प्रार्थना
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा दे जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित हम जिस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं उसका नाम है नीरव साधना आज जो प्रसंग हम देखें
प्रसंग: हम इष्ट में चमत्कार नहीं, प्रेम और करुणा खोजे
इसके पीछे में देखिए कि हमने कथामृत साधक भाव की आलोचना करने के समय जो एक कांसेप्ट देखा था कि जब भक्त शुरू शुरू में अपने इष्ट के पास में आता है या तो फिर किसी को अपने गुरु के रूप में अपने इष्ट के रूप में स्वीकार करता है तो जब उसकी भक्ति कच्ची होती है भक्त की तो वह ईश्वर के भीतर में अपने इष्ट के भीतर में वह कुछ सिद्धि देखना चाहता है कुछ सुपर पावर देखना चाहता है वह देखना चाहता है कि मेरे इष्ट जो है वह इतने पावरफुल है कि वह अपने अकेले वह मेरे जितने भी दुख दर्द है जन्म जन्मांतर के उसको काट देंगे मेरे साथ में जो भी समस्याएं हैं उनका समाधान होगा एक्चुअली जैसे हमने देखा था कल भी कि हमारे जीवन में टर्निंग पॉइंट कब आता है कि हमारे जीवन में या तो तो कोई एक डिजास्टर होता है या तो फिर एक ऐसी घटना होती है कि उसने हमारे मन पर इतनी गहन असर डाली कि उस घटना की वजह से हमारे जीवन में टर्निंग पॉइंट आया स्वामी जी के जीवन में हमने देखा कि ठाकुर के पास में वैसे तो आना शुरू कर ही दिया था आध्यात्मिकता के प्रति उनकी प्रबल आकर्षण तो था ही उनके मन में किंतु पिताजी के मृत्यु के बाद में उनका मन जैसे कि संसार के ऊपर में से संपूर्ण रूप से दूर हो गया वह परीक्षा देने को कि कहीं कॉलेज में जा रहे थे तो उनके मन में अचानक इस तरह का भाव आया कि अरे यह मैं क्या कर रहा हूं यह कहां मैं संसार में फंसा हूं तो फिर वहां से दौड़े-दौड़े वह ठाकुर के पास में चले आए थे और स्वामी जी के साथ में तो यह ठीक है इवन ठाकुर के साथ में भी इस तरह से हुआ था हमको तो पता है कि बालक गदाधर पहले से ही कामर पुकुर में जो चोटी अर्थात कि धर्मशाला कमार पुकुर गांव में गांव के बाहर में धर्मशाला रहती थी धर्मशाला थी जिसमें कि जो साधु जगन्नाथ पुरी या गंगासागर दर्शन करने के लिए जाते थे वह उस धर्मशाला में आकर के रुकते थे यही बालक गदाधर बालक गदाई उनके पास में जाता था उनके पास में से भक्ति मूलक भजन गीत वगैरह सुनता था और उनको उनको सहाय भी करता था तो बालक गदाधर में पहले से ही यह धर्म भाव था ही किंतु जब उनके पिताजी का मृत्यु हुआ खुद ही राम ने देह त्याग किया उसके बाद में बालक गदाई के स्वभाव में बहुत परिवर्तन आ गया वह भूति र खाल वगैरह स्मशान वगैरह पर वह घूमता रहता था अकेला-अकेला और बैठ कर के साधना करता रहता था तो इवन श्री रामकृष्ण देव के जीवन में भी यह टर्निंग पॉइंट आया था तो हमारे जीवन में भी इस तरह की कोई घटना घट जिससे कि हमारा मन अंतर्मुखी अपने को प्रश्न करने के लिए मजबूर हो जाए कि यह जो मैं कर रहा हूं मेरे जीवन में यह जो बाह्य जो आकर्षण है जिनके पीछे में मैं दौड़ रहा हूं यह बाह्य जगत है जिसको प्राप्त करने के लिए जिसके जो विषय के भोग है उसको प्राप्त करने के लिए मैं इतना लालायित होकर के घूमता हूं तो आखिर में इस जगत का अर्थ क्या है मेरा व्हाट इज माय ट्रू नेचर व्हाट इज द नेचर ऑफ गॉड आत्मन और द सोल ये ईश्वर क्या है आत्मन क्या है मैं कौन हूं मेरा क्या प्रयोजन है जगत में यह जो हायर आइडियाज जो है वो इस डिजास्टर के बाद में हमारे जीवन में आना शुरू होंगे तो अभी जब हम इस सब घटना वली से पसार होकर के अब किसी को अपना इष्ट बना दिया मान लीजिए कि भगवान रामकृष्ण को ही अपना इष्ट बनाया तो फिर हम जब उनके पास में आएंगे तो यह तो आशा रखेंगे कि यह जो छोटी-मोटी समस्या है मेरे जीवन की उसका सॉल्यूशन ला दे जैसे कि मैंने कल व लड़के की कहानी बताई थी वह लड़का मेरे पास में रांची में आता था और उस समय मोबाइल नया-नया था और मोबाइल की वैल्यू भी थी तो उसके कुछ मित्रों ने उसके ऊपर में आक्षेप लगाया कि उसने उन लोगों का मोबाइल चोरा लिया है अभी यह लड़का मेरे एक दिन वह आश्रम में आया उसका पूरा लाइफ अ अब अप साइड डाउन हो गया था कॉलेज में सभी लोग उससे दूर भागते थे सभी लोग पीछे-पीछे उसकी निंदा करते थे और मुंह पर बोलने वाले लोगों की भी तो कमी नहीं होती कॉलेज कैंपस में तो यह लड़का बेचारा बड़ा ही डिप्रेसो गया था और एक दिन वह आश्रम में आया रांची आश्रम में मंदिर के सामने खड़ा था शाम का समय था मैं वहां पर टहल रहा था तो उसने देखा यह महाराज जी है यहां पे और मैं यंग था उस समय तो काफी तो उसको लगा कि यंग है महाराज तो उसके साथ में मैं बात करूं बोलक के उसने मेरे साथ में बात करना शुरू किया तो फिर वैसे लड़का तो बड़ा इंटेलिजेंट था वह कहता है मैंने कुछ किया नहीं है झूठ मूट का मेरे पर आक्षेप लगा रहे हैं व्हाट एवर वो तो एक हो गया वो नियमित आने लगा उसके बाद में मैं ठाकुर मा स्वामी जी की बातें करता था इन जनरल सब डिस्कशन करता था अभी यह लड़का है कुछ-कुछ दिनों के बाद में मुझे बताएगा अच्छा ये जो मेरे साथ में कॉलेज में हो रहा है उसका क्या सॉल्यूशन है मैंने उसको कहा कि देखो भाई इसका सॉल्यूशन तुम मैं तो तुमको नहीं दे सकता तुम्हारी कॉलेज में जाकर के तुम्हारे मित्रों को तो मैं नहीं बता सकता कि यह इनोसेंट है उसके साथ में इस तरह का अन्याय मत करो वह तो मेरे बस की बात नहीं है तुम ठाकुर को प्रार्थना करो और बेटर यह जो तुम्हारे जीवन में जो हुआ है उसका तुम उसको तुम ठाकुर का आशीर्वाद समझ कर के जीवन को परिवर्तित करो ऐसा नहीं है कि तुम सध हो जाओ बट एटलीस्ट आध्यात्मिकता को अपने जीवन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दो देखो कि इतनी छोटी उम्र में तुम्हारे भीतर में एक अकल आ गई है कि नहीं इधर-उधर कहीं पे जा अब देखिए कि ये जो टीनेजर्स जो होते हैं कॉलेज स्टूडेंट्स उनके जीवन में इस तरह की छोटी-मोटी घटनाएं हजार होती है वे लोग ज्यादातर लोग क्या करेंगे ऐसा कोई डिजास्टर हुआ तो कहीं कु संगत में पड़ जाएंगे कहीं वह दूसरी सब बैड हैबिट्स में फंस जाएंगे एडिक्शन में फंस जाएंगे देखिए आज जो ड्रग्स वगैरह का जो आजकल कॉलेज कैंपस में चल रहा है वह कितना लूज लाइफस्टाइल हो गया है कुछ-कुछ यंगस्टर्स का कुछ-कुछ टीनेजर्स का तो तो बेटर है तुम्हारे इतने तो संस्कार है तुम्हारे भीतर में कि तुम ठाकुर के पास आए हो समस्या का समाधान पाने के लिए वह ड्रग्स और यह वह सब उसमें तो तुम नहीं चले गए हो तो यू टेक द बेनिफिट ऑफ योर प्रॉब्लम एंड यू प्रे टू ठाकुर दैट इन द र अर्ली एज इतनी छोटी उम्र में तुम उनके पास में आए हो तुम 1015 साल कथामृत नियमित पढ़ो यह सब सत्संग वगैरह करो देखो कि 10-15 साल में तुम्हारा लाइफ कितना बदल जाता है परिवर्तन आ जाता है तो अभी यह लड़के का संस्कार इतना तो अच्छा था कि वह ड्रग्स वगैरह नहीं करके ठाकुर के पास आया किंतु संस्कार में इतना जोर नहीं था कि वह जो उसकी जो सा परिस्थिति थी उसका जो प्रॉब्लम उससे वह ऊपर उठ पाए हर कुछ दिन के बाद में वह मुझे कहता है अच्छा वो मेरा यह प्रॉब्लम यह प्रॉब्लम तो फिर एक समय में उससे इतना तंग आ गया कि फिर मैंने उसके साथ में बात करना ही बंद कर दिया अभी मेरा कहना है कि जो कुछ करना है यह सब प्रॉब्लम का सॉल्यूशन तुम लाओगे ठाकुर लाएंगे मेरे पास में आकर के बोलने से क्या लाभ है और इवन ठाकुर के पास में बोलने का भी कोई लाभ नहीं है यह आध्यात्मिकता में प्रवेश करना यानी कि संसार में परफेक्शन ना हो इसलिए तो हम आध्यात्मिकता में परफेक्शन खोजते हैं यदि बाह्य जीवन में सब परफेक्ट है तो मैं आंतरिक जीवन में प्रवेश ही क्यों करूंगा यह तपस्या साधना साधन भजन करूंगा ही क्यों तो बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं कि ईश्वर के पास में आते हैं कोई प्रॉब्लम का सॉल्यूशन लाने के लिए अभी क्या है कि यदि ऐसा कोई ईश्वर या इष्ट देखेंगे जिनके भीतर में यह सुपर पावर देखते हैं यह ऐश्वर्य दिखता है कोई सिद्धि का जादुई चमत्कारी सिद्धि का तब यह लोग आकर्षित होते हैं किंतु जैसे कि हमने लीला प्रसंग में देखा कि अवतार या तो इष्ट जिनको कि हम अपने गुरु के रूप में अपने तारणहार के रूप में स्वीकृत करते हैं एक्सेप्ट करते हैं उनके जीवन में यह सब बाह्य ऐश्वर्य नहीं देख कर के यह जो दो तरह के ऐश्वर्य के बारे में हमने डिस्कशन किया था एक तो है कि सुपर पावर ऐश्वर्य यानी कि यह उस असुर का वध कर दिया आपके कर्म संस्कार काट दिए वगैरह वगैरह कर्म संस्कार खैर उसको नहीं लेकर के यह जो बाह्य जगत में जो मिरेकल जो हमको दिखते हैं इस तरह का ऐश्वर्य और दूसरा है एक विद्या का ऐश्वर्य एक साधना समाधि का ऐश्वर्य एक प्रेम और सहानुभूति भालोबासा का ऐश्वर्य तो यदि हमको हमारी बुद्धि यदि मैच्योर होती है हमारे में जो स्पिरिचुअल एक डेवलपमेंट होता है तो फिर हम अपने ईश्वर में अपने इष्ट में यह जो बाह्य डिवाइन ऐश्वर्य है वह नहीं खोज करके मिरेकल अस ऐश्वर्य नहीं खोज करके यह जो नॉन मिरेकल अस ऐश्वर्य है उसको खोजना ज्यादा पसंद करेंगे ठाकुर के जीवन में देखिए यह समाधि का ऐश्वर्य था यह स्वामी जी के जीवन में देखिए कि विद्या का ऐश्वर्य था मां के जीवन में देखिए कि प्रेम का ऐश्वर्य था किंतु कहां पे हमने देखा है कि उन्होंने इसका वध कर दिया इस राक्षस को मार दिया यह ब्रिटिश गवर्नमेंट जैसा महा भयानक राक्षस उस समय बैठा हुआ था तो ठाकुर मां और वो तो चलो भी ठाकुर और मां को तो छोड़ ही दीजिए इवन स्वामी जी भी ब्रिटिश गवर्नमेंट के बारे में इनको भगाना है मुक्ति चाहिए फ्रीडम चाहिए इंडिया को इस तरह की बातें कहीं अल्प ही एक दो जगह पे मिलती है ज्यादातर फोकस तो स्वामी जी ने योग और वेदांत के ऊपर में दिया है विदेश में गए थे तो योग और वेदांत सिखाया भारत में उन्होंने कर्म योग सिखाया तो यही तीनों के जीवन में देखिए कि असुर का संहार करने का एक बहुत सुंदर अपॉर्चुनिटी था वही शुंभ निशुंभ उस समय थे तो यह अपना ब्रिटिश गवर्नमेंट था इस समय जितना यह शुंभ निशुंभ ने अत्याचार किया था कंस ने अत्याचार किया था पृथ्वी पे रावण ने जितना अत्याचार किया था उससे कहीं गुना अत्याचार ज्यादा भारत की भूमि पर इस ब्रिटिश गवर्नमेंट ने किया था तो एक परफेक्ट अपॉर्चुनिटी था कि वही श्री राम श्री कृष्ण की लीनियस को उनका यह जो वारसा है उसको जागृत रखने का परफेक्ट अपॉर्चुनिटी था ब्रिटिश गवर्नमेंट को भारत में से भगा करके व भारत को फिर से मिलिटरी स्ट्रांग करने का जिस तरह से देखिए कि पांडवों के पास में यह मिलिटरी पावर यह भगवान कृष्ण ने दिलवाया या तो फिर यह वान नर सेना उनको इतना स्ट्रांग बनाया भगवान राम ने तो यह अपॉर्चुनिटी हमारे पास में भी थी और यहां पर एक्चुअली ठाकुर इस बात का उल्लेख भी करते हैं कि एक बार वह राजपथ से चल रहे थे हमने देखा ना वो केशव सेन वाले किस्से में कि वह जहाज में आए हैं वहां पे कोलकाता में और फिर वहां से राजमार्ग से उनकी घोड़ा गाड़ी चल रही है वो अंग्रेज लोगों का वो विस्तार है दोनों साइड में सुंदर-सुंदर अट्टालिका यानी कि बड़े सुंदर-सुंदर बिल्डिंग्स है तो इस तरह का एक वर्णन दूसरा भी है कि ठाकुर इसी तरह से चल रहे हैं रास्ते से और पीछे में पूरे सब भक्तों का दल चल रहा है तो ठाकुर कहते हैं कि कोई-कोई कहते हैं कि परमहंस की फौज आ रही है तो ये ठाकुर की आर्मी बनाने का कांसेप्ट कोई हमारा नहीं है ठाकुर ने ही इस बात को कह दिया था कि आर्मी बना सकते हैं यदि चाहे तो ठाकुर के नाम से किंतु हमने यह सब नहीं करके योग और वेदांत के प्रचार के ऊपर में ही विद्या का ऐश्वर्य साधना का ऐश्वर्य प्रेम के ऐश्वर्य के ऊपर में ही ज्यादा फोकस किया है तो यह जो बाह्य ऐश्वर्य का त्याग करके आंतरिक ऐश्वर्य है यह मिरेकुलम है उसका त्याग करके यह जो स्पिरिचुअल पावर्स है उसको डेवलप करने का यह जो थीम है वो कंसिस्टेंट है अपने लिटरेचर में तो यहां पर भी एक
प्रसंग: ठाकुर माँ से कहते हैं कि - स्वास्थ्य प्रदान करने वाले मंत्र को अपने आराध्य देव को समर्पित कर दो ताकि मन अध्यात्म से विचलित न हो
प्रसंग ऐसा है जो कि इनडायरेक्टली या तो डायरेक्टली इसी थीम के साथ में कनेक्टेड है मां के पास में कहीं से एक मंत्र आया था जिसको कि पाठ करके आप किसी को आरोग आरोग्य दे सकते हैं किसी को सु स्वस्थ बना सकते हैं उनको हेल्थ दे सकते हैं तो इस तरह का मंत्र जब ठाकुर को पता चला तो ठाकुर ने कहा कि ठीक है इस तरह का मंत्र है कोई दिक्कत नहीं है तुम को इस मंत्र को इष्ट के पाद पद्म में तुम सुपरत कर दो यानी कि उनके जो मां के जो इष्ट थे उनको यह मंत्र वापस फिरा दो इस मंत्र का पाठ करने की जप करने की कोई आवश्यकता नहीं है तो यह घटना यहां पर गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं क्या लिखते हैं श्री मायर मोन के संपूर्ण रूपे अध्यात्म क्षेत्र निबट राख जन्य ठाकुर एक समय श्री मायर द्वारा लब्ध एक एकटी रोग रानर मंत्र इष्ट पदे अर्पण करते बोलिया लेन श्री मां के मन को संपूर्ण रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र में एकाग्र रखने के लिए ठाकुर ने एक समय मां के द्वारा प्राप्त एक रोग ठीक करने का मंत्र उनके इष्ट के पाद पद्म में अर्पण करने के लिए कहे थे घटना ती श्री मां श्री जुक्ता जोगिन मा के बोलेन यह घटना माने खुद ने योगिन मा को बताई थी योगिन मा एक दिन ठाकुरर आहारा आंते तहर होते आचो मनेर जन्नो जोड़ ढलिया दीवार पर ठाकुर अकस्मात बोली लेन ठाकुर ने एक बार आहार किया था आहार करने के बाद में योगिन मां उनके हाथ धो रही थी एक घटी में से जल डाल रही थी उसी समय एकाएक ठाकुर बोल उठे ओगो आर गलाई वेदना होए छ तुम आराम कर बार ज मंत्र ती जानते ता उच्चारण करे एक बार हाटी बोलिए दाव तो ठाकुर ने कहा कि देखो मैं ओगो ठाकुर की ये जोने बात करने की स्टाइल की अरे मेरे गले में दर्द हो रहा है तो तुम्हारे पास में जो रोग ठीक करने का जो आरोग्य प्राप्ति का जो मंत्र है उसको बोल कर के तुम मेरे गले पर एक बार हाथ फिरा दो तो योगिन मा ठाकुरर आदेश पालन करी लेन योगिन माने ठाकुर के आदेश का पालन किया परे तिनी श्री मायर निकट आशिया बोलेन आमी जे ही मंत्र जानी उन्नी ही कथा की कर बुझते पार लेन योगिन माने मां शारदा देवी के पास जाकर के कहा कि मुझे यह मंत्र पता था यह बात ठाकुर को कैसे पता चली कि यह मंत्र मैं जानती हूं करके इहा सुनिया श्रीमा हसते हसते बोली लेन यह सुन करर के मां ने हंसते हंसते कहा ओगो उन्नी शब शकल कथा जानते पारेन अरे ठाकुर मन की सब बात जान सकते हैं अथ च मन मुख एक कोरे शत उद्देश जे जा कोर छे तार जनने ताके कोखोनो घृणा करे ना किंतु ठाकुर लोगों के मन की सब बात जान सकते हैं किंतु जो अपने मन मुख एक करके यानी कि जो एक ऑनेस्टी और इंटीग्रिटी होती है मेरे मन में एक बात चल रही है मेरे मुंह से मैं दूसरी बात कह रहा हूं जैसे हिंदी में जो मुहावरा है मुख में राम बगल में छुरी मुंह पर तो एक अच्छी-अच्छी बात कर रहा हूं मन में किसी को मैं गाली दे रहा हूं तो यह जो दो मुंह वाली जो बात है ऐसा जो करेंगे जो नहीं करेंगे उनके बारे में जिनका कि मन और मुह एक है यदि मैं किसी की प्रशंसा कर रहा हूं तो जेनन प्रशंसा है किसी से मैं नाराज हूं तो मुंह पर बोल दूंगा कि मैं तुमसे ना राज हूं फिर झूठ मुठ का मुंह पर तो प्रशंसा करूंगा मन में गाली दूंगा ऐसा नहीं मन और मुख एक करके जो सत उद्देश्य के लिए जो जो कर रहा है उसके लिए ठाकुर कभी भी उनकी घृणा नहीं करते यह बात योगिन मा को मां ने इसलिए बताई क्योंकि देखिए कि ठाकुर पहले से ही इस तरह की मंत्र उसकी सिद्धियां उसके बारे में उनका बड़ा ही एक तरह से कहेंगे कि क्रुद्ध उनका उसके प्रति उनकी कहेंगे कि एक नाराज की भरी दृष्टि रहती थी हमको यह प्रसंग याद है कि जब हृदय ठाकुर का भांजा और ठाकुर का सेवक उसने जब ठाकुर को कहा कि आप तो मां काली के साथ में इतना वार्तालाप करते हैं उनके कृपा प्राप्त है जाकर के उनके पास में कुछ मिरेकुलम मांग के आइए कुछ सिद्धि मांग के आइए मां के पास में तो ठाकुर बड़े सरल हृदय के थे कल जैसे हमने देखा था कि जिसके साथ में ठाकुर रहते थे उनकी बातों को बड़े ही सरल रूप से वह स्वीकार कर लेते थे कभी-कभी तो वही हृदय ने कहा है तो मां काली के पास में गए कहा कि अरे मां हृदय कहता है कि इस तरह की सिद्धा ही कुछ मिरेकुलम दे दो तो माने वोह जो भयानक दृश्य उनको दिखा दिया था हस्य जनक दृश्य ठाकुर को कि एक बूढ़ी वैश्या उनकी ओर पीठ करके वो विष्ठा कर रही है तो व वो तो फिर यह ठाकुर उसको देख कर के बड़े ही नाराज होकर के हृदय के पास में आकर के कहे कि देखो तुम्हारे लिए मुझे इस तरह का दृश्य देखना पड़ा वो बूढ़ी वैशा कीी विष्ठा की तरह यह सब सिद्धियां है तो ठाकुर के मन में यह बात बड़ी क्लियर थी किंतु साथ-साथ में ही यहां पर देखिए कि मां योगिन मां को क्या कहती है ये मां और ठाकुर का देखिए कि दोनों को उपदेश देने का तरीका किस तरह का है कभी-कभी ठाकुर जिसके बारे में एकदम ही एक बड़ी ही स्ट्रिक्ट पोजीशन लेते हैं सत्य के बारे में तो वही सत्य के बारे में हमने देखा कि मां कहती है कि किसी को स्वास्थ्य रक्षा के लिए किसी की सेहत के लिए यदि हम झूठ बोल कर के उसको अच्छा खाना खिलाए तो उसमें गलत कुछ नहीं है तो यहां पर भी वैसे मां शारदा देवी को तो ठाकुर ने मंत्र लौटा देने के बारे में कहा था किंतु यहां पर योगिन मां को ठाकुर कुछ नहीं कहते और इस बात का इंटरप्रिटेशन मां यहां पर इस तरह से करती है कि यदि जो अपना मन और मुख यानी कि एक ऑनेस्टली जो कोई कार्य करता है सत कार्य के लिए यदि कोई इस तरह की पोजीशन लेता है तो उसके लिए ठाकुर उसकी घृणा कभी नहीं करते मन मुख एक कोरे शोत उद्देश जे जा कोर छे तार जनने ताके कखन घृणा कोरे ना ठाकुर मन और मुख एक करके सत उद्देश्य के लिए जो जो करता है उसके लिए उसको कभी भी गरुणा नहीं करते हैं र भय नहीं तुमको कोई भय नहीं है अमियो और काछ आश बार आगे ओई मंत्रो पे लाम मैं भी ठाकुर के पास में और काछ अर्थात कि ठाकुर के पास में आने से पहले मैंने भी वही मंत्र प्राप्त किया था एखाने ऐसे ओ के ई कोथा बोलाई उन्नी बो लेन यहां पर आने के बाद में उनको यह बात बताने से उन्होंने कहा था मंत्र निय छो ताते खती नहीं मंत्र ली है लिया है तो उसमें कोई क्षति नहीं है कुछ उसमें कुछ बुरा नहीं है उहा खन इष्ट पाद पदे समर्पण करे दाओ इस मंत्र को अभी इष्ट के पाद पद्म में समर्पण कर दो तो यहां पर देखिए कि यह जो मिरेकल अस पावर है या तो फिर यह लस ऐश्वर्य है इसको ठाकुर अभी दोनों तरह से मां को तैयार कर रहे हैं मां को एक साधिका के रूप में भी तैयार कर रहे हैं कि इस तरह की जो मंत्र वगैरह जद मां जानेगी तो फिर जैसे पहली ही लाइन में गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है ना श्री मां के श्री मायर मन के संपूर्ण रूपे आध्यात्म क्षेत्र निबट राख जन्नो ठाकुर एक समय श्री मायर द्वारा लब्ध एकटी रोग सरान और मंत्र इष्ट पदे अर्पण करी ते बोलिया लेन मां के मन को संपूर्ण रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र में एकाग्र रखने के लिए ठाकुर ने एक समय मां के द्वारा एक रोग ठीक करने का मंत्र इष्ट के पाद पद्म में अर्पण करने को कहे थे तो यहां पर एक तो एक रीजन है कि मां साधिका के रूप में जो साधना करेगी उस समय इस तरह के जो मंत्र होंगे जो कि मिरेकुलम देते हैं वह हो सकता है कि आध्यात्मिक क्षेत्र से उनको कहीं और कहीं पर ले जाए और डिरेल जो कहते हैं इंग्लिश में शब्द है उनकी आध्यात्मिक यात्रा को कहीं डिरेल ना कर दे तो एक वह बात है दूसरी बात की जब भविष्य में मां इष्ट का पद धारण करेगी संघ जननी भक्त जननी का पद जब वह श अलंकृत करेगी वो भक्त जननी जब होगी तब यदि मां के पास में इस तरह से रोग ठीक करने का मंत्र होगा तो ठाकुर ने क्या कहा था कि यदि यह रोग वगैरह ठीक करना बीमारी ठीक करना मैं शुरू करूं तो यहां पर दक्षिणेश्वर में एक बड़ा अस्पताल जैसा लग जाएगा हजार लोग इसको यह दुख है इसको यह रोग है इसको यह बीमारी है इसको बुखार है इसको यह है यह ठीक कर दो उसी के लिए हजार लोगों की लाइन लग जाएगी किंतु दक्षिणेश्वर को तो ठाकुर एक विद्यापीठ के रूप में गुरुकुल के रूप में स्थापित करना चाहते थे वहां पे विद्यार्थी आ ठाकुर रूपी गुरु के पास में ठाकुर रूपी इष्ट के पास में आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए तो यही बात जो कि जिसकी आशंका ठाकुर को दक्षिणेश्वर में थी यही बात कहीं जयराम बाटी में ना हो जाए कि मां जद गलती से भी अभी मां का तो हृदय बहुत बड़ा था तो मां जद कोई आया बीमार हो गया और मां ने मंत्र से उसको ठीक कर दिया और यह कलकत्ता में यह बात फैल गई कि मां मंत्र के द्वारा लोगों को ठीक ठीक करती है तो जयराम बाटी में आध्यात्मिक पिपासु की वजह रोगियों की लाइन लंबी लग जाएगी तो यह भविष्य में ना हो इसके लिए भी ठाकुर ने इस मंत्र को दे इष्ट को दे देने के लिए मां को
प्रसंग: ठाकुर कैसे माँ की रक्षा करते थे
कहा और एक जो प्रसंग है देखिए वोह जो एक समय था आज से 100 सवा स साल पहले का 150 साल पहले का कि स्त्री और और पुरुष इन दोनों को बिल्कुल अलग से रहने की बात थी वह कोई मिक्स अप जो ना हो जाए यह एक था प्रश्न और दूसरा कि आध्यात्मिक क्षेत्र में ब्रह्मचर्य का पालन एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट है बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है तो मां मां के पास में कोई पुरुष जाकर के लंबी-लंबी बातें करें वो हंसी मजाक करें इस बात को ठाकुर बिल्कुल पसंद नहीं करते थे इसीलिए हम देखते हैं कि जितनी भी महिला भक्त आती है उनको तो ठाकुर मां के पास में भेज देते हैं वह भी जिसका शुद्ध चरित्र होगा वही सब तरह की महिलाएं फिर मां के पास में जाए वह भी उनको नहीं पसंद था वो जो कहानी है कि एक महिला ने आकर के मां जब खाने का थाला लेकर के ठाकुर के पास जा रही थी तो उस महिला ने आकर के मां से थाला ले लिया खाने का और क्या कहा कि मां मुझे दीजिए मैं ठाकुर को देके आती हूं फिर जब ठाकुर ने देखा कि अरे यह महिला थाला लेकर आई है खाने का तो बड़े ही मां के ऊपर में नाराज हो गए थे तुमको पता नहीं है कि उसका चरित्र कैसा है तुमने उसके द्वारा मुझे खाने को क्यों भेजा खाना तब मां ने क्या कहा था कि जो मां मां बोले ऐसे दाढ ले अमी थकते पबोना यदि मां बोल कर के आके कोई मेरे पास में कुछ मांगता है तो बिना दिए मैं रह नहीं पाऊंगी तो ये तो एक था कि ठाकुर वैसे कंट्रोल करना चाहते थे किंतु 100% कंट्रोल कर नहीं पाते थे कि कौन मां के पास में जाए नाना जाए किंतु जहां तक पुरुषों की बात है तो ठाकुर बड़े ही सीरियस थे इस मामले में कि अननेसेसरी जिनको कि ठाकुर ने स्वयं मां को इंट्रोड्यूस ना करवाया हो जैसे कि बूढ़ो गोपाल है न कि जैसे कि लाटू महाराज है उनके अलावा और कोई जाकर के मां के साथ में वार्तालाप करें हंसी मजाक करें इस बात को ठाकुर बिल्कुल पसंद नहीं करते थे और बड़ा ही क्रोधित हो जाते थे बड़े ही नाराज हो जाते थे यदि ऐसा कुछ वो देखेंगे तो देखिए कि अपने जो त्यागी संतान है उनको वह कभी-कभी कह देते थे कि अच्छा तुम जाओ मां के पास में से अभी जैसे कि गाड़ी भाड़ा लेने की बात है तो जैसे कि अभी बाबूराम महाराज है वगैरह उनके पास में कोई इतना तो रुपया था नहीं या तो फिर घर में से इतना रुपया नहीं देंगे कि वह जो दक्षिणेश्वर में परमहंस रहते हैं तो उनके पास जाना है तो घोड़ा गाड़ी का ना कि नौका का रुपया दीजिए तो ऐसा घर में से तो शायद मिलेगा नहीं तो कोई त्यागी लड़कों को ठाकुर कह देते थे कि नबत में मां है उसके पास में से रुपया ले लो आने जाने का यह गाड़ी भाड़ा वगैरह जो भी होता है उसके लिए तो अब ये बाबूराम महाराज ना कि कौन एग्जैक्ट में भूल गया वो जब रुपया लेने को जाते मां के पास में तो मां क्या करती वो जो नबत की चौखट है यानी कि जो दरवाजे के बाहर में मां को पता था कि ये इसी टाइम पे यह पैसा लेने के लिए आएगा तो फिर क्या करते थी मां कि इतना रुपया लेकर के वो बाहर में रख देती थी वह खुद भीतर में चली जाती थी और यह त्यागी संतान भी मां का वह आकर के वहां से रुपया लेकर के चला जाएगा पैसा लेकर चला जाएगा हो सकता है बाहर से मां को प्रणाम बताया किंतु मां का दर्शन करना वह सब इतना वोह वोह भी मां भी इनकरेज नहीं करती थी ठाकुर भी इनकरेज नहीं करते थे किंतु यहां पर एक ऐसी घटना के बारे में कि जब हृदय एक बार मां के साथ में बात कर रहा था हसी मजाक कर रहा था तो वह देख कर के ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए और हृदय को डांट दिया कि यदि तुम किसी काम के लिए नहब में जाते हो तो जो काम है खत्म करके सीधे चले आओ वहां पर खड़े रह करर के मां और लक्ष्मी दीदी भी तो थी वहां पे तो उनके साथ में वार्तालाप करना हंसी मजाक करना यह सब बिल्कुल नहीं चलेगा ऐसा ठाकुर ने हृदय को डांट करके कह दिया था तो वही घटना यहां पे श्री मां के तीनी अति सावधान रखा करी तेन श्री मां को ठाकुर बड़े ही सावधान पूर्वक रक्षा करते थे श्री मायर कथा ईते ही जाना जाए मां की बात से ही हमको यह बात पता चलती है यह बात हमको मां ने ही कही है नौबत थाक बार समय ठाकुर एमन की रामलाल के हमार काछ आते बारण करते रामलाल तो भासुर प होए नबत में जब मैं रहती थी उस समय ठाकुर दूसरों को तो छोड़ ही दीजिए रामलाल को मेरे पास में आने से मना कर देते थे और रामलाल तो भासुर पो अर्थात कि जो जेठ होता है उसका लड़का यानी कि ठाकुर तो उन मां के हस्बैंड ठाकुर के भाई का लड़का तो वो तो मने रिलेटिव ही होता है किंतु उसको भी ठाकुर उन मां के पास में आने से मना कर देते थे एक दिन श्री मां और लखी देवी के शोकाल नोटर समय भगतानी और राधाकांत प्रसादी फल मिष्ठान नादी दते गया श्रीजू तो हृदय अनेक गल्पो और हशद कोरिया ठाकुरे निकट फिरी ले तीनी तहा के तीव्र भर्स णा कररिया बोलिया लेन एक दिन श्री मां और लक्ष्मी दीदी को सुबह को 9 बजे के समय भवता आरणी और राधाकांत के प्रसादी फल मिष्ठान फल और मिठाई देने के लिए जब हृदय गया था नबत में उस समय बहुत हंसी मजाक और वार्तालाप करके जब वो ठाकुर के पास में फिरत आया तब ठाकुर ने उसको बड़े ही कड़े स्वर में बड़े ही क्रोधित होकर के कहा जाबी आर दिए चोले आश बी जाओ और जाकर के देकर के चले आना खबरदार कखन जेनो आर देरी ना होए खबरदार कभी भी देरी ना हो वहां पर खड़े रहना गप लगाना हंसी मजा करना ऐसा बिल्कुल नहीं चलेगा यदि मां भवता करणी का राधाकांत का प्रसाद और मिठाई भाई नबत में देने के लिए जाना है तो जाकर के चले आओ और फिर कोई किसी तरह का वार्तालाप नहीं चलेगा देखिए यही नियम बाद में मां कोलकात्ता में या तो जयराम बाटी में थी इसी नियम का पालन करती थी देखिए कि साधु जो होते हैं या तो फिर आध्यात्मिक साधक जो होते हैं उनका जीवन जो है ना उनका माइंड बड़ा ही सेंसिटिव होता है यदि कोई भी सांसारिक चीजें उनको स्पर्श करती है ना तो संसार में रहने के समय उस चीजों की जो इस व्यक्ति के सांसारिक व्यक्ति पर जो असर होगी उससे हजार गुना असर एक साधक के मन पर होगी यह एक पैराडॉक्स है यदि एक संसारी है उसके सामने संसार का प्रलोभन का कोई एक वस्तु आ जाए तो वह तो वैसे ही प्रलोभन के भीतर में रहता है वैसे ही वह तो प्रलोभन को भोग करता है नियमित रूप से तो यह प्रलोभन ना उसके सामने इतने डेंजरस या तो इतने आकर्षक नहीं प्रतीत होते जबकि जो साधक प्रलोभन का त्याग करने का प्रयास करता है उनके सामने प्रलोभन बहुत बड़े होकर के दिखते हैं तो जिस तरह से ठाकुर मां की रक्षा करते थे वैसे ही मां उनके साथ में जो त्यागी संतान रहते थे साधु ब्रह्मचारी रहते थे मां उतनी ही उनकी रक्षा करती थी उद्बोधन में एक बार राधु राधू जो पैर में पायल पहन कर के वो इधर-उधर दौड़ रही थी अब यह पायल की तो आवाज होगी और यह आवाज जो भी सुनेगा उसको पता चल ही जाएगा कि यह किसी स्त्री के पैरों की आवाज है तो यह आवाज सुनकर के वैसे सांसारिक व्यक्ति के मन में हो सकता है कि इतना प्रलोभन ना हो किंतु साधु सन्यासी जो कि सब कुछ त्याग करने का प्रयास कर रहे हैं उनके मन में इससे प्रलोभन प्रकट हो सकता है तो इमीडिएट मां ने राधु को डांट कर के कहा कि राधू तुमको शर्म नहीं आती है यहां पर हम साधु ब्रह्मचार्य से घिर कर के रहते हैं उसमें तुम यह पायल पहन कर के अपने पैरों में इधर-उधर दौड़ रही हो जोर-जोर से हंसी मजाक कर रही हो चुपचाप यहां पे शांति से बैठो साधुओं को अपनी साधना करने दो उनके कार्य में उनके मन पे विक्षेप ना लगाओ इस तरह से मां ने राधु को डांट दिया था फिर कभी-कभी साधुओं को डांटने की आवश्यकता पड़ जाती है एक बार मां का एक संतान वो सेवक महाराज तो वही उद्बोधन की ही बात है हम हमको पता है कि मां जब उद्बोधन में रहती थी तो ग्राउंड फ्लोर प यह सब साधु सन्यासी रहते थे ब्रह्मचारी और फर्स्ट फ्लोर पे मां अपनी ये जो स्त्री भक्त वगैरह है राधू नलिनी ये जो उनके जो कुटुंबी है संबंधी उनके साथ में रहती थी तो अभी एक बार ऐसा हुआ कि मां का एक सेवक मां की सेवा करने के लिए अभी तो बीच-बीच में ऊपर आना ही पड़ेगा किंतु क्या है ना एक प्रोपोर्शन होता है तो अभी यह सेवक महाराज थे बार-बार मां के पास में जा रहे हैं कभी यह मां के लिए पान सजा करके गए पान सजाने के लिए मां के पास में गए कभी किसी महाराज का मैसेज लेकर के गए कुछ ना कुछ कारण से वो बार-बार वह फर्स्ट फ्लोर पर मां के पास में जा रहे हैं तो मां ने लक्ष्य किया कि जितनी एक मिनिमम आवश्यकता है यहां पे हृदय को ठाकुर ने क्या कहा ठाकुर ने हृदय को यह नहीं कहा कि तुम प्रसाद लेकर मत जाओ उन्होंने कहा कि प्रसाद लेकर जाओ किंतु जो जाक के देक चले आओ इसके बाद में और कोई लप्पन छप्पन मत करो जो एक बेर मिनिमम करना होता है उसको करना है उसके आगे कुछ नहीं करना है तो यहां पे मां ने लक्ष्य किया कि ये उनका जो त्यागी सेवक है ब्रह्मचारी य साधु वो बार-बार ऊपर आ रहे हैं फिर हो सकता है कि 10 लोगों के साथ में गप भी लगाते हो तब जाकर के मां ने उनको डांट दिया कि देखो इस तरह से तुम बार-बार यहां पर आते हो मैं तो यह सब लड़कियों को लेकर के स्त्रियों को लेकर के रहता ती हूं तुमको इतनी यहां पे आने की जरूरत क्या है जितना आने की जरूरत है उतना उससे ज्यादा मत आओ ऐसा करके मां ने उनको डांट दिया था तो यह सब प्रसंग है अब और भी एक सुंदर प्रसंग है अ जयराम बाटी या कोवाल पाड़ा क्या है एग्जैक्ट लोकेशन में भूल गया किंतु उसी साइड का है तो मां के एक सेवक महाराज जमीन पर मां के सामने बैठे थे और मां के साथ में कुछ बात कर रहे थे या कुछ कार्य कर रहे थे तो उस समय एक लेडी डिवटी मां के साथ में तो बहुत सारी महिलाएं लड़कियां रहती थी तो एक लेडी डिवोटा वहां महाराज जी के पास में से जा रही है तो क्या हुआ कि उनकी साड़ी का आंचल इस महाराज जी को लग गया तो जैसे ही मां ने देखा बड़ी ही नाराज हो गई मां ने कहा कि उस लेडी डिवोटा को कहा कि अरे तुमको शर्म नहीं आती है तुम्हारी साड़ी का आंचल इस साधु को स्पर्श हो गया यह सन्यासी है तुम गृहस्थ हो अपनी साड़ी का आंचल इस तरह से स्पर्श करवा दिया उसने जाओ तुम प्रणाम करो महाराज को अभी महा ने इतना गंभीर स्वर से कहा कि यह महाराज भी थोड़े से डर गए और लेडी डिवटी भी एकदम बेचारी डर गई तो अभी क्या करेगी मां ने आदेश दिया है तो प्रणाम करना पड़ेगा तो प्रणाम करने को गई तो महाराज ऊपर से और ज्यादा लज्जित हो गए क्योंकि वह उम्र में कम थे छोटे थे और यह लेडी डिवटी उनसे उम्र में कहीं बड़ी थी किंतु अभी मां ने आदेश दिया है तो तो फिर प्रणाम ग्रहण करना पड़ेगा तो यह जो सब य साथ में रहने के समय में जो एक स्ट्रिक्ट नियमों का पालन करना पड़ता है कि सन्यास जीवन या तो फिर इन जनरल साधक जीवन कितना कठिन है आजकल देखिए कि हम लोग इतना अभी हम लोगों के पास में देखिए ठाकुर ने कहा था कि एक साधु जद रास्ते के ऊपर में से जा रहा है तो नजर नीची रखेगा ऊपर में नहीं देखेगा स्त्रियों के सामने उसकी नजर ना पड़ जाए किंतु नीची नजर रखते रखते जदी चलता है और पैरों के नीचे में एक स्त्री रूपी एक गुड़िया भी आ गई स्त्री के आकार की गुड़िया भी जद उसके पास में आ गई तो उसको भी यह साधु उसके सामने भी नहीं देखेगा तो यहां तक स्ट्रिक नियम अपने ऑर्डर में थे और थियोरेटिकली अभी भी है किंतु देखिए कि कार्य के समय में सभी के साथ में बात करनी पड़ती है स्वामी जी का तो जीवन देखिए कि बिल्कुल किस तरह का है स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो वह स्त्रियों स्त्री भक्तों के साथ में डिसाइल के साथ में एक ही मकान में एक ही घर में वास करते थे कैलिफोर्निया में जब गए थे तो ये मीड सिस्टर्स थी तीन मीड भगिया उन्होंने स्वामी जी को अपने घर आकर के रहने के लिए आमंत्रण दिया था तो स्वामी जी वहां पे उनके घर पर रहने को गए थे अभी देखिए कि वहां पे तो फिर भी यह मिड सिस्टर्स थी उनके पिताजी उनके साथ में थे बूढ़े थे वह उनके साथ में रहते थे किंतु जब यह बात हुई कि स्वामी जी अभी सैन फ्रांसिस को जाएंगे प्रवचन देने के लिए तब यह जो मिड सिस्टर थी एलिस हेंस ब्रो उसने कहा कि स्वामी जी मैं आपके एजेंट के रूप में आगे जाती हूं आपके लिए सब व्यवस्था करती हूं फिर आप वहां पे आइए तो वह खुद जब वहां पे गई और वहां प पहले तो जाकर के होम ऑफ ट्रुथ बोलक के एक जगह पे रहते थे एक बिल्डिंग में किंतु बाद में स्वामी जी ने देखा कि यहां पे सबके साथ में रहने से य होम ऑफ ट्रुथ क्या है एक सोसाइटी जैसा था वहां पे सब मिलकर के वेदांत की जो खिचड़ी रूपी कुछ साधना करते थे तो स्वामी जी ने कहा कि नहीं मेरे लिए अलग से मकान देखना पड़ेगा तो टर्क स्ट्रीट पे एक फ्लैट ठीक किया और स्वामी जी के साथ में रहने के लिए मिसेस एलिस हेंस ब्रो और यह जो होम ऑफ ट्रुथ की जो संचालिका थी उसका नाम मैं भूल गया यह दोनों स्त्रियां जाकर के वहां पे एज ए हाउसकीपर रहने लगी स्वामी जी के लिए खाना पकाती थी घर का सब साफ सफाई करती थी सब कुछ हेल्प करती थी और स्वामी जी क्लासेस लेते थे तो यहां तक कि प्रसंग है कि जब वह स्वामी जी का जो स्नान करने का बाथ टब वो एलिस हेंस ब्रो क्लीन कर रही है अभी यह उस समय तो अमेरिका में जैसे प्रथा है वोह लोग बाथ टब जो होता है उसमें व लोग स्नान करते हैं तो स्वामी जी जिस बात टप का व्यवहार करते थे वो उसको क्लीन कर रही है और स्वामी जी नाराज हो कर के बोलते हैं तुमको क्लीन करना नहीं आता है ठीक से इसको यहां पे इस तरह से क्लीन करो उसको क्लीन करो तो ये एलिस हेंस ब्रो नाराज होकर बोलती है वो भी थोड़ी नाराज हो गई स्वामी जी आपको इससे ज्यादा क्लीन चाहिए तो आप ही लीजिए यह कपड़ा यह जो भी क्लीन करने का सामान है आप ही कर दीजिए अपने से तो यह सब प्रसंग हम स्वामी जी के जीवन में देखते हैं निवेदिता का जो स्वामी जी के साथ में गुरु और शिष्य का जो संबंध था तो हमको प्रश्न होगा कि एक और यदि देखें कि ठाकुर और मां कितना स्ट्रिक्टली यह सब ऑब्जर्वेशन कर कितना स्ट्रिक्टली नियमों का पालन करते थे और स्वामी जी को देखिए और चलो स्वामी जी तो वो शिव भगवान स्वयं थे वह तो भैरव के अंश थे तो उनको तो कुछ बोलने की जरूरत नहीं है वह तो जो चाहे करे वो कर सकते निर्विकल्प समाधि प्राप्त की है बाल ब्रह्मचारी थे वह हमेशा ब्रह्मचार्य का पालन किया है तो किंतु यदि स्वामी जी ने जिस कर्मयोग का प्रारंभ किया अभी जिस तरह से अखंडानंद जी महाराज गांव-गांव जाकर के यह रिलीफ का कार्य करते थे या प्लेग रिलीफ वगैरह करते थे और इसके बाद में यह जो सेवा कार्य इंस्टीट्यूशनलाइज हुआ अपने ऑर्डर में यह जिस तरह से कनखल सेवाश्रम है वृंदावन वाराणसी सेवाश्रम है वहां पे रोगियों की सेवा करनी है तो साधु लोग तो फिर वहां पर जदी इस तरह से कहेंगे कि नहीं सेवा कार्य करने के समय स्त्रियों के साथ में बात नहीं करनी या तो फिर उनके सामने देखना भी नहीं तो वह कैसे चलेगा वह तो असंभव है तब हमको कहा जाता है कि शिव ज्ञान से जीव सेवा करनी है जिन रोगी का हम सेवा करते हैं उनके भीतर में वही ठाकुर वही मां वही स्वामी जी को ही देखना है जिससे कि हम जिनकी सेवा करते हो उनके प्र प्रति एक पवित्र भाव अपने मन में रहे तो यह थिरी तो ठीक है किंतु जद देखिए कि कंट्रा इक्स ये सब चीजों का कोई सोल्यूशन नहीं होता किंतु यह कंट्रा इक्स खड़ा करके इसके बारे में चर्चा करने से हमको आनंद आता है तो यही है कि यहां पे एक मां और ठाकुर का अप्रोच था इतना स्ट्रिक्टली वह देखते थे कि स्त्री और पुरुष कहीं पर भी इकट्ठा ना हो आपस में किसी तरह का वार्तालाप ना हो जो हो वो बेर मिनिमम जितना आवश्यक है कार्य चलाने के लिए उतना ही हो ऑन दी अदर हैंड हमको यहां पर पता है कि स्वामी जी ने जिस तरह से सेवा कार्य का प्रारंभ किया जिस तरह से रामकृष्ण संघ में स्कूल है हॉस्पिटल है यह कल्चरल एक्टिविटी है जिसमें ये आध्यात्मिक प्रवचन वगैरह है इन सब में जद आप स्त्रियों के साथ में ना उनके सामने ना देखें उनके साथ में बात ना करें यह तो हो ही नहीं सकता तो यह कंट्रा कैसा है ऐसा नहीं है कि इसका कोई मतलब ये रिकंस है रिकंस है कि जिनकी सेवा करते हैं जिनके साथ में बात करते हैं उनके भीतर में ईश्वर को देखना जिससे कि पवित्र भाव बना रहे किंतु फिर भी एक कंट्रा इक्स तो हमको दिखता ही है और यह सब पैराडॉक्स कंट्रा क्शन नहीं करके मैं शब्द यूज करूंगा पैराडॉक्स पैराडॉक्स ये साइंटिफिक वर्ड है उसका अर्थ है कि दो सिद्धांत जो कि इक्वली सही है किंतु दोनों अपोजिट डायरेक्शन में ले जाते हैं कंट्रा क्शन यानी कि क्या कि कुछ सही है कुछ गलत है और दोनों के बीच में मिसमैच है किंतु पैराडॉक्स का अर्थ है कि दो सिद्धांत जो कि इक्वली करेक्ट इक्वली ट्रू है किंतु हमको अपेरेंटली अपोजिट डायरेक्शन में ले जाते हैं सो पैराडॉक्स आई विल यूज द वर्ड कि इस तरह के पैराडॉक्स रामकृष्ण संघ में कितने सारे हैं तो यहां पर भी कि ठाकुर ने हृदय को डांट करके कह दिया कि वहां पर जाना जो भी कार्य है समाप्त करके चले आना खबरदार कखन जनवार देरी ना होए खबरदार कभी भी कोई भी किसी भी तरह की डिले ना हो विलंब ना हो देरी ना हो अभी इसके बाद का जो प्रसंग है वह काफी बड़ा है तो इसको अभी हम कल देखते हैं आजही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण
प्रश्न: हमने अन्य स्थानों पर देखा है कि वे चमत्कारों के बारे में बहुत बात करते हैं और कहते हैं कि चमत्कारों में विश्वास एक दिन हमें तपस्या और साधना की ओर ले जाएगा।
मस्तु मागर मा छल झोल जुब मेर कोल बोल हरि बोल ना देखिए कि रामकृष्ण मिशन में भी तो यह कल्पतरू वाले ठाकुर है अभी देखिए कि मेरा खुद का जो ऑब्जर्वेशन है मैं जब यहां पर पहली पहली बार आया था ना तो कल्पतरु का सेलिब्रेशन मैंने देखा था सिर्फ काशीपुर में ही होता है और कहीं सेंटर में मैंने नहीं देखा था आजकल मैं देखता हूं कि सभी सेंटर में कल्पतरु का सेलिब्रेशन हो रहा है यहां विशाखापट्टनम में फर्स्ट जनवरी को हुआ था पूरा मंदिर भर गया था माने मोर पीपल देन एनी अदर डे तो मैं भी चकित हो गया कि अच्छा यह कल्पतरु डे इतना फेमस है और तो देखिए कि एवरीवन लाइक्स चमत्कार अभी देखिए यह कल्पतरु नाम भी जो है ना वह भी एक्चुअली गलत नाम है हमने देखा था किय कल्पतरु नाम दिया है रामचंद्र ने और रामचंद्र दत्त ने और शरत महाराज ने लीला प्रसंग में स्पष्ट रूप से लिखा है कि हमको उसको कल्पतरु नहीं दिन नहीं बोल कर के आत्म प्रकाश दिवस है ना वो नाम देना चाहिए जो आत्म प्रकाश तो यह आत्म प्रकाश नाम नहीं देकर के हमने वही रामचंद्र वाला कल्पतरु नाम ले लिया है सो मैंने देखिए कि चमत्कार यहां पर भी इस तरह से घुस गया
प्रश्न: कल्पतरु दिवस पर ठाकुर ने स्वयं किसी को वैषयिक समृद्धि का आशीर्वाद नहीं दिया था, है न?
है नहीं किया था किंतु आप देखिए आप लोगों का मेंटालिटी समझिए मैं जद यह कहता हूं कि यह कल्पतरु दिन है तो फिर मैं उसका क्या अर्थ घटन करूंगा कल्पतरु तो सब कुछ देता है शरत महाराज ने यह भी है यह जो आपने बात कही एगजैक्टली यही बात शरत महाराज ने लीला प्रसंग में कही है वो रीजन देते हैं कि हम क्यों इस दिन को कल्पतरु नहीं कहते अभयदान आत्म प्रकाश यह नाम हमने क्यों दिया है कल्पतरु क्यों नहीं दिया है क्योंकि कल्पतरु आपको सब कुछ देता है सांसारिक चीजें भी देता है ऐश्वर्य विद्या का ऐश्वर्य भी देता है और सांसारिक ऐश्वर्य भी देता है दिव्यता भी देता है सब कुछ देता है जबकि ठाकुर ने स्पेसिफिकली आपको आध्यात्मिकता ही दी है इसीलिए अभदा ने आत्मा प्रकाश यह नाम बेटर है यह जो आपने कहा एगजैक्टली वही बात कि हम कल्पतरु क्यों नहीं कहते कल्पतरु आपको सब कुछ दे सकता है मैं कहूंगा पैसा चाहिए पैसा दे देगा मैं कहूंगा मुझे यह शोहरत चाहिए इज्जत चाहिए प्रेस्टीज चाहिए तो सब कुछ दे देगा ठाकुर इस तरह से नहीं करेंगे ठाकुर तो आपको आध्यात्मिकता ही देंगे दैट इज व्हाई कल्पतरु नेम इज रंग इसके बावजूद लीला प्रसंग में इतना स्पष्ट रूप से लिखने के बावजूद रामकृष्ण मिशन ही उसी प्रसंग को कल्पतरु के रूप में प्रोपेगेटर रहा है नाव अभी आपको क्या बोलना है इसके बारे में आप लोगों को कहेंगे कि कल्प त अरुदीन है किंतु आपको सिर्फ आध्यात्मिकता ही मांगनी है अपने घर में जो प्रॉब्लम है उसका सोल्यूशन मत मांगिए लोग थोड़ी ना सुनने वाला है आपने जो प्रसंग कहा वह शशर
प्रश्न: किसी ने ठाकुर से कहा कि कैंसर के उपचार के लिए माँ काली से प्रार्थना करें। यदि हम भगवान से ऐसी कृपा नहीं मांगेंगे तो फिर किससे मांगेंगे? संसार के कष्टों के समाधान के लिए गृहस्थ कहाँ जाएँगे?
पंडित ने ठाकुर को कहा था कि आपके पास में तो यह सब सिद्धि है आप मां को कहिए कि आपको ठीक कर दे गले का कैंसर तो ठाकुर ने उस समय तो मना कर दिया किंतु ये नरेण वगैरह वहां पर बैठे हुए थे तो जैसे ही यह पंडित गया नर ने फिर पकड़ लिया कि आपको आपके लिए ठीक करने की जरूरत नहीं है हमारे लिए कीजिए तो फिर ठाकुर मान लिए कि यदि नरेण ऐसा कहता है कि आपको अपने लिए स्वार्थ के लिए तो नहीं कर रहे है ना दूसरों के लिए कर रहा है तो निस्वार्थ आ जाती है तो फिर ठाकुर ने मां को बोल दिया था कि वह जो एशियाटिक सोसाइटी में वो हड़ पिंजर वो जो स्केलेटल एक देखा था वोह तार से बांधा हुआ तो ऐसा कुछ ठीक-ठाक कर दो फिर इस तरह से उन्होंने मां के पास में मांगा था हालांकि वो भी मां ने नहीं दिया और एक बार जब ठाकुर ने यह कहा किय खाने में दर्द हो रहा है गले में तो उसका कुछ सॉल्यूशन ला दो तो मां ने क्या उत्तर दिया कि तुम इतने सारे मुंह से तो तुम ही खा रहे हो तो तो स्वामी जी का देखिए कि घर में जब प्रॉब्लम है ठाकुर के पास स्वामी जी खुद कि वो ठाकुर के पास में गए आपको कुछ कर देना पड़ेगा मेरे घर का प्रॉब्लम सॉल्व कर देना पड़ेगा ठाकुर ने कहा जाओ मां के पास में मां काली के पास में स्वामी जी गए मुंह से क्या निकल आया तीन बार गए तीनों बार ज्ञान भक्ति वैराग्य माग करके आए तो इन लोगों का कैटेगरी ही अलग होता है जब क कि आपके खुद के लिए मांगो तो ठाकुर ने पहले तो मनाही ही कर दिया फिर नरेंद्र ने कहा हमारे लिए मांगिए तो कहीं जाकर के उन्होंने बोलने का साहस किया नरेंद्र को खुद को अपने घर के बारे में मांगने को गया तो मुंह से तो वही आ गया कि ज्ञान भक्ति वैराग्य तभी एक बात है कि जैसे हम लोगों के लिए है मैं बिल्कुल सही बात है कि हम मां को नहीं बोलेंगे तो किसको बोलेंगे कि जिस तरह से क्राइसिस आ जाती है जगत में अपने जीवन में तो हम लोग बोल सकते हैं व नहीं बोलना है ऐसा कुछ नहीं है किंतु एक ही बात है कि देखिए साथ-साथ में अभी यह ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप सिर्फ ना हो जाए अभ यह ठाकुर ने ही बाद में कहा ना नरेण का ही प्रसंग यही प्रसंग कि जब नरेण मां के पास में जब गया तो ज्ञान भक्ति वैराग्य मा के आया किंतु जब ठाकुर के पास में आया तो ठाकुर ने कह दिया कि अच्छा ठीक है चलो मोटा भात का पड़ अभाव थाक ना अर्थात कि जो मोटा मोटी जो खाने और कपड़े का जो अभाव है वह नहीं रहेगा माने नर को मिला किंतु इनडायरेक्टली मिला यदि वो नर वही मांगने को जाता तो इतना ही मिलता उससे ज्यादा और कुछ नहीं मिलता जीवन भर के लिए वह प्रोग्रेस वहीं पर ठप हो जाता किंतु अभी सुदामा की कहानी है वह उनकी पत्नी बार-बार धक्का मार कर के भेजती है जाओ तुम्हारे मित्र है वहां पे तो गए तो भगवान कृष्ण के पास में गए तो गप तो लगाए दुनिया भर के किंतु मुंह से बोल नहीं पाए कि भाई मुझे इतनी मदद कर दो किंतु जब घर पर आए तो देखा सब कुछ ठीक-ठाक हो गया था तो ये क्या है कि आप ईश्वर के पास में ज्ञान भक्ति वैराग्य मांगेंगे तो ईश्वर आपको फिर वोह इतना ही देक छोड़ नहीं देंगे इतनी तो अकल ईश्वर में भी है कि वह बाकी सब व्यवस्था हमारे लिए इतनी कर दे किंतु बात वही है कि जद डायरेक्टली वह मांगने को जाएंगे तो फिर उतना ही मिलेगा फिर उससे ज्यादा और कुछ नहीं मिलेगा तो हमको एक स्मार्ट चॉइस करनी है कि मुझे सब कुछ चाहिए मैंने वो ठाकुर कहते हैं ना कि कोई सहनाई जब बजाता है ना तो एक ही सूर बजाता है किंतु मैं तो सभी सूर बजाता हूं तो मैं सभी सूर का आनंद लेता हूं तो हम हम भी एक लेट अस मेक अ स्मार्ट चॉइस कि ईश्वर के पास में मांगे तो विद्या अपने आध आध्यात्मिक उसी वही को मांगे फिर मां के ऊपर में छोड़ दे कि आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए जो एक पीस ऑफ माइंड चाहिए एक पारि पार्श्विक एक अवस्था रोटी कपड़ा नहीं मिलने से तो मेरा मन उसी में रहेगा मैं कहां से वो सब कर पाऊंगा यदि नरेंद्र का मन अपनी मां के ऊपर में भाइयों के ऊपर में ही रहता तो वह देश छोड़ कर के विदेश जाकर के इतना सब नहीं कर पाता तो वहां से तो इसलिए उसके माइंड को उठा देना है इतना तो सहूलियत पहुंचा देनी है सो लेट अस मेक अ स्मार्ट चॉइस इस तरह से मां के पास में मांगे वो जो एक आशीर्वाद है ना वो किसी ने कहा था कि तुमको एक आशीर्वाद देता हूं एक मने विष देता हूं तो वह कहता है कि अच्छा एक ही विष देते हैं ठीक है कि मैं वृद्ध अवस्था में अपने पौत्र के साथ में बैठ कर के सोने की थाली में खाऊं यानी उसने सब मांग लिया इसमें वृद्ध अवस्था में यानी कि लंबी आयु मांग ली पौत्र के साथ में बैठ के यानी कि वो पूरा भरा भरा भरा संसार मांग लिया सोने की थाली में बैठ के खाना ऐश्वर्य भी मांग लिया तो ऐसा एक स्मार्ट हमको करना है कि इस पास में ज्ञान भक्ति वैराग्य मांगी बट ट्रस्ट गॉड कि बाकी का वो जो पारि पार्षिक वो ठीक करके रखेंगे रामकृष्ण मिशन की देखिए ना अवस्था मां शारदा देवी ने स्वयं जाकर के देखा कि वह बध गया में कि बौद्ध भिक्खू के मठ में इतना ऐश्वर्य है तब मां ने ठाकुर को प्रार्थना की कि मेरे लड़के भिक्षा मागते मागते रास्ते रास्ते पर भटक रहे हैं उनके लिए रहने खाने की कुछ व्यवस्था कर दो तो यदि हम आध्यात्मिक जीवन में जेनुइन है तो हमारे लिए ठाकुर यह सब कर ही देंगे फिर वह मांगने की जरूरत नहीं है बट वी हैव टू बी स्मार्ट मनमुक एक करना है फिर हमने ऐसा किसी से सुन लिया कि अच्छा ठीक है हम ठाकुर को पटा लेते हैं अभी मुंह से तो इस तरह से मांगेंगे मन में मन में वह आशा रहेगी तो ऐसा भी नहीं चलेगा वी हैव टू बी वेरी ऑनेस्ट इन अवर अप्रोच टुवर्ड स्पिरिचुअलिटी देन एवरीथिंग एल्स विल कम