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Meditation ·

Meditation 02 sep 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः ध्यान के बारे में कुछ बात करते हैं। मैंने एक स्लाइड शो बनाया है। इस वीकेंड पे थोड़ा सा टाइम था और यहां पे क्या है कि वो बच्चों के क्लास चलते हैं वैसे यूथ फोरम तो उसमें मैं थोड़ा कुछ बातें कर रहा था तो बेस्ड ऑन दैट मैंने यह बनाया है स्लाइड शो

ध्यान करे हमेशा हृदय में

अभी देखिए अ ध्यान के बारे में यह जो चित्र है वो बेसिकली हम सभी लोग इस चित्र से फमिलियर तो है ही है कि यह टट चक्र है हमारे देह के भीतर में इड़ा पिंगला सुषुमना यह तीन नाड़ियां है और यह स्पाइनल कॉर्ड जो है अपना इसके और यह इस नाड़ियों के ही इस पाथवे में यह चक्र है तो उसमें से जो अपर तीन थ्री चक्र है ऊपर वाले तीन चक्र वही हमारे लिए वैसे तो इंपॉर्टेंट है अनाहत विशुद्ध और आज्ञा उसमें भी आप देखिए वैसे सहस्त्रार कोई चक्र नहीं इन लोगों ने इस पिक्चर में रख दिया है किंतु चक्र यदि कहेंगे तो वो मूलाधार से लेकर के आज्ञा तक ही है और आज्ञा चक्र जैसे कि हमको पता है भ्रू मध्य में है अर्थात कि यहां पे अभी क्या है कि इस तरह के पिक्चर को देखकर के और जब हम ध्यान करने का अपने जीवन में सर्वप्रथम हम प्रारंभ करते हैं तो हम लोग करते क्या है? एक तो एक प्रीकंसिव कुछ नोशन होते हैं। प्लस कुछ कहां से इधर-उधर से यह सब पॉपुलर चीजें जो कि अपने कल्चर में चलती है, वह सब हम कुछ देख लेते हैं। और फिर यह सब कुछ देख के हम लोग क्या करते हैं? ध्यान करने की शुरुआत सीधी अपने मस्तिष्क के भीतर में करते हैं। जैसे कि एक्चुअली बचपन से ही हमको अभी क्या है कि यूजुअली तो हम यह सब चीजों के बारे में ज्यादा सोचते भी नहीं। अब जैसे यह सांस लेना है। ब्रीथिंग जो है अ यह ब्रीथिंग क्या है? ऑटोमेटिक है। जब तक हम प्राणायाम नहीं सीखेंगे तब तक हमको यह सेंस नहीं आएगा कि ब्रीथिंग को भी हम लोग कंट्रोल कर सकते हैं। उसको नियमन कर सकते हैं और उसमें से बहुत सारे बेनिफिट डिराइव कर सकते हैं। तो जब तक हम प्राणायाम नहीं सीखेंगे तब तक ब्रीथिंग जो है जो अपने आप जो होता रहता है वैसा ही होता रहेगा। किंतु सिमिलरली सिमिलरली यह अपनी कॉन्शियसनेस या अपने माइंड के साथ में हम जो कुछ भी करते हैं सिस्टमेटिक रूप से तो हम बचपन से कभी सीखे नहीं है। इसलिए हम जो एक कहेंगे कि बाय डिफॉल्ट जो हम करते आ रहे हैं जीवन भर करते जा रहे हैं। होता क्या है? हम कुछ भी सोचते हैं तो अपने मस्तिष्क के भीतर में ही सोचते हैं। अपने हेड के भीतर में या तो फिर यहां पे ही अपना कंसंट्रेशन होता है। जब हम सोचते हैं तब अभी पहले के जमाने में क्या था कि लोगों का लाइफ एक तरह से देखें तो स्लो लाइफ था। सुबह को यदि घर से निकल कर के दुकान पर जाना है या तो खेत में जाना है या तो कोई भी काम करने के लिए जाना है तो या तो पैदल जाएंगे या तो फिर यह बैलगाड़ी में बैठकर के जाएंगे। यानी कि एक जगह से दूसरी जगह तक जाने का जो जर्नी है वो काफी टाइम ले लेता था। दूसरा कि एक तो प्रेशर जो होता है, रश जो होता है काम का वह भी इतना नहीं होता है। बेसिकली रूरल इकोनमी थी, आर्टिजंस थे, गवर्नमेंट ऑफिसर्स थे तो रश होता है कभी-कभी ऑकेजन के ऊपर में कि हां अभी शारदीय दुर्गा पूजा आ रही है तो अपनी दुकान में ज्यादा सामान रखना होगा क्योंकि ज्यादा कस्टमर आएंगे। अदरवाइज क्या होता था? मैं अपने बचपन के दिनों की बात बताता हूं कि हमारे यहां पर गांव में मैं जाता था अपनी मां के घर तो वहां एक दवाई की दुकान थी तो वहां पर वो मेरे जो नाना थे वो वहां पर बैठे रहते थे। वो गुजराती में कहते हैं गल्ला या तो फिर कहेंगे वो काउंटर इंग्लिश वर्ड है। तो वहां पर बैठे रहते थे। अभी दिन भर में एक दो एक दो करके कोई ना कोई आएगा दवाई लेने के लिए तो वे लोग वो मेरे नाना जो थे वो दवाई देते थे रुपया लेते थे और वह वहां पर ड्रॉवर में रखते थे और बस इतना वो करते थे तो एक कस्टमर को या एक जो यह है दवाई लेने वाला उसको निपटाने में ज्यादा से ज्यादा कितना टाइम लगेगा और गांव है ना ऐसा नहीं कि डॉक्टर लोग आपको कई बहुत सारी फैंसी मेडिसिंस लिख देने वाले है। आपको यदि कोई सीरियस बीमारी है तो गांव में ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर भी नहीं मिलेगा। फिर आपको पास वाले किसी शहर में जाना होगा। यहां पर गांव में तो यह सब जो जनरल जो बीमारियां है उसको ट्रीट करने वाले डॉक्टर और उनकी तरह की दवाइयां तो एकदम मैंने देखा मैं जब वो गांव में जाता था वो छुट्टियों के दिनों में देखता था कि वहां पर मेरे नाना है। फिर मेरे और एक चाचा थे। फिर एक वर्कर है एक दो वहां के वे लोग ऐसे बैठे रहते थे कभी आपस में गप लगाते थे वरना बाहर में देखते रहते थे वहां खुला मैदान था वो बहुत खुला एक ग्राउंड है आसपास में ऐसा कोई बिल्डिंग वगैरह कुछ नहीं था तो सामने मैदान में देखते रहेंगे तो मैं देख मैं शहर से जाता था तो तो शहर से जाने के समय ऐसा लगता था कि शहर का जीवन और गांव का जीवन जैसे हम YouTube वीडियो होता है ना YouTube वीडियो आपको कोई टॉपिक पता है जनरली और आप स्पीड में देखना चाहते हैं तो आप उसका स्पीड बढ़ा सकते हैं। तो 1x करके स्पीड आता है। 1.25 टाइम्स 1.25 एक्स स्पीड बढ़ा सकते हैं। 1.5 मैं यूजुअली वो वीडियो वगैरह यदि कोई देखता हूं मतलब इस तरह से वेदांत के कोई क्लासेस तो फिर मैं 1.5 या 1.75 या बहुत बार टू टाइम स्पीड करके देखता हूं। क्योंकि बहुत सारा कुछ तो पता ही है। अभी जनरली मेनमेन पॉइंट ही हमको दिखने हैं। तो ऐसा टू टाइम स्पीड करके मैं वीडियो को भगाता हूं। तो इसे तो फटाफट खत्म भी हो जाता है और जो मेन चीजें हैं वह देखने को मिल जाती है। तो ऐसा मुझे लगता था गांव का जो लाइफ है ना वो 75 ना कि 50 टाइम्स स्पीड पर चल रहा है और शहर का जो लाइफ है वो टू टाइम्स ना कि 2.5 टाइम्स ना ऐसी स्पीड पर चलता है। तो क्या है जो मैं कहना चाहता था कि उस समय पहले का एक समय था जबकि यह जीवन का गति जो था ना वह काफी स्लो था कंपेयर टू टुडे तो हम लोग क्या है ना सोचने के लिए इतना कोई हैबचुएटेड नहीं थे अपना फोकस कहां पे रहता है जो फिजिकल वर्क कर रहे हैं उसके ऊपर में या तो अपना फोकस रहता है या तो फोकस एक डिफ्यूज रहता है नहीं कि कंसंट्रेटेड होकर के अपने दिमाग में बैठा रहता आज जो प्रॉब्लम हमारे साथ में आधुनिक युग के साथ में स्टार्ट हुआ है भारत में खास करके पिछले 50 सालों में वो है कि हमारा लाइफ इतना फास्ट हो गया है। इतना घड़ी के कांटों के साथ में हमको अपना लाइफ मैच करवाना पड़ रहा है कि सतत अपने भीतर में एक एंजायटी रहता है कि अच्छा इसके बाद में क्या होने वाला है? आज अभी 8:00 बजे हैं तो यह करना है। 8:30 को यह करना है। 9:00 बजे यह करना है। 