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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्राणों की पुकार || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 29 Nov 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः यहां पर आसपास में इतने सारे पेड़ है कि पूरी रात जब यह हवा चलती है तो पेड़ में से हवा पार होती है तो सूसू करके जो आवाज होती है ना वह पूरी रात भर यहां पर सुनाई देती है और कथामृत में वह वर्णन है कि वो झावतला में जो झाऊ वृक्ष है उसमें से जो किस तरह से जो हवा चलती है मास्टर महाशय वहां पर कुछ दिन रात को रुके थे तो वोह क्रिसमस की छुट्टी के दौरान ठाकुर ने कहा था कुछ दिन यहां पर रहो साधन वजन करना तो फिर मास्टर महाशय रुके थे और फिर पहले तो रुके थे वही नबत में नबत के फर्स्ट फ्लोर पर क्यों क्योंकि मास्टर महाशय का कवित्वम प्राण तो नबत का जो पहला जो मंजिल है पहली मंजिल वहां से सुंदर सब दृश्य दिखता है वहां सामने में गंगा दिखती है फिर इस साइड में ठाकुर का कमरा है उसके ऊपर में देखेंगे तो काली मंदिर का जो शिखर है वो सब पूरा सुंदर रूप से दिखाई देता है तो मास्टर महाशय कहते हैं कि नहीं मैं तो नौबत में ही रुकूंगा किंतु ठाकुर ने कहा था कि वह पंचवटी की जो कुटिया है वहां पर बहुत साधन भजन हुआ है वहां पर जाकर के रुकना तो मास्टर महाशय पहले तो माने नहीं पहले तो अपना कवित्वम जो हृदय था उसकी बात सुन कर के वो पहली मंजिल पर रुके नबत के किंतु फिर रात को उनको लगा कि नहीं यहां पर सिर्फ वो कविता सुनने सुनाने के लिए या तो फिर यह सौंदर्य देखने के लिए नहीं आए प्राकृत सौंदर्य यहां पर तो आए हैं साधन वजन के लिए तो उन्होंने सोचा कि जब ठाकुर ने कहा ही है कि मैं पंचवटी के नीचे में जो कमरा है एक जो एक झोपड़ी है जहां पर रहकर के ठाकुर ने अद्वैत साधना की थी वहां पर मैं जाकर के रहता हूं तो वह जा रहे हैं वहां पर और एकाएक उनको वोह तो उस समय तो पंचवटी तो एकदम घना था वहां पर बाहर से तो कुछ दिखाई भी नहीं देता था और जगह भी थोड़ी सी नीचे से थी वो ढलान जैसा कुछ था तो भीतर में कौन बैठा है पता नहीं चलेगा बाहर से एकाएक मास्टर महाशय जा रहे हैं झोपड़ी की ओर और एकाएक उनको सुनाई दिया कि ठाकुर का कोई एक भक्त वह प्राण के आवेग से पुकार रहा है कि कहां हो दादा मधुसूदन कहां हो वो जो ठाकुर की कहानी है ना मधुसूदन की वह बच्चा जंगल से जा रहा है उसको डर लग रहा है तो उसकी मां ने कहा तुम दादा अपने है बड़े भाई मधुसूदन उनको पुकारना तो बच्चा जंगल से जा रहा है डर लग रहा है तो पुकार रहा है कहां हो दादा मधुसूदन तो मधुसूदन आकर के खड़े हो जाते हैं उनके साथ में और बच्चे को बिना विघ्न के वह जंगल पार करा देते हैं तो यहां पर भी ठाकुर ने कहा है कि चित्कार करके रोना है ईश्वर का नाम यदि चित्कार करके रोते-रोते लोगे तभी यह सब ईश्वर का दर्शन ईश्वर की प्राप्ति आसान हो जाएगी व तो मास्टर महाशय यह देखते हैं कि एक भक्त है ठाकुर का जो कि पंचवटी में वहां पर बैठ कर के चित्कार करके रो रहा है पुकार रहा है कि कहां हो दादा मधुसूदन तो अभी यह कहानी जो है तो मैं सोच रहा था मैं मास्टर महाशय ने नाम नहीं दिया किसी का कि कौन भक्त था किंतु महापुरुष महाराज के स्मृति कथा पढ़ेंगे तो उसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है जब किसी ने कहा कि अच्छा महापुरुष महाराज को प्रश्न किया कि जब ध्यान तो होता नहीं है मन बैठता नहीं है जितना भी कोशिश करें मन चंचल है 10 दिशाओं में वह भागता है तो क्या किया जाए तो महापुरुष महाराज उस समय वह प्रेसिडेंट थे तो उन्होंने कहा कि अच्छा मुझे ठाकुर ने क्या कहा था पता है अरे कादरे काद अरे तुम रो रोते-रोते ईश्वर को पुकारो जदिया तो अपने आंसुओं से अपने हृदय की जो मलिन है जो चित्त शुद्धि करने की आवश्यकता है वह सब एक साथ में हो जाएगा मलिन होता धुल जाएगी चित्त शुद्धि होगी यह ईश्वर के लिए यदि तुम रो पाओगे तो तो महापुरुष महाराज ने कहा था कि फिर मैं वहां पर जाकर के पंचवटी में या कालीवाड़ा चित्कार करके रोता था और फिर ईश्वर को पुकारता था तो देखिए यहां पर यह दो स्मृति कथाएं मिल जाती है मास्टर महाशय ने कहा नहीं कि वह तारक द थे महापुरुष महाराज थे महापुरुष महाराज ने भी ऐसा कोई स्पेसिफिक मेंशन नहीं किया कि कथामृत में वो जो वर्णन है

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वो मेरा ही है किंतु जैसे कि ये दोनों मिल जाते हैं हम अनुमान करके कह सकते हैं कि वो महापुरुष महाराज ही होंगे हालांकि ठाकुर ने सभी भक्तों को अपने सन्यासी शिष्यों को ऐसा कुछ ना कुछ कहा ही होगा तो एक कोइंसिडेंटली तो यहां पर भी रात को मैं सुनता हूं यह पेड़ में से यह पवन पसार हो रहा है राजकोट में इतने पेड़ नहीं थे तो पता नहीं चलता था और उसके पहले में मठ में

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था तो बेलूर मठ में भी इतने पेड़ नहीं कि वह पवन उसमें से पसार हो और फिर ऐसा सूसू करके आवाज आए तो यह सब मैंने देखा था सुना था जब मैं रांची में था रांची में अपना एक दो जमीन है ट्राइबल एरिया में 7575 एकर्स की दो अपनी जमीन है जहां पर भी हम यह उन्नत किस्म की खेती वगैरह बच्चों को सिखाते हैं ट्राइबल लड़कों को तो वहां पर मैं कभी-कभी रात को रुक जाता था रुकना पड़ता था तो वहां पर ऐसा होता था मुझे वो दिन अभी भी याद है कि ठंडी के दिन है वो रांची की ठंडी तो एकदम जोर की ठंडी माने वो तो हिल स्टेशन जैसा है तो वहां पर तो लोग हेल्थ के लिए जाया करते हैं स्वास्थ्य को इंप्रूव करने के लिए तो और वैसे भी यह ट्राइबल विलेज है कोई किसी भी तरह का पोल्यूशन नहीं किसी भी तरह का यह अब जैसे शहर में देखेंगे या तो फिर यह एयर पोल्यूशन या तो फिर ये नोइज पोल्यूशन या तो फिर ये लाइट पोल्यूशन इतनी लाइट चारों ओर जला के रखते हैं शहर में कि आपको आकाश में तारे भी नहीं दिखाई देंगे हवा में इतना भयानक पोल्यूशन होता है कि आपको अभी ये जैसे कि दिल्ली की हालत है और दिल्ली जैसे ही मोर और लेस ज्यादातर शहरों की है हम लोग कभी-कभी इतना यूज टू हो जाते हैं यह सब एयर पोल्यूशन से कि जब हम यह शुद्ध जगह पर जाते हैं तो भी हमको लगता है डिफरेंस लगता है अदर वाइज शहर में रहते रहते तो डिफरेंस लगेगा भी नहीं और तीसरा है नोइज पोल्यूशन शहर में ऐसा संपूर्ण रूप से शांत वातावरण मिलना यह मुश्किल है सब समय किसी ना किसी तरह का वह नोइज व व आवाज है वह चलती ही रहेगी किसी ना किसी तरह की तो देखिए कि एक समय था कि हम लोग इस तरह से प्रकृति के साथ में रहते थे जब ठंडी होती है तब हम इस तरह से गर्म वस्त्र पहना करते थे फिर यह जो अग्नि है उसको प्रकट या करते थे फिर उसके सामने बैठ कर के थोड़ा सा कुछ मित्रों के साथ में गप लगाया या तो फिर कुछ चिंतन मनन कर लिया मैं इस तरह से रांची में मैंने बहुत दिन बिताए हैं मैं नारायणपुर गया था नारायणपुर आपको शायद पता होगा कि अपना एक बड़ा ही सुंदर वहां पर ट्राइबल डेवलपमेंट सेंटर है तो वहां पर भी मेरे एक दो इस तरह से मित्र थे सा ब्रह्मचारी तो वहां पर भी इस