प्रार्थना
देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं उसका नाम है भार समर्पण और इसमें अभी हम देख रहे हैं कि किस तरह से श्री रामकृष्ण श्री मां शारदा देवी को भविष्य का जो उनका जिम्मेदारी है यह सब अपने त्यागी संतानों को उनके आध्यात्मिक जीवन के गठन की रामकृष्ण संघ की आगेवाणी लेने की रामकृष्ण संघ में गुरुत्व और देवित्व के पद पर
थोडा सा कुछ करने से कोई आ के कह देगा "यह यह"
समासित होने की और इन जनरल जैसे मां शारदा देवी ने स्वयं कहा था कि ठाकुर मुझे इस जगत में मातृत्व भाव का प्रचार करने के लिए रख करके गए हैं। तो यह भी एक है एक इंटरेस्टिंग ऑब्जरवेशन है कि किस तरह से ईश्वर के बारे में हमारा कांसेप्ट है वह इवॉल्व होता है। बहुत पहले एक समय था कि जब हम ट्राइबल अपना एक एग्जिस्टेंस था। ट्राइबल सोसाइटी में हम रहते थे। उस समय हम देखते थे कि चारों ओर कभी कहां से झड़ वृष्टि हो जाता है। कहां से अकाल पड़ जाता है। कहां से कोई जानवर आकर के उनको खा के चला जाता है। कोई सांप आकर के दंस लेता है। बीमार होते हैं तो फिर क्या करें वह समझ में नहीं आता है। वह एक परिस्थिति थी एक समय। जबकि पूरा विश्व हमारे लिए एक भयावह था। कब कहां से मृत्यु आ जाए, कब कहां से बीमारी आ जाए, वह हम समझ नहीं पाते थे। तो उस समय हमने एक इस तरह से क्रूल क्रूर भगवान की कल्पना की थी कि जो इस सृष्टि का नियंत्रात नियंत्रा है और कभी भी हमारे पर कहर बरसा सकता है। कभी भी हमारे पर जुल्मो सितम बरसा सकता है। और इस तरह के क्रूर भगवान को खुश रखने के लिए उसको ठंडा रखने के लिए शांत रखने के लिए हमको उसको रेगुलरली कुछ ना कुछ सैक्रिफाइस देना होता था। वह जो ठाकुर की कहानी है ना कि आप श्मशान में आधी रात को शब्द साधना कर रहे हैं। अभी शब साधना में आपको जो नया जो अभी जो एक मृत देह है नया मृत देह उसके ऊपर में आसन करना है। उसके ऊपर में बैठना है और जप करना है। वि इज वेरी डेंजरस। यदि वह कच्चा हृदय का आदमी होगा तो वह श्मशान में जाने से ही डरेगा। फिर शशान में जाने के बाद में मृत देह पर आसन बनाना वो मतलब उसके लिए बड़ा मुश्किल है। तो पहले तो आपको मृत देह पर बैठकर के जप करना है और एकाएक यदि यह मृत देह एकदम खड़ा हो जाए आपको भय दिखाने लगे तो मुंह खोल करके आपको डराने लगे तो आपको यह कुछ ना कुछ नाश्ता वगैरह यह जो छोला वगैरह अपने पास में रखना है वह मुंह खोलने से उसके मुंह में दे देना है। तो वह खाता रहे और वह शांत हो जाए। तो इसी तरह से यह जो एक क्रूर भगवान जुल्मो सितम बरसाने वाले भगवान उसको आपको बीच-बीच में कोई ना कोई सैक्रिफाइस देकर के कोई ना कोई बलि देकर के ठंडा रखना है। तो यह उस समय की एक अवधारणा थी कांसेप्ट ऑफ गॉड। ईश्वर के बारे में हमारी कल्पना या ईश्वर के बारे में हमारे विचार। उसके बाद में जैसे-जैसे हम सेटल होते गए, प्रकृति पर अपना नियमन बढ़ता गया, हम लोग फार्मिंग करने लगे, खेती करने लगे। तो वैसे ही हमने एक थोड़े से सौम्य ईश्वर की कल्पना की कि वह इतना तो क्रूर नहीं है। किंतु हां, उसको आपको सतत सैक्रिफाइस देते रहना पड़ेगा। इसके बाद में जैसे-जैसे यह अपने वेद और उपनिषदों का युग प्रारंभ हुआ, हमने एक प्रेममय ईश्वर की कल्पना करने की शुरुआत की। यह जो भागवत में जो कहानी है कि जब वह इंद्र इन लोगों से नाराज हो गया वृंदावन वासियों से और उनके वहां पर वह सतत वह बारिश बरसाने लगा। क्यों? क्योंकि इन लोगों ने उनको सैक्रिफाइस देना बंद कर दिया था। भगवान कृष्ण स्वयं जहां पर विराजमान है तो वह जो पुराने ईश्वर थे पुराने भगवान थे उनको देने की क्या जरूरत है बलि तो सैक्रिफाइस या उनको ऑफरिंग देने की तो इंद्र बारिश बरसा रहा है बरसा रहा है और भगवान कृष्ण ने अपने यह पूरा गोवर्धन पर्वत अपने हाथों से उठा लिया उन्हें टचली उंगली माने लास्ट उंगली से अपनी सबसे छोटी उंगली उसको कहते हैं उससे उठा लिया और फिर सभी वृंदावन वासियों को वह बारिश से बचाया। तो यहां पर हमको देखने को मिलता है पुराने जो ईश्वर है पुराने भगवान है वह जा रहे हैं जो क्रूर है जो जुल्मो सितम बसा बरसाते हैं अपने वो जा रहे हैं एक प्रेममय ईश्वर की कल्पना वहां से स्टार्ट होती है। ऑफ़ कोर्स इसके बाद में तो अद्वैत वेदांत या तो फिर यह आत्मन का जो कांसेप्ट है, वेदांत का कांसेप्ट है, वह कहता है कि ईश्वर या तो फिर उसको दूसरे शब्द से पुकारे। आत्मन या ब्राह्मण हमारे ही हृदय में है। और हमारे हृदय में यह जो डिविनिटी है या ब्राह्मण है उसका साक्षात्कार करने के लिए अपनी आंखों के सामने यह जो अविद्या का पर्दा जो लगा है अंतरचु के सामने बहिर चक्षु के सामने नहीं तो ये अंतरचु के सामने जो अविद्या का पर्दा लगा है उसको जैसे ही हटाएंगे हमारे भीतर की डिविनिटी है दिव्यता है उसका दर्शन हमें होगा। तो यहां तक पहुंचा है वेदांत। किंतु ठाकुर का देखिए कि यह वेदांत की जो आत्मन या ब्राह्मण की परिकल्पना है उसके ही पूरक यह एक मातृत्व की कल्पना यहां पर करते हैं। यह ईश्वर का मातृत्व स्वरूप यह अपना हिंदू धर्म की एक विशिष्टता है। हिंदू धर्म की एक यूनिकनेस है। और जितने भी धर्म देखिए एक्चुअली यदि विश्व के धर्मों को हम तीन ब्रांचेस में बांट दें। एक ब्रांच है जिसको कि हम अब्राहमिक रिलीजन कहेंगे जो कि हो गए क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और जुडाइज्म। तो यह तीनों को जनरली अब्राहमिक रिलीजन कहा जाता है। इसके बाद में हो गया अपना ब्राह्मण धर्म। यानी कि यह ब्राह्मण ब्रांच कहेंगे। जो कि यह ब्राह्मणों के द्वारा सर्वप्रथम इसका उद्भव हुआ था। तो तीसरी ब्रांच का यदि नाम दें माने यह हिस्टोरिकल नाम जैसे चला आ रहा है श्रमण ब्रांच तो देखिए कि यह माने इसमें भी देखिए जनरली ओवरऑल टू कैटेगरी है। एक तो अब्राहमिक रिलीजन है जिसके भीतर में यह तीन विदेशी धर्म आते हैं। फिर यह एक आर्यन ब्रांच है। सेमेटिक और आर्यन इस तरह से भी डिवाइड कर सकते हैं। आर्यन ब्रांच में अपना ब्राह्मण और यह श्रमण दो ब्रांच आती है। यह श्रमण ब्रांच में देखिए कि वहां पे ईश्वर की अवधारणा की जगह वहां पे निर्वाण या तो केवली स्थिति ये श्रमण ब्रांच में दो धर्म आएंगे। एक है बुद्धिज्म दूसरा है जैनिज्म। इन दोनों में आप देखेंगे कि ईश्वर या आत्मन दोनों को स्वीकार नहीं करते हैं। वहां पर यह जो अल्टीमेट स्टेट है आध्यात्मिक जीवन का जिसको कि वेदांत
क्या श्रीचैतन्य ही श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं?
में निर्विकल्प समाधि कहा गया है। वहीं पे वहां पर उनको निर्वाण या तो फिर यह केवली स्थिति कहा गया है। तो देखिए कि तीन ब्रांच है। एक जो वह अह अब्राहमिक ब्रांच जिसमें कि यह इस्लाम, जुडाइज़्म और क्रिश्चियनिटी आता है, वहां पर ईश्वर की परिकल्पना है। सर्वश्रेष्ठ कौन है? तो है वो ईश्वर। किंतु वो है मेल। माने वो पुरुष ईश्वर। ईश्वर जो है उनके वो मेल है। और यहां पे हिंदूइज़्म में देखिए कि सर्वश्रेष्ठ कहेंगे हम वो है ब्रह्मन या तो आत्मन। किंतु हमारे यहां पर भी देखिए कि तीन डिवीजन है विदिन दिस ब्राह्मिनिज्म और विदिन दिस आवर इंडियन रिलीजन तीन ब्रांचेस है। एक तो है कि ईश्वर की अल्टीमेट परिकल्पना है ब्राह्मण या तो आत्मन यह एक हो गई। दूसरा है कि वैष्णविज्म। यह वैष्णव स्कूल। तो वैष्णव स्कूल में आप देखिए कि सर्वश्रेष्ठ जो सत्ता है वह है भगवान विष्णु। तो भगवान विष्णु जो है और यह जो क्रिश्चियनिटी के जो फादर इन हेवन है इनको आप मोर और लेस इक्वेट कर सकते हैं कि एक पुरुष ईश्वर है जो कि अवकाश में कहीं पर रहते हैं। स्वर्ग में वैुंठ में कहीं पर रहते हैं और वह प्रेममय है और उनकी कृपा से हमारा कल्याण हो सकता है। किंतु साथ-साथ में ही हिंदू धर्म में एक तृतीय थर्ड ब्रांच है जिसको कि हम शक्ति साधना कहते हैं। यह शक्तिज्म यह ब्रांच यहां पर देखिए कि विश्व में सर्वोच्च सत्ता है एक स्त्री ईश्वर या तो फिर देवी या तो फिर भगवती मां काली मां दुर्गा। तो यह शक्ति जो है पूरे जगत का वह सृष्टि स्थिति निर्माण सब कुछ करती है और उसी के आशीर्वाद से हमको इस जगत में जो सर्वोच्च अध्यात्म प्राप्ति है वो भी प्राप्त होती है। और यहां पर थर्ड ब्रांच है यह श्रमण ब्रांच जिसमें कि यह जुड़ बुद्धिज्म और यह जैनिज्म आएगा। वहां पर देखिए कि ना ही ईश्वर है ना ही आत्मन है ना ही यह मेल मेल गॉड है ना ही फीमेल गॉड है माने पुरुष ईश्वर भी नहीं स्त्री ईश्वर भी नहीं और यह आत्मन या ब्राह्मण भी नहीं वहां पे सर्वोच्च स्थिति है निर्वाण या तो फिर केवली स्थिति तो यह पूरा जो वर्ल्ड रिलीजन का जो स्पेक्ट्रम है उसमें यह जो शक्ति अभी राम रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा में देखिए कि यह जो हिंदूइज़्म की तीनों ब्रांच है इन तीनों ब्रांचों को रिप्रेजेंटेशन दिया गया है। या तो फिर तीनों ब्रांचेस का एक बड़ा ही सुमधुर संगम अपने रामकृष्ण भावधारा में दिखता है। हिंदू धर्म की अपने यहां पे यह वेदांत के ब्राह्मण या तो आत्मन की भी परिकल्पना है। हमको पता है कि ठाकुर ने तोतापुरी के पास में वेदांत साधना करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त की थी। अपने यहां पे जो वैष्णव भक्ति मूवमेंट है वह भी रिप्रेजेंटेड है। हमको पता है कि ठाकुर के भीतर में बहुत सारे भक्त ठाकुर के उनको चैतन्य देव के ही अवतार या तो फिर चैतन्य देव की तरह ही उनको देखा करते थे। ठाकुर के भीतर में जो वैष्णव साधना का जो हार्ट है हृदय है वो है जो भाव साधना तो शांत भाव से साधना दास्य भाव से साधना सख्य भाव मातृ भाव संतान या तो फिर वात्सल्य भाव और फिर अल्टीमेटली मधुर भाव महाभाव तो यह ठाकुर ने भाव साधना भी की है जो कि वैष्णविज्म या तो भक्ति मूवमेंट का हार्ट है। ठाकुर ने वेदांत साधना की है। अद्वैत वेदांत साधना जो कि वेदांत मूवमेंट का हार्ट है और साथ में ही ठाकुर ने मां काली की भी उपासना की है जो कि शक्ति साधना का हृदय है या तो फिर उसका कोर है। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर ने मां शारदा देवी को जिस तरह से प्रोजेक्ट करना चाहा था। यह इसके भीतर में हम यह नहीं कहेंगे कि सिर्फ शक्ति साधना के एलिमेंट है। हमको यह तीनों एलिमेंट्स जो है हिंदू धर्म के एक साथ में मिश्रित हुए से दिखते हैं। तो कहीं यह मां के जीवन में जो वो फेमस अभी कोई पूछेगा कि मां के साथ में यह निर्विकल्प समाधि या अद्वैत वेदांत का क्या संबंध है? तो वह जो फेमस पत्र जो कि यहां पर मायावती से एक साधु ने मां को लिखा था। पूछा था कि मां यहां पर मायावती में तो ठाकुर के एक भी फोटो नहीं है। तो ठाकुर की पूजा किए बिना क्या हम रह सकते हैं? तो मां ने फेमस उत्तर दिया है। तुम्हारे ठाकुर भी अद्वैत थे। तुम भी अद्वैती ही हो। तो देखिए कि मां अद्वैत साधना को संपूर्ण रूप से स्वीकार करती है। शक्ति साधना तो वो है ही है क्योंकि जगदंबा स्वयं है और साथ में ही भाव साधना। मां के भीतर में जो मातृ भाव था वह भाव सा अभी वह शुद्धतम भाव है वह मातृ भाव यदि महाभाव कहा जाएगा तो वह शायद मधुर भाव या महाभाव होगा सर्वश्रेष्ठ यदि कहे तो किंतु शुद्धतम यदि कहे तो वह हो गया मातृभाव तो मातृभाव यानी कि वैष्णव साधना का जो कोर एसेंस है वह भी था अद्वैत साधना को मां ने संपूर्ण रूप से स्वीकार किया था मां कितनी बार समाधि में गई होगी उसका हमको पता नहीं है। एक उदाहरण स्पष्टतर हमारे पास में है वह है शोडशी पूजा। उसके वह डिस्क्रिप्शन में गंभीरानंद जी स्पष्ट लिखते हैं कि जैसे ही ठाकुर ने मां को श्रृंगार सजा करके वह पूज्य के आसन पर देवी के आसन पर विराजमान किया और जैसे ही मंत्रोारण करके पूजा का प्रारंभ किया वैसे ही मां की अर्धबाह्य दशा आकर के उपस्थित हुई और इवेंचुअली ठाकुर और मां दोनों गंभीर समाधि में निमग्न हो गए। जैसे-जैसे पूजा अपने ये कंक्लूजन तक पहुंची, उस समय ठाकुर और मां एक साथ में जैसे कि गंभीर समाधि में निमग्न हो गए थे। तो मां के जीवन में अद्वैत वेदांत, शक्ति साधना और वैष्णव साधना तीनों के एलिमेंट इन तीनों का संगम मां के जीवन में है। तो यह मां को ठाकुर को प्रोजेक्ट करना था और यह भी एक कहेंगे कि वी डू नॉट नो कि भविष्य किस तरह से डेवलप होता है। किंतु यह जो खास करके विदेश में यह जो तीन धर्म है अब्राहमिक धर्म उनमें जो पुरुष ईश्वर का जो प्राधान्य है वहां पर स्त्री या देवियां या तो संत वगैरह स्त्री संत नहीं है ऐसा नहीं किंतु ईश्वर का स्वरूप तो पुरुष का ही है। तो ठाकुर ने मां को जिस तरह से यह शक्ति साधना का भविष्य जो जिस तरह से है एक शक्ति को जिस तरह से ठाकुर ने प्रोजेक्ट किया है तो हाउ इट विल वर्क आउट अपॉन द सोसाइटी देखिए कि हम लोग जो है ना अभी यह पॉपुलर कल्चर की वजह से अब हम बहुत बार माने ज्यादातर समय पॉपुलर कल्चर के नाम पे वह सीधा हॉलीवुड का अनुकरण ही करते हैं। विदेशी किताबों में से उठाएंगे, विदेशी मूवीज में से उठाएंगे, विदेशी साइंस को उठाएंगे। बोलकर के हमारे सोसाइटी में भी ईश्वर या तो फिर यह आध्यात्मिकता के संबंधित जो सब जो एक आइडियाज चल रहे हैं लोगों के मन में जो विचार चल रहे हैं वो सीधे-सीधी ये क्रिश्चियनिटी या तो फिर वो वेस्टर्न फिलॉसोफर्स के आइडियाज को हम उठा दे रहे हैं। और अभी जैसे कि मेरा एक लड़के के साथ बात हो रहा था। मुझे पूछता है कि ईश्वर सृष्टि की रचना करता है तो वो कैसे करते हैं वगैरह-वगैरह तो मैंने कहा कि देखो अपने हिंदू धर्म में या तो फिर वेदांत में ऐसा नहीं है कि ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं। यदि वेदांत धर्म वेदांत अपना जो यह है सिस्टम उसको ठीक से पढ़ोगे तो पता चलेगा कि ब्राह्मण है। ब्रह्मन में से यह सब एक तरह से जब अविद्या का एक आवरण उसके ऊपर में लगता है तो दो तरह की अविद्या होती है। एक तो समष्टि एक तो है व्यष्टि। तो यह जो समष्टि अज्ञान है उसमें से ईश्वर मैनिफेस्ट होते हैं और यह व्यष्टि अज्ञान है। उसमें से यह जीव और जगत मैनिफेस्ट होता है। यानी ईश्वर स्वयं तो एक अज्ञान समष्टि अज्ञान मिश्रण हुआ ब्रह्मन के साथ में। तभी तो वह ईश्वर प्रकट हुए। अभी ईश्वर ने सृष्टि की रचना की ऐसा नहीं है। सृष्टि की रचना वही ब्रह्मन में से ही हुई है। किंतु हम लोग सब अपने मन में यह बैठ सोच के बैठ गए हैं कि अभी जैसे वह बाइबल में है कि वो इट टूक भगवान को सात दिन लगे वो सृष्टि की रचना करने के लिए और उसके बाद में उन्होंने रेस्ट किया। तो अभी यह जो आईडिया है वह पॉपुलर कल्चर में एंटर होते हम सब के सबकॉन्शियस में घुस गया है। तो खास करके देखिए कि इवन जो लोग जैन होते हैं वहां पर तो यह भगवान को ही नहीं मानते हैं। यह आत्मन को भी नहीं मानते हैं। ऐसे लोगों में भी यही कल्पना चलती है कि हां भगवान ने सृष्टि की रचना की। हां भगवान हम पर दया करेगा। वह जैन धर्म में भगवान ही नहीं तो दया कैसे होगी आपके ऊपर में? तो जो भारत में खास करके जो धार्मिक सिस्टम है, धार्मिक रिलीजियस स्पिरिचुअल स्कूल है उसका जो प्रॉपर स्टडी ही हमने नहीं किया और यह विदेशी पॉपुलर कल्चर जो है उसको उठा के हमने अपने यहां पे बिठा दिया है। तो यहां पे देखिए कि यदि यह मां मां का जो स्वरूप है यह शक्ति स्वरूप इसको यदि भविष्य में प्रोजेक्ट किया जाए जो सर्वोच्च ईश्वर है वह पुरुष नहीं किंतु स्त्री है और मां का जो वात्सल्य भाव है उसके सामने हमारा यदि संतान भाव हो हमारा यदि बालक भाव हो तो फिर हम सबसे बड़ा ही आसानी से ईश्वर प्राप्ति की ओर या तो फिर यदि वेदांत की भाषा में कहे तो फिर यह आत्मज्ञान की प्राप्ति या तो फिर आत्म साक्षात्कार की ओर हम बड़ा ही आसानी से आगे बढ़ेंगे। तो दिस इज माने एक बहुत ही एक इंपॉर्टेंट पॉइंट है अपने लिटरेचर में जिसका कि इतना गहन रूप गहनता से मैंने चिंतन इतना देखा नहीं है। इवन मैं खुद कभी-कभी सोचता हूं कि यह मां को जो जिस तरह से प्रोजेक्ट किए हैं ठाकुर ने हम लोग जिस तरह से मां को स्वीकार करते हैं। इसको यदि पॉपुलर कल्चर में यदि कन्वर्ट किया जाए गांव-गांव शहर-शहर घर-घर तक पहुंचाया जाए कि ईश्वर स्त्री स्वरूप या तो मातृ स्वरूप है और उनकी आराधना करने के लिए आपको कोई यह लांच वगैरह देने की जरूरत नहीं है। ब्राइबिंग देते हैं ना कि चलो मंदिर में जाकर के कुछ लड्डू वगैरह ऑफर कर दिया तो वह खुश हो जाएगी हम पे। हमको आशीर्वाद देगी। ऐसा नहीं है कि लड्डू ऑफर करने से वह नाराज होगी। वह तो खुश ही होगी किंतु इवन बेटर ऑप्शन है यह संतान भाव से मातृ रूपी ईश्वर की आराधना। तो यह आईडिया इतना रेवोल्यूशनरी है आज के युग में। खास करके यदि हम यह पॉपुलर कल्चर को देखते हैं और उसके सामने इस आईडिया को रखते हैं तो पता चलेगा कि यदि यह आईडिया समाज में
ठाकुर भक्तों के लिए आकुल-व्याकुल होते है