9:30 को यह करना है। यानी कि समय हमको चलाता है। समय के अनुसार हमको दौड़ना रहता है। स्वामी जी की वो फेमस है ना कि वो एक जगह पर जा रहे थे ट्रेन में बैठने के लिए। तो सब लोग स्वामी जी को कहते हैं स्वामी जी जल्दी करिए जल्दी करिए। ट्रेन चली जाएगी। ट्रेन चली जाएगी। स्वामी जी अपनी बिल्कुल राजाशाही चाल के साथ में चलते रहते हैं। वो कहते हैं कि ट्रेन एक जाएगी तो दूसरी मिल जाएगी। इतने में टेंशन लेने की क्या बात है? मैं समय के समय मैं थोड़ी ना समय के अनुसार चलूंगा। समय को मेरे अनुसार चलना है। तो खैर स्वामी जी की बात अलग थी। किंतु दैट इज व्हाट कि आज का युग जो है कि इतना एंग्जायटी और रश और इतना पावर पैक्ट और एक्शन पैक्ट युग है कि हम लोगों को ना सोचने की एक हैबिट हो गई है और रेदर कहेंगे कि एक बैड हैबिट हो गई है। अभी हम लोग सब समय अपने माइंड में कुछ ना कुछ सोचते ही रहेंगे। सोचते ही रहेंगे। यह अपना जो व जो वर्क है ना फिजिकल वर्क की जगह मेंटल वर्क बहुत ज्यादा हो गया है। और सिर्फ माने जो इंटेलेक्चुअल टाइप का वाइट कॉलर वर्क करते हैं सिर्फ यह लोग ही नहीं इंडस्ट्री की लैंग्वेज में जिनको ब्लू कॉलर वर्कर या तो फिर यह मैनुअल वर्कर कहा जाता है। उन लोगों की लाइफ में भी ना अभी मेंटल एक्टिविटी इतनी बढ़ गई है। सब कुछ जैसे कि माइंड आपका आपको खा जा रहा है। आपके शरीर की जितनी एनर्जी है, आपकी जितनी प्राण शक्ति है, मन जो है अपनी प्राण शक्ति को जैसे कि खा जा रहा है और किसी चीज के लिए, थोड़ा सा रिलैक्स होने के लिए, आनंद करने के लिए या तो फिर जस्ट जैसे मैं अपने गांव में देखता था मेरे नाना को वहां पर वह काउंटर पर बैठे हैं और बाहर में देख रहे हैं। तो क्या है कि दी डेज़ आफ्टर डज़ दिन के बाद दिन ऐसे बीतते जाएंगे और जैसे कि माने आप समय के परे होकर के रहते हैं ना ऐसा लगता है। अभी भी मैं यह जो कंस्ट्रक्ट खड़ा करता हूं इमेजिनरी कंस्ट्रक्ट यह मेंटल इमेज कि कहां पर जाकर के हमको पीस मिलती है। शांति मिलती है। तो एक तो है ऑब्वियसली बेलूर मठ एक कंस्ट्रक्ट है। बेलूर मठ में ज्वाइन करने को गया था। उन दिनों का एक कंस्ट्रक्ट बनाता हूं। दक्षिणेश्वर ऑब्वियसली एक कंस्ट्रक्ट है। जयराम भाटी है। किंतु यह जो हमारी दुकान थी वह भी एक कंस्ट्रक्ट में बनाता हूं। यहां पर जैसे कुछ नहीं हो रहा है। दिन सुबह, दोपहर, शाम, संध्या, रात एक के बाद एक आते जाते हैं और मैं बस वहीं पर वो मेरे नाना के साथ में काउंटर पर बैठा हूं। जैसे जगत के साथ में अपना कोई लेना देना नहीं है। जगत का जो एक प्रेशर है, एक जीवन का प्रेशर है, अपने ऊपर में है ही नहीं। जैसे कि इस जीवन में हमको कुछ स्पर्श ही नहीं करता। तो खैर अभी प्रॉब्लम हम लोगों के साथ में क्या है? एक ओवरथिंकिंग करने की एक हैबिट पहले से ही हो गई है। और यह हैबिट की वजह से अपना कंसंट्रेशन सब समय अपना फोकस जो है सब समय अपने यह मस्तिष्क के भीतर में रहता है। इसी के ऊपर में जैसे हम सोचते ही जाते हैं, सोचते ही जाते हैं। बहुत बार अपना लाइफ जैसे कि अभी दो तरह के तो काम होते हैं। अपने कर्म यदि कोई भी एक्टिविटी करते हैं। एक एक्टिविटी ऐसी होती है जिसमें हमको एक्टिवली एंगेज रहना पड़ता है कि अभी मैं किसी के साथ में वार्तालाप कर रहा हूं तो मुझे आप मेरा फोकस जो है या मेरा जो कंसंट्रेशन है वह वार्तालाप पे ही करना पड़ेगा और वह ऑटोमेटिक हो ही जाता है और या कोई नई जगह पर जाते हैं तो किस तरह से जाना अब यात्रा करते हैं तो यात्रा में आपका पूरा फोकस आपका वह उसी पर लगा रहता है। किस तरह से ट्रेन की टिकट निकाले। अब ट्रेन में बैठने को जाएंगे तो मेरा बर्थ कौन सा है? ट्रेन स्टार्ट होती है तो लगेज की चिंता। फिर वो चाय वाला आता है तो उसके पास में से वो एक ख्याल में रखना होता है कि चाय वाला आता है। कहीं-कहीं पे कोई-कोई रूट पे कहां पे अच्छी चाय मिलती है, नहीं मिलती वह हमको पता हो जाता है पहले से। या तो हम कर लेते हैं तो फिर वह अच्छी चाय मिलने से उसको पीना है नाश्ता यदि लाए हैं तो मतलब वो लंच बॉक्स में उसको खाना है वगैरह वगैरह आपका पूरा फोकस उसमें रहेगा किंतु जो यात्रा आप डेली करते हैं जैसे कि मैं अपने घर से अपने क्लास में या अपनी जॉब पे जाता हूं तो क्या है कि यह सबकॉन्शियस मसल मेमोरी ऑलरेडी फिट हो गया है तो फिर बहुत बार ऐसा होता है कि मैं ड्राइविंग कर रहा हूं और मेरा माइंड जो है। फिर से वही अपने सर पे आकर के बैठ गया है। और वही वह भूत पिशाच जो घूमते रहते हैं वह घूमते ही रहेंगे। यानी कि दो तरह की एक्टिविटी है। एक तरह की एक्टिविटी में हम एक्टिवली एंगेज रहते हैं। अपना कंसंट्रेशन वो मांगता है और हमको अपना कंसंट्रेशन देना पड़ता है। तो जब तक हम इस तरह की कोई एक्टिविटी करते हैं, हम बड़े खुश रहते हैं कि हां चलो कि मैं कुछ कर रहा हूं और मुझे सेटिस्फेक्शन भी हुआ। किंतु जैसे ही हम उस तरह की एक्टिविटी करते हैं जो कि बहुत ज्यादा तो मसल मेमोरी पर ही चल जाता है जो कि बहुत ज्यादा तो ऑटो पायलट पे ही चल जाता है। आजकल की वो जो ऑटो पायलॉट कार आती है ना वो ऑटोमेटिक वो चलती है वो ऑटो नेविगेशन तो वैसे ही आप वो आप वो डेस्टिनेशन डाल दीजिए। यहां से स्टार्ट करना है। वहां पे एंड करना है और ऑटो पायलॉट ऑन कर दीजिए। वह कार अपने से चलती जाएगी। तो अपना बॉडी भी बहुत सारा जो काम है दिन का अभी खाना पकाना है, कपड़े धोने हैं, बर्तन धोने हैं, स्नान करना है, ब्रश करना है कुछ भी बहुत सारा कुछ अपने जीवन का जो कि यह ड्राइविंग है जैसे कि वो बहुत सारा कुछ ऑटो पायलॉट पे ही चलता है। और ऑटो पायलट पर चलने की वजह फिर वही सीरियस प्रॉब्लम खड़ा होता है कि मेरा माइंड जो है उसका फोकस जो है फिर से वह अपने सर के भीतर में जाकर के वो दुनिया भर का उत्पात करता रहेगा। यानी कि बहुत बार लोग कहते हैं कि मैं कोई काम में बिजी रहना चाहता हूं जिससे कि मेरा माइंड ठीक रहे। हम क्यों ऐसा कहते हैं? क्योंकि इस तरह का काम करना है जो कि अपना एक्टिव एंगेजमेंट मांग लेता है। तो उसकी वजह से क्या होता है कि हम लोगों का मेंटल हेल्थ ठीक रहता है। वरना मैं अब जैसे कि मैं राजकोट में था तो राजकोट में दो लड़के मुझे एक दिन मिलने को आए तो उसमें से एक लड़के को कुछ प्रॉब्लम था और उसका मित्र उसको लेकर के आश्रम में आया था कि इसको कुछ क्वेश्चन है कुछ प्रॉब्लम है तो क्या सॉल्यूशन है तो ऑफिस में से मेरे पास में भेज दिए थे इन दोनों लड़कों को कि यह क्या कॉम्प्लिकेटेड मामला है वहां पर जाकर काम जाओ उनके साथ बात करो करके तो मैं पूछ रहा हूं हूं। मित्र के साथ में मेरी पूरी बात हो रही है। जिस लड़के को प्रॉब्लम है कुछ बोल नहीं रहा है। मित्र क्या कहता है कि यह मेरा है। यह मेरा अच्छा दोस्त है और यह लेक्चरर था कॉलेज में। कंप्यूटर साइंस उसने स्टडी किया है। सब कुछ उसका उसका अच्छा चल रहा था। फिर पता नहीं सडनली क्या हुआ कि कुछ कारण की वजह से ना कि कोई भी फैमिली ऑब्लिगेशन वो राजकोट में जॉब करता था। वह छोड़कर के अपने गांव चला गया। अपने गांव में उसका फार्म है और उसकी मां है तो मां की संभाल लेता है। फार्म में काम करता है। फार्मिंग करता है। तो अभी मैंने कहा अच्छा तो ये तो उसमें गलत कुछ नहीं है। तो शहर के लड़के यदि गांव में जाकर के फार्मिंग करेंगे उससे तो अच्छा और कुछ नहीं। तो प्रॉब्लम क्या है? तो फिर वो कहता है तुम बोलो ना। अभी जो लड़का जिसको प्रॉब्लम है बोल नहीं रहा है। किंतु आखिर में उसने बोलना शुरू किया। कहता है कि मुझे अभी यह सब इतनी सारी बैड हैबिट लग गई है। ये सतत में कंटीन्यूअस