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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 24 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र उसका हम पाठ कर रहे थे। स्वामी गंभीरानंद जी [संगीत] महाराज द्वारा रचित जो पुस्तक है उसका चीर सथवा चीर सिमंतिनी यह चैप्टर हम देख रहे थे। श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि हो चुकी है और महासमाधि के जो कुछ विवरण हमको मिलते हैं उसका एक कंपाइलेशन मैंने किया है। वह हम देख रहे थे। तो काली महाराज का जो

स्वामी अभेदानन्दकृत श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन

विवरण है वह हमारा चल रहा था। अ ऑलरेडी अ श्री रामकृष्ण देव के स्थूल देह को चिता में भस्मीभूत किया जा चुका है। और इसके बाद की जो घटना एक पैराग्राफ आगे से ही थोड़ा सा हम देख लेते हैं कि क्या कहते हैं काली महाराज ठाकुर के जो पार्षद है और भक्तगण है उन्होंने अश्रु से भरे हुए नेत्रों से श्री रामकृष्ण के पुण्य शरीर के सत्कार करने के लिए घी चंदन काष्ठ माल्य प्रभुति वगैरह जो द्रव्य है उसकी व्यवस्था करके रखी थी। क्रमशः यह उसी दिन सुबह की बात है। 16 अगस्त को ही मध्य रात्रि को अर्ली मॉर्निंग कहेंगे। 1:00 बजे रात को अर्थात कि 16 के 16 अगस्त के अर्ली मॉर्निंग कहा जाएगा। तो अर्ली मॉर्निंग तो नहीं कहेंगे। माने प्री मॉर्निंग यदि नाम देना चाहते हैं तो उस दिन 16 अगस्त को ही ठाकुर का माने इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार उनका महासमाधि हुआ था और वही 16 अगस्त की ही शाम को ठाकुर के पवित्र देह को काशीपुर महास्मशान में अग्निदाह देना था तो इसके लिए यह सब द्रव्य की व्यवस्था करके रखी है। क्रमशः जिस तरह से विधि होती है जिस तरह से प्रथा है भारत में मृत देह के गंगा में मृत देह को स्वच्छ किया जाता है धोया जाता है तो इसी तरह से गंगा में श्री रामकृष्ण देव के पवित्र शरीर को स्वच्छ किया गया और माला से सज्जित करके चिता के ऊपर में स्थापित किया गया। चिता का अग्नि शतशत ज्वालाओं से विस्तार होकर के उर्ध्व उत्थित होने लगा। सेवक और भक्तगण अग्निकुंड में पुष्प वर्षण करने लगे। खोल करल और कीर्तन के मधुर ध्वनि से शशान घाट प्रतिध्वनित होने लगा। यह एक अवर्णनीय अपरूप दृश्य था। श्री रामकृष्ण देव के संतान और भक्तगण आखिरी बार के लिए शेष बार मत आखिरी बार के लिए श्री श्री ठाकुर के दिव्य शरीर के दिव्य शरीर का निरीक्षण करके श्रद्धा चित्त से प्रणाम करने लगे कोईकोई है कि स्तवपाठ करने लगे क्रमशः श्री रामकृष्ण देव का पार्थिव शरीर भस्म स्तूप में परिणत हुआ अग्नि के ढेर में राख के ढेर में परिणत हुआ भस्म स्तूप इतना हमने कल तक देखा था। अभी आज देखते हैं कि काली महाराज आगे क्या कहते हैं। हम आमरा दुई तीन जन से भस्म स्तूपे मध्य हो श्री श्री ठाकुर पवित्र अस्थि संग्रह करिया एकटी ताम्रो कोलोश स्थापन करिला हम दो दोती लोगों में से हम दो-तीन लोगों ने मिलकर के कौन थे वह नाम नहीं लिखा है। हम लोग अनुमान करके कह सकते हैं कि एक तो काली महाराज ही होंगे क्योंकि काली महाराज ने आमरा द्वी तीन जन हम दो-तीन लोग ऐसा कहा है तो यह दो-तीन भक्तों ने वह जो राख का ढेर था उसमें से ठाकुर के पवित्र अस्थि संग्रह करके एक ताम्र कलश में स्थापित किए एवं और दुख भारा क्रांतो हृदय काशीपुर बागाने फिर्या आशिलाम दुख दुख भारा आक्रांत हृदय इस तरह का हृदय जो कि दुख के भार से आक्रांत हो गया है या तो फिर दुख के भार से बोझ के नीचे वो धस गया है तो इस तरह का हृदय लेकर के काशीपुर के बागान में वापस आ गए से रात्रे हमरा शकुले श्री श्री ठाकुर घरे ओष् राख्या तहार पवित्र जीवनी आलोचना करते लागीला उसी दिन रात को हम सभी श्री श्री ठाकुर के घर में अस्थि स्थापित करके उनके पवित्र जीवन की आलोचना करने लगे एवं ध्यान जपे मनोनिवेश करिया तहार अदर्शन जनित दुख दूर करते चेष्टा करिला ध्यान और जप में मनोनिवेश करके उनके अदर्शन से प्रकट हुए दुख को दूर करने का प्रयास करने लगे अदर्शन जनित दुख अर्थात कि अभी तक तो श्री रामकृष्ण देव का साक्षात दर्शन वे पाते थे। अभी सभी के भीतर में हृदय के भीतर में ठाकुर बस रहे हैं। इसलिए अदर्शन जनित दुख दूर करने के लिए प्रयास करने लगे। नरेंद्रनाथ पुर भागे बसिया श्री श्री ठाकुर अहतु की विचित्र कृपा कथा बोलिया आमादे कखन कखनो सांत्वना देते लागीो नरेंद्र सबसे आगे बैठकर के श्री श्री रामकृष्ण देव की अहितु की अर्थात [नाक से की जाने वाली आवाज़] कि निस्वार्थ कोई किसी पर कृपा करता है किसी को पैसा देगा या किसी को हेल्प करेगा तो हो सकता है मन के भीतर में नेम एंड फेम की कोई वासना हो किया तो फिर अभी यह इन्वेस्टमेंट कर रहा है। भविष्य में रिटर्न मिलेगा। ऐसा एक इच्छा हो। श्री रामकृष्ण देव इन्होंने ठाकुर ने यह डायरेक्ट डिसाइपल को तैयार किया। इसके पीछे उनका कोई भी हेतु उद्देश्य या सेल्फिश मोटिव नहीं था। इसलिए अहतुतु की विचित्र कृपा। विचित्र का अर्थ यहां पर स्ट्रेंज नहीं लेना है। विचित्र का यहां पर लेना है। अद्भुत इस तरह की कृपा जिसका कि हम आकलन है या उसका कंपैरिजन है और कहीं पर नहीं पा सकते हैं। तो श्री श्री रामकृष्ण देव की अहतु की अद्भुत कृपा की बात करके हमको सांत्वना देने लगा। देखिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में उसी दिन रात को सभी लोग ठाकुर के घर में अस्थि रख करके वहां पर इकट्ठा हुए थे और वहां पर वार्तालाप कर रहे थे। इसके बाद का भी वर्णन है। काली महाराज का काफी लंबा वर्णन है कि महासमाधि की रात को अर्थात कि जब वापस आ गए शशान से फिर क्या हुआ वगैरह इसमें से कुछ-कुछ वर्णन हमने वराह नगर मठ का जो हमारा सीरीज ऑफ क्लासेस है। उसमें हमने डिस्कस किया था कि किस तरह से नरेंद्र ने कहा कि आओ हम लोग भी तो ठाकुर के ही एक तरह से कहेंगे कि अह उनकी अह धरोहर समान ही है। उनके वारसदार ही है। तो फिर क्यों नहीं उनके अस्थियों का एक-एक अंश हम लोग ग्रहण कर ले। तो ऐसा करके ठाकुर की अस्थि का एक-एक अंश सभी गुरु भाइयों ने ग्रहण किया था। और काली महाराज लिखते हैं कि कितनी गहन ध्यान उनका सबका उस दिन रात को हुआ था। तो वह सब घटनाएं है किंतु मैं उसको स्किप कर दूंगा। फिर कभी उसको देखेंगे क्योंकि ठाकुर की महासमाधि तो समाप्त हो गई और हमारा फिलहाल तो यही उद्देश्य है। वराह नगर मठ का या फिर अन्य कोई गुरु भाइयों का डिस्कशन करेंगे तो वह सब फिर से कभी देखेंगे। अभी

श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन — रामचंद्र दत्त के शब्दों में

चलते हैं रामचंद्र दत्त के वर्णन पर। देखिए रामचंद्र दत्त हमको पता है कि गृहस्थ भक्तों में से अग्रणी थे। जिस तरह से त्यागी संतानों में अग्रणी नरेंद्रनाथ थे वैसे ही गृहस्थ भक्तों में अग्रणी रामचंद्र थे। किंतु यहां पे एक बात समझनी है कि नरेंद्र की लीडरशिप और यह जो रामचंद्र दत्त का अग्रणी होना इन दोनों में फर्क क्या है? नरेंद्र त्यागी संतानों का लीडर था। इसके पीछे फैक्टर्स बहुत सारे थे। त्यागी संतानों में सबसे ज्यादा जप ध्यान करने की, त्याग की, बौद्धिक क्षमता की, ठाकुर को समझने की क्षमता नरेंद्र की सबसे ज्यादा थी। जबकि [गला साफ़ करने की आवाज़] गृहस्थ संतान कहेंगे ठाकुर के तो सभी एक के बाद एक मोती की तरह है। अब जैसे मास्टर महाशय ने कथामृत की रचना की या तो फिर गिरीश घोष की शरणागति थी। नाग महाशय की शरणागति थी। यह गोपाल की मां का पवित्र जीवन था। तो रामचंद्र दत्त इन सबसे श्रेष्ठ नहीं थे। शरणागति में वह कहीं इनसे श्रेष्ठ नहीं थे। गिरीश से या तो फिर नाग महाशय से या तो फिर मेधा शक्ति में मास्टर महाशय से श्रेष्ठ नहीं थे। तो उनका जो लीडरशिप था उन्होंने अपने से लिया हुआ था। जबकि नरेंद्र का जो लीडरशिप था ठाकुर ने दिया था। क्योंकि नरेंद्र की क्वालिटी के ऊपर में वह आधारित था। जबकि रामचंद्र दत्त का जो लीडरशिप था वह सिंपली बिकॉज़ कि जो व्यवहारिक कुछ कारण होते हैं इकट्ठा हो गए थे। जैसे कि उनके पास में पैसा था। जैसे कि उनके पास में फ्री टाइम था कि ठाकुर की सेवा करने के लिए वहां पर नियमित आ सकते हैं। जैसे कि उनके भीतर में एक व्यवहारू बुद्धि थी। जिसकी वजह से जो रेगुलर काम जो होते हैं डे टू डे वर्क ठाकुर की सेवा के वो बखूबी निभा सकते थे। जैसे कि उनकी कुछ सोशल स्किल थी क्योंकि सभी के साथ में मिलकर के वो कार्य करवा सकते थे। बिकॉज़ ऑफ दिस व्यवहारिक कारणों की वजह से रामचंद्र दत्त का लीडरशिप था। तो यह देखिए कि यहां पर रामचंद्र दत्त का जो वर्णन है वह किस तरह से है। त्यागी संतानों का वर्णन जो हमने अभी तक देखा उसके बाद में रामचंद्र दत्त का थोड़ा सा हमको क्या कहेंगे कि लिटरेरी दृष्टि से भी इतना यह नहीं लगेगा। अच्छा या तो फिर कहेंगे कि भाव की दृष्टि से भी शायद ना लगे। किंतु फिर भी ही इज वन ऑफ दी इंपॉर्टेंट हिस्टोरिकल कैरेक्टर। और ठाकुर को काफी नजदीक से उन्होंने देखा था। ठाकुर के कृपा प्राप्त थे। बोलकर के उनका वर्णन यहां पे है। देखते हैं क्या कहते हैं रामचंद्र दत्त। 31 श्रावण पूर्णिमा रविवार दैट इज 15th अगस्त 1886। ये महासमाधि का आगे का दिन। 16 अगस्त को महासमाधि हुई। उसके आगे का दिन 15 अगस्त प्रातः काले तिनी कोनो भक्त के डाका या पंजिका दिखीते बोली लेना सुबह को उन्होंने किसी भक्त को बुला के पंजीिका अर्थात कि वो पंचांग जिसको कहते हैं एस्ट्रोलॉजी की किताब वो देखने को कहा उसमें यह लिखा होता है कौन सा शुभ मुहूर्त है और कौन सा अशुभ मुहूर्त है 31 श्रावण शकुल विवरण श्रवण करिया जे एक भाद्रो दिनटी तहार कर्ण गोचर होइलो अमनी तहा के चुप करते कोहिले 31 श्रावण का सब विवरण सुनकर के उसी दिन 31 श्रावण था यानी कि ठाकुर को बिल्कुल अंतिम दिन ही ठाकुर यह पंजीिका देख रहे हैं। बिल्कुल अंतिम दिन यह पंचांग देख रहे हैं। 31 श्रावण का पूरा विवरण उन्होंने सुन लिया। किंतु उनको लगा कि नहीं शायद आज का दिन इतना शुभ नहीं है। तो नेक्स्ट डे क्या है? तो नेक्स्ट डे है पहला भद्र। तो उस दिन का जैसे ही विवरण उन्होंने सुना जैसे ही उनके कानों में गया वैसे ही उन्होंने उस जो भक्त ये पंजिका में से सुना रहा था पंचांग में से उसको कहा बस अभी तुम यहीं पर ठहर जाओ। प्रकृत पक्ष घटनाटी तहार महासमाधि आठ नए दिन पूर्व घटिया छिलो स्वामी जोगानंद पंजी काटी ठाकुर के पिया सुनाइया छिले किंतु यहां पे दूसरा भी एक मत है कि यह घटना उनकी महासमाधि के 8 9 दिन पहले हुई थी और स्वामी योगानंद जी ने यह पंचांग ठाकुर को पढ़ के सुनाया था

श्रीरामकृष्ण का दैनिक जीवन: हर क्षण आध्यात्मिक प्रेरणा

अपराह ने किंचित पर डॉक्टर नवीन पाल के कोहिले आज तुम्हार बो क्लेश होते छे दुईटी पार आज आमार बो क्लेशते छे दुईटी पारश्वो झोलिया उठीते छे दोपहर के कुछ समय के बाद में उन्होंने डॉक्टर नवीन पाल को कहा कि आज मुड़े मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है दोनों साइड पे जैसे कि अग्नि प्रज्वलित किया हो इस तरह से जलन हो रही है ए बोलिया हस्त प्रसारण कोरिया लेन ऐसा कह के दोनों हाथ फैला दिए नाड़ी देख डॉक्टर चखु स्थिर हो नाड़ी देखकर के डॉक्टर की आंखें स्थिर हो गई शायद उसको अंदाज आ गया होगा कि बस ये आखिरी घड़ी आ पहुंची है परमहंस देव को ही लेन परमहंस देव ने पूछा रोग दुषाध्य होइया छे रोग क्या असाध्य या दुसाध्य हुआ है इस अर्थ में कि अभी यहां से वापस आने का कोई रास्ता नहीं देखिए [नाक से की जाने वाली आवाज़] अ मास्टर महाशय के साथ में ठाकुर का एक बार वार्तालाप हो रहा था। कभी-कभी हम सोचते हैं कि ठाकुर ने तो सब कुछ जैसे कि प्रीप्लान करके ही यह सब किया है। ठाकुर तो अवतार थे। उनकी महासमाधि कब होने वाली है, कैसे होने वाली है, किस परिस्थिति में होगी, यह सब चीजें तो जैसे उनको पक्का पता पहले से ही होगा। किंतु क्या है? पता है ठाकुर के जीवन को जैसे-जैसे हम स्टडी करेंगे पता चलेगा कि उनके भीतर में दो है। ठाकुर ने खुद ने कहा था इसके भीतर में भक्त भी है और मां भी है। मां का संतान भी है। तो यह जो हाथ टूटा है यह उस समय की बात है जब ठाकुर को फ्रैक्चर हुआ था। तो जो हाथ टूटा है वह संतान का टूटा है। मां का नहीं। तो देखिए कि ठाकुर यह दोनों रियलिटी पे आना जाना करते थे। जब मां का भाव अर्थात कि जगत जननी का भाव उन पर जब सवार होता था तो भूत भविष्य वर्तमान सब देख पाते थे तब जबकि वह सही-सही में अवतार थे नारायण स्वयं थे किंतु बहुत बार ऐसा होता था कि वह संतान भाव में ही रहते थे और उनकी भूत भविष्य की अंडरस्टैंडिंग जो होती थी वह उस समय के लिए उस क्षण भर के लिए लिमिटेड हो जाती थी। तो ठाकुर यहां पे भी देखिए एक प्रसंग है मास्टर महाशय के साथ में बात करते हैं तो मास्टर महाशय ने बात में एक कैंसर के होने के बाद की ही बात है। अह मास्टर महाशय ने सब बार बात बातबात में कह दिया कि कैंसर कितना डेंजरस रोग है तो ठाकुर बड़े ही अधीर हो गए कि अच्छा यह क्या असाध्य है? क्या इससे मैं कभी मुक्त ही नहीं होऊंगा? तो इतना लंबा क्यों लग रहा है उसको ट्रीट होने में, उसको क्योर होने में? तो फिर मास्टर महाशय जैसे बिल्कुल बच्चे को समझा करके कहते हैं जैसे बच्चे को समझाते हैं वैसे [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठाकुर को कहते हैं नहीं यह तो इतना देरी इसलिए लग रहा है क्योर होने में कि जिससे कि औषध ठीक पड़ेगा। औषध ठीक पड़वे बोले औषध ठीक पड़ेगा। अर्थात कि इतना प्रॉपर्ली आपको क्योर कर देंगे कि भीतर में इसके किसी भी तरह का जो साइड इफेक्ट है या कोई लिंगरिंग आफ्टर इफेक्ट है आज की लैंग्वेज में कहे बहुत सारे लोगों को कोरोना का आफ्टर इफेक्ट हो गया। मैंने दो-तीन लोगों से सुना कि पहले तो बड़े हेल्दी थे किंतु कोरोना के बाद में स्टेप्स यदि चढ़ते हैं तो उनको उनकी सांस फूल जाती है। माने वो बहुत ही जल्दी टायर्ड हो जाते हैं। किसी किसी को हार्ट डिसीज भी हो गया है कोरोना के बाद में तो यह कोरोना की आफ्टर इफेक्ट है या साइड इफेक्ट है जो भी है। तो यहां पर मास्टर महाशय ऐसा कहना चाहते हैं कि औषध ठीक पड़ेगा ओशु ठीक पड़वे बोले अर्थात कि यह जो समय लग रहा है आपका कैंसर क्योर होने का वो क्यों हो रहा है क्योंकि आप इस तरह से कंप्लीटली क्योर कर देंगे कि ना ही इसका साइड इफेक्ट रहेगा ना ही इसका आफ्टर इफेक्ट रहेगा तो ठाकुर शांत हुए जैसे बिल्कुल बच्चा है और कहते हैं अच्छा ताई बोलो माने ऐसा कहो कि इसके लिए देरी हो रहा है ऐसा मत कहो कि कि यह असाध्य रोग है या बहुत लंबा समय लगेगा इसको क्योर होने में या तो फिर बड़ा ही भयावह रोग है। ऐसा सब क्यों बोलते हो? तो देखिए कि ठाकुर का एक बचपना था उनके भीतर में। इस अर्थ में कि जब वह सामान्य लेवल पर रहते थे, एक संतान भाव ले रहते थे और आध्यात्मिक ऊंचाई पर जब जाते थे तब जगत जननी का आवेश होता था। ठाकुर ने खुद ने जिस तरह से कहा है कि चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी। बाह्य दशा, अर्धबाह्य दशा और अंतर्दशा। तो बाह्य दशा में वह भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे। अर्धबाह्य दशा में भाव में मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते थे और अंतरर्दशा में समाधि मग्न हो जाते थे। किंतु यहां पर देखिए जो बाह्य दशा है वह आप ठाकुर के बालक भाव के साथ में अप टू एन एक्सटेंट कंपेयर कर सकते हैं। किंतु उसमें भी देखिए कि बाह्य दशा में भक्तों के साथ वार्तालाप करना ऐसा ठाकुर कहते हैं। बहुत बार हमने देखा है। म अंतरर्दशा और अर्धबाह्य दशा तो ईश्वरीय दशाएं हैं। ईश्वरीय भाव का आवेश होता है। यह तो स्पष्ट दिखता है। किंतु यह जो बाह्य दशा है उसको भी हम दो विभाग में बांट सकते हैं। बाह्य दशा में एक तो है कि जब भक्तों के साथ में वार्तालाप करते हैं बहुत बार भक्तों का जो संस्कार है, उनका भूत भविष्य वर्तमान है, उनकी किस ईश्वर पर आस्था है, उनकी किस योग मार्ग में उनकी रुचि है या उनकी क्षमता है, दक्षता है, उसका देख करके आकलन करके ठाकुर उनके साथ में बात करते थे। तो इसके लिए भी भक्तों के साथ में वार्तालाप करने के लिए भी बहुत बार वह उनके भीतर में यह मां देवी सरस्वती का जैसे कि उनका भाव उनके भीतर में प्रवेश होता था। किंतु दूसरा एक बाह्य दशा में दूसरा एक कहेंगे कि ठाकुर यह दिन प्रतिदिन की घटनाओं के भीतर में वो एंगेज हो रहे हैं। तो जैसे कि एक बार वो जो वृंदा दासी है वृंदा दासी ने आकर के पूछा यह जो एक चीज यहां पर रखी थी वो कटोरी ना की ऐसा कुछ वो कहां पे गई? देखने को नहीं आती। तो ठाकुर ने कहा अच्छा अरे रामलाल को पूछो। रामलाल देखता है कहां पे है। तो देखिए कि अभी यह जो दिन प्रतिदिन की घटनाएं हैं उसका विवरण कथामृत में बहुत ही अल्प मिलता है। किंतु वह है तो सही ही ऐसा तो संभव ही नहीं कि ठाकुर सब समय या तो भक्तों के साथ में वार्तालाप करते हैं या तो फिर नृत्य कीर्तन करते हैं अर्धबाह्य दशा में या तो फिर अंतर्दशा में समाधिस्थ रहते हैं। ऐसा तो है ही नहीं। उनके जीवन का काफी हिस्सा बहुत ज्यादा हिस्सा नहीं किंतु कुछ ना कुछ पार्ट जो है उनके लाइफ का तो वो एक नॉर्मल लेवल पर जाता होगा। जैसे हम लोग डे टू डे हमारा जीवन है। हम लोग खाना खाते हैं। हम लोग शौच के लिए जाते हैं। हम लोग यह जो जीवन जरूरी जो वार्तालाप है वह सब करते हैं कि यह कटोरी कहां गई कि या तो फिर यह प्रसाद आया है। तो ठाकुर कहते हैं कि वहां पर वह तोता मेना है पिंजरे में उनको भिजवा दो। तो पिंजरा क्या? तो नहबत तोता और मैना क्या? तो फिर यह मां शारदा और यह लक्ष्मी दीदी। तो जो भी वह काली मंदिर से आता है तो एक हिस्सा वहां पर भेजने को बोलते हैं। मास्टर महाशय बहुत लंबे समय तक यही सोचते थे कि ठाकुर ने कोई ये चिड़िया पाल के रखी है। तो यह सब क्या है? ठाकुर एक डे टू डे लाइफ में एक व्यवहार दक्ष वर्तन करते थे। ऐसा नहीं है कि उनका वर्तन जो है वह इंप्रैक्टिकल था या तो फिर वह विचित्र कुछ था। ऐसा नहीं था। ही इज़ अ वेरी नॉर्मल पर्सन। वही जो फेमस घटना है ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं कि मेरी धोती भी ठीक नहीं रहती है जब मैं भाव में मत हो जाता हूं। इसके बावजूद मैं कभी छाता भूल के नहीं आता। जब मास्टर महाशय छाता वहां पंचवटी में भूल के आ गए थे। तो मास्टर महाशय ने जब यह सुना तो वह बड़े ही लज्जित हो गए। तो यह जो छाता याद रख के छाता यानी छतरी अंब्रेला। तो यह अंब्रेला याद रख के ले आना साथ में। यह मां को यह जो काली मंदिर से जो प्रसाद आया है वहां नहबत में मां के पास में पहुंचाना यह जो सब चीजें हैं उनके खुद के कमरे में यह पात्र वगैरह जो कुछ भी होंगे वह अपनी जगह पर है कि नहीं यह सब देखना यह एक नॉर्मल एक पर्सन जो होता है एक व्यवहार कुशल पर्सन जो होता है उसके तरीके का ठाकुर का यह एक पोर्शन भी था उनके जीवन का आई फील कि कभी-कभी ठाकुर के वार्तालाप है या तो ठाकुर की अर्धबाह्य दशा में नृत्य कीर्तन करते हैं। अंतर्दशा में समाधिस्थ हो जाते हैं। वह सब पढ़कर के हमको जितना इंस्पिरेशन मिलता है या जितना सीखने को मिलता है उतना ही सीख या तो उतना ही इंस्पिरेशन शायद हमको ठाकुर की यह डे टू डे लाइफ से मिलता। यदि उसको विस्तृत रूप से वर्णन करते कि हां सुबह को आज ठाकुर उठे इतने समय फिर वह स्नान करने को गए ये है वर्णन है गंगाधर महाराज का रेमिनेशंस है गंगाधर महाराज अर्थात कि स्वामी अखंडानंद जी तो अखंडानंद जी का है यह रेमिनेशंस कि ठाकुर ने कहा चलो गंगा स्नान के लिए जाते हैं। फिर गंगा स्नान कर रहे हैं। वहां पर दो-तीन लोगों को देखा कि वह सब सांसारिक वार्तालाप कर रहे हैं। तो ठाकुर जैसे बिल्कुल गंगाधर महाराज इतना सुंदर वर्णन करते हैं कि छोटा बच्चा जब नाराज हो जाता है तो कतराता कतराता वैसा तीक्षण दृष्टि करता करता कैसे किसी के सामने देखता है जिससे कि वह नाराज है तो ठाकुर भी इस तरह से बड़े ही कतराते बड़े ही तीक्षण दृष्टि से जो लोग सांसारिक वार्तालाप कर रहे हैं पवित्र गंगा के घाट के ऊपर में बैठे-बैठे पवित्र भवतारिणी के मंदिर के गंगा के घाट पे बैठे-बैठे तो ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए कि ऐसी पवित्र जगह पर सांसारिक बातें कर रहे हैं। तो ऐसे बिल्कुल बच्चे की तरह कतराते कतराते उनके सामने देख रहे हैं। तो इट्स अ वेरी ब्यूटीफुल डिस्क्रिप्शन। इसके बाद में फिर ठाकुर वापस आते हैं कमरे में और फिर जो सभी जो अभी तो स्नान करके आए हैं तो जितने देवी देवता के फोटोग्राफ है उनके सामने जाकर प्रणाम करते हैं वगैरह एक बड़ा ही सुंदर वर्णन है। वन मॉर्निंग विद श्री रामकृष्ण यदि एक सुंदर आर्टिकल लिखना है श्री रामकृष्ण देव के साथ में एक सुबह तो बहुत ही अच्छा मटेरियल मिलेगा और मैंने जितना भी अपने साहित्य का स्टडी किया मुझे ऐसा लगता है यह जो डे टू डे वर्णन है ना ठाकुर के जीवन का यह इतना ही इंस्पायरिंग है जितना कि इंस्पायरिंग यह विद्यासागर के साथ में जब बातें करते हैं या तो केशव सेन के साथ में या तो बाकी सब भक्तों के साथ में वह जो एक इंस्पायरिंग मटेरियल हमको मिलता है लीला प्रसंग और कथामृत उससे उतना ही इंपॉर्टेंट इतना ही इंस्पायरिंग मटेरियल हमको यह डे टू डे में से मिलेगा। देखिए आई विश कि जिस तरह से कथामृत लिखा गया है जिसमें फोकस है ठाकुर के फिलॉसोफिकल डिस्कशन पे जिस तरह से लीला प्रसंग लिखा गया है जिसमें कि डिस्कशन है ठाकुर की घटनाओं का फिलॉसोफिकल इंटरप्रिटेशन करने पे वैसे ही ऐसी कोई किताब लिखी जाए वि इज डिवोटेड टू डे टू डे लाइफ ऑफ श्री रामकृष्णा और विदाउट एनी फिलॉसोफिकल कमेंट्री ये जो ठाकुर गंगा स्नान कर रहे हैं। उसका क्या फिलॉसोफिकल मीनिंग है? तो मां गंगा का यह महात्म है वगैरह-वगैरह। वह सब छोड़ो महात्म को और फिलॉसोफी को। ये पूरे