फैलता है तो कितना बड़ा रेवोल्यूशन आएगा। तो यह जो मां को मातृभाव की मातृभाव का प्रचार करने के लिए ठाकुर यह मां ने खुद ने कहा है कि मातृभाव का प्रचार करने के लिए ठाकुर ने ठाकुर मुझे छोड़ के गए हैं। इस जगत में रख के गए हैं। वरना तो ठाकुर के जाने के बाद में मेरी क्या आवश्यकता थी यह देह धारण करने की? मैं भी साथ-साथ में चली जाती। किंतु मातृभाव का प्रचार करना है। बोलकर के ही मैं अभी भी जगत में हूं। तो यह मातृभाव और यह संतान भाव यह यदि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता चले तो देखिए कि कितना आसान सबका धर्म जीवन हो जाएगा। तो इसी के बारे में जो एक के बाद एक प्रसंग है वह सब यहां पर भार स्वीकार इस जो चैप्टर है भार समर्पण इसमें सब उल्लेखित है। कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर ने वह कहा था कि वह शारदा है, सरस्वती है, ज्ञान देने के लिए आई है। रूप यदि होता तो फिर अशुद्ध मन के लोग देखते और उनको उनका अकल्याण होता। इसीलिए इस बार रूप ढक करके आई है। और एक समय ने एक और एक समय ठाकुर ने कहा था ज्ञानदायिनी महा बुद्धिमती ओके वह क्या ऐसी वैसी कोई है ओ की जेष है वो क्या ऐसी वैसी है ओ अमार शक्ति वो मेरी शक्ति है और फिर हृदय को कहा था ठाकुर ने अरे और नाम शारदा वो सरस्वती उसका नाम शारदा है वह सरस्वती है इसीलिए श्रृंगार करना उसको अच्छा लगता साझना उसको अच्छा लगता है। तो यह ठाकुर ने धीरे-धीरे करके मां का जो मातृत्व शक्ति का प्रकाश होने वाला था उसका बैकग्राउंड या तो फिर ग्राउंड वर्क तैयार करके जा रहे हैं। अभी आगे गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं पाठकेर होइ तो स्मरण आ बालिका बधुर अंगो होइते भूषण अपशराण अपसारण पर श्री रामकृष्ण जननी चंद्रा देवी बधु के क्रोड़े तुलिया शोजल नो ने प्रबोध वाक्य बोलिया छिलेन जे गदाई अतः पर तहां के विविधो अलंकार साजाबे पाठक को हो सकता है कि याद होगा कि बालिका वधू के अंग अंग से यह आभूषण वगैरह सरा लेने के बाद में निकाल लेने के बाद में रामकृष्ण जननी चंद्रा देवी ने बालिका वधू को अपनी गोद में उठाकर के अश्रु भरे नयनों से शजोलो नयो ने अश्रु भरे नयन से उनको सांत्वना दी थी और कहा था कि गदाई उनके लिए और भी बहुत सारे अलंकार सजा करके ले आएगा। यह घटना यहां पे जो उल्लेख है हमको पता है कि ठाकुर का संसार कामार पुकुर में वह तो शिव का संसार था और फिर वह मां शारदा देवी के साथ में विवाह होना था तो बहू को तो फिर वह गहने पहनाने पड़ेंगे वह तो सामाजिक प्रथा है तो अभी घर में तो गहने हैं नहीं तो वह जो लाहाबाबू जमींदार थे उनके पास में से गहने मांग करके चंद्रामणि देवी ले आई थी और विवाह के दिन वह शारदामणि देवी को बालिका है। वह तो पांच छ साल की उस समय थी। तो उस समय मां को इस गहने पहना के बड़ा सुंदर रूप से सजाया था। अभी वह मां जब शारदा देवी जब घर आई वो बालिका जब घर में आई जयराम बाटी से कामार पुकुर में और वह रात को सो रही है। उस समय यह चंद्रामणि देवी दुख करके कहती है गदाधर को वो उसको तो ठाकुर को तो गदाई करके पुकारते थे गांव में। तो उसकी मां मां चंद्रामणि देवी तो मां गदाई को कहती है कि देखो बालिका वधू है इतनी सुंदर दिख रही है गहने पहन के और उसको भी तो अच्छा लग रहा है इस तरह से श्रृंगार करना अभी मैं किस मुंह से उसके पास में से गहने वापस मांगू मुझे तो क्योंकि गहने लौटा देने होंगे लाहा बाबू को उनसे तो उधार ले आए हैं तो फिर यह अपने गधाही ने क्या कहा कि मां तुम चिंता मत करो यह सोई हुई है शारदा देवी तो में उनके अंग में से यह गहने एकदम एकदम चोरी चुपके मैं हटा देता हूं। उनको पता भी नहीं चलेगा। तो यह ठाकुर ने ऐसा ही किया। मां सोई हुई थी। वह गहने धीरे से चुपके से निकाल दिए और चंद्रामणि देवी को दे दिए। चंद्रामणि देवी ने वह गहनों को दे दिया लाहा बाबू को वापस। अभी यह जब सुबह हुई यह मां उठी नींद से देखा कि गहने गायब है तो अभी छोटी सी बालिका है किंतु उसको यह उनको यह तो समझ में आता है कि गहने तो पहन के मुझे बड़ा सुंदर दिखता था। तो अभी गहने कहां गए? तो फिर उन्होंने मां चंद्रामणि को पूछा कि मैंने यह सब इशारा करके जो गहने पहन के रखे थे, वह कहां गए? तो चंद्रामणि देवी की आंखों में आंसू आ गए। मां शारदा देवी को बच्ची थी। वह उनको अपनी गोद में उठा के अश्रु भरे नयनों से कहा कि बिटिया देखो तुम्हारा एक समय आएगा जब मेरा बच्चा गदाई तुम्हारे लिए और भी सुंदर-सुंदर कितने गहने वो बना करके देखा। अभी मां तो जैसे मान गई किंतु उसी दिन फिर वह मां के एक चाचा वहां पर आए थे जयराम भाटी से कामार पुकुर और उन्होंने तो सोच लिया था कि जो यह कामार पुकुर में गदाई का जो घर है ठाकुर का वो अच्छा ही होगा क्योंकि इतने सारे गहने वो बच्ची को दिए हैं शारदा देवी को पहनने के लिए तो फिर तो अच्छा ही होगा किंतु फिर जब आकर के देखा कि मां के अंग में से सभी गहने निकाल दिए हैं तो उनके चाचा बड़े ही नाराज हो गए और मां मां को उठा के अपनी गोद में फिर से जय राम बाटी ले गए। तो देखिए कि वो घटना वो सबको याद रहेगी हमेशा के लिए। और उस समय देखिए कि यहां पे भी गंभीरानंद जी महाराज इस घटना का उल्लेख करके हमको बताते हैं कि अभी जब दक्षिणेश्वर में ठाकुर रह रहे हैं मां भी रह रही है और फिर इतने