तरह का फार्म है तो वहां पर रात को रुका था एक बार कुछ दिनों के लिए रुका था तो वहां पर फार्म था फार्म में जैसे इतने आकाश में तारे दिखाई देते हैं कि आप शहर में सोच भी नहीं सकते कि आकाश में इतने तारे हो सकते हैं बोलकर के और फिर वहां पर रुका था और रात को जो परिचित थे मेरे महाराज मेरे मित्र जो थे उन्होंने किसी को बुलाया कहा कि भजिया बनाओ रात को गरम गरम भजिया तो गरमागरम भजिया बनाया गया वहां पर कुर्सी पर बैठे हैं सामने में अग्नि प्रज्वलित हो रहा है वह मक्का जो है मक्का को भुना गया अग्नि पे और वह खा रहे हैं साथ में चाय पी रहे हैं तो देखिए कि यह जो मनुष्य सभ्यता है हजारों सालों से इस तरह से प्रकृति की गोद में पली बड़ी है जब भी बारिश होता है तो बारिश का जो यह है पानी वह हमारे शरीर पर लगता है यदि ठंड होती है तो त महसूस करते हैं और जब गर्म होता है तो गर्मी के लिए जो कोई उपाय किया जाए वह सब हम करते हैं इस तरह से हम हजारों लाखों साल से बढ़े बढ़ते आ रहे हैं और यह जब प्रकृति के साथ में रहेंगे यह जो सीजनल चेंजेज जो है यह जो जिसको कहेंगे ऋतु यह ऋतु जैसे जैसे बदलती जाती है वैसे-वैसे ही अपना खानपान अपनी रहने की जो स्टाइल है अप अपने जो वस्त्र है अपना जो कार्य है अपने जो कार्य का समय है वह सब भी बदलता जाता है सूर्योदय से सूर्यास्त तक कर्म करना है कार्य करना है जो भी काम अपना हो घर का काम हो ना किय खेत में काम हो ना कि यह बाजार में कुछ काम हो जो भी है सूर्योदय से सूर्यास्त तक का वो साइकल रहता है अपना विश्राम और कर्म का तो देखिए कि जैसे ही अंधेरा हुआ 10 लोग पांच लोग मिलकर के बैठे मैं अपने खुद के घर की बात बताता हूं मैं जब छोटा था तो हमारे घर के सामने वह एक ओटला बोलक के एक होता है गुजरात में जो लोग रहते होंगे उनको पता होगा घर के सामने एक बनाते हैं बैठने की एक जगह वो जगह पर बैठ कर के तीन-चार पड़ोसी है पांच छह जितने भी हो उस शेरी में जितने रहते हैं सब इकट्ठा होकर गप लगाएंगे अभी मैं रिसेंटली यहां पर आने से पहले अपने घर गया था कोई एक दो दिन के लिए तो मैंने जाकर के देखा रात में वहां पर कोई नहीं बैठा है बाहर में तो मैंने अपनी मां को पूछा कि क्यों क्यों बाहर में कोई नहीं बैठा है तो बोला कि अभी देखिए कि सभी का लाइफ स्टाइल ही इतना चेंज हो गया है देरी से आएंगे फिर वह अभी मोबाइल टीवी सबके पास में है एंटरटेनमेंट के साधन कौन ऐसा गली में बाहर में शेरी में जाकर के बैठेगा अपने पड़ोसी के साथ में गप लगाएगा बहुत बार ऐसा होता है कि पड़ोसी को आप पहचानते भी नहीं है तो यह जो है प्रकृति से अपना जो विच्छेद होना अभी अपना समय कैसा है घड़ी के साथ में चलता है यदि ठंडी लगती है तो हीटर ऑन कर देना है गर्मी लगती है तो एसी ऑन कर देना है खाना पना एक ही तरह का चलेगा क्योंकि हम लोग अपनी क्लाइमेट को कंट्रोल करते हैं रदर देन कि ऋतु के साथ में जीने की बजह ऋतु को अपने वश में लाने का प्रयास करते हैं और वैसे भी देखिए कि ये ग्रीन हाउस एमिशन जो है यह ग्रीन हाउस गैसेस का एमिशन वो इतना बढ़ गया है कि अभी ठंडी जैसा कुछ लगता ही नहीं है तो अभी देखिए कि समय के साथ में अपने जीवन में इतना परिवर्तन आया है प्रकृति से मनुष्य इतना दूर चला गया है जैसे कि वी आर लिविंग इन एन अर्बन डेजर्ट ये जो शहरी ंग एक एक शहरी रण है एक शहरी एक रण विस्तार है उसमें रह रहे हैं ऐसा एक लगता है और वो स्वामी जी ने कहा था ना कुछ दिनों पहले जब हम पढ़ रहे थे कि मैन कम्स फ्रॉम फॉरेस्ट एंड ही रिटर्न्स टू द फॉरेस्ट ये मनुष्य है वन में से आया है वन में वापस जाएगा बस यह बीच में जो है य शहर रूपी एक अरण्य उसमें से हम पसार हो रहे हैं तो हमको भी यदि ऐसा हो सके कि प्रकृति की साइकल के साथ में अपने जीवन को ढाले थोड़ा बहुत जो है तो क्या है कि यह जो भीतर की जो आध्यात्मिकता है वह पनपना शुरू होगी वरना यह शहर में रह कर के अपना मन इतना व्यस्त रहता है अब थोड़ा सा आंख बंद करके दो-तीन मिनट बैठिए देखिए कि मन में कितने हजारों विचार आते हैं मैं जब छोटा था मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैं इतने विचार मैंने कभी अपने जीवन में किए हैं जितना मैं 5 मिनट में अभी कर लेता हूं ऑफकोर्स यह बड़े होने से ज्यादा रिस्पांसिबिलिटी आता है एक्सपीरियंस बढ़ता है लोगों के साथ में डीलिंग बढ़ता है तो नेचुरली जो कर्म व्यस्तता भी बढ़ेगी किंतु इसका एंटीडोट भी हमको निकालना ही पड़ेगा यदि हम प्रकृति के साथ में थोड़ा बहुत ट्यूनिंग ना कर पाए तो क्या होगा कि अपना जीवन है ना ज्यादा से ज्यादा आर्टिफिशियल होता जाएगा अपना मन जो है ना वह जैसे कि सहम सहम जाएगा जैसे कि अपना मन जैसे कि इट विल कोलप्पन इट सेल्फ इंग्लिश में कहते हैं वो वो जैसे कि संकुचित हो जाएगा उसका जो विकास है वह रुक जाएगा फिर क्या मन को अच्छा लगेगा सब समय एक तरह की व्यस्तता चाहिए यदि आप कर्म कर रहे हैं अपने बिजनेस में अपनी दुकान में या जहां पर भी हो जब तक कर्म कर रहे हैं तब तक मन कर्म में लगा है और जैसे ही आपको थोड़ा सा समय मिलता है आप वैसे ही मोबाइल निकाल करके या तो फिर मित्रों के साथ में गप लगा कर के अपना समय गवा देंगे यह जो थोड़ा बहुत अकेले बैठना अपने हाथ में बैठना अपने खुद के विचारों को सुनना और विचारों को धीरे-धीरे करके अपने से अलग कर देना टू अंडरस्टैंड दैट आई एम नॉट माय थॉट्स यह जो मेरे मन में सतत जो विचारों की भरमा जो यह हार माला चल रही है वह मैं नहीं हूं मैं इससे अलग हूं यह यह ज्ञान ये ज्ञान धीरे-धीरे करके हमारे मन में तभी पनपे ये मैं इतनी सारी मेरा हिस्ट्री पढ़ने का एक जो शौक है तो उसमें मैं बार-बार पढ़ता रहता हूं कि पुराने समय के जो [प्रशंसा] एस्ट्रोनोवा का अवलोकन करता है ऑब्जर्वेशन करता है सितारों का फिर सितार जो ग्रह है उनका और फिर उसके ऊपर में से वह गणना करता है कि कौन सा ग्रह कौन सा यह जो सूरज का उगना सूरज का अस्त होना उदय और अस्त कौन सी जगह से होता है कैसे होता है तो उन्होंने इतना हजारों सालों से ऑब्जर्वेशन करके करके ये टेबलेट्स बनाए थे टेबल्स कंपाइल किए थे कि हां यह जो इस इतने डिग्री एसेंशन और डिसेंशन पे यह तारा या यह प्लेनेट दिखाई देती है वगैरह वगैरह और इसके बेस पे फिर उन्होंने आखिर में प्रेडिक्शन करना शुरू किया था ये जो कोलंबस था पहली बार हम जो अमेरिका उन्होंने उसने खोजा और वहां के जो अमेरिका के वो जो नेटिव जो लोग थे जिनको कि लोग रेड इंडियन कहा करते थे तो यह वहां पर गया तो अभी उसको लगा कि यह लोग इतने सारे हैं उसके साथ में युद्ध करना चाहेंगे तो वो तो बेचारा मारा ही जाएगा तो उनको इंप्रेस कैसे करें तो उसने कहा कि देखो ये एक्लिप्स होने वाला है अभी ये एक्लिप्स मेरे हाथ में है सूर्य ग्रहण होने वाला है आप लोग मेरी बात नहीं सुनेंगे तो मैं सूर्य ग्रहण करवा दूंगा तो ये लोग सोचते हैं कि सूर्य ग्रहण किस कैसे पता चलेगा कि कब होगा कैसे होगा क्या इसके हाथ में है क्या सूर्य ग्रहण करवाना तो उसको पता था कि ये इतने समय पर ग्रहण होने वाला है कैलकुलेशन करके खोज निकाला था तो अभी जैसे ही सूर्य ग्रहण हुआ वो स्थानिक लोग बड़े ही विस्मय में अभिभूत हो गई कि अरे उसके पास में इतनी शक्ति है कि सूर्य को खा जाएगा तो सब उसके सामने झुक गए तो देखिए कि ये जो सब डेवलपमेंट हुआ कैसे हुआ कि आप प्रकृति की गोद में आप लेटे हुए हैं आप सोए हुए हैं घंटों के बाद घंटों तक आप आकाश का निरीक्षण कर रहे हैं एक्चुअली टू लुक लक आउट इज एक्चुअली टू लुक विदन आप जब प्रकृति के साथ में बैठे हैं बड़ी ही रमणीय जगह है पहाड़ है नदी है जंगल है कुर्सी पर बैठे हैं आप जितना प्रकृति का दर्शन करेंगे वैसा ही आपको पता चलेगा कि आप अपने हृदय में झांक रहे हैं क्योंकि यह जो बाह्य सौंदर्य और यह भीतर की आध्यात्मिकता यह जैसे की एक ही है उसका सौंदर्य का आनंद लेते लेते अपने भीतर की जो आध्यात्मिकता है उसके सीधे संपर्क में आप आएंगे तो यह जो है कि प्रकृति के साथ में रहना टू लिव इन ट्यून विथ नेचर इट इज वेरी नेसेसरी फॉर अस हम लोग इसको धीरे-धीरे करके भूलते जा रहे हैं किंतु जितना ही हम इस तरह से बीच-बीच में यदि निकल कर के ऐसी कोई जगह पर जाए कि जहां पर सिर्फ हम ही हो बहुत बार ऐसा होता है ना कि चलो पिकनिक पर चलते हैं 1015 मित्र चलते हैं पूरे रास्ते में गप ही लगाए वहां जाकर के जितना भी लिटरिंग अर्थात की वह प्लास्टिक की यह बोतल इधर-उधर फेंकी वह प्राकृतिक स्थान को गंदा कर दिया और फिर चले आए इस तरह से नहीं हो सकता है अकेले जाइए या तो फिर एक दो मित्रों के साथ में और वहां पर जाकर के संपूर्ण मौन व्रत का पालन कीजिए यदि मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं या किसी रमणीय जगह पे समय अपने साथ में बिताए अपने मित्र को कहिए ये जो अखंड नंद जी अर्थात कि गंगाधर महाराज और स्वामी जी वह हिमालय में जा रहे थे एक बार साथ में तो फिर स्वामी जी ने कहा कि एक काम करो ग गंजे गंजे करके पुकारते थे स्वामी जी अखंडानंद जी महाराज को कि तुम एक काम करो तुम इस रास्ते से जाना मैं इस रास्ते से जा रहा हूं अभी साथ में नहीं चलते हैं हिमालय में तो गंगाधर महाराज सोचते हैं स्वामी जी ऐसा क्यों कहते हैं हम दो ही तो है अभी हम साथ में नहीं चलेंगे तो कैसे चलेगा किंतु अच्छा ठीक है चलिए स्वामी जी का मन जद अंतर्मुखी हो रहा है तो उनको चलने दीजिए अपने से अकेले तो ग गंगाधर महाराज अलग से जा रहे हैं स्वामी जी अलग से जा रहे हैं बीच में एकाएक गंगाधर महाराज को स्वामी जी के हंसने और बातें करने की आवाज सुनाई दी तो वह थोड़े आश्चर्य चकित हो गए कि यहां पर मेरे अलावा तो और कोई है नहीं तो स्वामी जी किसके साथ में वार्तालाप कर रहा है किसके साथ में हंसी मजाक कर रहा है तो उन्होंने थोड़ा सा उस जहां से यह आवाज आ रही थी वहां पर जाकर देखा तो स्वामी जी अकेले हवा में बातें कर रहे हैं और अपने साथ में ही वह हंस रहे हैं तो गंगाधर महाराज समझ गए कि या तो उनको किसी तरह का दर्शन हो रहा है या तो कोई आध्यात्मिक अनुभूति हो रही है आज के समय में यदि आप अपने साथ में बातें करेंगे अपने साथ में हंसी मजा करेंगे तो लोग कहेंगे पागल हो गया है सब समय उसको लोगों से घिर कर के रखो सब समय उसको प्रवृत्ति से घिर कर के रखो जिससे कि वह अपने साथ में वार्तालाप ना करें अपने साथ में वार्तालाप करना जैसे कि एक मानसिक रोग की निशा नी है ऐसा एक बन गया है तो हमको इस ये जो विशय सर्कल है जो विषम चक्र उसको तोड़ कर के अपने साथ में यदि समय बिता सके प्रकृति के साथ में यदि मिलकर के रह सके तो जितना हो सके करना है शहर में रह कर के ज्यादा कोई अपॉर्चुनिटी मिलती नहीं है बीच-बीच में यदि मिलती है तो इसका लाभ इस तरह से लेना है ग्रुप में नहीं जाकर के अकेले या एक दो मित्रों के साथ में जाना है और जितना समय हो सके अपने से अपने साथ में बिताना है अच्छा तो यह तो वह रात को व जो पेड़ में से जो आवाज चल रही थी हवा की उसके वो देख कर के मुझे यह सब याद आया मैंने कहा कि थोड़ा सा शेर करते हैं अभी श्री रा मां शारदा देवी की जीवनी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध हमारा जो चैप्टर है प्राण टान अर्थात कि प्राण भर कर के मां और ठाकुर मां ने जो ठाकुर की सेवा की और इन दोनों का अपने के आपस में जो प्रेम था परस्पर उसके बारे में बहुत सारे उदाहरण गंभीरानंद जी महाराज हमको देते हैं तो देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या कहते हैं महाराज जी लिखते हैं ठाकुर बड़ो ई पेट रोगा छिले ठाकुर श्री रामकृष्ण वह बड़े ही उनको पेट का रोग था वह बड़े ही पेट रोगा थे अर्थात कि उनको पेट का रोग मने इनडाइजेशन सब समय उन को लगा रहता था श्रीमान नबत आशिया ठाकुरे इच्छा मतो शकता झोल प्रवृति रात दतन मां जब से नबत में आई तो ठाकुर की रुचि के अनुसार झोल अर्थात की वेजिटेबल सूप और शुक्तो बोलक के वो एक बंगोली आइटम है एक तरह का खास तरह से बनाने की व जो कि सुपाच्य है यह सब ठाकुर के लिए बना देती थी मा शेर म जे तीन दिन उहा पारी ते ना श कोई दिन ठाकुरे जन्नो काली मंदिर ईते प्रसाद आश तो और महीने में जो तीन दिन वह पका नहीं सकती थी ठाकुर के लिए आहार नहीं बना सकती थी उन तीन दिन काली मंदिर से ठाकुर के लिए आहार भोजन आता था प्रसाद आता था ताहा खाले ठाकुरे अशोक बाड़ी तो और जब काली मंदिर से प्रसाद आता तो ठाकुर जब खाते तो उनका जो पेट का जो रोग है और भी बढ़ जाता क्यों क्योंकि काली मंदिर में जो प्रसाद बनता था भोग जो बनता था मां काली का उसमें बहुत ज्यादा तेल और मसाला दिया जाता था जबकि ठाकुर तेल मसाला वगैरह बड़ा ही कम खाते थे तो अभी तीन दिन खाएंगे इस तरह का खाना तो नेचरली है कि पेट तो बिगड़ेगा ही बिगड़ेगा ताई एक दिन तीनी श्री मां के बोली लेन इसीलिए ठाकुर ने एक दिन मां को कहा देखो तुम य तीन दिन रन्ना ना कोराते अर अशुभ ता बेड़े छ देखो तुम ये जो तीन दिन खाना नहीं बनाती इससे मेरे पेट का रोग बढ़ गया है तुम व को दिन केनो रा लेना तुमने वह इतने दिन जो है खाना क्यों नहीं बनाया श्री मां बोली लेन मां ने कहा मे देर असु चर तीन दिन तारा काव के रधे दते पारे ना मां ने कहा कि स्त्रियों की अशु चि का जो तीन दिन है अशो का वह किसी को खाना नहीं बना सकती ठाकुर बोली लेन के बोलले पारे ना ठाकुर ने कहा किसने कहा नहीं बना सकते तुम आमा के देवे ताते दोष हवे ना तुम मेरे लिए खाना बनाओ इससे तुमको कोई दोष नहीं होगा बोलो तो असच तुम्हार शरीर है कौन जिनीषा कहो तो यह असच है तुम्हारे शरीर का कौन सा भाग है कौन सा अंग है चामरा ना मांसो ना हाड़ ना मज्जा यह स्किन है ना कि ये हड्डियां है ना कि ये मसल्स वगैरह है ना कि यह जो स्पाइनल कोर्ड है यह सब है तुम्हारे शरीर का कौन सा भाग है देखो मनही सूची असच देखो मन में ही है यह सूची और असच बायरे असू च बले किछु नहीं बाहर में असच बोल कर के कुछ भी नहीं है इ हार पोर ईते श्रीमा प्रत्य हो राना करिया दतन इसके बाद में से श्री मां प्रतिदिन ठाकुर के लिए खाना बनाती थी ठाकुर से राना खाया तृप्त हृदय एक दिन बोलिया लेन ठाकुर ये खाना खाके तृप्त हृदय से मन भर के एक दिन कहे थे देखो तो तुम्हार राना खे हमार शरीर केवन भालो आछ देखो तो तुम्हारा खाना खा कर के तुम्हारा पकाया हुआ खाना खा कर के मेरा शरीर कितना स्वस्थ है देखिए यह जो सूची असच यह एक हद तक तो हमको पालन करना पड़ेगा क्योंकि यह जो सैनिटाइजेशन जो है यह तो एक बात है किंतु साथ-साथ में ही कभी-कभी क्या होता है कि खास करके कुछ कुछ ब्राह्मण परिवारों में यह जो ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर जिसको कहते हैं ओसीडी ये इसका स्वरूप धारण कर लेता है यह क्लिनिकल टर्म है जिसका स्टडी साइकोलॉजिस्ट या तो साइकेट्रिस्ट किया करते हैं जिसको कि ये ओसीडी लग गया है वे लोग क्या करेंगे कोई भी एक काम रिपीटेडली किया करेंगे और उनको कभी भी इस बात से संह यह नहीं होगा कि तृप्ति नहीं होगी यह करते-करते जैसे कि एक स्त्री का उन्होंने उदाहरण देखा यह क्लिनिकल साइकोलॉजी में आता है कि उसको हाथ धोने का एक हैबिट हो गया था उसके मन में यह घर घर गया था कि उसके हाथ सब समय ग गंदे रहते हैं तो इतना हाथ धोएगी इतना हाथ धोएगी कि फिर उसके हस्बैंड को कहना पड़ा कि अरे यह क्या कर रही हो फिर उसको डॉक्टर को दिखाना पड़ा इस तरह का उसके मन में घर कर गया था तो यह क्या है कि कभी-कभी यह मानसिक बीमारी के रूप में लग जाता है कि सूची असू च यह खास करके यह जो जयराम बाटी में जो नलिनी है माकू है और फिर वहां पे एक मैं एक ब्राह्मणी को रखा था खाना बनाने के लिए इन सबको यह जिसको बांगला में कहते हैं शची वाई अर्थात कि ये शची वाई इसका करेंगे सूची अस सूची का रोग यह बड़ा उनको लगा रहता था यह कभी एक बार यह अपना राममय महाराज गौरेश्वर आनंद जी वह कहीं बागान में काम कर रहे हैं वापस आकर के वैसे ही वहां पे खाने के लिए बैठे मां का जो रामदा है उसमें तो वह नलिनी दीदी ने कहा अरे ये इतना बागान में काम करके आए हाथ पैर नहीं धोए जाओ हाथ पैर धो कर के आओ तुमको इतना गंदा हाथ लेकर के खाना खाने में कैसे आनंद आता है वगैरह वगैरह ऐसा डांटना शुरू कर दिया तो मां को बोलना पड़ा उसको नलिनी दीदी को मां को डांटना पड़ा एक बार यही एक वो जो ब्राह्मणी जो है जो कि वहां पे खाना बनाती थी वो कहीं बाहर से आई और उसने कहा मेरा एक विष्ठा के ऊपर में मेरा पैर पड़ गया है अभी मुझे गंगा स्नान करना पड़ेगा तो मां ने कहा अभी इतनी रात को गंगा स्नान करोगी बीमार हो जाओगी अपने शरीर पे थोड़ा सा गंगा जल के कुछ छींटे डाल दो तो उसी से तुम पवित्र हो जाओगी गंगा गंगा स्नान अर्थात जयराम बाटी में व अमोदर नदी है या तो फिर यह ताल व जो पुण्य पुकुर है उसमें स्नान करने से ही गंगा स्नान हो जाएगा तो मां ने कहा कि अपने सर पर थोड़ा सा गंगाजल छिटक दो उसी से हो जाएगा कोई इतनी देरी स्नान करने की जरूरत नहीं है तो भी वोह ब्राह्मणी कहती है कि नहीं नहीं स्नान तो करना ही पड़ेगा वरना तो मैं खाना कैसे पकाऊ गी तब आखिर में मां ने कहा अच्छा ठीक है मुझे स्पर्श कर दो इसी से तुम शुद्ध हो जाओगी तब कहीं जाके ब्राह्मणी में अकल आई कि अच्छा वो किसके साथ में बात करती है महामाया स्वयं जद ऐसा कहेगी कि मुझे स्पर्श कर दो तुम्हारी असू च जो है वो धुल जाएगी या तो वह स्वच्छ हो जाएगी तब उसके भीतर में अकल आई कि ना यह तो एक प्रकार का मानसिक रोग उसके सर में बैठा हुआ है कि सब समय जितना जी विष्ठा को स्पर्श किया तो पूरा स्नान करना पड़ेगा पैर धोने से हो जाएंगे वैसे हाथ पैर धोने से हो जाएगा आपको पूरा स्नान करना ऐसा तो कोई जरूरी नहीं है सब समय तो यह मां जो उस दिन कही कि हां तुम मुझे स्पर्श कर दो तुम भी शुद्ध हो जाओगी इसके पीछे में देखिए कि मां का भी तो था कुछ ना कुछ तो मां भी फॉलो करती थी जो ट्रेडिशनल रूप से किया जाना चाहिए किंतु हमने देखा है कि ठाकुर और मां के जीवन में किस तरह से यह ट्रेडिशनल मॉडर्निटी ये जो अर्वाचीन और आधुनिक य प्राचीन और अर्वाचीन इन दोनों का संगम भी कैसे है कंफ्लेक्स है वो कहां पे मिल भी जाता है कहां पे विरोधाभास भी दिखता है तो यह एक ऐसा हो गया विरोधाभास जैसा आपात तः शची या असु च मन की ही बातें हैं हां शारीरिक असू च होती ही है शौच जाने के बाद में हम अपने हाथ धोएंगे ही धोएंगे किंतु स्नान कर लेना पूरा या यह सब जो है वो क्या है कि कंडीशन के ऊपर में आधार रखता है यदि एक्चुअल कुछ लगा है तो आप स्नान करेंगे दैट इज समथिंग एल्स अदर वाइज शास्त्र में में विधान है बोल कर के मुझे करना है यह बात का तो कोई तात्पर्य नहीं है तो यहां पर ठाकुर ने जैसे ही कहा कि सूची या असच तुम्हारे शरीर का कौन सा अंग है वो तो बता के देखो वोह तो सब मन में ही मन में है तब मां ने ठाकुर की बात को स्वीकार कर लिया इसके बाद में अभी एक बड़ा ही सुंदर विवरण शुरू होता है देखिए यह जो हमने कहा कि प्राचीन और अर्वाचीन इन दोनों के बीच में कभी-कभी विरोधाभास दिखता है कभी-कभी संगम दिखता है इनके जीवन में तो साथ-साथ में ही यह जो आदर्श है आदर्श में भी आप देखिए कि ठाकुर और मां आदर्श का अर्थ घटन किस तरह से करते हैं हमको लगेगा कि कुछ-कुछ आदर्श है वह तो हमेशा के लिए सत्य है सब परिस्थिति में सत्य है जैसे कि ठाकुर ने कहा कि दो आदर्श अपने हैं सत्य और ब्रह्मचर्य इन दोनों का पालन हर किसी सिचुएशन में हर किसी कांटेक्ट में होना ही चाहिए यदि आप आध्यात्म मार्ग के पथिक है आप उस उच्च आदर्श तक शायद ना पहुंच पाए हो या तो फिर पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हो किंतु आदर्श से कभी नहीं होना है कभी यह नहीं कहना है कि अरे यह तो आदर्श है ही नहीं और कुछ मैं कर सकता हूं इस आदर्श को छोड़ करके ऐसा कभी नहीं करना है गुजराती में कहावत है कि निशान चुक माफ नहीं माफ नीचू निशान अर्थात कि यदि टारगेट आप अपनी वो जो तीरंदाजी करते हैं ना वो टारगेट के ऊपर में तीर मारते हैं तो आप यदि तीर मारना छोड़ दे या तो फिर आप आपने जो तीर मारा है वो मिस हो जाए वो चलेगा किंतु टारगेट अपना इतना पास में ना लेके आइए कि वो तीर मारना बड़ा ही सहज हो जाए अपना जो निशान है उसको इतना नीचा मत कर दीजिए आदर्श को इतना नीचा मत कर दीजिए आदर्श मिस होगा किंतु आदर्श को नीच मत कर दीजिए तो अ ये हमने ठाकुर के मुंह से सुना है और फिर ठाकुर यह भी कहते हैं कि मैंने मां को सब दे दिया सत्य नहीं दे पाया तो ठाकुर की दृष्टि से सत्य रक्षा कितनी इंपॉर्टेंट बात है यदि ठाकुर कहेंगे एक बार ठाकुर कहते हैं कि किसी डिवटी के वहां पे मैं चला गया फिर पहले ही मैंने कह दिया था कि मैं लची नहीं खाऊंगा अर्थात कि पूरी नहीं खाऊंगा अभी जब खाने के लिए बैठा तो भूख लग गया किंतु मुंह से तो निकल गया है कि पूरी नहीं खाऊंगा तो अभी क्या करूं तो फिर मिठाई खाकर के मैंने पेट भर लिया तो सब बाकी डिवटी हंसने लगे कि इस तरह का सत्य पालन तो हम भी करें मिठाई खा कर के पेट भरना यह तो अच्छी बात है किंतु ये एक मतलब हास्य रस की बात है किंतु एब्सलूट सत्य का जो पालन है ठाकुर के जीवन में हमको वो दिखता है उने वो ठाकुर ने एक बार राजा महाराज को कहा था कि क्या रे तुमने ऐसा तो कौन सा पाप कर दिया कि मैं तुम्हारे चेहरे के सामने नहीं देख पाता तो राजा महाराज बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए मैंने तो ऐसा कोई पाप नहीं किया इतना कोई बड़ा अन्याय नहीं किया क्यों आप ऐसा बोल रहे हैं फिर ठाकुर ने कहा नहीं नहीं तुम थोड़ा सोच कर के देखो कि तुमने क्या किया है तब राजा महाराज ने पता है ठाकुर की प्रकृति कैसी है तो फिर उनके मन में आया कि हां याद आया कि मैंने हंसी मजाक में झूठ बोल दिया था एक दो दिन पहले तो ठाकुर ने कहा कि हां इसीलिए मैं तुम्हारा चेहरा नहीं देख पा रहा हूं इसीलिए तुम्हारे चेहरे के ऊपर में जैसे कि एक काला आवरण पड़ा है तो राजा महाराज कहते हैं कि उतने दिन तब तक तो हम यही सोचते थे कि कोई बड़ा पाप करना यानी चोरी डके करना किसी का कत्ल करना या किसी पर अत्याचार करना इसको हम पाप समझते थे अभी हंसी मजाक में झूठ बोल दिया यह भी एक बड़ा पाप है वो हमको उसी दिन पता चला ठाकुर की बात सुन कर के तो यह देखिए और ठाकुर कहते हैं हंसी मजाक में भी कभी असत्य मत बोला करो तो यहां तक ठाकुर की सत्य के ऊपर में निष्ठा थी किंतु देखिए हमने डिस्कस किया था ना कि ठाकुर मां स्वामी जी दे एमप्लीफाई थ्री डिफरेंट एस्पेक्ट्स ऑफ ह्यूमन लाइफ मनुष्य के जो तीन विभिन्न आयाम है मनुष्य जीवन के तीन विभिन्न आयाम है इन तीनों विभिन्न आयामों को आदर्श रूप में ठाकुर म स्वामी जी आए हैं ठाकुर एमप्लीफाइज द पर्सनल स्पिरिचुअल क्वेस्ट हमारा जो व्यक्तिगत आध्यात्मिक जो मुमुक्षु है उसको एमप्लीफाई करते हैं उसके आदर्श स्वरूप है ठाकुर यह जो स्टडी ऑफ सिविलाइजेशन है है राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन उस सिविलाइजेशन को कैसे पुष्टिकर मतलब उसको सशक्त बनाया जाए तो उसके आदर्श स्वरूप या तो उसका स्टडी किया है स्वामी जी ने और यह जो फैमिली लाइफ है व्हाट इज द आइडियल फैमिली लाइफ विद्या का संसार क्या है तो वह आदर्श दिखाया है माने अब यह जो आदर्श होते हैं वैल्यूज जिसको कहते हैं वो वैल्यूज तीनों एस्पेक्ट में किस तरह से ये होती है मतलब अप्लाई होती है सत्य को यदि आप अपने व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन के साथ में देखा जाए देखें अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक जीवन की दृष्टि से देखें फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ अवर पर्सनल स्पिरिचुअल क्वेस्ट तब यह सत्य पालन जो है वो एब्सलूट हो जाता है ईश्वर के साथ में किसी भी तरह की धोखा दारी नहीं चलेगी ईश्वर के साथ में कभी भी असत्य वचन नहीं कहना है मन मुख एक करना है जो अपने मन में है उसी का आचरण करना है वरना बाहर से बड़ा धार्मिक दिखावा करेंगे भीतर में पूरा यह जो सब जितना कचरा है भीतर में पड़ा हुआ है ठाकुर ने कहा ना कि कोई कोई पंडित होते हैं वह बाज पक्षी की तरह समी की तरह आकाश में तो बड़ा ऊंचा उड़ेंगे किंतु नजर हमेशा रहती है कुड़े दन के ऊपर में कहां वह मांस का टुकड़ा पड़ा है कहां वो आ कर के उसको छीन करके वह खाना शुरू करें तो वैसे ही मन मुख एक करना संपूर्ण सत्य वचन का पालन करना ये आध्यात्मिक जीवन में एब्सलूट नेसेसरी है किंतु गृहस्थ जीवन में सत्य का किस तरह से पालन करेंगे वो थोड़ा सा इंप्लीमेंटेशन है एप्लीकेशन है थोड़ा सा डिफरेंट हो जाता है तो यह किस तरह से यह डिफरेंट होता है यह अभी गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं श्री मायर सेब आरटी विवरण भक्तगण तहरे निकट श्या लेन मां जिस तरह से ठाकुर की सेवा करती थी इसका एक विवरण भक्तों ने मां के पास में ही सुना है एक बार श्री श्र ठाकुरे अखेर समय कुमार टोली गंगा प्रसाद सेन के देखानो होलो एक बार ठाकुर बीमार हो गए थे तो कुमार टली बोलकर के कलकाता में एक जगह है वहां पर गंगा प्रसाद सेन बोलकर के एक वैद्य है उनको कंसल्ट किया गया कविराज जल बंध करिया औषध शेवनेला कविराज ने क्या किया जल बंद कर दिया कहा कि पानी नहीं पीना है और औषध यह औषध या तो फिर यह दवाई लेनी है ऐसा उनको कह दिया शिशु प्रकृति ठाकुर अमनी शकल के जिज्ञासा कोरीते लागी लेन अी ठाकुर थे शिशु प्रकृति बालक स्वभाव तो बालक स्वभाव जैसे बच्चा वो कभी कुछ प्रश्न हो जाता है तो सबको पूछता है अच्छा मैं ये करूं कि ना करूं क्या करूं ऐसा करके ठाकुर एक उदाहरण देते हैं ठाकुर के उदाहरण भी ना बड़े कलरफुल होते हैं छोटा बच्चा जिसको कि लाज शर्म नहीं है जिसको कि यह पता नहीं है कि संसार में किस तरह से वो भद्र किस तरह से दिखानी है वो मतलब मतलब वो किस तरह से दिखावा करना है वो एक जेंटलमैन ली नेस का तो ऐसा छोटा बच्चा क्या करता है शौच जाएगा फिर वह सबको दिखाएगा वो उल्टा घूम कर के कि अच्छा देखो तो मैंने वो ठीक ठीक साफ किया है कि नहीं देख कर के बताओ तो ये बच्चे का स्वभाव होता है नहीं लज्जा होती है नहीं शर्म होती है नहीं वो झूठ बोलने की प्रकृति होती है तो ठाकुर का भी ऐसा था वो ठाकुर भी सबको बच्चे की तरफ पूछते हैं कि हैगा लला खे पर्बो कि अरे भाई मैं बिना पानी पिए रह पाऊंगा श्री मां के वो जिज्ञासा कोरी ले मां को भी पूछा कि बिना पानी पिए रह पाऊंगा तीनी बोली लेन पार बे बई की तो मां ने उत्तर दिया कि हां क्यों नहीं रह पाएंगे ठाकुर सावधान कोरिया दि लेन ठाकुर ने सामने सतर्क कर दिया मां को सावधान कर दिया बेदाना पजन तो झोल पूछे दते होवे देखो जदी तोमरा पारो यह जो ये ये है बेदाना बेदाना को क्या कहते है अभी हिंदी नाम भूल गया वो जो उसका जो दाना होता है ना लाल लाल कलर का रेड कलर का उसको भी आपको वो कपड़े से पहुच करके देना होगा क्योंकि उसके ऊपर में भी छोटा सा पानी का बिंदु भी लगा होगा तो वह नहीं खा पाएंगे एक तरह का फल है वह श्री मां आश्वास दले माने आश्वासन देके कहा ता मां काली जमन कोबेन जथा साधो तार इच्छा हवे मां काली जैसा करवाएगी वैसा मां काली की इच्छा से होगा शेष मन स्थिर कोरिया जल पान छड़िया दिया तीनी औषध खाई ते आरंभ करी लेन आखिर में मन को स्थिर करके पानी पीना छोड़ कर के ठाकुर ने औषध खाना प्रारंभ किया श्री मा ताहा के रोज तीन चारी शेर श से पांच छ शेर पर जंतो दूध दतन मां प्रतिदिन ठाकुर को तीन चार शेर और आखिर में पांच छह शेर पर्यंत इतना हो सके इतना दूध पिलाती गाई दवाई बार जे लोटी दूध दी तो श्री के बेसी बेसी दूध दिया जाए तो जो गोवा जो गाय को धो कर के जो दूध देने के लिए आता था वो मां को ज्यादा ज्यादा करके दूध दे जाता था बोली तो खाने दिले काली भोग बेटा रा बाड़ी नहीं जाब काके ना काके खावा आवे और कहता यह जो दूध देने वाला आता था क मैं काली मंदिर की जो ऑफिस है वहां पर जदी में अनार यस तो यस अनार तो अनार के जो दाने होते हैं ना वो लाल लाल कलर के उसको भी साफ करके वस्त्र से उसमें भी थोड़ा सा भी जल ना रहे इस तरह से वो ठाकुर को खिलाना था तो ये दूध देने के लिए जो आता था वह मां को कहता था कि मैं जद काली मंदिर की ऑफिस में दूंगा ये इतना ज्यादा दूध तो यह जो वहां के जो पुजारी वगैरह लोग जो है जो एडमिनिस्ट्रेटर वगैरह जो वहां पर कार्य करते हैं कारकून वगैरह यह दूध घर में ले जाएंगे और पता नहीं किसको किसको खिला देंगे ए आर ए खाने दिले उन्नी खावे और मैं यदि आपको दूंगा तो ठाकुर खाएंगे ताई से पांच छ शेर पजन तो दिया जाए तो इसीलिए वह पांच छ शेर तक दूध दे जाता श्रीमा संदेश रसगुल्ला इत्यादि जहा था की तो ई व्यक्ति के दते मां के पास में संदेश रसगुल्ला वगैरा जो भी रहता था वह दूध देने के लिए जो आता था उनको मां देती तखन ई सकोल जिनी जथ आश तो ताई अभाव लोना उस समय ये मिठाई वगैरह पर्याप्त मात्रा में वो वहां पे आता था मां के पास में इसलिए उन सबका अभाव नहीं था तिनी दूध ज्वाल दिया घनो करिया एक शेर डेढ़ शेर कोरिया ठाकुर के दतन और फिर मां क्या करती दूध को उबाल की तो दूध को उबालने से क्या होता है पानी जो जितना भी है व जल जाता है गाढ़ा दूध रह जाता है इससे क्या होता है कि उसका परिमाण दिखने में तो कम लगता है किंतु पौष्टिक वैल्यू जो है वो उसकी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तो जैसे खीर बनाते हैं खीर पूरा बर्तन भर कर के आपने दूध को जलाना शुरू किया आखिर में देखेंगे कि आधा बर्तन हो गया है या उससे भी कम हो गया है पानी जितना भी है सब बापी वाष्पीकरण हो गया है और घना दूध पड़ा है वहां पे तपेली में तो मां भी इस तरह से दूध को उबाल उबाल करके घना करके ठाकुर को देती क्यों ठाकुर को डर था कि ज्यादा खा लूंगा तो फिर मैं पेट में दर्द हो जाएगा अज ये फ इनडाइजेशन हो जाएगा वगैरह वगैरह तो ठाकुर को भी एक तरह का ओसीडी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर जैसा था ये देख कर के ही डर जाते थे ज्यादा भात का प्रमाण देख कर के ही डर जाते थे अभी महाराज जी सब लिखेंगे कि खाना खाने में ठाकुर को कितना डर लगता था तो उनके डर की वजह से मां क्या करेगी दिखाना है कि कम दूध खिला रहे हैं ठाकुर को तो ज्यादा दूध लेकर के उबाल करके घना करके दिखेगा कम है वो घना दूध ठाकुर को खिलाती जखन जिज्ञासा करी तेन कतो दूध तखन तीनी घनो दूध री कथा मने करिया बोली तेन कतो आर एक शेर पाच पो होवे और ठाकुर जब पूछते ठाकुर भी बड़े अलर्ट रहते थे कि ज्यादा मैं कहीं ना खा लूं तो मां को पूछते थे कितना दूध है इसमें तो मां भी वो जो घना दूध है उसका प्रमाण कहती ठाकुर को नहीं कि एक्चुअल प्रमाण एक्चुअल बर्तन भर के हैं उबाल करके आधा बर्तन कर दिया है तो फिर वही कहती कि आधा बर्तन ही है आधी कटोरी ही है इससे ज्यादा मैंने कहां दी आपको तो वोह उबला हुआ घने दूध का प्रमाण ठाकुर को मां कहती तो मां कहती कतो आर कितना होगा एक शेर पांच पो होवे एक शेर और पांच पो होगा ठाकुर संदे हो दूरी भूत ना होई तीनी बोली तेन ठाकुर बड़े ही संदेह वान बड़े ही अलर्ट रहते थे कि हां मां ऐसा कुछ ना कुछ तो करेगी कुछ ना कुछ गड़बड़ करेगी करेगी तो वो फिर से बड़े ही वो अलर्ट होकर के सावधान होकर के पूछते ना े पुरुष और देखा जा अभी क्या होगा कि दूध को उबाल देंगे तो उसके ऊपर में जो मलाई का एक जो पूरा स्तर है वह बैठ जाएगा और एकदम घना स्तर वो मलाई का रहेगा तो ठाकुर भी अभी इतने तो मूर्ख नहीं है बालक स्वभाव है किंतु बालक के भीतर में भी तो थोड़ी तो बुद्धि होती है तो मां को कहते हैं कि ना इतना तो कम ये ज्यादा दूध लग रहा है देखो इसके ऊपर में मलाई इतना गाढ़ा मलाई जमा हुआ है कैसे तुम कहती हो इतना कम दूध है तो मां क्या करेगी श्री मां तथापि नाना भाव बुझाया ओई खो दूध सटाई तहा के खवाई तेन किंतु मां कैसे भी करके समझा बुझा करके छोटा बच्चा जब वह खाने में यह सब नाटक करता है तो मां कैसे कभी-कभी समझाए गी कभी-कभी धमक भी देगी तो मां तो ठाकुर को धमक नहीं देती थी किंतु ऐसे ही समझा बुझा करके जो घना दूध था पूरा ठाकुर को खिला देती थी एक दिन आहार समय गोलाप मा उपस्थित छले ठाकुर तहा के जिज्ञासा कररी लेन हागा कतो दूध हो एक बार आहार के समय गोलाप मा वहां पर उपस्थित थी ठाकुर ने उनको पूछा कि अरे यह दूध कितना होगा तो गोलाप मा व्यापार भलो कोरिया ना बुझीते पारिया पात दूधे परिमाण बोलती लेन गोलाप मा को पता नहीं है कि मां का अभी यह सब चालाकी चल रहा है पर्दे के पीछे में ज्यादा दूध को उबाल करके घना करके कम दिखा करके ठाकुर को खिला रही है तो उन्होंने भोल पन में बड़े ही आसान तरीके से कह दिया उनको पता था कि इतना ज्यादा दूध उबाला गया है तो बिना उबला हुआ जो सही प्रमाण था दूध का वह ठाकुर को बता दिया अमनी ठाकुर चमकाया उठिया बोली लन वैसे ही ठाकुर बड़े ही चमत्कृत हो गए चमक हो गए बोल उठे ए य तो दूध अरे इतना दूध ताई तो हमार पेटे र शुख होए इसीलिए तो मुझे पेट का असु होता है पेट का रोग होता है डाको डाको बुलाओ बुलाओ आह्वान सुनिया श्री मां आशीते ठाकुर प्रश्न कोरी लेन कतो दूध अभी मां को ड मां को बुलाया गया मां आई ठाकुर ने पूछा कि कितना दूध है मां पुर्बे री नय उत्तर दिले पांच हो होबे आर की मां ने पहले ही तरह शांति से कहा यह पांच शेर के आसपास होगा और क्या ठाकुर तब जिज्ञासा कोरील तबे ज गुलाब बोले तो ठाकुर ने पूछा सामने कि गुलाब मा जो है वोह कहती कि इतना सारा है मां निर्विकार चित्त उत्तर दिले माने बड़े ही ठंडे हृदय से उत्तर दिया देखिए वो ठंडे चित्त से निर्विकार चित्त बिना किसी क्षोभ के बिना किसी डिस्टरबेंस के शांति से उत्तर दिया गुलाब जाने ना गुलाब को पता नहीं है खानेर माप गुलाब जाने यहां का क्या मेजरमेंट है गुलाब को पता है क्या घटते कतो दूध धरे गुलाब जानवे की कोरे इस बाटी में या इस पात्र में कितना दूध आएगा गुलाब को कैसे पता होगा श दिन पर्व एखानी शेष होलो वहां प यह बात यहीं पर समाप्त हुई किंतु ठाकुर आर एक दिन गोलाप मा के दूधेर परि माण जिज्ञासा कोरी लाइन किंतु ठाकुर के मन का संदेह पूरा निरस्त नहीं हुआ है देखिए पता है कि मां कुछ ना कुछ गड़बड़ कर ही रही है तो और एक बार उन्होंने गुलाप मां को पूछा एवं गुलाप माओ बलिया फिलेन गुलाप मा ने भी बोल दिया खानेर एक बाटी और काली घरेर एक बाटी अर्थात कि वो नबत में एक बाटी जो है उसका प्रमाण काली बाटी की जो एक बाटी है वहां काली मंदिर का वो जो किचन जो होगा वहां पर जो एक बाटी का जो प्रमाण होगा वो इतना ही है ठाकुर बोली ले ये तो दूध ठाकुर सुनक के बोल उठे अरे इतना दूध डाको डाको जिज्ञासा करो बुलाओ बुलाओ पूछो पूछो तो मां को बुलाया गया श्री मा आशीते ठाकुर बोली लेन मां जैसे ही आई ठाकुर ने पूछा बा बाटी ते कतो धरे को छोटा क पो वो बाटी जो है उसमें कितना दूध आएगा कितना छटा कितना पो यह सब मेजरमेंट की यूनिट है श्री मा उत्तर दले मां ने उत्तर दिया को छोटा क पो अतो जानी ने कितना छटा कितना पो है यह सब मुझे पता नहीं है दूध खावे त को छोटा के गोटी को पो तो केनो दूध खाना है उसमें उसम कितना आता है कितना छटाक आता है कितना पो आता है इतना चिंता करने की क्या जरूरत है अतो हिसाब के जाने इतना हिसाब किसको पता है देखिए मां को सब पता है किंतु फिर भी क्या कह रही है ठाकुर अनुज कोरील ठाकुर ने बड़ा ही वह कंप्लेन के स्वर में कहा य तो की हजम होए ताई तो पेटे र सुखे इतना क्या डाइजेस्ट होगा पेट में शुख हो जाएगा रोग हो जाएगा वास्तविक से दिन पेटे असु करी लो और सही सही उस दिन ठाकुर को पेट का रोग हो गया श्री मां जिज्ञास कोरलेन मां ने पूछा की रकम दासतो होचे किस तरह से यह शौच हो रहा है ठाकुर ने ठाकुर बोली लेन पालो पालो सादा सादा एक टू एक टू पन बार बाजे गेलो ठाकुर ने कहा