ये जो सोशल मीडिया है, यह शॉर्ट वीडियोस है, यह सब देखता रहता हूं। और इस सब चीजों से कैसे छूटा जाए पता नहीं चलता। दूसरा मेरा टेंशन बहुत बढ़ गया है। मुझे रात को नींद नहीं आती है। यह सब प्रॉब्लम स्टार्ट हो गए हैं। तो मुझे क्या करना चाहिए? तो अभी मैं समझा कि अच्छा ठीक है प्रॉब्लम क्या है? मैंने कहा देखो तुमको वर्क थेरेपी चाहिए। तुम एक काम करो। मुझे पता है शायद तुम मेरी बात नहीं स्वीकार करोगे। किंतु यदि मेरी बात स्वीकार करो तो एक काम करो। यह राजकोट में क्या है ना दुकान बहुत सारी है। शॉप जिसको कहते हैं ना बहुत सारी शॉप है। तो अभी शॉप के ऊपर में दुकान में वो काउंटर पर काम करने के लिए किसी को चाहिए। ये यंग लड़के लड़कियां वो काउंटर पर काम करते हैं। तो क्या है? दुकान का जो मालिक है वह थोड़ा इधर-उधर जा सकता है। उसको कंटीन्यूअस काउंटर पर बैठने की जरूरत नहीं। तो काउंटर पर ये जो लड़के लड़कियां काम करते हैं उनका क्या होता है काम कि कोई कस्टमर आता है तो उसको बताना है कि अपनी दुकान में यह ये मिल रहा है इसका यह प्राइस है उसका वो प्राइस है वगैरह-वगैरह और यदि ट्रांजैक्शन फाइनल हो जाए तो उसको जो साड़ी है जो भी है उसको दे के पैसा लेके ट्रांजैक्शन खत्म करना है। यह काउंटर वाले लड़के लड़कियों का काम है। मैंने उसको कहा कि तुम बिजीएस्ट जो दुकान है ना सबसे ज्यादा कस्टमर वहां पे आते हैं। ऐसी किसी दुकान में जाकर के यह तुम काउंटर पर बैठने का काम तुम ले लो। यदि वह दुकान मालिक ऐसा कहता है कि मुझे जरूरत नहीं है किसी लड़के की या तो फिर जो भी है तो तुम उसको कहना कि मैं फ्री में काम करूंगा। किंतु तुम फिर भी काउंटर पर बैठो। एक महीना तुम काउंटर पर बैठकर के अपना जो पूरा मन है ना पूरा कर्म में लगा दो। पूरा 100% ओके इस तरह की जगह तुमको सेलेक्ट करनी है। कंटीन्यूअस कस्टमर आते ही जाते हैं। आते ही जाते हैं। और तुम्हारा मन जो है वो कंटीन्यूअस कस्टमर के साथ में बात करने में पैसों का ट्रांजैक्शन करने में यह जो दुकान में जो बिक्री हो रहा है उसको वह बताने में तुम उसी में इस तरह से वह बिजी हो जाएगा कि तुमको और कुछ सोचने का तुमको आवश्यकता नहीं रहेगी। सोचने का तुमको समय भी नहीं मिलेगा। इसको कहते हैं वर्क थेरेपी। ऐसा तुम वर्क थेरेपी एक महीना करो। देखो तुम्हारा माइंड ठीक हो जाएगा। तो ऑब्वियसली यह अब लड़का फिर है थोड़ा अपर कास्ट का। अभी वो बोलता है मैं काउंटर पे बैठूंगा क्या? मैं तो असिस्टेंट लेक्चरर था वगैरह-वगैरह। किंतु खैर अभी उसने मेरी बात स्वीकार की हो ना की ना की हो। उसका फ्रेंड भी थोड़ा डिसअपॉइंट हो गया। उन्होंने सोचा था कि मैं उनको कोई मेडिटेशन की मेथड बता दूंगा। प्राणायाम कुछ बता दूंगा कि वह मुझे बार-बार बोल रहा है उसका मित्र। आप उसको कोई मेडिटेशन सिखा दीजिए ना। कुछ प्राणायाम सिखा दीजिए ना। कोई सुदर्शन क्रिया जैसा कुछ नहीं है क्या यहां पे? तो अभी मैं उसको कहता हूं देखो भाई उसके मन की जो परिस्थिति है इस परिस्थिति में ये जो मेडिटेशन करेगा तो पूरा पगल पागल हो जाएगा। पूरा उसका माइंड हाथ में से जाएगा। अभी उसको चाहिए वर्क थेरापी। बाद में उसको जो करना है वह करो। तो खैर उन्होंने मुंह पर तो हां हां बोल के गए अभी किया होगा नहीं किया होगा वह तो ठाकुर जाने किंतु देखिए यह हमारे आज के जीवन की ना एक बहुत बड़ी वास्तविकता है कि अपना माइंड अपना बॉडी जो है बहुत बार ऑटो पायलट पर काम करता है और अपना माइंड हमको इस तरह से पागल करके रख देता है। इस तरह के राक्षस हमारे माइंड के भीतर में घूमते रहते हैं कि इसके लिए ना फिर जब हम ध्यान करने को भी जाएंगे ना यह लड़के को मैंने क्यों कहा कि तुम्हारी जो परिस्थिति है उसमें तुम ध्यान करोगे ना तुम पागल हो जाओगे। प्रॉब्लम क्या है? हम ध्यान करेंगे तो ऑलरेडी अपना माइंड का फोकस यहां पर बैठा हुआ है। ऑलरेडी दुनिया भर के राक्षस यहां पे अपने मन के भीतर में अपने हेड के भीतर में वो सब धमा नृत्य कर रहे हैं। तांडव नृत्य कर रहे हैं। स्वामी जी का वो जो फेमस उदाहरण एक बंदर फिर उसने शराब पिया। फिर उसको बिछी ने काटा। फिर उसके सर पर भूत सवार हुआ। तो अभी आप सोच लीजिए वो किस तरह से पागलामी करेगा। किस हद तक वो रेस्टलेस हो जाएगा। तो यहां पर भी अपना मन जो है ऑलरेडी रेस्टलेस है। ऑलरेडी उसको उसने शराब पी रखी है। ऑलरेडी उसको बिछी ने काट के रखा है। ऑलरेडी उसके सर पर भूत सवार हो गया है। और वैसे ही तो बंदर है। तो ऑलरेडी हमारा ध्यान है अपने सर के भीतर में है। और फिर हम यदि मेडिटेशन स्टार्ट करेंगे। अभी बाय डिफॉल्ट बाय हैबिट हम मेडिटेशन करेंगे। अपने सर के भीतर में ही बहुत बार ऐसा होता है। मेरे खुद के साथ में ऐसा हुआ। बिना किसी प्रॉपर इंस्ट्रक्शन के यह किताब फिताब पढ़कर के ना इधर-उधर से देख के ध्यान करना प्रारंभ कर दिया। आंख बंद करके बैठना है। अपने माइंड में कोई यह कंस्ट्रक्ट वगैरह खड़ा करना जो कुछ भी है। ऐसा कुछ करके अपने माइंड पे ही मैं फोकस कर रहा हूं। तो यह कैसा है पता है? ठाकुर कहते हैं ना कि जिसको विकार का रोगी है फिर यह आचार तेुल वगैरह जहां पर रखा है उसी कमरे में यह विकार के रोगी को रखना है। अब यह रोगी को ना ही पानी पीना है ना ही यह सब चीजें खानी है। किंतु फिर भी एक ही कमरे में रखे हैं और ना खाए इससे बिना हो सकता है क्या? प्रलोभन तो एक ऑब्वियस चीज है। अभी आज का थोड़ा मॉडर्न इसका वर्जन करें तो अभी यह डायबिटीज भी हो गया है और दुनिया भर की ये पेस्ट्रीज और केक और वगैरह जो कुछ भी है चॉकलेट वो जहां पे रखी है उस कमरे में उसको रखा है पेशेंट को। अभी पेशेंट कितना वो टेंप्टेशन सहन करेगा। एक पॉइंट पे वो ही विल गिव इन। वो दुनिया भर की वो पेश्री पेश्री खाना शुरू कर देगा। शुगर स्पाइक हो जाएगा। सो दिस इज वेरी डेंजरस थिंग कि यह सब पॉपुलर चीजें देख के बिना किसी प्रॉपर ट्रेनिंग के हम ध्यान करना प्रारंभ करते हैं। ऑलरेडी मन में विकार प्रवेश कर चुका है और उसी मन के भीतर में हम कंसंट्रेशन करते हैं और उसका रिजल्ट यह आता है या तो फिर आप थोड़ी ही देर में आप ऐसा मने ये हो जाएंगे रेस्टलेस हो जाएंगे कि मैं उठकर के खड़ा हो जाऊंगा ध्यान नहीं कर पाऊंगा बैठूंगा और ज्यादा तो मैं पागल हो जाऊंगा ऐसा एक भीतर में से एक फीलिंग खड़ी होती है आप बैठ ही नहीं पाएंगे और यदि मान लीजिए जोर जबरदस्त करके बैठे तो अभी ठाकुर की कृपा होने से आप निकल जाएंगे क्योंकि यह चित्र तो स्पष्ट कहता है कि आज्ञा चक्र तो यहीं पर है तो उस पर कंसंट्रेट इधर कैसे भी करके उस पर कंसंट्रेशन करेंगे सक्सेस हो जाएंगे तो गलत माने हो भी सकते हैं। सो दैट इज वन थिंग किंतु हम लोगों का प्रॉब्लम क्या है कि हमले ना ही वो शक्ति है कि टू इट्स लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंच पाए कैसे भी करके जो सा शुरुआत में जो तूफान खड़ा होता है कैसे भी करके उसको फेस करके उसके आज्ञा चक्र को भेदन कर दे उसको और फिर सीधा वो सहस्त्रा से ऊपर में अपने कुंडलिनी उठ जाए वो शक्ति तो अपन में है नहीं ज्यादातर लोग यह कैसा है पता है मान लीजिए हमारे में कैपेसिटी है स्विमिंग स्विमिंग पूल तैरने की। अभी यहां पे स्विमिंग पूल तैरने की कैपेसिटी लेकर के मैं यहां पे विशाखापटनम बीच है। उसमें मैं तैरने को जाऊंगा और कहूंगा जैसे मैं स्विमिंग पूल क्रॉस कर देता हूं। चलो मैं यह अरेबियन सी क्रॉस करके अभी नेक्स्ट शोर कौन सा आता है? शायद बांग्लादेश आएगा या तो फिर और ज्यादा जाएंगे तो यह पोर्ट ब्लेयर वगैरह कुछ आ जाएगा। तो वहां तक मैं तैर जाता हूं। इज इट पॉसिबल? यह नहीं पॉसिबल। अभी देखिए इंपॉसिबल भी नहीं है। माने मनुष्य की शक्ति का कोई ऐसे लिमिट नहीं है। हो सकता है कि ठाकुर की कृपा होने से मैं तैर करके ये पोर्ट ब्लेयर वगैरह तक पहुंच भी जा सकता हूं। किंतु प्रोबेबिलिटी कितनी है? पॉसिबल है। प्रोबेबिलिटी कितनी है? 0.01% इससे ज्यादा तो प्रोबेबिलिटी नहीं है। म 99.999% प्रोबेबिलिटी यही है कि 1015 मीटर जाने के बाद में ही मैं डूब जाऊंगा। सो मैं यह नहीं कहूंगा कि मस्तिष्क में ध्यान करना इंपॉसिबल है। मैं यह कहूंगा कि यह इंप्रोबेबल है। इस तरह का खतरनाक एक्सपेरिमेंट कभी नहीं करना चाहिए। ध्यान हमेशा करना चाहिए विशुद्ध चक्र पे अनाहत चक्र पे अपने हृदय में। हमेशा हमेशा यह बात याद रखनी है। जैसे ही ध्यान करने के समय, जप करने के समय कोई भी इस तरह की स्पिरिचुअल प्रैक्टिस हो जहां पे कि अपने कंसंट्रेशन को हम इनवर्ड्स करते हैं। यह जो योग के जो स्टेप्स है यम, नियम, आसन, प्राणायाम। यह चार जो है वह अपना आइदर एटीट्यूड चेंज करते हैं। यम नियम अपना एटीट्यूड चेंज करते हैं। प्राणायाम प्रत्याहार प्राण आसन और प्राणायाम है हमारे बॉडी पर कंसंट्रेशन रखना है। अपनी ये जो अवेयरनेस है बॉडी पर रखनी है। मैं सांस ले रहा हूं अनुलोम विलोम कुंभक कर रहा हूं उस पर कंसंट्रेशन होना चाहिए। और आसन करते हैं तो मैं जो आसन कर रहा हूं उसके ऊपर में कंसंट्रेशन होगा। वो चाहे शीर्षासन हो, अर्धमत्सेंद्रासन हो, सर्वांगासन हो, वृक्षासन हो, विच एवर जो भी आसन है आसन जो मैं फिजिकल कर रहा हूं, मेरे बॉडी पर कंसंट्रेशन होना चाहिए और वहां प्राणायाम में ब्रीथिंग पे होना चाहिए। यम नियम मेरा एटीट्यूड परिवर्तन करता है। मुझे एटीट्यूड पे कंसंट्रेट करना है। किंतु जब से मैं यह प्रत्याहार वाले स्टेज में आता हूं, मेरा जो एक्सटर्नल फोकस है, जैसे ही इंटरनल होता है, धारणा, ध्यान, समाधि जब मैं उस हायर स्टेजेस में प्रवेश करता हूं, देश बंद, चित्तस्य धारणा धारणा अर्थात कि कोई एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मेरे मन को एकाग्र करना वह सर्वप्रथम स्टेप है। इनर मेडिटेशन का, धारणा का। तो, अब जभी मैं कौन-क यह ऑब्जेक्ट ऑफ कंसंट्रेशन चाहे जप हो, ना कि चाहे यह कंस्ट्रक्ट हो, ना कि चाहे कुछ भी हो। यदि मैं उसको अपने मस्तिष्क के भीतर में यहां पे अपने हेड के भीतर में खड़ा करता हूं, दैट विल बी एक्सट्रीमली डेंजरस। एक्सट्रीमली डेंजरस। हमेशा यदि जप करना है, कंस्ट्रक्ट खड़ा करना है, ध्यान करना है, किसी ठाकुर की छवि है, उसको मैं विजुअलाइज करके ध्यान कर रहा हूं या कुछ भी है, एवरीथिंग हैज़ टू बी इनाइड आवर हार्ट। एवरीथिंग हैज़ टू बी इन दी अनाहत चक्र। यदि यह हार्ट को छोड़ के अपना मन यदि यह अपने यह आज्ञा चक्र की ओर जाना या अपने मस्तिष्क की ओर जाना यह प्रारंभ हुआ तो देखेंगे साथ-साथ में ही इतना डिस्टरबेंस आकर के घेर लेगा वैसे ही हमको बिना मतलब सोचने की हैबिट बनी हुई है और यह वैसे ही यह जब आकर के अपने मन में मैं उसके ऊपर में ध्यान कर रहा हूं। ध्यान का अर्थ क्या है? मैं एक्सटर्नल स्टिमुली को काट दे रहा हूं। एक्सटर्नल जो सेंसरी इनपुट है उसको काट दे रहा हूं। यानी यह तो ऐसा हो गया कि वैसे मैं एक अपने मैं शेर के पिंजरे में मैंने प्रवेश किया है। चार्ली चैप्लिन का एक था वो एक मूवी मूवी ना कि एक वीडियो जो भी है। उसमें वो शेर के पिंजरे में वो दौड़ता कहीं से किसी से वह भागता हुआ कहां से आकर के वो पिंजरे में अपने को बंद कर देता है। सोचता है अभी मैं सेफ हूं। अभी मैं बच गया। पीछे देखता है तो पीछे में शेर पड़ा है। बेचारा सोचता है और यह दर भाई अभी पिंजरा खुल नहीं रहा है। बेचारा बाहर नहीं निकल रहा है। तो देखिए कि यह अपने दिमाग में कंसंट्रेशन करना यह बिल्कुल ऐसी बात है कि जगत की समस्या से बचकर के हम लोग आते हैं ध्यान करने के लिए और ध्यान करते-करते पता चला कि यह तो शेर के पिंजरे में बंद हो गए हैं। बाहर की समस्या जितनी थी उससे हजार गुनी समस्या उससे हजार गुने बड़े राक्षस अपने मन में बैठे हुए हैं। और जैसे ही मैंने ध्यान करने का प्रारंभ किया, जप करने का, स्पिरिचुअल प्रैक्टिस करने का प्रारंभ किया, वैसे ही यह सब दैत्य, दानव, राक्षस, मॉन्सर जो कुछ भी है सब जग गए नींद में से और हमको खाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। तो यह तो मने वो आकाश में आकाश में से गिरा खिजूर पर अटका। इस तरह की परिस्थिति ना हो जाए। इसके लिए ध्यान करना है, जप करना है, कंस्ट्रक्ट खड़ा करना है। व्हाटएवर यू डू एवरीथिंग हैज़ टू बी डन इन द हार्ट। शुरू-शुर में आपको थोड़ा सा ये होगा। एंटाई इनटिव लगेगा। क्योंकि क्या है? बाय इंट्यूएशन इतना जो अपना जीवन है 30 साल 40 साल 50 साल जितना हम जिए हैं। हमने तो यही किया है ना। सोचना जो कुछ भी है अपने मन के भीतर में ही तो किया है ना। अपने माइंड में ही तो किया है ना। अभी आप सोचेंगे हार्ट में क्या सोच सकते हैं क्या? इज दिस इवन पॉसिबल? किंतु फिर भी ट्राई करके देखिए। असंभव नहीं है। धीरे-धीरे करके यू विल गेट ए नेक ऑफ इट। कि एक्चुअली तो क्या है? सोचना नहीं है ना। ध्यान में तो सोचने को बंद करना है। यह जो भठी चल रही है अपने दिमाग के भीतर में 24 आवर्स माने रात को भी सपने भी इस तरह के आते हैं। सुबह को उठकर के देखेंगे कि ऐसा नहीं लग रहा कि मैं रात को सोया तो अभी मैं रिलैक्स महसूस कर रहा हूं। सुबह को उठकर के भी वह उतनी ही थकान लगती है। क्यों? क्योंकि यह जो इंजन है अपने माइंड के भीतर में वह चलता ही रहता है। चलता ही रहता है। उसको स्विच ऑफ करने का कोई हमारे पास में उपाय ही नहीं है। वो जैसे वो होता है ना कोई मूवीज में होता है कि वो गाड़ी चल रही है। ट्रेन चल रही है। अभी विलेन ने क्या किया है? उसका ब्रेक फेक वगैरह तोड़ के फेंक दिया है। अभी ये गाड़ी रोकने का कोई उपाय नहीं है। और सामने में खाई है। तो ये अभी वो बेचारा यह हीरो वगैरह क्या करेंगे लोगों को बचाने के लिए। फिर वो कुछ ना कुछ कारनामा करता है। किंतु अपने यह ट्रेन रेक इसको कहते हैं। अपने माइंड के भीतर में यह ट्रेन रेक है। माने उसको रोकने का कोई उपाय ही नहीं है। वो बिना बिना उसकी ब्रेक के बिना उसके इंजन वो जो गाड़ी चलाने वाले पायलट के बिना वो चलती रहती है। चलती रहती है। सो ऑलवेज ट्राई टू कंसंट्रेट ट्राई टू मेडिटेट इन द हार्ट। जैसे ही यह प्रैक्टिस आप प्रारंभ करेंगे, आप देखेंगे कि अपना जो यह फोकस है बार-बार दौड़ करके हृदय में से माइंड की ओर जा रहा है। बार-बार ऐसा होगा। बट ट्राई टू कंट्रोल इट। अभी क्या है कि विल पावर भी तो चाहिए थोड़ा बहुत। यह सब क्रियाएं यदि करनी है आध्यात्मिक जीवन में थोड़ा सा भी आगे बढ़ना है तो बिना विल पावर के चलेगा नहीं। तो यह विल पावर का काम ही यही है कि यह जो अपना जो मन है जो कंटीन्यूस अपने माइंड के भीतर में अपना फोकस खींच रहा है उसको बार-बार जोर करके खींच करके हृदय में ही रखना हृदय पे ही कंसंट्रेट करना। देखेंगे यह कंस्ट्रक्ट बनाना या तो फिर जप करना या कुछ भी है। अब किसी ने मुझे प्रश्न किया कि मैं जब यह बातें कर रहा था किसी ने मुझे प्रश्न किया। जप करते हैं तो सोचते तो हम अपने मन से ही हैं। तो उस समय में कैसे हृदय पर कंसंट्रेट करूं? तो या तो फिर मान लीजिए जप करते हैं तो कर जप करते हैं तो कंसंट्रेशन अल्टीमेटली होना चाहिए। जहां पे आपकी दो फिंगर्स इकट्ठा हो रही है वहां पे। और यदि माला जप करते हैं तो आपका कंसंट्रेशन होना चाहिए। जो वह रुद्राक्ष का यह जो यह है बीड या तो मणका उसके ऊपर में आपका कंसंट्रेशन होना चाहिए। किंतु अब जैसे कि मैं यह कर जप करते-करते यहां पर मैंने उंगली रख के अंगूठा रख के कहा जय श्री राम। फिर कहा जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। अब ये जय श्री राम तो मैं अपने मन में बोल रहा हूं ना। मेरा कंसंट्रेशन दो जगह पर कैसे हो सकता है? वो तो ऑटोमेटिकली माइंड में ही जाएगा। तो देखिए अब जैसे मेरा उत्तर थोड़ा सा डिफरेंट था। पहले तो यह है कि मैं बहुत बार मां नाम का जप करता हूं। अब मां ने खुद ने कहा है कि किसी ने पूछा मां आपका नाम का जप करना है तो कैसे करना है? तो मां ने कहा कि राधा बोलकर के भी कर सकते हो मां बोल के भी कर सकते हो। तो अभी मां जप करना है तो आप यहां पर जब उंगली रखेंगे तो आप यू कैन इजीली विजुअलाइज मां मां मां मां मां उसमें आपको यदि मन में उसका उच्चारण नहीं भी करेंगे तो भी चल जाएगा। सिर्फ मां वो विजुअलाइज करके आपका काम निकल जाएगा। सो दैट इज वन थिंग। अभी ऑब्वियसली है कि अपना जो मंत्र है ठाकुर का वह तो काफी लंबा है। इस तरह से पूरा जो मंत्र है प्रणव फिर बीज और नाम वगैरह सब कुछ एक साथ में आप क्या विजुलाइज कर पाएंगे? आपको तो उच्चारण करना ही पड़ेगा। तो अभी वर्क अराउंड यह है कि आइदर ठाकुर का चेहरा विजुअलाइज कीजिए या तो फिर सिर्फ ओमकार विजुअलाइज कीजिए या तो फिर और एक सॉल्यूशन है कि मंत्र को एक बार पेपर पर लिख दीजिए। उसको विजुअलाइज कर लीजिए। रेदर देन कि उसका उच्चारण करने के पेपर पर लिख के उसको मेमोराइज कर दीजिए कि मंत्र ऐसा दिखता है। फिर उसको जब आप यह उंगली पर लगाएंगे तो फिर उसको पूरे मंत्र को आप विजुअलाइज कर सकते हैं। बट ये सब क्या है कि एक तरह का शॉर्टकट है। अल्टीमेटली यदि आप पूरा मंत्र उच्चारण करते भी हैं और अपना फोकस यहां पर रखते हैं तो भले ही चाहे फोकस आपका स्प्लिट होगा। हो सकता है ऑब्वियसली कि मैं अपने मन में उच्चारण कर रहा हूं। जय श्री राम और मैं अपना फोकस यहां पर रखने का ट्राई कर रहा हूं। तो कोई बहुत बड़ा आपत्ति नहीं है कि भले ही चाहे उसको थोड़ा बहुत स्प्लिट होने दो डज नॉट मैटर। भले ही चाहे मैं अपने मन में ही जय श्री राम जय श्री राम कर रहा हूं और मैं फोकस रख रहा हूं। यहां पे कर जप पे यहां जहां पे मेरा अंगूठा है वो उंगली को जहां पे टच होता है माला लेकर के करते हैं तो ऑब्वियसली है कि जहां पे मेरा अंगूठा जिस बीड के ऊपर में रुद्राक्ष के जिस दाने के ऊपर में वो मैं टच कर रहा हूं वहां पे ऐसा विजुअलाइज करना है कि ये जो बीड है ये जो रुद्राक्ष वो जैसे कि ना वह प्रकाशित हो रहा है। जब भी मैं नए रुद्राक्ष को स्पर्श करता हूं। रुद्राक्ष जैसे कि प्रकाशित हो रहा है। उसमें आप ठाकुर का चेहरा ना कि ऐसा कुछ देख सकते हैं। ऐसा विजुअलाइज नहीं करेंगे तो भी चलेगा। बट थिंग इज दैट कि वो स्प्लिट होता है फोकस जप माला जप या कर जप करने में डज नॉट मैटर। यह कोई बहुत बड़ी आपत्ति नहीं है। आपका मेजॉरिटी ऑफ़ फोकस जो है वो आइदर वो माला पे है या तो कर जप पे है या तो फिर हृदय में भी आप फोकस कर सकते हैं। डज नॉट मैटर। ओनली थिंग इज कि आपका मेजॉरिटी ऑफ फोकस आपके माइंड में नहीं होना चाहिए। सो दैट वास वन क्वेश्चन। तो यह है एक बहुत बड़ा मेरे लिए मैंने जब यह धीरे-धीरे करके डीप में जाना शुरू किया शुरू में तो मुझे इतना रेजिस्टेंस का सामना करना पड़ता था। मैं जैसे ही और क्या है कि अगेन अपना तो एक रहता है ना एक ईगो रहता है कि मैं क्यों अनाहत चक्र पे विशुद्ध चक्र पे फोकस करूं। क्यों नहीं आज्ञा चक्र जो कि हाईएस्ट है उसी पर सीधा फोकस करना शुरू कर दे और फिर यदि अब जैसे कि वेदांत का विचार है विचार मार्ग है अहम ब्रह्मास्मि तो अभी मैं यदि यह भी सोचता हूं कि जीव जगत जीव जगत के भीतर में जो कुछ भी है उसके साथ में ना ही मेरा संपर्क है ना ही उसके साथ में मेरा आइडेंटिटी है। आई एम ब्राह्मण व्हिच इज़ बिय्ड स्पेस टाइम मैटर मैटर और एनर्जी और फिर यह मन वचन बुद्धि अहंकार ये वाणी विचार जो कुछ भी है सबसे परे जो है वो अनंत अजर ये अनंत अजर वगैरह शब्द भी छोटे पड़ जाता है आत्मन को जब डिस्क्राइब करने को जाएंगे बट दैट इज माय रियल नेचर सतचित आनंद इज माय ट्रू नेचर ये जब हम विचार भी करते हैं तो विचार करते हैं अपने मन के भीतर में और जैसे यह विचार मार्ग का सहारा लेते हैं। फिर से वही प्रॉब्लम स्टार्ट होता है। भक्ति योग का शरणागति रूपी कुछ भी करने को जाते हैं। तो अगेन अपने मन में हम प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर आप मुझे अपना संतान की तरह देखिए। आप मेरे मां है, पिताजी है। आप मुझ पर कृपा कीजिए। ज्ञान भक्ति वैराग्य मुझे अर्पण कीजिए। प्रार्थना भी जैसे आप अपने मन में करते हैं जो कुछ भी करते हैं माने आइदर यह सांसारिक कोई भी कार्य है वह भी अपने मन में करना है। स्पिरिचुअल कार्य जो भी है वह भी अपने माइंड में करना है। तो क्या है कि यह बहुत बड़ा मुझे रेजिस्टेंस सामना करना पड़ा था। धीरे-धीरे करके मुझे समझ में आया कि एटलीस्ट इनिशियल स्टेजेस में हमको अपना कंसंट्रेशन या तो फोकस अपने माइंड में ना रखें। जितना उतना अच्छा है। यदि आप कर जप करते हैं, आपका फोकस उंगली पे है, माला जप करते हैं तो आपका फोकस माला पे है। यदि आप कंस्ट्रक्ट खड़ा करते हैं तो अपने हृदय में करते हैं। यदि वेदांत विचार करते हैं तो हृदय में करते हैं। भाव साधना करते हैं, विजुअलाइज करते हैं कि मैं दक्षिणेश्वर में मां शारदा देवी की गोद में बैठा हुआ हूं। एक बिल्कुल शिशु होकर के और मां मुझे स्नेह कर रही है। मुझे खाना खिला रही है। मुझे डांट भी रही है। क्योंकि मैं नटखट मैं हूं इतना तो मिसिप भी इतना करता हूं। तो ये जो कोई भी लीला है सब विजुअलाइज ट्राई टू विजुअलाइज इनसाइड दी हार्ट विच इज वेरी एसेंशियल इन द अर्ली स्टेजेस ऑफ साधना। बाद में यदि आपको ऐसा लगता है कि ऑटोमेटिक मेरा माइंड जो है वो हायर टू हायर होता जा रहा है। ऑटोमेटिक हृदय में से मेरा फोकस मेरे माइंड में आ रहा है। तो क्या है कि बाद में जबकि हमारा एक बैठ जाए फाउंडेशन बैठ जाए फिर उसको रेजिस्ट करने की जरूरत नहीं है। अभी क्या है कि फिर वह एक अपना नेचुरल इवोल्यूशन अपना काम करेगा। किंतु शुरू शुरू में तो एटलीस्ट इन द बिगिनिंग फाइव टू 10 इयर्स ऑफ साधना अपने माइंड में फोकस जितना हम कम करें म ऑब्वियसली कम से कम कर दें तो उतना ही अच्छा है। सो दैट इज एक इंपॉर्टेंट चीज है। उसके बाद में देखिए

मस्तिष्क में होते है कर्म, हृदय में रहता है ज्ञान

कि यह जो मैंने जो कुछ कहा उसको वेदांत की एक तरह से माने एक थोड़ा सा आवरण पहनाए तो देखिए कि शंकराचार्य का बेसिक सिद्धांत क्या कहता है? व्हाट इज द कोर ऑफ शंकराचार्य दैट इज कर्म एंड ज्ञान। हमारा जो पूरा मेंटल एग्जिस्टेंस है या तो फिर अपना जो कॉन्शियसनेस है अभी कॉन्शियसनेस से मैं सिर्फ अपना माइंड को नहीं लेता। ऑब्वियसली कॉन्शियसनेस इज वैसे तो पूरे विश्व में व्याप्त है। वैसे तो पूरे टाइम और स्पेस से परे हैं। किंतु फॉर नाउ यदि हम अपने बॉडी को ही कर दें कि दिस इज माय लोकस ऑफ कॉन्शियसनेस और रेदर कि होम ऑफ कॉन्शियसनेस तो आप कहेंगे कि जो माइंड जो है इट इज द होम ऑफ कर्मा। और यह जो हार्ट है दैट इज द होम ऑफ ज्ञाना। यह ज्ञान और कर्म। यह शंकराचार्य का वेदांत का जो शंकराचार्य का जो विचार है उसका हार्ट है। हमको कर्म से ज्ञान की ओर जाना है। यहां पे ऑब्वियसली कर्म का अर्थ स्वामी जी वाले कर्म योग में नहीं लेना है। वो कर्म योग है कि जब लोगों के प्रति अपनी करुणा वगैरह होनी चाहिए। दैट इज कंप्लीटली डिफरेंट। दैट इज़ अ सोशल एस्पेक्ट। सोशल एटीट्यूड एटीट्यूडनल या तो फिर कहेंगे कि बिहेवियरल एस्पेक्ट नहीं कि कंटलेटिव एस्पेक्ट स्वामी जी का जो कर्म है इट इज अ बिहेवियरल कर्म यहां पे हम कंटप्लेटिव जो वर्ल्ड की जो बात करते हैं उसकी बात है कि अपनी कॉन्शियसनेस जो है जब तक वो कुछ ना कुछ कार्य करती ही रहेगी और कॉन्शियसनेस का यह कार्य है चाहे मैं यह सोचता हूं कि मैं क्या खाना खाऊंगा या तो मैं यह सोचता हूं कि मेरा करियर क्या होगा ना कि मैं यह सोचता हूं कि उसने मुझे ऐसा कुछ बुरा कहा मैं उसका बदला लूंगा। व्हाटएवर कंटीन्यूअसली यह जो कर्म चल रहा है उसको कर्म कहते हैं यहां पे। और जो कर्म का एंड होता है वो है ज्ञान। कर्म का एंड होने से जब ज्ञान प्रकट होता है तो सतित आनंद रूपी यह जो परमात्मन या तो आत्मन या तो ब्रह्मन है वह अपनी कॉन्शियसनेस में प्रकट हो जाएंगे। और रेदर कि अपनी कॉन्शियसनेस है उसी का माने एक एक तरह से यह हो जाए डिसोल्यूशन हो जाएगा और वी विल बी एस्टैब्लिश्ड इन आवर ट्रू नेचर वि इज ब्रह्मन तो अभी देखिए कि किस तरह से यह शंकराचार्य की थ्यरी है। एक तो है अपनी जो कॉन्शियसनेस है मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार है, वह कर्म पे ही बना है। और इस कर्म में यह तमस, रजस या सात्विक कर्म होते रहते हैं। आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य क्या है? इस कॉन्शियसनेस को काट करके अपने मन को जैसे कि यह अमृत सागर में पिघल करके इसके परे का जो हायर एग्जिस्टेंस है सतचित आनंद उसकी ओर जाना है। सो दैट इज आवर जर्नी। तो यह कर्म और ज्ञान यह बात है कि कर्म और ज्ञान दोनों एक साथ में रह ही नहीं सकते और रेदर किस तरह से रह सकते हैं वह हमको ठाकुर ने बताया है कि एक बार नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त की अर्थात कि कर्म को मैं दूर मैं कर्म को शांत करता गया करता गया मेरी कॉन्शियसनेस है मेरा माइंड है उसमें जितनी भी विचार तरंगे उठती है उसको में या तो कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, ज्ञान योग के माध्यम से उसको शांत करता गया। एक समय ऐसा आएगा कि यह मन की तरंग है वह शांत हो जाएगी। यानी कि मन के जो कर्म है वह समाप्त हो जाएंगे। संस्कार सब कट जाएंगे। कर्म समाप्त हो जाएंगे। जिस क्षण यह परिस्थिति आती है कि संस्कार कट गए, कर्म सब शांत हो गए, वैसे ही मन का विलय होता है सच्चिदानंद में और हमको निर्विकल्प समाधि या तो फिर ईश्वर दर्शन व्हाटएवर शब्द हम देना चाहे वो हाईएस्ट स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस हमको प्राप्त होता है। जहां पे कि मन का कोई अस्तित्व नहीं। अर्थात कि कर्म का कोई अस्तित्व नहीं। संस्कार बिल्कुल समाप्त हो गए। किंतु फिर जैसे ठाकुर कहते हैं कि इसके बाद में इति इति करके जगत में वापस आया जाता है। सभी लोग नहीं आ पाएंगे। अभी अगेन इसको हमने काफी डिस्कस किया है। ईश्वर की इच्छा बोलो ना कि जो कुछ भी बोलो। कैसे भी करके हम एक बार वापस आ गए तो फिर क्या होगा? मन जो है उसका पुनः जागरण होगा। किंतु यह मन जो है सोने का मन है। इसके भीतर में कर्म तो रहेंगे। मन बुद्धि चित्त अहंकार तो रहेगा। अस्मिता तो रहेगी किंतु उससे ना कोई संस्कार नहीं बनेंगे। नेति नेति वाले फेज में क्या होता था कि सब संस्कार बन जाते थे। मैं कोई भी कर्म करूंगा तो उसका यह जो पत्थर पर लकीर की तरह वो खींच जाता था। मेरे जो यह जो संस्कार का यह जो बैंक है रिजर्व बैंक जन्म जन्मांतर से हम इसके में लेनदेन करते रहते हैं। वह उसमें एक नया डिपॉजिट बन जाता था। किंतु जब निर्विकल्प समाधि के बाद में वापस आते हैं तो कर्म तो रहेंगे किंतु ऑब्वियसली बिना कर्म के कॉन्शियसनेस नहीं है। बिना कॉन्शियसनेस के लाइफ पॉसिबल नहीं है। किंतु वो इस तरह का कर्म है जो कि संस्कार नहीं बनाते हैं। सो दैट इज कंप्लीटली डिफरेंट कि ठाकुर का जो सॉल्यूशन है कि ज्ञान और कर्म साथ में रह सकते हैं किंतु वह निर्विकल्प समाधि के बाद में शंकराचार्य का या तो फिर ठाकुर वाला जो नेति नेति वाला फेज है या तो ठाकुर का या तो शंकराचार्य का जो टीचिंग है उसमें कर्म को हमको त्याग करना ही होगा। स्वामी जी इस पूरे चक्र में कहां पर बैठते हैं? स्वामी जी अब स्वामी जी का क्या कहना है? ठाकुर ने जैसे कि हमको समझाया है कि काम और क्रोध वगैरह जाता नहीं है तो इसका जो चेहरा है ईश्वर की ओर घुमा दो। तो स्वामी जी कहते हैं कि वैसे ही कर्म चले जाए वैसे मैं बोलता रहूं कि कर्म चले जाओ कर्म चले जाओ वैसे तो जाने वाले नहीं है। तो पहले कर्म को सुसंस्कृत करो। माने सेवा कार्य करके लोगों के प्रति करुणा रख करके जो आपको कर्म को सुसंस्कृत करना होगा। सेल्फिश कर्म जो करते हैं मन में जो हमेशा सेल्फिश विचार आते हैं। अगेन मैं यहां पर फिजिकल कर्म की नहीं कॉन्शियस लेवल पर जो कर्म चल रहा है उसकी बात कर रहा हूं। अपने मन के भीतर में जो हमेशा सेल्फिश विचार चलते रहते हैं उसको काटने के लिए मन को खींच करके हृदय की ओर ले जाने के लिए पहला जो म इंटरमीडिएट स्टेप्स जो है म स्टेप बाय स्टेप तो वो जाएगा ना मन का वो जो विलय तो फटाक के बोलने से तो होने वाला नहीं वो स्टेप बाय स्टेप जाना होगा तो पहला स्टेप है कि मन में जो विचार चल रहे हैं वो बहुत ज्यादा सेल्फिश होते हैं बहुत ज्यादा रिएक्शनरी होते हैं बहुत ज्यादा इंद्रियों के सुख के आसपास में घूमते रहते हैं तो उसको लोगों की सेवा के लिए लगाएं। लोगों का कष्ट है अनुभव करें। एमैथी या तो कंपैजन डेवलप करें। लोगों के प्रति करुणा जगाए। लोग लोगों को सहाय करने की भावना विकसित करें। तो यह मन को मारने के लिए जो इंटरमीडिएट स्टेप्स है, इज़ियर स्टेप्स है। बेबी स्टेप्स जो है, उसमें से यह एक है कर्म योग। ज्ञान योग ऑब्वियसली कि मन के विचारों को तो काट देना है। यानी कि यह मन के जो विचार है वह मेरा सही स्वरूप नहीं। सच्चिदानंद मेरा सही स्वरूप है। और वह विचार करना है हार्ट के भीतर में। भक्ति योग में भी जो प्रार्थना करनी है वो भी हार्ट में करनी है और राजयोग का तो म वही है कि म देश बंध चित्तस्य धरणा म जो विचार है विचारों को काटना वही है योग चित्तवृत्ति निरोध योग योग चित्तवृत्ति निरोधः योग क्या है चित्त की वृत्तियों का निरोध जो दूसरा ही सूत्र है प्रथम है कि अथः योगानु अनुशासनम और दूसरा ही है योग चित्तवृत्ति निरोध तो चित्त की वृत्तियों का निरोध करना वही योग है तो यानी कि जिस तरह से जिस योग से देखें जो बेबी स्टेप्स क्या है नेति नेति करने के समय में मन को विलय करने के समय में चाहे कर्म योग हो जिसमें कि हम अपने विचारों को सुसंस्कृत करते हैं। भक्ति योग हो जिसमें कि हम अपने विचारों में शरणागति को प्रवेश करवाते हैं। ज्ञान योग हो जिसमें हम कहते हैं कि यह सम सत्व रजस तमस मेरा सही स्वभाव नहीं है। मेरा सही स्वभाव है सतित आनंद और या तो फिर राजयोग हो जिसमें कि वैसे ही हम जड़ मूल से ही ये मन के विचारों को काटने का प्रयास करते हैं। व्हिच एवर वे और व्हिच एवर द कॉम्बिनेशन ऑफ वे जो कि हम सिलेलेक्ट करें खींच करके एक बार मन को ये अपना फोकस है कर्म से ज्ञान की ओर ले जाना है। अपना जो हेड है वहां से हार्ट की ओर ले आना है। ज्ञान का सीट है वह है हार्ट और कर्म का सीट है हेड। तो यह कि शंकराचार्य की माने दृष्टि से कि कर्म से ज्ञान की ओर जाना है। अपने हेड से अपने हार्ट की ओर आना है। एक बार मन के विचार समाप्त हो जाए चार योगों का सहारा लेकर के तो हमको कोई ना कोई आध्यात्मिक अनुभूति होगी। उसके बाद में हो सकता है कि जब वापस आए तो लोक कल्याण के लिए जो कुछ सोचना पड़ता है जो कुछ करना पड़ता है उसके लिए माइंड काम करेगा किंतु उसके लिए हमको बहुत ज्यादा कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं है। तो यह मैंने इसमें और भी बहुत कुछ है बट एनीवे वह फिर कभी देखेंगे तो आज यही ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

ठाकुर और माँ का आदेश है हृदय पर ध्यान करना

मां ने कहा कि यह क्या कर रहे थे मूर्खामी माने भ्रू मध्य पे ध्यान कर रहे थे। ऐसा कभी मत करो। हमेशा हृदय में ध्यान करो। ठाकुर कहते हैं कि हृदय है आत्मा का किल्ला। पटा हो डंका मारा जाएगा। यानी डंका मारा अर्थात कि यह मोस्ट पॉपुलर जगह है हृदय। मास्टर वहां से पूछते हैं ठाकुर को।

सहस्रार तक की कुण्डलिनी की यात्रा

म सहस्त्र मंजिल है। माने वहां से यह जो कुंडलिनी है उसको भेद करके निकलेगी और वह महाकारण में विलय हो जाएगी। माने वो जो ठाकुर की वो जो कहानी है ना कि जड़ समाधि होने वाली थी और वो माने मुंह से रक्त निकल कर के निकल गया। तो वह साधु क्या कहता है कि आपकी कुंडलिनी है सहस्त्रार भेद करके निकल जाती और आपको जड़ समाधि हो जाती। किंतु जगदंबा को आपसे कोई काम करवाना है बोल करके वह जो एनर्जी ऊपर जा रही थी उसकी वजह मुंह से निकल गई रक्त के माध्यम से ना ऑब्वियसली ये क्या है देखिए

प्रश्न: पता नहीं था की अनाहत चक्र पे (ह्रदय में) ध्यान करना आज्ञा चक्र (मस्तिष्क) में ध्यान करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है

अब पीएचडी करना इज ऑलवेज बेटर देन कि फर्स्ट स्टैंडर्ड करना किंतु फर्स्ट स्टैंडर्ड किए बिना पीएचडी करेंगे कैसे दैट इज द थिंग ना कि वहां पे जाने के लिए तो एक रास्ता है हम लोग सीधा पीएचडी में एडमिशन ले लेंगे बोलेंगे कुछ समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं उत्तर क्या मिलेगा फर्स्ट स्टैंडर्ड से चालू करो

हृदय रचनात्मक विचारों का भी केंद्र है

यहां पे है ना मैं एक पॉइंट आज डिस्कस नहीं किया है। अभी अब जब कल या जब भी एक मौका मिलेंगे करेंगे। देखिए एक तो हमने दो तरह के कर्म है ना कि एक तो है कि जो कि एब्सेंट माइंडेडली हम करते हैं ऑटो पायलट पे वहां पे हमको सबसे ज्यादा प्रॉब्लम होता है। जहां पे हमको एंगेज होना है उस तरह के कर्म में हम अपना सर का इस्तेमाल करते भी हैं तो कोई बड़ा प्रॉब्लम नहीं खड़ा होता। अब जैसे क्रिएटिव थिंकिंग है, मैं कोई म्यूजिक कंपोज कर रहा हूं या मैं प्रोग्रामिंग कर रहा हूं। या तो मैं इस शेयर मार्केट में कौन सा शेयर लेना, कौन सा सेल करना वो सोच रहा हूं। ऑब्वियसली मैं ये अपने हेड में से ही करूंगा क्योंकि वही तो विचार का यह सीट है। किंतु थोड़ा सा हम एडवांस जाएंगे ना अपने आध्यात्मिक जीवन में हम देखेंगे कि हमको यह जो हाईली क्रिएटिव हाईली यूनिक और इंडिविजुअलिस्ट कस्टमाइज टाइप के भी जो काम करने हैं ना उसमें भी हमको अपना हेड नहीं चाहिए। वो हार्ट ही काम कर लेगा। क्योंकि ज्ञान ही तो है ना अल्टीमेटली द सीट ऑफ नॉलेज। स्वामी जी क्या कहते कॉन्शियस लेवल पे जब तक माइंड रहता है नए विचार नहीं आते। ये आइंस्टाइन है, न्यूटन है, बाक ना बिथोवन ये जितने भी हाईएस्ट लेवल के जो लोग हैं आइदर कंपोजर है ना साइंटिस्ट है ना रिस्चर है। उनके जो वर्ल्ड शेटरिंग माने ब्रेक थ्रू आइडियाज कहां से आते हैं? दे कम फ्रॉम दी हायर लेवल समवेयर। तो अगेन हमको इवन हायर लेवल एंगेजमेंट भी करना है। यू डोंट नीड हेड दैट मच। अपने हार्ट में से ही आप देखेंगे कि वो क्रिएटिव विचार ऑटोमेटिक आते जाएंगे। ये क्रिएटिव विचार करने की जो पूरी मेथड ही हमारी गलत है कि मैं अपने माइंड में फोकस रख के सोचता रहता हूं। सोचता रहता हूं कि मैं यह ऐसा है ना कि अपने को एक बंद कमरे में हमने बंद कर दिया है। ताला लगा दिया है। और मैं यह सोचता हूं कि मुझे कैसे भी करके मुझे यहां से बाहर जाने का रास्ता मिल जाए। मैं बंद कमरे में अंधेरे कमरे में दौड़ता ही रहता हूं। दौड़ता ही रहता हूं। दिखता तो है नहीं। अपने हाथों से दरवाजा खोजता हूं। नहीं मिलेगा। किंतु जैसे ही अब बाय द ग्रेस ऑफ ईश्वर ना कि व्हाटएवर एक स्टेप यदि हम हायर लेवल कॉन्शियस पे चले जाते हैं तो पता लगेगा कि ये दरवाजा खुल गया। हम लोग बाहर आ गए। बट दैट हायर लेवल ऑफ कॉन्शियस। अब जैसे यह साइंटिस्ट थे या ग्रेट कंपोजर थे, ग्रेट लिटरेरी जो ऑथर थे उनकी लाइफ में ना एक्सीडेंटली आता है। वी कैन एक्चुअली कल्टीवेट इट। वी कैन अंडरस्टैंड द साइंस एंड वी कैन कल्टीवेट इट कि रिमूव द फोकस फ्रॉम आवर हेड एंड ब्रिंग इट टू आवर हार्ट। देखेंगे कि हार्ट में से ही वह ओरिजिनल क्रिएटिव विचार आते जाएंगे। व्हिच विल टेक यू टू द टॉप ऑफ योर प्रोफेशन। ना आप सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। यू कैन डेवलप द बेस्ट थ्यरीज़ ऑफ़ एआई। इफ यू आर अ कंपोजर यू कैन कंपोज अ ग्रेट म्यूजिक। यू आर इन द फील्ड ऑफ़ साइंस। यू कैन डिस्कवर ग्रेट न्यू थरीज। एवरीथिंग यू कैन डू विथ योर हार्ट। मैंने आपको माइंड की अपने हेड की जरूरत ही नहीं है। तो इन दैट सेंस वो ठीक ही कहा है कि यदि बिना सर का यदि अपना जीवन रहेगा इट विल नॉट हैव दैट मच डिफिकल्टी।

नाम जप कैसे करे

माने ना नाम जप का महत्व है कब? कि हम वह नाम जप फोकस बाहर ले आते हैं माइंड से हेड से अपने माइंड में अपने हेड में ही नाम जप करना शुरू कर दें देन इट विल बी अनदर प्रॉब्लम कि माने उसी आप जैसे वो ए्जायटी नर्वसनेस हो गई है आप शराब पिएंगे तो क्या और बढ़ता ही जाएगा उसके जैसा सो फोकस हैज़ टू ब्रिंग आउट आउटसाइड ये क्यों अपने गुरु ये कर जप या माला जप पे इतना यह करते हैं कि एनी हाउ टू ब्रिंग द फोकस अवे फ्रॉम आवर हेड। मन, बुद्धि,

मस्तिष्क में रहते हैं सत्व-रजस-तमस और हृदय में रहते है सत-चित-आनन्द

चित्त, अहंकार, संस्कार सब वहीं पे रहते हैं। अस्मिता जो कुछ कहो मेरा जो आइडेंटिटी है स्व माने स्मॉल आई वो वहां पे रहता है। जो बिग आई है वो हार्ट में रहता है। सत, रज, तमस रहते हैं हेड में और सतचित आनंद रहता है हार्ट में। वो हार्ट में है। म आइरोनिकली कि जो हायर अवस्था है वह फिजिकली लोअर लेवल पे रहती है। बट दैट इज ना ना ना ना ना यही यही देखिए होगा क्या हम अगेन हमारा एस्पिरेशन अपनी कैपेसिटी से ज्यादा बढ़ जाता है। इसलिए हमको यह सब थोड़ा सा म काउंटर इंटिव लगता है। देखिए हार्ट में आप आत्मन या सच्चिदानंद उसका अनुभव कीजिए वि इज वेरी नेसेसरी। उससे होगा क्या कि माइंड जो है माइंड के भीतर में जो संस्कार है वह सुसंस्कृत होते जाएंगे। जब माइंड का सुसंस्कृत हो जाएगा फिर वही कॉन्शियसनेस धीरे-धीरे करके हायर लेवल पे अपने आज्ञा विशुद्ध चक्र में आज्ञा चक्र में आ जाएगी। कोई दिक्कत नहीं है। यह ऐसा है ना वो ठाकुर वो कहानी कहते हैं ना कि एक गांव में पोदो बोल के एक लड़का था। वो शाम को शंख बजाने लगा तो सब लोग दौड़े-दौड़े आए कि मंदिर में अभी आरती होगी। देखा तो वहां पे वो जो वो जो ये है बेड चमगादड़ वो उसने विष्ठा करके रखी है मंदिर के भीतर में ना ही उसने वो जो इष्ट का वो यहां पे ये किया है वो मूर्ति का पधरामणी की है वैसे ही बिना मतलब शंख फूंक रहा है तो कहते हैं कि मंदिर तोर नाहीिक माधव तू शंख फूंक ले कर ली गोल मंदिर में तुम्हारे माधव तो है नहीं यह चमगादड़ की विष्टा पड़ रही है और तुमने शंख बजा के ये क्या हल्लागुल्ला मचा दिया है तो पहले तो मंदिर मंदिर को सुसंस्कृत करें। फिर वह ईश्वर की स्थापना करें। फिर तो आप यह आरती वगैरह करेंगे ना। सो हार्ट में पहले तो सब जो है मसाला वगैरह बना दीजिए। फिर वो धीरे-धीरे करके वो माइंड सुसंस्कृत होता जाएगा। देन यू कम अप देन डज नॉट मैटर। मन से अगोचर है। मास्टर महाशय मन से अगोचर है। ठाकुर कहते हैं नहीं शुद्ध मन के गोचर है। अर्थात शुद्ध मन से उसको प्राप्त कर सकते हैं। किंतु बात यही है कि अब जैसे मैंने अपने खुद के लाइफ में पाया ना कि अपना एक ईगो रहता है। अपना एक ये रहता है। क्यों मैं अभी हार्ट में इतना ज्यादा अभी हाईएस्ट तो आज्ञा ही आज्ञा चक्र ही है। व्हाई नॉट टू स्टार्ट दैट जर्नी हायर जर्नी बाद में जो होगा सो देखा जाएगा। वो रहता है अपना ईगो बड़ा स्ट्रांग। अह तो क्या है ना? और फिर यह अट्रैक्शन भी है ना इंद्रियों के जितने भी सुख भोग है तमस रजस सत्व वगैरह तो सब हेड के भीतर में ही है तो उसका एक बुलावा है अपना एक ईगो है बोल के वी ऑटोमेटिकली वहां पे जाना चाहते हैं हेड के भीतर में तो इसके लिए ना वो हायर जर्नी को थ्यरी है थ्यरी को थोड़ा सा भूल जाए हार्ट में ही पूरा फोकस करें दैट इज बेस्ट फॉर आवर स्पिरिचुअल लाइफ फिर वो ठाकुर ही धीरे-धीरे करके हमको वहां वहां पे ले जाएंगे। सो ऑब्वियसली हम यहां पे थ्यरी डिस्कस करने को बैठे हैं तो वी विल डिस्कस एवरीथिंग बट साधक जीवन का जहां प्रश्न है फिर वहां पे उस थ्यरी को भूल करके वी हैव टू फोकस ऑन हार्ट हां म वो अब जैसे मैं ट्रेन में जर्नी करता हूं तो बोला रेलवे का ऐप डाल देता हूं। फिर अभी यह कौन सा स्टेशन है? यहां पे कौन कितना रुकेगी? इसके बाद का स्टेशन कौन सा वहां पे कितना रुकेगी। अभी मैं उसको देखूं ना देखूं डज नॉट मैटर। ट्रेन अपने-अपने हिसाब से चलने वाली है। यदि वह रुक गई तो 2 दिन के लिए भी रुक जाएगी। ऐप किसी काम की नहीं है। अननेसेसरी ऐप देख के टेंशन लेना वो बाहर में खिड़की से देखते जाओ नजारा सुंदर नजारा तो अपना रूरल जो ये है कंट्री साइड इंडिया का कितना ब्यूटीफुल है। मैं जब शुरू-शुर में ट्रेन जर्नी करता था ना तो स्लीपर क्लास में ही ऑब्वियसली और हमेशा मेरा था कि दरवाजे के पास जाकर के खड़े रह जाना है और बाहर में देखते रहना है। फुल उसका एक्सपीरियंस लेना है। इवन खिड़की भी नहीं दरवाजा में से और मैं उस समय देखता था बहुत सारे लोग ना अपना थर्ड वो जो बर्थ होता है ना अपर बर्थ वहां पे जाके लेट जाते हैं और मोबाइल देखते रहते हैं तो मैं सोचता था इन लोगों का लाइफ कैसा है कि म जो एक आपको एक्सपीरियंस मिल रहा है फ्री में वो नहीं लेकर के वहां पे अपर बर्थ में लेट करके मोबाइल देखते रहते हैं पूरा जर्नी अभी होता है बहुत बार मैं भी ऐसा करता हूं बट एनीवे ना इवन आप जब भी करते हैं या या कुछ भी आप स्पिरिचुअल चिंतन करते हैं। ट्राई टू फोकस ऑन हार्ट और इमीडिएटली आपको यह रिजल्ट दिखना शुरू हो जाएगा।

प्रश्न: कहते है की ईश्वर सच्चे हृदय से कही हुई प्रार्थना सुनते है.

माने ये लिटरेरी है ना कि मेटाफोरिकल है। गुड क्वेश्चन। आई होप कि यह मेटाफोरिकली ही होगा। आई गेस कि मेटाफोरिकली होगा। किंतु यदि ये आप इसको लिटरेरी भी ले ले तो भी ये तो ये गलत नहीं होगा। माने ये दोनों ओर से सच है। राइट?

प्रश्न: जप हृदय में करना आसान है क्योकि सिर्फ रिपीट ही करना है. किन्तु प्रार्थना में तो बहोत सारे शब्द बोलने होते है. क्या उसे भी हृदय में कर सकते है?

यस यस यस यस आप प्रैक्टिस करके देखिए शुरू में थोड़ा सा आपको ओड लगेगा क्योंकि ऑब्वियसली अपना हैबिट है कि सब कुछ हेड में करना है। सो हार्ट में करने से थोड़ा सा ओड लगेगा किंतु वी कैन शिफ्ट आवर एंटायर लाइफ फ्रॉम हेड टू हार्ट। मुझे ऐसा नहीं लग रहा कि थ्योरेटिकल कोई लिमिटेशंस है यहां पे। ऑफकोर्स कि हायर स्टेजेस में फिर हार्ट टू हेड आएगा। बट दैट इज लॉन्ग माने अभी तो लंबा जर्नी है। इनिशियली वी कैन शिफ्ट माने यह घर बंद करके दूसरे घर में जाए। वी कैन डू दैट। हमने हेड की दुकान बंद करके हार्ट की दुकान खोले। यू कैन डू एवरीथिंग इन आवर हार्ट। इट इज़ एंटायरली पॉसिबल। थोड़ा सा प्रैक्टिस हम करेंगे ना। कॉन्शियस प्रैक्टिस करेंगे। थोड़ा सा समय देंगे। इट विल हैपन। देखिए हम लोगों का प्रॉब्लम यहीं पे आता है ना कि जो चीजें हमको प्रॉपर्ली सीखनी होती है स्टूडेंट डेज में वो हम सीखते नहीं है। अब अब मान लीजिए ना मैं आपने कभी मैथमेटिक्स नहीं सीखा और अभी इस उम्र में आप वो मल्टीप्लिकेशन डिवीजन करने को जाएंगे तो कितना डिफिकल्ट लगेगा। लगेगा इंपॉसिबल है। किंतु आज हम माने ऑटोमेटिक कर सोचते भी नहीं है। माने ₹50 की चीज ली दुकान वाले ने दुकान वाले को मैंने ₹100 दिया। ऑटोमेटिक मुझे सोचना भी नहीं पड़ता कि मुझे 50 वापस मिलेगा। इट इज दैट ऑब्वियस। उन्हें ऑटो पायलट भी पूरा हो गया है। सो यह सब चीजें यदि बचपन में सीखते तो वो ऑटो पायलट पे हो जाती। वो नहीं है। अब इस उम्र में स्टार्ट कर रहे हैं कष्ट होगा। बट अब देखिए जन्म जन्मांतर का जर्नी है। एक बार तो स्टार्ट करना ही है। तो इस बार कर दिया। ना बट हरी नहीं करना है। बोल के आलसी भी नहीं हो जाना है। दैट इज वन करेंगे ना नेक्स्ट जन्म में करेंगे। क्या है? बोले तमस में से तो रजस में आना होगा कैसे भी करके बाद में तो सत्व और गुणातीत की अवस्था चालू होती है। ये जो है ना स्लाइड शो मैंने इसमें और भी काफी स्लाइड है और भी बहुत कुछ डाला है। देखेंगे कि धीरे-धीरे करके एक के बाद एक स्लाइड्स देखते रहेंगे। नहीं मैं एक्चुअली ये जो पूरा जो बनाया है ना स्लाइड मैंने इसमें मैंने किसी पर्टिकुलर उसमें से नहीं लिया। मैं अपने एक्सपीरियंस से ही यह सब बनाया है। अब अब जैसे शंकराचार्य का मैंने डाल दिया शंकराचार्य का नाम बट बेस्ड ऑन माय एक्सपीरियंस ओनली। देखिए इवेंचुअली मैं यह सब थ्यरीज डेवलप करूंगा। किताब पब्लिश करनी है ऐसा एक म नेब्यूलस आईडिया है मेरे माइंड में और उस समय मुझे ये सब ये म रेफरेंस पक्के डालने पड़ेंगे। सो एट दैट टाइम ये सब किया जाएगा। बट एज ऑफ नाउ आई एम स्पीकिंग फ्रॉम एक्सपीरियंस। ओम