सारे भक्त हैं इतने सारे भक्त कुछ ना कुछ तो देते ही है और फिर ठाकुर को तो सैलरी भी मिलती थी वहां पे वह काली मंदिर से ठाकुर ने कहा था कि मैं साइन नहीं करूंगा तुम लोगों को पैसा देना हो तो दो ना देना हो तो ना दो तो वह जो पैसा ऐसा कुछ बचा होगा। तो ठाकुर ने फिर हृदय को कहा कि इसमें से वह मां के लिए यह बाला यानी कि चूड़ियां बना दो। तो इसके बारे में वो क्या कहते हैं? जननी से प्रतिश्रुति स्मरण एवं देवी स्वरूप हृदय धारण करिया श्री रामकृष्ण ई समय हृदय के बोलिया छिलेन देख तोर सिंधु के कतो टाका आ छे तो उनकी मां की यह उनकी मां का जो वचन है उसको याद करके और देवी के स्वरूप को हृदय में धारण करके ठाकुर ने हृदय को पूछा था कि देख जो तो तुम्हारी यह जो सिंदूक यानी कि वो वो एक तरह से वो सिंधु को क्या कहेंगे बैग ना कि जो कुछ भी है तो उसके भीतर में तुम्हारे पास में कितना रुपया है देखो तो ओके भालो करे दुई छोड़ा ताबीज घोड़िए दे उसके लिए अच्छे से दो ताबीज वो बना दो श्री रामकृष्ण तोखो निजे अशुस्थ तबु हृदय के तीन शतो टाका बए ताबीज घोड़ाया दीते बोली लेन ठाकुर उस समय अपने से बीमार थे किंतु फिर भी हृदय को ₹300 के यह जो दावीज है उसको बना देने के लिए कहा किंतु कार तो ओई जन दुई शत टाका मात्र खर्च होई बाकी एक शत टाका श्री मां के नगद देवा होइया छिलो किंतु उस तावीज बनाने के लिए सिर्फ 200 टाका ही लगा था ₹200 ही लगे थे इसलिए ठाकुर ने जब कहा था कि ₹300 की यह बनानी है यह गहने तो ₹200 ही लगे तो बाकी के ₹100 ₹100 मां को कैश देने मां को कैश दिया गया था। नगद यानी कि कैश में दे दिया गया था। पंचवटी ते साधन काले ठाकुर जोख सितार दर्शन पान तोखन लखो कोरिया छिल जे तहार हाथ डायमंड काटा बाला आ जब पंचवटी में ठाकुर ने साधना करने के समय मां सीता का दर्शन किया था तब उन्होंने लक्ष्य किया था कि उन्होंने अपने हाथ में यह डायमंड काटा यह बैंगल्स पहने हुए हैं। बाला पहनी हुई है। ताई तनी श्री मां के ओरूप भालाओ देवया छिलेन इसीलिए उन्होंने मां को उस तरह से वह बैंगल्स भी बना दिए थे गहना दिया श कौतुके बोलिया छिलेन ओरे आमार शंगे और ए संबंध बनो और इस तरह से मां के लिए गहने बना के उन्होंने सौतुक उन्होंने हंसते-हंसते कहा था कि अरे उसके साथ में मेरा यही संबंध है। देखिए ये जो प्रसंग है उसके ऊपर में बहुत सारा कुछ सोच सकते हैं। सबसे पहले तो अ ये जो तावीज के बारे में यस ये तावीज ही है और इसके बारे में इस तरह से एक कहानी भी है। एक प्रसंग भी है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब मां वहां पर जा रही थी वृंदावन वगैरह तो उस समय मां ने अपना हाथ खिड़की में रखा था। यह जो ट्रेन में जा रही थी, रेल में यात्रा कर रही थी, तो ट्रेन में वो खिड़की के पास में मां बैठी हुई थी और हो सकता है कि खिड़की के ऊपर में मां ने हाथ रखा हो। एकाएक उन्होंने देखा कि खिड़की में से बाहर से यह ठाकुर वो भीतर में देख के कहते हैं कि अरे यह हाथ यहां पर रखा है। यह तावीज है तुम्हारा। वह कहीं निकल के चला ना जाए। इसको संभाल के रखो। तो जैसे ही ठाकुर ने इस तरह से दर्शन दिए वो इमीडिएटली माने जैसे कि वह तावीज को खोल करके वह अलग से एक बक्से में रख दिया था। तो यह हो एक तावीज की कहानी और ठाकुर के बारे में भी इस तरह से एक कहानी है तावीज की कि मां ने कहा था कि ठाकुर के देह का रंग वो जो सोने का तावीज जो पहनते थे उसके साथ में मिल जाता था। उसी के जैसा वह जैसे कि सोने का गोल्डन रंग का ठाकुर का रंग था देह का और वह भी एक दूसरी कहानी है कि वो एक बार एक ब्राह्मण वहां पर आया था दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर और ये ब्राह्मण ये दोनों के बीच में ऐसा वो वाद विवाद होने लगा कि कौन ज्यादा गोरा है तो ठाकुर तो बालक स्वभाव थे तो अभी जो ईश्वर स्वयं है उनके लिए कौन गोरा कौन काला इसका तो कोई फर्क नहीं पड़ता किंतु फिर भी यह बालक स्वभाव भाव तो फिर यह ठाकुर ने मां को कहा कि देखो हम दोनों लोग गंगा के किनारे चलते-चलते नबद के सामने से जाएंगे। तुम देख के बताना कि कौन ज्यादा गोरा है। तो अभी देखिए कि मां तो इतनी पतिव्रता थी ठाकुर के प्रति उनका संपूर्ण समर्पण था। किंतु जहां पर न्याय देने की बात आती है, हमने बार-बार देखा है कि वह ठाकुर को म ठाकुर अपने पति है, उनके इष्ट है, उनके गुरु है, वह सब बातों को बिल्कुल भूल जाएगी। उस समय जो न्याय जिसको जो मिलना चाहिए उसी तरह से मां न्याय देगी। तो वो जो उभय भारती की कहानी है अपने वेदांत की स्टोरीज में कि शंकराचार्य और मंडन मिश्र दोनों में वाद-विवाद हुआ। यह जो यह हुआ म आर्गुमेंटेशन और फिर यह वाद-विवाद में से यह ठीक किया गया कि डिबेट करेंगे दोनों कि कौन सा यह पूर्व मीमांसा ठीक है ना कि उत्तर मीमांसा ठीक है तो यह मंडन मिश्र की पत्नी को ही कहा गया कि आप है अंपायर का काम कीजिए जज का काम कीजिए तो वह देखिए कि मंड हो सकता है कि उस समय की आज की भी मां के जीवन में भी देखिए कि पति को सर्वश्रेष्ठ मानने की जो प्रथा है उसके अनुसार वह पति को ही विजय घोषित करती ऐसा नहीं जो न्याय के अनुसार जो प्रॉपर एक सिस्टम के अनुसार जो होना