन किसी जगह पे सूरज प्रकाशित होता राहत है तो ये ब्रिटिश अंपायर यह यूरोपियन वालुज या वेस्टर्न कलर इस तरह से उसने आक्रमण किया था की हम लोग बहुत सारे ये जो माइकल मधुसूदन और ठाकुर को मिलने के लिए गया बहुत बड़े कवि थे और मेघनाथ वध उनका काव्या स्वामी जी का बड़ा ही प्रिया था तो ठाकुर ने उनको पूछा की धर्म ने धर्मांतरण क्यों किया तो उसने पेट की और इशारा करके कहा की पेट के लिए तो यह बात सुनकर के ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए थे वो बोले नारा ये किस तरह के छिछोरी बातें कर रहे हो पेट के लिए धर्मांतरण कर दिया तो अभी क्या था की क्या करें जो लड़के तपस्या के लिए जा रहे थे की ठाकुर पेयशेयर बाल्टी मच्छर मुंडो माथुर योगा तो अर्थात की ठाकुर के लिए अच्छे खाने की व्यवस्था पाया शेर बाटी अर्थात की खिड़की कटोरी और बाकी सब व्यंजन अच्छे खनन की व्यवस्था मधुर बाबू करते थे तुम लोगों की ऐसी व्यवस्था कौन करेगा इस यह बोलकर के मैन तपस्या के लिए जान वाले साधुओं को बेलूर मठ वापस भेज दिया था तो ठाकुर को तो ठीक है बढ़िया मजे से दक्षिणेश्वर में बैठे हैं वो माथुर बाबू को बोलेंगे ऊंट तो खड़ा हो जाएगा बोलेंगे बैठ तो बैठ जाएगा ऐसे बड़ा राजा जैसा आदमी उनके हाथ में है कितने उनके रसद्दार वो इतने लोग उनके खड़े हैं हाथ जोड़कर के उनकी सेवा करने के लिए कथामृत में हमने पढ़ा की मास्टर महाशय जब बलराम भवन में जाते हैं तो देखा की एक व्यक्ति ऐसा हाथ जोड़कर के बहुत ही विनय विनय हो करके वहां पर खड़ा है ठाकुर की सेवा करने के लिए तो मशहूर महाशय ने पहले तो यही सोच लिया होगा की कोई नौकर होगा बाद में पता चला की अरे तो बलराम बाबू स्वयं जिनका की ये घर है जिनके घर में ठाकुर पढ़ा रहे हैं तो ऐसे बड़े-बड़े लोग धनी लोग मनी लोग दो हाथ जोड़कर के ठाकुर की सेवा करने के लिए उनका आदेश पालनपुर करने के लिए खड़े हैं तो ठाकुर बोल सकते हैं की अरे तुमको पेट के लिए धर्म परिवर्तन करने की क्या जरूर है किंतु जिसके लिए यह सब नहीं है मथुरा बाबू जिसके पास नहीं है वे बलराम बाबू जिनके पास नहीं है हाथ जोड़कर के सेवा करने के लिए खड़े वे लोग बेचारे कहां जाएंगे उनको तो धर्म परिवर्तन करना ही पड़ेगा यदि समाज में कुछ प्राप्त करना है तो ये इस तरह का समय था की या तो फिर आप अपने पुरखा के यह जो हजारों साल की चली आई हुई संस्कृति को लात मार करके उसको ठुकरा दे और धर्म परिवर्तन तो करने वाले लोग ज्यादा नहीं थे मतलब भद्र समाज जिसको कहा जाता है यह मिडिल क्लास में लोअर क्लास में बहुत सारे लोगों ने कर लिया था वो मिडिल क्लास कितने लोग वैसे इजी इतना इजीली धर्म परिवर्तन नहीं करते थे माइकल मधुसूदन का तो एक एक्सेप्शनल कैसे था किंतु बहुत सारे लोगों के मां में सन प्रकट हो गया था संक्षे प्रगति हो गया थे की हां हमारे हजारों सालों की ऋषि मुनियों की परंपरा सही है की गलत है इसमें स्वामी जी स्वयं स्वामी जी स्वयं वो हाजरा के साथ में क्यों बात करते थे हाजरा का एक स्केप्टिकल नेचर था सभी चीजों के ऊपर में फैट करके विश्वास नहीं करता था एक संदेह आत्मा को उसका नेचर था बोलकर के स्वामी जी को उसके साथ बात करने में बड़ा मजा आता था हाजरा के साथ में बैठे रहकर के उसके साथ में गैप लगाते रहते थे तो ये स्वामी जी जैसे स्वामी जी के मां में संदेह हो गया एक बार स्वामी जी गीता की प्रशंसा करने लगे तो ठाकुर ने क्या कहा नरेंद्र गीता की प्रशंसा कर रहा है इसका अर्थ यह है की किसी यूरोपियन पंडित ने कहा है यूरोपियन पंडित ने गीता के प्रशंसा की होगी इसलिए नरेंद्र कर रहा है तो ठाकुर को भी पता था की नरेंद्र किस हद तक ये सब चीजों में विश्वास करता है हमारी संस्कृति पर वह उसके मां में संदेह था तो यह संदेह संशय का जो एक पूरा वातावरण खड़ा हुआ था हमारी संस्कृति के विरोध में उसका पूरा विनाश करके उसकी जगह पे हिंदू संस्कृति भारतीय परंपरा हमारा आर्य धर्म हमारे वेदांत की पुनः स्थापना करना ये भी एक एन तूने जागरण एक नव प्रभात का शुभारंभ एक आकाश में जब रोड होती है प्रभात होता है तो आकाश में किसी लालिमा छ जाति है तो इस तरह से नवाप्रभात नवयुग का उद्यापन करने के लिए भी शक्ति का अवतरण पूर्ण शक्ति का आशिक शक्ति का नहीं पूर्ण शक्ति का अवतरण इसीलिए इसके लिए भी प्रयोजनीय था तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं