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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्रकाश और छाया के बीच : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 4 oct 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः तो तेलो भेलो के मैदान में मां शारदा का जो अपने डके बाबा के साथ में मुलाकात हुई उसका विवरण उसका वर्णन हम लोग पढ़ रहे थे तो अभी आगे देखते हैं कि क्या होता है कि कल तक हमने देखा कि मां ने जब ऐसा कहा कि मैं आपकी बेटी हूं और आपका जमाई दक्षिणेश्वर में रहता है और मैं जमाई के पास जा रही हूं और मेरे साथी मुझे छोड़ कर के चले गए हैं और मैं मैं मुझे लगता है कि मैं रास्ता भूल गई हूं अभी मैं बड़ी विपद में पड़ी हूं और यदि आप मुझे सहाय करके दक्षिणेश्वर पहुंचा देंगे तो आपके जमाई आपका बड़ा ही खातिर बर्दाश्त करेंगे आपकी बड़ी ही आगत स्वागता करेंगे तो यह सुनकर के व जैसे कि वह डकेट था पत्थर दिल इंसान होगा क्योंकि डके की करके नर हत्या करके जो लोग अपना जीवन चलाते हैं तो मनुष्यों के प्रति उनकी एक जो कहेंगे कि सहानुभूति वह बड़ी कम होती है किंतु फिर भी इस पत्थर दिल इंसान का हृदय पिगल गया और फिर उन्होंने कहा कि पीछे में ही मेरी स्त्री भी आ रही है और उनकी स्त्री ने भी वहां पर आकर के मां को कहा कि बिटिया तुम डरो मत हम लोग तुमको यहां से ले जाएंगे और फिर वहां एक गांव में गए गांव में स्त्री ने अपने वस्त्रों से मां के लिए बिछाना बनाया इस डकेट ने एक दुकान में से कुछ मुरमुरा वगैरह लाकर के मां को खिलाया और जब तक मां विश्राम कर रही थी तब तक यह डकेट अपने हाथ में एक लाठी रख कर के वहां पर मां की रक्षा करने के लिए खड़ा था कि कोई आकर के मां के विश्राम में व्याघात ना पहुंचाए कोई खलल ना पहुंचाए और फिर दूसरे दिन सुबह को देखा कि मां के संगी जो मां को छोड़ कर के चले गए थे वह मां को खोजते खोजते यहां पर आ पहुंचे और मां ने भी उनको कहा कि किस तरह से इन डकेट बाबा ने उनकी जीवन की रक्षा की थी उनको रात को मार्गदर्शन दिया था और यहां पर गंभीरानंद जी महाराज साथ-साथ में यह भी कहते हैं कि उस समय की जो परिस्थिति थी नात जात यह रूढ़ चुस्त उसके अनुसार तो यह गांव वासनी जो थी मां के साथ में जो गंगा स्नान के लिए जा रही थी उनमें कोई ब्राह्मण भी होंगी और ब्राह्मण उन्होंने सोचा भी होगा कि मां शारदा तो स्वयं है ब्राह्मण कन्या और यह डके तो जो है वह तो है निम्न जाति का तो यह डकेट इनके बाबा कैसे हो गए मां शारदा इनकी बिटिया कैसे हो गई यह सब हो सकता है कि संकुचित विचार इनके मन में उस समय आए होंगे बाद में भी हमने देखा कि जयराम बाटी में किस तरह की मानसिकता चलती थी एक एक सुंदर कहानी है अ मां के घर में एक ब्राह्मणी एक महिला को खाना बनाने के लिए रखा था तो अभी इनका तो जिस तरह से जो ब्राह्मण होते हैं जो खाना बनाते हैं रसोइए का काम करते हैं उनको तो बड़ी ही सावधानी से सा चेती से किचन में काम करना पड़ता है रसोई में यदि किसी भी चीज को स्पर्श कर ले जो कि अस्पृश्य है तो इमीडीएटली स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहनने पड़ेंगे तो अभी इस ब्राह्मणी महिला जो कि यह रसोई बना रही थी उसने एक दिन रात को आकर के मां को कहा कि जो गांव में वह जो मैदान में से जो आ रही होगी मां के घर पे तो इस एक कुत्ते को उसने स्पर्श कर लिया है कुत्ता ना कि ऐसा कुछ ऐसा कुछ अस्पृश्य चीज उसने स्पर्श कर लिया है तो इसलिए अभी उसको स्नान करना पड़ेगा तो मां ने कहा अभी बारिश का मौसम है अभी इस समय में रात के समय में स्नान वगैरह करोगी तो बीमार हो जाओगी सर्दी जुकाम हो जाएगा एक काम करो तुम एक सिर्फ एक गंगाजल अपने सर पर छिटक दो तो उसी से काम हो जाएगा तो अभी उसने कहा कि अरे मैं गंगाजल कैसे छिटक ने से यह स्पर्श का जो गुनाह है अस्पृश्य चीज को स्पर्श करने का बिना स्नान के नहीं जा जाएगा सिर्फ गंगाजल छिटक में से नहीं होगा तब मां ने कहा तो एक काम करो मुझे स्पर्श कर लो मुझे स्पर्श करोगी तो तुमने जो चीज को अस्पृश्य चीज को स्पर्श किया है वह सब तुम्हारा जो मलिन होता है वह धुल जाएगा तब कहीं जाकर के इस ब्राह्मणी को पता चला व रसोई बनाती थी कि कितनी पवित्र देवी मूर्ति के सामने वह खड़ी है उनका वह कार्य कर रही है तो मां के जीवन