चाहिए जो निर्णय वही वह उभय भारती ने भी लिया था डिक्लेअ किया था कि शंकराचार्य जीत गए। यहां पे भी मां ने देखा कि वह जो ब्राह्मण था जिसके साथ में ठाकुर यह मुकाबला कर रहे थे कौन ज्यादा गोरा है तो वह ब्राह्मण को ही मां ने ठीक किया कि वह ज्यादा गोरा है। तो वह तावीज अच्छा अभी प्रश्न होगा कि ठाकुर सोने का तावीज कैसे पहन सकते हैं? तो हो सकता है कि यह जो ठाकुर की जो बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बादबाद की अवस्था हुई थी जबकि वह किसी भी तरह की धातु को स्पर्श नहीं कर पाते थे वो उसके पहले की अवस्था होगी इसलिए हो सकता है कि ठाकुर ने यह सोने का तावीज पहना हो तो यहां पे भी यह मां के पास में भी तावीज था जिसको कि मां ने ठाकुर के कहने से वह बाद में निकाल करके बक्से में रख दिया था तो वह एक प्रश्न है वह एक है और दूसरा है कि ठाकुर के पास में ₹300 आया कहां से? यहां पे मैंने इसके बारे में जो कुछ भी पढ़ा है, मुझे ऐसा कहीं पे भी नहीं दिखा कि ठाकुर ने इस तरह का कोई सेविंग्स किया हो कि उन्होंने इस तरह से पैसे इकट्ठा किए हो। हो सकता है कि रामकुमार के पैसे हो। वह यदि ठाकुर को देकर गए हो। मुझे पता नहीं है। सही में इसके बारे में मैंने कहीं पढ़ा भी नहीं है। किंतु ठाकुर के पास में ₹300 होना वह भी एक अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है कि मतलब जो पैसों का संग्रह कभी नहीं कर पाते थे। ना ही किसी से ऐसा कोई पैसा स्वीकारते थे। उनकी सैलरी पत्रक पे साइन भी नहीं करते थे। तो इतना सारा रुपया आया कहां से? और उस समय का ₹300 यानी कि आज के वह ₹00 के बराबर होगा। तो वह तो सही में एक बहुत बड़ी रकम है। आज यदि वह दो बैंगल्स बना करके देखिए सोने के तावीज बना करके उसकी कीमत के अनुसार आप अनुमान कीजिए कि वह कितना रुपया वो ठाकुर के पास में होगा आज की करेंसी में। तो वह एक बात है। अह दूसरा है यहां पे एक देखिए कि यहां पे अह गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि ठाकुर जब साधना कर रहे थे उस समय मां सीता का दर्शन हुआ था और उनके हाथों में जो बैंगल्स पहने हुए थे उसमें वो डायमंड काटा वो डिजाइन अभी इसका क्या अर्थ है मुझे पता नहीं वो पिक्चर में तो हमको दिखता है तो उससे हम कह सकते हैं वह जो वो जो डिजाइन है उसको डायमंड काटा डिजाइन कहते होंगे तो यह ठाकुर ने मां सीता को ऐसा पहने हुए देखा था। तो इसके बारे में से एक प्रश्न हमको आता है कि यह जो ठाकुर का जो दर्शन था मां सीता का वो सही सही मां सीता जो कि उस समय त्रेता युग में जिस तरह से वह रहती होगी जिस तरह के आभूषण पहनती होगी वही मां सीता को ठाकुर ने देखा है ना कि फिर यह ठाकुर के सबकॉन्शियस माइंड का प्रोजेक्शन है क्योंकि बहुत बार आज खास करके आज की जो आधुनिक थ्यरी कहती है कि हम लोग क्या करते हैं यह जैसे जैसे कि ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या तो फिर ये लार्ज लैंग्वेज मॉडल। इसमें क्या होता है? आप बहुत सारा डाटा वो एल्गोरिदम को फीड कीजिए। खिलाइए उसको और फिर उसी डाटा को निकाल करके उसमें से खिचड़ी बना करके वो आपको कोई ना कोई प्रश्न का उत्तर देगा। अभी यह कल ही यह देखिए कि ओपन एआई ने वह जो इमेज जनरेटिंग एक फीचर उन्होंने बनाया है वह सबके सामने रखा। तो अभी वो जितना जहां पे भी आप एआई के बारे में देखेंगे पढ़ने को जाएंगे तो हमने यह ओपन एआई में यह पिक्चर बनाया यह पिक्चर बनाया उसी का वो सब जगह पर विवरण है तो बहुत सारे लोग इस तरह का भी स्पेककुलेशन करते हैं कि अभी यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है वो क्या लोगों की क्रिएटिविटी को खा जा रहा है या तो फिर लोगों की क्रिएटिविटी को चुरा रहा है क्योंकि कितने ही आर्टिस्ट सालों सालों से मेहनत करके वह अपना एक स्टाइल डेवलप करते हैं। अभी ये स्टाइल आपने एआई को खिला दिया और फिर उसको कहा कि मेरा जो फोटो है उसको दो और उसी कार्टून स्टाइल में इसको कन्वर्ट करके दे दो। तो मैंने जैसे ही अपना फोटो फोटो डाला उसने उसको कार्टून स्टाइल में कन्वर्ट करके दे दिया। अभी मैं यदि एक रियल आर्टिस्ट को पकड़ता कि यह तुमने इस स्टाइल में मेरा फोटो दौड़ना है तो मेरे से वह कितना लाखों रुपया ले लेता। उसकी कमाई होती इकोनमी यह आर्ट की इकोनॉमी है। वह चलती रहती। अभी ये एआई जो है उसने सब सीख लिया है तो वो अपने दिमाग में से यह सब निकालता रहता है। उसको जो भी फीड करो उसका वो जो प्रीडिटरमाइंड डाटा है उसके अनुसार वो आपको रिजल्ट देगा। तो यह दर्शन वगैरह जो है इसके बारे में भी आधुनिक एक थ्यरी है कि हम लोग जो दिन भर जो देखते रहते हैं, सुनते रहते हैं, वह अपनी सबकॉन्शियस में जमा होता रहता है। फिर यह जो हम सपने देखते हैं, वह सपने हैं इसी सबकॉन्शियस डाटा में से निकाल करके कुछ ना कुछ वो खड़ा करता रहेगा। हम ऐसा कोई भी सपना कभी नहीं देखेंगे कि जिसके बारे में यह जो जागृत अवस्था में ना ही हमने उसके बारे में कुछ सोचा हो ना ही हमने किस इसके बारे में कुछ देखा हो तो जो देखा है जो सुना है जागृत अवस्था में और जो सबकॉन्शियस में स्टोर हुआ है उसी सपने को हम यह निद्रा अवस्था में देखते हैं। उसी डाटा को खा के यह अपना सबकॉन्शियस माइंड यह सपने बना करके फेंकता है। तो यह जो ठाकुर के दर्शन थे खास करके यह प्रश्न मुझे इसलिए हुआ कि यह जो डायमंड काटा बाला इसका जो वर्णन है तो यह तो एक आधुनिक