किताबें के किताबें ढेरों के ढेर लाइब्रेरी भरी पड़ी है। वो हिंदू धर्म के विभिन्न जो एस्पेक्ट है उसके महात्म को प्रदर्शित करने के लिए। वो चाहे योग हो ना कि वेदांत हो ना कि चाहे कोई भी किसी भी तरह की फेस्टिविटीज हो या पूजा हो। हमको एटलीस्ट मुझे यदि ऐसी कोई किताब मिलती कि जो कि और कुछ नहीं है। बस ठाकुर के दिन प्रतिदिन जो घटनावली है उसका वर्णन है तो मैं सही में उसको इतना आनंद के साथ में पढ़ता बट अनफॉर्चूनेटली हम सभी के मन में एक ऐसा बैठा हुआ है कि यदि ठाकुर को पढ़ना है तो उनके जो सर्वोच्च भाव है उसी को पढ़ना है। उनके डे टू डे लाइफ का इतना कोईेंस नहीं है। मास्टर महाशय देखिए आप जस्ट इमेजिन कीजिए कि ठाकुर के साथ में जो इतना समय उन्होंने बिताया और ठाकुर के फिलॉसोफिकल डिस्कशन को पॉइंट बाय पॉइंट फॉलो करके एक्यूरेटली जो नोट कर सकते हैं उनको क्या ये डे टू डे जो घटनाएं होती होगी यह वृंदा जो काम वाली जो बाई है उसके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं या तो फिर यह जो काली मंदिर के जो कर्मचारी है उनके साथ में ठाकुर किस तरह से डीएल कर रहे हैं जो मिलता है विवरण वह विवरण किसी ना किसी पॉइंट को लेकर के मिलता है। अब जैसे कि एक दिन काली मंदिर से प्रसाद आया नहीं देरी हो गया तो ठाकुर बड़े ही व्यस्त हो उठे। बड़े ही एशियस हो गए कि क्यों प्रसाद नहीं आया? क्यों प्रसाद नहीं आया? तो योगानंद जी अपने डाउटिंग थॉमस तो उनका जो था कि हां वो ब्राह्मण के है मतलब है तो ब्राह्मण ही आखिर में संस्कार तो ब्राह्मण के ही है चाल कोला बांधा ब्राह्मण तो मतलब जो कि जिनको कि दक्षिणा में केला और चावल मिलता है ऐसी तरह के ब्राह्मण ही तो है आखिर में भले ही चाहे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लिया तो एक दिन प्रसाद देरी से आया तो इतने एशियस हो गए तो यह था अपने योगानंद जी का इंटरप्रिटेशन फिर ठाकुर गए वहां पे वो जो कोठारी अर्थात कि वहां का जो एडमिनिस्ट्रेटर होता है जाकर पूछे कि अरे वहां के लिए जो प्रसाद की व्यवस्था की है वो आया क्यों नहीं अभी तक तो कोठारी थोड़ा सा शर्मिंदा हो गया। अच्छा अच्छा महाशय मैं अभी देखता हूं व्यवस्था करता हूं। फिर ठाकुर जब वापस आए और देखा कि योगानंद जी के चेहरे पर डाउट स्पष्ट दिख रहा है। तो ठाकुर ने कहा कि देखो कि रानी रासमणि ने तो यह मंदिर और मंदिर का जो कुछ भी व्यवस्थाएं हैं भोग प्रसाद की वो कंगालियों के की कंगालियों के लिए करके गई है। ये गरीब है जो लोगों को खाने को नहीं मिलता है। ऐसे लोग यहां पे आते हैं। मां काली का भोग वह ग्रहण करते हैं। तो इन लोगों को नहीं मिलकर के यह यहां के जो कुछ-कुछ ब्राह्मण है वह कुछ-कुछ पंडित हैं वे लोग क्या करेंगे मां काली का भोग अपने घर ले जाएंगे और फिर उन्होंने किसी किसी के साथ में अवैध संबंध रखा है उनको जाकर के दे देंगे अविद्या ठाकुर उनको कहते हैं एक बार डॉक्टर सरकार को डॉक्टर सरकार ने कि तुम्हारी अभी अविद्या मरे। ऐसा ठाकुर ने डॉक्टर सरकार को कहा। तो अविद्या का अर्थ डॉक्टर सरकार ने इस तरह से कर लिया कि इस तरह की स्त्री जिसके साथ में अवैध संबंध होता है अर्थात कि एक तो होती है वाइफ जिसके साथ में एक लीगल संबंध होता है शास्त्रीय संबंध होता है और इस तरह की स्त्री जिसके साथ में अवैध संबंध होता है तो जैसे ही ठाकुर ने कहा तुम्हारी अविद्या मरे तो डॉक्टर सरकार ने नाराज होकर कहा मेरी कोई अविद्या कभी नहीं थी तो ठाकुर कहते नहीं वो अविद्या नहीं जो वो जो जन्मगत अविद्या संस्कारों से प्रकट होती है वह अविद्या तो यहां पे भी यह पंडित लोगों की अविद्या थी वह अविद्या के लिए माने डॉक्टर सरकार वाले अर्थ में कि उन लोगों के लिए मां काली का भोग ले जाएंगे तो क्या है कि रानी रासणि ने जिस पर्पस के लिए धन दिया है वो पपस जो है सॉल्व नहीं होगा। इसलिए मैं यहां पे मंगवाता हूं मां काली का प्रसाद जिससे कि जो जेनुइन भक्त आते हैं उन लोगों को यह प्रसाद मिले। तो जब यह योगेंद्र महाराज ने सुना तो थोड़े से शर्मिंदा हो गए। किंतु यहां पर देखिए है जो घटना कि प्रसाद क्यों नहीं आया और ठाकुर वहां पर बोलने को गए फिर प्रसाद आया। अभी इसके यह घटना लिपिबद्ध इसीलिए की गई है क्योंकि इसका एक फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस है। इसका एक टीचिंग है इसके भीतर में कि ठाकुर की जो निष्ठा है वह कितनी गहरी है। आज हमारे संघ में रामकृष्ण संघ इतना बड़ा हो गया है तो बहुत सारे पैसे आते हैं। तो कोई-कोई पैसा इस पर्पस के लिए आता है। कोई-कोई पैसा उस पर्पस के लिए आता है। तो जिस पर्पस के लिए पैसा आता है उसी पर्पस के लिए उसको यूज करना है। उसको एक्सपेंड करना है और किसी पर्पस के लिए नहीं। स्वामी जी रामकृष्ण संघ का जो फंडामेंटल जो आइडियाज है उसमें कह के गए हैं शाकेर को माछे जावे ना माछेर को शाके जावे ना अर्थात कि शाक के लिए जो पैसा आया है उसका कड़ी अर्थात कि पैसा शाक का पैसा मछली में नहीं जाएगा। मछली का पेशा पैसा शाक में नहीं जाएगा। जिस पर अभी आजकल तो इतना टाइट अकाउंटिंग नहीं है या तो फिर यह सब डिवीजन इतने डीप नहीं है कि यह मछली का पैसा या यह सब्जी का पैसा यह किचन के लिए है। यह साधु सेवा के लिए ऐसे जनरल अकाउंट होते हैं। किंतु स्वामी जी का जो कहना था वो एकदम जो ठाकुर का यह जो निष्ठा है उसके साथ में जुड़ा हुआ है। कि बात सिर्फ यह नहीं है कि आप आध्यात्मिक ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाली बातें करते हैं। यह वेदांत को जो व्यवहारू बनाना है अर्थात कि दिन प्रतिदिन के प्रत्येक कार्य में निष्ठा होनी चाहिए। हम लोग स्वामी जी को पढ़कर के व्यवहारू वेदांत का एक अर्थ करते हैं कि शिव ज्ञान जीव सेवा स्कूल चलानी है, हॉस्पिटल चलानी है, ट्राइबल डेवलपमेंट करना है वगैरह-वगैरह। किंतु देखिए कि हम लोग जब यह सब देखते हैं हमको लगता है कि अच्छा यह है वेदांत का व्यवहारू एप्लीकेशन जो कि शायद ठाकुर ने नहीं किया। किंतु वेदांत का जो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है वो सिर्फ यह नहीं है शिव ज्ञान जीव सेवा इस अर्थ में कि आप लोगों की इस तरह से सेवा करें। इसके बहुत सारे दूसरे भी अर्थ हैं और बहुत इंपॉर्टेंट जो है वह है कैरेक्टर। यदि कैरेक्टर इंटीग्रिटी अपने में नहीं है तो बहुत महत कार्य करने को यदि जाएंगे ना तो हम कहीं मुंह के बल जाकर के गिरेंगे। हां, स्वामी जी ने यह कहा कि यदि जेनुइन सेवा करते हैं तो धीरे-धीरे करके कैरेक्टर बन जाएगा। यदि इन द बिगिनिंग कैरेक्टर इंटीग्रिटी इतना स्ट्रांग नहीं भी है सेवा करते-करते इवेंचुअली इंटीग्रिटी आ जाएगी। सो दैट इज अनदर मैटर कि इस जगत में परफेक्ट होकर के ठाकुर की तरह मां की तरह तो कोई आया नहीं है। हमारा कैरेक्टर यदि अच्छा नहीं होता तो हम वैसे ही जन्म ही क्यों ग्रहण करते? हम लोग तो मुक्त ही हो जाते। तो कैरेक्टर में डिफेक्ट है बोल के जन्म ग्रहण किया है। बोल कर के ही तो ये संसार चक्र में हम लोग पीस रहे हैं। संसार चक्की में पीस रहे हैं। भवसागर में डूब रहे हैं। बोल करके ही तो हम साधना करने को आए। सो दैट इज अ जेन्युइन आर्गुमेंट। स्वामी जी कहते हैं कि कर्म योग करते-करते चरित्र गठन हो जाएगा। चिंता मत कीजिए। किंतु यह चरित्र गठन होना चाहिए। कर्म योग करतेकरते चरित्र गठन नहीं होता है तो फिर समझिए कि आप जो कर्म योग का जो प्रॉपर मेथड है उसको फॉलो नहीं कर रहे हैं। कर्म भोग हो जा रहा है। कर्म योग नहीं हो रहा है। निष्काम सेवा नहीं हो रही है। इन्वेस्टमेंट की तरह सकाम सेवा हो रही है। सो बट दैट इज अनदर मैटर। यहां पे जो व्यवहारू एप्लीकेशन है वेदांत की वि इज देयर इन एव्री मोमेंट ऑफ आवर लाइफ कि हां इतना छोटा सा छोटा जो घटना भी है वहां पर आपको ठाकुर की एक इंटीग्रिटी देखने को मिलती है कि काली मंदिर में किस पर्पस के लिए रानी रासमणि ने पैसा दिया उसी पर्पस के लिए वह पैसा व्यय हो तो मैं कभी-कभी सोचता हूं कि देखिए हम लोग वेरी फॉर्चूनेट कि मां के जीवन की से प्रतिदिन दिन भर की कितनी सारी घटनाओं का हमारे पास में विवरण है। मास्टर महाशय से सीख करके मां के पास में जो त्यागी संतान रहने को आए थे। उन्होंने मां के बारे में काफी कुछ लिखा है और सिर्फ त्यागी संतान ही नहीं यह जो भक्तगण भी है, गृहस्थ भक्त भी है, उन्होंने भी मां के बारे में मां के डे टू डे लाइफ के बारे में मां के दिन प्रतिदिन जीवन के बारे में काफी कुछ लिखा है कि किस तरह से मां खाना पकाती है। किस तरह से उनके परिवार जनों के साथ में व्यवहार करती है। किस तरह से भक्तों के साथ में वार्तालाप करती है। सो इट इज़ अ वेरी गुड डिस्क्रिप्शन। ठाकुर के साथ में प्रॉब्लम क्या है? ठाकुर ने जैसे कि मास्टर महाशय को ही कहा कि तुम अकेले जैसे कि एक ऑफिशियल चित्रगुप्त की तरह मेरे जीवन का जो भी लेखाजोखा है वह लिखोगे। बाकी सबको ठाकुर ने एनकरेज किया नहीं है लिखने के लिए। बोल के जो कुछ डिस्क्रिप्शन आज हमारे पास में अवेलेबल है अदर देन कथामृत और लीला प्रसंग बहुत ही अल्प है किंतु है और खास करके डायरेक्ट डिसाइपल के द्वारा जो कहा गया है ठाकुर के बारे में वि इज वेरी वैल्यूुएबल वि इज वेरी आप कहेंगे कि रिच इन डे टू डे घटना डे टू डे लाइफ आल्सो और उसके यह जो इंप्लिकेशन है दैट आल्सो तो आई ऑलवेज विश के ठाकुर की जो दिन प्रतिदिन की घटना है उसका एक सिंपल वर्णन विदाउट एनी फिलॉसोफिकल कमेंट्री यदि हमारे पास अवेलेबल होता तो यह कितना सुंदर होता माने वो पढ़ना जस्ट इमेजिन के ठाकुर झाऊला के लिए जा रहे हैं नौबत के सामने से और वहां पर खड़े रह के मां के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। अब आई डोंट नो के दिस अ फिलॉसोफी यदि है इस वार्तालाप के पीछे में और नहीं बट जस्ट टु इमेजिन दैट सीन इतना सुंदर प्राकृतिक दृश्य है मां जगदंबा स्वयं मां शारदा के रूप में वहां पे उपस्थित है नारायण रूपी ठाकुर स्वयं वहां पे है और बात चल रही है जैसे कि बिल्कुल संसार की माने विद्या का संसार ऑफ कोर्स अविद्या का संसार नहीं किंतु बिल्कुल डे टू डे लाइफ की वो वर्णन है भी सही ऐसे कुछ-कुछ कि नरेंद्र आया है तो मां का तो मन प्राण जैसे ठाकुर के श्री चरणों में ही पड़ा रहता था। तो जैसे ही ठाकुर ने कहा नरेंद्र को तुम आज रात को यहां पर रहना। मां ने नरेंद्र के लिए खाना बनाना शुरू कर दिया। अभी वर्णन क्या है? ठाकुर जा रहे हैं झाऊला रास्ते में खड़े रहे नैवत के सामने और मां को कह रहे हैं कि नरेंद्र के लिए खाना बना देना। तो मां ने कहा हां वह तो मैंने ऑलरेडी स्टार्ट कर दिया है। अभी देखिए एक्चुअल वर्णन तो सिर्फ एक ही लाइन है और वह भी एक पॉइंट को इलस्ट्रेट करने के लिए किया गया है कि हां मां का मन जो है उनके कान जो है जो वो सब कुछ मन प्राण ठाकुर के ही पास में रहता था। भले ही चाहे फिजिकल सेपरेशन इतना हो नहबत और ठाकुर के कमरे के बीच में प्राण का सेपरेशन बिल्कुल नहीं था। प्राण जैसे कि एक साथ में दोनों के इंटरवोवन थे। तो इस पॉइंट को इलस्ट्रेट करने के लिए सिर्फ एक लाइन लिखा है कि नबत के सामने ठाकुर खड़े रहते हैं और मां को यह बात कहते हैं। किंतु जस्ट इमेजिन कि ये एक्चुअल इवेंट जो है वो फाइव टू 10 मिनट से कम की नहीं होगी। और एटलीस्ट 20 से 30 सेंटेंस का जो है एक्सचेंज हुआ होगा ठाकुर और मां के बीच में। सो वो क्या थे? एक्चुअल सेंटेंस ठाकुर ने मां को क्या कहा? मां ने ठाकुर को क्या कहा? टुडे वी डू नॉट नो सम हाउ आई विश कि किसी ने वह एक्चुअल स्टेटमेंट रिकॉर्ड करके रखे होते। क्यों? मतलब ठाकुर के हाईएस्ट फिलॉसोफिकल स्टेटमेंट जो है मास्टर महाशय ने उसको रिकॉर्ड किया है। किंतु समथिंग एज मंडेन एज दिस। एज सिंपल एस दिस कि मां के साथ में बात कर रहे हैं। कह रहे हैं कि नरेंद्र के लिए खाना बनाना और मां कहती है कि हां मैंने खाना ऑलरेडी स्टार्ट कर दिया है। सो यह जो वार्तालाप है यह यदि रिकॉर्ड होता तो उसका भी एक ऐसा पावर होता कि जो कि हमको इतना इंस्पायर करता। मैं बहुत बार कहता हूं ना कि एक हाथ में कथामृत रखिए, दूसरे हाथ में जप माला रखिए। दोनों साथ में करना है। जब भी जप करते-करते मन भटकने लगता है तो मन को कथामृत में लगाइए और जब मन कथामृत पढ़ के थोड़ा सा एकाग्र हो जाता है तो फिर से जप करने में उसको लगा दीजिए। यानी कि जप करने में जैसे ही डिस्ट्रैक्शन आता है वैसे ही माइंड को कथामृत में रख देना है। पिरो देना है। और कथामृत में से निकाल करके फिर से जप करने में लगा देना है। अभी यहां पे कथामृत की जगह कथामृत का जो वार्तालाप है काफी फिलॉसोफिकल है। भले ही चाहे ठाकुर ने उसको सिंपल और प्लेन बनाने का प्रयास किया हो। दिन प्रतिदिन की घटनाओं का एग्जांपल देकर के वह कहने का प्रयास किया हो। अल्टीमेटली कथामृत इज ए वेरी फिलॉसोफिकल टेक्स्ट। किंतु यदि इस तरह की घटनाओं का वर्णन उसका कलेक्शन अपने पास में होता कि जहां पे और कुछ नहीं बस दिन प्रतिदिन का वार्तालाप हो रहा है। यू कैन फाइंड फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस सिग्निफिकेंस इन दैट आल्सो। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु रेदर देन द टॉपिक इटसेल्फ इज नॉट फिलॉसोफिकल। टॉपिक इटसेल्फ इज वेरी मंडेन वेरी डाउन टू अर्थ तो इस तरह का यदि वार्तालाप होता तो आई विश के जप करने में हमारे मन को एकाग्र करने में इससे ज्यादा सहायभूत और कुछ नहीं होता। सो दैट इज दैट हम लोग बहुत बार क्या करते हैं? हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफी। हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफी। ऐसा करते तो रहते हैं वि इज के एक तरह से देखें तो हमारे हिंदुओं का एक मोस ऑपरेंडी कहो ना कि हमारा एक कॉन्शियस चॉइस है वो कहो कि वो है कि व्हाट इज द हाईएस्ट इन द लाइफ इसको पर्स्यू करना है। किंतु यह हाईएस्ट को फॉलो करते-करते कभी ना बॉटम अपना जो है वह गायब हो जाता है। हाईएस्ट से जब गिरते हैं ना तो लोएस्ट पे जाकर के अटकते हैं। ये एक हो जाता है प्रॉब्लम। कहीं पे वहां से गिरने के बाद में बीच में कहीं पे एक सपोर्टिंग हमको नहीं मिलता। सो ये जो डे टू डे वार्तालाप है जब मन इतना ये जो अश्रुप भारा क्रांत वो जो शब्द यूज किया है ना काली महाराज ने। सो ऐसा अश्रु भराक क्रांत हमारा मन हो जाएगा कि डिप्रेस हो जाएंगे और किसी चीज में अपना मन नहीं बैठता है। प्राण शक्ति जैसे कि संपूर्ण रूप से खत्म हो गई है। शरीर में कुछ करने की क्षमता नहीं है। आजकल का लाइफ जो है ना हमको पूरा निचो देता है। हमारी प्राण शक्ति को पूरा खा जाता है। यह रियल फील जो चलता क्यों है? इट इज द लोएस्ट एफर्ट वर्क। आपको और कुछ नहीं करना है। मोबाइल हाथ में लेके वह स्क्रॉल करते रहना है और सोशल मीडिया आपके ब्रेन को भीतर से खा जाएगा। सो इंस्टेड ऑफ दिस कि जबकि प्राणशक्ति संपूर्ण रूप से व्यय हो गई है। थोड़ा सा भी कुछ भी करने की कैपेसिटी नहीं। उस समय यह सब पढ़ना है। जो कि डे टू डे लाइफ का विवरण है ठाकुर का। यह ठाकुर मां के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। नब नौबत के सामने खड़े रह करके। ये ठाकुर वो जो घोड़ा जो होता है ना वो तो घोड़ा गाड़ी उस समय होता था हॉर्स कैरेज तो एक बार की बात है कुछ भक्त जा रहे हैं हॉर्स कैरेज में वापस जा रहे हैं दक्षिणेश्वर से तो ठाकुर देख रहे हैं तो ठाकुर ने कहा देखो तुम इतने लोग एक साथ में मत जाना कि जैसे कि घोड़े को कष्ट हो ये भी एक ऑब्जरवेशन है देखिए सच अ मंडे ऑब्जरवेशन कि घोड़े को कष्ट ना हो इस तरह से मतलब घोड़े को कष्ट ष्ट हो इस तरह से तुम लोग सभी लोग एक गाड़ी में मत सवार हो जाना ऐसा होगा कुछ नौका से जाओ कोई दूसरा एक रास्ता खोज लो ऐसा करके जाना वि इज सो आपको सरप्राइजिंग लगेगा जो कि ब्रह्म भाव में मत्त रहते हैं सब समय उनका ऐसा भी ऑब्जरवेशन हो सकता है वि इज वेरी गुड देखिए काली मंदिर के दो तरह के कर्मचारी थे एक तो थे कि वह पंडित ब्राह्मण गण जो कि पूजा करते थे वगैरह करते थे मंदिर में काम करते थे और उनका एक घमंड था। यह ठाकुर एक बार कहते हैं कि रामलाल बामुनेर दोले मिशेचे आर केयर कोरेना माने यह रामलाल जो है यह पंडित ब्राह्मण के दल में वह अभी मिक्स हो गया है क्योंकि वह तो अभी मां काली का पुजारी है तो मां काली का पुजारी का जो पोजीशन है ब्राह्मण लोगों में वह तो हाईएस्ट है। नो डाउट। तो जितने भी ब्राह्मण लोग हैं वहां के पुजारी गण वो तो उनको सबसे ज्यादा सम्मान देंगे। तो अभी उनके दल में वो जाकर के मिक्स हो रहा है। बोल के मेरी अभी इतनी संभाल नहीं लेता। तो यह ठाकुर ये बाबूराम महाराज को ना कि ऐसे ही किसी को कहते हैं कि तुम थोड़े दिन आकर के अभी मेरे साथ में रहो। मेरी संभाल लेने के लिए कोई है नहीं। तो ऐसा करके यह कहते हैं ठाकुर। तो वो एक दल था ब्राह्मण पंडित लोगों का जो कि काफी घमंडी भी था और एक सोशल स्टेटस भी था उनका काली मंदिर में। किंतु एक दूसरा भी वर्ग था कर्मचारियों का। वो चाहे द्वारवान है ना कि वो जो गार्डनर है ना कि वो जो रसिक मेहतर है जो कि टॉयलेट क्लीन करता था। माने जो मैनुअल वर्कर्स जितने भी थे उन लोगों का एक दल था और इन दल इन लोगों के साथ में ठाकुर का रिलेशन बहुत ही अच्छा था। बहुत ही उन लोगों की ठाकुर के ऊपर में भक्ति थी। एक बार की घटना है कि उन लोगों ने भजन कीर्तन स्टार्ट किया सबने मिलकर के तो ठाकुर को उन्होंने शायद आमंत्रण दिया होगा कि आप आइएगा हम लोग भगवान का भजन गा रहे हैं तो उनको उत्साह वर्धन करने के लिए ठाकुर जाकर के वहां पर खड़े रहते हैं। मोस्ट प्रोबेबबली शायद ये नाट मंदिर में ही वे लोग कीर्तन कर रहे थे। तो उनका उत्साह वर्धन करने के लिए ठाकुर वहां पर जाकर खड़े रहे। उन्होंने खुद ने शायद हो सकता है एक दो कीर्तन किए होंगे और फिर ठाकुर अपने कमरे में वापस आ गए यह कह के कि अच्छा अच्छा बहुत अच्छा है तुम लोगों को ऐसा बीच-बीच में करना चाहिए तो देखिए कि वो जो वार्तालाप है कर्मचारियों के साथ में काली मंदिर के वो उसमें से बहुत ही रेयर कुछ हमारे पास में अवेलेबल है। हिंट्स बिखरे हुए हैं बहुत सारी जगहों पे किंतु सिस्टमेटिकली रिकॉर्ड नहीं किया गया है। सो यदि यह सब चीजें हमारे पास में अवेलेबल होती डे टू डे लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण जिस तरह से श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग है उनकी साधनाओं का फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग उनके गुरु भाव का फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग उनका जो वर्ल्ड मिशन है उसका फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग फिर जैसे श्री रामकृष्ण कथामृत है ठाकुर के वार्तालापों के पीछे में कितना डेप्थ स्पिरिचुअल था माने उनके जो हाईएस्ट स्पिरिच डिस्कशन था जो कि जनरल पब्लिक के लिए था नॉट फॉर एनी स्पेसिफिक ग्रुप तो वो जो जनरल पब्लिक के लिए हाईएस्ट फिलॉसोफिकल डिस्कशन ठाकुर का था वार्तालाप वो रामकृष्ण कथामृत में है तो ऐसे ही यदि डेली लाइफ ऑफ श्री रामकृष्ण या तो फिर श्री रामकृष्ण रोज निशी ऐसा करके कुछ होता सो इट वुड हैव बीन सो हेल्पफुल टू अस इन टुडेेस एटमॉस्फियर कि जबकि हम मैंने खुद ने अपने लाइफ में देखा है सुबह को जप करते हैं तो मन काफी फ्रेश रहता है। रात को ऐसा कुछ करने को बैठते हैं तो मन काफी डिस्ट्रैक्टेड होता है। क्योंकि दिन भर की घटनाएं वगैरह कल का प्लानिंग ये वो वो सब मिलकर के मन को डिस्ट्रैक्ट करके रखता है। अभी तो फिर भी कम है। राजकोट में था तो एक्सट्रीम लेवल पर था। यहां पे तो कुछ है नहीं करने को। तो फिर भी किंतु है तो सही। थोड़ा बहुत तो है ही। अब यू कैन नेवर बी कंप्लीटली फ्री फ्रॉम एव्री रिस्पांसिबिलिटी। ऐसा तो कभी होगा ही नहीं। तो जो भी डिस्ट्रैक्शन, डिप्रेशन या तो यह जो प्राण शक्ति का रास हो जाना यदि इस तरह की कोई किताब होती और उसको पढ़ते और साथ में यदि जप करते इट वुड हैव बीन द मोस्ट पावरफुल एक्सपीरियंस। मां का जीवन देखिए हम लोग कहते हैं कि कम्युनिटी लाइफ के रिलेटेड है। मतलब जैसे कि उनका फ्रेमवर्क जो है मां के जीवन का ठाकुर का कम नहीं था कम्युनिटी लाइफ को लेकर के। अनफॉर्चूनेटली उस एस्पेक्ट को ना हमने रिकॉर्ड ही नहीं किया है। तो यह भी एक बात हो सकती है कि ठाकुर चाहते थे कि कम्युनिटी लाइफ को लेकर के जो कुछ भी डिस्कशन या तो अंडरस्टैंडिंग है या तो जो कुछ प्रेरणा है हम मां से प्राप्त करें। बोलकर के ठाकुर ने जानबूझकर के किसी को अपना वह एस्पेक्ट है जीवन का उसको रिकॉर्ड नहीं करने दिया। यह भी एक इंटरप्रिटेशन हो सकता है। तो एनीवे म जो यहां पे ठाकुर ने यह कहा ना कि ठाकुर ने पूछा डॉक्टर को डॉक्टर ने नाड़ी देख के कहा जब ठाकुर की नाड़ी देखी डॉक्टर ने तो उनकी आंखें स्थिर हो गई। यानी कि ठाकुर समझ गए कि अभी उनको कुछ ना कुछ माने नेगेटिव दिख रहा है। तो ठाकुर ने पूछा कि रोग क्या दुसाध्य हुआ है? तो डॉक्टर ताई तो बोलिया अधोदन होईल हां हां तो ऐसा बोलकर के उन्होंने चेहरा झुका दिया तो परमहंस देव रोगेर कथा कििंबिंबा डॉक्टर कथा आर मुखे आ लेना तो फिर ठाकुर ने या तो रोग की बात या तो फिर ठाकुर जो डॉक्टर का जो रिप्लाई है उसके बारे में और कुछ उन्होंने कहा नहीं लुक्स समथिंग सो मंडेन के ठाकुर इज कंसर्न अबाउट हिज कैंसर अबाउट हिज डिसीज और एक और है कि उन्होंने महासमाधि का निश्चय कर ही लिया है। दूसरी ओर है कि ही इज कंसर्न अबाउट हिज कैंसर। सो ठाकुर के जीवन में ऑल दिस रियलिटीज लिव्ड पैरेलल। ये पैरेलल एग्जिस्टेंस था डिफरेंट लेवल्स ऑफ रियलिटी का। यहां पर संतान भाव है तो कभी जगत जननी भाव है। सो दैट इज म छोटा सा एक हिंट मिलता है एक छोटे वार्तालाप के माध्यम से। इसके बाद वाला है। अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: आध्यात्मिक प्रगति का एक बड़ा लक्षण है — गहरी शान्ति और स्थिरता। लेकिन जब हम कर्मयोग करते हैं, तब मन में बहुत हलचल, संघर्ष और उत्तेजना दिखाई देती है। जैसा आपने कहा, उससे प्राणशक्ति का भी ह्रास होता है। उदाहरण के लिए, Swami Brahmananda कर्मयोगी स्वभाव के नहीं थे, इसलिए उनके जीवन में अद्भुत शान्ति और गंभीरता दिखाई देती है। दूसरी ओर Swami Vivekananda कर्मयोग के महान आदर्श थे, इसलिए उनके जीवन में तीव्र उद्वेग, संघर्ष, यहाँ तक कि गुरुभाइयों के साथ वाद-विवाद भी दिखाई देता है। तो क्या कर्मयोग गलत है?