वह सफेद सफेद एकदम पतला 15 बार मुझे सोच के लिए जाना पड़ा तो मादर एमन सेवा चाहिना तुम लोगों की इस तरह की सेवा मुझे नहीं चाहिए श दिन आर बिका ले किछु खाई लेना उस दिन ठाकुर ने शाम को और कुछ खाया नहीं भात इत्यादि पड़िया रलो मैं जितना भात वगैरा जो कुछ भी बनाया था वैसे ही पड़ा रहा श्री मां एकट सागू करिया दलन मां ने थोड़ा सा साबूदाना ठाकुर के लिए बना दिया सत्य प्रतिष्ठित ठाकुरर शरीर ऊपर मनर क्रिया अनुत पता गोलाप मा श्री मां के बोली लेन सत्य में प्रतिष्ठित ठाकुर के शरीर पर जो मन की जो बात है वो शरीर पर किस तरह से असर करती है वह देख कर के गोलाप माने अनुत पत बड़े ही दुखी होकर के मां को कहा कि मां बोले दते होए आमी की जानी ताई तो खावा नष्ट होलो मां आपको मुझे बता देना चाहिए था कि ठाकुर को आप झूठ मुठ काओ झूठ बोल कर के ज्यादा ज्यादा दूध पिलाते हैं मुझे क्या पता था देखिए ठाकुर का खाना नष्ट हुआ श्री मां तहा के बुझाई लेन मां ने उनको समझा के कहा खबार जन्नो मिथ्या बोलने दोष नहीं खाने के लिए यदि झूठ बोलना पड़े खिलाने के लिए तो उसमें किसी भी तरह का दोष नहीं है खिलाने के लिए मिथ्या वचन कहना पड़े उसमें दोष नहीं है आमी ही रकम करे भूलिए टुल खवाई इसी तरह में उनको भुला करके खिलाती हूं श्री मां मन भुला कथा गुली तार ऊपर दृष्टि ना राखिया श बार ऊपर दृष्टि राखिया छिले माने इस समय जब बात कर रही थी तो ठाकुर को भुला कर के खिला रही है वह बात नहीं ठाकुर की सेवा हो रही है इसी बात को ध्यान में रख कर के यह बात कही थी तीनी लखो कोरीते लेन जे ताहर एकांतिक जोतने ठाकुर सारिया उठते छन शरीर रिष्ट पुष्ट ईते छन मां ने देखा था कि वो जब ये उतनी उनकी ठाकुर की इतनी केयर करती है ज्यादा ज्यादा दूध पिलाती है झूठ बोल कर के तब ठाकुर की ही स्वास्थ्य उन्नति होती है ठाकुर का ही हेल्थ इंप्रूव होता है तो इसलिए उन्होंने कहा कि यदि दूसरों की सेवा के लिए दूसरों के भले के लिए उनको खिलाने के लिए यदि हम असत्य वचन कहते हैं तो उसमें कुछ भी दोष नहीं है देखिए इसके बारे में बहुत सारा कुछ चिंतन करना होगा बहुत सारा डिस्कशन करना होगा तो अभी तो समय समाप्त हो गया है मां के ऊपर में जब नेक्स्ट क्लास होगा तब यह डिस्कशन हम इसको आगे बढ़ाएंगे आज की ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु और सुनक के हम इसके ऊपर में जितना चिंतन करते हैं उतना अपना ही अंडर टेंडिंग गहरा होता है कि आध्यात्मिक जीवन तो सहज सरल नहीं है वह किताब में जो पढ़ लिया और हम जो जी रहे हैं उसमें कितना अंतर है तो हमको किस तरह से यह सब सत्य यह जो आदर्श है उसका पालन जीवन में कैसे करना है वह सब सीख मिलती है ठाकुर की दृष्टि से नहीं ठाकुर नाराज हो गए थे किंतु यह याद रखिएगा किंतु देखिए यह सब चीजें किस क्षेत्र में किस तरह से अप्लाई होती है जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि यह जो ध्रुव है या लाद है कि विभीषण है उन्होंने अपने पिताजी है या बड़े भाई है इनकी बात नहीं सुनी जब वह आध्यात्मिक मार्ग में वोह लोग बाधा खड़ी कर रहे थे तो अभी यह अनसेल्फिशनेस फिर स्पिरिचुअल रियम में जब चला जाएगा इंडिविजुअल क्वेस्ट फॉर स्पिरिचुअलिटी तो फिर वो थोड़ा सा चेंज हो जाता है कि अपनी स्पिरिचुअलिटी में यदि कोई बाधा डालेगा तो फिर वह स्वीकार नहीं करना है दैट मींस एवरी वैल्यू देर इज नो सच थिंग एज एब्सलूट वैल्यू आप किस परिप्रेक्ष्य में उसको कहते हैं ट मैटर्स दैट इज द बिगेस्ट लर्निंग फ्रॉम दिस नहीं किंतु देखिए कॉन्टेक्स्ट देखना है ऑफिस में जद झूठ बोलेंगे या और कहीं पर झूठ बोलेंगे अपने स्वार्थ के लिए जैसा अभी यह मानव भाई ने कहा कि अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलना भी तो बिल्कुल ठीक नहीं है माने जो असत्य वचन सहारा लिया व सेल्फलेस रीजन के लिए था माने वह निस्वार्थ भाव के लिए था तो अभी देखिए यह कॉन्टेक्स्ट हम कभी सोचेंगे कि मैं निस्वार्थ हूं कभी किंतु पीछे में कौन सा स्वार्थ पड़ा हुआ है किसको पता यानी यह सब आदर्श को ना बड़ा ही गहराई पूर्वक चिंतन करना चाहिए आदर्श का पालन कभी भी सहज नहीं होता है जीवन में तो और होना भी नहीं चाहिए यदि हमको चिंतन करने को मजबूर ना करें तो फिर ऐसा हो जाएगा कि आंख बंद करके आदर्श का पालन करने हम समझ रहे हैं आदर्श का पालन कर रहे हैं किंतु किसी दिन गड्ढे में गिरेंगे सो यह चिंतन हमेशा चलना चाहिए मैं आदर्श का पालन किस हद में कहां तक कैसी परिस्थिति में कर रहा हूं ये जो आजकल पता है ना लोग पैसा देकर के वाईफाई फ्री जोन में रिट्रीट के लिए जाते हैं मैंने आपने जैसे कहा कि वो तो ठीक ही है फर्स्ट स्टेप के रूप में कि साधन शुद्धि चित्त शुद्धि है साधन शुद्धि है साधन को शुद्ध अर्थात कि मोबाइल प यदि और कुछ देख रहे हैं तो चलो सर्व प्रियानंदनसेक्स ऑर्डर के भी दूसरे लोग हैं तो व मैं भी काफी कुछ यह सब फॉलो करता रहता हूं किंतु जो इसके बाद का जो स्टेज है उसके तक नहीं पहुंचेंगे तो फिर हम यह जैसे किय बाल मंदिर में ही रह जाएंगे किंडरगार्डन में ही रह जाएंगे आध्यात्मिकता के तो फिर अपने को देखना है कि क्या हमको ग्रेजुएशन पोस्ट ग्रेजुएशन करना है ना कि परपे चुली वह बालक आध्यात्मिक बालक के रूप में ही रहना है दैट इज अपॉन अस और बहुत ऐसा होता है ना कि प्रेशर ही इतना है कि चाहकर भी नहीं कर पाता हूं तो यह भी एक तो परिस्थिति है क्या करेंगे आज का जो समय जैसा चल रहा है जो दायित्व है सबके सर पर और यहां पे भी इवन अभी सुहितानंद जी आ रहे हैं दीक्षा होने वाली है तो कल मीटिंग था बड़े महाराज ने मुझे बताया कि क्या करना होगा मुझे तो ये मैं अभी से टेंशन में आ गया हूं अरे राजकोट में था मैं पब्लिकेशन के अलावा और कभी कुछ भी मतलब राजकोट क्या पूरा लाइफ मैंने जो मोनेस्ट्री लाइफ है रांची जब से छोड़ा है तब से मैं पब्लिकेशन में हूं तो एक पब्लिकेशन की एक छोटी सी वो जो एक मेरा ऑफिस है उसके बाहर कभी कुछ देखा नहीं है मैंने तो यह सब जिम्मा लेना अभी से मैं टेंशन में हूं बट वी हैव टू डिसाइड वी हैव टू फर्म अप अवर विल पावर यदि नहीं करेंगे तो फिर यह जन्म तो ऐसे ही जाएगा क्या करेंगे अभी जैसे देखिए अ मैं आजकल महापुरुष महाराज की देवलोक पुस्तक है वह पढ़ रहा हूं तो मैं क्या करूंगा आरती के बाद में अपने कमरे में आऊंगा और हमको ब पीपीटीसी से ही जॉइन करने से ही यह सिखाया गया कि आरती के बाद में वो जो ट्यूब लाइट वगैरह नहीं जलाना है वो डेस्क लैंप ही जलाना है तो डेस्क लैंप जला करके मैं वहां पर वो किताब पढ़ता रहता हूं और फिर मेरा ऐसा हैबिट है कि मैं पेंसिल लेकर के बैठूंगा वो मार्किंग करता रहूंगा अंडरलाइन करूंगा मार्किंग करूंगा यह सब करूंगा तो ऐसा दो घंटा मुझे मिलता है आज संध्या आरती के बाद तो दो घंटा कहां पसार हो जाता है पता नहीं चलता अभी मैं मार्किंग कर रहा हूं पढ़ रहा हूं बीच में बीच में मन स्थिर हो गया अपने से ही कुछ करने की जरूरत नहीं है वैसे ही 510 मिनट तक बैठा हूं ऐसा नहीं है कि चिंतन कर रहा हूं वैसे ही बैठा हूं और फिर 5 10 मिनट के बाद मैं लगा अच्छा ठीक है चलो फिर से पढ़ना शुरू करते हैं पढ़ते पढ़ते कभी-कभी मैं चिंतन करता हूं कि अच्छा महापुरुष महाराज ने यह क्या कहा तो देखिए कि सब एक साथ में हो रहा है कभी पढ़ रहा हूं कभी जो पढ़ा है उसके ऊपर चिंतन कर रहा हूं कभी मन अपने से स्थिर हो गया है तो यह जो रामकृष्ण संघ कीय जो स्मृति कथाएं है ना उसका यह बहुत बड़ा पावर है कि इसको पढ़ते पढ़ते मन ऑटोमेटिक कभी स्थिर हो जाएगा तो ये जो सहज स्थिर होना और मेहनत करके मन को स्थिर करना ये देखिए कि यह सहज रूप से स्थिर होता है तो दैट इज वन वेरी पावरफुल वे अपने कोई भी स्मृति कथा की पुस्तक कथामृत है वगैरह कोई भी है वो लेकर के बैठिए पेंसिल हाथ में रखिए कुछ ना कुछ मार्किंग करते रहिए पढ़ते पढ़ते ऑटोमेटिक ऐसा होगा कि कुछ समय मन अपने से स्थिर हो जाएगा एट दैट टाइम यू विल स्टार्ट गेटिंग द जॉय ऑफ दिस सॉलिट्यूड ये जो सही सही शांति नीरवता है उसका आनंद आना शुरू होगा देन योर माइंड विल ऑटोमेटिक क्रेव फॉर इट एक बार आपने कभी रसगुल्ला नहीं खाया एक बार जब खा लिया तब आपको अ भी सब समय उसको खाने की हैबिट अभी वो मन में आता है कि नहीं अभी तो रसगुल्ला खाना ही है उस दिन खिलाया था कितना आनंद आया था ये भगवान बुद्ध की जो कहानी कि यंग थे तब पेड़ के नीचे में बैठे थे मन स्थिर हो गया और ऐसा आनंद से मन भर गया फिर जब वो जो दृश्य देखे ना एक के बाद एक वो डेड बॉडी देखा बीमार व्यक्ति को देखा श्रमण को देखा फिर ये आध्यात्मिक चेतना जागृत हुई तब उनको फिर वही याद आया कि हां मैं जब यंग था और जो मन में जो शांति आई थी वोह फिर से चाहिए सो वंस यू गेट दिस पीस यूर माइंड विल ऑटोमेटिक क्रेव टुवर्ड्स इट तो यह अभी रसगुल्ला खाने की चाह आपको मेहनत करके रसगुल्ला नहीं खाना वो भीतर से ही आता है तो सिमिलरली दिस जॉय विल डिमांड यू टू डू मोर टू अटन इट फिर ये जो विश साइकिल होती है ना विष चक्र कि जितना हम नेगेटिव इमोशन में जाते हैं उतना ही नेगेटिव इमोशन अपने सर पे करके जैसे कि वशीभूत करके बैठ जाती है दिस वर्चुअल सर्कल यह पॉजिटिव सर्कल चालू होगा रिइंफोर्समेंट ऑफ जॉय रिइंफोर्समेंट ऑफ हैप्पीनेस रिइंफोर्समेंट ऑफ पीस एंड जैसे प्रोफाउंड क्वाट व अपने को जैसे चक्रवृद्धि ब्याज की तरह आप बैंकर है इस चक्रवृद्धि ब्याज की तरह व अपने को बढ़ाता जाएगा बिल्कुल ठीक यह भी उदाहरण मुझे देना चाहिए देखिए अपने ऑर्डर में देखिए जैसे जैसे समय भी ता है ना बहुत सारे चिंतक आते हैं वो फिर चिंतक लोग क्या करते हैं फिलोसोफर कि जितनी भी घटना है ना उसके पीछे का तात्पर्य खोजना शुरू कर देते हैं अपना ऑर्डर है ना अभी बड़ा यंग है इतनी ऐसी इतनी घटनाएं हैं जिसका कि तात्पर्य अभी भी हमको आत्मसात करना है वो छोटी-छोटी घटना है वो शिव सजे हैं छोटे थे और गांव में वो जो शिव का नाटक हो रहा था वो जो नाटक करने वाला बीमार हो गया ठाकुर को शिव बना दिया जैसे ही शिव बन के आए समाधि स्थ हो गए जैसे कि लगा कि अपना सही स्वरूप उनको पता चल गया ठाकुर क्यों गया वगैरा नहीं चाहते थे वहां जाने से ही शरीर चला जाएगा तो मैंने ये सब छोटी-छोटी घटनाओं में इतना तात्पर्य है अभी इसको कितने 1500 साल लगेंगे इसको सबको खोज करके डिस्कस करने में जब ठाकुर की थ शिवरात्रि थी तब नीलांबर मुखर्जी गार्डन अर्थात कि बेलूरमठ पहले उस जगह प था ना जहां पर आज का वेद विद्यालय है तो गिरीश घोष वगैरा थे स्वामी जी को शिव की तरफ सजाया गया था यस बहुत अच्छा पैरेलल मैंने भी कभी नहीं सोचा था इस तरह से वो जो भजन कीर्तन चल रहे थे तो स्वामी जी ने कहा यह सब बंद करो मर्दानगी भाव वाले गीत गाओ भजन गाओ ये क्या इस देश में खोल करता म वो जो ये जो ढाक है पखावज वो सब नहीं बचते हैं क्या वो शिव के भाव से अपने को भर दो यह राधा भाव अभी दूर कर दो ये जो सब स्वामी जी ने जिस दिन कहा था उस दिन की बात है उसके बाद में गिरीश घोष आया था गिरीश घोष को भी इसी तरह से सजाया था स्वामी जी पूजा घर की ओर जा रहे हैं स्वामी जी कहते हैं कि हम लोगों को खाने में नहीं मिल रहा है और तुम अपने ठाकुर को लची भोग दोगे क्या पूरी भोग दोगे देखता हूं तुम्हारे ठाकुर कैसे पूरी भोग खाते हैं फेंक दू का ठाकुर को पूजा घर की ओर जा रहे हैं तो शशि महाराज भी तो पहलवान थे ना खड़े हो गए स्वामी जी को धक्का मारा बाल से खींचना शुरू किया कि कैसे जाते हो मंदिर में देखता हू और ये लोग हल्लागुल्ला कर रहे है लाटू महाराज बैठ के जप कर रहे थे तो नाराज हो गए तो बोल उठे ठाकुर पैसा रख के गए अच्छा है अस्थि रख के गए उसमें इतना झगड़ा कर पैसा रख के जाते तो क्या करते तुम लोग किंतु देखिए जैसे ही लाटू महाराज ने ऐसा कहा ना स्वामी जी और राजा महाराज स्वामी जी और शशि महाराज दोनों हंस पड़े दोनों को पता है नाटक चल रहा है देखिए वो हंसी मजाक भी करना है तो ठाकुर महा स्वामी जी को लेकर के वो जो दक्षिणेश्वर में मास्टर महाशय नरेंद बात कर रहा है तो नर कहता है आजकल के लड़कों का दिमाग बड़ा बिगड़ गया है कैसे बेकार लोगों के साथ में मिलकर बातें करते हैं तो ठाकुर वहां पर आ गए तो थोड़ी देर उनकी बात सुनी फिर अभी नरेंद्र तो प्रिय पात्र है उसको तो कुछ बोलना नहीं है मास्टर वहां से को डांट दिया कि यह तो बच्चा है उसको पता नहीं तुम तो बड़े हुए तुमको समझ में नहीं आता यह सब बातें यहां पर करते हो तो ठाकुर हंसी मजाक नहीं करते थे ऐसा नहीं किंतु सब कुछ लेकर के अभी जैसे वह किसी ने कहा कि वह विलायत के बारे में तो इमीडिएट ठाकुर ने क्या कहा हमारा विलायत है ईश्वर के पास विलायत अर्थात की दूसरा विदेशी विदेशी देश तो अपना विदेश है ईश्वर के पास तो बात-बात में वो ईश्वर को ले आना दैट इज व्हाट वी नीड टू लर्न फ्रॉम ठाकुर और क्या है कि जैसे स्वामी जी स्वामी जी अमेरिका गए तो सब लोग बोलते हैं स्वामी जी आप इतनी हंसी मजा क्यों करते हैं आप तो धार्मिक यू आर अ रिलीजियस प्रीचर तो स्वामी जी कहते हैं क्या मुझे पेट का दर्द हो गया है क्या कि मैं सब सब समय मुंह चढ़ा करके घूमू मुह मना करके घूमू कि उन लोगों की ऐसी पूरी ये हैबिट है मतलब ऐसा एक पूरा कल्चर है कि जो ये रिलीजियस प्रीचर होंगे एक एकदम गंभीर रहेंगे एकदम सीरियस रहेंगे लोगों को डांट लोगों को डर दिखाएंगे कि हां तुम नर्क में जाओगे हमारी बात मानो वरना तुम नर्क में जाओगे तो दि रिलीजन ऑफ जॉय वी आर द चिल्ड्रन ऑफ इम्मोर्टालिटी व्हाई शुड वी बी अफ्रेड व्हाई शुड वी बी लाइक सेड और डिप्रेस्ड वी शुड एंजॉय बिकॉज ठाकुर महा स्वामी जी ने इतना सब कुछ देख कर के गए हैं व्हाई शुड नॉट वी एंजॉय वो जो ठाकुर कहते हैं ना कि एक समाध बोलकर के पंडित है वो क्या कहता है ईश्वर निरस है उनको अपना रस डाल के सरस कर दो तो ठाकुर कहते वेद में जिसको कहा गया है रसो वही सह उसको निरस कहता है किस तरह का पंडित है देखिए देखिए ठाकुर कहते हैं ना कि बहुत सारे साधु होते हैं ना वो चार धम नहीं करेंगे जगन्नाथ धम बाकी रखेंगे क्यों क्योंकि वह धम का चिंतन करते-करते शरीर जाएगा तो वैसे ही सब प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलना ठीक है जैसे वो प्रश्न का चिंतन करते करते अपना दिन जाए सब प्रश्न का उत्तर मिल गया