ठाकुर माँ काली से जो भी मांगते हैं, उन्हें मिल जाता है
स्टाइल हो गई ना कि आपका आज का जो भी यह है वो गहने बनाने वाला उसको आप जाकर कहेंगे कि इस स्टाइल में गहने बना दो। वह फटाक करके बना करके वह दे देगा। उसके बारे में उसको आपको उसको ज्यादा कुछ बताने की जरूरत नहीं। यानी कि यह स्टाइल तो उस समय काफी पॉपुलर होती होगी। काफी लोगों के हाथ में इस तरह की यह जो बाला है वो बैंगन है वह ठाकुर ने देखे होंगे। तो यह जो सबकॉन्शियस माइंड पे यह जो इंप्रेशन पड़ा है उसी को उन्होंने मां सीता देवी जब दर्शन हुआ तो उस दर्शन में उसका यह सबकॉन्शियस ठाकुर का वो प्रोजेक्ट हुआ है कि नहीं कहना मुश्किल है। क्योंकि त्रेता युग में क्या यही स्टाइल थी? त्रेता युग के बारे में आज हमारे पास में कोई भी जानकारी नहीं है। ज्यादा से माने ये जिस तरह से ये इजिप्ट के पिरामिड देखते हैं या तो फिर ये मेसोपोटेमिया में ये जो टेबलेट्स देखते हैं। टेबलेट यानी वो मिट्टी का वो जो एक टाइल की तरह टाइल्स की तरह वो उसमें यह लोग लिखते हैं तो वह प्रिजर्व हुआ है। पिरामिड प्रिजर्व हुए हैं। यह मिट्टी का यह जो टेबलेट है वह प्रिजर्व हुआ है मेसोपोटेमिया में। भारत में त्रेता युग का कुछ भी प्रिजर्व नहीं हुआ। मुझे तो नहीं पता है ये सिंधु रिवर वैरी सिविलाइजेशन वो जो मोहनजोदड़ो के ये जो अवशेष है वो तो कोई अपने त्रेता युग की जो भव्यता है उसका 10% भी वो 0.1% भी वो वहां पर हमको नहीं दिखता है। जिस तरह से हमारे पुराणों में वर्णन है। तो ना ही कोई भी आर्कियोलॉजिकल एविडेंस हमारे पास में है, ना ही कोई पिक्चर्स है, ना ही कोई भी आर्ट फॉर्म है, कुछ भी नहीं है। उसके बारे
अपनी सेवा करने के लिए ठाकुर ने माँ से एक धनी व्यक्ति को मांगा
में पुराणों में वर्णन अवश्य होगा। किंतु ये जो पौराणिक वर्णन है उसको लेकर के आधुनिक आर्ट फॉर्म खास करके ये जो गहनों का जो शेप है, गहनों का जो आकार है, वो उसी त्रेता युग के जैसा आज के लोग जानते होंगे। यह समझना थोड़ा सा लॉजिकली मुझे मुश्किल लग रहा है। तो इसीलिए मेरे मन में यह प्रश्न आया था कि यह जो ठाकुर ने मां के हाथ में मां सीता के हाथ में यह गहने देखे वो त्रेता युग के ही थे ना कि फिर यह ठाकुर का सबकॉन्शियस माइंड उसको प्रोजेक्ट कर रहा था। अभी यह देखिए कि इस तरह का स्पेककुलेशन करना इस सब चीजों का कोई डेफिनेट उत्तर होता नहीं है। ज्यादातर लोग इस तरह का स्पेककुलेशन करते भी नहीं है। किंतु खैर यह मैंने किया। बिना उत्तर का यह प्रश्न है जो कि इसके बारे में सोच के हम माने बेनिफिट यही है इस तरह के प्रश्न करने का और इस तरह के प्रश्न के बारे में सोचने का कि किसी ना किसी तरह से श्री रामकृष्ण मां शारदा देवी के जीवन के प्रसंग है उसका चिंतन अपने माइंड में चलता रहे। तो यह पूरा गहनों का विवरण है। इसके बाद में गंभीरानंद जी कहते हैं सरला आधुनिक शिक्षा विहीना ओ अभी अभिजात्यादी द शून्या श्री मां के चिनीते पारा सहज नहे जो सरल है जो आधुनिक शिक्षा के जिनको कि जिनके पास में कोई आधुनिक शिक्षा नहीं है और आदि जाती आदि शून्य यानी कि एक तरह का यह जो हाई सोसाइटी घमंड होता है लोगों में एक तरह का जो हाइपोक्रेसी होता है उसके बिना ना कि श्री मां को जानना वो सहज नहीं है। ताई श्री रामकृष्ण स्वयं तहां स्वरूप प्रकटितो कोते अग्रसोर होइया छिलेन इसीलिए श्री रामकृष्ण स्वयं उनका स्वरूप प्रकाशित करने के लिए अग्रसर हुए थे आगे बढ़े थे त जानते तजे त्यागेश्वर्य पूर्ण वर्तमान जुगे शुद्ध शत पवित्रताए परिपूर्ण ए चरित्र खानी सम्यक उपलब्धि करा आमादे शक्तिर बाहिरे उनको पता था कि यह भोग और ऐश्वर्य पूर्ण वर्तमान युग है। उसमें शुद्ध सत्व पवित्रता से परिपूर्ण इस चरित्र को समझना ठीक-ठीक समझना सम्यक उपलब्धि ठीक-ठीक समझना हमारी शक्ति के बाहर है। ताई तिनी श्री मां संबंधे रहस्य छले बोलितेन और इसीलिए वह मां शारदा के बारे में वो हंसते-हंसते कहते रहस्य करतेकरते कहते छाई चापा बेड़ाल यानी कि यह माने छाई यानी कि भस्म भस्म से आवृत एक बिल्ली होती है। उस तरह से मां को कहते हैं छाई चापा बेडाल। भस्मावत एक बिल्ली। भस्मा मारारे बैमन लोको चखुर अंतराले थाकिया जाए श्री माय अंतरे सौंदर्य ओ तेमनी साधारण अज्ञात जो जदी भस्म से आवृत देह का वर्ण है देह का जो रंग है वह लोगों को समझ में नहीं आता उनको पता नहीं चलेगा वैसे ही मां के अंतर का जो सौंदर्य है वह भी लोगों की समझ में नहीं आएगा लोग उसको लोगों से लोगों की नजरों से वह अज्ञात ही रह जाएगा। जैसे देखिए कि भगवान शिव को हम देखते हैं शशान में रहते हैं और भस्म से अपने देह को लप देह को लिंपित करते हैं। भस्म अपने देह पे आवृत करते हैं। इसका एक देखिए कि भस्म से देह को आवृत करना उसका कुछ ना कुछ मेडिसिनल यूज़ तो है ही है। मच्छर वगैरह काटेंगे नहीं जो कि यदि आप खुले में रहते हैं, श्मशान में रहते हैं तो एक बहुत बड़ा भय यह रहता है। मच्छर ना कि