वो जो भगवान बुद्ध का वो जो मूर्ति देखते हैं ना बुद्ध या महावीर का टिपिकल एक जो इंप्रेशन आता है जगत से परे खुश खुशहाल उनका मन देखिए मैं अपना एक एक्सपीरियंस से बताता हूं क्या होता अब जैसे रांची के दिनों के बारे में यू आर राइट मतलब कि दिन भर काम करने के बाद में ऐसा नहीं फील होता था कि आई आई एम ट्रंकविल ट्रंकलिटी थी किंतु साथ में यह भीतर में रजस भी बहुत था। नर्वस एंग्जायटी तो नहीं थी कभी भी टेंशन भी कभी भी नहीं रहा किंतु एक भीतर से एंथूजियास्टिक रजस था कि हां कल और भी बढ़ाना है काम कल और भी बढ़ाना है। तो क्या है कि कार्य को लेकर के पूरा मेरा माइंडसेट था। सो दैट इज वन थिंग कि बुद्ध की तरह ट्रंकिलिटी मैंने रांची में कभी अनुभव नहीं की ना ही वह मेरा कभी गोल रहा था। किंतु क्या है कि देखिए कि वहां पर मेरा रजस कट गया और अभी बाद में क्योंकि मैं जैसे ही वापस आया जॉइ करने के लिए तो उन्होंने मुझे पब्लिकेशन में बैठा दिया। तो मेरे लिए पब्लिकेशन में बैठना असंभव हो जाता। यदि वह रजस अभी भी मेरे मन में होता। आई वुड हैव बिकम फ्रस्ट्रेटेड कि एक ही कैबिन में बैठकर के आपको दिन भर यह किताबों को लेकर के रहना है। सो दैट वास पॉसिबल ओनली बिकॉज़ कि वो रजस कट गया। और आज मैं यहां पे इसीलिए रह पा रहा हूं कि इवन जो मेरा एक इंटेलेक्चुअल एक था वो भी जैसे कि कट गया है कि हां म एक इंटेलेक्चुअल मुझे कुछ अचीव करना है वगैरह। सो दो कट गए मेरे वो जो वर्क एस्पेक्ट वो भी कट गया रांची में और माने वर्क आउट हो गया और वो जो इंटेलेक्चुअल एस्पेक्ट था वो भी वर्कआउट हो गया बेलूर मठ में और राजकोट में रह के बोल के आई कैन बी ट्रूली ट्रंकविल टुडे किंतु यदि मैं सीधा यहां पे आ जाता मेरा पोस्टिंग यहां पे हो जाता विशाखापट्टनम में तो आई वुड हैव बिकम मेड क्योंकि आप देखिए कि ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी के पूरे इस माहौल में मुझे फेंक दिया जाता तो मुझे क्या करना होता? मां की तरह जैसे मां ने कहा दिन में 10,000 जप करो। क्या मैं कर सकता हूं? नहीं वो आई कैन नॉट इवन इमेजिन कि मैं इवन दो-3000 भी कर पाऊं। म उस समय जिस समय मेरी यह परिस्थिति थी। जबकि मेरे मन में कार्य को लेकर के माने ये तो संस्कार होते हैं ना। आपको रजस होता ही है। तमस होता ही है। तो उस परिस्थिति में क्या मैं बैठ के 10,000 जप कर पाता? नहीं। आई वुड हैव गॉन मेड यदि मुझे फोर्स किया जाता तो तो क्या है कि वो कट गया बोलकर के टुडे आई एम इन अ मच बेटर पोजीशन कि यहां पर मैं रह पा रहा हूं। सो क्या है कि देखिए स्वामी जी ने तो स्पष्ट कहा है कि यह जो थ्यरी है कि कर्म योग करने के बाद में ज्ञान योग में प्रवेश करने के लिए आप एलिजिबल होते हैं। वो थ्यरी बिल्कुल गलत है। ये ज्ञान योग वालों ने इस थिरी को चलाया है। आप प्योर कर्म योग से ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति कर सकते हैं। यह स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है। किंतु स्वामी जी के खुद के जीवन में ये जो स्टेजेस आए हैं वो आप देखिए। जब वह एक्सट्रीम रजस था। पूरे भारत में घूमे थे और फिर अमेरिका का फर्स्ट विजिट है। दैट वाज़ स्वामी जी वाज़ एट द हाइट ऑफ ह रजस। किंतु जब भारत वापस आए और पहला साल तो उन्होंने काफी काम किया किंतु सेकंड ईयर से उन्होंने पब्लिक लेक्चर देना ऑलमोस्ट बंद कर दिया। उसके बाद में यह ऑर्गेनाइजेशनल वर्क है। डिसाइपल को रेडी करना है। वह सब उनका यह हो गया। यानी कि देयर इज़ अ फेस ट्रांजिशन। फिर जो सबसे इंपॉर्टेंट घटना है कि वहां पे अमरनाथ यात्रा। तो अमरनाथ यात्रा में जो स्वामी जी को अनुभव हुआ वहां पे गुफा में। सो दैट वाज़ अ टर्निंग पॉइंट ऑफ हिज ओन लाइफ। फिर वो जो ऑफ कोर्स कि खीर भवानी की घटना। सो अमरनाथ और खीर भवानी दैट इज स्वामी जीसस लाइफस्ट टर्निंग पॉइंट कि वो जो एक्सट्रीम रजस प्रवरज्या के दिन फर्स्ट वेस्टर्न विजिट और यह जो भारत में भाषण देके जो स्वामी जी लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोडा ऑल तीन फेस का वहां पे अंत आ गया है। सो कर्मयोग का स्वरूप चेंज हो गया है। इट इज मच मोर यू कैन से दैट सब्सटेंशियल यह मैं पब्लिक में लेक्चर देना तो यदि आप 100 लोगों को बोलेंगे अभी कल ही मैं एक स्कूल में गया था तो मैं बोल रहा था कॉलेज में गया था इंजीनियरिंग के स्टूडेंट मेरे सामने बैठे थे तो मैं बोल रहा हूं तो मैं सबका जो एक्सप्रेशन है ना स्टूडेंट का मैं ऑब्जर्व कर रहा हूं तो कुछ स्टूडेंट को मैंने देखा काफी इंटरेस्ट से मेरी बात सुन रहे हैं किंतु ऐसे बहुत सारे बैठे थे जो कि यह गेरवा पहन के कौन बाबा जी को यह लोग बुला के ले आए हैं। हमको जोर जबरदस्ती यहां पर बैठना पड़ रहा है। यह जो उनके मन का जो भाव है स्पष्ट उनके चेहरे पे मैं देख पाता हूं। तो क्या है कि पब्लिक वर्क में यह एक है कि आप बहुत ज्यादा मेहनत करेंगे तो हो सकता है कि मुश्किल से 10-15% को आप उनका लाइफ ट्रांसफॉर्म कर पाए। सो दैट वास दैट टाइप ऑफ वर्क। किंतु यह जो खीर भवानी और अमरनाथ के बाद का जो स्वामी जी का कर्म योग है इट इज अ फेस चेंज इट्स मच मोर सटल मच मोर डीपर अभी बेलूर मठ को स्ट्रेंथन करना है रामकृष्ण संघ को स्ट्रेंथन करना है डिसाइपल को रेडी करना है निवेदिता को ट्रेन करना है और फिर जो सेकंड विजिट ऑफ वेस्ट था इट इज़ अगेन मच मोर सटल थोड़ा बहुत प्रवचन स्वामी जी ने पब्लिक दिए हैं किंतु उनका जो मेन फोकस था कि कुछ सिलेक्टेड डिसाइपल को रेडी करके उनका लाइफ लाइफ बनाना है जो कि ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में किया था। सो दैट मॉडल स्टार्टेड इन स्वामी जीसस लाइफ आफ्टर खीर भवानी अमरनाथ और अगेन जब वापस आए और लास्ट पीरियड था उनका बेलूर मठ में दैट इज अगेन फेस चेंज और जो मायावती जब गए थे आखिरी बार दैट वाज़ के उसके बाद में जैसे कि बहुत ही ज्यादा उनका माइंडसेट इनवर्ड हो गया। एट द सेम टाइम बेलूर मठ आकर के बेलूर मठ के भविष्य के बारे में रामकृष्ण संघ के भविष्य के बारे में उनका बहुत ज्यादा थिंकिंग था। बट आप देख रहे हैं तो जो कर्म योग का आर्क क्या है? कर्म योग आखिरी घड़ी तक किया है। उन्होंने आखिरी घड़ी तक योगानंद जी के साथ में वो जो टहलते टहलते कहा कि यहां पे बहुत बड़ा यूनिवर्सिटी होगा वगैरह-वगैरह। बट द टाइप ऑफ वर्क एक है कि बहुत ही ज्यादा एक्सट्रोवर्ट और लोगों के साथ में जुड़ा हुआ है। अनदर इज डीपर एंड डिपर एंड मोर एंड मोर मीनिंगफुल। सो दैट कर्म योग का आर्क है। माने इन समरी जो ऐसा क्लेम करेगा कि कर्म योग पहले करना है बाद में ज्ञान योग करना है। दैट इज अ रॉन्ग थिंकिंग। सो दैट इज रॉन्ग थिंकिंग। बट कर्म योग का आर्क है।

प्रश्न: एक व्यक्ति से कहा गया कि यदि वह 100 गायों को बैठा दे, तो उसे बड़ा पुरस्कार मिलेगा। उसने बड़ी मेहनत करके 99 गायों को तो बैठा दिया, परन्तु सौवीं गाय बहुत ज़िद्दी निकली। वह किसी भी तरह बैठने को तैयार नहीं हुई। अंत में क्रोध में आकर वह व्यक्ति उस पर जोर से चिल्ला पड़ा। लेकिन उसके चिल्लाते ही जो 99 गायें पहले से शान्त बैठी थीं, वे भी घबराकर एक साथ उठ खड़ी हुईं। हमारा संसार भी कुछ ऐसा ही है।

देखिए यहां पर भी एक टीचिंग है। यहां पे भी है कि ट्राइंग टू बिकम परफेक्शनिस्ट कि 100 गायों को बिठाना है तो मैं एक गाय को छोड़ के रह नहीं पाऊंगा। जो सक्सेस 99 में मिली है। लेट अस टेक द विन जैसे इंग्लिश में कहते हैं। सो ये जो काम छोड़ देना एक लेवल पे मने लगा कि इनफ हो गया है। परफेक्शनिज्म में नहीं जाना है। नाउ डेलीगेट द रिस्पांसिबिलिटी। यह भी तो स्वामी जी में था कि ही डेलीगेटेड द रिस्पांसिबिलिटी। वरना बहुत सारे लोगों को मैंने देखा है वन मैन शो चलता है। मैं ही सब करूंगा। क्यों? क्योंकि मैं ही परफेक्शनिस्ट हूं और किसी को दूंगा तो गड़बड़ कर देगा। माने ऐसे मैंने बहुत सारे लोगों को देखे हैं। अकेले-अकेले बहुत कुछ करेंगे किंतु किसी को साथ में नहीं ले पाएंगे। किसी ने मुझे स्पष्ट कहा ऐसे ही सीनियर पोजीशन में कि मैं दूसरे लोगों के पास में यदि काम करवाऊंगा और उन लोगों को काम एक्सप्लेन करने में मुझे जितना समय जाएगा उससे आधे में मैं अपने से कर लूंगा और वह जो करेगा उससे मच बेटर करूंगा। तो क्या है एक माइंडसेट जो है ना बहुत सारे मैनेजर या एडमिनिस्ट्रेटर में होता है। मुझे परफेक्शनिस्ट होना है और परफेक्शनिस्ट होने के लिए मुझे ही सब कुछ करना है। तो इस ट्रैप में से भी स्वामी जी नहीं फंसे हैं कि उन्होंने बहुत ही जल्दी महासमाधि ले ली। कहा कि वटवृक्ष के नीचे में छोटे पौधे कभी बड़े नहीं होंगे। गुरु भाइयों को डेलीगेट किया रिस्पांसिबिलिटी। इट इज नथिंग लेस देन मिरेकुलस। ये जो लास्ट टाइम स्वामी जी जब न्यूयॉर्क गए माने सेकंड विजिट से वापस आ रहे थे इंडिया तो लास्ट टाइम न्यूयॉर्क गए तो काली महाराज ने दो-तीन बार स्वामी जी को कहा इट इज योर न्यूयॉर्क यू टेक इट मेक दिस इज योर न्यूयर यू टेक इट मेक तो स्वामी जी ने दो-तीन बार तो सुना कुछ बोले नहीं फिर आखिर में कह दिया यू टेक द न्यूयॉर्क फॉर मी द एंटायर वर्ल्ड इज देयर म जिन लोगों के लिए आत्मन है तो उन लोगों के लिए फिर ये ऑर्गेनाइजेशन फॉर्गेनाइजेशन क्या है [हंसी] म स्वामी जी का फेमस स्टेटमेंट ना एग्जैक्टली जैसे आपने कहा कि अटैच माने अटैचमेंट एंड डिटचमेंट परफेक्टली डेवलप्ड एंड परफेक्टली बैलेंस दैट इज़ कर्म योग। माने हम लोग अटैचमेंट वाला भाग तो याद रखते हैं कि मुझे स्कूल चलाना है, हॉस्पिटल चलाना है या कोई भी कार्य करना है। आई नीड टू बी परफेक्ट इन एवरीवेयर। बट फिर एक डिटचमेंट का भी पीरियड आता है। फेस चेंज का, एक ट्रांजिशन का वो हम फिर भूल जाते हैं।

प्रश्न: आश्चर्य की बात है लोग सेवाकार्य करते हुए भी कामना-वासना से, name-fame से जुड़ जाते है.

और अल्टीमेटली यदि यदि आत्मन इज योर गोल तो फिर उसको भी तो आपको छोड़ना है। अदरवाइज आप वहीं पर रह जाएंगे। आपने बिल्कुल ठीक कहा। सांसारिक दृष्टि से चैरिटेबल एक्टिविटी करना वेरी गुड। किंतु चैरिटेबल एक्टिविटी में आप एक बार एस्टैब्लिश हो जाते हैं देन ट्राई टू बी इवन मोर एंबिशियस। अब देखिए जैसे कि मैं एक बार बता रहा हूं लिमड़ी में मैं था तो बाबा के साथ में सुरेंद्र नगर गया था। वहां पे एक अनाथ आश्रम है। तो जो लोग अनाथ जो भाई अनाथा आश्रम चला रहे हैं उनका डेडिकेशन वगैरह देखा। मुझे बहुत अच्छा लगा। माने अनाथाश्रम चलाना तो बहुत ही कष्ट का काम है ना। इस अर्थ में नहीं कि आपको मेहनत ज्यादा करनी है। किंतु छोटे बच्चों को संभालना। मां के बिना के जो बच्चे हैं उन लोगों का एक मन का जो दुख होता है उसको आपको ये करना मैं तो नहीं कर पाऊंगा। मैं बाकी सब करने को तैयार हूं। मैं अनाथ आश्रम में जाने को तैयार नहीं। वहां का जो डिप्रेशन है ना इट विल किल मी। मैं तो एकदम स्पष्ट कहता हूं। अब यह भाई सब कर रहा है। सो आई वास सो इंप्रेस्ड। सो मैंने कहा अब वापस जाने के समय कथामृत ना कि ऐसा कुछ आप डेली पढ़िए वगैरह तो वो कहते हैं कि अरे महाराज ये सब करेंगे तो काम कौन करेगा? सो ओके उनका भी एक थ्यरी ठीक ही है। किंतु अल्टीमेटली इतना अच्छा काम करने के बाद में यदि आप इसको लिवरेज नहीं करेंगे फॉर ब्रह्म ज्ञान तो फिर क्या अर्थ रहेगा? राइट? और इनके पास में तो क्या है? वो तो अभी रिटायर एज क्रॉस कर दिया था। 70 प्लस एज था। उनके लड़के वगैरह वेल सेटल थे और पैसा इतना आता था और आप तो बीजेपी का है एक बार आपका कनेक्शन बैठ गया पैसों का तो गुजरात में कोई यह नहीं है यदि चैरिटेबल इंस्टट्यूट अच्छा एक बार प्रेस्टीज हो जाता है तो ही कैन इजीली ट्रांजिशन हिमसेल्फ उसको डे टू डे अभी वो टेंशन लेने की जरूरत नहीं है इंस्पाइट ऑफ दैट

प्रश्न: perfection is its own trap. what was virtue yesterday, today it has become a liability, right?

देखिए मैं अपने जीवन में देखता हूं ना आई फील के जैसे मेरा पूरा जीवन ठाकुर ने इंजीनियर किया है। जब मेरे मन में एक्सट्रीम रजस था ही गव मी दैट ओपोरर्चुनिटी टू वर्क दैट आउट। मुझे एक लेजिटमेट अपॉर्चुनिटी नहीं मिलती ना और मैं सीधा डायरेक्ट यहां पे आता आई वुड हैव या तो मैं टिक ही नहीं पाता और यदि बहुत मेहनत करता तो पागल हो जाता। सो दैट अपॉर्चुनिटी आई गव टू वर्क आउट माय रजस एक्टिव रजस। और फिर एक इंटेलेक्चुअल एक मेरा बहुत एक था कि ना यह सब करना ही है। सो ऑल दैट आल्सो वर्क्ड आउट। सो नाउ आई फील सो ट्रंक माने ऐसा नहीं है कि मैंने कोई ब्रह्म ज्ञान ऐसा कुछ मिल गया ऑफ कोर्स नहीं वो तो जन्म जन्मांतर की यात्रा है काम कांचन से मुक्त होना जन्म जन्मांतर की यात्रा है किंतु इन जनरल जो साधु लाइफ कहते हैं ना आई एम रियली एंजॉयंग इट सो ये कभी भी संभव नहीं होता यदि ये दोनों वर्कआउट नहीं हो जाते तो तो वर्कआउट भी करवा दिया एट द सेम टाइम मुझे ट्रैप भी नहीं किया मैंने जो कि देखिए नाम देकर बताता हूं सो जी राइट जो कि रांची के अध्यक्ष थे जिनकी कृपा से ही मैं अभी संघ में हूं। यदि उन्होंने मुझे काम करने का ओपोरर्चुनिटी नहीं दिया होता पता नहीं मैं कहां पे होता। सो उनकी कृपा से ही मैं संघ में हूं। एट द सेम टाइम मैंने में देखा कि ही हैज़ ही इज़ ट्रैप्ड इनू दैट कि एक लेवल पर जाकर के धीरे-धीरे करके फेस ट्रांजिशन होना चाहिए। वह पकड़ के बैठे हैं उसको और उससे उनको कष्ट भी हो रहा है। मेरे पर बहुत विश्वास करते थे। मुझे बहुत कुछ बताते थे जो कि वह और किसी को नहीं बताएंगे। सो मैं देख पा रहा था कि वह उस लेवल पर बैठे हैं कि यदि वह ट्रांजिशन करते हैं अभी तो नेक्स्ट लाइफ उनका मच बेटर होगा। किंतु सम हाउ ही वास स्ट्रैप्ड इंटू दैट कि मुझे रूरल डेवलपमेंट परफेक्ट करना ही है। परफेक्ट करना ही है। यदि मैं उस लूप में फंस जाता तो क्या होता? बाय द ग्रेस ऑफ ठाकुर आई हैव बीन एबल टू फ्री मायसेल्फ फ्रॉम दैट दैट नथिंग लेस देन मिरेकुलस सत्वगुण भी डाकू है [हंसी]

प्रश्न: जैसा कि आप ठाकुर के दैनिक जीवन की चर्चा कर रहे थे, वैसे ही लीलाप्रसंग में कहा गया है कि भक्त की आध्यात्मिक यात्रा भी बदलती जाती है। प्रारम्भ में वह भगवान को ऐश्वर्य, महिमा और चमत्कारों से युक्त रूप में देखना चाहता है। उसे ईश्वर की सर्वशक्ति और दिव्यता आकर्षित करती है।

इसीलिए गोपाल की मां शी इस वन ऑफ द प्यरेस्ट डिवोटी कुछ नहीं है बस गोपाल ही है और कुछ नहीं है नो फिलॉसोफी नो समाधि में कुछ नहीं और इसीलिए स्वामी जी की आंखों में वो आंसू ले आ सकती है। सो गोपाल की मां शी इस एन एपिटोमी ऑफ़ दैट प्योर डिवोशन एंड ऐश्वर्य विहीन डिवोशन। और इसीलिए अपने साधु कहते हैं ना कि लोग स्वामी जी को पढ़कर के रामकृष्ण संघ की ओर आकर्षित होते हैं। फिर ठाकुर के पास आ जाता है। और एट द एंड मां है। सो ऐश्वर्य जो है धीरे-धीरे जाता है। जो उपाधि है वह सब धीरे-धीरे जाती जाती है। फिर एक सिंपल प्लेन डे टू डे लाइफ घटनावली और कुछ नहीं बस कि वो बैठे हैं, खा रहे हैं, बात कर रहे हैं, गप लगा रहे हैं। एज इफ के हम उनके साथ में रह रहे हैं। सो लिविंग वि श्री रामकृष्णा अभी प्योर लीला [हंसी]

प्रश्न: कभी-कभी हम सोचते हैं कि भगवान का दर्शन होना ही आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। परन्तु जब आपने रामलाल दादा का प्रसंग सुनाया, तब यह समझ में आया कि केवल दर्शन प्राप्त हो जाना ही सब कुछ नहीं है। यदि जीवन में चरित्र, शुद्धता और अन्तःकरण का परिवर्तन नहीं आया, तो दर्शन भी स्थायी फल नहीं देता।

देखिए मैं आपको दो कंपेयर करके बताऊं मैं बिल्कुल पहली पहली बार ये सब अट्रैक्शन हुआ था ना तो वो ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी पढ़ा था व्हिच इज फुल ऑफ मिरेकल और एट द एंड ऑफ माय टुडे यदि मैं कहूं आई एम मोस्ट इंप्रेस्ड बाय बाय मदर मां के जीवन में कुछ नहीं है। ना ही विद्या का ऐश्वर्य है, ना ही दर्शन का ऐश्वर्य है, ना ही यह माने सुपर नेचुरल ऐश्वर्य है। कुछ नहीं है। ऐशो बशो खाओ आओ बैठो खाओ। यही है मां के जीवन में। बच्चों के साथ में वो इतना स्नेह, करुणा ये है। तो आज मैं कंट्रास्ट करता हूं। व्हाट वाज़ माय परसेप्शन ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ? कि आपको विज़न होते हैं, मिरेकल होते हैं। समथिंग सुपर नेचुरल ये जो हम वो फॉरेन मूवीस देखते हैं ना मतलब सुपर पावर्स वाले वो सुपरमैन हवा में उड़ता है। सो मतलब व्हाट वी वांट इट सुपर पावर और कम जस्ट प्लेन एक सह हृदय था। राइट? सो दिस इज़ अ ट्रांजिशन ऑफ़ माय लाइफ। मैंने देखा। अब मां को पढ़ने के बाद में वो सब ये मुझे हास्यास्पद लगता है। आज मुझे यदि कोई कहेगा कि यू वांट ये सब चाहिए कि नहीं तुमको? मैं फट करके उसको हटा दूंगा। कुछ नहीं चाहिए उसमें से। [हंसी] मां की तरह एक सिंपल सहृदयता मिली तो भी बहुत है। स्वामी जी ने कहा है ना कि कैरेक्टर इज द बिगेस्ट मिरेकल। बाकी सब जितने भी मिरेकल है आप मनन्ना फ्रॉम हेवन और वगैरह नो डिसरिस्पेक्ट टू टू एनीवन बट आप जितने भी मिरेकल करके दिखाइए। द कैरेक्टर इज द बिगेस्ट मिरेकल। और वो आएगी ना उसके बाद में रियल ट्रंकलिटी आएगी। देखिए मैं बिल्कुल पहला अगेन मैं उस दिनों में कि मैंने बिल्कुल पहली पहली बार ये सब करना प्रारंभ किया था वड़ोदरा में योगानिकेतन है वो एमएस यूनिवर्सिटी का बहुत ही अच्छा इंस्टट्यूट है तो मैं वहां पे योगा सीखने को जाता था टीचर्स ट्रेनिंग कोर्स करने के लिए तो वहां पे सबसे पहली बार योग सूत्र पढ़ा तो वो लोग सिखाते थे और योगसूत्र का जो पहला सूत्र है योग चित्तवृत्ति निरोध तो आई वास सो इंप्रेस्ड कि हां प्यरेस्ट फॉर्म ऑफ मेडिटेशन इज दिस कि योग मन में से सब तरह के विचारों को हटा देना है। ऑटोमेटिक आपका ध्यान समाधि हो जाएगा। ओके वेरी गुड। मैंने कहा कि बस इसी से यहां से ही प्रारंभ करते हैं। चित्तवृत्ति निरोध से प्रारंभ करते हैं। [हंसी] हास्यास्पद कि मैं बैठा हूं। सोच रहा हूं कि चित्तवृत्ति का निरोध कर रहा हूं। कर रहा हूं। उसके बाद में 15 20 मिनट के बाद में पता चला दुनिया भर की जितनी चित्तवृत्तियां है सब उसके भीतर में खेल रही है और [हंसी] म कंप्लीटली जैसे कि बेहोश हो जाती है अपनी ये जो सेंसिंग कैपेसिटी है वो बेहोश हो जाती है पता ही नहीं चलता कहां से यह सब आ गया आधा घंटा एक घंटा चला गया राइट सो उस समय मुझे लगता था दिस इज़ एन इंपॉसिबल टास्क किंतु आज मुझे लगता है कि चित्तवृत्ति निरोध करना है तो कुछ नहीं कैरेक्टर बनाना है यदि कैरेक्टर बनता है तो एवरीथिंग हैप्स ऑटोमेटिकली। खास करके मां का जीवन की यह जो छोटी-छोटी घटनाएं आप पढ़ेंगे ना धीरे-धीरे करके भीतर का सब निर्मल होता जाएगा। सब कचरा धुलता जाएगा। ये सब चित्तवृत्ति निरोध वगैरह आपको कुछ नहीं लगेंगे। आप बैठे हैं शांति से। एग्जैक्टली मैं कभी-कभी कंपेयर करता हूं। यहां शांति से बैठा हूं। 15 20 मिनट चले गए। माइंड इज कंप्लीटली ट्रंकविल। कोई उसमें ये डिस्टरबेंस। एंड आई एम कंप्लीटली अवेयर। ऐसा नहीं कि बेहोश हो गए हैं ना कंप्लीटली अवेयर कि दिख रहा है ट्रंकलिटी इज देयर सो और ऐसा नहीं कि मैं कोई बहुत ज्यादा योग प्रैक्टिस ना की कुछ कर लिया है मैं अपने जीवन की तपस्या यदि कहूं तो रांची में जो कर्म योग किया वो और फिर मैंने ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ा वो माने जब मैं एडिटर था दीज़ आर द टू तपस्या जो कि मैंने अपने जीवन में किया है और इसी ने मेरे मुझे लगता है कि ज्यादातर संस्कारों को काट दिया है। ओम