में यह इतना सब कुछ नहीं था मां को पता था कि उदा हृदय रखना चाहिए यह नात जात यह रूढ़ी चुस्त यह सब था शायद एक समय जरूरत होगी इस्लामिक आक्रमण हो रहे थे भारत के ऊपर में उस समय स्त्रियों की रक्षा करने के लिए समाज की रक्षा करने के लिए हो सकता है कि यह सब चीजें उस समय बनी हो किंतु आज के समय में आधुनिक समय में यह सब चीजों की आवश्यकता नहीं तो मां किंतु दो चीज है मां हालांकि यह सब चीजों को अपने हृदय में स्थान नहीं देती थी कि किंतु बाह्य रूप से इन सब का पालन भी करती थी क्यों क्योंकि समाज में रहना है समाज को यदि सुधारना है अपग्रेड करना है तो समाज में रह कर के ही होगा समाज के सामने और समाज के ऊपर में आघात करके आप समाज को कभी भी उसको आप रिफॉर्म नहीं कर पाएंगे तो इसीलिए यह गंभीरानंद जी महाराज ने कहा दूसरी भी एक बात हमने कल देखी थी कि किस तरह से यह निम्न जाति और उच्च वर्ण निम्न वर्ण उच्च वर्ण उस समय के हिसाब से इन दोनों में मां और यह बेटी का जो यह संपर्क बना यह एक एक भविष्य का आभास दे रहा है दूसरे जितने भी देश है यह चाइना है रशिया है इवन जर्मनी है वहां पर कितना एक रक्तपात हुआ वहां पर समाज में सुधार करने के लिए भारत में समाज की उन्नति के लिए आधुनिक देश के गठन के लिए हमको रक्तपात नहीं करना पड़ा है न वर्ण वालों ने उच्च वर्णों का कत्ल करके उनकी संपत्ति हड़प नहीं ली है यह सब जैसे कि दूसरे देशों में हो रहा था भारत में यह सब नहीं हुआ कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन ना सोशलिस्ट रेवोल्यूशन वगैरह यहां पर नहीं हुए हमारा देश वैसे इकोनॉमिकली सोशलिस्ट है किंतु हम लोग पॉलिटिकली या तो फिर सोशली सोशलिस्ट या कम्युनिस्ट नहीं है तो यह सब मां ठाकुर और स्वामी जी उनके आगमन से यह सब भविष्य के भारत की यह नीव रखी जाती है प्रत्येक घटनाएं देखिए प्रत्येक घटना का एक गभीर तात्पर्य है प्रत्येक घटना के माध्यम से हमको यह पता चलेगा कि यह भविष्य का भारत कैसा होने वाला है तो अभी इस कहानी में और भी है हम थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं विकास उन्मुख सु पवित्र मातृत्व शक्ति एवं दशर निष्ठुर तार संघर्ष स्थले मातृत्व की रूपे विजय लाभ करी लो अर्थात की विकास उन्मुख मातृ शक्ति सु पवित्र मातृशक्ति अर्थात कि मां की मातृत्व शक्ति जो है वह धीरे-धीरे करके वह खिल रही है व धीरे-धीरे करके प्रकाशित हो रही है और यह मां की मातृत्व सु पवित्र मातृत्व शक्ति धीरे-धीरे प्रकाशित हो रही थी उसमें एक निष्ठुर डकेट इन दोनों के संघर्ष में किस तरह से मातृत्व शक्ति का विजय हुआ यह घटना इस प्रमा इस बात का प्रमाण है देखिए कि जब तक ठाकुर थे तब तक मां अपने को बड़ी छुपा छुपा करके रखती थी किसी भी पुरुष के सामने नहीं जाएगी जो स्त्री भक्त है उनके अलावा और किसी के साथ में बात नहीं करेगी और वह भी जो जिनको की ठाकुर मां के पास में नौबत में भेजते थे उन्हीं के साथ में बात करना सबके साथ में बात नहीं करना किंतु धीरे-धीरे करके जो सबसे महत्त्वपूर्ण घटना हमने देखी कि रामकृष्ण संघ की वह है सड़सी पूजा तो सड़सी पूजा के बाद में दो चीजें आरंभ हुई सर्वप्रथम तो ठाकुर ने शक्ति का सहाय लेकर के आसरा लेकर के धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया कोलकाता में दूसरा कि मां के भीतर में जो मातृत्व शक्ति थी जगन मातृत्व शक्ति भगवती मां स्वयं थी उस बात का आभास उस दिन से धीरे-धीरे करके प्रकट होना शुरू हुआ तो अभी जैसे कि वह एक सुंदर घटना है कि एक बार मां एक खाने का थाली लेकर के ठाकुर के पास में जा रही थी वैसे जनरली ऐसा होता था मां खाना बनाएगी नबत में दक्षिणेश्वर में और ठाकुर के पास में लेकर के जाएगी तो इसी तरह से एक दिन मां खाने का थाली लेकर जा रही थी एक स्त्री भक्त ने आकर के कहा कि मां मुझे दे दो मैं यह थाली ठाकुर के पास में ले जा हूं तो मां ने कहा ठीक है तुम ले जाओ और उस महिला ने जाकर के ठाकुर के सामने वह थाली रख दी और फिर वहां से चली गई तो फिर ठाकुर ने मां को बुलाया मां को बुला कर के पूछा कि अरे तुमने उस स्त्री को यह मेरे खाने क्यों छूने दिया तुमको पता नहीं है वह दुष्चिंता नष्ट हो गया है और किसी के साथ में पर पुरुष के साथ में रहती है ऐसा तुम जान कर के भी उसके हाथ में मेरे खाने का थाला दिया अभी उसका स्पर्श किया हुआ भोजन में कैसे आहार करूंगा तो मां ने क्या उत्तर दिया था कि कोई मां बोल कर के आके मेरे पास में कुछ मांगेगा तो मैं बिना दिए बिना नहीं रह पाऊंगी तो मां के पास में मां बोलकर के हम जो कुछ भी चाहेंगे जो कोई भी आशीर्वाद मांगेंगे मां हमको वह देगी ही देगी तो यह जो मातृत्व शक्ति है यह मातृत्व शक्ति का धीरे-धीरे उन्म चन हो रहा है धीरे-धीरे यह शक्ति प्रकाशमान हो रही रही है और इसका यह यहां पर उदाहरण हमको मिलता है कि किस तरह से एक कठोर हृदय डकेट मां की मातृत्व शक्ति के सामने वह झुक जाता है आलो अंधारे संग्रा में आलोर प्रभुत्व की रूपे प्रतिष्ठित होया भविष्यत मानव के नूतन आशा पथर संधान दिलो आलो और अंधार प्रकाश और अंधकार इन दोनों के संग्राम में किस तरह से प्रकाश की विजय हुई और भविष्य के मनुष्य को उसने प्रेरणा दी उसको रास्ता दिखाया देखिए दशहरा आ रही है सामने और दशहरा यह उत्सव है कि प्रकाश और अंधकार का जब संग्राम होता है तो भगवान राम की ही विजय होती है भगवान राम की रावण के ऊपर में विजय वो ये दशहरा के दिन तो यहां पर भी देखिए कि प्रकाश और अंधकार इन दोनों के बीच में हुआ युद्ध और प्रकाश की हुई विजय भविष्यत मानव के नूतन आशा पथर संधान दिलो भविष्य के मनुष्य को नए आशा पथ का आशा की किरण का उसने संधान दिया उसने उसको यह मार्गदर्शन दिया ताहर इंगी और शीतो ग्राम मने उभा तो होलो की ना तहारो तना अमरा पाई ना यह बात का महात्म्य की प्रकाश की विजय हुई है यहां पर यह बात क्या यह अशिक्षित बाकी जो सब महिलाएं थी मां की संगिया उनके मन में इस बात का थोड़ा सा भी रेखा पात हुआ होगा कि भी नहीं इस बात से हम लोग अनजान है देखिए कि आप कोई एक अपराधी मनुष्य होता है तो आप यदि समाज में अपराध को रोकने के लिए 1000 कानून आप चालू कर सकते हैं किंतु आप अपराधी को कभी भी नहीं रोक पाएंगे आज अमेरिका की परिस्थिति देखिए कि प्रत्येक स्कूल में हर कुछ कुछ दिनों में सुना जाता है कहीं यहां पर इस स्कूल में शूटिंग हुआ तो कहीं उस स्कूल में शूटिंग हुआ तो अभी आपको लगेगा कि इतना सारा रूल्स एंड रेगुलेशन है इतना अच्छा पोलिस सिस्टम है किंतु फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है अपराध कहीं पर भी वह चाहे अफगानिस्तान हो ना कि अमेरिका हो ना कि भारत हो ना कि श्री लंका जापान यूरोप कुछ भी हो आप अपराधी को कानून बना कर के कभी भी नहीं रोक पाएंगे जब तक यह यहां पे मैं यहां पे एक वी आई है विवेकानंद इंस्टिट्यूट ऑफ एक्सीलेंस हमारा जहां पर कि हम लोग कंप्यूटर क्लास सिखाते हैं कंप्यूटर वगैरह सिखाते हैं तो प्रत्येक दिन शाम को मैं वहां पर जाता हूं क्लास लेने के लिए ठाकुर महा स्वामी जी के बारे में कुछ बताऊंगा योगा प्राणायाम ध्यान वगैरह कुछ सिखाऊंगा तो मुझे आते-आते संध्या हो जाती है अभी मैं जिस रास्ते से जाता हूं वहीं रास्ते में ही एक फैमिली एक बैठा होता है भिखारियों का भिक्षुक का अभी छोटे-छोटे दो बच्चे हैं उनकी उम्र मुश्किल से एक डेढ़ साल होगी व अभी खड़ा होकर के चल भी नहीं पा रहे हैं इतना छोटा एक बच्चा सड़क के किनारे बैठा है उसके पास में पहनने को कपड़े भी नहीं बाल भी उसे उसके कैसे हैं वो मतलब यह लड़के का जीवन आप देखिए कि यहां पर इतने सारे लोग रास्ते से जा रहे हैं किसी की भी नजर इस तरह के गरीब लोगों पर नहीं पड़ती कि चलो इन लोगों को हम थोड़ी बहुत सहाय करें यह जो आज भारत में जद यह निष्ठुर ता भारत की क्या कोई भी देश में देखिए कि जो अनफॉर्चूनेटली शक्ति कहो ना कि सामाजिक परिस्थिति कहो आर्थिक राजनीतिक परिस्थिति कहो उन्होंने इस व्यक्ति को आगे बढ़ने में सहाय नहीं की है ऐसे जो अनफॉर्चूनेटली सहानुभूति होनी चाहिए यह सहानुभूति की मदद से ही इनका हृदय जो है वह विकसित होगा वरना इस तरह से फुटपाथ पे ख बड़े हुए हैं गरीबी में बड़े हुए हैं जो भी आएगा जाएगा उसके सामने हाथ लंबा करके भिक्षा मांगना बचपन से ही जिन्होंने सीखा है वह व्यक्ति यदि बड़ा होकर के अपराधी हो जाएगा तो फिर उसमें उसका बेचारे का क्या कसूर है यह जो अमजद बोलकर के जो एक डाकू मां के पास में बाद में आता था तो इस अमजद की जो बैक स्टोरी जिसको कहते हैं ना कि उसके गांव की कहानी इसके बारे में मैंने कहीं पर पढ़ा था उसके गांव में कोई रोजगार वगैरह जो था सबका बंद हो गया था अभी मुझे वह डिटेल याद नहीं आ रही है बहुत दिनों पहले पढ़ा था मैं किंतु इस तरह से था कि वह जो कुछ गांव थे उनका जो रोजगार वगैरह था वह सब उस समय बंद हो गया था तो अभी आजकल की तरह मॉडर्न अपना गवर्नमेंट तो नहीं था कि चलो कोई ना कोई स्कीम लगा कर के ना वेलफेयर योजना करके उनके कोई सहायता करें उन लोगों के पास में उपाय ही नहीं था डके करने के अलावा तो देखिए कि जब समाज की सहानुभूति नहीं मिलती है समाज की सहाय नहीं मिलती है तो यदि कोई व्यक्ति अपराधी होगा तो उसमें हम दोषी किसको ठहराए गे कानून बना कर के आप अपराध को कभी नहीं रोक पाएंगे अपने हृदय में आपको मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा जिसको कि हम कहते हैं चित्त प्रसाद इतने सुंदर गुणों को विकसित करना होगा कि दूसरों की कष्ट और दूसरों की अ यह जो है कि असुविधा देख कर के हमको खुद को हृदय में ऐसा हो कि चलो हम उनको थोड़ी बहुत म मदद कर ले हो सकता है कि मेरे पास में देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है तो किंतु फिर भी थोड़ा बहुत तो मैं ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो कि कुछ भी नहीं दे सकता देने की जिसकी इच्छा हो तो वह हमेशा कुछ ना कुछ उपाय कर लेगा आप कितना धन या कितना कार्य आप दान में देते हैं उसका बात नहीं है आप किस महे छा से देते हैं आप किस इंटेंशन से देते हैं इस बात का बड़ा एक प्राधान्य है तो हम सबको यह एक बात याद रखनी चाहिए कि मां की तरह हम लोग भगवती स्वयं शायद नहीं है किंतु फिर भी यह मातृत्व भाव हम सब में होना चाहिए जो असहाय है जिसको कि सहाय की आवश्यकता है उसको कुछ ना कुछ सहाय हम अवश्य करें तो यहां पे भी यह जो मातृत्व शक्ति का मां के भीतर में उदय हो रहा था इस मातृत्व शक्ति ने एक अपराधी डकेट के मन को किस तरह से प र में से पिघल करके पानी बना दिया इस घटना का भविष्य का जो तात्पर्य है यह गांव वासी महिलाएं शायद कैसे समझेगी वे लोग तो यही देखेगी कि यह ब्राह्मण है और यह दूसरे वर्ण का है यह उस वर्ण का है यह इस जाति का है इस तरह की जो एक क्लासिफिकेशन जो होता है अपने मन में जदी होता है तो उसको हम को हमेशा के लिए दूर कर देना है आमरा निरपेक्ष दृष्टा हिसाबे एट सुधु देखीते पाई ज श्री मायर डाकत बाबा और मां एवं कामर पुकुर बंधु बांधव और आयो शोजोन से दिन तारकेश्वर शिव मंदिर सनि कटे एकही परिवार भुगतो नर नारीर मतो अलाद सकारे रंधन और भोजना आदि समाप्त कोरी लेन हम तो निरपेक्ष दृष्टा के रूप में सिर्फ इतना देख सकते हैं कि श्री मां श्री मां के ये डकेट बाबा और डकेट मां और यह गांव कामर पुकुर जयराम बाटी की यह सब गांव वाले इन सब लोगों ने मिलकर के तारकेश्वर मंदिर के सामने में वहीं पर एक ही परिवार जन की तरह साथ में बैठ कर के आहार किया था भोजन भी बनाया था रंधन अर्थात कि आहार पकाया भी था और भोजन अर्थात कि आहार ग्रहण भी किया था एवं तार पर वैध बाटी अभिमुख रवाना हो लेन और आहार करके एक एक ही परिवार के जन है इस तरह से आहार करके सब लोग वैद्य वाटी नामक जो जगह है वहां पर जाने के लिए सब लोग ने प्रस्थान किया एक रात्रे मध्य श्रीमा तहर डाका माता-पिता अच्छा देखिए यह जो गौरांग महाप्रभु का यह जो वैष्णव संप्रदाय है वैष्णव संप्रदाय के बारे में भी ऐसा कहा जाता है कि जितने भी कोई भी वर्ण का होगा कोई भी जाति का होगा इन लोगों के भीतर में कभी भी किसी भी तरह का भेद नहीं रखा जाता साथ में मिलकर के बैठ कर के आहार वगैरह कर सकते हैं और इसीलिए मैंने कहीं-कहीं पर पढ़ा भी है कि यह जो बंगोल संपूर्ण रूप से इस्लामीकरण इसका नहीं हो गया इसके पीछे में यह गौरांग महाप्रभु की यह जो वैष्णव भावधारानी कि किसी साधु ने भी कहा था एक बार कि हम लोग तो सोचते थे कि यह वैष्णव अर्थात कौन तो जिसको कि समाज में से निकाल दिया जाता है जिसकी समाज में कोई उसकी यह स्थान नहीं रहता वे लोग जाकर के यह वैष्णव वगैरह बनते हैं तो जद जिसको समाज में से आप निकाल देंगे या तो फिर जिसको आप धुत का करेंगे वह जद दुश्मन के साथ में मिल जाएगा इस बात में फिर और क्या आश्चर्य है स्वामी जी ने क्या कहा था वेदांतिका ब्रेन एंड इस्लामिक बॉडी इस बात का अर्थ क्या है अखंडानंद जी को एक सपना आया था देखा कि स्वामी जी एक बड़े ही बलिष्ठ मुसलमान फकीर के रूप में वह एक जगह से जा रहे हैं तो अखंडानंद जी ने स्वामी जी को पूछा कि क्यों स्वामी जी इस तरह का वेष क्यों धारण किया है तो स्वामी जी ने कहा इस समय में यही अर्थात कि इस समय में इसी बात की आवश्यकता है वेदांतिका ब्रेन अर्थात कि आध्यात्मिकता दर्शन शास्त्र यह अद्वैत वेदांत इन सब चीजों में हमारा हिंदुइज्म जो हिंदू धर्म है वह सर्वश्रेष्ठ है आध्या अमिक विज्ञान में किंतु यह जो समाज में ऐक्य की स्थापना करनी है समाज को सशक्त करना है भीतर में भीतर से तो उसके लिए हमको जो इस्लाम का कांसेप्ट है कांसेप्ट ऑफ ब्रदरहुड वह एक बार जिसने यह धर्म अंगीकृत कर दिया उसमें फिर वह बड़े से बड़ा शेख क्यों ना हो ना कि निम्न से निम्न दर्जे का भिक्षुक क्यों ना हो दोनों साथ में बैठ कर के आहार कर सकते हैं यह जो ऐक्य है यूनिटी है ब्रदरहुड है व हमको हिंदू धर्म में लाना है तो तो इसी कारण से स्वामी जी ने यह बात कही थी और स्वामी जी ने यह सब बातें जिस समय कही उससे कहीं पहले मां ने इस सब चीजों का सूत्रपात कर दिया था स्वामी जी को जगत प्रसिद्ध घटना कि एक जगह से जा रहे हैं वो एक व्यक्ति बैठ कर के वो चिलम फूंक रहा है वो जो स्मोकिंग पाइप जिसको कहते हैं तो स्वामी जी तो स्मोकिंग का बड़ा ही शौक था तो उन्होंने कहा भैया उसके साथ में बैठ कर के मुझे भी दो ये चिलम ने को तो वो व्यक्ति बड़ा संकुचित होकर के कहा कि मैं तो निम्न जाति का हूं मैं मेरी चिलम आपको कैसे दूंगा तो स्वामी जी भी सोचे अच्छा ठीक है चलो खड़े होकर के जा रहे हैं थोड़ा सा दूर गए फिर उनको लाइट हुई कि अरे भाई मैं ही जद इस तरह से जाति वर्ण में मानने लगूंगा तो फिर बाकी को तो मैं क्या कुछ बताऊंगा तो फिर जा कर के वापस बैठे और जोर करके उसके हाथ से छिल छीन कर के उस उन्होंने स्मोकिंग किया और फिर स्वामी जी के गुरु भाई ये भी कहते थे बाद बाद में स्वामी जी की वो स्मोकिंग करने की वो जो हैबिट है इतनी बुरी है कि वो निम्न वर्ण के पास में से भी छीन करके स्मोकिंग कर लिया तो जो भी है ये जो स्वामी जी ने नत भारत भविष्य के नए भारत के बारे में जो कुछ भी बताया है इन सभी चीजों का सूत्रपात प्रारंभ ठाकुर और मां के जीवन में ही हम देखते हैं कि किस तरह से हो चुका है तो यहां पर भी यह कामर पुकुर के जो ग्रामवासी है जो जितने भी चाहे रूढ़ी चुस्त हो गए उन्होंने मां शारदा ने सबने साथ में मिलकर के डकेट मां और बाबा के साथ में बैठ कर के आहार किया और फिर वहां से रवाना हुए एक रात्रे मध्य श्री मां और तहर डाकत पिता माता परस्पर के यतो अपनार कोरिया लया लेन ज विदाई काले तीन जनेरी चखे अजस्र अश्रु बरते थाकि लो विदाई के समय मां शारदा और डकेट मां और बाबा अपने इतने आत्मीय हो चुके थे कि जब विदाई लेने का समय आया तो सभी की आंखों में अश्रु वर्षण होने लगे अनेक दूर पर जंतो श्री मां के आगाया दते दते बागदी रमणी खेत्रो होते अनेक गुली कोड़ाई सुटी तुलिया व्याकुल भावे कादी ते कादी ते उहा तहर अंचल बांध काटर स्व बोली लो मां शारदा रात्रे जखन मुड़ी खाबी तखन एक गुली दिए खाश मां को कितनी ही देर तक वो उनको वो साथ में ले गए और फिर फिर यह जो बागदी अर्थात की डकेट मां थी उसने रोते-रोते फिर वहां पर खेत जो थे वहां प ये जो ग्रीन पीस उसको त चुन कर के मां को उनके आंचल में बांध कर के कहा मां शारदा बेटिया तुम जब रात को यह मुरमुरा खाती हो तो इसके साथ में इसको भी मिला कर के खाना अशेष श्री मां दशु पिता माता के सुविधा मतो दक्षिणेश्वर जाया ताहा के देखिया आशीर्वाद कथा स्वीकार कोराया कोनो प्रकारे ताहा दिख के छड़िया चोली लेन आखिर में श्री मां ने अपने दस्य पिता और माता के पास में यह बात स्वीकार करवाई कि कभी ना कभी तो यह लोग दक्षिणेश्वर में आएंगे और ठाकुर का दर्शन भी करेंगे मां के साथ में मुलाकात भी करेंगे और ऐसा करके कैसे भी तरह से उनका साथ छोड़ कर के दक्षिणेश्वर जाने के लिए कोलकाता जाने के लिए आगे बढ़े तहरा नाना बद द्रव्य लैया श्री मा के देखीते मध्य मध्य को एक बार दक्षिणेश्वर उपस्थित होया छलो और ये दशु दंपति भी कुछ कुछ भेंट वगैरह लेकर के मां और ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर में कई बार जाकर के उपस्थित भी हुए थे श्री रामकृष्ण मायर मुखे शकल कथा सुनिया ही समय ताहा दिगर शहीद जा मातारिकी आदिक के परितृप्ति कोरिया लेन ठाकुर ने भी श्री राम कृष्ण ने भी मां के पास में यह पूरी कहानी सुनी और जब भी यह मां बाबा दक्षिणेश्वर आते थे तो बिल्कुल जो उनके जमाई होते हैं उसी तरह से उनके साथ में ठाकुर ने व्यवहार किया था और उनको परितृप्ति किया था यहां पर लिखा है आदर आप्या यान जब जमाई को स्त्री के अपनी पत्नी के घर में जाता है तो पत्नी के मां और पिताजी उनको कितना आदर सत्कार करते हैं उनका कितना सन्मान होता है तो यह जमाई का अधिकार होता है कि वो अपने शसुर और सास के सामने यह इस तरह का सन्मान वह मांग सकता है तो ठाकुर भी इस तरह से जमाई होता है उसी तरह से वह मां बाबा के साथ में डकेट मां बाबा के साथ में उन्होंने इस तरह का व्यवहार किया था और इस व्यवहार से उनको संतुष्टि भी हुई थी समस्त घटना ती भक्तो दग निकट वर्णना कररिया श्रीमा एकटी अर्थपूर्ण कथा उहा शेष कोरिया लेन यह समग्र घटना मां भक्तों के सामने वर्णन करके एक बड़े ही इंपोर्टेंट बात अर्थपूर्ण बात से इस कहानी को समाप्त की थी एमन सरल सच्चरित्र होले व अमार डाका बाबा आगे कोखोनो कोखोनो डाका ज कर छलो एक कथा किंतु आमार मने होय मने इतने सरल और सत चरित्र होने के बावजूद मेरे डाका पिता आगे कभी-कभी डके करते थे यह बात मुझे ठीक मने यह बात मुझे ऐसा लग रहा है कि आगे उन्होंने कभी-कभी डकती की होगी अर्थात तेलो भेलोर माठ संध्याकालीन सेही लोम होर सण घटना टके तिनी कोनो दिने एकटा साधारण व्यापार बोलिया ग्रहण करेना अर्थात कि तेलो भेलो के मैदान में संध्या के समय एक जो भयावह घटना जो हुई थी एक डाकत बाबा के एक डकेट के साथ में मुलाकात इस घटना को उन्होंने कभी भी एक साधारण घटना बोलक के माना नहीं था कुछ भी हो सकता था उस दिन रात को किंतु देखिए कि मां भगवती स्वयं और यहां पर मां कहती है कि डकेट बाबा जो थे वह सरल थे और सत चरित्र थे तो ये दोनों ने मिलकर के इस घटना को बड़ा ही एक पवित्र एक आकार दिया है भविष्य के आने वाले भरत की एक नीव यहां पर डाली गई है एक फाउंडेशन यहां पर रखा गया है दशु वृत्ति परायण डाका दंपति कठोर मन केमोन कोरिया जे अ तोटा द्रवी भूतो होया छलो ताहा निर्णय कोरा अमाद ओषध ये दस्यु दंपति का जो कठोर हृदय है इतना सहजता से द्रवी भूत कैसे हो गया था यह ठीक करना हमारे लिए असाध्य है होय तो अनन्य साधारण होय तो मायर अनन्न साधारण सरलता अश्रुत पूर्ण अश्रुत पूर्व पवित्रता तहा दे हृदय जोय कोरिया छलो हो सकता है कि मां की सरलता और उनकी पवित्रता इस सरलता और पवित्रता ने ही उनके हृदय को विजय उनके हृदय को जय किया होगा होई तो बाहार पश्चात कोनो देवी शक्तियो छीलो हो भी सकता है कि इसके पीछे कोई देवी शक्ति भी हो सकती है य द्वितीय कल्पना भित्ति हीनो न है य जो इसके पीछे इस घटना के पीछे देवी शक्ति हो सकती है यह बात बिल्कुल जिसको कहेंगे कि यह नहीं है हवाहवा में यह बात नहीं कही गई कारण श्री मां कथा छले कोनो कोनो भक्त के जहा बोलिया लेन तहा ईते इ हार आभास पावा जाए क्यों क्योंकि माने बात बात में जिस भक्त को किसी किसी भक्त को जो कहा था इस बात से यह दिव्यता का एक संध न दिव्यता का एक प्रकाश इस घटना के पीछे होगा यह हम अनुमान कर सकते हैं भक्तो रा तहर श्री मुखे सुनिया लेन तिनी एक बार बागदी दंपति के जिज्ञासा कोरिया लेन भक्तों ने मां के पास में सुना था कि मां ने एक बार इस दस दंपति डकेट मां और बाबा को पूछा था तुम्ही तो तोमरा आमा केतो स्नेहो करो केनो ग आप लोग मुझे इतना स्नेह क्यों कर रहे हैं तो हारा उत्तर दिया लेन उन्होंने उत्तर दिया था तुम तो साधारण मानुष नो आमरा तो मा के काली रूपे देखे जीी तुम तो कोई साधारण मनुष्य नहीं हो हमने तुमको काली के रूप में देखा है मां बाधा दिया बोली लेन माने बीच में ही उनको रुक करके कहा शकी को तोमरा एटा की देख ले अरे आप लोगों ने यह तो क्या देख लिया तारा इ हाते निरोस तो ना होया विश्वास पूर्ण अनु जोग सहकार बोली लेन वो लोग माने जब बाधा दे कर के कहा उनके रोक कर के कहा कि अरे आप ये क्या बात कर रहे हैं आपने मुझ में मां काली का दर्शन किया ऐसा कैसे संभव है तो इस बात से निरस्त ना होकर के इस बात से इस बात को रोक ना करके उन्होंने आगे कहा विश्वास पूर्ण अनुयोग सहकार बली लो बलि लन अर्थात कि बड़े ही विश्वास पूर्वक बड़ी ही मिनती पूर्वक इन्होंने कहा ना मा आमरा सतो ही देखे छी ना मा हम लोगों ने सत्य सत्य देखा है आमरा पापी बोले तुम रूप गोपन करछ हम लोग पापी है यह मान कर के तुम अपना सही स्वरूप छुपा रही हो श्री मां उदासीन भावे बोलिया गले की जानी आमी तो किछु जानी ना माने बड़े ही उदासीनता पूर्वक कहा क्या पता मुझे तो इसके बारे में कुछ नहीं पता देखिए कि मां एक तरह से भगवती है भी सही दूसरी ओर अपना यह जो स्वरूप है उसको भी किस तरह से छुपाना चाहती है यहां पर डकेट मां बाबा का सरल सहजता पूर्ण एक विश्वास था एक भरोसा था मां के ऊपर में तो मां ने इस बात की और कोई इस इसके आगे और कोई बात नहीं की किंतु एक बार की घटना है कोई कोई लोग होता है ना कि प्रशंसा कुछ ज्यादा ही करना चाहते हैं हो सकता है कि वे लोग कुछ प्राप्त करना चाहते हो सामने वो खुशामद करके या जो कुछ भी है तो एक महिला ने एक दिन आकर के मां को ऐसा कहना शुरू किया कि मां तुम तो भगवती स्वयं हो तुम तो जगदंबा स्वयं हो तो यह सब बातों से नाराज होकर के मां एकदम बोल उठी जाओ जाओ तुम क्या बात करती हो उन्होंने अर्थात कि श्री राम कृष्ण ने दया करके अपने चरणों में आश्रय दिया है वही तो इससे ज्यादा कुछ नहीं बेरो वेखन थे के निकलो यहां से ऐसा करके मां नाराज हो गई थी तो देखिए कि मां हे भगवती किंतु स्वीकार कब करेगी जबकि वह देखेगी कि सामने वाले में कितनी सरलता पवित्रता और सिंसियर है यहां पर बागदी दंपति के भीतर में भी वह सरलता सहजता थी बोलकर के माने इस बात का ज्यादा विरोध नहीं कहा किया बस सिर्फ इतना कहा कि क्या पता मुझे मुझे तो इसके बारे में कुछ पता नहीं हालांकि पता सब है किंतु जब तक मनुष्य रूप में मनुष्य भाव में इस जगत में लीला कर है तब तक यह मनुष्य का जो आवरण है वह बनाए रखना पड़ेगा यदि देवी अपव उनके भीतर जो है वह स्वयं प्रकाशित होना शुरू हो जाए तो फिर हम लोग यह क्या बोलना शुरू कर देंगे पता है कि अच्छा ठीक है दो चीज है पहले तो है कि हमको आध्यात्मिक तपस्या साधना करने की जरूरत नहीं क्यों क्योंकि जिस तरह की तपस्या मां ठाकुर स्वामी जी वगैरह ने की है वे लोग हम कैसे कर पाएंगे वह तो भगवान शिव ना कि भगवान विष्णु ना कि भवती के अंश स्वयं है तो वे लोग करें तपस्या हमसे तो हो नहीं पाएगा यह एक चीज होगा दूसरा कि हम अपने यह जो समाज है अपनी य अर्थव्यवस्था है अपना यह देश है उसके निर्माण के लिए कटिबद्ध नहीं होके दल बद्ध होकर के जो एक सत्य की शक्ति है उसको हम प्रकट नहीं करेंगे हम लोग सब समय सोचेंगे कि कोई भी राक्षस प्रकट होगा यह रावण है ना कि कंस है ना कि शुंभ निशुंभ है तो उसके दमन के लिए भगवान स्वयं अवतरित हो जाएंगे हमको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है तो ऐसा हाथ पर हाथ रखकर जद बैठे रहेंगे आध्यात्मिक जीवन में भी और जागतिक जगत में भी इस संसार में भी तो हम लोग हमेशा पराजित होते ही रहेंगे एक बार तो कमर कस करके एक बार तो पुरुषार्थ करके हमको दिखा देना है पुरुषार्थ करके साधन भजन भी कर लेना है पुरुषार्थ करके भारत के नव निर्माण के लिए भारत के कल्याण के लिए देश सेवा के लिए शिव ज्ञाने जीव सेवा उसका भी एक एक उसका एक अनुष्ठान कर लेना है यह पुरुषार्थ हमारे भीतर में रहे हमको सिर्फ प्रेरणा मिले हम बिल्कुल हाथ पर हाथ रख कर के बैठ ना जाए असहाय ना हो जाए इसके लिए यह लोग देवता स्वरूप होकर के भी अपना देवत्व छुपा करके रखते तो यहां पर यह प्रकरण समाप्त होता है अभी इसके बाद का जो प्रकरण है बिंदु वासिनी उसका प्रारंभ अभी हम सोमवार से करेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु एक तो नेक्स्ट वीक दुर्गा पूजा है तो इस नेक्स्ट वीक तो मां का ही यह लेंगे जीवन और फिर आई थिंक सप्तमी अष्टमी शुक्र शनि शनि रवि तो वैसे भी छुट्टी है तो आई थिंक देखेंगे कि गुरुवार से हम छुट्टी रखेंगे गुरु शुक्र शनि रवि ऐसा मैं कंफर्म बताऊंगा आपको बाद में मुझे भी थोड़ा सा बैकग्राउंड देखना होगा किंतु इसके बारे में एक बात बताऊं कि हम लोग पीपीटीसी में जब जवाइन करते थे तो दो तीन गाने थे सबसे पहले हमको सिखाए जाते थे तो एक एक सबसे पहला गाना था के तुम बाजले य बासुरी जो हां के तुम हां हां बस नवीन और आगे ते हा तो वो एक सबसे पहला सिखाया जाता था दूसरा ये अंबा स्तोत्रम तो बिल्कुल आने के साथ साथ में ही इसको मैंने खा था तो इ वेरी नाइस स्तोत्र इसका बैकग्राउंड जो है वो मुझे थोड़ा सा देखना पड़ेगा किंतु इ वेरी इंटरेस्टिंग य काली दम मधर य अंबा स्तोत्रम स्वामी जी की जो पोयम्स है ना उसमें हम जाएंगे ना तो इतना सब कुछ है मतलब मुझे डर यह बात का लगता है कभी-कभी ऐसे सब टॉपिक हाथ में लेकर के कि इसको मैं न्याय दे पाऊंगा कि नहीं मतलब वो स्वामी जी कहते थे ना कि शिवगढ़ ते मांदर गड़ बसी अर्थात कि किसी ने पूछा स्वामी जी को कि ठाकुर का बायोग्राफी क्यों नहीं लिख रहे तो स्वामी जी कहते हैं शिव को रचना करते करते कहीं बंदर की रचना ना कर दूं ऐसा डर लगता है किंतु जैसे हमारी उस दिन राजयोग के दिन बात हुई थी ना वेर द एंजल्स आर अफ्रेड टू ट्रेड देर द फल्स रसन ऐसे पहले ही एक डिस्क्लेमर देक के हम चालू करेंगे देखिए अपना यह क्लास जो है ढाई साल से चल रहा है ऑलमोस्ट ढाई साल से न साल होने को आए तो प्रत्येक दिन हम क्लास लेते हैं फिर भी हमने सिर्फ सरफेस को स्पर्श मात्र किया है अभी तो इतना महासागर है मैं टीसी में हमारे क्लास प्रतिदिन पांच-पांच क्लास होते थे दो साल का हम लोगों ने ट्रेनिंग सेंटर किया और ट्रेनिंग सेंटर के बाद में पता चला कि वह हमारे आचार्य महाराज कहते हैं कि यह आपको इंट्रोडक्शन दे दिया अभी आपको जीवन भर स्टडी करना [हंसी] है नहीं रहे किंतु इसका फायदा क्या है कि हमको साधना करने के लिए जीवन भर का सामग्री है ऐसा कभी नहीं होगा कि यह साहित्य खत्म हो गया हमको ऐसा कभी नहीं होगा कि राम कृष्ण विवेकानंद में यदि हमारा भरोसा है तो यह साहित्य समाप्त हो गया अभी जद आगे बढ़ना है तो भागवत में जाए न कि वेदांत में जाए ना कि इसमें जाए कोई जरूरत नहीं है आप राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य को फॉलो करके ही आप पूरा जीवन गठित कर सकते हैं ट इज वह हमारा एक सदिरा है अपना काली दमदर यस यस यस यस य ये अपना दुर्गा पूजा समाप्त हो जाए ना इसके बाद में काली दम अधर लेते हैं क्योंकि दुर्गा पूजा तक अर्थात देखिए कि बुध बुधवार से जद हम छुट्टी रखे तो बुध गुरु शुक्र शनि तो वैसे भी छुट्टी है तो सोमोल मंगल हम मां का ले लेंगे और फिर जब नेक्स्ट मंडे से स्टार्ट करेंगे तो काली द मदर से स्टार्ट करेंगे मंड हा मंडे आफ्टर मंडे आफ्टर दशहरा के बाद वाला मंडे यस यस बड़ी क्योंकि क्या है कि हमारे यहां पर भी वह सब कार्यक्रम वगैरह होगा तो मुझे भी थोड़ा सा उपस्थित रहना पड़ेगा यह राजकोट जैसा नहीं है राजकोट में मैं पब्लिकेशन से बाहर ही नहीं निकलता था यहां पर ऐसा है कि हम लोग है कुल मिला कर के चार पांच साधु तो यहां पर सब कुछ करना पड़ेगा [हंसी] कल ही मेरी किसी के साथ बात हो रही थी मैंने कहा कि बीच-बीच में ना मैं बहुत छुट्टी लेता था पहले पहले जब क्लास चालू था ना मैं हर दो-तीन दिन पर लिख देता था कि अभी आज क्लास नहीं होगा आज नहीं होगा मैंने सप्ताह में एक दो छुट्टी तो होती ही थी फिर मैंने देखा मैंने कल ही जो भक्त के साथ में बात किया मैंने कहा कि आप लोग इतने रेगुलर है कि अभी मुझे छुट्टी ले में मुझे शर्म आ रही [हंसी] है अभी आज सुबह की बात कहूं अभी क्या है कि हमारे जो बड़े महाराज है यहां पर रूटीन के बड़े पक्के हैं आपको रूटीन फॉलो करना ही है यह करना वो करना राजकोट से बिल्कुल मने एकदम एकदम अपोजिट वाला वातावरण है यहां पे तो अभी महाराज बाहर गए तो सब लोग सभी चीजों में छुट्टी लगा रहे हैं मैं तो कल मेरा शाम का क्लास था उसमें भी नहीं गया था तो आज सुबह से मैं सोच रहा हूं आज सभी चीजों में छुट्टी लगा देते बिल्कुल रूम में लेटे रहते और कुछ नहीं करना किंतु मैंने कहा नहीं आखिरी तक मैंने ऑलमोस्ट मोबाइल लेकर के मैसेज कंपोज करना स्टार्ट किया था कि आज क्लास नहीं करेंगे फिर आखिरी घड़ी में मैंने सोचा नहीं नहीं क्लास कर लेते एटलीस्ट यह कर लेते बाकी सब छोड़ देते [हंसी] मैंने एक बात बताई थी वो वो जो निखिलेश्वरानंद जी है ना उनकी कजन वो वहां पर आश्रम के पास में ही रहती है तो वो वृद्ध महिला है और बीच-बीच में रेगुलर आती है आश्रम में एक बार मैं अपने ऑफिस में से अपने कमरे में जा रहा था तो वह चंद्रमोहन महाराज गार्डन देखते हैं ना उनके साथ में खड़े रहे के मैं बात कर रहा था तो यह ये महिला ने आकर के चंद्रमोहन महाराज को पूछ रही है कि यह गेस्ट स्वामी जी कहां से आए हैं चंद्रमोहन महाराज कहते यह स्वामी जी य 10 साल से रह रहे हैं