कुछ ना कुछ आकर के काट जाएगा। तो मैंने ऐसा कहीं पे पढ़ा था कि भस्म जो लेप कर देते हैं अपने देह पे तो मच्छर वगैरह या तो अन्य कोई पशु वगैरह आपको काटेंगे नहीं। यह तो एक है। दूसरा है कि भस्म से अपने देह को आवृत करना। यानी कि यदि देह का जो रूप और सौंदर्य है उसको छुपा के रखना। देखिए कि जो त्याग के रास्ते पर जाते हैं बहुत बार ऐसा होता है कि उनके मन में तो कोई लोभ लाभ वासना या तो फिर कामना उनके मन में तो नहीं होती किंतु उनसे आकर्षित होकर के दूसरे लोग उनका मन लुभाने का प्रयास करेंगे तो ऐसा ना हो कि उनके रूप देह के सौंदर्य से दूसरे लोग मोहित होकर के उनके रास्ते में ध्यान या तो साधना के रास्ते में बाधा बने ने ऐसा ना हो इसलिए साधक गण भारत की जो सनातन परंपरा इसके अनुसार अपने देह को इस तरह से यह भस्म से आवृत करके रखते थे। तो यहां पे भी देखिए कि ठाकुर कहते हैं जिस तरह से भस्मावृत देह होता है उसका सौंदर्य या तो फिर उसका सही रंग लोगों को पता ना चले वैसे ही श्री मां के हृदय मन के अंतर में जो विद्या का सौंदर्य, जो यह ज्ञान का सौंदर्य, मातृत्व का सौंदर्य, चरित्र का सौंदर्य यह लोगों की नजर से अज्ञात ही रह जाएगा। मां खुद तो अपना खुद का प्रचार करने वाली नहीं है। तो फिर मां का मां के बारे में भक्तों को बताएगा कौन? तो यह काम सबसे पहले ठाकुर ने किया था और उसके बाद में स्वामी जी ने किया था। एक तरह से देखें कि ठाकुर का और स्वामी जी का पूरा जीवन का आप कंक्लूजन के रूप में क्या कहेंगे कि ठाकुर ने इतनी बार-बार समाधि में जाते थे। फिर यह त्यागी संतानों को उन्होंने तैयार किया। बाद में यह रामकृष्ण संघ की स्थापना की। म अल्टीमेट कंक्लूजन आप ठाकुर के जीवन में क्या निकालेंगे? यही तो निकालेंगे। स्वामी जी के जीवन में क्या कहेंगे कि हां उन्होंने वेदांत और योग का नव युग में फिर से पुनः स्थापना की। भारतीय आध्यात्मिकता का विजयध्वज पूरे विश्व में फैलाया। बेलूर
अपनी सेवा के लिए ठाकुर माँ काली से एक धनी व्यक्ति को मांगते है
मठ की स्थापना की। शिवज्ञान जीव सेवा का जो आधुनिक मंत्र है उसके अनुसार यह जो लोक कल्याण के कार्यावली है उसका प्रारंभ किया। यह स्वामी जी के जीवन का कंक्लूजन होगा। अभी यह मां की दृष्टि से देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी दोनों के जीवन का कंक्लूजन यही होगा कि ठाकुर ने अपनी यह आध्यात्मिक ऐश्वर्य से और स्वामी जी ने विद्या के ऐश्वर्य से लोगों को तो सबसे पहले आकर्षित किया। फिर वही जब यह ऑडियंस इकट्ठा हो गया तो इन दोनों ने जैसे कि सेंटर स्टेज पे मां को ही प्रोजेक्ट किया। मां को प्रोजेक्ट करके दोनों लोग अपने-अपने रास्ते पर चले गए। ठाकुर का देखिए कि उन्होंने मां का प्रारंभ ही हुआ है। उनका यह जो मां का जो मिशन है उसका प्रारंभ में ही ठाकुर ने खुद ने महासमाधि ले ली और फिर स्वामी जी ने क्या किया कि पूरे संघ की रचना हो गई। मां के लिए स्टेज तैयार हो गया। तो फिर जैसे कि स्वामी जी ने महासमाधि ले ली। उसके बाद में 1902 में स्वामी जी की महासमाधि के बाद में वो फिर यह राधु को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करने के बाद में ही तो मां का ये जो मिनिस्ट्री है मां का ये जो मिशन है जगत में मातृभाव का प्रचार करना उसका सही-सही प्रारंभ ये ठाकुर और स्वामी जी के जाने के बाद में ही हुआ है। इन दोनों के रहते-रहते तो मा जिस तरह से ये ठाकुर ने कहा भस्मावृत्त ये बेडाल यानी कि बिल्ली की तरह किसी को पता नहीं था या तो फिर पता था तो वही त्यागी संतानों को अंतरंग भक्तों को और स्त्री भक्तों को सिर्फ इतनों को ही पता था कि मां का सही स्वरूप क्या है। जगत के सामने मां का सही स्वरूप जैसे ही प्रकट होने का प्रारंभ हुआ माने कि इन दोनों ने जैसे ही ठाकुर और स्वामी जी ने जैसे ही मां का सही स्वरूप जगत के सामने प्रकट करने में अपना जो कार्य था वो समाप्त हुआ वो कार्यभार उन्होंने वहन किया वैसे ही जैसे कि दोनों का स्टेज के ऊपर में से एग्जिट हो गया। ठाकुर ने आकर के पहले तो ऑडियंस इकट्ठा किया। स्वामी जी ने बहुत बढ़िया स्टेज बना दिया और फिर यह ऑडियंस इकट्ठा हो गया। स्टेज बन गया। फिर ठाकुर और स्वामी जी दोनों चले गए। इन दोनों ने मां शारदा देवी को आवाहन करके स्टेज के ऊपर में लाकर के स्थापित किया। अभी यह जगत में रामकृष्ण मशीन या तो रामकृष्ण मिशन जो कुछ भी कर रहा है देखेंगे कि इसके सेंटर में यह मां का ही आशीर्वाद यह भक्त जननी संघ जननी या तो फिर यह जो मां जगन माता यह जो इस सब जो इस सब शब्दों से इस सब इस तरह की प्रशंसा से मां को जब हम आभूषित करते हैं। इसके पीछे का रीज़न क्या है कि वह ठाकुर या तो स्वामी जी दोनों के बस की बात नहीं थी। उन्होंने अपना-अपना रोल तो निभाया किंतु जो भविष्य में रामकृष्ण भावधारा का यदि प्रचार होना है यदि पूरे विश्व में उसको फैलना है तो मुझे ऐसा लग रहा है मेरा पर्सनल एनालिसिस है कि उसके सेंटर स्टेज में मां शारदा देवी को ही रहना है। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास में फिर से इसको आगे पढ़ेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु